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- मेरा गाँव
सुनीता पाण्डेय निशा सालों बाद अपने मम्मी-पापा के साथ गांव जा रही थी। आपने मामा के बेटे की शादी में। बचपन में गई थी उसके बाद हॉस्टल में पढ़ने गई तो वहीं की हो गई। जब कभी छुट्टियां मिलती तो नई-नई जगह चली जाती मम्मी-पापा के साथ, बाद में दोस्तो के साथ, मेट्रो सिटी, विदेश घूमना उसे पसंद था। वो गांव आना ही नही चाहती थी, पर सबके कहने पर वो मान गई और बेमन चली आई इस गांव। गांव में पहुंचते ही गोबर की बदबू, कच्चे रास्ते, उसे गुस्सा दिला रहे थे। बैलगाड़ी मे बैठकर उसका सफर उसे चिड़चिड़ा कर रहा था। पर मम्मी की हिदायतें बार-बार उसके गुस्से को दबा रही थी। पूरे रास्ते पेड़ों से गिरे सूखे पत्ते देख रही थी, फिर जैसे बैलगाड़ी आगे बढ़ रही थी, वो चारो तरफ खेतों में उग आई गेंहू की फसल देख थोड़ा बहुत खुश हुई। जाहिर नही किया उसने, पर उसकी मां उसे देख समझ गई। अपने ननिहाल पहुंच कर मामा-मामी से मिली, फिर सब बच्चे एक दूसरे से मिले। मामी ने चाय नाश्ता लगाया, इतना कुछ खाने का सामान देख उसने मामी से पूछा, "मामी इतना सारा सामान यहां मिल जाता है क्या?" "हां बिटिया यहां सब मिलता है पर ये सब मैने घर में खुद अपने हाथ से बनाया है।" "इतना सब" "हां बेटा घर के बने खाने में स्वाद भी होता है और बरकत भी।" शाम को वो घर के सब बच्चों के साथ खेतों में घूमने गई, तरह-तरह के फल, फूल, सब्जियां देख वो हैरान हो गई। पेड़ों से तोड़ कर खाना, कही कोई मनाही नहीं। सब गांव वाले उसे अपने-अपने खेतो में, बागों में ले जाए और जो उसका मन हो वो उसे तोड़ कर दे। ऐसा तो उसने पहली बार देखा था क्योंकि शहर में तो बिना पैसे के कुछ भी नही मिलता और वो भी इतना ताजा तो कभी नही। रात में आसमान से आती ठंडी-ठंडी हवा इस गर्मी के मौसम को भी अंगूठा दिखा रही थी। बिना एसी और कूलर के भी उसे बहुत ऐसी नींद आई कि लगा सालों बाद उसने सुकून की नींद की है। दूसरे दिन वो गांव के बच्चों के साथ तालाब में नहाने गई, फिर मंदिर में आरती के समय सब गांव वालों का एक साथ पूजा करना उसके मन को प्रफुल्लित कर रहा था। अब तो उसे यहां का माहौल अच्छा लगने लगा। गांव की हरियाली, हरे भरे पेड़, ताज़ी एवं शुद्ध हवा ये प्रकृति का इंसान को दिया सबसे अनमोल तोहफा है पर हम ईंट पत्थर कंक्रीट के घरों को महल कहते है अब ये अंतर उसे साफ-साफ समझ आ रहा था। अब प्रकृति की खूबसूरती उसके मन में बस गई थी उसने घर आकर अपनी मम्मी को बुलाया और कहा, "मम्मी अब हम हर छः महीने में एक बार जरुर यहां आएंगे।" उसकी मम्मी ने कहा, "क्यों?" "मेरी प्यारी मम्मी क्योंकि यहां जीवन है, खुशियां है, सुख है, शांति है जो प्रकृति ने इस जगह को दी है और मुझे अब प्रकृति की गोद में इन खुशियों को महसूस करना है।" उसकी बातें सुन पूरे परिवार ने जोर से ताली बजा कर कहा, "बिलकुल सही.... *****
- बहू का घर
लक्ष्मी कुमावत वंदना रसोई के काम से फ्री होकर मम्मी जी के कमरे की तरफ जा रही थी। सोने से पहले सुबह की तैयारी करके रखना चाहती थी। सुबह तो खुद के लिए भी ढंग से वक्त नहीं मिलता। ऊपर से ननद अचानक से शाम को अपने ससुराल से आ गई तो काम वैसे भी बढ़ गया। स्कूल जाने से पहले सुबह ढंग से थोड़ा बहुत काम कर जाए इसके लिए पहले से तैयारी कर लेना बेहतर है। स्कूल में वार्षिक परीक्षा चल रही है तो छुट्टी लेना तो असंभव है। यही सोचकर मम्मी जी के कमरे की तरफ जा रही थी, पर कमरे के दरवाजे पर पहुंचकर उसके पैर ठिठक गए। अंदर उसकी सास सुशीला जी, उसका पति मधुर, देवर अंशुल और ननद वनिता बैठ कर बात कर रहे थे। बार-बार वंदना का नाम आ रहा था इसलिए वंदना ने बात सुनना ही उचित समझा। "भैया मैंने सुना है कि भाभी के मायके में उनके पापा ने प्रॉपर्टी बेची है और उसका अच्छा खासा पैसा भी आया है। खुद उनके पापा-मम्मी कितने अच्छे फ्लैट में रहने गए हैं। साथ ही अपने बड़े भाई के बेटे को भी रख रखा है। तो भाभी को भी तो पैसे मिले ही होंगे।" वनिता की बात सुनकर मधुर बोला, "अरे मुझे क्या पता? ना तो पापा जी ने कुछ बताया और ना ही वंदना ने। दोनों की दोनों बाप बेटी अंदर के अंदर ही सब कुछ कर लेते हैं। पर यहां दामाद की कोई इज्जत नहीं है। मुझे तो बताना भी ठीक नहीं समझते" "अरे भैया, तो पता करो ना। ऐसे थोड़ी ना काम चलेगा। आखिर कितने पैसे आए हैं, पता होगा तभी तो अपना बजट बना पाएंगे। और इस बार मुझे बाइक लेनी ही लेनी है। चाहे कुछ भी हो जाए" अंशुल ने जिद करते हुए कहा तो वनिता कहां पीछे रहती। वह भी अपनी फरमाइश करते हुए बोली, "हां भैया, पता कर ही लो। मुझे भी इस बार सोने के कड़े तो चाहिए ही चाहिए। आप लोगों से तो इतना भी नहीं हुआ कि मुझे सोने के कड़े शादी में ही दे देते। जब मेरी देवरानी अपने मायके से आए हुए सोने के कड़े पहनती हैं तो मुझे सही में बहुत बुरा लगता है। ऐसा लगता है कि जैसे मुझे ही दिखा रही हो।" तभी सुशीला जी भी बोली, "तुम दोनों चुप करो। मुझे बात करने दो। देखो मधुर, पैसों की जरूरत इन दोनों को ही नहीं मुझे भी है। मैं भी सोच रही हूं कि इस मकान के ऊपर एक मंजिल और चढ़ा दूं, ताकि कल को अंशुल की भी शादी हो तो परेशानी ना हो। अब हम लोग तुमसे नहीं कहेंगे तो किससे कहेंगे? बहू के पास पैसा रखा है और हम लोग परेशान हो रहे हैं। ये कोई बात होती है क्या? उल्टा जब पैसा हमारे पास हो तो हमें तो हमारे स्टैंडर्ड बढ़ाना चाहिए। तुम अपने ससुर जी से पूछोगे तो अच्छा नहीं लगेगा। पर तुम वंदना से तो बात कर ही सकते हो ना कि आखिर प्रॉपर्टी को बेचने पर कितना नफा हुआ है। आखिर वो अपने माता-पिता की इकलौती बेटी है। आज नहीं तो कल सब कुछ तुम्हारा ही तो होना है। उनकी प्रॉपर्टी पर तुम्हारा भी पूरा अधिकार है। मुझे तो यकीन नहीं होता कि वंदना ने तुम्हें अभी तक कुछ नहीं बताया। और वंदना के ताऊ जी की बेटे को क्यों रख रखा है? मधुर सँभल जा, नहीं तो मालूम पड़े तेरा हिस्सा वो तेरा साला ले उड़े।" थोड़ी देर की खामोशी के बाद मधुर बोला, "ठीक है मां, मैं वंदना से बात करता हूं। मैं भी सोच रहा हूं कि ये नौकरी वौकरी छोड़ कर खुद का बिजनेस ही शुरू कर लूँ। कब तक लोगों की जी हुजूरी करता रहूंगा। अब जरा बात करता हूं कि कितने पैसे आए हैं ताकि आगे की प्लानिंग कर सकूं।" वंदना ने उसके आगे कुछ नहीं सुना। वो उल्टे पैर वापस अपने कमरे में आ गई। उन लोगों की बातें याद कर उसका सिर दर्द से फटा जा रहा था। कितने लालची हैं ये लोग? जब देखो बहाना बनाकर उसके मायके से पैसा निकालने के लिए मुंह खोले बैठे रहते हैं। जैसे ये लोग कमा कर उसके मायके रख कर आए हैं। जबकि उसके मायके वालों को जब उसकी जरूरत होती है तो ये लोग साथ भी नहीं खड़े होते। पिछले साल वनिता की शादी में भी पापा ने अपनी एफ डी तुड़वा कर इन लोगों को कर्जा दिया था, जिसे तो ये लोग डकार गए। एक बार भी नहीं पूछा कि पापा जी आपको पैसों की जरूरत है या नहीं। लौटाने है या नहीं। यही नहीं, अभी जब दो महीने पहले पापा को हार्ट अटैक आया था, तब तो इनमे से कोई सेवा करने नहीं गया था। उसकी मां की तो हिम्मत टूट चुकी थी। वंदना ही दौड़ भाग कर रही थी। बस उसके साथ उसके ताऊ जी का बेटा उदय ही खड़ा था। मधुर तो जब तक पापा हॉस्पिटल में रहे, तब तक रोज शाम थोड़ी सी देर आकर चले जाते थे। एक बार भी उसने ये पूछना मुनासिब नहीं समझा कि पैसों का बंदोबस्त कैसे हो पाया? जबकि वो अच्छी तरह जानता था कि उसके मायके वाले भी मध्यम वर्गीय परिवार के लोग हैं। और प्रॉपर्टी के नाम पर उनके पास सिर्फ उनका मकान है जिसमें वो रहते हैं। उस समय तो वंदना और उदय ने उधार ले कर पापा का इलाज कराया था। लेकिन पापा के इलाज होने के बाद पैसों को चुकाने के लिए अभी कुछ दिन पहले ही उन्होंने अपना मकान बेच दिया और बचे हुए पैसों में खुद के लिए फ्लैट लेकर उसमें रहने लगे। अब उसी बेचे हुए मकान के पैसे इन लोगों को नजर आ रहे थे। खैर, थोड़ी देर बाद अचानक सुशीला जी की आवाज आई, "बहू जरा कमरे में आना तो।" वंदना समझ गई कि उससे पैसा निकालने की रूपरेखा तैयार कर ली गई है। अब उसे बुलाया जा रहा है। वो उठकर के सुशीला जी के कमरे में गई तो सुशीला जी की जगह मधुर ने कहा, "वंदना मैंने सुना है कि तुम्हारे पापा ने अपना मकान बेच दिया है और वो फ्लैट लेकर रह रहे