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  • आधार

    प्रेमचंद सारे गॉँव में मथुरा का सा गठीला जवान न था। कोई बीस बरस की उमर थी। मसें भीग रही थी। गउएं चराता, दूध पीता, कसरत करता, कुश्ती लडता था और सारे दिन बांसुरी बजाता हाट में विचरता था। ब्याह हो गया था, पर अभी कोई बाल-बच्चा न था। घर में कई हल की खेती थी, कई छोटे-बडे भाई थे। वे सब मिलचुलकर खेती-बारी करते थे। मथुरा पर सारे गॉँव को गर्व था, जब उसे जॉँघिये-लंगोटे, नाल या मुग्दर के लिए रूपये-पैसे की जरूरत पडती तो तुरन्त दे दिये जाते थे। सारे घर की यही अभिलाषा थी कि मथुरा पहलवान हो जाय और अखाडे में अपने सवाये को पछाडे। इस लाड – प्यार से मथुरा जरा टर्रा हो गया था। गायें किसी के खेत में पडी है और आप अखाडे में दंड लगा रहा है। कोई उलाहना देता तो उसकी त्योरियां बदल जाती। गरज कर कहता, जो मन में आये कर लो, मथुरा तो अखाडा छोडकर हांकने न जायेंगे! पर उसका डील-डौल देखकर किसी को उससे उलझने की हिम्मत न पडती। लोग गम खा जाते। गर्मियों के दिन थे, ताल-तलैया सूखी पडी थी। जोरों की लू चलने लगी थी। गॉँव में कहीं से एक सांड आ निकला और गउओं के साथ हो लिया। सारे दिन गउओं के साथ रहता, रात को बस्ती में घुस आता और खूंटो से बंधे बैलो को सींगों से मारता। कभी-किसी की गीली दीवार को सींगो से खोद डालता, घर का कूडा सींगो से उडाता। कई किसानों ने साग-भाजी लगा रखी थी, सारे दिन सींचते-सींचते मरते थे। यह सांड रात को उन हरे-भरे खेतों में पहुंच जाता और खेत का खेत तबाह कर देता। लोग उसे डंडों से मारते, गॉँव के बाहर भगा आते, लेकिन जरा देर में गायों में पहुंच जाता। किसी की अक्ल काम न करती थी कि इस संकट को कैसे टाला जाय। मथुरा का घर गांव के बीच में था, इसलिए उसके खेतों को सांड से कोई हानि न पहुंचती थी। गांव में उपद्रव मचा हुआ था और मथुरा को जरा भी चिन्ता न थी। आखिर जब धैर्य का अंतिम बंधन टूट गया तो एक दिन लोगों ने जाकर मथुरा को घेरा और बोले—भाई, कहो तो गांव में रहें, कहीं तो निकल जाएं। जब खेती ही न बचेगी तो रहकर क्या करेगें? तुम्हारी गायों के पीछे हमारा सत्यानाश हुआ जाता है, और तुम अपने रंग में मस्त हो। अगर भगवान ने तुम्हें बल दिया है तो इससे दूसरो की रक्षा करनी चाहिए, यह नही कि सबको पीस कर पी जाओ। सांड तुम्हारी गायों के कारण आता है और उसे भगाना तुम्हारा काम है; लेकिन तुम कानों में तेल डाले बैठे हो, मानो तुमसे कुछ मतलब ही नही। मथुरा को उनकी दशा पर दया आयी। बलवान मनुष्य प्राय: दयालु होता है। बोला—अच्छा जाओ, हम आज सांड को भगा देंगे। एक आदमी ने कहा—दूर तक भगाना, नही तो फिर लौट आयेगा। मथुरा ने कंधे पर लाठी रखते हुए उत्तर दिया—अब लौटकर न आयेगा। चिलचिलाती दोपहरी थी। मथुरा सांड को भगाये लिए जाता था। दोंनो पसीने से तर थे। सांड बार-बार गांव की ओर घूमने की चेष्टा करता, लेकिन मथुरा उसका इरादा ताडकर दूर ही से उसकी राह छेंक लेता। सांड क्रोध से उन्मत्त होकर कभी-कभी पीछे मुडकर मथुरा पर तोड करना चाहता लेकिन उस समय मथुरा सामना बचाकर बगल से ताबड-तोड इतनी लाठियां जमाता कि सांड को फिर भागना पडता कभी दोनों अरहर के खेतो में दौडते, कभी झाडियों में। अरहर की खूटियों से मथुरा के पांव लहू-लुहान हो रहे थे, झाडियों में धोती फट गई थी, पर उसे इस समय सांड का पीछा करने के सिवा और कोई सुध न थी। गांव पर गांव आते थे और निकल जाते थे। मथुरा ने निश्चय कर लिया कि इसे नदी पार भगाये बिना दम न लूंगा। उसका कंठ सूख गया था और आंखें लाल हो गयी थी, रोम-रोम से चिनगारियां सी निकल रही थी, दम उखड गया था; लेकिन वह एक क्षण के लिए भी दम न लेता था। दो ढाई घंटो के बाद जाकर नदी आयी। यही हार-जीत का फैसला होने वाला था, यही से दोनों खिलाडियों को अपने दांव-पेंच के जौहर दिखाने थे। सांड सोचता था, अगर नदी में उतर गया तो यह मार ही डालेगा, एक बार जान लडा कर लौटने की कोशिश करनी चाहिए। मथुरा सोचता था, अगर वह लौट पडा तो इतनी मेंहनत व्यर्थ हो जाएगी और गांव के लोग मेंरी हंसी उडायेगें। दोनों अपने–अपने घात में थे। सांड ने बहुत चाहा कि तेज दौडकर आगे निकल जाऊं और वहां से पीछे को फिरूं, पर मथुरा ने उसे मुडने का मौका न दिया। उसकी जान इस वक्त सुई की नोक पर थी, एक हाथ भी चूका और प्राण भी गए, जरा पैर फिसला और फिर उठना नशीब न होगा। आखिर मनुष्य ने पशु पर विजय पायी और सांड को नदी में घुसने के सिवाय और कोई उपाय न सूझा। मथुरा भी उसके पीछे नदी में पैठ गया और इतने डंडे लगाये कि उसकी लाठी टूट गयी। अब मथुरा को जोरो से प्यास लगी। उसने नदी में मुंह लगा दिया और इस तरह हौंक-हौंक कर पीने लगा मानो सारी नदी पी जाएगा। उसे अपने जीवन में कभी पानी इतना अच्छा न लगा था और न कभी उसने इतना पानी पीया था। मालूम नही, पांच सेर पी गया या दस सेर लेकिन पानी गरम था, प्यास न बुंझी; जरा देर में फिर नदी में मुंह लगा दिया और इतना पानी पीया कि पेट में सांस लेने की जगह भी न रही। तब गीली धोती कंधे पर डालकर घर की ओर चल दिया। लेकिन दस पांच पग चला होगा कि पेट में मीठा-मीठा दर्द होने लगा। उसने सोचा, दौड कर पानी पीने से ऐसा दर्द अकसर हो जाता है, जरा देर में दूर हो जाएगा। लेकिन दर्द बढने लगा और मथुरा का आगे जाना कठिन हो गया। वह एक पेड के नीचे बैठ गया और दर्द से बैचेन होकर जमीन पर लोटने लगा। कभी पेट को दबाता, कभी खडा हो जाता कभी बैठ जाता, पर दर्द बढता ही जाता था। अन्त में उसने जोर-जोर से कराहना और रोना शुरू किया; पर वहां कौन बैठा था जो, उसकी खबर लेता। दूर तक कोई गांव नही, न आदमी न आदमजात। बेचारा दोपहरी के सन्नाटे में तडप-तडप कर मर गया। हम कडे से कडा घाव सह सकते है लेकिन जरा सा-भी व्यतिक्रम नही सह सकते। वही देव का सा जवान जो कोसो तक सांड को भगाता चला आया था, तत्वों के विरोध का एक वार भी न सह सका। कौन जानता था कि यह दौड उसके लिए मौत की दौड होगी! कौन जानता था कि