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- मैं तार घर हूं।
यह बात और है कि मैं अब बेकार हूं। पर बीते वक्त का एक चमत्कार हूं। वीराने में बेरौनक खड़ा हूं अब। इस शहर के जंगल में पड़ा हूं अब। मेरे कान तरसते हैं। किसी के पदचाप सुनने को जी हां मैं तारघर हूं। वही विसराया हुआ तारघर । मेरे माता-पिता श्री कुक और व्हीटस्टोन ब्रिटिश परिवार के थे। जिन की कठोर तपस्या का फल हूं। मेरे पूर्वजों ने श्रेष्ठ प्रयोगशालाओं में वर्षों दिन-रात मेरा आवाहन किया। एक ऐसा अवतार। मेरा जन्म क्या एक जश्न था जहान में। एक अद्भुतपूर्व शक्ति का अवतार। मेरा बचपन बड़े लाड प्यार से खुशगवार माहौल में बीता। मेरे जनक की तपस्या, परिश्रम अति सराहनीय है। देश-विदेश के शिल्पीयों ने गड़ा है। मुझको सजाया और संवारा है। मेरे लिए खिलौने भी सात समंदर पार से आए थे। मुझे रफ्तार बहुत पसंद थी। किसी की बात दूर-दूर तक जल्दी पहुंचाना मेरा उद्देश्य था। मेरा वो खिलौना “मोर्स कोड इनकोडिंग” कहलाता था। मैं अपने तार घर में लिखता था। वह संदेश पल भर में दूरदराज पहुंच जाता था। मैं सूचना संदेश का नया अवतार था। मेरे पूर्वज जो संदेश आग दिखाकर, धुआं उठा कर, ढोल बजाकर, कबूतर उड़ाकर, चिल्लाकर पहुंचाते थे। वह थक चुके थे। मेरे जन्म के समय के साथ उन्हें विश्राम मिला और खुशी के साथ मुझे स्वीकार किया। अब सारा ध्यान मेरी ओर खिंच गया। लोग मुझे प्यार से “तार” कहने लगे। और यह मेरा घर ‘तारघर’ हो गया। मेरी सेवाओं की ड़ोरियां दूर-दूर तक फैलाई गई, गठबंधन किए गए और हम धीरे-धीरे एक दूसरे से जुड़ते गए। अति शीघ्र संदेश के लिए लोग मेरे तारघर आते और अपना संदेश शीघ्र ही अपनों को दूर-दूर तक पहुंचाते। मुझे बहुत अच्छा लगता था। मेरा जन्म सफल हो गया। दिन-रात रौनक रहती थी मेरे घर में, प्रकाश, शोर-शराबा, चहल-पहल, मेरी सराहना, मेरी खुशी की कोई सीमा न थी। बच्चों के जन्म की सूचना, विवाह की सूचना, सफलता की सूचना, धन व्यापार की सूचना। हां कभी गम की भी सूचनाएं होती थी। मैं बोझिल मन से पर अपना कर्म-धर्म मान कर उन्हें भी तुरंत भेजता था। एक ही टेबल पर रखता था। आंसू और मुस्कान। मैंने रेलवे-परिवहन, जहाजरानी सेवा का भी सफलतापूर्वक संचालन किया। एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक पहुंचने की सूचना का भार भी मेरे कंधों पर था। देश-विदेश की संधियों, युद्ध विराम जैसे महत्वपूर्ण कार्य भी मैंने ही किए संदेश माध्यम से। मुझे गर्व था अपने कार्य पर लोग मेरे जनक को धन्यवाद भी बोलते थे। अब मैं ख्याति के शिखर पर था। जहां कोई बहुत दिनों तक नहीं रह सकता है। मेरी नई पीड़ी जन्म ले रही थी। फैक्स, टेलीप्रिंटर, कंप्यूटर, मोबाइल, ईमेल। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। नए का स्वागत पुराने की विदाई और धीरे-धीरे त्याग कर भूल जाना। मेरे घर की रौनक जाने लगी, चहल-पहल कम हो गई, अब मैं लोगों का इंतजार करने लगा। कभी-कभी इतनी निराशा कि कई दिनों तक मेरी चौखट पर कोई आहट नहीं होती थी। मायूष, नम आंखें और थक कर सो जाना। तारघर के उपवन भी मलिन होने लगे। भवन भी जीर्ण-शीर्ण हो चला। एक दिन मेरे घर पर भी ‘सेवाएं समाप्त’ का बोर्ड लग गया। लोगों ने रास्ते बदल लिए। मैं अकेला अंधेरी रातें, वीरांनगी, डर, घर में जीव जंतुओं का बास। रात मुझे सपना आया जल्द ही मेरी नई पीढ़ी का यहां घर बनेगा। इसी आशा से आज भी अपनी पुरानी यादों को सजोय, बेरौनक खड़ा हूं। जी हां मैं वही तार घर हूं। “तारों से रिश्ता तोड़कर बेतार हो गए। नई पीढ़ी के बच्चे बहुत होशियार हो गए।” मेरा आखरी तार। डॉ. जहान सिंह ‘जहान’ ****
- पिता का प्यार....