हैं। साथ ही उदय को भी अपने पास रख रखा है।" "हां, अभी कुछ दिन पहले ही बेचा है। आखिर कर्जा चुकाना था। उनका कौन सा बेटा बैठा हुआ है जो उनके कर्जे चुकाएगा या उनकी बीमारी का इलाज करवाएगा। और रही बात उदय की, तो अभी पापा को अकेला नहीं छोड़ा जा सकता।" "हां, वो तो ठीक है लेकिन कितने में बेचा? आखिर मैं दामाद हूँ। इतना हक तो मेरा भी बनता है कि मैं भी जानूँ कि पापा जी प्रॉपर्टी बेच रहे हैं या कहीं फ्लैट ले रहे हैं। उनके पास कुछ बचा है या नहीं।" "अरे हां, आप तो दामाद है। आपका तो हक है सब कुछ जानने का। चलिए मैं बता देती हूं आपको। पापा के इलाज में काफी पैसा खर्च हो गया था, जो कर्जा लेकर के किया गया था। तो उस कर्जे को चुकाने के लिए उनके पास कुछ नहीं था। सिर्फ वो मकान था इसलिए उन्होंने उसे बेचा। पहले कर्जा चुकाया, बाद में खुद के रहने के लिए बंदोबस्त भी करना था इसलिए फ्लैट ले लिया। थोड़े बहुत पैसे बचे हैं जो मैंने उन्हीं के नाम से बैंक में डिपॉजिट कर दिए हैं।" "तुम्हें कुछ नहीं दिया? मैंने तो सुना है काफी नफा हुआ था। तुम तो बेटी हो ना उनकी।" सुशीला जी ने बीच में ही कहा। "अब क्या कर सकते हैं मम्मी जी। पैसा लेने का हक ही थोड़ी ना रखती है बेटियां। जिम्मेदारी भी कोई चीज होती हैं। अब जब जिम्मेदारी उदय निभा रहा है तो मैंने सोचा पैसे भी उसी को मिलने चाहिए। इसलिए मैंने हक छोड़ दिया। और पापा को कह दिया कि जो आपकी जिम्मेदारी निभाए ये फ्लैट भी उसी के नाम कर देना।" कहकर वो अपने कमरे में जाने लगी तो मधुर ने कहा, "अरे तुम ऐसा कैसे कर सकती हो? तुम्हें पता भी है, वो उदय तुम्हारे बड़े पापा का बेटा, लालच में तुम्हारे मां-पापा की सेवा कर रहा है।" "लालच में ही सही, कम से कम मेरे मां और पापा की सेवा तो हो रही है। मुझे मेरे मां पापा से कुछ नहीं चाहिए क्योंकि मैं अपने दम पर कमाने का साहस रखती हूं।" कहकर वंदना अपने कमरे में चली गई और पीछे रह गए घर के बाकी सदस्य अपने टूटे हुए अरमानों के साथ। *****
- स्वार्थी राजा
विनोद मिश्रा एक जंगल में मंदविष नामक सांप रहता था और बहुत बूढ़ा हो चुका था। बूढ़ा और कमजोर होने के कारण अपना शिकार करने में असमर्थ था। एक दिन रेंगता हुआ वह तालाब के किनारे पहुँच गया और वहीं लेट गया और कुछ दिनों तक वह इसी तरह लेटा रहा। उसी तालाब में बहुत सारे मेंढक भी रहते थे। उन्होंने तालाब किनारे लेटे हुए सांप की हालत के बारे में मेंढकों के राजा जालपाद को बतलाया। मेंढकों का राजा जालपाद उस सर्प के बारे में जानने के लिये सर्प के पास पहुंचा और जालपाद बोला – “हे सर्पराज! मैं मेंढकों के राजा जालपाद हूँ और इसी तालाब में रहता हूँ। आपकी हालत के बारे में कुछ मेंढकों ने मुझे बतलाया था। आप इतने सुस्त क्यूँ पड़े हुए हो, आपकी यह हालत किसने की है, क्या आप हमें कुछ बतलाओगे।” मेंढकों के राजा से इस प्रकार के प्रश्न सुनकर सर्प ने बनावटी कहानी बनाई और बोला- “हे मेंढकों के राजा! मैं एक गाँव के पास रहता था। एक दिन एक ब्राम्हण के पुत्र का पैर मेरे ऊपर रखा गया था और मैंने उसे काट लिया जिससे उस ब्राम्हण पुत्र की मृत्यु हो गई। उस ब्राम्हण ने मुझे श्राप दिया कि मुझे किसी तालाब के किनारे जाकर मेंढकों की सेवा करनी होगी और उन्हें अपनी पीठ पर बैठकर घुमाना होगा।” सर्प के मुंह से इस प्रकार की बातें सुनकर मेंढकों का राजा जालपाद बहुत खुश हुआ। उसने सोचा कि अगर इस सर्प से मेरी दोस्ती हो जाती है और मैं इस सर्प की पीठ पर बैठकर सबारी करूँगा तो दल का कोई भी दूसरा शक्तिशाली मेंढक मेरे खिलाफ विद्रोह भी नहीं कर सकेगा। जालपाद को कुछ सोचता हुआ देख सर्प बोला – “भद्र! मैं सोच रहा था कि मुझे उस ब्राम्हण का श्राप भोगना पड़ेगा। किसी और मेंढक को अपनी पीठ पर बैठाकर घुमाने से अच्छा है, मैं मेंढकों के राजा को अपनी पीठ पर बिठ्लाऊ। अगर आप चाहें तो मेरी पीठ पर बैठ कर देख सकते हैं।” मेंढकों के राजा जालपाद ने सांप की बात पर विश्वास कर लिया और झिझकते हुए सांप की पीठ पर बैठ गया। सांप ने उसे पूरा तालाब घुमाया और लाकर पुनः उसी स्थान पर छोड़ दिया। मेंढक (जालपाद) को सांप की गुदगुदी पीठ पर बैठने में बहुत आनंद आया और वह रोज सांप की पीठ पर बैठकर तालाब में घूमने का आनंद लेता और अपने सजातियों को सांप का भय दिखलाता। एक दिन जब वह सांप की पीठ पर सवारी कर रहा था तब सर्प बहुत धीरे-धीरे चल रहा था। मेंढक (जालपाद) ने पूछा – “आज आप इतने धीरे-धीरे क्यूँ चल रहे हो? आज सवारी में मजा नहीं आ रहा है।” सर्प बोला – “मित्र! मुझे कई दिनों से भोजन नहीं मिला है इसीलिए कमजोरी आ गई है और मुझसे चला नहीं जा रहा है।” सर्प की बात सुनकर मेंढकों का राजा जालपाद बोला – “अरे मित्र! इतनी छोटी सी बात है, इस तालाब में हजारो मेंढक है जो तुम्हारा प्रिय आहार हैं। तुम चाहो तो इनको अपना आहार बना लिया करो।” मंदविष सांप के मानो मन की हो गई वह तो यही चाहता था। अब वह प्रतिदिन बिना मेहनत किये कुछ मेंढकों को खा सकता था। इधर मूर्ख जालपाद यह भी नहीं समझ सका कि अपने क्षणिक आनंद के लिए वह अपने वंश का नाश करवा रहा है। अब मेंढकों का राजा जालपाद प्रतिदिन सांप के पीठ पर बैठकर तालाब की सबारी करता और सांप तालाब में रहने वाले मेंढकों को खाकर अपना पेट भरता था। एक दिन एक दूसरे सांप ने मेंढक को सांप की सवारी करते देखा तो उसे अच्छा नहीं लगा और कुछ देर बाद मंदविष के पास आकर बोला – “मित्र तुम यह प्रकृति विरुद्ध कार्य क्यूँ कर रहे हो? ये मेंढक तो हमारे भोजन हैं और तुम इन्हें अपनी पीठ बार बैठा कर सवारी करवा रहे हो?” मंदविष बोला- “ये सारी बातें तो मैं भी जानता हूँ और अपने लिए उपयुक्त समय का इन्जार कर रहा हूँ जब इस तालाब में कोई भी मेंढक नहीं बचेगा।” बहुत दिनों तक इसी प्रकार चलता रहा एक दिन ऐसा आया कि तालाब में जालपाद के परिवार को छोड़ कर कोई दूसरा मेंढक नहीं बचा। मंदविष सांप को भूख लगी और वो जालपाद से बोला – “अब इस तालाब में कोई मेंढक नहीं बचा है और मुझे बहुत भूख लग रही है।” जालपाद बोला- “इसमें मैं क्या कर सकता हूँ। इस तालाब में मेरे सगे-संबंधियों को छोड़ कर तुम सारे मेंढकों को खा चुके हो। अब तुम अपने भोजन की व्यवस्था खुद करो।” जालपाद की बात सुनकर मंदविष सांप बोला – “ठीक है मुझे तो बहुत भूख लग रही है मैं तुम्हारे परिवार को छोड़ देता हूँ पर मुझे अपनी भूख मिटाने के लिए तुम्हे खाना पड़ेगा।” मंदविष सांप की बात सुनकर जालपाद के पैरो तले जमीन खिसक गई और उसने अपनी जान वचाने के लिए अपने सगे संबंधियों तक को खाने की अनुमति दे दी। देखते ही देखते सांप ने जालपाद के सभी रिश्तेदारों और परिवारों वालों को खा लिया। अब तालाब में मेंढकों में सिर्फ जलपाद बचा था। मंदविष सांप जलपाद से बोला – “अब इस तालाब में तुम्हें छोड़कर कोई भी मेंढक नहीं बचा है और मुझे बहुत भूख लगी है अब तुम ही बतलाओ मैं क्या करूँ?” मंदविष सांप की बात सुनकर जालपाद मेंढक डर गया और बोला – “मित्र! तुम्हारी मित्रता में मुझे अपने वंश और परिवार के लोगों को खो दिया है अब तुम कहीं और जाकर अपना भोजन देख लो।” जालपाद की बात सुनकर मंदविष सांप बोला -“मित्र! तुम्हारा कहना मैं मान लूँगा। तुमने अपने स्वार्थ के कारण अपने जन्मजात दुश्मन को अपना मित्र बनाया और अपने सगे संबंधियों को मेरा भोजन बनवाया अब तुम अकेले इस दुनियां में रहकर क्या करोगे?” इतना बोलकर सांप ने जालपाद मेंढ़क को भी मारकर अपना आहार बना लिया। शिक्षा – जो व्यक्ति अपने क्षणिक लाभ के लिए अपने परिवार को दांव पर लगा देता है। उसका अंत भी बुरा ही होता है। *****
- स्वर्ग या नर्क