मौत ही सांड का रूप धरकर उसे यों नचा रही है। कौन जानता था कि जल जिसके बिना उसके प्राण ओठों पर आ रहे थे, उसके लिए विष का काम करेगा। संध्या समय उसके घरवाले उसे ढूंढते हुए आये। देखा तो वह अनंत विश्राम में मग्न था। एक महीना गुजर गया। गांववाले अपने काम-धंधे में लगे। घरवालों ने रो-धो कर सब्र किया; पर अभागिनी विधवा के आंसू कैसे पुंछते। वह हरदम रोती रहती। आंखे चांहे बन्द भी हो जाती, पर ह्रदय नित्य रोता रहता था। इस घर में अब कैसे निर्वाह होगा? किस आधार पर जिऊंगी? अपने लिए जीना या तो महात्माओं को आता है या लम्पटों ही को। अनूपा को यह कला क्या मालूम? उसके लिए तो जीवन का एक आधार चाहिए था, जिसे वह अपना सर्वस्व समझे, जिसके लिए वह जिये, जिस पर वह घमंड करे। घरवालों को यह गवारा न था कि वह कोई दूसरा घर करे। इसमें बदनामी थी। इसके सिवाय ऐसी सुशील, घर के कामों में कुशल, लेन-देन के मामलो में इतनी चतुर और रंग रूप की ऐसी सराहनीय स्त्री का किसी दूसरे के घर पड जाना ही उन्हें असह्रय था। उधर अनूपा के मैककवाले एक जगह बातचीत पक्की कर रहे थे। जब सब बातें तय हो गयी, तो एक दिन अनूपा का भाई उसे विदा कराने आ पहुंचा। अब तो घर में खलबली मची। इधर कहा गया, हम विदा न करेगें। भाई ने कहा, हम बिना विदा कराये मानेंगे नही। गांव के आदमी जमा हो गये, पंचायत होने लगी। यह निश्चय हुआ कि अनूपा पर छोड दिया जाय, जो चाहे करे। यहां वालो को विश्वास था कि अनूपा इतनी जल्द दूसरा घर करने को राजी न होगी, दो-चार बार ऐसा कह भी चुकी थी। लेकिन उस वक्त जो पूछा गया तो वह जाने को तैयार थी। आखिर उसकी विदाई का सामान होने लगा। डोली आ गई। गांव-भर की स्त्रिया उसे देखने आयीं। अनूपा उठ कर अपनी सांस के पैरो में गिर पडी और हाथ जोडकर बोली—अम्मा, कहा-सुनाद माफ करना। जी में तो था कि इसी घर में पडी रहूं, पर भगवान को मंजूर नही है। यह कहते-कहते उसकी जबान बन्द हो गई। सास करूणा से विहृवल हो उठी। बोली—बेटी, जहां जाओं वहां सुखी रहो। हमारे भाग्य ही फूट गये नही तो क्यों तुम्हें इस घर से जाना पडता। भगवान का दिया और सब कुछ है, पर उन्होने जो नही दिया उसमें अपना क्या बस; बस आज तुम्हारा देवर सयाना होता तो बिगडी बात बन जाती। तुम्हारे मन में बैठे तो इसी को अपना समझो: पालो-पोसो बडा हो जायेगा तो सगाई कर दूंगी। यह कहकर उसने अपने सबसे छोटे लडके वासुदेव से पूछा—क्यों रे! भौजाई से शादी करेगा? वासुदेव की उम्र पांच साल से अधिक न थी। अबकी उसका ब्याह होने वाला था। बातचीत हो चुकी थी। बोला—तब तो दूसरे के घर न जायगी न? मां—नही, जब तेरे साथ ब्याह हो जायगी तो क्यों जायगी ? वासुदेव-- तब मैं करूंगा। मां—अच्छा, उससे पूछ, तुझसे ब्याह करेगी। वासुदेव अनूप की गोद में जा बैठा और शरमाता हुआ बोला—हमसे ब्याह करोगी? यह कह कर वह हंसने लगा; लेकिन अनूप की आंखें डबडबा गयीं, वासुदेव को छाती से लगाते हुए बोली ---अम्मा, दिल से कहती हो? सास—भगवान् जानते है! अनूपा—आज यह मेंरे हो गये? सास—हां सारा गांव देख रहा है। अनूपा—तो भैया से कहला भेजो, घर जायें, मैं उनके साथ न जाऊंगी। अनूपा को जीवन के लिए आधार की जरूरत थी। वह आधार मिल गया। सेवा मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति है। सेवा ही उस के जीवन का आधार है। अनूपा ने वासुदेव को लालन-पोषण शुरू किया। उबटन और तैल लगाती, दूध-रोटी मल-मल के खिलाती। आप तालाब नहाने जाती तो उसे भी नहलाती। खेत में जाती तो उसे भी साथ ले जाती। थोडे की दिनों में उससे हिल-मिल गया कि एक क्षण भी उसे न छोडता। मां को भूल गया। कुछ खाने को जी चाहता तो अनूपा से मांगता, खेल में मार खाता तो रोता हुआ अनूपा के पास आता। अनूपा ही उसे सुलाती, अनूपा ही जगाती, बीमार हो तो अनूपा ही गोद में लेकर बदलू वैध के घर जाती, और दवायें पिलाती। गांव के स्त्री-पुरूष उसकी यह प्रेम तपस्या देखते और दांतो उंगली दबाते। पहले बिरले ही किसी को उस पर विश्वास था। लोग समझते थे, साल-दो-साल में इसका जी ऊब जाएगा और किसी तरफ का रास्ता लेगी; इस दुधमुंहे बालक के नाम कब तक बैठी रहेगी; लेकिन यह सारी आशंकाएं निमूर्ल निकलीं। अनूपा को किसी ने अपने व्रत से विचलित होते न देखा। जिस ह्रदय में सेवा को स्रोत बह रहा हो—स्वाधीन सेवा का—उसमें वासनाओं के लिए कहां स्थान? वासना का वार निर्मम, आशाहीन, आधारहीन प्राणियों पर ही होता है चोर की अंधेरे में ही चलती है, उजाले में नही। वासुदेव को भी कसरत का शोक था। उसकी शक्ल सूरत मथुरा से मिलती-जुलती थी, डील-डौल भी वैसा ही था। उसने फिर अखाडा जगाया। और उसकी बांसुरी की तानें फिर खेतों में गूजने लगीं। इस भाँति १३ बरस गुजर गये। वासुदेव और अनूपा में सगाई की तैयारी होने लगीं। लेकिन अब अनूपा वह अनूपा न थी, जिसने १४ वर्ष पहले वासुदेव को पति भाव से देखा था, अब उस भाव का स्थान मातृभाव ने लिया था। इधर कुछ दिनों से वह एक गहरे सोच में डूबी रहती थी। सगाई के दिन ज्यो-ज्यों निकट आते थे, उसका दिल बैठा जाता था। अपने जीवन में इतने बडे परिवर्तन की कल्पना ही से उसका कलेजा दहक उठता था। जिसे बालक की भॉति पाला-पोसा, उसे पति बनाते हुए, लज्जा से उसका मुंख लाल हो जाता था। द्वार पर नगाडा बज रहा था। बिरादरी के लोग जमा थे। घर में गाना हो रहा था! आज सगाई की तिथि थी: सहसा अनूपा ने जा कर सास से कहा—अम्मां मैं तो लाज के मारे मरी जा रही हूं। सास ने भौंचक्की हो कर पूछा—क्यों बेटी, क्या है? अनूपा—मैं सगाई न करूंगी। सास—कैसी बात करती है बेटी? सारी तैयारी हो गयी। लोग सुनेंगे तो क्या कहेगें? अनूपा—जो चाहे कहें, जिनके नाम पर १४ वर्ष बैठी रही उसी के नाम पर अब भी बैठी रहूंगी। मैंने समझा था मरद के बिना औरत से रहा न जाता होगा। मेंरी तो भगवान ने इज्जत आबरू निबाह दी। जब नयी उम्र के दिन कट गये तो अब कौन चिन्ता है! वासुदेव की सगाई कोई लडकी खोजकर कर दो। जैसे अब तक उसे पाला, उसी तरह अब उसके बाल-बच्चों को पालूंगी। ******