लक्ष्मी कांत पांडे एक 75 वर्ष के वृद्ध पिता अपने 40 वर्षीय उच्च शिक्षित बेटे के साथ अपने घर में सोफे पर बैठे थे। अचानक एक कौवा आया और उनकी खिड़की पर आ कर बैठ गया। बूढ़े पिता ने अपने पुत्र से पूछा, बेटा “यह खिड़की पर क्या है?” पुत्र ने पिता को उत्तर दिया पिता जी यह “यह एक कौवा है”। कुछ मिनटों बाद ही, पिता ने फिर से अपने पुत्र से पूछा, “यह क्या है?” बेटे ने कहा, “पिताजी, मैंने अभी-अभी आपसे कहा तो है, कि यह एक कौवा है। थोड़ी देर चुप रहने के बाद उस बूढ़े पिता ने तीसरी बार फिर अपने बेटे से पूछा, बेटा यह क्या है?” इस बार बेटे ने अपने पिता से गुस्से में फटकार के साथ कहा। कह तो दिया “यह एक कौवा, एक कौवा, एक कौवा है”। आपको समझ नहीं आता। थोड़ी देर बाद, पिता ने चौथी बार भी अपने पुत्र से फिर वही पूछा, “यह क्या है?” इस बार बेटा अपने पिता पर चिढ़ते हुए चिल्लाया, “आप मुझसे एक ही सवाल बार-बार क्यों पूछते हो, मैं आप से बार-बार कह चूका हूँ कि ‘यह एक कौवा है’। क्या आप यह नहीं समझ पा रहे हो?” थोड़ी देर के बाद पिता अपने कमरे में गए और एक पुरानी फटी हुई सी डायरी लेकर वापस आए, जिसे उन्होंने अपने बेटे के जन्म के बाद से संभाल कर रखा था। पिता ने उस डायरी का एक पन्ना खोला और अपने बेटे से कहा, बेटा क्या तुम इसे मेरे लिए पढ़ सकते हो। जब बेटे ने इस पन्ने को पढ़ा तो डायरी में यह शब्द लिखे थे:- “आज मेरा तीन साल का छोटा सा बेटा मेरे साथ सोफे पर बैठा था, तभी खिड़की पर एक कौवा बैठा था। मेरे बेटे ने मुझसे 23 बार पूछा कि यह क्या है, और मैंने उसे 23 बार जवाब दिया कि यह एक कौआ है। जब-जब मैंने उसे जबाब दिया तब-तब मुझे अच्छा लगा और हर बार मैंने उसे प्यार से गले लगाया। मुझे उसके पूछने पर बिल्कुल भी गुस्सा नहीं आया, बल्कि मुझे अपने मासूम बच्चे के प्रति स्नेह महसूस हुआ।” बेटे और पिता दोनों की आखें नम हो गई। फर्क बस इतना था कि बेटे की आखें शर्मिंदगी महसूस कर रहीं थी और पिता की आखें अपने बेटे के आंसू देख नम हो गई। दोस्तों, एक पिता ही होता है जो अपने बच्चों को खुद से ज्यादा कामियाब होकर गर्भ महसूस करता है। एक पिता अपने बच्चों पर निस्वार्थ प्यार बरसता है। एक पिता अपने बच्चों को योग्य बनता है। और अपने बच्चों को हमेशा खुश देखना चाहता है। जब हम छोटे थे तब माता-पिता ने हमारी देखभाल की। हमारी खाहिशे पूरी की। चाहें उसके लिए उन्हें अपनी ख्वाहिशों को ही क्यों न दवानी पडी हो। जबकि छोटे बच्चे ने उनसे 23 बार “यह क्या है” पूछा, पिता को एक ही प्रश्न का 23 बार उत्तर देने में कोई जलन नहीं हुई और जब आज पिता ने अपने पुत्र से वही प्रश्न केवल 4 बार पूछा, तो बेटा न केवल चिढ़ गया बल्कि गुस्से से भी भर गया। सिर्फ इतना ही फर्क होता है पिता और बेटे में। *****