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव एक वैश्या मरी और उसी दिन उसके सामने रहने वाला बूढ़ा सन्यासी भी मर गया, संयोग की बात है। देवता लेने आए सन्यासी को नरक में और वैश्या को स्वर्ग में ले जाने लगे। संन्यासी एक दम अपना डंडा पटक कर खड़ा हो गया, तुम ये कैसा अन्याय कर रहे हो? मुझे नरक में और वैश्या को स्वर्ग में ले जा रहे हो, जरूर कोई भूल हो गई है तुमसे। कोई दफ्तर की गलती रही होगी, पूछताछ करो। मेरे नाम आया होगा स्वर्ग का संदेश और इसके नाम नर्क का। मुझे परमात्मा का सामना कर लेने दो, दो-दो बातें हो जाए, सारा जीवन बीत गया शास्त्र पढ़ने में और ये परिणाम। मुझे नाहक परमात्मा ने धोखे में डाला। उसे परमात्मा के पास ले जाया गया। परमात्मा ने कहा इसके पीछे एक गहन कारण है। वैश्या शराब पीती थी, भोग में रहती थी। पर जब तुम मंदिर में बैठकर भजन गाते थे, धूप दीप जलाते थे, घंटियां बजाते थे, तब वह सोचती थी कब मेरे जीवन में यह सौभाग्य होगा। मैं मंदिर में बैठकर भजन कर पाऊंगी कि नहीं। वह ज़ार जार रोती थी और तुम्हारे धूप दीप की सुगंध जब उसके घर मेम पहुंचती थी तो वह अपना अहोभाग्य समझती थी। घंटियों की आवाज सुनकर मस्त हो जाती थी। लेकिन तुम्हारा मन पूजापाठ करते हुए भी यही सोचता कि वैश्या है तो सुंदर पर वहां तक कैसे पंहुचा जाए? तुम हिम्मत नही जुटा पाए। तुम्हारी प्रतिष्ठा आड़े आई। गांव भर के लोग तुम्हें संयासी मानते थे। जब वैश्या नाचती थी, शराब बंटती थी, तुम्हारे मन में वासना जगती थी। तुम्हें रस था, खुद को अभागा समझते रहे। इसलिए वैश्या को स्वर्ग लाया गया और तुम्हें नरक में। वेश्या को विवेक पुकारता था तुम्हें वासना। वह प्रार्थना करती थी। तुम इच्छा रखते थे वासना की। वह कीचड़ में थी पर कमल की भांति ऊपर उठती गई और तुम कमल बनकर आए थे कीचड़ में धंसे रहे। असली सवाल यह नहीं कि तुम बाहर से क्या हो। असली सवाल तो यह है कि तुम भीतर से क्या हो? भीतर ही निर्णायक है। ******
- आओ फिर से दिया जलाएँ
अटल बिहारी वाजपेयी आओ फिर से दिया जलाएँ भरी दुपहरी में अँधियारा सूरज परछाई से हारा अंतरतम का नेह निचोड़ें- बुझी हुई बाती सुलगाएँ। आओ फिर से दिया जलाएँ हम पड़ाव को समझे मंज़िल लक्ष्य हुआ आँखों से ओझल वर्त्तमान के मोहजाल में- आने वाला कल न भुलाएँ। आओ फिर से दिया जलाएँ। आहुति बाकी यज्ञ अधूरा अपनों के विघ्नों ने घेरा अंतिम जय का वज़्र बनाने- नव दधीचि हड्डियाँ गलाएँ। आओ फिर से दिया जलाएँ। *****
- काबुलीवाला
रबीन्द्रनाथ टैगोर मेरी पाँच वर्ष की छोटी लड़की मिनी से पल भर भी बात किए बिना नहीं रहा जाता। दुनिया में आने के बाद भाषा सीखने में उसने सिर्फ एक ही वर्ष लगाया होगा। उसके बाद से जितनी देर तक सो नहीं पाती है, उस समय का एक पल भी वह चुप्पी में नहीं खोती। उसकी माता बहुधा डांट-फटकार कर उसकी चलती हुई जुबान बंद कर देती है; किन्तु मुझसे ऐसा नहीं होता। मिनी का मौन मुझे ऐसा अस्वाभाविक-सा प्रतीत होता है, कि मुझसे वह अधिक देर तक सहा नहीं जाता और यही कारण है कि मेरे साथ उसके भावों का आदान-प्रदान कुछ अधिक उत्साह के साथ होता रहता है। सवेरे मैंने अपने उपन्यास के सत्तरहवें अध्याय में हाथ लगाया ही था कि इतने में मिनी ने आकर कहना आरंभ कर दिया, “बाबा! रामदयाल दरबान कल ‘काक’ को कौआ कहता था। वह कुछ भी नहीं जानता, है न बाबा?” विश्व की भाषाओं की विभिन्नता के विषय में मेरे कुछ बताने से पहले ही उसने दूसरा प्रसंग छेड़ दिया, “बाबा! भोला कहता था, आकाश मुँह से पानी फेंकता है, इसी से वर्षा होती है। अच्छा बाबा, भोला झूठ-मूठ कहता है न? खाली बक-बक किया करता है, दिन-रात बकता रहता है।” इस विषय में मेरी राय की तनिक भी राह न देख कर, चट से धीमे स्वर में एक जटिल प्रश्न कर बैठी, “बाबूजी, माँ तुम्हारी कौन लगती है?” उसके इस प्रश्न का उत्तर देना, किसी भंवर में फंसने बराबर था। इसलिए मैंने उसका ध्यान हटाने के लिए कहा, “मिनी, तू जा, भोला के साथ खेल, मुझे अभी काम है, अच्छा। तब उसने मेरी मेज के पार्श्व में पैरों के पास बैठकर अपने दोनों घुटने और हाथों को हिला-हिलाकर बड़ी शीघ्रता से मुँह चलाकर ‘अटकन-बटकन दही चटाके’ कहना आरंभ कर दिया। जबकि मेरे उपन्यास के अध्याय में प्रतापसिंह उस समय कंचनमाला को लेकर रात के गहरे अंधेरे में बंदीगृह के ऊंचे झरोखे से नीचे कलकल करती हुई सरिता में कूद रहा था। मेरा घर सड़क के किनारे पर था। सहसा मिनी अपने अटकन-बटकन को छोड़कर कमरे की खिड़की के पास दौड़ गई, और जोर-जोर से चिल्लाने लगी, “काबुलीवाला, ओ काबुलीवाला”… मैले-कुचैले ढीले कपड़े पहने, सिर पर साफा बांधे, कंधे पर सूखे फलों की मैली झोली लटकाए, हाथ में अंगूरों की कुछ पिटारियाँ लिए, एक लंबा-तगड़ा-सा काबुली धीमी सी चाल से सड़क पर जा रहा था। उसे देखकर मेरी छोटी बेटी के हृदय में कैसे भाव उदय हुए यह बताना असंभव है। उसने जोरों से पुकारना शुरू किया। मैंने सोचा, अभी झोली कंधे पर डाले, सर पर एक मुसीबत आ खड़ी होगी और मेरा सत्तहरवा अध्याय आज अधूरा रह जाएगा। किन्तु मिनी के चिल्लाने पर ज्यों ही काबुली ने हँसते हुए उसकी ओर मुँह फेरा और घर की ओर बढ़ने लगा; त्यों ही मिनी भय खाकर भीतर भाग गई। फिर उसका पता ही नहीं लगा कि कहाँ छिप गई। उसके छोटे-से मन में वह अंधविश्वास बैठ गया था कि उस मैली-कुचैली झोली के अंदर ढूंढने पर उस जैसी और भी जीती-जागती बच्चियाँ निकल सकती हैं। इधर काबुली ने आकर मुसकराते हुए मुझे सलाम किया। मैंने सोचा, वास्तव में प्रतापसिंह और कंचनमाला की दशा अत्यन्त संकटापन्न है, फिर भी घर में बुलाकर इससे कुछ न खरीदना अच्छा न होगा। कुछ सौदा खरीदा गया। उसके बाद मैं उससे इधर-उधर की बातें करने लगा। खुद रहमत, रूस, अंग्रेज, सीमान्त रक्षा के बारे में गप-शप होने लगी। आखिर में उठकर जाते हुए उसने अपनी मिली-जुली भाषा में पूछा, “बाबूजी, आपकी बच्ची कहाँ गई?” मैंने मिनी के मन से व्यर्थ का भय दूर करने के लिए उसे भीतर से बुलवा लिया। वह मुझसे बिल्कुल सटकर काबुली के मुख और झोली की ओर संदेह से देखती खड़ी रही। काबुली ने झोली में से किसमिस और खुबानी निकालकर देना चाहा, पर उसने नहीं लिया और दुगुने संदेह के साथ मेरे घुटनों से लिपट गई। काबुलीवाले से उसका पहला परिचय इस प्रकार हुआ। इस घटना के कुछ दिन बाद एक दिन सवेरे मैं किसी आवश्यक कार्यवश बाहर जा रहा था। देखूं तो मेरी बिटिया दरवाजे के पास बेंच पर बैठी हुई काबुली से हँस-हँसकर बातें कर रही है और काबुली उसके पैरों के समीप बैठा-बैठा मुस्कराता हुआ उन्हें ध्यान से सुन रहा है और बीच-बीच में अपनी राय मिली-जुली भाषा में व्यक्त करता जाता है। मिनी को अपने पाँच वर्ष के जीवन में बाबूजी के सिवा ऐसा धैर्यवाला श्रोता शायद ही कभी मिला हो। मिनी की झोली बादाम-किसमिस से भरी हुई थी। मैंने काबुली से कहा, “इसे यह सब क्यों दे दिया? अब कभी मत देना।” कहकर कुर्ते की जेब से एक अठन्नी निकालकर उसे दी। उसने बिना किसी हिचक के अठन्नी लेकर अपनी झोली में रख ली। कुछ देर बाद घर लौटकर देखता हूं, तो उस अठन्नी ने बड़ा भारी उपद्रव खड़ा कर दिया है। मिनी की माँ एक सफेद चमकीला गोलाकार पदार्थ हाथ में लिए डांट-डपटकर मिनी से पूछ रही थी, “तूने यह अठन्नी पाई कहाँ से, बता?” मिनी ने कहा, “काबुलीवाले ने दी है।” “काबुलीवाले से तूने अठन्नी ली कैसे, बता?” मिनी ने रोने का उपक्रम करते हुए कहा, “मैंने मांगी नहीं थी, उसने आप ही दी है”। मैंने जाकर मिनी की उस अकस्मात मुसीबत से रक्षा की और उसे बाहर ले आया। पूछने पर मालूम हुआ कि इस दौरान में काबुलीवाला रोज आता रहा है और पिस्ता-बादाम की रिश्वत दे-देकर मिनी के छोटे से हृदय पर बहुत अधिकार कर लिया है। देखा कि इस नई मित्रता में बंधी हुई बातें और हँसी ही प्रचलित है। जैसे मेरी बिटिया रहमत को देखते ही, हँसती हुई पूछती, “काबुलीवाला, ओ काबुलीवाला! तुम्हारी झोली के भीतर क्या है?” काबुली, जिसका नाम रहमत था, एक अनावश्यक चंद्र-बिंदु जोड़कर मुस्कराता हुआ उत्तर देता, “हाँ बिटियाँ!” उसके परिहास का रहस्य क्या है, यह तो नहीं कहा जा सकता; फिर भी इन नए मित्रों को इससे तनिक विशेष खेल-सा प्रतीत होता है और जाड़े के प्रभात में एक सयाने और एक बच्ची की सरल हँसी सुनकर मुझे भी बड़ा अच्छा लगता। उन दोनों मित्रों में और भी एक-आध बात प्रचलित थी। रहमत मिनी से कहता, “तुम ससुराल कभी नहीं जाना, अच्छा?” हमारे देश की लड़कियाँ जन्म से ही ‘ससुराल’ शब्द से परिचित रहती हैं; किन्तु हम लोग कुछ नई पीढ़ी के होने के कारण इतनी सी बच्ची को ससुराल के विषय में विशेष ज्ञानी नहीं बना सके थे। अत: रहमत का अनुरोध वह स्पष्ट रूप से नहीं समझ पाती थी; इस पर भी किसी बात का उत्तर दिए बिना चुप रहना उसके स्वभाव के बिल्कुल ही विरुद्ध था। उलटे, वह रहमत से ही पूछती, “तुम ससुराल जाओगे?” रहमत काल्पनिक श्वसुर के लिए अपना जबर्दस्त घूंसा तानकर कहता, “हम ससुर को मारेगा।” सुनकर मिनी ‘ससुर’ नामक किसी अनजाने जीव की दुरवस्था की