  • हृदय का स्पंदन

    राजीव लोचन यह उस ज़माने की बात है, जब लड़के-लड़की की शादी उनके माता-पिता या बड़े भाई-बहन तय कर देते थे। आज के ज़माने की तरह लड़का-लड़की न तो एक दूसरे को देखते थे और न ही मिलते थे। माता-पिता के कहे अनुसार ही शादी कर लेते थे। यह कहानी राजीव व परी की है। राजीव लुधियाना शहर का रहने वाला बहुत ही सुंदर नौजवान है, एक बैंक में काम करता है, अपना घर व संयुक्त परिवार है। परी फिरोजपुर के पास एक छोटे-से गाँव में रहती है। लंबी-पतली, सुंदर। घर के सभी कामों में दक्ष। उसकी बहन की शादी लुधियाना में हुई है। एक दिन जब वह किसी काम से बैंक जाती है तो राजीव को देखकर उसे अपनी छोटी बहन का ख्याल आ जाता है। वह जाँच-पड़ताल करती है तथा राजीव के घरवालों से बात करके परी के लिए रिश्ता माँग लेती है। राजीव के घरवाले भी उसकी शादी जल्दी करवाना चाहते हैं, इसलिए वे इस शर्त पर हाँ कर देते हैं कि लड़की शादी के बाद नौकरी नहीं करेगी। दोनों तरफ़ से रिश्ता तय हो जाने के बाद शादी की तारीख आ जाती है पर राजीव और परी ने एक दूसरे को कभी नहीं देखा, न ही फोन पर बात की, पर हाँ एक दूसरे को खत ज़रूर लिखे थे, वे भी छिपकर। शादी के दिन राजीव बहुत खुश था कि वह अपनी दुल्हन परी को देखेगा, परंतु परी तो उसके सामने ऐसे आई जैसे गठरी में किसी को लपेटा हो, चेहरा बिल्कुल भी नज़र नहीं आ रहा था। आखिर उनके रिवाज़ था कि शादी से पहले लड़का-लड़की एक दूसरे को नहीं देखते। राजीव के सारे अरमानों पर पानी फिर गया। शादी के बाद जब वे घर वापिस आए तो कमरे में जब राजीव ने परी को देखा तो देखता ही रह गया। परी ने जब राजीव की ओर देखा तो उनकी आँखें चार हो गईं। उन दोनों को उनके सब्र का मीठा फल मिल गया। दोनों ने आँखों ही आँखों में जिन्दगी भर एक दूसरे का साथ निभाने का वादा कर लिया। *******

  • विजेता मेंढक

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव बहुत समय पहले की बात है एक सरोवर में बहुत सारे मेंढक रहते थे। सरोवर के बीचों-बीच एक बहुत पुराना धातु का खम्भा भी लगा हुआ था, जिसे उस सरोवर को बनवाने वाले राजा ने लगवाया था। खम्भा काफी ऊँचा था और उसकी सतह भी बिलकुल चिकनी थी। एक दिन मेंढकों के दिमाग में आया कि क्यों ना एक रेस का आयोजन किया जाए। रेस में भाग लेने हेतु प्रतियोगियों को खम्भे पर चढ़ना होगा, और जो सबसे पहले ऊपर पहुँच जाएगा वही विजेता माना जाएगा। रेस का दिन आ पंहुचा, चारों तरफ बहुत भीड़ थी। आस-पास के इलाकों से भी कई मेंढक इस रेस में हिस्सा लेने पहुचे। माहौल में सरगर्मी थी, हर तरफ शोर ही शोर था। रेस शुरू हुई। लेकिन खम्भे को देखकर भीड़ में एकत्र हुए किसी भी मेंढक को ये यकीन नहीं हुआ कि कोई भी मेंढक ऊपर तक पहुंच पायेगा। हर तरफ यही सुनाई देता “अरे ये बहुत कठिन है” “वो कभी भी ये रेस पूरी नहीं कर पायंगे।” “सफलता का तो कोई सवाल ही नहीं, इतने चिकने खम्भे पर चढ़ा ही नहीं जा सकता।” और यही हो भी रहा था, जो भी मेंढक कोशिश करता, वो थोडा ऊपर जाकर नीचे गिर जाता। कई मेंढक दो-तीन बार गिरने के बावजूद अपने प्रयास में लगे हुए थे। पर भीड़ तो अभी भी चिल्लाये जा रही थी, “ये नहीं हो सकता, असंभव”, और वो उत्साहित मेंढक भी ये सुन-सुनकर हताश हो गए और अपना प्रयास छोड़ दिया। लेकिन उन्हीं मेंढकों के बीच एक छोटा सा मेंढक था, जो बार-बार गिरने पर भी उसी जोश के साथ ऊपर चढ़ने में लगा हुआ था। वो लगातार ऊपर की ओर बढ़ता रहा, और अंततः वह खम्भे के ऊपर पहुँच गया और इस रेस का विजेता बना। उ सकी जीत पर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ, सभी मेंढक उसे घेर कर खड़े हो गए और पूछने लगे, “तुमने यह असंभव काम कैसे कर दिखाया, भला तुम्हें अपना लक्ष्य प्राप्त करने की शक्ति कहाँ से मिली, ज़रा हमें भी तो बताओ कि तुमने ये विजय कैसे प्राप्त की?” तभी पीछे से एक आवाज़ आई “अरे उससे क्या पूछते हो, वो तो बहरा है।” सार - हमारे अन्दर अपना लक्ष्य प्राप्त करने की काबीलियत होती है, पर हम अपने चारों तरफ मौजूद नकारात्मकता की वजह से खुद को कम आंक बैठते हैं। और हमने जो बड़े-बड़े सपने देखे होते हैं उन्हें पूरा किये बिना ही अपनी ज़िन्दगी गुजार देते हैं। ******

