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- तिनके का सहारा
मनीषा गुप्ता सेठ रामलाल जी की पत्नी का एक लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया था, अब वह इतनी बड़ी कोठी में अकेले रहते थे। बेटा विदेश में नौकरी करता था इसलिए बेटे बहु कभी-कभी ही मिलने आते थे। पत्नी विमला जी के जाने के बाद अब सेठ रामलाल जी बिल्कुल अकेले पड़ गए थे वह धीरे-धीरे अवसाद का शिकार हो रहे थे उन्हें लग रहा था उनके जीवन में कुछ नहीं बचा। बेटा बहू दिन में एक बार उनका समाचार जानने के लिए वीडियो कॉल अवश्य कर लेते थे। रामलाल जी के घर में मालती नाम की महिला साफ-सफाई का काम करती थी घर में कोई न होने कारण वह अपने एक वर्षीय बेटे को भी अपने साथ ही काम पर ले जाती थी। रामलाल जी ने जब एक दिन उस बच्चे को देखा तो उनके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कुराहट आ गई, अब रामलाल जी को रोज उसे बच्चे का इंतजार रहता और वह दोनों खूब मजे में खेलते थे। रामलाल जी को उम्र की इस पड़ाव में वह बच्चा तिनके का सहारा लग रहा था, उस बच्चों के साथ खेल कर उन्हें ऐसा लगता जैसे वह अपने बेटे के बचपन को दोबारा जी रहे हो। वह बच्चा भी बा.. बा... की आवाज निकाल कर उनकी गोदी में बड़े प्यार से चढ़ जाता । सेठ रामलाल ने बच्चे के लालन-पालन की अच्छी व्यवस्था कर दी। उसे अच्छे स्कूल में भर्ती करवा दिया। बच्चे और रामलाल के बीच उभरते प्यार को देखकर मालती भी खुशी से अपना जीवन व्यतीत करने लगी। मालती अब दोहरे उत्साह के साथ सेठ रामलाल की सेवा करती। सेठ रामलाल जी अब अपना जीवन दुबारा जीने लगे थे। बच्चे के प्यार और मालती की सेवा से खुश होकर सेठ ने दोनों के रहने की व्यवस्था भी अपनी कोठी में ही करवा दी। इस प्रकार उस बालक ने सेठ रामलाल के जीवन जीने में 'तिनके' का काम किया था। *****
- नयी कोपल
सविता पाटील कभी किसी में अपना ही अक्स दिख जाता है। जो तुम्हारे जैसा ही सोचता है। तुम्हारे जैसा ही किसी वृतांत को देखता है, समझता है। फिर एक आभास होता है। भीड़ में किसी के साथ होने का हाथों में किसी के हाथ होने का। जो अपरिचित है, पर परिचित लगता है। अनदेखा है पर देखा लगता है। यह भाव मन को सुहाता है। अब न ये विचार सूखे पत्तों से झड़ जायेंगे। और न ये वृक्ष ठूंठा रह जायेगा। बल्कि नयी कोंपलें फूटेंगी। नदी सूखी न रहेगी। नयी धाराएं जुड़ती जायेंगी। *****
- सेवा का फल
शिवकुमार गोयल हजरत मूसा हर पल खुदा की याद में डूबे रहते थे। उन्हें खुदा के नूर की अनुभूति हर क्षण होती रहती थी। एक दिन इबादत के समय उन्होंने खुदा से पूछा, 'परवरदिगार, क्या आप जन्नत में मेंरे पास जगह लेने वाले का नाम बताएँगे?! खुदा ने कहा, 'मूसा, तेरा पड़ोसी जन्नत में भी तेरा पड़ोसी रहेगा।' मूसा यह सुनकर हतप्रभ रह गए। उनका पड़ोसी मैले-कुचैले कपड़े पहने पेड़ के नीचे बैठा जूते तैयार करता था। मूसा ने कभी उसे मसजिद जाते या नमाज पढ़ते नहीं देखा था। उन्होंने सोचा कि जब खुदा यह कह रहे हैं, तो उसमें कुछ खास बात तो होगी ही। वे उससे मिलने उसकी झोंपड़ी में जा पहुँचे। जूते गाँठने वाला व्यक्ति अपना सामान समेटकर झोंपड़ी में घुस ही रहा था। उसने हजरत मूसा को देखा, तो अभिवादन कर विनम्र होकर बोला, “आप मेरे गरीबखाने पर पधारे, मैं आपका शुक्रगुजार हूँ। आप कुछ देर बैठिए। मैं अभी आपकी खिदमत में हाजिर होता हूँ।' इतना कहकर वह झोंपड़ी में घुस गया। जब बहुत देर हो गई, तो उन्होंने झाँककर देखा कि वह व्यक्ति बिस्तर पर पड़ी जर्जर शरीर वाली वृद्धा माँ को रूई के फाहे से दूध पिला रहा है। दूध पीते-पीते माँ को झपकी आने लगी, तब उसने माँ के पाँव दबाने शुरू कर दिए। हजरत मूसा यह दृश्य देखते ही समझ गए कि खुदा उससे माँ की अनूठी सेवा के कारण खुश हैं। हजरत दरवाजा खोलकर अंदर पहुँच गए। वृद्धा माँ के पैरों में सिर रखकर बोले, “माँ, तेरी सेवा ने तेरे बेटे को जन्नत का हकदार बना दिया है।' ******