कल्पना करके खूब हँसती। देखते-देखते जाड़े की सुहावनी ऋतु आ गई। पूर्व युग में इसी समय राजा लोग दिग्विजय के लिए कूच करते थे। मैं कलकत्ता छोड़कर कभी कहीं नहीं गया, शायद इसीलिए मेरा मन ब्रह्माण्ड में घूमा करता है। यानी, मैं अपने घर में ही चिर प्रवासी हूँ, बाहरी ब्रह्माण्ड के लिए मेरा मन सर्वदा आतुर रहता है। किसी विदेश का नाम आगे आते ही मेरा मन वहीं की उड़ान लगाने लगता है। इसी प्रकार किसी विदेशी को देखते ही तत्काल मेरा मन सरिता-पर्वत-बीहड़ वन के बीच में एक कुटीर का दृश्य देखने लगता है और एक उल्लासपूर्ण स्वतंत्र जीवन-यात्रा की बात कल्पना में जाग उठती है। इधर देखा तो मैं ऐसी प्रकृति का प्राणी हूँ, जिसका अपना घर छोड़कर बाहर निकलने में सिर कटता है। यही कारण है कि सवेरे के समय अपने छोटे- से कमरे में मेज के सामने बैठकर उस काबुली से गप-शप लड़ाकर बहुत कुछ भ्रमण का काम निकाल लिया करता हूँ। मेरे सामने काबुल का पूरा चित्र खिंच जाता। दोनों ओर ऊबड़खाबड़, लाल-लाल ऊँचे दुर्गम पर्वत हैं और रेगिस्तानी मार्ग, उन पर लदे हुए ऊँटों की कतार जा रही है। ऊँचे-ऊँचे साफे बांधे हुए सौदागर और यात्री कुछ ऊँट की सवारी पर हैं, तो कुछ पैदल ही जा रहे हैं। किन्हीं के हाथों में बरछा है, तो कोई बाबा आदम के जमाने की पुरानी बंदूक थामे हुए है। बादलों की भयानक गर्जन के स्वर में काबुली लोग अपने मिली-जुली भाषा में अपने देश की बातें कर रहे हैं। मिनी की माँ बड़ी वहमी तबीयत की है। राह में किसी प्रकार का शोर-गुल हुआ नहीं कि उसने समझ लिया कि संसार भर के सारे मस्त शराबी हमारे ही घर की ओर दौड़े आ रहे हैं। उसके विचारों में यह दुनिया इस छोर से उस छोर तक चोर-डकैत, मस्त, शराबी, साँप, बाघ, रोगों, मलेरिया, तिलचट्टे और अंग्रेजों से भरी पड़ी है। इतने दिन हुए इस दुनिया में रहते हुए भी उसके मन का यह रोग दूर नहीं हुआ। रहमत काबुली की ओर से भी वह पूरी तरह निश्चिंत नहीं थी। उस पर विशेष नजर रखने के लिए मुझसे बार-बार अनुरोध करती रहती। जब मैं उसके शक को परिहास के आवरण से ढकना चाहता तो मुझसे एक साथ कई प्रश्न पूछ बैठती, “क्या कभी किसी का लड़का नहीं चुराया गया? क्या काबुल में गुलाम नहीं बिकते? क्या एक लंबे-तगड़े काबुली के लिए एक छोटे बच्चे का उठा ले जाना असंभव है?” इत्यादि। मुझे मानना पड़ता कि यह बात बिलकुल असंभव भी नहीं है। भरोसा करने की शक्ति सबमें समान नहीं होती, अत: मिनी की माँ के मन में भय ही रह गया, लेकिन केवल इसीलिए बिना किसी दोष के रहमत को अपने घर में आने से मना न कर सका। हर वर्ष रहमत माघ मास में लगभग अपने देश लौट जाता है। इस समय वह अपने व्यापारियों से रुपया-पैसा वसूल करने में तल्लीन रहता है। उसे घर-घर, दुकान-दुकान घूमना पड़ता है, फिर भी मिनी से उसकी भेंट एक बार अवश्य हो जाती है। देखने में तो ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों के मध्य किसी षड्यंत्र का श्रीगणेश हो रहा है। जिस दिन वह सवेरे नहीं आ पाता, उस दिन देखूं, तो वह संध्या को हाजिर है। अंधेरे में घर के कोने में उस ढीले-ढाले जामा-पाजामा पहने, झोली वाले लंबे-तगड़े आदमी को देखकर सचमुच ही मन में अचानक भय-सा पैदा हो जाता है। लेकिन, जब देखता हूँ कि मिनी ‘ओ काबुलीवाला‘ पुकारती हुई हँसती-हँसती दौड़ी आती है और दो भिन्न-भिन्न आयु के असम मित्रों में वही पुराना हास-परिहास चलने लगता है, तब मेरा सारा हृदय खुशी से नाच उठता है। एक दिन सवेरे मैं अपने छोटे कमरे में बैठा हुआ नई पुस्तक के प्रूफ देख रहा था। जाड़ा, विदा होने से पूर्व, आज दो-तीन दिन खूब जोरों से अपना प्रकोप दिखा रहा है। जिधर देखो, उधर उस जाड़े की ही चर्चा है। ऐसे जाड़े-पाले में खिड़की में से सवेरे की धूप मेज के नीचे मेरे पैरों पर आ पड़ी। उसकी गर्मी मुझे अच्छी प्रतीत होने लगी। लगभग आठ बजे का समय होगा। सिर से मफलर लपेटे ऊषाचरण सवेरे की सैर करके घर की ओर लौट रहे थे। ठीक इस समय राह में एक बड़े जोर का शोर सुनाई दिया। देखा, तो अपने उस रहमत को दो सिपाही बांधे लिए जा रहे हैं। उनके पीछे बहुत से तमाशाई बच्चों का झुंड चला आ रहा है। रहमत के ढीले-ढाले कुर्ते पर खून के दाग हैं और एक सिपाही के हाथ में खून से लथपथ छुरा। मैंने द्वार से बाहर निकलकर सिपाही को रोक लिया, पूछा, “क्या बात है?” कुछ सिपाही से और कुछ रहमत से सुना कि हमारे एक पड़ोसी ने रहमत से रामपुरी चादर खरीदी थी। उसके कुछ रुपए उसकी ओर बाकी थे, जिन्हें देने से उसने साफ इंकार कर दिया। बस इसी पर दोनों में बात बढ़ गई और रहमत ने छुरा निकालकर घोंप दिया। रहमत उस झूठे बेईमान आदमी के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के अपशब्द सुना रहा था। इतने में “काबुलीवाला! ओ काबुलीवाला!” पुकारती हुई मिनी घर से निकल आई। रहमत का चेहरा क्षण-भर में कौतुक हास्य से चमक उठा। उसके कंधे पर आज झोली नहीं थी। अत: झोली के बारे में दोनों मित्रों की अभ्यस्त आलोचना न चल सकी। मिनी ने आते ही पूछा, “तुम ससुराल जाओगे।” रहमत ने प्रफुल्लित मन से कहा, “हां, वहीं तो जा रहा हूं।” रहमत ताड़ गया कि उसका यह जवाब मिनी के चेहरे पर हँसी न ला सकेगा और तब उसने हाथ दिखाकर कहा, “ससुर को मारता, पर क्या करूं, हाथ बंधे हुए हैं।” छुरा चलाने के जुर्म में रहमत को कई वर्ष का कारावास मिला। रहमत का ध्यान धीरे-धीरे मन से बिल्कुल उतर गया। हम लोग अब अपने घर में बैठकर सदा के अभ्यस्त होने के कारण नित्य के काम-धंधों में उलझे हुए दिन बिता रहे थे। तभी एक स्वाधीन पर्वतों पर घूमने वाला आदमी कारागार की प्राचीरों के अंदर कैसे वर्ष पर वर्ष काट रहा होगा, यह बात हमारे मन में कभी उठी ही नहीं। और चंचल मिनी का आचरण तो और भी लज्जाप्रद था। यह बात उसके पिता को भी माननी पड़ेगी। उसने सहज ही अपने पुराने मित्र को भूलकर पहले तो नबी सईस के साथ मित्रता जोड़ी, फिर क्रमश: जैसे-जैसे उसकी वयोवृध्दि होने लगी, वैसे-वैसे सखा के बदले एक के बाद एक उसकी सखियाँ जुटने लगीं और तो क्या, अब वह अपने बाबा के लिखने के कमरे में भी दिखाई नहीं देती। मेरा तो एक तरह से उसके साथ नाता ही टूट गया है। कितने ही वर्ष बीत गये। वर्षों बाद आज फिर शरद ऋतु आई है। मिनी की सगाई की बात पक्की हो गई। पूजा की छुट्टियों में उसका विवाह हो जाएगा। कैलाशवासिनी के साथ-साथ अबकी बार हमारे घर की आनन्दमयी मिनी भी माँ-बाप के घर में अंधेरा करके ससुराल चली जाएगी। सवेरे सूर्यदेव बड़ी सज-धज के साथ निकले। वर्षों के बाद शरद ऋतु की यह नई धवल धूप सोने में सुहागे का काम दे रही है। कलकत्ता की संकरी गलियों से परस्पर सटे हुए पुराने टूटे फूटे घरों के ऊपर भी इस धूप की आभा ने एक प्रकार का अनोखा सौंदर्य बिखेर दिया है। हमारे घर पर सूर्यदेव के आगमन से पूर्व ही शहनाई बज रही है। मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जैसे यह मेरे हृदय की धड़कनों में से रो-रोकर बज रही हो। उसकी करुण भैरवी रागिनी मानो मेरी विच्छेद पीड़ा को जाड़े की धूप के साथ सारे ब्रह्माण्ड में फैला रही है। मेरी मिनी का आज विवाह है। सवेरे से घर बवंडर बना हुआ है। हर समय आने-जाने वालों का तांता बंधा हुआ है। आँगन में बांसों का मंडप बनाया जा रहा है। हरेक कमरे और बरामदे में झाड़फानूस लटकाए जा रहे हैं, और उनकी टक-टक की आवाज मेरे कमरे में आ रही है। ‘चलो रे’, ‘जल्दी करो’, ‘इधर आओ’ की तो कोई गिनती ही नहीं है। मैं अपने लिखने-पढ़ने के कमरे में बैठा हुआ हिसाब लिख रहा था। इतने में रहमत आया और अभिवादन करके खड़ा हो गया। पहले तो मैं उसे पहचान न सका। उसके पास न तो झोली थी और न पहले जैसे लंबे-लंबे बाल और न चेहरे पर पहले जैसी दिव्य ज्योति ही थी। अन्त में उसकी मुस्कान देखकर पहचान सका कि वह रहमत है। मैंने पूछा, “क्यों रहमत, कब आए?” उसने कहा, “कल शाम को जेल से छूटा हूँ।” सुनते ही उसके शब्द मेरे कानों में खट से बज उठे। किसी खूनी को मैंने कभी आँखों से नहीं देखा था, उसे देखकर मेरा सारा मन एकाएक सिकुड़-सा गया। मेरी यही इच्छा होने लगी कि आज के इस शुभ दिन में वह इंसान यहाँ से टल जाए, तो अच्छा हो। मैंने उससे कहा, “आज हमारे घर में कुछ आवश्यक काम है, सो आज मैं उसमें लगा हुआ हूँ। आज तुम जाओ, फिर आना।” मेरी बात सुनकर वह उसी क्षण जाने को तैयार हो गया। पर दरवाज़े के