  • सच्चा गुरु

    मुकेश ‘नादान’ नरेंद्र की उस समय जो मन:स्थिति थी, उसके विषय में स्वामी सारदानंद ने अपने ग्रंथ 'श्रीरामकृष्ण लीला प्रंग' में लिखा है, “मैं सोच में पड़ गया कि इच्छा मात्र से यह पुरूष अगर मेरे जैसे प्रबल इच्छा-शक्ति वाले मन को और दृढ़ संस्कार युक्त गठन को इस प्रकार मिट्टी के लोटे की भाँति तोड़-फोड़कर अपने अनुरूप ढाल सकता है, तो फिर यह पागल कैसे हो सकता है? लेकिन पहली भेंट में ही एकांत में ले जाकर इन्होंने मुझे जिस तरह संबोधित किया, उसे क्या कहा जाए? बुद्धि का उन्मेष होने के अनंतर खोज तथा तर्कयुक्ति की सहायता से प्रत्येक वस्तु तथा व्यक्ति के विषय में एक मत स्थिर किए बिना मैं कभी निश्चिंत नहीं हो सका। इसी स्वभाव में आज एक प्रंड आघात लगा। इससे इस संकल्प का उदय हुआ कि जैसे भी हो, इस अद्भुत पुरूष के स्वभाव तथा शक्ति की बात अवश्य समझनी चाहिए।” नरेंद्र जिसे आदर्श के रूप में खोज रहे थे, वे वही थे। फिर भी नरेंद्र जैसे दृढ़ संस्कारयुक्त व्यक्ति के लिए भी श्रीरामकृष्ण जैसे अदूभुत पुरूष को एकाएक गुरु के रूप में धारण करना संभव नहीं था। अतः उन्होंने श्रीरामकृष्ण की परीक्षा लेने का निश्चय किया। एक दिन सुबह के समय, जब नरेंद्र अपने मित्रों के साथ अध्ययन में जुटे थे, उन्हें किसी के पुकारने का स्वर सुनाई दिया- घनरेन, नरेन!” स्वर सुनते ही नरेंद्र हड़बड़ाकर तेजी से दुवार खोलने के लिए लपके। उस स्वर को वे पहचानते थे। आगंतुक श्रीरामकृष्ण ही थे। नरेंद्र को देखते ही श्रीरामकृष्ण की आँखों में आँसू भर आए। वे बोले, “तू इतने दिनों से आया क्यों नहीं?” नरेंद्र उन्हें आदर सहित भीतर ले आए। आसन ग्रहण करने के पश्चात्‌ श्रीरामकृष्ण ने उन्हें अंदेशे खाने को दिए, जिन्हें नरेंद्र ने अपने मित्रों में भी बाँटा। इसके पश्चात्‌ श्रीरामकृष्ण ने नरेंद्र से भजन गाने को कहा। नरेंद्र ने 'जागो माँ कुल वुंक्तडलिनी' भजन गाया। भजन आरंभ होते ही रामकृष्ण भावविभोर हो उठे और समाधि में लीन हो गए उन्हें संज्ञाशून्य होता देखकर नरेंद्र के मित्र भयभीत हो उठे। तब नरेंद्र बोला, “भयभीत मत होओ। वे संज्ञाशुन्य नहीं हुए हैं, बल्कि भावविभोर हुए हैं। दूसरा भजन सुनकर पुन: चेतना में आ जाएँगे।” नरेंद्र का कथन सत्य सिद्ध हुआ। नरेंद्र ने अन्य भजन गाने आरंभ किए, तो रामकृष्णजी की चेतना लौट आई। गीतों का सिलसिला समाप्त होने पर श्रीरामकृष्ण नरेंद्र को आग्रहपूर्वक दक्षिणेश्वर ले गए। नरेंद्र यदि कुछ दिनों तक दक्षिणेश्वर जाकर श्रीरामकृष्ण से भेंट नहीं करते थे, तो वे व्याकुल हो उठते थे। ******

  • अर्धांगिनी

    डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव लेफ्टिनेंट कर्नल की नवेली पत्नी सीमा ने जैसे ही पति के पार्थिव शरीर को झंडे में लिपटे हुए देखा, जोर से फफक पड़ी। अपने दिवंगत पति के माथे को चूम कर वह बहुत रोई। इतना रोई कि नाक और आँख सिंदूर की तरह लाल हो गये, परंतु उसके माथे की लाली गायब थी। दोनों की शादी के अभी मात्र छः महीने ही हुए थे। खेलने-खाने की उम्र में सीमा विधवा हो गई। अब उसके जीवन में न कोई रंग रहा, न ही रस। उसे लगा, जीना बेकार है। आखिर, करे तो क्या करे? इसी ऊहापोह में वह कई महीनों से मर-मर कर जी रही थी। अचानक एक दिन, वाश रूम में लगे आईने ने उसे धिक्कारते हुए कहा, "अपनी सुरत तो देख, पच्चीस वर्ष की है, और चालीस की लगती है। आँखों के पास झुर्रियाँ और बाल सफ़ेद दिख रहे हैं। पढ़ी-लिखी होकर अपना ये हाल बना लिया।" सुनकर वह धक्क सी रह गयी। तुरंत कमरे में जाकर पति के तस्वीर को गले से लगाया और घंटों तक अपने दुखों को आँसूओं के सैलाब से धोती रहीं। एकाएक उसके मन से काला, सघन बादल छंट गया, सुनहरी धूप निकल आई। सीमा के उजड़े जीवन में मानो फिर से बहार छा गयी। आत्मविश्वास भरे लहजे में उसने पति की तस्वीर से कहा, "प्रिय, आपसे वादा करती हूँ कि इस तरह रो कर मैं अपना जीवन बर्बाद नहीं करूँगी। आपकी तरह मैं भी देश के लिए शहीद हो जाना चाहती हूँ। आखिर, आपकी अर्धांगिनी जो हूँ।" वह तैयार होकर सेना में भर्ती के लिए आवेदन करने निकलने लगी। जाते समय उसने अपना चेहरा आईने में फिर से देखा। इसबार आईना मुस्कुरा कर उसे 'जय जवान' कह रहा था। ******

  • मुस्कान

    सविता पाटील पलों से पल में… बह रही है ज़िन्दगी, हर पल कुछ हो नया, कह रही है ज़िन्दगी! तेरा होना न होना… कुछ तो फर्क करे, अखबारों में नहीं, पर अपनी बातों में… कोई तेरा जिक्र करे! किसी की यादों का… ऐसा हिस्सा बने, माथे पर शिकन नहीं, होठों पर मुस्कान बने!! *****