- विदेशी बेटा
लतिका श्रीवास्तव पीयूष बेटा तेरे पिता तुझे बहुत याद कर रहे हैं। अंतिम समय में तुझे देखना चाहते हैं। एक बार आ जा बेटा। दमयंती जी करुणा विगलित स्वर में अपने इकलौते चिराग पियूष से प्रार्थना कर रहीं थीं। मां कोशिश कर रहा हूं। कंपनी में छुट्टी पहले से लेनी पड़ती है। ऐसे अचानक नही ले सकता। इतनी दूर विदेश में हूं। आने-जाने सबकी व्यवस्था में समय लगता है। मां, पापा को देश के बेस्ट हॉस्पिटल में एडमिट करवा तो दिया है। बेस्ट डॉक्टर्स दिन रात लगे हैं। मैं आकर क्या करूंगा। मुझे तो खुद अपने लिए समय नही मिल पाता है। आप लोगों की यही तो ख्वाहिश थी कि उनका बेटा विदेश जाए समाज में इज्जत बढ़ाए। इन्हीं ख्वाहिशों को पूरा करने में मैने अपनी ख्वाहिशों का गला घोंट दिया। और कोई भी बेस्ट सुविधा चाहिए तो बता दीजिएगा। पीयूष ने कहा और फोन कट गया था। और दमयंती जी के जेहन में वो अबोध नन्हा पियूष कौंध रहा था जो फूट-फूट कर रो रहा था। मां मैं हॉस्टल नहीं जाऊंगा मुझे नहीं पढ़ना बाहर जाकर वहां मुझे खाना कौन खिलाएगा। अभी तो मुझे अपने जूते की लेस बांधनी भी नहीं आती। मां मुझे आपके पास रहना है, नन्हा पीयूष बिलख रहा था। दमयंती जी, प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता उसे समझाने की कोशिश कर रही थीं। पियूष अभी सिक्स्थ स्टैंडर्ड में गया था। लेकिन दमयंती जी के लिए वो बहुत बड़ा हो गया था। सिक्स्थ क्लास फ्यूचर डिसाइडिंग क्लास होती है। उनकी सोसायटी में सभी के बच्चे बाहर हॉस्टल चले गए हैं। उन्हें भी इतने काम रहते हैं। आए दिन पीयूष के स्कूल में होने वाली मीटिंग्स और दुनिया भर की गतिविधियों में बेटे के साथ जुड़ने के लिए उनके पास बिलकुल वक्त नहीं रहता। जब देखो तब उनके और सोमेश के बीच इन्हीं मुद्दों को लेकर तनातनी होती रहती थी। सोमेश को अपना ऑफिस और अपना काम अपना पैसा सबसे महत्वपूर्ण लगता था। और दमयंती के समाज सुधार के कार्य बेकार और समय बर्बाद करने वाले लगते थे। आप कुछ कहते क्यों नहीं पीयूष को, समझाइए अब बड़ा हो गया है। घर से बाहर जाकर ही उसका व्यक्तित्व निर्माण संभव है। माधुरी जी का बेटा सुयश चार सालों से आर्मी स्कूल में हॉस्टल में पढ़ रहा है। अलग ही दिखता है। माधुरी जी बड़ा दंभ करती है उसे लेकर। अब मैं क्या बोलूं। तुम्हें जब मेरी कोई बात सुननी ही नही है, तो ये तो अभी बहुत छोटा है। ये क्या समझेगा तुम क्यों नही समझ जाती हो, कि अभी से इसे बाहर नहीं भेजना चाहिए। थोड़ा बड़ा हो जाएगा तो समझ आ जायेगी तब भेज देंगे। सोमेश के कहते ही दमयंती का स्वर तेज हो गया। बहुत छोटा है बहुत छोटा है, कह-कह के आपने ही इसका दिमाग चढ़ा दिया है। अरे जब एक दिन बाहर जाना ही है। तो अभी से आदत डाल लेने में हर्ज ही क्या है। यहां घर पर ही रहता है, तो भी आपके पास तो समय नहीं रहता उसके लिए। मुझे ही उसके साथ लगे रहना पड़ता है। वहां हॉस्टल में उसकी ट्यूशन कोचिंग स्कूल बस टिफिन तैयार करने बीमारी में देखभाल इन सबकी चिंता से मैं दूर हो जाऊंगी। हां दूर होकर क्या करोगी वही समाज सुधार के चोचले! दिखावटी सुधार है सब तुम्हारा। बाहर घूमने फिरने और घर की जिम्मेदारियों से बचे रहने का ढोंग है। अभी ही तुम्हारे करने से क्या कर पा रहा है। इतनी छोटी पांचवी कक्षा में क्या मार्क्स आएं हैं इसके। मुझे तो शर्म आती है, इसे अपना बेटा कहते हुए। बेस्ट स्कूल, बेस्ट कोचिंग, बेस्ट सुविधाएं सब कुछ तो कर रहा हूं। बेस्ट पापा हूं। मैं नौकरी क्या होती है, कैसे मिलती है, पैसे का महत्व समझ में नहीं आ रहा है इसे। मेरे साथ के सभी सहकर्मियों के बच्चे विदेशों में सेटल्ड हैं। मेरे बेटे को देख लो, दब्बू कहीं का। मां के अंचल से बाहर ही नहीं निकलना चाहता। मेरी इज्जत डुबोएगा ये। एक ही तो है और किससे क्या उम्मीद रखूं। सोमेश जी उत्तेजित ऊंची होती आवाज के बीच ही.... "....