पास आकर कुछ इधर-उधर देखकर बोला, “क्या, बच्ची को तनिक नहीं देख सकता?” शायद उसे यही विश्वास था कि मिनी अब तक वैसी ही बच्ची बनी है। उसने सोचा हो कि मिनी अब भी पहले की तरह ‘काबुलीवाला, ओ काबुलीवाला’ पुकारती हुई दौड़ी चली आएगी। उन दोनों के पहले हास-परिहास में किसी प्रकार की रुकावट न होगी? यहाँ तक कि पहले की मित्रता की याद करके वह एक पेटी अंगूर और एक कागज के दोने में थोड़ी-सी किसमिस और बादाम, शायद अपने देश के किसी आदमी से मांग-तांगकर लेता आया था। उसकी पहले की मैली-कुचैली झोली आज उसके पास न थी। मैंने कहा, “आज घर में बहुत काम है। सो किसी से भेंट न हो सकेगी। मेरा उत्तर सुनकर वह कुछ उदास-सा हो गया। उसी मुद्रा में उसने एक बार मेरे मुख की ओर स्थिर दृष्टि से देखा। फिर अभिवादन करके दरवाजे के बाहर निकल गया। मेरे हृदय में जाने कैसी एक वेदना-सी उठी। मैं सोच ही रहा था कि उसे बुलाऊं, इतने में देखा तो वह स्वयं ही आ रहा है। वह पास आकर बोला, “ये अंगूर और कुछ किसमिस, बादाम बच्ची के लिए लाया था, उसको दे दीजिएगा।” मैंने उसके हाथ से सामान लेकर पैसे देने चाहे, लेकिन उसने मेरे हाथ को थामते हुए कहा, “आपकी बहुत मेहरबानी है बाबू साहब! हमेशा याद रहेगी। पैसा रहने दीजिए।” तनिक रुककर फिर बोला- “बाबू साहब! आपकी जैसी मेरी भी देश में एक बच्ची है। मैं उसकी याद कर-कर आपकी बच्ची के लिए थोड़ी-सी मेवा हाथ में ले आया करता हूँ। मैं यह सौदा बेचने नहीं आता।” कहते हुए उसने ढीले-ढाले कुर्ते के अंदर हाथ डालकर छाती के पास से एक मैला-कुचैला मुड़ा हुआ कागज का टुकड़ा निकाला, और बड़े जतन से उसकी चारों तहें खोलकर दोनों हाथों से उसे फैलाकर मेरी मेज पर रख दिया। देखा कि कागज के उस टुकड़े पर एक नन्हे-से हाथ के छोटे-से पंजे की छाप है। फोटो नहीं, तेलचित्र नहीं, हाथ में-थोड़ी-सी कालिख लगाकर कागज के ऊपर उसी का निशान ले लिया गया है। अपनी बेटी के इस स्मृति-पत्र को छाती से लगाकर रहमत हर वर्ष कलकत्ता के गली-कूचों में सौदा बेचने के लिए आता है और तब वह कालिख चित्र मानो उसकी बच्ची के हाथ का कोमल-स्पर्श, उसके बिछड़े हुए विशाल हृदय में अमृत उड़ेलता रहता है। देखकर मेरी आँखें भर आईं और फिर मैं इस बात को बिल्कुल ही भूल गया कि वह एक मामूली काबुली मेवा वाला है, मैं एक उच्च वंश का रईस हूँ। तब मुझे ऐसा लगने लगा कि जो वह है, वही मैं हूँ। वह भी एक पिता है और मैं भी। उसकी पर्वतवासिनी छोटी बच्ची की निशानी मेरी ही मिनी की याद दिलाती है। मैंने तत्काल ही मिनी को बाहर बुलवाया; हालांकि इस पर अंदर घर में आपत्ति की गई, पर मैंने उस पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया। विवाह के वस्त्रों और अलंकारों में लिपटी हुई बेचारी मिनी मारे लज्जा के सिकुड़ी हुई-सी मेरे पास आकर खड़ी हो गई। उस अवस्था में देखकर रहमत काबुल पहले तो सकपका गया। उससे पहले जैसी बातचीत न करते बना। बाद में हँसते हुए बोला, “लल्ली! सास के घर जा रही है क्या?” मिनी अब सास का अर्थ समझने लगी थी। अत: अब उससे पहले की तरह उत्तर देते न बना। रहमत की बात सुनकर मारे लज्जा के उसके कपोल लाल हो उठे। उसने मुँह को फेर लिया। मुझे उस दिन की याद आई, जब रहमत के साथ मिनी का प्रथम परिचय हुआ था। मन में एक पीड़ा की लहर दौड़ गई। मिनी के चले जाने के बाद एक गहरी साँस लेकर रहमत फर्श पर बैठ गया। शायद उसकी समझ में यह बात एकाएक साफ हो गई कि उसकी बेटी भी इतने दिनों में बड़ी हो गई होगी और उसके साथ भी उसे अब फिर से नई जान-पहचान करनी पड़ेगी। संभवतः वह उसे पहले जैसी नहीं पाएगा। इन आठ वर्षों में उसका क्या हुआ होगा, कौन जाने? सवेरे के समय शरद की स्निग्ध सूर्य किरणों में शहनाई बजने लगी और रहमत कलकत्ता की एक गली के भीतर बैठा हुआ अफगानिस्तान के मेरु-पर्वत का दृश्य देखने लगा। मैंने एक नोट निकालकर उसके हाथ में दिया और कहा, “रहमत, तुम देश चले जाओ, अपनी बेटी के पास। तुम दोनों के मिलन-सुख से मेरी मिनी सुख पाएगी।” रहमत को रुपए देने के बाद विवाह के हिसाब में से मुझे उत्सव-समारोह के दो-एक अंग छांटकर काट देने पड़े। जैसी मन में थी, वैसी रोशनी नहीं करा सका, अंग्रेजी बाजा भी नहीं आया, घर में औरतें बड़ी बिगड़ने लगीं। सब कुछ हुआ, फिर भी मेरा विचार है कि आज एक अपूर्व ज्योत्स्ना से हमारा शुभ समारोह उज्ज्वल हो उठा। *****
- एक गृहणी
पराग त्रिपाठी एक गृहणी वो रोज़ाना की तरह आज फिर ईश्वर का नाम लेकर उठी थी। किचन में आई और चूल्हे पर चाय का पानी चढ़ाया। फिर बच्चों को नींद से जगाया ताकि वे स्कूल के लिए तैयार हो सकें। कुछ ही पलों मे वो अपने सास ससुर को चाय देकर आयी फिर बच्चों का नाश्ता तैयार किया और इस बीच उसने बच्चों को ड्रेस भी पहनाई। फिर बच्चों को नाश्ता कराया। पति के लिए दोपहर का टिफीन बनाना भी जरूरी था। इस बीच स्कूल का रिक्शा आ गया और वो बच्चों को रिक्शा तक छोड़ने चली गई। वापस आकर पति का टिफीन बनाया और फिर मेज़ से जूठे बर्तन इकठ्ठा किये। इस बीच पतिदेव की आवाज़ आई की मेरे कपङे निकाल दो। उनको ऑफिस जाने लिए कपङे निकाल कर दिए। अभी पति के लिए उनकी पसंद का नाश्ता तैयार करके टेबिल पर लगाया ही था कि छोटी ननद आई और ये कहकर गई कि भाभी आज मुझे भी कॉलेज जल्दी जाना, मेरा भी नाश्ता लगा देना। तभी देवर की भी आवाज़ आई कि भाभी नाश्ता तैयार हो गया क्या? अभी लीजिये नाश्ता तैयार है। पति और देवर ने नाश्ता किया और अखबार पढ़कर अपने अपने ऑफिस के लिए निकल चले। उसने मेज़ से खाली बर्तन समेटे और सास ससुर के लिए उनका परहेज़ का नाश्ता तैयार करने लगी। दोनों को नाश्ता कराने के बाद फिर बर्तन इकट्ठे किये और उनको भी किचिन में लाकर धोने लगी। इस बीच सफाई वाली भी आ गयी। उसने बर्तन का काम सफाई वाली को सौंप कर खुद बेड की चादरें वगेरा इकट्ठा करने पहुँच गयी और फिर सफाई वाली के साथ मिलकर सफाई में जुट गयी। अब तक 11 बज चुके थे, अभी वो पूरी तरह काम समेट भी ना पायी थी कि काल बेल बजी। दरवाज़ा खोला तो सामने बड़ी ननद और उसके पति व बच्चे सामने खड़े थे। उसने ख़ुशी-ख़ुशी सभी को आदर के साथ घर में बुलाया और उनसे बाते करते-करते उनके आने से हुई ख़ुशी का इज़हार करती रही। ननद की फ़रमाईश के मुताबिक़ नाश्ता तैयार करने के बाद अभी वो ननद के पास बेठी ही थी कि सास की आवाज़ आई कि बहु खाने का क्या प्रोग्राम है। उसने घडी पर नज़र डाली तो 12 बज रहे थे। उसकी फ़िक्र बढ़ गयी वो जल्दी से फ्रिज की तरफ लपकी और सब्ज़ी निकाली और फिर से दोपहर के खाने की तैयारी में जुट गयी। खाना बनाते-बनाते अब दोपहर का दो बज चुके थे। बच्चे स्कूल से आने वाले थे, लो बच्चे आ गये। उसने जल्दी-जल्दी बच्चों की ड्रेस उतारी और उनका मुंह हाथ धुलवाकर उनको खाना खिलाया। इस बीच छोटी नन्द भी कॉलेज से आ गयी और देवर भी आ चुके थे। उसने सभी के लिए मेज़ पर खाना लगाया और खुद रोटी बनाने में लग गयी। खाना खाकर सब लोग फ्री हुए तो उसने मेज़ से फिर बर्तन जमा करने शुरू कर दिये। इस वक़्त तीन बज रहे थे। अब उसको खुद को भी भूख का एहसास होने लगा था। उसने हॉट पॉट देखा तो उसमे कोई रोटी नहीं बची थी। उसने फिर से किचिन की ओर रुख किया तभी पतिदेव घर में दाखिल होते हुये बोले कि आज देर हो गयी भूख बहुत लगी है जल्दी से खाना लगा दो। उसने जल्दी-जल्दी पति के लिए खाना बनाया और मेज़ पर खाना लगा कर पति को किचिन से गर्म रोटी बनाकर ला कर देने लगी। अब तक चार बज चुके थे। अभी वो खाना खिला ही रही थी कि पतिदेव ने कहा कि आ जाओ तुम भी खालो। उसने हैरत से पति की तरफ देखा तो उसे ख्याल आया कि आज मैंने सुबह से कुछ खाया ही नहीं। इस ख्याल के आते ही वो पति के साथ खाना खाने बैठ गयी। अभी पहला निवाला उसने मुंह में डाला ही था कि आँख से आंसू निकल आये। पति देव ने उसके आंसू देखे तो फ़ौरन पूछा कि तुम क्यों रो रही हो। वो खामोश रही और सोचने लगी कि इन्हें कैसे बताऊँ कि ससुराल में कितनी मेहनत के बाद ये रोटी का निवाला नसीब होता है और लोग इसे मुफ़्त की रोटी कहते हैं। पति के बार बार पूछने पर उसने सिर्फ इतना कहा कि कुछ नहीं बस ऐसे ही आंसू आ गये। पति मुस्कुराये और बोले कि तुम औरते भी बड़ी "बेवक़ूफ़" होती हो, बिना वजह रोना शुरू कर देती हो। ******
- हम तुम और वो