  • नजरिया

    डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव एक गाँव में अशोक कुमार नाम का कुम्हार रहता था। माँ – बाबा बचपन में ही गुजर गये थे अतः अशोक कुमार कुंवारा ही था। माँ – बाबा की मौत से उसके नाजुक ह्रदय को ऐसा आघात हुआ कि वह दिन–रात गुमसुम रहने लगा। गाँव वालों ने उसे बहुत समझाया किन्तु उसे समझ नहीं आया। फिर एक दिन वह गाँव से दूर एक पहाड़ी पर झोपड़ी बनाकर रहने लगा। किन्तु जीने के लिए अर्थोपार्जन तो करना ही था। कुछ दिन तक तो वह सदमे से निकल ही नहीं पाया किन्तु एक दिन उसे एक बाबा मिले। बाबा ने जब जाना कि वह पहाड़ी पर अकेला रहता है तथा उसके माता–पिता नहीं रहे तो वह भी उसके साथ रहने लगे। बाबा और कुम्हार की जोड़ी खूब जमी। बाबा ने धीरज बंधाया कि आना–जाना तो संसार का नियम है, बेटा! उसे इतना दुखी नहीं होना चाहिए तथा अपने नये जीवन की शुरुआत करना चाहिए। बाबा ने उसे याद दिलाया कि अपने पिता की शिक्षाओं का अनुसरण करें। कुमार को बात समझ में आ गई। उसने पिता के सिखाएं अनुसार कुमार ने मिट्टी के घड़े बनाना शुरू कर दिया। जब सभी घड़े बनकर तैयार हो गये तो वह उन्हें पकाने के लिए जंगल से लकड़ी लेने गया। जंगल से जब वह लकड़ी लेकर आ रहा था तो उसे प्यास लगी। लेकिन जंगल में पानी कहाँ मिलता। उसने एक पेड़ पर चढकर चारों और अपनी नज़रे दौड़ाई तो ज्ञात हुआ कि दूर एक सरोवर है। वह पेड़ से उतरकर लकड़ियों का गट्ठर अपने सिर पर रखकर सरोवर की ओर चल दिया। थोड़ी देर बाद जब वह वहाँ पहुंचा तो उसने देखा कि कुछ स्त्रियाँ सरोवर में जल क्रीड़ा कर रही थी। जैसे ही उन्होंने कुमार को देखा, उन्होंने उससे तुरंत पानी पीकर चले जाने का आग्रह किया। कुमार ने पानी पिया और चल दिया। किन्तु भीगे वस्त्रों में स्त्री के रूप सौन्दर्य का दर्शन, साथ ही यौवन की मादकता को देख कुमार का मन बार–बार उन्हें देखने को मचलने लगा। वह चाहता था कि वह उनसे मित्रता करें किन्तु अपरिचितों से बातचीत आरम्भ कैसे करें इसका उसे कोई ज्ञान नहीं था। और वैसे भी स्त्रियों ने उसे वहाँ से चले जाने को कहा था। इसलिए ललचाते हुए भी कुमार लाचार होकर चल दिया। "यौवन, यौवन को आकर्षित करता है। अतः बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि सावधान रहे।" घर पहुँचकर उसने आसमान की ओर देखा तो बादल घिर रहे थे अतः उसने लकड़ियों को काटकर घड़ों को उसपर जमाया। किन्तु इस समय भी उसके मानस पटल पर सरोवर वाला वही दृश्य नाच रहा था। अतः वह उन्हीं ख्यालों में खोया हुआ सो गया। उसे नींद इतनी गहरी आई कि बाहर हवाएं चलने का उसे कुछ भी आभास नहीं हुआ। कुछ देर बाद वर्षा आरम्भ हो गयी। उसके घड़े तथा लकड़ियाँ सभी बाहर ही पड़े थे अतः सभी घड़े टूट गये और लकड़ियाँ गीली हो गई। जब संध्या को बारिश थमने के बाद बाबा गाँव से आये तो देखा सभी घड़े टूट चुके हैं और लकड़ियाँ गीली हो चुकी हैं और कुमार अन्दर झोपड़ी में चैन की नींद ले रहा था। आंखे बंद चेहरे की मुस्कान को देख बाबा को उसकी मुर्खता पर हंसी आई। बाबा की हंसी सुनकर उसकी आंखे खुली तो उठकर भागा। लेकिन अब वह क्या कर सकता था। बारिश सब बर्बाद करके जा चुकी थी। उसे खुद पर बहुत गुस्सा आया अतः पास में पड़े एक पत्थर पर हाथ पीटकर वह अपना गुस्सा निकालने लगा। इतने में बाबा बोले – “कुमार! जहाँ तक मैं जानता हूँ तुम दिन में कभी नहीं सोते, फिर आज ऐसा क्या हो गया जो तुम्हें दिन में इतनी गहरी नींद आई कि बारिश आकर चली गई फिर भी नहीं उठे।” तो कुम्हार ने बाबा को सरोवर वाली पूरी घटना कह सुनाई। यह सुनकर बाबा बोले – “बेटा! स्त्री के जिस रूप की तुम आकांक्षा रखते हो उसके दर्शन मात्र से तुम्हारा यह हाल है तो यदि वह तुम्हें मिल गई तो फिर क्या होगा? अंदाजा लगा सकते हो। स्त्री को जिस रूप में तुमने देखा वस्तुतः वह एक विकार है। स्त्री के दैवीय दर्शन को अपने मानस में स्थापित करों तो वह तुम्हारे लिए अर्धांगिनी भी होगी और लाभकारी भी।” अब कुमार को समझ में आ गया था कि स्त्री को उसके देखने का नजरिया गलत था। अब वह सबको पवित्र दृष्टि से देखने लगा। कुछ दिनों बाद उसके कहने से बाबा ने एक स्त्री के घर वालों से बात की और उसका विवाह हो गया। अब भी वह बाबा की शिक्षा को नहीं भुला था। स्त्री का सम्मान उसके लिए सर्वोच्च था। यदि इसी तरह प्रत्येक व्यक्ति स्त्री को समझने लगे तो समाज कितना सुन्दर हो। सभी नारियों का भी सम्मान हो और सभी पुरुषों को भी अपने चरित्र पर गर्व हो। ऐसी कल्पना मात्र से ही मन प्रसन्न हो उठता है। आओ सब मिलकर संकल्प ले। "नारी का सम्मान हो, अपना देश महान हो। ******