- गुरु की उदासी
मुकेश ‘नादान’ एक दिन श्रीरामकृष्ण भक्त के स्वभाव को चातक का दृष्टांत देकर समझा रहे थे, “चातक जिस प्रकार अपनी प्यास बुझाने के लिए बादल की ओर ही ताकता रहता है और उसी पर पूर्णतया निर्भर रहता है, उसी प्रकार भक्त भी अपने हृदय की प्यास और सब प्रकार के अभावों की पूर्ति के लिए केवल ईश्वर पर ही निर्भर रहता है।” नरेंद्रनाथ उस समय वहाँ बैठे थे, एकाएक बोल उठे, “महाराज, यद्यपि यह प्रसिदूध है कि चातक पक्षी वर्षा का जल छोड़कर और कोई जल नहीं पीता, परंतु फिर भी यह बात सत्य नहीं है, अन्य पक्षियों की तरह नदी आदि 'जलाशयों में भी जल पीकर वह अपनी प्यास बुझाता है। मैंने चातक को इस तरह जल पीते हुए देखा है।” श्रीरामकृष्ण देव ने कहा, “अच्छा! चातक अन्य पक्षियों की तरह धरती का जल भी पीता है? तब तो मेरी इतने दिनों की धारणा मिथ्या हो गई। जब तूने देखा है तो फिर उस विषय में मैं संदेह नहीं कर सकता।” बालक तुल्य स्वभाव वाले श्रीरामकृष्ण देव इतना कहकर ही निशूंचित नहीं हुए, वे सोचने लगे-यह धारणा जब मिथ्या प्रमाणित हुई, तो दूसरी धारणाएँ भी मिथ्या हो सकती हैं। यह विचार मन में आने पर वे बहुत उदास हो गए। कुछ दिन बाद नरेंद्र ने 'एक दिन उन्हें एकाएक पुकारकर कहा, “वह देखिए महाराज, चातक गंगाजी का जल पी रहा है।” श्रीरामकृष्ण देव जब देखने आए और बोले, “कहाँ रे?” नरेंद्र के दिखाने पर उन्होंने देखा, एक छोटा सा चमगादड़ पानी पी रहा है। तब वे हँसते हुए बोले, “यह तो चमगादड़ है रे! अरे मूर्ख, तू चमगादड़ को चातक समझता है और मुझे इतने बड़े सोच में डाल दिया। अब मैं तेरी किसी बात पर विश्वास नहीं करूँगा।” श्रीरामकृष्ण के साकार देव-देवियों और उनके क्रियाकलापों के प्रति पूर्ण विश्वासी होने पर भी नरेंद्रनाथ का इन सब पर विश्वास नहीं था। वे कह उठते-घरूप-दूप आपके मस्तिष्क का भम है।” नरेंद्र की सत्यवादिता के संबंध में दृढ़ निश्चयी श्रीरामकृष्ण इस प्रकार हतबुद्धि होकर माँ काली से निवेदन करते, “माँ, नरेंद्र कहता है, यह सब मेरे मस्तिष्क का भम है। क्या यह सच है?” माँ इस प्रकार उन्हें समझाकर कहतीं, “नहीं, वह सब ठीक है, भम नहीं है। नरेंद्र बच्चा है, इसीलिए ऐसा कहता है।” इस प्रकार वह आश्वस्त मन से लौटकर नरेंद्र को सुना देते, “तेरी जैसी इच्छा हो, वैसा भले ही बोल, किंतु मैं उस पर विश्वास नहीं करता।” श्रीरामकृष्ण नरेंद्र की इस प्रकार की उक्ति से साधारणतया असंतुष्ट नहीं होते थे, फिर भी नरेंद्र के कल्याण के लिए सदैव चुप ही रहते, ऐसा भी नहीं था। श्रीरामकृष्ण के विश्वास को हिला नहीं पाने पर तथा श्रीरामकृष्ण के दूवारा उनकी बात नहीं मानने पर नरेंद्र उनकी ऐसी बातों पर संदेह प्रकट करते। उन दिनों की बातों का स्मरण कर श्रीरामकृष्ण ने एक दिन भक्तों से कहा था, “माँ काली को पहले उसके जी में जो आता था वही कहता था, मैंने चिढ़कर एक दिन कहा था, “मूर्ख, तू अब यहाँ न आना'। *******
