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  • आलात

    डॉ रश्मि दुबे हर तरफ आघात ही आघात है। ये हमारे सामने की बात है। दिन पे दिन ही ये बिगड़ते जा रहे जाने कैसे देश के हालात हैं। सामने हर शख़्स ही हंसता मिले पीठ पीछे पर छिपे आलात हैं। देश की किसको पड़ी है आज भी रोती जनता और बस हैहात है। इन गरीबों की सुनेगा कौन कब उनका कैसा दिन भला क्या रात है। जब अमीरों की चलेगी रात दिन आम जनता तो सदा लमआत है। कब सुधर पाएंगे ये हालात ही रश्मि मुश्किल ये बड़ा इस्बात है। *****

  • नानी का घर

    पूजा मनोज अग्रवाल बात आज से करीब पच्चीस साल पहले की है, जब मेरी उम्र लगभग सत्रह साल रही होगी। मुझे अपनी नानी के यहां जाने को बहुत चाव रहता था, क्योंकि वहां हम सब मौसेरे और ममेरे भाई-बहनों का जमघट लगा रहता था। हमारे मामा जी के चार बच्चे थे, उनकी बड़ी बेटी का नाम मीनू था, वे हम सब भाई बहनों में सबसे बड़ी थी। मीनू दीदी हर सिलाई कढ़ाई और खाना बनाना जैसी हर चीज में एक्सपर्ट थी। तरह-तरह के अचार और व्यंजन बनाना उन्हें बखूबी आता था। और वे हम सब छोटे बहन भाइयों को बहुत प्यार से नई-नई चीजे बना कर खिलाती थी। हमारी एक फरमाइश के पीछे दीदी घंटों किचन में बिताया करती। पूरी गर्मियों की छुट्टियां मीनू दीदी का सिर्फ यही रूटीन रहता था। हम सभी बच्चे नानी के घर पूरा दिन मौज मस्ती करते। तंबोला, लूडो, आंख मिचोनी और राजा, मंत्री, चोर सिपाही जैसे जाने कौन-कौन से गेम खेला करते थे। हर शाम मीनू दीदी नानी के हाथों से तोड़ी हुई मैदा की नमकीन सेवियां बनाया करती थी, जो हम सब बच्चे जन्म जन्मांतर से भूखों की तरह खा जाते थे। और हमारे प्यारे मामा जी हम सब बच्चों के लिए रोज शाम को हमारी मनचाही आइसक्रीम मंगाया करते थे, और हम सभी भाई-बहन देर रात तक बातें करते हुए बहुत मजे करते थे। एक बार मीनू दीदी ने गृहशोभा मैगजीन से देखकर गट्टे की सब्जी की रेसिपी बनाई। गट्टे की सब्जी हम पंजाबियों के यहां रूटीन में नहीं बनती तो यह सब्जी दीदी ने पहली बार ही ट्राई की थी। अब पहली बार बनाई थी, तो दीदी के बनाए हुए गट्टे बहुत टाइट बन गए। मामा जी के बड़े बेटे आशु भैया ने कटोरी में गट्टे को तोड़ने के लिए ज्यों ही चम्मच से उसे काटने की कोशिश की, तभी उसमें से एक गट्टा उछलकर मेरे मुंह पर आ गिरा। सब्जी की छींटे यहां वहां मेरे मुंह और कपड़ों पर लग गए थे। बस तो फिर क्या था सभी बहन भाइयों ने खूब जमकर ठहाके लगाए और मेरा सब्जी से सना हुआ चेहरा देखकर मेरी खूब खिल्ली उड़ाई। घर में भारी भीड़ के चलते हमारी नानी और मामी कभी दिन में दो पल को भी आराम न कर पाती थी। और ना ही वे हम बच्चों की दिनभर की शरारतों से परेशान हुआ करती थीं। एक भयंकर एक्सीडेंट की वजह से हमारी प्यारी मीनू दीदी तो अब हमारे बीच नहीं हैं, परंतु वह आज भी हमें बहुत याद आती हैं, उनकी वह सारी बातें, उनकी यादें आंखों के सामने चल चित्र की भांति चल जाती हैं। आजकल गर्मी की छुट्टियां और उस समय की गर्मी की छुट्टियों में जमीन आसमान का फर्क है। आज बच्चे अपनी ही नानी के घर जाने से कतराने लगे हैं। वे अपने घर, और अपने मोबाइल, लैपटॉप की ही दुनिया तक सीमित रह गए हैं। और हम उस पीढ़ी के लोग, उन दिनों को याद कर सोचते हैं, काश!! वह गर्मी की छुट्टियां फिर वापस आ जाए, काश ,,,,!! हमारी मीनू दीदी एक बार फिर इस दुनिया में अपने बहन भाइयों के बीच अपने बच्चों के पास वापस लौट आएं। *******

  • आत्महित

    श्री रूप किशोर श्रीवास्तव एक किसान के घर में एक चूहा, एक साँप, एक कबूतर और एक बकरा रहते थे। वे आपस में बहुत अच्छे दोस्त थे। एक दिन किसान चूहे से परेशान होकर एक चूहेदानी ले आया। चूहे ने जब देखा कि उसको पकड़ने के लिए यह चूहेदानी आई है तो वह डर गया। जब डर होता है तो अपनी व्यथा व्यक्ति दूसरों को जरूर बताता है शायद कुछ मदद मिल सके। चूहे ने भी वही किया और अपने तीनों दोस्तों साँप, कबूतर और बकरे को बताया। उन लोगों ने उसकी बात पर कोई गौर इसलिए नहीं किया कि चूहेदानी से उनको क्या खतरा। लेकिन चूहा तो परेशान था इसलिए वो घर छोड़ कर बाहर भाग गया। रात्रि को किसान ने चूहेदानी का प्रयोग किया और चूहे को पकड़ने के लिए रोटी का टुकड़ा लगाया। चूहा तो पहले ही भाग गया था। सुबह साँप ने सोंचा चूहा तो फंस गया होगा चलो देखते हैं। चूहेदानी तो खाली