अगम प्रसाद श्रीवास्तव मैंने कभी ये सोचा भी नही था, कि इतने लंबे अंतराल के बाद वह अचानक मेरे सामने आ खड़ी होगी। मैं कुछ देर अपने आप को देखता रह गया, लगा कि कही कोई सपना तो नहीं देख रहा हूं। अपने को चिकोटी काट कर देखा... नही ये वास्तविकता ही थी। वह मेरे सामने ही खड़ी थी। वही रूप, वही बाल, वही अंदाज, यहाँ तक कि वही मुस्कान। मैं उसे लगातार घूर रहा था, वह एक सब्जी के ठेले पर खड़ी आलू तुलवा रही थी। सिल्क की साड़ी, शायद वह खादी सिल्क थी, उसी से मैचिंग ब्लाउज, गले में मंगलसूत्र, पैरो में शानदार चप्पल, और बगल में एक सफेद या क्रीम कलर का पर्स दबा रखा है। मैं हिम्मत कर के उसके पास पहुंच गया। मगर तब तक वो आगे बढ़ कर दूसरे ठेले पर पहुंच गई। ठेले वाला मुझसे पूछने लगा, "बाबूजी, कितने आलू तौल दूं?"। मैंने कहा के "मैं घर से थैला लाना भूल गया हूं, कल ले जाऊंगा।" फिर मैं उसके पीछे जा कर खड़ा हो गया, और मैंने धीरे से कहा, "अगर मैं गलती नही कर रहा हूं, तो आप नीलम ही हैं ना?" वह एक दम झटके से पलटी और मुझे अजीब सी निगाह से देखा और फिर अपने काम में लग गई। मैं अपने को बहुत हीन समझने लगा, फिर सोचा एक बार और कोशिश कर के देखता हूं। "आपने शायद मुझे पहचाना नहीं", मैने फिर उसे संबोधित किया। वह मुड़ी और उसने गुस्से में मेरी ओर देखा और बड़बड़ाई, "अजीब शहर है, जहा पर लड़कियों को, नही बल्कि अमीर औरतों को भी लोग छेड़ते हैं, भैया, जरा इन साहब से कहो कि अपना रास्ता नापें और औरतों से छेड़खानी ना किया करें, वरना इतने जूते पड़ेंगे, कि बच्चे भी नही पहचानेंगे।" वह दो टके का भाजी वाला गुस्से से बोला, "बाबूजी आपको इस उमर में ये सब शोभा नही देता, जाइए अपना काम कीजिए।" मेरी हालत ऐसी हो गई थी मानो, भरे बाजार मुझे किसी ने नग्न कर दिया हो। मैं बेहद शर्मिंदा हुआ, और गर्दन नीचे कर वहां से हट गया। सब ठेले वाले मुझे घूर रहे थे, और मैं अपने ख्यालों में डूबा हुआ घर पहुँच गया। राधा ने पूछा, "क्या बात है, कुछ तबियत खराब है क्या?“ मैं बिना कुछ बोले अपने कमरे में आया और कपड़े बदल कर आराम कुर्सी पर अधलेटा सा बैठ गया। थोड़ी देर में राधा मेरी पत्नी उपमा और चाय ले कर आ गई। मैंने चुपचाप उसके हाथ से प्लेट लेकर चाय की चुस्की भरी और उपमा खाया, लेकिन बोला कुछ नहीं। राधा ने एक-दो बार पूछा भी, मैने कहा, "कुछ नही बस थोड़ा सिर दर्द कर रहा है।" उसने फौरन मेरी बड़ी बेटी सुमि को आवाज दी और कहा कि "अपने पापा के सिर में थोड़ी सी मालिश कर दो।" मुझे मेरी दोनों बेटियों से बहुत प्यार है। बड़ी बहुत ही गंभीर है और छोटी जो नवीं कक्षा की सबसे तेज छात्रा है मगर है बहुत चंचल। शायद उसके नाम का ही असर है - चंचल नाम माँ ने रखा था। बचपन से वह बहुत चंचल थी। माँ की तो बहुत ही लाडली थी। मैंने सूमि को वापिस भेज दिया और कमरे की बत्ती बंद कर के बिस्तर पर लेट गया, और गहन बीती बातों में खो गया। मुझे याद आया अपने कॉलेज का वो प्रथम दिन, जब मैं सीढ़ियों से ऊपर जा रहा था और कुछ लड़कियां जीने के पास खड़ी थी। मैंने उनसे कहा, "सिस्टर साईड प्लीज" और वे सब एक तरफ हो गईं। फिर जब मैं वापिस लौटा तो उनमें से एक लड़की ने मुझे बुला कर पूछा, "तुम्हारे घर में माँ - बहन नही हैं क्या?" मैंने कहा, "माँ भी है और दो बहनें भी है।" तब वह टपाक से बोली, "क्या वह काफी नही हैं।" मैं झेंप गया और "सॉरी" कह कर वहां से बाहर निकल गया। घर आ कर मुझे वह लड़की और उसकी सभी बातें याद आती रही और मैं मुस्कुरा के रह गया। अब तो रोज उस से मुलाकात होती और मैं कुछ झेपू टाइप का लड़का था, बोलता कुछ नही और उसे एक मुस्कुराहट देकर निकल जाता। एक दिन फिर हम लोगों का आमना-सामना हो गया और ना चाहते हुए भी मेरे मुंह से निकल गया "हेलो", और वो आश्चर्य से मेरी ओर देखते हुए बोली, "जनाब को बोलना भी आता है!" मैं एक बार फिर झेंप कर जाने लगा, तभी उसने बड़े ही प्यार से कहा, "मुझे नीलम कहते हैं, मुझसे दोस्ती करोगे?" और उसने अपना दाया हाथ बढ़ा दिया। मैंने अपने दोनों हाथो में उसका खूबसूरत हाथ थाम लिया और तब मुझे एहसास हुआ के काश वो हाथ मेरे हाथ में यूंही थमा रहे। फिर वह खंखारी और मैने उसका हाथ छोड़ दिया। फिर हम कैंटीन में गए, वहां उसने मुझे Thumbs-up पिलाया और कुछ देर बाद इधर उधर की बातें कर के हम लोग अलग हो गए। अब तो रोज ही हम दोनों मिलते, बातें करते और शाम को अपने अपने घर लौट जाते। वह एक बेहद अमीर घर की बेटी थी, और मैं एक मध्यम श्रेणी के परिवार से संबंध रखता था। उसको गरीबी और तंगी का एहसास नहीं था और मुझे इन सब की आदत थी। उसकी शोख अदाएं, रंग रूप, कद काठी, आदि ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया था, उसके बारे में और अपने भविष्य के बारे में कि कैसे मैं उसको पाऊँ। एक दिन मैंने उस से हिम्मत कर के कह दिया, "नीलू, मैं तुमसे समुद्र की अनंत गहराई के जितना प्यार करता हूँ।" उसने झट से मेरा हाथ पकड़ कर चूम लिया और बोली, "आकाश, तुमने अपने लबों को मेरे शब्द दे दिए", और हम दोनों कसकासकर एक दूसरे की आगोश में खो गए। इसके बाद तो हम दो प्रेमी परिंदो के जैसे प्यार के आकाश में सैर करने लगे। कब हम लोगों के फाइनल एग्जाम हुए और कॉलेज खत्म हुआ पता ही नही चला। आखरी पेपर वाले दिन, रात को बारह बजे तक साथ घूम कर बिताई। हमारा प्यार बहुत ही पवित्र था, जिसमे वासना की कही भी किसी प्रकार की कोई गुंजाइश नहीं थी। फिर वो अपने माता-पिता के साथ पन्द्रह दिनों के लिए बाहर चली गई। मेरा तो इतना बुरा हाल हो गया कि न दिन दिखता था न रात। बस उसकी तस्वीर थी और मेरी तन्हाई। मैं दीवानों की तरह उसको ढूंढता रहा और वो परछाई की तरह मुझसे भागती रही। एक दिन मुझे उसका एक खत मिला, जिसमे सिर्फ ये लिखा था फौरन मिलो तीन बजे अपनी जगह पर। और मैं दीवानों की तरह बारह बजे से जा कर अपनी मोहब्बत का इंतजार करने लगा। वह आई ठीक सवा तीन बजे और मेरे गले से लग कर रोने लगी। फिर ना जाने क्या हुआ के उसने मेरा चेहरा चुम्बनों से भर दिया, और फिर खड़ी हो कर बोली, "अब मेरी तुम्हारी मुलाकात शायद कभी ना हो। मेरे प्यार मुझे माफ कर देना क्योंकि कल मैं अमरीका जा रही हूं, सात दिनों बाद मेरी शादी है। उसका नाम अंबर है।" क्या मुकद्दर हैं नीलम फसी भी तो आकाश और अंबर के बीच। वह रोते हुए वहां से भाग गई, मेरी जिंदगी से हमेशा के लिए। मैं अचंभित सा खड़ा ही रह गया, दिल चाह रहा था की उसको आवाज दे कर रोक लूं, मगर जैसे मेरे मुंह में जुबान ही नही थी और वह चली गई। मैं अकेला हो गया, जो इंसान बुलंदियों को छूना चाहता था वह आज मात्र एक छोटी सी सरकारी नौकरी में ही संतोष पा गया। जब मेरा प्यार ही मेरे पास नहीं, तो मैं किसके लिए क्या करता। कुछ महीनों के पश्चात मेरी भी शादी हो गई। शादी के पहले मैंने राधा को देखा भी नही था, मगर राधा ने मेरे जीवन में प्रवेश कर के नीलम की यादों को भी मुझसे दूर कर दिया था। आज अगर नीलम बीस वर्षों के अंतराल के बाद नही दिखी होती तो मन इतना बेचैन कभी ना हुआ होता। अचानक कमरे में रोशनी हो गई, राधा मेरे पास आई और सिरहाने बैठ गई, मेरी आँखें लाल हो रही थी और बदन भी गरम था। उसने मुझे क्रोसिन की गोली दी और कहा के "डॉक्टर को बुला दूं क्या?" मैंने मना किया तो उसने कहा के "आप इतने बेचैन क्यों हो, मुझे बताइए आपको नीलम की कसम।" उसके मूंह से इतने वर्षों के बाद नीलम का नाम सुन कर मैं चौंक गया, मेरे मुख से बेसाख्ता निकल गया की,"मुझे आज नीलम दिखी थी बाजार में, और उसने मुझे पहचान ने से भी इंकार कर दिया।" राधा बोली, "मुझे मालूम है, आज वह घर आई थी दोपहर में, और बच्चों व आपके लिए काफी कुछ तोहफे लाई थी, जो कमरे में रखे हैं। उनके पति अपना सारा काम अमरीका से बंद कर के इसी शहर में आ गए हैं। और कंस्ट्रक्शन का काम शुरू करने वाले हैं। वह नही चाहती है कि आप उसको देख कर कोई भी पुरानी पहचान निकाले जिससे उसको अपने पति के सामने शर्मिंदा होना पड़े। वैसे वो आपसे मिलने फिर आएगी रविवार को।" मैं राधा का मूंह देखता रह गया कि कितनी निश्चल मन से उसने एक ही सांस में सब कुछ बता दिया। अगर कही राधा का पूर्व प्रेमी इस तरह से मिला होता शायद मैं उसे सहन भी नही कर पाता। मेरा मन हल्का हो गया था। मैंने भी निश्चित कर लिया था कि अब मेरा सब कुछ मेरी राधा और सिर्फ मेरी राधा का ही हैं। किसी और का मेरी जिंदगी में प्रवेश वर्जित है। मैंने फौरन सुमी को आवाज दी कि खाना लगाओ, बहुत भूख लगी है। और राधा के मस्तक पर अपने प्यार की मोहर लगा दी। सुमी और चंचल कमरे में आकर मेरे बिस्तर पर ही बैठ गई। मैंने तीनों को बाहों में समेट लिया और कहा कि "हम सब लोग दो दिनों के लिए पनवेल जाएंगे।" बच्चे खुशी से उछल पड़े। उनके जाते ही राधा ने पूछा, "लेकिन कल जो नीलम जी आएंगी तो?" मैंने राधा को अपनी बाहों में भर कर, कस कर भींच लिया और कहा के "आकाश के पास सिर्फ राधा है। हम दोनों के बीच जब हवा ही नही समा रही है तो नीलम जी की गुंजाइश कहा।" और राधा मुझसे लता की तरह लिपट गई। मैं आज अपने को बहुत ही हल्का महसूस कर रहा था। राधा की महानता के आगे मैं नतमस्तक था। ******