- कर्मों की दौलत
डॉ रश्मि दुबे कड़वे बोलों की बोली से जब जब दिल भर आता है। तीर ज़ुबां का जब भी लगता जख़्म नहीं भर पाता है। घटता रिश्तों का मीठा पन होते दिल भी दूर कहीं। धीरे-धीरे जीवन में दुर्दिन का साया आता है। मर्यादा जो भूल गया हो सीधे सच्चे रिश्तों की। तन्हा रह कर वह इंसा बस चोट जहां में खाता है। क्या लेकर आया था मानव क्या लेकर तू जाएगा। कर्मों की दौलत ले इंसान इस दुनिया से जाता है। किस मद में तू चूर हुआ यह दुनिया बिल्कुल नश्वर है। किस से क्या उम्मीद करें बस ईश्वर साथ निभाता है। *****
- अपना देश
दीपशिखा लैपटॉप लेकर बैठी है चुनमुनिया खलिहान में, दृश्य बदलते देख रही हूँ अपने हिंदुस्तान में... गूगल की दुनिया से जाने दुनिया का विस्तार, कच्चे घर में बैठ घूमती सात समुंदर पार। डर के आगे जीत लिखी है लक्ष्य पूर्ति की आस, दौलत की ताक़त पर भारी होगा दृढ़ विश्वास। इक दिन महल दण्डवत होगा कुटिया के सम्मान में.... दृश्य बदलते देख रही हूँ... हर कक्षा में टॉपर रहना शीश उठाकर जीना, सीख गई है मुस्कानों से दुख का दामन सीना। उड़ने को आकाश मिला स्पेस जेट के सपने, गर्व भरी आंखों से तकते बूढ़े बरगद अपने। सोच रहे हैं हीरा निकला कोयले की खदान में... दृश्य बदलते देख रही हूँ... पक्की सड़कें महानगर की ले आईं हैं साथ, ऊंची शिक्षा की वनिता ने थाम लिया है हाथ। प्रतिभा से अवसर का होता देख लिया गठबंधन, आज रही विस्मित आंखों में आशाओं का अंजन। माँ बापू की फोटो रखकर लाई है सामान में... दृश्य बदलते देख रही हूँ... *****
- प्यास सच्ची गिलास झूठा
विजया डालमिया अब मुझे तुम पर विश्वास नहीं रहा...छला है तुमने मुझे ....कहकर तेजी से सुमि रूम की तरफ बढ़ चली। प्लीज सुमि .... प्लीज .. मेरी एक बार पूरी बात तो सुन लो। यह मेरी आखिरी गलती है ....प्लीज। अपने सुभाष को माफ कर दो ना... कहकर वह बार-बार गिड़गिड़ा रहा था, किंतु सुमि ने दरवाजा उसके मुंह पर बंद करते हुए कहा... अब कभी नहीं... अब सब खत्म। मैं तुम्हारी कोई बात नहीं सुनना चाहती। अब मुझे तुम्हारी किसी बात पर विश्वास नहीं रहा ....