थी और देखने के चक्कर में साँप उंसमें फंस गया। जब किसान की पत्नी ने चूहेदानी उठाई और बाहर ले जाकर खोला तो साँप निकल पड़ा और उसने किसान की पत्नी को काट लिया। यह देखकर तुरंत किसान ने साँप को मार दिया। साँप के काटने से किसान की पत्नी के शरीर में जहर फैलने लगा। तुरंत वैध को बुलाया गया। वैध ने औषधि के साथ शरीर में गर्मी पंहुचने के लिए कबूतर के रक्त की व्यवस्था करने को कहा। किसान ने जल्दी से कबूतर को मार दिया और उसका रक्त पत्नी को पिलाया। काफी इलाज़ के बाद वो ठीक न हो सकी और उसका देहांत हो गया। देहांत के बाद गाँव में खाना किया गया। भोजन के व्यवस्था के लिए बकरे को काट दिया गया। जब चूहा वापस आया तो कोई भी उसका मित्र नहीं था। अपने लिए कोई खतरा न समझते हुए यदि वो मित्र अपने दोस्त की सहायता करते तो शायद सब बच जाते। लेकिन स्वार्थवश उन्होने ऐसा नहीं किया। ******

  • नैराश्य लीला

    प्रेमचंद पंडित हृदयनाथ अयोध्या के एक सम्मानित पुरूष थे। धनवान तो नहीं लेकिन खाने पिने से खुश थे। कई मकान थे, उन्हीं के किराये पर गुजर होता था। इधर किराये बढ गये थे, उन्होंने अपनी सवारी भी रख ली थी। बहुत विचार शील आदमी थे, अच्छी शिक्षा पायी थी। संसार का काफी तरजुरबा था, पर क्रियात्मक शक्ति से व्रचित थे, सब कुछ न जानते थे। समाज उनकी आंखों में एक भयंकर भूत था जिससे सदैव डरना चाहिए। उसे जरा भी रूष्ट किया तो फिर जाने की खैर नहीं। उनकी स्त्री जागेश्वरी उनका प्रतिबिम्ब, पति के विचार उसके विचार और पति की इच्छा उसकी इच्छा थी, दोनों प्राणियों में कभी मतभेद न होता था। जागेश्चरी शिव की उपासक थी। हृदयनाथ वैष्णव थे, दोनो धर्मनिष्ट थे। उससे कहीं अधिक, जितने समान्यत: शिक्षित लोग हुआ करते है। इसका कदाचित् यह कारण था कि एक कन्या के सिवा उनके और कोई सनतान न थी। उनका विवाह तेरहवें वर्ष में हो गया था और माता-पिता की अब यही लालसा थी कि भगवान इसे पुत्रवती करें तो हम लोग नवासे के नाम अपना सब-कुछ लिख लिखाकर निश्चित हो जायें। किन्तु विधाता को कुछ और ही मन्जूर था। कैलाश कुमारी का अभी गौना भी न हुआ था, वह अभी तक यह भी न जानने पायी थी कि विवाह का आश्य क्या है कि उसका सोहाग उठ गया। वैधव्य ने उसके जीवन की अभिलाषाओं का दीपक बुझा दिया। माता और पिता विलाप कर रहे थे, घर में कुहराम मचा हुआ था, पर कैलाशकुमारी भौंचक्की हो-हो कर सबके मुंह की ओर ताकती थी। उसकी समझ में यह न आता था कि ये लोग रोते क्यों हैं। मां बाप की इकलौती बेटी थी। मां-बाप के अतिरिक्त वह किसी तीसरे व्यक्ति को उपने लिए आवश्यक न समझती थी। उसकी सुख कल्पनाओं में अभी तक पति का प्रवेश न हुआ था। वह समझती थी, स्त्रीयां पति के मरने पर इसलिए रोती है कि वह उनका और बच्चों का पालन करता है। मेरे घर में किस बात की कमी है? मुझे इसकी क्या चिन्ता है कि खायेंगे क्या, पहनेगें क्या? मुझे जिस चीज की जरूरत होगी बाबूजी तुरन्त ला देंगे, अम्मा से जो चीज मागूंगी वह दे देंगी। फिर रोऊं क्यों? वह अपनी मां को रोते देखती तो रोती, पति के शोक से नहीं, मां के प्रेम से। कभी सोचती, शायद यह लोग इसलिए रोते हैं कि कहीं मैं कोई ऐसी चीज न मांग बैठूं जिसे वह दे न सकें। तो मै ऐसी चीज मांगूगी ही क्यों? मै अब भी तो उन से कुछ नहीं मांगती, वह आप ही मेरे लिए एक न एक चीज नित्य लाते रहते हैं? क्या मैं अब कुछ और हो जाऊगीं? इधर माता का यह हाल था कि बेटी की सूरत देखते ही आंखों से आंसू की झडी लग जाती। बाप की दशा और भी करूणाजनक थी। घर में आना-जाना छोड दिया। सिर पर हाथ धरे कमरे में अकेले उदास बैठे रहते। उसे विशेष दु:ख इस बात का था कि सहेलियां भी अब उसके साथ खेलने न आती। उसने उनके घर लाने की माता से आज्ञा मांगी तो फूट-फूट कर रोने लगीं। माता-पिता की यह दशा देखी तो उसने उनके सामने जाना छोड दिया, बैठी किस्से कहानियां पढा करती। उसकी एकांतप्रियता का मां-बाप ने कुछ और ही अर्थ समझा। लडकी शोक के मारे घुली जाती है, इस वज्राघात ने उसके हृदय को टुकडे-टुकडे कर डाला है। एक दिन हृदयनाथ ने जागेश्वरी से कहा—जी चाहता है घर छोड कर कहीं भाग जाऊं। इसका कष्ट अब नहीं देखा जाता। जागेश्वरी—मेरी तो भगवान से यही प्रार्थना है कि मुझे संसार से उठा लें। कहां तक छाती पर पत्थर की सिल रखूं। हृदयनाथ—किसी भातिं इसका मन बहलाना चाहिए, जिसमें शोकमय विचार आने ही न