मां मैं हॉस्टल जा रहा हूं। सारा सामान मैंने बांध लिया है और हां पिताजी अब आप लोगों को मेरी वजह से समाज परिवार में किसी भी बेइज्जती का सामना नहीं करना पड़ेगा। कहता नन्हा पियूष अचानक बड़ा हो गया था। उस दिन वो घर छोड़कर जो हॉस्टल गया तो फिर पलट के नही देखा। जैसे निर्मोही सा हो गया था घर आना ही नही चाहता था। मां पिताजी भी उसे हॉस्टल में रखकर कोचिंग करते देखना चाहते थे। पियूष भी पढ़ता ही गया, बढ़ता ही गया और अनजाने ही मां पिता से दूर होता गया। पिता की इच्छा अनुरूप न्यूयॉर्क चला गया वहीं सेटल हो गया। सच है कल जब उसे मां की ममता और पिता के स्नेह की छांव की जरूरत थी, तब हमने उसे अपने से दूर कर दिया था। आज हमें पुत्र के स्नेहिल सान्निध्य की जरूरत है तो वो हमसे दूर हो गया है। हमने तो खुद अपने पैरो पर कुल्हाड़ी मारी है। पुत्र को याद करती हुई व्यथित सी दमयंती जी सोमेश जी के पास बैठ गई थीं। अरे वाह बेटा हो तो आपके पियूष जैसा हो। देखो कितना ख्याल रखता है मां पिता का। बिचारा खुद नहीं आ पाया तो क्या हुआ, देश का बेस्ट डॉक्टर नर्सिंग होम और बेस्ट सुविधाएं उपलब्ध करवाई हैं उसने। सोसायटी के अशोक जी और सुमेधा ने सोमेश के बेड के पास बैठते हुए जोर से दमयंती जी से कहा। तो दमयंती और सोमेश एक दूसरे की ओर नजर उठा कर देखने का साहस नहीं संजो पाए। ******
- अनोखी विरासत
नीरजा कृष्णा रात के बारह बज रहे थे। अचानक मोबाइल पर खर्र खर्र हुई। सरिता जी एकाएक घबड़ा सी गईं कि इतनी रात को कौन है? फिर देखा कि अमेरिका से बहु सीमा थी। उनका वोही समय होता है। लपक कर फोन उठाया तो उधर से उनके पोते मनु की आवाज आई। हैलो दादी! आप कैसी हो?" सरिता जी की नींद काफूर हो गई। हिला कर दादाजी को भी जगा दिया। "यस पोते राम! हाऊ आर यू?" "क्या दादी! आप ठीक तो हो ना?" "हाँ बेटा, बिल्कुल चुस्त दुरूस्त हूँ पर तुमको क्यों ऐसा लगा?" मनु-- "अरे दादी! आपने राधे-राधे ना बोल कर हाऊ आर यू बोला तो मैं डर गया कि मेरी दादी को ये क्या हो गया?" सरिता जी हँसते हँसते लोटपोट हो गई और बोली- "अरे माई डियर पोते राम! तेरी दादी सठिआई नहीं है बल्कि तेरे साथ मजे़ से गिटपिट करने के लिए अंग्रेजी भाषा सीख रही है। दादाजी ने एक ट्यूटर लगा दिया है।" "वाह दादी! डैट्स ग्रेट ना....पर आपको काफ़ी कुछ अंग्रेजी आती ही है।" "अरे नहीं ना डियर! तेरे प्यारे-प्यारे दोस्तों के सामने तो गड़बड़ हो ही जाती थी।" "ओके दादी! ठीक है पर मैं तो आपको खुश करने के लिए बढ़िया हिन्दी सीख रहा हूँ। मम्मा ने भी मेरे लिए हिन्दी सिखाने को ट्यूटर रख दिया है। हिन्दी हमारी मातृभाषा है। हमको उसका पूर्ण ज्ञान होना चाहिए ना।" दादी-दादा जी एकदम अवाक् हो गए। दोनों के नेत्रों से खुशी के आँसू बहने लगे। *******
- काजू का पेड़