और फूट-फूट कर रो पड़ी। उधर सुभाष थका-हारा लूटा हुआ सा खड़ा था। इधर सिमी खुद को लूटा हुआ महसूस कर रही थी। इतने समय से जिसे भगवान का दर्जा दिया। आँख मूंदकर जिसकी हर बात मानी। कभी किसी बात का विरोध तक नहीं किया। उसी ने आज उसे एक गहरा धक्का दे दिया। यूँ तो सुभाष छोटी-छोटी बातों पर गोल घूमाता था, पर वह हँसी-मजाक की तरह ही होती थी। सिमी भी क्षणिक झूठ-मूठ की नाराजगी रखती और फिर मान जाती। एक अजनबी अनजान शहर से आकर उसके दिल के बेहद करीब हो गया था। उसने अपने सुबह-शाम उसके नाम और रातें उसके सपनों के नाम कर दी थी और आज अचानक सुभाष का अतीत सिमी के सामने आ खड़ा हुआ। सिमी ने कुछ रोज पहले ही तो सुभाष से पूछा था.... कहीं कोई ऐसी बात तो नहीं है ना तुम्हारी लाइफ में जो तुमने मुझसे छुपा रखी है? मगर उस जालिम ने बड़ी चालाकी से मुस्कुराते हुए अपने चिरपरिचित अंदाज में जवाब दिया ....नहीं यार! मैं तो तुम्हारे साथ एकदम ट्रांसपेरेंसी से रहता हूँ ...और आज एक अनजान लड़की दोनों के बीच आ खड़ी हुई जिससे सिमी जरूर अनजान थी पर सुभाष नहीं। ....ओह सुभाष क्यों किया तुमने ऐसा? अब मेरी सांसे चल रही है इसलिए जिंदा हूँ। लेकिन सांसों के चलने को जिंदगी नहीं कह सकते ना। दिल के टूटने की कोई आवाज नहीं होती, लेकिन जिसका दिल टूटता है उसकी आवाज जरूर बंद हो जाती है। आँखों में नमी पर होठों पर ना ही शिकायत है ना ही सिसकी है। बस एक खामोशी दूर तक पसरी है। जिसकी आवाज से मैं जी जाती थी, उसी आवाज ने मुझे जीते जी मार दिया। किसी का साथ पहले आदत, फिर जरूरत बन जाता है। अब मैंने अपनी आदत बदल ली। सुभाष तुम जहाँ रहो खुश रहो। आज मैं फिर हमसे ...मैं... होकर रह गई। मेरी प्यास सच्ची थी मगर गिलास झूठा था... कहकर सिमी ने एक गहरी सांस ली और चल पड़ी उस रास्ते की तरफ जिसकी कोई मंजिल न थी। ******
- घड़ी
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव एक दिन की बात है। एक किसान अपने खेत के पास स्थित अनाज की कोठी में काम कर रहा था। काम के दौरान उसकी घड़ी कहीं खो गई। वह घड़ी उसके पिता द्वारा उसे उपहार में दी गई थी। इस कारण उससे उसका भावनात्मक लगाव था। उसने वह घड़ी ढूंढने की बहुत कोशिश की। कोठी का हर कोना छान मारा। लेकिन घड़ी नहीं मिली। हताश होकर वह कोठी से बाहर आ गया। वहाँ उसने देखा कि कुछ बच्चे खेल रहे हैं। उसने बच्चों को पास बुलाकर उन्हें अपने पिता की घड़ी खोजने का काम सौंपा। घड़ी ढूंढ निकालने वाले को ईनाम देने की घोषणा भी की। ईनाम के लालच में बच्चे तुरंत मान गए। कोठी के अंदर जाकर बच्चे घड़ी की खोज में लग गए। इधर-उधर, यहाँ-वहाँ, हर जगह खोजने पर भी घड़ी नहीं मिल पाई। बच्चे थक गए और उन्होंने हार मान ली। किसान ने अब घड़ी मिलने की आस खो दी। बच्चों के जाने के बाद वह कोठी में उदास बैठा था। तभी एक बच्चा वापस आया और किसान से बोला कि वह एक बार फिर से घड़ी ढूंढने की कोशिश करना चाहता था। किसान ने हामी भर दी। बच्चा कोठी के भीतर गया और कुछ ही देर में