पायें। हम लोंगों को दु:खी और रोते देख कर उसका दु:ख और भी दारूण हो जाता है। जागेश्वरी—मेरी तो बुद्धि कुछ काम नहीं करती। हृदयनाथ—हम लोग यों ही मातम करते रहे तो लडकी की जान पर बन जायेगी। अब कभी कभी थिएटर दिखा दिया, कभी घर में गाना-बजाना करा दिया। इन बातों से उसका दिल बहलता रहेगा। जागेशवरी—मै तो उसे देखते ही रो पडती हूं। लेकिन अब जब्त करूंगी तुम्हारा विचार बहुत अच्छा है। विना दिल बहलाव के उसका शोक न दूर होगा। हृदयनाथ—मैं भी अब उससे दिल बहलाने वाली बातें किया करूगा। कल एक सैरबीं लाऊगा, अच्छे-अच्छे दृश्य जमा करूगा। ग्रामोफोन तो आज ही मगवाये देता हूं। बस उसे हर वक्त किसी न किसी काम में लगाये रहना चाहिए। एकातंवास शोक-ज्वाला के लिए समीर के समान है। उस दिन से जागेश्वरी ने कैलाश कुमारी के लिए विनोद और प्रमोद के समान जमा करने शुरू किये। कैलासी मां के पास आती तो उसकी आंखों में आसू की बूंदे न देखती, होठों पर हंसी की आभा दिखाई देती। वह मुस्करा कर कहती – बेटी, आज थिएटर में बहुत अच्छा तमाशा होने वाला है, चलो देख आयें। कभी गंगा-स्नान की कहती, वहां मां-बेटी किश्ती पर बैठकर नदी में जल विहार करतीं, कभी दोनों संध्या-समय पार्क की ओर चली जातीं। धीरे-धीरे सहेलियां भी आने लगीं। कभी सब की सब बैठकर ताश खेलतीं। कभी गाती-बजातीं। पण्डित हृदयनाथ ने भी विनोद की सामग्रियां जुटायीं। कैलासी को देखते ही मग्न होकर बोलते—बेटी आओ, तुम्हें आज काश्मीर के दृश्य दिखाऊं: कभी ग्रामोफोन बजाकर उसे सुनाते। कैलासी इन सैर-सपाटों का खूब आन्नद उठाती। इतने सुख से उसके दिन कभी न गुजरे थे। इस भांति दो वर्ष बीत गये। कैलासी सैर-तमाशे की इतनी आदि हो गयी कि एक दिन भी थिएटर न जाती तो बेकलसी होने लगती। मनोरंजन नवीनता का दास है और समानता का शत्रु। थिएटरों के बाद सिनेमा की सनक सवार हुई। सिनेमा के बाद मिस्मेरिज्म और हिपनोटिज्म के तमाशों की सनक सवार हुई। सिनेमा के बाद मिस्मेरिज्म और हिप्नोटिज्म के तमाशों की। ग्रामोफोन के नये रिकार्ड आने लगे। संगीत का चस्का पड गया। बिरादरी में कहीं उत्सव होता तो मां-बेटी अवश्य जातीं। कैलासी नित्य इसी नशे में डूबी रहती, चलती तो कुछ गुनगुनती हुई, किसी से बातें करती तो वही थिएटर की और सिनेमा की। भौतिक संसार से अब कोई वास्ता न था, अब उसका निवास कल्पना संसार में था। दूसरे लोक की निवासिन होकर उसे प्राणियों से कोई सहानुभूति न रहीं, किसी के दु:ख पर जरा दया न आती। स्वभाव में उच्छृंखलता का विकास हुआ, अपनी सुरूचि पर गर्व करने लगी। सहेलियों से डींगे मारती, यहां के लोग मूर्ख है, यह सिनेमा की कद्र क्या करेगें। इसकी कद्र तो पश्चिम के लोग करते है। वहां मनोरंजन की सामाग्रियां उतनी ही आवश्यक है जितनी हवा। तभी तो वे उतने प्रसनन-चित्त रहते हैं, मानो किसी बात की चिंता ही नहीं। यहां किसी को इसका रस ही नहीं। जिन्हें भगवान ने सामर्थ्य भी दिया है वह भी सरंशाम से मुह ढांक कर पडे रहते हैं। सहेलियां कैलासी की यह गर्व-पूर्ण बातें सुनतीं और उसकी और भी प्रशंसा करतीं। वह उनका अपमान करने के आवेश में आप ही हास्यास्पद बन जाती थी। पडोसियों में इन सैर-सपाटों की चर्चा होने लगी। लोक-सम्मति किसी की रिआयत नहीं करती। किसी ने सिर पर टोपी टेढी रखी और पडोसियों की आंखों में कोई जरा अकड कर चला और पडोसियों ने अवाजें कसीं। विधवा के लिए पूजा-पाठ है, तीर्थ-व्रत है, मोटा खाना पहनना है, उसे विनोद और विलास, राग और रंग की क्या जरूरत? विधाता ने उसके द्वार बंद कर दिये हैं। लडकी प्यारी सही, लेकिन शर्म और हया भी कोई चीज होती है। जब मां-बाप ही उसे सिर चढाये हुए हैं तो उसका क्या दोष? मगर एक दिन आंखे खुलेगी अवश्य। महिलाएं कहतीं, बाप तो मर्द है, लेकिन मां कैसी है। उसको जरा भी विचार नहीं कि दुनियां क्या कहेगी। कुछ उन्हीं की एक दुलारी बेटी थोडे ही है, इस भांति मन बढाना अच्छा नहीं। कुछ दिनों तक तो यह खिचडी आपस में पकती रही। अंत को एक दिन कई महिलाओं ने जागेश्वरी के घर पदार्पण किया। जागेश्वरी ने उनका बडा आदर-सत्कार किया। कुछ देर तक इधर-उधर की बातें करने के बाद एक महिला बोली—महिलाएं रहस्य की बातें करने में बहुत अभ्यस्त होती है—बहन, तुम्हीं मजे में हो कि हंसी-खुसी में दिन काट देती हो। हम को तो दिन पहाड हो जाता है। न कोई काम न धंधा, कोई कहां तक बातें करें? दूसरी देवी