  • चंद्रकांता

    चंद्रकांता देवकीनंदन खत्री बयान – 1 शाम का वक्त है। कुछ-कुछ सूरज दिखाई दे रहा है। सुनसान मैदान में एक पहाड़ी के नीचे दो शख्स वीरेंद्र सिंह और तेज सिंह एक पत्थर की चट्टान पर बैठ कर आपस में बातें कर रहे हैं। वीरेंद्र सिंह की उम्र इक्कीस या बाईस वर्ष की होगी। यह नौगढ़ के राजा सुरेंद्र सिंह का इकलौता लड़का है। तेज सिंह राजा सुरेंद्र सिंह के दीवान जीत सिंह का प्यारा लड़का और कुँवर वीरेंद्र सिंह का दिली दोस्त, बड़ा चालाक और फुर्तीला, कमर में सिर्फ खंजर बांधे बगल में बटुआ लटकाए, हाथ में एक कमंद लिए बड़ी तेजी के साथ चारों तरफ देखता और इनसे बातें करता जाता है। इन दोनों के सामने एक घोड़ा कसा-कसाया दुरुस्त पेड़ से बंधा हुआ है। कुँवर वीरेंद्रसिंह कह रहे हैं, “भाई तेजसिंह! देखो मोहब्बत भी क्या बुरी बला है, जिसने इस हद तक पहुँचा दिया। कई दफ़ा तुम विजयगढ़ से राजकुमारी चंद्रकांता की चिट्ठी मेरे पास लाए और मेरी चिट्ठी उन तक पहुँचाई, जिससे साफ मालूम होता है कि जितनी मुहब्बत मैं चंद्रकांता से रखता हूँ, उतनी ही चंद्रकांता मुझसे रखती है। हालांकि हमारे राज्य और उसके राज्य के बीच सिर्फ पाँच कोस का फासला है। इस पर भी हम लोगों के किए कुछ भी नहीं बन पड़ता। देखो इस खत में भी चंद्रकांता ने यही लिखा है कि जिस तरह बने, जल्द मिल जाओ।” तेजसिंह ने जवाब दिया, “मैं हर तरह से आपको वहाँ ले जा सकता हूँ, मगर एक तो आजकल चंद्रकांता के पिता महाराज जय सिंह ने महल के चारों तरफ सख्त पहरा बैठा रखा है। दूसरे उनके मंत्री का लड़का क्रूर सिंह उस पर आशिक हो रहा है। ऊपर से उसने अपने दोनों ऐयारों को जिनका नाम नाजिम अली और अहमद खाँ है, इस बात की ताकीद करा दी है कि बराबर वे लोग महल की निगहबानी किया करें, क्योंकि आपकी मोहब्बत का हाल क्रूर सिंह और उसके ऐयारों को बखूबी मालूम हो गया है। चाहे चंद्रकांता क्रूर सिंह से बहुत ही नफरत करती है और राजा भी अपनी लड़की अपने मंत्री के लड़के को नहीं दे सकता, फिर भी उसे उम्मीद बंधी हुई है और आपकी लगावट बहुत बुरी मालूम होती है। अपने बाप के जरिए उसने महाराज जय सिंह के कानों तक आपकी लगावट का हाल पहुँचा दिया है और इसी सबब से पहरे की सख्त ताकीद हो गई है। आप को ले चलना अभी मुझे पसंद नहीं, जब तक कि मैं वहाँ जाकर फसादियों को गिरफ्तार न कर लूं।” “इस वक्त मैं फिर विजयगढ़ जाकर चंद्रकांता और चपला से मुलाकात करता हूँ, क्योंकि चपला ऐयारा और चंद्रकांता की प्यारी सखी है और चंद्रकांता को जान से ज्यादा मानती है। सिवाय इस चपला के मेरा साथ देने वाला वहाँ कोई नहीं है। जब मैं अपने दुश्मनों की चालाकी और कार्रवाई देख कर लौटूं तब आपके चलने के बारे में राय दूं। कहीं ऐसा न हो कि बिना समझे-बूझे काम करके हम लोग वहाँ ही गिरफ्तार हो जाएं।” वीरेंद्र – “जो मुनासिब समझो, करो। मुझको तो सिर्फ़ अपनी ताकत पर भरोसा है। लेकिन तुमको अपनी ताकत और ऐयारी दोनों का।” तेजसिंह – “मुझे यह भी पता लगा है कि हाल में ही क्रूर सिंह के दोनों ऐयार नाजिम और अहमद यहाँ आ कर पुनः हमारे महाराजा के दर्शन कर गए हैं। न मालूम किस चालाकी से आए थे। अफसोस, उस वक्त मैं यहाँ न था।” वीरेंद्र – “मुश्किल तो यह है कि तुम क्रूर सिंह के दोनों ऐयारों को फंसाना चाहते हो और वे लोग तुम्हारी गिरफ्तारी की फ़िक्र में हैं। परमेश्वर कुशल करे। खैर, अब तुम जाओ और जिस तरह बने, चंद्रकांता से मेरी मुलाकात का बंदोबस्त करो।” तेज सिंह फौरन उठ खड़े हुए और वीरेंद्र सिंह को वहीं छोड़ पैदल विजयगढ़ की तरफ रवाना हुए। वीरेंद्र सिंह भी घोड़े को दरख्त से खोल कर उस पर सवार हुए और अपने किले की तरफ चले गए।

  • अहमक

    मधु मधुमन पहले ख़ुद बेकली ढूँढते हैं। फिर सुकूं की घड़ी ढूँढते हैं। बख़्त में ही न हो शय जो अपने हम वही, बस वही ढूँढते हैं। जाने क्या हो गया है जहां को लोग हर चीज़ फ़्री ढूँढते हैं। दाग़ होते हैं चेहरे पे अपने आइने में कमी ढूँढते हैं। हम भी अहमक हैं जो इस सदी में पहले सी सादगी ढूँढते हैं। दोष तो है हमारा ही जो हम सब में संजीदगी ढूँढते हैं। प्यार मिलता नहीं हर किसी को ढूँढने को सभी ढूँढते हैं। दर्द दिल का सँभलता नहीं जब लोग तब शाइरी ढूँढते हैं। छोड़ ‘मधुमन‘ ये बातें पुरानी बात कोई नई ढूँढते हैं। *****

  • साड़ी कैसी है?