धर्मेंद्र दयाल सिन्हा तवियत कुछ खराब रहने के कारण मैं कार्यालय से अवकाश लिया था। अपनी दोनों बेटियों 15 वर्षीय दिशा एवं 8 वर्षीय आस्था को स्कूल छोड़ कर आया हूं। मंद-मंद हवा में अपने गार्डन में बैठ कर सुखद अनुभूति मिल रही है। तभी मेरा ध्यान गार्डन के उस पेड़ पर चला गया और मैं अतीत की दुनिया में खो गया। करीब 5 साल पहले मैंने यह पेड़ सोनपुर मेले से खरीद कर लाया था, काजू का पेड़ जानकर। उसे बहुत ही प्यार और जिज्ञासा से प्रतिदिन पानी डालता और उसकी सेवा करता। पत्नी अंतरा और दोनों बेटियां भी जिज्ञासावश पेड़ की सेवा करते। समय बीतता गया। महीने-दर-महीने, साल-दर-साल वह तथाकथित काजू का पेड़ बढ़ता गया और साथ ही बढ़ती गई हम सभी की जिज्ञासा एवं उस पेड़ के प्रति प्यार और लगाव। हर साल यह सोचता कि इस बसंत में यह पेड़ अवश्य फलेगा, पर इंतजार बढ़ती गई। अंतरा तथा बच्चे आशान्वित नजरों से उस पेड़ की कोख पर गहरी नजर डालते रहे। और उस दिन तो मैं अवाक रह गया जब छोटी बेटी ने कहा कि अगले साल यदि यह नहीं फला तो पापा इसे कटवा देना। आखिरकार एक सुंदर सलोने समय के बीच पेड़ की शाखों पर नव अंकुर झूम आए। नन्हे फलियों में काजू जैसा सजा वह पेड़ कुछ कड़वे स्वाद वाले फल के साथ हम लोगों के सामने प्रस्तुत हुआ। वह फल तो थे लेकिन वह फल काजू न थे। अब घर के लोग उसे कटवाने के बारे में सोच रहे थे। तभी मंद-मंद चलती हवा जोरों से तूफान जैसी चलने लगी और एक अंतर्द्वंद का तूफान मेरे मन के अंदर भी चल रहा था। क्या सिर्फ इसलिए इसे काट देना उचित होगा कि यह वह फल नहीं जिसके लिए मैंने इसकी सेवा की थी? क्या इतने दिनों तक उस पेड़ की सेवा करते हुए हमें उस से लगाव नहीं हो पाया? बच्चे तो फिर भी बच्चे हैं पर अंतरा भी .....? मुझे वह समय याद आ गया जब आस्था गर्भ में थी हम दोनों बल्कि तीनों (दिशा) ने लड़के की चाह की थी। अंतरा ने पूरी इच्छा और प्यार से 9 माह तक बेटे की चाह में अपने गर्भ को सींचा। 9 माह बाद जब आस्था आई तो क्या उसके प्यार में कोई कमी थी? कभी नहीं। हम सभी आस्था को उतना ही तो प्यार करते थे। फिर वर्षों इस पेड़ को सींचने के बाद भी इस से इतना लगाव क्यों नहीं? अनगिनत सवाल मेरे मन के अंदर कौंध रहे थे। फिर मैंने एक निश्चय किया। नहीं ऐसा नहीं होगा। हमें भी इतने सालों से इस पेड़ से उतना ही लगाव हो गया है। मैं सभी को समझाऊंगा। हम सब में अच्छे संस्कार हैं। सब जरूर समझ जाएंगे। ऐसा सोचकर मन शांति से भर गया। "सुनो" तभी अंतरा की आवाज ने मेरी तंद्रा भंग की। मैं यादों के झरोखों से बाहर आया। बाहर तूफान थम चुका था और हल्की बारिश हो रही थी। मैं अंतरा को अपने सीने से लगा लिया और मेरी आंखों से दो बूंद आंसू उसके गालों पर गिर गए। अंतरा प्रश्न सूचक नेत्रों से हमारी ओर देखने लगी। बाहर गार्डन में खड़े पेड़ के पत्तों से भी बारिश की बूंदे टपक रही थी। बिल्कुल मेरे आंखों की बारिश जैसी। तूफान के बाद की शांति जैसी शांत एवं शीतल। पेड़ से लगे अधखिले फूल मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। मानो मेरा शुक्रिया अदा कर रहे हो। ******
- गरीब का बेटा
लक्ष्मी कांत मैं एक घर के करीब से गुज़र रहा था कि अचानक से मुझे उस घर के अंदर से एक बच्चे की रोने की आवाज़ आई। उस बच्चे की आवाज़ में इतना दर्द था कि अंदर जा कर वह बच्चा क्यों रो रहा है, यह मालूम करने से मैं खुद को रोक ना सका। अंदर जा कर मैने देखा कि एक माँ अपने दस साल के बेटे को आहिस्ता से मारती और बच्चे के साथ खुद भी रोने लगती। मैने आगे हो कर पूछा बहनजी आप इस छोटे से बच्चे को क्यों मार रही हो? जब कि आप खुद भी रोती हो। उस ने जवाब दिया भाई साहब इस के पिताजी भगवान को प्यारे हो गए हैं और हम लोग बहुत ही गरीब हैं, उन के जाने के बाद मैं लोगों के घरों में काम करके घर और इस की पढ़ाई का खर्च बामुश्किल उठाती हूँ और यह कमबख्त रोज़ाना स्कूल देर से जाता है और रोज़ाना घर देर से आता है। जाते हुए रास्ते मे कहीं खेल कूद में लग जाता है और पढ़ाई की तरफ ज़रा भी ध्यान नहीं देता है। जिस की वजह से रोज़ाना अपनी स्कूल की वर्दी गन्दी कर लेता है। मैंने बच्चे और उसकी माँ को जैसे तैसे थोड़ा समझाया और चल