ने आंखें मटकाते हुए कहा—अरे, तो यह तो बदे की बात है। सभी के दिन हंसी-खुंशी से कटें तो रोये कौन। यहां तो सुबह से शाम तक चक्की-चूल्हे से छुट्टी नहीं मिलती: किसी बच्चे को दस्त आ रहें तो किसी को ज्वर चढा हुआ है: कोई मिठाइयों की रट कहा है: तो कोई पैसो के लिए महानामथ मचाये हुए है। दिन भर हाय-हाय करते बीत जाता है। सारे दिन कठपुतलियों की भांति नाचती रहती हूं। तीसरी रमणी ने इस कथन का रहस्यमय भाव से विरोध किया—बदे की बात नहीं, वैसा दिल चाहिए। तुम्हें तो कोई राजसिंहासन पर बिठा दे तब भी तस्कीन न होगी। तब और भी हाय-हाय करोगी। इस पर एक वृद्धा ने कहा—नौज ऐसा दिल: यह भी कोई दिल है कि घर में चाहे आग लग जाय, दुनिया में कितना ही उपहास हो रहा हो, लेकिन आदमी अपने राग-रंग में मस्त रहे। वह दिल है कि पत्थर : हम गृहिणी कहलाती हैं, हमारा काम है अपनी गृहस्थी में रत रहना। आमोद-प्रमोद में दिन काटना हमारा काम नहीं। और महिलाओं ने इन निर्दय व्यंग्य पर लज्जित हो कर सिर झुका लिया। वे जागेश्वरी की चटुकियां लेना चाहती थीं। उसके साथ बिल्ली और चूहे की निर्दयी क्रीडा करना चाहती थीं। आहत को तडपाना उनका उद्देश्य था। इस खुली हुई चोट ने उनके पर-पीडन प्रेम के लिए कोई गुंजाइश न छोडी: किंतु जागेश्वरी को ताडना मिल गयी। स्त्रियों के विदा होने के बाद उसने जाकर पति से यह सारी कथा सुनायी। हृदयनाथ उन पुरूषों में न थे जो प्रत्येक अवसर पर अपनी आत्मिक स्वाधीनता का स्वांग भरते है, हठधर्मी को आत्म-स्वातन्त्रय के नाम से छिपाते है। वह सचिन्त भाव से बोले---तो अब क्या होगा? जागेश्वरी—तुम्हीं कोई उपाय सोचो। हृदयनाथ—पडोसियों ने जो आक्षेप किया है वह सवर्था उचित है। कैलाशकुमारी के स्वभाव में मुझें एक सविचित्र अन्तर दिखाई दे रहा है। मुझे स्वयं ज्ञात हो रहा है कि उसके मन बहलाव के लिए हम लोंगों ने जो उपाय निकाला है वह मुनासिब नहीं है। उनका यह कथन सत्य है कि विधवाओं के लिए आमोद-प्रामोद वर्जित है। अब हमें यह परिपाटी छोडनी पडेगी। जागेश्वरी—लेकिन कैलासी तो अन खेल-तमाशों के बिना एक दिन भी नहीं रह सकती। हृदयनाथ—उसकी मनोवृत्तियों को बदलना पडेगा। शनै:शैने यह विलोसोल्माद शांत होने लगा। वासना का तिरस्कार किया जाने लगा। पंडित जी संध्या समय ग्रमोफोन न बजाकर कोई धर्म-ग्रंथ सुनते। स्वाध्याय, संयम उपासना में मां-बेटी रत रहने लगीं। कैलासी को गुरू जी ने दीक्षा दी, मुहल्ले और बिरादरी की स्त्रियां आयीं, उत्सव मनाया गया। मां-बेटी अब किश्ती पर सैर करने के लिए गंगा न जातीं, बल्कि स्नान करने के लिए। मंदिरो में नित्य जातीं। दोनों एकादशी का निर्जल व्रत रखने लगीं। कैलासी को गुरूजी नित्य संध्या-समय धर्मोपदेश करते। कुछ दिनों तक तो कैलासी को यह विचार-परिर्वतन बहुत कष्टजनक मालूम हुआ, पर धर्मनिष्ठा नारियों का स्वाभाविक गुण है, थोडे ही दिनो में उसे धर्म से रूची हो गयी। अब उसे अपनी अवस्था का ज्ञान होने लगा था। विषय-वासना से चित्त आप ही आप खिंचने लगा। पति का यथार्थ आशय समझ में आने लगा था। पति ही स्त्री का सच्चा पथ प्रदर्शक और सच्चा सहायक है। पतिविहीन होना किसी घोर पाप का प्रायश्चित है। मैने पूर्व-जन्म में कोई अकर्म किया होगा। पतिदेव जीवित होते तो मै फिर माया में फंस जाती। प्रायश्चित का अवसर कहां मिलता। गुरूजी का वचन सत्य है कि परमात्मा ने तुम्हें पूर्व कर्मों के प्रायश्चित का अवसर दिया है। वैधव्य यातना नहीं है, जीवोद्धर का साधन है। मेरा उद्धार त्याग, विराग, भक्ति और उपासना से होगा। कुछ दिनों के बाद उसकी धार्मिक वृत्ति इतनी प्रबल हो गयी, कि अन्य प्राणियों से वह पृथक् रहने लगी। किसी को न छूती, महरियों से दूर रहती, सहेलियों से गले तक न मिलती, दिन में दो-दो तीन-तीन बार स्नान करती, हमेशा कोई न कोई धर्म-ग्रन्थ पढा करती। साधु–महात्माओं के सेवा-सत्कार में उसे आत्मिक सुख प्राप्त होता। जहां किसी महात्मा के आने की खबर पाती, उनके दर्शनों के लिए व्याकुल हो जाती। उनकी अमृतवाणी सुनने से जी न भरता। मन संसार से विरक्त होने लगा। तल्लीनता की अवस्था प्राप्त हो गयी। घंटो ध्यान और चिंतन में मग्न रहती। समाजिक बंधनो से घृण हो गयी। घंटो ध्यान और चिंतन में मग्न रहती। हृदय स्वाधिनता के लिए लालायित हो गया: यहां तक कि तीन ही बरसों में उसने संन्यास ग्रहण करने का निश्चय कर लिया। मां-बाप को यह समाचार