    उषा भारद्वाज क्या हुआ बहू? - सावित्री ने अपनी जगह पर बैठे-बैठे अपनी बहू रितु की तेज आवाज सुनकर पूछा। कुछ नहीं मां - प्रकाश उनके बेटे ने अपने रूम से जवाब दे दिया। सावित्री चुप होकर बैठ गई। थोड़ी देर बाद अक्कू के रोने की आवाज सुनाई पड़ी। क्या हुआ बेटा? - सावित्री अपने पोते का रोना सुनकर व्याकुल होकर वहां आ गई, जहां वह रो रहा था। अरे क्यों रो रहा है बेटा, क्या हो गया? लेकिन अक्कू बिना दादी की बात सुने रोता रहा। सावित्री ने देखा, उसने अपने ऊपर सब्जी गिरा ली थी। "अरे बेटा कोई बात नही, चुप हो जाओ।" तब तक रितु आ गई।" कितनी बार इसको मना किया प्लेट लेकर मत चला करो लेकिन यह मानता ही नही, और सब्जी अपने ऊपर गिरा ली। उसकी शर्ट उतारते उतारते रितु बडबडाती जा रही थी। कोई बात नहीं, हो जाता है, बच्चा ही तो है - सावित्री ने रितु को समझाते हुए कहा। तभी पीछे से प्रकाश की आवाज आई - मम्मी आप ऐसे समय मत बोला करिए, यह बहुत शरारती होता जा रहा है। सावित्री चुप हो गई और अपने कमरे में चली गई। थोड़ी देर बाद अक्कू उनके पास आया - दादी क्या कर रही हो? दादी मेरे साथ खेलोगी। मैं तुम्हारे जैसा कैसे खेल पाऊंगी। अभी कुछ ही मिनट बीते थे कि रितु की आवाज आयी - अक्कू चलो होमवर्क करना है। अक्कू मुंह बना कर वहां से खेलने का वादा करके चला गया। सावित्री सोचने लगी जब प्रकाश छोटा था जेठ-देवर उनका परिवार, सब एक साथ ही रहते थे। प्रकाश को छोटे से बड़े होने तक कभी प्यार से कभी समझा कर पढ़ाई के लिए प्रेरित किया। यहां तक कि छोटे-छोटे काम जिससे बच्चे आत्मनिर्भर बने वह भी सिखाया। एक दिन, रितु और प्रकाश मकान बनवाने के विषय में बात कर रहे थे सावित्री भी वही बैठी थी उन्होंने कुछ बोलना चाहा। तभी रितु ने कहा -"मम्मी आप नहीं जानती हैं, आजकल का डिजाइन बदल चुका है। सावित्री चुप हो गई। प्रकाश ने कहा - मम्मी अब सब बदल गया है। सावित्री चुप हो गई। इसीतरह अक्सर कोई बात हो जाती थी। और फिर सावित्री को चुप होना पड़ता। धीरे-धीरे सावित्री ने अपने आपको अपने कमरे तक ही सीमित कर लिया था। सुबह उठती स्नान ध्यान करतीं और फिर अपने कमरे में आ जाती कभी गीता पढतीं, अक्कू कभी आता तो उससे थोड़ी देर बात करती। टीवी देखती उसमें भागवत, भजन सुना करती थी। लेकिन कितनी देर ......वह तो पिंजरे में बंद पक्षी की तरह हो गई थी, जो पंख होते हुए उड़ नहीं सकती थी। पिंजरे में बंद पक्षी बोलता है तब उसको सब बड़े प्यार से सुनते हैं, लेकिन वह तो बोल भी नहीं सकती थी। उनका मन होता था मगर अपनी बात किससे करें? गर्मी की छुट्टियां शुरु हो गई थी। हमेशा रितु अक्कू को लेकर अपनी गीता दीदी के पास देहरादून जाती थी। लेकिन इस बार वह नहीं जा पा रही थी। इसलिए गीता अपने बच्चों के साथ दो-चार दिन के लिए आई थी। सावित्री अपने कमरे में बैठी सब सुन रही थी। गीता थोड़ी देर बैठी। फिर बोली- रितु आंटी नहीं दिखाई पड़ रही है। रितु ने कहा- वह अपने कमरे में हैं। गीता उठी और सावित्री के कमरे में आई- आंटी प्रणाम! अरे! गीता आओ बैठो। पास पड़ी कुर्सी की तरफ इशारा किया बैठने के लिए। और सुनाइए कैसी हैं? मैं ठीक हूं बेटा, बुढ़ापा तो है ही। सावित्री अपने मन की पीड़ा को छिपाते हुए बोली। तुम बताओ तुम कैसी हो? मैं ठीक हूं आंटी। गीता ने उनको बड़े ध्यान से देखते हुए उत्तर दिया। दो दिन बीत गए थे। गीता ने रितु से पूछा- आंटी को कोई प्रॉब्लम है क्या? 2 साल पहले जब मैं आई थी तब तो बहुत हंसती-बोलती थी। सबके बीच में आकर बैठती थी। लेकिन इसबार तो वो एकदम खामोश सी हो गई हैं। बीमार है क्या? -गीता ने सावित्री की चुप्पी का रहस्य जानना चाहा। रितु ने कहा - नहीं दीदी वह बीमार नहीं है। वह ठीक हैं और वह बोलती भी हैं। लेकिन रितु मैं 2 दिन से आई हूं मैंने देखा कि वो एक बार भी मेरे पास खुद से आकर नहीं बैठी हैं और मैंने उनको अपने कमरे से भी बहुत कम निकलते देखा है।- गीता ने ऋतु की बात को ना मानते हुए कहा। "पता नहीं पहले तो खूब बोलती थी बीच-बीच में हम लोग बात करते थे उसमें भी अपनी राय देने लगती थीं, और फिर अब वो बूढ़ी हो गयी हैं। उनके समय और आज के समय में बहुत परिवर्तन आ गया। दीदी अब वैसा कुछ भी नहीं रहा जैसे पहले होता था"। -रितु ने वहीं पर बात खत्म करनी चाही। तू बुरा ना मान तो एक बात कहूं, जो इंसान पहले इतना बोलता था। हर काम करने के लिए आगे बढ़ता हो अगर वह बिना बीमारी के, बिना किसी समस्या के चुप हो जाए एक ही जगह बैठ जाए तो इसकी वजह कोई छोटी नहीं हो सकती है।- गीता ने कहा। गीता फिर बोली- रितु मैं तुझे जानती हूं तुम्हें ज्यादा किसी दूसरे का बीच में टोका टोकी पसंद नहीं है इसके लिए सिर्फ यही कहूँगी। माना कि परिवर्तन हो गया है समय में, माना कि हर चीज बदल रही है लेकिन तुम उनके अनुभवों से नये आइडियाज ले सकती हो, उनको छोटी-छोटी बातों में शामिल करो। उनको एहसास दिलाओ कि तुमको उनकी जरूरत है। इस उम्र में इंसान जब कुछ नहीं कर पाता तब किसी-किसी को अपना जीवन व्यर्थ लगने लगता है। आंटी की खामोशी का यही कारण है। कहां की बात लेकर आप बैठ गईं।- रितु ने बीच में गीता को टोकते हुए कहा। मगर गीता चुप नही हुई क्योंकि उसने सावित्री को इस उम्र में भी बच्चों की तरह चहकते हुए सुना था वो बोली- तुमने देखा है घर में भाभी मम्मी को हर छोटे-छोटे काम में शामिल कर लेती हैं। पौधों के बारे में कुछ पूंछना हो या अचार कैसे रखा जाता है? इस तरह की बहुत सी बातें इंसान को उसके महत्व का एहसास कराती हैं। रितु चुपचाप गीता की बातें सुनती रही। उसको यह एहसास हो गया था कि उससे बहुत बड़ी गलती हुई है। दूसरे दिन सावित्री जैसे ही रोज के कार्यों से निवृत्त होकर अपने कमरे में आयीं। पीछे से रितु चहकती हुई बोली- मम्मी देखिए ये साड़ी कैसी लग रही है? सावित्री के कानों में रितु के ये शब्द मिश्री की तरह घुल गए उनके होठों पर एक मुस्कान आ गई वो बड़े प्यार से बोली- "बहुत सुंदर लग रही है। इसका रंग तुम पर बहुत अच्छा लग रहा है।" इतना सुनकर रितु खिलखिला कर हंस दी जिसे देखकर सावित्री भी कुछ समय पहले की तरह हंस पड़ी दोनों सास बहू की हंसी मिल गई। *******