दिया। इस घटना को कुछ दिन ही बीते थे कि एक दिन सुबह-सुबह कुछ काम से मैं सब्जी मंडी गया। तो अचानक मेरी नज़र उसी दस साल के बच्चे पर पड़ी जो रोज़ाना घर से मार खाता था। मैं क्या देखता हूँ कि वह बच्चा मंडी में घूम रहा है और जो दुकानदार अपनी दुकानों के लिए सब्ज़ी खरीद कर अपनी बोरियों में डालते तो उन से कोई सब्ज़ी ज़मीन पर गिर जाती थी वह बच्चा उसे फौरन उठा कर अपनी झोली में डाल लेता। मैं यह नज़ारा देख कर परेशानी में सोच रहा था कि ये चक्कर क्या है, मैं उस बच्चे का चोरी-चोरी पीछा करने लगा। जब उस की झोली सब्ज़ी से भर गई तो वह सड़क के किनारे बैठ कर उसे ऊंची-ऊंची आवाज़ें लगा कर वह सब्जी बेचने लगा। मुंह पर मिट्टी गन्दी वर्दी और आंखों में नमी, ऐसा महसूस हो रहा था कि ऐसा दुकानदार ज़िन्दगी में पहली बार देख रहा हूँ । अचानक एक आदमी अपनी दुकान से उठा जिस की दुकान के सामने उस बच्चे ने अपनी नन्ही सी दुकान लगाई थी, उसने आते ही एक जोरदार लात मार कर उस नन्ही दुकान को एक ही झटके में रोड पर बिखेर दिया और बाज़ुओं से पकड़ कर उस बच्चे को भी उठा कर धक्का दे दिया। वह बच्चा आंखों में आंसू लिए चुप चाप दोबारा अपनी सब्ज़ी को इकठ्ठा करने लगा और थोड़ी देर बाद अपनी सब्ज़ी एक दूसरे दुकान के सामने डरते-डरते लगा ली। भला हो उस शख्स का जिस की दुकान के सामने इस बार उसने अपनी नन्ही दुकान लगाई उस शख्स ने बच्चे को कुछ नहीं कहा। थोड़ी सी सब्ज़ी थी ऊपर से बाकी दुकानों से कम कीमत। जल्द ही बिक्री हो गयी, और वह बच्चा उठा और बाज़ार में एक कपड़े वाली दुकान में दाखिल हुआ और दुकानदार को वह पैसे देकर दुकान में पड़ा अपना स्कूल बैग उठाया और बिना कुछ कहे वापस स्कूल की और चल पड़ा। और मैं भी उस के पीछे-पीछे चल रहा था। बच्चे ने रास्ते में अपना मुंह धो कर स्कूल चल दिया। मै भी उस के पीछे स्कूल चला गया। जब वह बच्चा स्कूल गया तो एक घंटा लेट हो चुका था। जिस पर उस के टीचर ने डंडे से उसे खूब मारा। मैने जल्दी से जा कर टीचर को मना किया कि मासूम बच्चा है इसे मत मारो। टीचर कहने लगे कि यह रोज़ाना एक डेढ़ घण्टे लेट से ही आता है और मैं रोज़ाना इसे सज़ा देता हूँ कि डर से स्कूल वक़्त पर आए और कई बार मैं इस के घर पर भी खबर दे चुका हूँ। खैर बच्चा मार खाने के बाद क्लास में बैठ कर पढ़ने लगा। मैंने उसके टीचर का मोबाइल नम्बर लिया और घर की तरफ चल दिया। घर पहुंच कर एहसास हुआ कि जिस काम के लिए सब्ज़ी मंडी गया था वह तो भूल ही गया। मासूम बच्चे ने घर आ कर माँ से एक बार फिर मार खाई। सारी रात मेरा सर चकराता रहा। सुबह उठकर फौरन बच्चे के टीचर को कॉल की कि मंडी टाइम हर हालत में मंडी पहुंचें। और वो मान गए। सूरज निकला और बच्चे का स्कूल जाने का वक़्त हुआ और बच्चा घर से सीधा मंडी अपनी नन्ही दुकान का इंतेज़ाम करने निकला। मैने उसके घर जाकर उसकी माँ को कहा कि बहनजी आप मेरे साथ चलो मैं आपको बताता हूँ, आप का बेटा स्कूल क्यों देर से जाता है। वह फौरन मेरे साथ यह कहते हुए चल पड़ीं कि आज इस लड़के की मेरे हाथों खैर नही। छोडूंगी नहीं उसे आज। मंडी में लड़के का टीचर भी आ चुका था। हम तीनों ने मंडी की तीन जगहों पर पोजीशन संभाल ली, और उस लड़के को छुप कर देखने लगे। आज भी उसे काफी लोगों से डांट फटकार और धक्के खाने पड़े, और आखिरकार वह लड़का अपनी सब्ज़ी बेच कर कपड़े वाली दुकान पर चल दिया। अचानक मेरी नज़र उसकी माँ पर पड़ी तो क्या देखता हूँ कि वह बहुत ही दर्द भरी सिसकियां लेकर लगातार रो रही थी, और मैने फौरन उस के टीचर की तरफ देखा तो बहुत शिद्दत से उसके आंसू बह रहे थे। दोनों के रोने में मुझे ऐसा लग रहा था जैसे उन्हों ने किसी मासूम पर बहुत ज़ुल्म किया हो और आज