ज्ञात हुआ ता होश उड गये। मां बोली—बेटी, अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है कि तुम ऐसी बातें सोचती हो। कैलाशकुमारी—माया-मोह से जितनी जल्द निवृत्ति हो जाय उतना ही अच्छा। हृदयनाथ—क्या अपने घर मे रहकर माया-मोह से मुक्त नहीं हो सकती हो? माया-मोह का स्थान मन है, घर नहीं। जागेश्वरी—कितनी बदनामी होगी। कैलाशकुमारी—अपने को भगवान् के चरणों पर अर्पण कर चुकी तो बदनामी क्या चिंता? जागेश्वरी—बेटी, तुम्हें न हो, हमको तो है। हमें तो तुम्हारा ही सहारा है। तुमने जो संन्यास लिया तो हम किस आधार पर जियेंगे? कैलाशकुमारी—परमात्मा ही सबका आधार है। किसी दूसरे प्राणी का आश्रय लेना भूल है। दूसरे दिन यह बात मुहल्ले वालों के कानों में पहुंच गयी। जब कोई अवस्था असाध्य हो जाती है तो हम उस पर व्यंग करने लगते है। ‘यह तो होना ही था, नयी बात क्या हुई, लडकियों को इस तरह स्वछंद नहीं कर दिया जाता, फूले न समाते थे कि लडकी ने कुल का नाम उज्जवल कर दिया। पुराण पढती है, उपनिषद् और वेदांत का पाठ करती है, धार्मिक समस्याओं पर ऐसी-ऐसी दलीलें करती है कि बडे-बडे विद्वानों की जबान बंद हो जाती है तो अब क्यों पछताते है?’ भद्र पुरूषों में कई दिनों तक यही आलोचना होती रही। लेकिन जैसे अपने बच्चे के दौडते-दौडते धम से गिर पडने पर हम पहले क्रोध के आवेश में उसे झिडकियां सुनाते है, इसके बाद गोद में बिठाकर आंसू पोछतें और फुसलाने का लगते हैं। उसी तरह इन भद्र पुरूषों ने व्य्रग्य के बाद इस गुत्थी के सुलझाने का उपाय सोचना शुरू किया। कई सज्जन हृदयनाथ के पास आये और सिर झुकाकर बैठ गये। विषय का आरम्भ कैसे हो? कई मिनट के बाद एक सज्जन ने कहा – सुना है डाक्टर गौड का प्रस्ताव आज बहुमत से स्वीकृत हो गया। दूसरे महाश्य बोले—यह लोग हिंदू-धर्म का सर्वनाश करके छोडेगें। कोई क्या करेगा, जब हमारे साधु-महात्मा, हिंदू-जाति के स्तंभ है, इतने पतित हो गए हैं कि भोली-भाली युवतियों को बहकाने में संकोच नहीं करते तो सर्वनाश होनें में रह ही क्या गया। हृदयनाथ—यह विपत्ति तो मेरे सिर ही पडी हुई है। आप लोगों को तो मालूम होगा। पहले महाश्य – आप ही के सिर क्यों, हम सभी के सिर पडी हुई है। दूसरे महाश्य – समस्त जाति के सिर कहिए। हृदयनाथ—उद्धार का कोई उपाय सोचिए। पहले महाश्य — अपने समझाया नहीं? हृदयनाथ — समझा के हार गया। कुछ सुनती ही नहीं। तीसरे महाश्य—पहले ही भूल हुई। उसे इस रास्ते पर उतरना ही नहीं चाहिए था। पहले महाशय — उस पर पछताने से क्या होगा? सिर पर जो पडी है, उसका उपाय सोचना चाहिए। आपने समाचार-पत्रों में देखा होगा, कुछ लोगों की सलाह है कि विधवाओं से अध्यापको का काम लेना चाहिए। यद्यपि मैं इसे भी बहुत अच्छा नहीं समझता, पर संन्यासिनी बनने से तो कहीं अच्छा है। लडकी अपनी आंखों के सामने तो रहेगी। अभिप्राय केवल यही है कि कोई ऐसा काम होना चाहिए जिसमें लडकी का मन लगें। किसी अवलम्ब के बिना मनुष्य को भटक जाने की शंका सदैव बनी रहती है। जिस घर में कोई नहीं रहता उसमें चमगादड बसेरा कर लेते हैं। दूसरे महाशय – सलाह तो अच्छी है। मुहल्ले की दस-पांच कन्याएं पढने के लिए बुला ली जाएं। उन्हे किताबें, गुडियां आदि इनाम मिलता रहे तो बडे शौक से आयेंगी। लडकी का मन तो लग जायेगा। हृदयनाथ - देखना चाहिए। भरसक समझाऊगा। ज्यों ही यह लोग विदा हुए: हृदयनाथ ने कैलाशकुमारी के सामने यह तजवीज पेश की कैलासी को सुन्यस्त के उच्च पद के सामने अध्यापिका बनना अपमानजनक जान पडता था। कहां वह महात्माओं का सत्संग, वह पर्वतो की गुफा, वह सुरम्य प्राकृतिक दृश्य व हिमराशि की ज्ञानमय ज्योति, वह मानसरावर और कैलास की शुभ्र छटा, वह आत्मदर्शन की विशाल कल्पनाएं, और कहां बालिकाओं को चिडियों की भांति पढाना। लेकिन हृदयनाथ कई दिनों तक लगातार सेवा धर्म का माहातम्य उसके हृदय पर अंकित करते रहे। सेवा ही वास्तविक संन्यास है। संन्यासी केवल अपनी मुक्ति का इच्छुक होता है, सेवा व्रतधरी अपने को परमार्थ की वेदी पर बलि दे देता है। इसका गौरव कहीं अधिक है। देखो, ऋषियों में दधीचि का जो यश है, हरिश्चंद्र की जो कीर्ति है, सेवा त्याग है, आदि। उन्होंने इस कथन की उपनिषदों और वेदमंत्रों से पुष्टि की यहां तक कि धीरे-धीरे कैलासी के विचारों में परिवर्तन होने लगा। पंडित जी ने मुहल्ले वालों की लडकियों को एकत्र किया, पाठशाला का जन्म