बाहर आ गया। उसके हाथ में किसान की घड़ी थी। जब किसान ने वह घड़ी देखी, तो बहुत ख़ुश हुआ। उसे आश्चर्य हुआ कि जिस घड़ी को ढूंढने में सब नाकामयाब रहे, उसे उस बच्चे ने कैसे ढूंढ निकाला? पूछने पर बच्चे ने बताया कि कोठी के भीतर जाकर वह चुपचाप एक जगह खड़ा हो गया और सुनने लगा। शांति में उसे घड़ी की टिक-टिक की आवाज़ सुनाई पड़ी और उस आवाज़ की दिशा में खोजने पर उसे वह घड़ी मिल गई। किसान ने बच्चे को शाबासी दी और ईनाम देकर विदा किया। ******
- कुछ सवाल
मधु मधुमन रीत कैसी ये जग में चलाई गयी, नातवां पर ही उँगली उठाई गई, भूल बेटे भी करते हैं अक्सर तो फिर, क्यूँ बहू ही हमेशा सताई गयी। एक धोबी के छोटे से शक़ पर फ़क़त, जानकी को सज़ा क्यूँ सुनाई गई। त्याग लक्ष्मण का सबने ही देखा मगर, उर्मिला की तपस्या भुलाई गयी। युद्ध तो कौरवों पांडवों में था फिर, दाँव पर द्रौपदी क्यूँ लगाई गयी। कृष्ण की प्रेम गाथाएँ गाते हैं सब, रुक्मणी की व्यथा क्यूँ न गाई गई। दोष तो इंद्र का था अनाचार में, फिर अहिल्या क्यूँ पत्थर बनाई गई। इम्तिहां की कसौटी पे ‘मधुमन‘ सदा, एक नारी ही क्यूँ आज़माई गई? ******
- नीली चिड़िया
अंकिता शाम्भवी कई बार तुम्हें पढ़ते हुए मैं ख़यालों के समंदर में डूबने-उतराने लगती हूँ जब बिल्कुल डूबने को होती हूँ— तुम्हारी कविताएँ मुझे कसकर थाम लेती हैं और तट पर लाकर छोड़ नहीं जातीं, बल्कि मेरे साथ ही वहीं बैठ जाती हैं। वे मुझे क़िस्से सुनाती हैं उस नीली चिड़िया के जो तुम्हारे दिल में छुपकर बैठी हुई थी जिसे तुम इस डर से बाहर नहीं आने देते कि वह तुम्हारी रचनाओं को नुक़सान न पहुँचा दे, काम न बिगाड़ दे जिस पर तुम व्हिस्की उँड़ेल दिया करते और तमाम वेश्याएँ, तमाम साक़ी, तमाम किराने के दुकान-मालिक ये नहीं जान पाते कि वह नीली चिड़िया तुम्हारे दिल के कोटर में न जाने कब से बंद है तुमने सचमुच उस प्यारी नीली चिड़िया पर बहुत ज़ुल्म किया वह हौले-हौले गाती रही कुछ जिसे सिर्फ़ तुमने सुना, तुमने ही समझा, उसे मरने नहीं दिया और तुम दोनों यूँ ही साथ सोते रहे उसने तुम्हारे सब राज़ छुपा रखे थे तुम नहीं चाहते थे इस दुनिया में कोई भी किसी से नफ़रत करे फिर भी लोगों ने नफ़रत की तुम्हारी शक्ल से, मेरी शक्ल से, हम सबकी शक्ल से, क्योंकि उन्हें अपनी शक्ल से भी प्यार नहीं था! तुम जानते थे इस दुनिया में अमीर ख़ुश नहीं न ही वंचित यहाँ कोई किसी से प्यार नहीं करता पर तुम्हारे मस्तिष्क ने तुम्हें पल भर भी चैन नहीं लेने दिया तुम बेचैन हो उठते रातें जागकर बिताते और देर तक टाइपराइटर पर उँगलियाँ टिपटिपाते तुम्हारी कविताओं में वेश्याएँ थीं, जिनसे तुमने प्रेम की उम्मीद की दलाल थे, कवि थे, प्रकाशक