- नालायक
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव बेटा, हमारा एक्सीडेंट हो गया है, मुझे तो ज्यादा चोट नहीं आई लेकिन तेरी माँ की हालत गंभीर है, कछ पैसों की जरुरत है और तेरी माँ को खून भी देना है। बासठ साल के माधव जी ने अपने बडे बेटे से फोन पर कहा। पापा, मैं बहुत व्यस्त हूं, आजकल, मेरा आना नही हो सकेगा। मुझे विदेश मे नौकरी का पैकेज मिला है तो उसी की तैयारी कर रहा हूँ। आपका भी तो यही सपना था ना इसलिये हाथ भी तंग चल रहा है, पैसे की व्यवस्था कर लीजिए मैं बाद मे दे दूंगा। उनके बडे इंजीनियर बेटे ने जबाब दिया। उन्होनें अपने दूसरे डॉक्टर बेटे को फोन किया तो उसने भी आने से मना कर दिया। उसे अपनी ससुराल मे शादी मे जाना था। हाँ इतना जरुर कहा कि पैसों की चिंता मत कीजिए, मै भिजवा दूंगा। यह अलग बात है कि उसने कभी पैसे नहीं भिजवाए। उन्होंने मायुसी से फोन रख दिया। अब उस नालालक को फोन करके क्या फायदा। जब ये दो लायक बेटे कुछ नही कर रहे तो वो नालायक क्या कर लेगा। उन्होंने सोचा और बोझिल कदमों से अस्पताल में पत्नी के पास पहुंचे और कुर्सी पर ढेर हो गये। पुरानी बातें याद आने लगी। माधव राय जी स्कूल मे शिक्षक थे। उनके तीन बेटे और एक बेटी थी। बडा इंजीनियर और मंझला डाक्टर था। दोनों की शादी बडे घराने मे हुई थी और अपनी पत्नियों के साथ अलग-अलग शहरों मे रहते थे। बेटी की शादी भी उन्होंने खुब धुमधाम से की थी। सबसे छोटा बेटा पढाई मे ध्यान नही लगा पाया था, ग्यारहवीं के बाद उसने पढाई छोड दी और घर मे ही रहने लगा। कहता था मुझे नौकरी नहीं करनी अपने माता-पिता की सेवा करनी है, इसी बात पर मास्टर साहब उससे बहुत नाराज रहते थे। उन्होंने उसका नाम ही नालायक रख दिया था। दोनों बडे भाई पिता के आज्ञाकारी थे पर वह गलत बात पर उनसे भी बहस कर बैठता था। इसलिये माधव जी उसे पसंद नही करते थे। जब माधव जी रिटायर हुए तो जमा पुँजी कुछ भी नहीं थी। सारी बचत दोनों बच्चों की उच्च शिक्षा और बेटी की शादी मे खर्च हो गई थी। शहर में एक घर, थोडी जमीन और गाँव मे थोडी सी जमीन थी। घर का खर्च उनकी पेंशन से चल रहा था। माधव जी को जब लगा कि छोटा सुधरने वाला नही तो उन्होंने बँटवारा कर दिया और उसके हिस्से की जमीन उसे देकर उसे गाँव मे ही रहने भेज दिया। हालाँकि वह जाना नही चाहता था पर पिता की जिद के आगे झुक गया और गाँव मे ही झोंपडी बनाकर रहने लगा। माधव जी सबसे अपने दोनों होनहार और लायक बेटों की बड़ाई किया करते। उनका सीना गर्व से चौडा हो जाता था। पर उस नालायक का नाम भी नही लेते थे। दो दिन पहले दोनों पति पत्नी का एक्सीडेन्ट हो गया था, वह अपनी पत्नी के साथ सरकारी अस्पताल मे भर्ती थे और डॉक्टर ने उनकी पत्नी को आपरेशन करने को कहा था। पापा, पापा! सुन कर तंद्रा टुटी तो देखा सामने वही नालायक खड़ा था। उन्होंने गुस्से से मुंह फेर लिया। पर उसने पापा के पैर छुए और रोते हुए बोला, “पापा आपने इस नालायक को क्यों नही बताया। पर मैंने भी आप लोगों पर जासूस छोड रखे हैं। खबर मिलते ही भागा आया हूं। पापा के विरोध के वावजुद उसने उनको एक बडे अस्पताल मे भरती कराया। माँ का आपरेशन कराया और अपना खून दिया। दिन रात उनकी सेवा मे लगा रहता कि एक दिन वह गायब हो गया। वह उसके बारे मे फिर बुरा सोचने लगे थे कि तीसरे दिन वह वापस आ गया। महीने भर मे ही माँ एकदम भली चंगी हो गई। वह अस्पताल से छुट्टी लेकर उन लोगों को घर ले आया। माधव जी के पूछने पर बता दिया कि खैराती अस्पताल था पैसे नही लगे हैं। घर मे नौकरानी थी ही। वह उन लोगों को छोड कर वापस गाँव चला गया। धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो गया। एक दिन यूँ ही उनके मन मे आया कि उस नालायक की खबर ली जाए। दोनों जब गाँव के खेत पर पहुँचे तो झोपडी में ताला देख कर चौंके। उनके खेत मे काम कर रहे आदमी से पुछा तो उसने कहा, “यह खेत अब मेरे हैं।” क्या? पर यह खेत तो....उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ। हां, उसकी माँ की तबीयत बहुत खराब थी। उसके पास पैसे नहीं थे तो उसने अपने सारे खेत बेच दिये। वह रोजी रोटी की तलाश में दूसरे शहर चला गया है, बस यह झोपडी उसके पास रह गई है। यह रही उसकी चाबी....उस आदमी ने कहा। वह झोपडी में दाखिल हुये तो बरबस उस नालायक की याद आ गई। टेबुल पर पडा लिफाफा खोल कर देखा तो उसमे रखा अस्पताल का नौ लाख का बिल उनको मुँह चिढाने लगा। उन्होंने अपनी पत्नी से कहा, “जानकी तुम्हारा बेटा "नालायक" तो था ही "झूठा" भी निकला। अचानक उनकी आँखों से आँसू गिरने लगे और वह जोर से चिल्लाये, “तु कहाँ चला गया नालायक। अपने पापा को छोड कर, एक बार वापस आ जा फिर मैं तुझे कहीं नहीं जाने दूंगा...उनकी पत्नी के आँसू भी वहे जा रहे थे। और माधव जी को इंतजार था अपने नालायक बेटे को अपने गले से लगाने का। सचमुच बहुत नालायक था वो.... ******
- पति पत्नी का प्रेम
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव एक सेठ जी थे। उनके घर में एक गरीब आदमी काम करता था, जिसका नाम था रामलाल। जैसे ही रामलाल के फ़ोन की घंटी बजी रामलाल डर गया। तब सेठ जी ने पूछ लिया? "रामलाल तुम अपनी बीबी से इतना क्यों डरते हो?" "मैं डरता नही सर उसकी कद्र करता हूँ, उसका सम्मान करता हूँ।" उसने जबाव दिया। मैं हँसा और बोला- "ऐसा क्या है उसमें। ना सुरत ना पढी लिखी।" जबाव मिला- "कोई फर्क नही पडता सर कि वो कैसी है? पर मुझे सबसे प्यारा रिश्ता उसी का लगता है।" "जोरू का गुलाम।" मेरे मुँह से निकला। "और सारे रिश्ते कोई मायने नही रखते तेरे लिये।" मैने पुछा। उसने बहुत इत्मिनान से जबाव दिया- "सर जी माँ बाप रिश्तेदार नही होते। वो भगवान होते हैं। उनसे रिश्ता नही निभाते उनकी पूजा करते हैं। भाई-बहन के रिश्ते जन्मजात होते हैं, दोस्ती का रिश्ता भी मतलब का ही होता है। आपका मेरा रिश्ता भी जरूरत और पैसे का है पर, पत्नी बिना किसी करीबी रिश्ते के होते हुए भी हमेशा के लिये हमारी हो जाती है, अपने सारे रिश्ते को पीछे छोडकर। और हमारे हर सुख-दुख की सहभागी बन जाती है। आखिरी साँसों तक।" मैं अचरज से उसकी बातें सुन रहा था। वह आगे बोला- "सर जी, पत्नी अकेला रिश्ता नही है, बल्कि वो पुरा रिश्तों की भण्डार है। जब वो हमारी सेवा करती है हमारी देख भाल करती है, हमसे दुलार करती है तो एक माँ जैसी होती है। जब वो हमें जमाने के उतार चढाव से आगाह करती है, और मैं अपनी सारी कमाई उसके हाथ पर रख देता हूँ क्योंकि जानता हूँ वह हर हाल में मेरे घर का भला करेगी तब पिता जैसी होती है। जब हमारा ख्याल रखती है हमसे लाड़ करती है, हमारी गलती पर डाँटती है, हमारे लिये खरीदारी करती है, तब बहन जैसी होती है। जब हमसे नयी-नयी फरमाईश करती है, नखरे करती है, रूठती है, अपनी बात मनवाने की जिद करती है, तब बेटी जैसी होती है। जब हमसे सलाह करती है, मशवरा देती है, परिवार चलाने के लिये नसीहतें देती है, झगडे करती है, तब एक दोस्त जैसी होती है। जब वह सारे घर का लेन देन, खरीददारी, घर चलाने की जिम्मेदारी उठाती है, तो एक मालकिन जैसी होती है। और जब वही सारी दुनिया को यहाँ तक कि अपने बच्चों को भी छोडकर हमारे पास आती है, तब वह पत्नी, प्रेमिका, प्रेयसी, अर्धांगिनी, हमारी प्राण और आत्मा होती है, जो अपना सब कुछ सिर्फ हम पर न्योछावर करती है।" “मैं उसकी इज्जत करता हूँ, तो क्या गलत करता हूँ सर।" उसकी बातें सुनकर सेठ जी के आखों में पानी आ गया। इसे कहते है पति पत्नी का प्रेम ना की जोरू का गुलाम। ******
- ईश्वर क्या है?