हो गया। नाना प्रकार के चित्र और खिलौने मंगाए। पंडित जी स्वंय कैलाशकुमारी के साथ लडकियों को पढाते। कन्याएं शौक से आतीं। उन्हे यहां की पढाई खेल मालूम होता। थोडे ही दिनों में पाठशाला की धूम हो गयी, अन्य मुहल्लों की कन्याएं भी आने लगीं। कैलास कुमारी की सेवा-प्रवृत्ति दिनों-दिन तीव्र होने लगी। दिन भर लडकियों को लिए रहती: कभी पढाती, कभी उनके साथ खेलती, कभी सीना-पिरोना सिखाती। पाठशाला ने परिवार का रूप धारण कर लिया। कोई लडकी बीमार हो जाती तो तुरन्त उसके घर जाती, उसकी सेवा-सुश्रूषा करती, गाकर या कहानियां सुनाकर उसका दिल बहलाती। पाठशाला को खुले हुए साल-भर हुआ था। एक लडकी को, जिससे वह बहुत प्रेम करती थी, चेचक निकल आयी। कैलासी उसे देखने गई। मां-बाप ने बहुत मना किया, पर उसने न माना। कहा, तुरन्त लौट आऊंगी। लडकी की हालत खराब थी। कहां तो रोते-रोते तालू सूखता था, कहां कैलासी को देखते ही सारे कष्ट भाग गये। कैलासी एक घंटे तक वहां रही। लडकी बराबर उससे बातें करती रही। लेकिन जब वह चलने को उठी तो लडकी ने रोना शुरू कर दिया। कैलासी मजबूर होकर बैठ गयी। थोडी देर बाद वह फिर उठी तो फिर लडकी की यह दशा हो गयी। लडकी उसे किसी तरह छोडती ही न थी। सारा दिन गुजर गया। रात को भी लडकी ने जाने न दिया। हृदयनाथ उसे बुलाने को बार-बार आदमी भेजते, पर वह लडकी को छोडकर न जा सकती। उसे ऐसी शंका होती थी कि मैं यहां से चली और लडकी हाथ से गयी। उसकी मां विमाता थी। इससे कैलासी को उसके ममत्व पर विश्वास न होता था। इस प्रकार तीन दिनों तक वह वहां रही। आठों पहर बालिका के सिरहाने बैठी पंखा झलती रहती। बहुत थक जाती तो दीवार से पीठ टेक लेती। चौथे दिन लडकी की हालत कुछ संभलती हुई मालूम हुई तो वह अपने घर आयी। मगर अभी स्नान भी न करने पायी थी कि आदमी पहुंचा—जल्द चलिए, लडकी रो-रो कर जान दे रही है। हृदयनाथ ने कहा—कह दो, अस्पताल से कोई नर्स बुला लें। कैलसकुमारी - दादा, आप व्यर्थ में झुझलाते हैं। उस बेचारी की जान बच जाय, मैं तीन दिन नहीं, तीन महिने उसकी सेवा करने को तैयार हूं। आखिर यह देह किस काम आएगी। हृदयनाथ—तो कन्याएं कैसे पढेगी? कैलासी — दो एक दिन में वह अच्छी हो जाएगी, दाने मुरझाने लगे हैं, तब तक आप जरा इन लडकियों की देखभाल करते रहिएगा। हृदयनाथ—यह बीमारी छूत फैलाती है। कैलासी—(हंसकर) मर जाऊंगी तो आपके सिर से एक विपत्ति टल जाएगी। यह कहकर उसने उधर की राह ली। भोजन की थाली परसी रह गयी। तब हृदयनाथ ने जागेश्वरी से कहा---जान पडता है, बहुत जल्द यह पाठशाला भी बन्द करनी पडेगी। जागेश्वरी—बिना मांझी के नाव पार लगाना बहुत कठिन है। जिधर हवा पाती है, उधर बह जाती है। हृदयनाथ—जो रास्ता निकालता हूं वही कुछ दिनों के बाद किसी दलदल में फंसा देता है। अब फिर बदनामी के समान होते नजर आ रहे है। लोग कहेंगें, लडकी दूसरों के घर जाती है और कई-कई दिन पडी रहती है। क्या करूं, कह दूं, लडकियों को न पढाया करो? जागेश्वरी – इसके सिवा और हो क्या सकता है। कैलाशकुमारी दो दिन बाद लौटी तो हृदयनाथ ने पाठशाला बंद कर देने की समस्या उसके सामने रखी। कैलासी ने तीव्र स्वर से कहा—अगर आपको बदनामी का इतना भय है तो मुझे विष दे दीजिए। इसके सिवा बदनामी से बचने का और कोई उपाय नहीं है। हृदयनाथ—बेटी संसार में रहकर तो संसार की-सी करनी पडेगी। कैलासी तो कुछ मालूम भी तो हो कि संसार मुझसे क्या चाहता है। मुझमें जीव है, चेतना है, जड क्योंकर बन जाऊ। मुझसे यह नहीं हो सकता कि अपने को अभागन, दुखिया समझूं और एक टुकडा रोटी खाकर पडी रहूं। ऐसा क्यों करूं? संसार मुझे जो चाहे समझे, मै अपने को अभागिनी नहीं समझती। मै अपने आत्म-सम्मान की रक्षा आप कर सकती हूं। मैं इसे घोर अपमान समझती हूं कि पग-पग पर मुझ पर शंका की जाए, नित्य कोई चरवाहों की भांति मेरे पीछे लाठी लिए घूमता रहे कि किसी खेत में न जाने पाऊँ। यह दशा मेरे लिए असह्य हैं। यह कहकर कैलाशकुमारी वहां से चली गयी कि कहीं मुंह से अनर्गल शब्द न निकल पडें। इधर कुछ दिनों से उसे अपनी बेकसी का यर्थाथ ज्ञान होने लगा था स्त्री पुरूष की कितनी अधीन है, मानो स्त्री को विधाता ने इसलिए बनाया है कि पुरूषों के अधीन रहे। यह सोचकर वह समाज के अत्याचार पर दांत पीसने लगती थी। पाठशाला तो दूसरे दिन बन्द हो गयी, किन्तु उसी दिन कैलाशकुमारी को पुरूषों से जलन होने लगी। जिस सुख-भोग से