थे, उनकी माँएँ, पत्नियाँ, दोस्त, भाई सब थे जिनसे तुमने कभी कोई उम्मीद नहीं की सभी ने तुम्हें निराश किया सभी को तुमने धिक्कारा अपनी कविताओं में उन्हें बार-बार लताड़ा तुम्हारी उँगलियों और टाइपराइटर के बीच ईमान का रिश्ता था। तुम्हें दुनिया की सबसे मामूली चीज़ें पसंद आईं और मामूली लोगों से प्यार हुआ, किसी गली में शराब के नशे में झूमता हुआ ठठेरा, पहली बार परीक्षा में बैठा एक लड़का, किसी बाड़ के किनारे अपने घोड़े का नेतृत्व करता खिलाड़ी, अपनी आख़िरी कॉल पर लगा हुआ साक़ी, कोई महिला वेटर जो रेस्तराँ में कॉफ़ी परोस रही है, किसी उजाड़ घर की दहलीज़ पर सोया हुआ नशेड़ी, एक सूखी हड्डी चबाता हुआ कुत्ता, किसी सर्कस के तम्बू में गोज़ करता हाथी, रास्ते में शाम छह बजे लगी हुई जमघट, या फिर, किसी डाकिये का फूहड़ मज़ाक़ ये मामूली लोग अपनी आख़िरी साँस तक तुम्हारी कविताओं में ज़िंदा रहे; पर वेश्याओं ने तुम्हें कभी प्यार नहीं किया, और संपादकों ने तुम्हारी रचनाएँ वापिस कर दीं। ******
- ध्वज के रंग
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव एक दिन कक्षा में गुरुजी ने बच्चों से पूछा- "बच्चों, बताओ तो भारत के राष्ट्रीय ध्वज में कितने रंग होते है?" "तीन" सारे बच्चों के स्वर कक्षा में एक साथ गूंजा। शोर थमने के बाद एक सहमा-सा बच्चा धीरे-धीरे खड़ा होकर विनम्र स्वर में बोला....." जी नहीं गुरुजी, पांच " सारे बच्चे यह सुन कर जोर-जोर से हँसने लगे। गुरुजी अपने गुस्से को दबाने की कोशिश करते हुए बोले, "चलिए, आप ही सबको बता दीजिए कौन-कौन से पाँच रंग है हमारे तिरंगे में?" तिरंगे के नाम सुनने के बाद भी बच्चा धीरे-धीरे बोलने लगा- "सबसे ऊपर केसरिया, उसके नीचे सफेद, सबसे नीचे हरा और बीच में एक चक्र जिसका रंग नीला है।" गुरुजी ने अपने हाथ दायें-बायें हिलाते हुए हल्के से ऊंची आवाज में पूछा- "फिर भी तो चार ही हुआ। ये पांचवां रंग कौन सा है....बताओ?" मासूम बच्चे ने आंख झुकाए सरलता से उत्तर दिया- "वो है पूरे ध्वज में फैला हुआ लाल-लाल रक्त का धब्बा, मुझे याद है गुरुजी, जब मैंने अपने पिताजी को अंतिम बार देखा था, जब वो आतंकवादियों के साथ एक मुठभेड़ के दौरान शहीद हो गए थे।" घर के आंगन में एक ताबूत के अंदर पिताजी एक वैसे ही ध्वज को ओढ़ कर सोये हुए थे...चिरनिद्रा में, हमेशा के लिए औऱ मेरी माँ के साथ पूरे परिवार की आँखें बेहद नम थीं।" कक्षा का शोर अचानक थम सा गया। पल भर में सन्नाटा पसर गया। गुरुजी का गुस्सा अचानक गायब हो चुका था। उनका गला भर आया था। वे कुछ बोल नहीं पा रहे थे। सिर्फ हाथ के इशारे से सबको शाँत बैठने को कह कर अपना सिर झुकाए कक्षा के बाहर निकल आए और भीगी आँखों से आसमान के तरफ़ देखते हुए सोंचने लगे- "तिरंगे में लगे हमारे शहीद हुए वीर जवानों के खून के उन लाल धब्बों को हम कैसे भूल सकते है भला? नमन हर उस वीर जवान को जो मातृभूमि के लिए अपना सबकुछ छोड़ देता है। अपना पूरा जीवन न्योछावर कर देता है....देश के लिए। जय हिन्द जय भारत। ******