उन को अपनी गलती का एहसास हो रहा हो। उसकी माँ रोते-रोते घर चली गयी और टीचर भी सिसकियां लेते हुए स्कूल चला गया। बच्चे ने दुकानदार को पैसे दिए और आज उसको दुकानदार ने एक लेडी सूट देते हुए कहा कि बेटा आज सूट के सारे पैसे पूरे हो गए हैं। अपना सूट ले लो, बच्चे ने उस सूट को पकड़ कर स्कूल बैग में रखा और स्कूल चला गया। आज भी वह एक घंटा देर से था, वह सीधा टीचर के पास गया और बैग डेस्क पर रख कर मार खाने के लिए अपनी पोजीशन संभाल ली और हाथ आगे बढ़ा दिए कि टीचर डंडे से उसे मार ले। टीचर कुर्सी से उठा और फौरन बच्चे को गले लगा कर इस क़दर ज़ोर से रोया कि मैं भी देख कर अपने आंसुओं पर क़ाबू ना रख सका। मैने अपने आप को संभाला और आगे बढ़कर टीचर को चुप कराया और बच्चे से पूछा कि यह जो बैग में सूट है वह किस के लिए है। बच्चे ने रोते हुए जवाब दिया कि मेरी माँ अमीर लोगों के घरों में मजदूरी करने जाती है और उसके कपड़े फटे हुए होते हैं। कोई जिस्म को पूरी तरह से ढांपने वाला सूट नहीं और मेरी माँ के पास पैसे नही हैं। इस लिये अपने माँ के लिए यह सूट खरीदा है। तो यह सूट अब घर ले जाकर माँ को आज दोगे? मैने बच्चे से सवाल पूछा। जवाब ने मेरे और उस बच्चे के टीचर के पैरों के नीचे से ज़मीन ही निकाल दी। बच्चे ने जवाब दिया नहीं अंकल छुट्टी के बाद मैं इसे दर्जी को सिलाई के लिए दे दूँगा। रोज़ाना स्कूल से जाने के बाद काम करके थोड़े-थोड़े पैसे सिलाई के लिए दर्जी के पास जमा किये हैं। टीचर और मैं सोच कर रोते जा रहे थे कि आखिर कब तक हमारे समाज में गरीबों के साथ ऐसा होता रहेगा। उन के बच्चे त्योहार की खुशियों में शामिल होने के लिए जलते रहेंगे, आखिर कब तक। क्या ऊपर वाले की खुशियों में इन जैसे गरीब का कोई हक नहीं? क्या हम अपनी खुशियों के मौके पर अपनी ख्वाहिशों में से थोड़े पैसे निकाल कर अपने समाज में मौजूद गरीब और बेसहारों की मदद नहीं कर सकते। आप सब भी ठंडे दिमाग से एक बार जरूर सोचना!! ******
- ईश्वर के करम
डॉ. रश्मि दुबे भटकते हुए कारवां अक्सर दरबदर नहीं होते। सब के नसीब में खुदा रहने को घर नहीं होते। ग़ुरबत में जीते जो दुनिया से बेखबर नहीं होते। कि किस्मत में उनकी तरक्की के सफर नहीं होते। मत तौलो इंसानों को अमीरी के तराजू में। दोनों पाले तराजू के कभी बराबर नहीं होते। बैठा क्यों उदास लेकर मुफ़लिसी के हजार ग़म। जीते हैं वे तक भी जिनके हम सफर नहीं होते। हे ईश्वर करम कर लेना तू बंदों पर अपने। तू मिला जिसे उन पर कुदरत के कहर नहीं होते। ****
- एक परिंदे का खत, मेरे नाम।
डॉ. जहान सिंह ‘जहान’ तुम अपने को कहते हो ‘जहान’। अगर सुन सकते हो तो सुनो मेरा दर्द-ए-बयान। मुझे मेरे हिस्से का आसमां दे दो। कुछ हवा, चंद पत्ते, एक टहनी, घोसला दे दो। गुड़िया ने अभी-अभी पंख खोले हैं। उसे उड़ने का हौसला दे दो। खेतों में अब छतें हैं। छतों पर अब दाने नहीं। ऊची मीनारें और तारों का जाल फैला है। मुझे मेरे हिस्से का खेत और खलिहान दे दो। मैं कोई ड्रोन नहीं जहां चाहूं उतर जाऊं। मुझे मेरे पंखों का सफर दे दो। मुझे मेरे हिस्से का आसमां दे दो। घरों की खिड़कियां कभी मेरी पिकनिक स्पॉट होती थीं। अब वह एसी और कूलर की आरामगाह हो गई हैं। मेरे बच्चे अब दोस्तों के घर जाने से डरते हैं। जब वह दरवाजे पर कुत्ते से सावधान रहो की तख्ती पढ़ते हैं। उन्हें खेलने की कोई जगह कोई पार्क दे दो। मुझे मेरे हिस्से का आसमां दे दो। कुएं पर पनघट नहीं पोखर, बावली में पानी नहीं मेरे हिस्से का बादल मुझे दे दो। एक दिन की कमाई चिट्ठी लिखवाने में गवाई। आजकल बिना लिए दिए कौन काम करता है। सुना है इसी बस्ती में एक इंसान रहता है ‘जहान’ उस इंसान का पता दे दो। मुझे मेरे हिस्से का आसमां दे दो। ****