प्रारब्ध हमें वंचित कर देता है उससे हमें द्वेष हो जाता है। गरीब आदमी इसीलिए तो अमीरों से जलता है और धन की निन्दा करता है। कैलाशी बार-बार झुंझलाति कि स्त्री क्यों पुरूष पर इतनी अवलम्बित है? पुरूष क्यों स्त्री के भाग्य का विधायक है? स्त्री क्यों नित्य पुरूषों का आश्रय चाहे, उनका मुंह ताके? इसलिए न कि स्त्रियों में अभिमान नहीं है, आत्म सम्मान नहीं है। नारी हृदय के कोमल भाव, उसे कुत्ते का दुम हिलाना मालूम होने लगे। प्रेम कैसा। यह सब ढोग है, स्त्री पुरूष के आधीन है, उसकी खुशमद न करे, सेवा न करे, तो उसका निर्वाह कैसे हो। एक दिन उसने अपने बाल गूंथे और जूडे में एक गुलाब का फूल लगा लिया। मां ने देखा तो ओठं से जीभ दबा ली। महरियों ने छाती पर हाथ रखे। इसी तरह एक दिन उसने रंगीन रेशमी साडी पहन ली। पडोसिनों में इस पर खूब आलोचनाएं हुईं। उसने एकादशी का व्रत रखना छोड दिया जो पिछले आठ वर्षों से रखती आयीं थी। कंघी और आइने को वह अब त्याज्य न समझती थी। सहालग के दिन आए। नित्य प्रति उसके द्वार पर से बरातें निकलतीं। मुहल्ले की स्त्रियां अपनी अटारियों पर खडी होकर देखती। वर के रंग रूप, आकर-प्रकार पर टिकाएं होती, जागेश्वरी से भी बिना एक आँख देखे रहा न जाता। लेकिन कैलाशकुमारी कभी भूलकर भी इन जालूसो को न देखती। कोई बरात या विवाह की बात चलाता तो वह मुहं फेर लेती। उसकी दृष्टि में वह विवाह नहीं, भोली-भाली कन्याओं का शिकार था। बरातों को वह शिकारियों के कुत्ते समझती। यह विवाह नहीं बलिदान है। तीज का व्रत आया। घरों की सफाई होने लगी। रमणियां इस व्रत को तैयारियां करने लगीं। जागेश्वरी ने भी व्रत किया। नयी-नयी साडिया मगवायीं। कैलाशकुमारी के ससुराल से इस अवसर पर कपडे, मिठाईयां और खिलौने आया करते थे। अबकी भी आए। यह विवाहिता स्त्रियों का व्रत है। इसका फल है पति का कल्याण। विधवाएं भी इस व्रत का यथेचित रीति से पालन करती है। इससे उनका सम्बन्ध शारीरिक नहीं वरन् आध्यात्मिक होता है। उसका इस जीवन के साथ अन्त नहीं होता, अनंतकाल तक जीवित रहता है। कैलाशकुमारी अब तक यह व्रत रखती आयी थी। अब उसने निश्चय किया मै व्रत न रखूंगी। मां ने तो माथा ठोंक लिया। बोली—बेटी, यह व्रत रखना धर्म है। कैलाशकुमारी - पुरष भी स्त्रियों के लिए कोई व्रत रखते हैं? जागेश्वरी — मर्दों में इसकी प्रथा नहीं है। कैलाशकुमारी—इसलिए न कि पुरूषों की जान उतनी प्यारी नही होती जितनी स्त्रियों को पुरूषों की जान? जागेश्वरी—स्त्रियां पुरूषों की बराबरी कैसे कर सकती हैं? उनका तो धर्म है अपने पुरूष की सेवा करना। कैलाशकुमारी—मै अपना धर्म नहीं समझती। मेरे लिए अपनी आत्मा की रक्षा के सिवा और कोई धर्म नहीं? जागेश्वरी—बेटी गजब हो जायेगा, दुनिया क्या कहेगी? कैलाशकुमारी – फिर वही दुनिया? अपनी आत्मा के सिवा मुझे किसी का भय नहीं। हृदयनाथ ने जागेश्वरी से यह बातें सुनीं तो चिन्ता सागर में डूब गए। इन बातों का क्या आशय? क्या आत्म-सम्मान को भाव जाग्रत हुआ है या नैरश्य की क्रूर क्रीडा है? धनहीन प्राणी को जब कष्ट-निवारण का कोई उपाय नहीं रह जाता तो वह लज्जा को त्याग देता है। निस्संदेह नैराश्य ने यह भीषण रूप धारण किया है। सामान्य दशाओं में नैराश्य अपने यथार्थ रूप मे आता है, पर गर्वशील प्राणियों में वह परिमार्जित रूप ग्रहण कर लेता है। यहां पर हृदयगत कोमल भावों को अपहरण कर लेता है—चरित्र में अस्वाभाविक विकास उत्पन्न कर देता है—मनुष्य लोक-लाज उपवासे और उपहास की ओर से उदासीन हो जाता है, नैतिक बन्धन टूट जाते है। यह नैराश्य की अतिंम अवस्था है। हृदयनाथ इन्हीं विचारों मे मग्न थे कि जागेश्वरी ने कहा – अब क्या करना होगा? जागेश्वरी—कोई उपाय है? हृदयनाथ — बस एक ही उपाय है, पर उसे जबान पर नहीं ला सकता। ******

  • बीते वक्त की बहार

    डॉ. जहान सिंह “जहान” यूं तो चलन से बाहर हूं, पर बीते वक्त की बहार हूं, यह सोचना गलत है कि मैं बेकार हूं आज भी पहली कतार में बैठा हुआ, महफिलों का श्रृंगार हूं, मैं बूढ़ा नहीं एक अनुभव साकार हूं, आज के लोगों के सिक्के सा कबाड़ नहीं, मैं सोना-चांदी, गिन्नी मोहरों का भंडार हूं, यूं तो चलन से बाहर हूं, बचपन में उंगली पकड़कर चले थे तुम, थामे रहो यह हाथ आज भी, तिनका ही सही पर डूबने वालों का सहारा हूं, यूं तो चलन से बाहर हूं, पर बीते वक्त की बहार हूं। *****

  • मेरी ताकत