- तिरंगा हम फहरायेंगे
पिंकी सिंघल झंडा ऊंचा रहे हमारा, लगता सबसे एकदम न्यारा, तीन रंगों से सजकर ये झंडा, दिखता देखो कितना प्यारा। हरा रंग हरियाली बतलाता, त्याग करना केसरिया सिखलाता, धवल रंग जो सजे बीच में, शांति का पैगाम वो लाता। आन बचाता भारत की ये, बान दिखाता भारत की ये, आंच न इस पर आने दें हम, शान बढ़ाता भारत की ये। प्राण अपने गंवा देंगे हम, सर्वस्व अपना लुटा देंगे हम, भारी हर विपदा पर भारत, दुश्मन को आज बता देंगे हम। हर सिम्त इसे हम लहरायेंगे, प्रेम सुधा बस बरसायेंगे झुकने देंगे न कुछ भी हो जाए, हर घर तिरंगा हम फहरायेंगे। ******
- खुद्दारी
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव दो जवान बेटे मर गए। दस साल पहले पति भी चल बसे। दौलत के नाम पर बची एक सिलाई मशीन। सत्तर साल की बूढी ममता गाँव भर के कपड़े सिलती रहती। बदले में कोई चावल दे जाता, तो कोई गेहूँ या बाजरा। सिलाई करते समय उसकी कमजोर गर्दन डमरू की तरह हिलती रहती। दरवाजे के सामने से जो भी निकलता वह उसे ‘राम–राम‘ कहना न भूलती। दया दिखाने वालों से उसे हमेशा चिढ रहती। छोटे–छोटे बच्चे दरवाजे पर आकर ऊधम मचाते, लेकिन ममता उनको कभी बुरा भला न कहकर उल्टे खुश होती। प्रधान जी कन्या पाठशाला के लिए चन्दा इकट्ठा करने निकले, तो ममता के घर की हालत देखकर पिघल गए — क्यों दादी, तुम हाँ कह दो, तो तुम्हें बुढ़ापा पेंशन दिलवाने की कोशिश करूँ। ममता घायल – सी होकर बोली भगवान ने दो हाथ दिए हैं। मेरी मशीन आधा पेट रोटी दे ही देती है। मैं किसी के आगे हाथ क्यों फैलाऊँगी। क्या तुम यही कहने आये थे? मैं तो कन्या पाठशाला बनवाने के लिए चन्दा लेने आया था। पर तेरी हालत देखकर। तू कन्या पाठशाला बनवाएगा? ममता के झुर्रियों भरे चेहरे पर सुबह की धूप-सी खिल गई। हाँ, एक दिन जरूर बनवाऊँगा दादी। बस तेरा आशीष चाहिए।” ममता घुटनों पर हाथ टेक कर उठी। ताक पर रखी जंग खाई संदूकची उठा लाई। काफी देर उलट-पुलट करने पर बटुआ निकला। उसमें से तीन सौ रुपये निकालकर प्रधान जी की हथेली पर रख दिए बेटे, सोचा था मरने से पहले गंगा नहाने जाऊँगी। उसी के लिए जोड़कर ये पैसे रखे थे। तब ये रुपये मुझे क्यों दे रही हो? गंगा नहाने नहीं जाओगी? बेटे, तुम पाठशाला बनवाओ। इससे बड़ा गंगा–स्नान और क्या होगा” - कह कर ममता फिर कपड़े सीने में जुट गई। ******