- अपनी बेटी
गीता वाधवानी रजनी कुछ दिनों से महसूस कर रही थी कि जब वह अपने मोहल्ले से निकलती है और जब शाम को अपनी जॉब से मोहल्ले में वापस आती है। तब उसे देखकर कुछ लोग कानाफूसी शुरू कर देते हैं। एक बार उसने ध्यान से सुनने की कोशिश की। तो उनकी बातचीत में उसे अपने पति नीलेश का नाम सुनाई दिया। जबसे नीलेश की जॉब चली गई थी तब से वह घर पर ही एक कमरे में छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता था और खाना भी बना लेता था। उसकी मदद के कारण रजनी बिना टेंशन के अपनी जॉब पर चली जाती थी। इधर कुछ दिनों से उसे नीलेश के व्यवहार में कुछ बदलाव दिखाई दे रहे थे और साथ ही मोहल्ले के लोगों में कुछ कानाफूसी भी हो रही थी। तब एक दिन अचानक रजनी दोपहर के समय अपने ऑफिस से घर आ गई। उस समय नीलेश बच्चों की ट्यूशन ले रहा था। कमरे का दरवाजा हल्का सा बंद था। रजनी ने उसे हाथ से धकेल दिया और सामने का दृश्य देखकर उसके मन में घृणा और क्रोध उत्पन्न हो गया। उसका शक सही निकला। नीलेश एक छोटी बच्ची को अपनी गोद में बिठाकर उसके शरीर को गलत तरीके से स्पर्श कर रहा था। यह देखते ही रजनी गुस्से में उबल पड़ी और जोर से चिल्लाई- "शर्म करो, तुम्हें तो अपनी इस हरकत पर डूब मरना चाहिए। क्या तुम भूल गए हो कि इस उम्र की हमारी भी एक बच्ची है। कुछ दिनों से मुझे तुम पर शक हो रहा था लेकिन मैं तुम्हें रंगे हाथों पकड़ना चाहती थी। तुम जाकर कहीं डूब मरो क्योंकि मैं अपनी बेटी को साथ लेकर यहां से जा रही हूं। मैं अब तुम्हारे साथ नहीं रह सकती।" नीलेश पहले तो अकड़कर बोला- "मैंने कुछ नहीं किया है मैं तो इसे प्यार से गणित के सवाल समझा रहा था।" लेकिन जब रजनी ने उसे छोड़कर जाने की बात की तब वह गिड़गिड़ाने लगा और माफी मांगने लगा। तब रजनी ने बात को गहराई से सोचते हुए, उसे घर को ना छोड़ कर जाने का फैसला किया क्योंकि उसे लगा कि नीलेश उसके जाने से पूरी तरह आजाद हो जाएगा। उसने मन में ठान लिया था कि नीलेश को अब सही राह पर लाकर ही रहूंगी। ******
- आत्मबोध
आभा सिंह वह रात भर सो नहीं सका था। नितांत अकेला सड़क पर चला जा रहा था। एक विद्रूप सी हंसी उसके होठों पर तैर गई। ऐसा लगा जैसे उसके होंठ कानों तक खींच रहे हैं। कानों में दर्द सा हुआ। लेकिन सबसे ज्यादा दर्द उसके सीने में हो रहा था। वह लाचार बेबस सब कुछ महसूस कर रहा था। 'उसे अपने बॉस की हरकत याद आने लगी। जब वॉस ने बिना किसी गलती के अधिकारों की बात करने पर दफ्तर से निकाल दिया और तो और चपरासी से पिटवाने की धमकी भी दे दी थी। उसकी जगह उस लड़के को दे दी जो उसे बहुत ही जूनियर था। वॉस उस पर मेहरबान था क्योंकि वह बास के तलवे भी चाटने को तैयार रहता था। वह वॉस के साथ ऑफिस के बाद कहीं भी जाने को तैयार रहता था। जिस भी प्रकार का कार्य वॉस कहते वह करने को तैयार रहता था। उसका मन खराब होने लगा उसने सड़क पर थूक दिया। चलते-चलते सड़क के किनारे बनी पुलिया पर बैठ गया। मन ही मन कहा, “जिसे नौकरी से ना निकला गया हो वह उसकी हालत समझ नहीं सकता।” उसकी हालत उस फटे पायजामें जैसी थी जिसे पहनो तब भी नंगा ना पहनो तब भी नंगा। वह क्या करें कहां जाए किस से कहे अपनी व्यथा। उसकी इच्छा हुई कि अपनी मां से व्यथा कहे। किंतु उसने सोचा कि वह बहुत दुखी हो जाएगी। मां ने बड़ी मेहनत से उसे पढ़ा लिखा कर इस योग्य बनाया था। उसे याद आया मां ने पढ़ने के लिए दो बीघा खेत बेच दिया था। अब मात्र तीन बीघा जमीन बची है। उसी से थोड़ा बहुत अनाज मिल जाता है। दुनिया भर के खर्चे वह कैसे पूरा करेगा। मां उसकी शादी करवाना चाह रही थी। नौकरी लगते ही लोग दौड़ने लगे थे। अब क्या होगा कैसे होगा? अब उसे