  • सब्र का फल

    प्रदीप कुमार वर्मा मुकेश छब्बीस साल का एक खूबसूरत, होनहार नौजवान था। जब राज्य प्रशासनिक सेवा की परीक्षा पास कर वह एक उच्च पद पर आसीन हुआ, तब उसके सामने विवाह के लिए एक से एक खूबसूरत, पढ़ी-लिखी और नौकरीशुदा लड़कियों के रिश्तों की लाइन लग गयी थी। वह भलीभांति जानता था कि शादी-व्याह कोई बार-बार होने वाला काम नहीं है। एक बार जिससे शादी हो गयी, तो बस फिर सात जनमों का तो पता नहीं, पर इस जनम का साथ तो निभाना ही है। बचपन में पिता जी की मौत के बाद माँ ने कितनी कठिनाइयों से उसे पाला-पोसा, उसका भी उसे अंदाजा था। माँ ने अपने जीवन में बहुत कष्ट झेले हैं, अब जबकि वह सक्षम है, तो माँ को अधिकतम आराम और सुख पहुंचाना चाहता था। इस कारण भी अपनी शादी के लिए लड़की के चयन में वह अतिरिक्त सावधानी बरत रहा था। काफी सोच-विचार कर वह माँ और मामा जी की पसंद पर अपने लिए ममता को चुन लिया। ममता एक पढ़ी-लिखी और खूबसूरत लड़की थी, जिसके माता-पिता की बहुत पहले एक दुर्घटना में मौत हो गयी थी। उसका पालन पोषण उसके चाचा-चाची ने बड़े ही प्यार से किया था। ममता उसी शहर में स्थित एक सरकारी विद्यालय में शिक्षिका थी, जहाँ मुकेश की पोस्टिंग थी। रिश्ता तय होने के बाद उनकी आमने-सामने एक-दो बार ही मुलाक़ात हो सकी थी। कारण यह था कि मुकेश जहाँ एक प्रशासनिक अधिकारी था, वहीं ममता भी उसी शहर में स्थित एक सरकारी विद्यालय में शिक्षिका थी। दोनों को जानने-पहचानने वाले बहुत से लोग थे। उनको विवाह से पहले साथ-साथ घूमते–फिरते देख लोग तरह-तरह की बातें करते, मीडिया में भी बात फैलने का डर था। सो, वे आमने-सामने कम ही मिलते, पर मोबाइल पर घंटों बतियाते। कुल मिलाकर रिश्ता तय होने और शादी के बीच की तीन माह की अवधि में वे दोनों मोबाइल पर ही इतनी सारी बातें कर लिए कि अब उन्हें लगता ही नहीं कि वे तीन माह पहले एक दूसरे से एकदम अपरिचित थे। समय अपनी रफ्तार से निकलता गया। बहुत ही धूमधाम से उनकी शादी हो गई। और अब सुहागरात। सुहागरात... कितनी मिठास है इस शब्द में... हर युवक-युवती इसका सालों इंतजार करते हैं। इसके लिए कई सपने बुनते हैं। आज जब उसकी सुहागरात है, तो पता नहीं क्यों समय के साथ-साथ उसकी घबराहट बढ़ती ही जा रही थी। वैसे वह रोज ममता से घंटों बात कर लेता, पर यूँ आमने-सामने... एक ही कमरे में... पता नहीं कैसे वह सिचुएशन को हैंडल करेगा। इसी उधेड़बुन में वह समय भी आ गया जब उसकी ममेरी भाभी जी ने उसे उस कमरे में पहुंचा दिया, जहाँ दुल्हन के वेश में ममता उसका इंतजार कर रही थी। सच, ममता आज नई दुलहन के वेश में बहुत ही खूबसूरत लग रही थी। बिलकुल परी लोक की राजकुमारी जैसी। मुँह दिखाई की रस्म अदायगी और हीरे की अंगूठी उपहार में देने के बाद बोला, "ममता, आज मुझे पहली बार ये एहसास हो रहा है कि मोबाइल पर बात करना कितना आसान होता है। मुझे तो खुद पर तरस भी आ रहा है। कितना बड़ा बेवकूफ हूँ मैं।" "ऐसा क्यों कह रहे हैं जी आप? आप जैसे भी हैं, अच्छे हैं।" वह शर्माते हुए बोली। "हाँ, भारतीय नारी जो ठहरी। अब तो ऐसा बोलना ही पड़ेगा।" वह बोला। "नहीं जी, ऐसी कोई बात नहीं है। पर आप ऐसा क्यों कह रहे हैं।" "अरे भई, तुम कितनी खूबसूरत लड़की हो, तुमसे तो मुझे प्यार-मुहब्बत की बातें करनी थी, पर मैं ठहरा किताबी कीड़ा। पिछले तीन महीने से तुमसे साहित्य, कला, संस्कृति, राजनीति और पर्यावरण की चर्चा करता रहा हूँ। जबकि मुझे तो तुमसे प्यार-मोहब्बत की बातें करनी थी...." वह किसी तरह रौ में बोल गया। "तो अब कर लीजिए ना।" वह शर्माते हुए बोली। "हाँ जी, अब तो जिंदगीभर वही करनी होगी। वैसे भी आज तो हमारी सुहागरात है। तो शुरुआत प्रैक्टिकल से करें। थ्योरिटिकल क्लासेस तो जिंदगीभर चलती रहेगी।" मुकेश उसकी हाथों को हाथ में लेकर बोला। "मुकेश जी, आज मैं बहुत ज्यादा थक गई हूँ। सिर में बहुत दर्द भी हो रहा है। नींद भी आ रही है। प्रैक्टिकल फिर कभी।" ममता उनींदी आँखों से बोली। मुकेश के लिए यह अप्रत्याशित स्थिति थी। पर यह सोच कर कि अब तो जीवनभर का साथ है। जहाँ इतने साल इंतजार किए, वहीं कुछ दिन और। बोला, "ठीक है मैडम जी। जैसा आप ठीक समझें। आप यहाँ पलंग पर सो जाइए। मैं वहाँ सोफे पर सो जाऊँगा।" "नहीं जी, आप यहीं सो जाओ न, ऊधर पलंग पर ही। मैं इधर सो जाऊँगी।" वह एक तरफ खिसकती हुई बोली। "ठीक है" मुकेश दोनों के बीच एक तकिया रखकर बोला, "अब लाइट ऑफ करके चुपचाप सो जाओ। गुड नाईट।" "गुड नाईट।" वह बोली और कमरे की लाइट ऑफ कर दी। मुकेश को नींद नहीं आ रही थी। उसने ऐसे सुहागरात की तो कल्पना भी नहीं की थी। पर सच तो सामने ही था। सालों का इंतजार आज के इंतजार पर भारी पड़ रहा था। वह सोच रहा था कि पता नहीं किस बेवकूफ ने ऐसा लिखा है कि "जो मजा इंतजार में है, वह पाने में कहाँ?’’ मेरी तरह इंतजार किया होता तो पता नहीं वह क्या लिखता? लगभग घंटा भर का समय बीत गया। आज नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। वैसे पढ़ने-लिखने में उसकी बचपन से ही रुचि थी। जब भी उसे नींद नहीं आती, वह पढने बैठ जाता पर आज वह लाइट जलाकर पढ़ नहीं सकता था, क्योंकि ममता की नींद में खलल पड़ सकता था। सो, वह एक चद्दर ओढ़कर मोबाइल में ही एक कविता लिखने लगा। जिंदगी हर कदम परीक्षा लेती है इंसान हर कदम परीक्षा देता है फिर भी वह परीक्षा से क्यों डरता है... वह लिखने में मगन था, तभी ममता उसके चद्दर में घुसते हुए बोली, "वावो, क्या बात है किसके लिए शायरी लिखी जा रही है ?" चौंक पड़ा वह, बोला, "अरे, तुम अभी तक सोई नहीं। या एक नींद मार चुकी ?" "नींद नहीं आ रही है मुझे। किससे चैटिंग हो रही है? जरा हमें भी तो पता चले?" वह शरारत से बोली। "अब तक तो जिससे चैटिंग होती थी, वह कर नहीं सकता।" वह बोला। "क्यों? मैं आपको कभी किसी से चैटिंग के लिए मना नहीं करूंगी।" ममता बोली। "अरे यार, बाजू में सो रहे इंसान से भला कोई कैसे चैटिंग कर सकता है?" मुकेश बोला। "सही कह रहे हैं जी आप। पर प्यार-मोहब्बत की प्रैक्टिकल क्लास तो शुरू कर ही सकते हैं। दरअसल मैं परखना चाह रही थी कि आपको मेरी इच्छा-नाइच्छा की कितनी परवाह है?" वह मुकेश की बाहों में समाते हुए बोली। "तो इस परीक्षा का रिजल्ट कैसा रहा?" मुकेश की पकड़ मजबूत होती जा रही थी। "फर्स्टक्लास फर्स्ट। बधाई हो साहब जी। आपको सौ में सौ अंक मिले हैं।” वह मुकेश की गालों में चुबंन की झड़ी लगाते हुए बोली। ****************

  • जज़्बात

    विनीता तिवारी चुरा हर चीज़ ग़ैरों की वो अक्सर बात करते हैं। कि ये तेरा मेरा इंसान को बर्बाद करते हैं। मुहब्बत ज़िंदगी में ग़र मिले सच्ची तो बेह्तर है। वरना लोग बस मतलब से आँखें चार करते हैं। उठा के लाश काँधों पर वो अपनी जी रहा कब से कहाँ हैं वो, जो जीने का ये ढंग निर्यात करते हैं। कराते मंदिर-ओ-मस्जिद को लेकर आपसी झगड़े ख़ुदा और राम को ये लोग ही बदनाम करते हैं। बड़े झाँसे, बड़े वादे वही कर पाते हैं सबसे जो कुछ करके दिखाने में नहीं विश्वास करते हैं। न जाने कौनसी शालीन दुनिया में रहे हो तुम यहाँ तो हर कदम पर लोग बस कुहराम करते हैं। *****

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