मुकेश ‘नादान’ नरेंद्र प्रात: सायं भजन करने बैठ जाते, ईश्वर का नाम लेते, उन्हें स्मरण करते। एक दिन उनके पिता ने उनकी परीक्षा लेनी चाही तो वे बोले, “तुम क्यों अपना समय नष्ट करते रहते हो। संसार में कोई ईश्वर नहीं। जिसका तुम नाम लेते फिरते हो, उसका कोई अस्तित्व नहीं।" नरेंद्र बोले, “यदि ईश्वर नहीं है तो फिर सृष्टि किसने रची हैं?" पिता ने कहा, “यह सब कुछ गरमी और गति का परिणाम है। प्रत्येक वस्तु में उष्णता है, गति है। पता नहीं, कब यह उष्णता बहुत बढ़ी। इसके कारण कहीं कुछ बन गया, कहीं कुछ। स्वयं ही यह सबकुछ हो गया। इसे बनाने वाला कोई नहीं।" नरेंद्र सोचने लगे, “अपने पिता को किस प्रकार समझाऊँ? कॉलेज में गए, तब भी यह विचार उनके मन में था। एक बड़ा सा कागज लेकर सुंदर रंगों के साथ वहाँ उन्होंने एक चित्र बनाया। चित्र बनाकर घर में आए, उसे कमरे में रख दिया, जिसमें उनके पिता सोया करते थे।' पिता कार्यालय से लौटे तो चित्र को देखा। नरेंद्र से बोले, “यह चित्र किसने बनाया? यह तो बहुत सुंदर बना है।" नरेंद्र ने कहा, “किसी ने भी तो नहीं बनाया, अपने आप ही बन गया है।" पिता ने आश्चर्य से कहा, “अपने-आप?” नरेंद्र ने कहा, “हाँ पिताजी, कॉलेज में कागज के रिम पड़े थे। उनमें उष्णता और गति आई तो एक रिम से यह कागज उड़कर मेज पर आ गया। एक अलमारी में रंग भी पड़े थे। उन्हें गरमी जो लगी तो उनके अंदर शक्ति आ गई। अलमारी से निकलकर वे कागज पर गिर पड़े, उसके ऊपर फैल गए और यह चित्र बन गया।" पिता बोले, “मुझसे उपहास करता है, भला यह अपने आप कैसे बन सकता है?” नरेंद्र ने कहा, “वैसे ही पिताजी, जैसे यह सृष्टि बन गई। यदि गरमी की शक्ति से स्वयमेव इतनी बड़ी सृष्टि बन सकती है तो क्या यह छोटा सा चित्र नहीं बन सकता?" नरेंद्र के पिता उसके ज्ञान की गहराई को समझ गए थे। इस शरीर में जिस प्रकार आत्मा प्रत्येक कार्य को चलाती हुई शरीर का स्वामी बन बैठी है, वैसे ही इस संसार को चलाता हुआ ईश्वर संसार का स्वामी बनके प्रत्येक वस्तु के अंदर विद्यमान है। इंद्रियों के परदे को हटाकर जिस प्रकार आत्मा के दर्शन होते हैं, इसी प्रकार प्रकृति के परदे को हटाकर ईश्वर का दर्शन होता है। ******
- मातृभूमि के वीर
सलमा शफ़ीक़ गौरी जब 1991 में मेरी शादी कैप्टन शफीक़ गौरी से हुई तो मेरी उम्र 19 साल थी। उनके अक्सर तबादले होते रहते थे और वो मुझसे लंबे समय के लिए दूर भी रहते थे। शुरुआत में मेरे लिए ये बहुत मुश्किल था। लेकिन वो मुझे समझाते कि सैनिक की पत्नी होना कैसा होता है। उस ज़माने में मोबाइल फ़ोन नहीं होते थे। मैं घंटों फ़ोन के पास बैठकर उनके कॉल का इंतेज़ार किया करती थी। हम दोनों एक दूसरे को पत्र लिखा करते थे। मेरे पति ये सुनिश्चित किया करते कि मुझे हर दिन एक पत्र प्राप्त हो। मैं उनके लिए छोटे-छोटे नोट लिखा करती और उनकी लगेज में छोटे-छोटे सरप्राइज़ छुपा दिया करती। अगले कुछ सालों में उनकी पोस्टिंग कुछ बेहद ख़तरनाक इलाक़ों में हुई। उस ज़माने में पंजाब और पूर्वोत्तर ख़तरनाक इलाके हुआ करते थे। उनकी पोस्टिंग त्रिपुरा, श्रीनगर और पंजाब में हो चुकी थी। वो कई दिनों तक घर से बाहर रहते थे। लेकिन तब तक मैंने खुद को मज़बूत कर लिया था। मैं अपनी और बच्चों की देखभाल करने लगी थी। मैं ये जान गई थी कि उनका पहला प्यार उनका देश है और बीवी और बच्चे दूसरे नंबर पर आते हैं। 1999 में वो श्रीनिगर में फ़ील्ड पोस्टिंग पर थे। वो एक ख़तरनाक इलाक़ा था इसलिए परिवार को साथ रहने की अनुमति नहीं थी। मैं बैंगलुरू में रहने लगी थी। 28 जून 2001 को हमने आख़िरी बार बात की थी। उन्होंने हमारी ख़ैरियत पूछी थी और बताया था कि वो एक सैन्य अभियान में जंगल में हैं। वो बच्चों से बात करना चाहते थे लेकिन वो अपने कज़िन के साथ खेल रहे थे और बहुत शोर शराबा भी था। मैंने उनसे कहा था कि वो बेस पर लौटकर कॉल करें और बच्चों से बात करें। मुझे आज भी अपनी उस बात का अफ़सोस होता है। एक जुलाई 2001 को शाम करीब साढ़े छह बजे कुछ सैन्य अधिकारी और उनकी पत्नियां हमारे घर आए। अचानक एक महिला ने मुझे बिठाया और बताया कि मेजर गौरी अब नहीं रहे हैं। वो अपनी बात कह चुकी थीं लेकिन मुझे लगा कि मैंने ग़लत सुना है। शायद कोई ग़लती हुई है। उन्होंने बताया कि वो सुबह से हमसे संपर्क करने की कोशिश कर रहे थे लेकिन फ़ोन लाइनों में दिक्कत की वजह से नहीं कर पाए थे। ऑपरेशन रक्षक के दौरान चरमपंथियों के साथ हुई आमने-सामने की लड़ाई में मेजर गौरी शहीद हो गए थे। और उनके साथ ही मेरी पूरी दुनिया धराशाई हो गई थी। मेरे इर्द गिर्द जो कुछ भी था नष्ट हो गया था। वो अंतिम दिन था जब मुझे उनसे कोई पत्र प्राप्त हुआ था। अगले दिन मैं एयरपोर्ट गई, उन्हें अंतिम बार रिसीव करने। इस बार वो एक बक्से में आए, तिरंगे में लिपटे हुए। मैं बहुट रोई। उन्होंने हमेशा मुझसे मज़बूत बने रहने के लिए कहा था। जब हमने अंतिम बार बात की थी तब भी उन्होंने यही कहा था। लेकिन मैंने उनके बिना अपने जीवन की कभी कल्पना ही नहीं की थी। मैंने उनकी वर्दी और कपड़ों को एक बक्से में रख दिया। मैंने आठ सालों तक उन कपड़ों को नहीं धोया क्योंकि मैं उन भावनाओं और अहसासों को साथ रहना चाहती थी। उनके पैसे अभी भी उनके वॉलेट में है। मैं आज भी उनके पत्र पढ़ती हूं। मैंने एक मां और एक पिता की भूमिका निभाने की कोशिश की है लेकिन जब मैं बच्चों को अपने माता-पिता के साथ खेलते हुए देखती हूं तो अपने आंसू रोकने की कोशिश करती हूं। आज मैं कर्नाटक में शहीदों के परिवारों और शहीदों की विधवाओं की बेहतरी के लिए काम करती हूं। जब मेजर शफीक़ गौरी शहीद हुए तो मेरी उम्र 29 साल थी। लोगों ने मुझसे ज़िंदगी में आगे बढ़ने के लिए कहा। लेकिन वो मेरे साथ थे, मेरे साथ हैं और हमेशा रहेंगे। ******