फिर से नौकरी की तलाश करनी पड़ेगी। दफ्तर-दफ्तर दौड़ना पड़ेगा। उसे लड़के ने बॉस को फंसा कर पीठ में छुरा भोग दिया था। हे ईश्वर क्या करें, कहां जाएं। सोच कर मां से कहने का विचार छोड़ दिया। उसके मन में आत्महत्या का विचार उभरने लगा। वह अपने घर की तरफ लौट आया। उसने चाय बनाई। पीते हुए, अपना दूरदर्शन चला दिया। इस समय दूरदर्शन पर महात्मा गांधी का विचार आ रहा था। आत्महत्या पाप है। मरना है तो जीने के लिए मरो। इस वाक्य ने उसे झिझोड़ कर रख दिया। उसके मन मस्तिष्क में गांधी जी के विचार उमड़ घुमड़ कर आने लगे। थोड़ी देर में उसका विचार बदल गया। उसने सोचा क्यों ना इसी जगह रहते हुए प्रयास करूँ और अपनी माता जी को बुला लूँ। थोड़ा सुकून मिलेगा और इस प्रकार उसने आत्महत्या का विचार त्याग दिया, और जीवन की डोर थाम ली। *****
- ये रहे कागज़
विकास बिश्नोई अक्सर लोग कहते हैं कि हम समाजसेवा करना तो चाहते हैं पर ऐसा कोई मौका ही नहीं मिलता। अगर मन सच्चा होगा और मन में सेवा की भावना होगी तो हमारे सामने ऐसे अवसर स्वयं आ जाते हैं। हाल ही में विजय के साथ ऐसा ही एक किस्सा हुआ, जिसने एहसास कराया कि सेवा का मौका मिलता नहीं, हमें ढूंढना पड़ता है। विजय हरियाणा के एक विश्वविद्यालय की परीक्षा शाखा में बतौर प्रोजेक्ट हेड कार्य करता था। एक दिन जब वो अपने दफ्तर में कार्य कर रहा था, तो वहां एक 40-45 वर्ष की महिला हाँफती हुई उसके पास आई और अपने कागज दिखाकर पूछा कि सर, यह मेरा कार्य यहीं आपके पास ही होगा क्या। विजय ने कागजात देखकर कहा, यहां नहीं मैम, आप सामने वाली लैब में जाइए, वहां यह कार्य होगा। सुनते ही महिला उदास हो गयी और कहा, सर प्लीज बता दो, कहाँ होगा। बहुत देर हो गयी, सब इधर से उधर भेज रहे है, कोई एक बिल्डिंग से दूसरी में। इसी में मेरा सांस फूलने लगा है अब तो। विजय एक दयालु प्रवर्ति का इंसान था। उसने कहा, आप एक बार सामने वाली लैब में पता कर लो। ना हो तो मुझे बताना। महिला लैब में गई और कुछ देर में ही उदासीन चेहरे के साथ वही उत्तर लेकर वापस आ गई। लैब वालों ने वही उत्तर उसे दिया था और अन्य जगह जाने का बोल दिया, जहां से वो आई थी। विजय ने पहले महिला को बिठाया, पानी मंगवाकर पिलाया। साथ ही अपने एक मित्र सुखविंदर को फोन कर अपने दफ्तर बुलाया। वह भी उसकी तरह दयालु और नेक दिल इंसान था। महिला को अपने लगभग 10-12 वर्ष अपने पुराने कागजात और रोल नंबर इत्यादि निकलवाने थे। काम इतना सरल भी ना था। दोनों ने सलाह मशवरा कर उस काम को खुद करने की ही ठानी। विजय ने अपने जूनियर को कुछ काम सौंपा व महिला को दफ्तर में बिठा, खुद सुखविंदर के साथ बाहर की ओर निकले। इधर उधर पूछताछ करने पर पता चला कि यह केवल रिकॉर्ड रूम से ही पता चल सकता है। दोनों वहां गए तो वहां के अधिकारियों ने स्टाफ के होने के नाते उन्हें प्रवेश दिया, पूछने पर पुराने कागजातों फाइलों की बोरी की ओर इशारा करते हुए कहा, ये रही बोरी और ये तुम। ढूंढ लो अगर कुछ मिलता है तो। विजय और सुखविंदर ने एक दूसरे की तरफ देखा, महिला के बारे सोचा और बोरी की ओर बढ़ गए। कार्य कठिन था, पर दोनों महिला की मदद हेतु दृढ़ संकल्प थे। चार घण्टे उन्हीं फाइलों में लगे रहने के बाद उन्हें सफलता मिल गई। उन्हें महिला के कागजात आखिरकार मिल ही गए थे। दोनों के चेहरे पर बहुत खुशी थी। दिल को तस्सली थी कि चार घण्टे लगाए तो हक आ ही गया। दोनों ने महिला को जाकर बताया तो वह हाथ जोड़कर उन्हें धन्यवाद करने लगी और कहा, जहां कोई नहीं होता, वहां भगवान किसी ना किसी को जरूर भेजता है। धन्यवाद किया, भविष्य के लिए आशीर्वाद दिया और चली गई। आज विजय सुखविंदर खुश भी थे और संतुष्ट भी। ******