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव एक छोटे कसबे में रहने वाले दस वर्षीय बालक को जूडो सीखने का बहुत शौक था। परंतु बचपन में हुई एक दुर्घटना में बायाँ हाथ कट जाने के कारण उसके माता-पिता उसे जूडो सीखने की आज्ञा नहीं देते थे। अब वो बड़ा हो रहा था और उसकी जिद्द भी बढ़ती जा रही थी। अंततः माता-पिता को झुकना ही पड़ा और वो बालक को नजदीकी शहर के एक मशहूर मार्शल आर्ट्स गुरु के यहाँ दाखिला दिलाने ले गए। गुरु ने जब बालक को देखा तो उन्हें अचरज हुआ कि बिना बाएँ हाथ का यह बालक भला जूडो क्यों सीखना चाहता है? उन्होंने पूछा, “तुम्हारा तो बायाँ हाथ ही नहीं है तो भला तुम दूसरे बालकों का मुकाबला कैसे करोगे।” “ये बताना तो आपका काम है” बालक ने कहा। मैं तो बस इतना जानता हूँ कि मुझे सभी को हराना है और एक दिन खुद मास्टर बनना है। गुरु उसकी सीखने की दृढ इच्छा शक्ति से काफी प्रभावित हुए और बोले, “ठीक है मैं तुम्हें सिखाऊंगा लेकिन एक शर्त है, तुम मेरे प्रत्येक निर्देश का पालन करोगे और उसमें दृढ विश्वास रखोगे।” बालक ने सहमती में गुरु के समक्ष अपना सर झुका दिया। गुरु ने एक साथ लगभग पचास छात्रों को जूडो सिखना शुरू किया। बालक भी अन्य बालकों की तरह सीख रहा था। पर कुछ दिनों बाद उसने ध्यान दिया कि गुरु जी अन्य बालकों को अलग-अलग दांव-पेंच सिखा रहे हैं, लेकिन वह अभी भी उसी एक किक का अभ्यास कर रहा है जो उसने शुरू में सीखी थी। उससे रहा नहीं गया और उसने गुरु से पूछा, “गुरु जी आप अन्य बालकों को नए-नए दांवपेच सिखा रहे हैं, पर मैं अभी भी बस वही एक किक मारने का अभ्यास कर रहा हूँ। क्या मुझे और चीजें नहीं सीखनी चाहियें?” गुरु जी बोले, “तुम्हें बस इसी एक किक पर महारथ हांसिल करने की आवश्यकता है।” और वो आगे बढ़ गए। बालक को विस्मय हुआ पर उसे अपने गुरु में पूर्ण विश्वास था और वह फिर अभ्यास में जुट गया। समय बीतता गया और देखते-देखते दो साल गुजर गए, पर बालक उसी एक किक का अभ्यास कर रहा था। एक बार फिर बालक को चिंता होने लगी और उसने गुरु से कहा, “क्या अभी भी मैं बस यही करता रहूँगा और बाकी सभी नयी तकनीकों में पारंगत होते रहेंगे।” गुरु जी बोले, “तुम्हें मुझ में यकीन है तो अभ्यास जारी रखो।” बालक ने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए बिना कोई प्रश्न पूछे अगले 6 साल तक उसी एक किक का अभ्यास जारी रखा। सभी को जूडो सीखते आठ साल हो चुके थे कि तभी एक दिन गुरु जी ने सभी शिष्यों को बुलाया और बोले “मुझे आपको जो ज्ञान देना था वो मैं दे चुका हूँ और अब गुरुकुल की परंपरा के अनुसार सबसे अच्छे शिष्य का चुनाव एक प्रतिस्पर्धा के माध्यम से किया जायेगा और इसमें विजयी होने वाले शिष्य को “सर्वोत्तम” की उपाधि से सम्मानित किया जाएगा।” प्रतिस्पर्धा आरम्भ हुई। गुरु जी ने बालक को उसके पहले मैच में हिस्सा लेने के लिए आवाज़ दी। बालक ने लड़ना शुरू किया और खुद को आश्चर्य चकित करते हुए उसने अपने पहले दो मैच बड़ी आसानी से जीत लिए। तीसरा मैच थोडा कठिन था, लेकिन कुछ संघर्ष के बाद विरोधी ने कुछ क्षणों के लिए अपना ध्यान उस पर से हटा दिया, बालक को तो मानो इसी मौके का इंतज़ार था, उसने अपनी अचूक किक विरोधी के ऊपर जमा दी और मैच अपने नाम कर लिया। इस बार विरोधी कहीं अधिक ताकतवर, अनुभवी और विशाल था। देखकर ऐसा लगता था कि बालक उसके सामने एक मिनट भी टिक नहीं पायेगा। मैच शुरू हुआ, विरोधी बालक पर भारी पड़ रहा था, रेफरी ने मैच रोक कर विरोधी को विजेता घोषित करने का प्रस्ताव रखा, लेकिन तभी गुरु जी ने उसे रोकते हुए कहा, “नहीं, मैच पूरा चलेगा।” मैच फिर से शुरू हुआ। विरोधी अति आत्मविश्वास से भरा हुआ था और अब बालक को कम आंक रहा था। इसी दंभ में उसने एक भारी गलती कर दी, उसने अपना गार्ड छोड़ दिया। बालक ने इसका फायदा उठाते हुए आठ साल तक जिस किक की प्रैक्टिस की थी उसे पूरी ताकत और सटीकता के साथ विरोधी के ऊपर जड़ दिया और उसे ज़मीन पर धराशाई कर दिया। उस किक में इतनी शक्ति थी कि विरोधी वहीं मूर्छित हो गया और बालक को विजेता घोषित कर दिया गया। मैच जीतने के बाद बालक ने गुरु से पूछा, “भला मैंने यह प्रतियोगिता सिर्फ एक मूव सीख कर कैसे जीत ली?” “तुम दो वजहों से जीते,” गुरु जी ने उत्तर दिया। “पहला, तुम ने जूडो की एक सबसे कठिन किक पर अपनी इतनी दक्षता हासिल कर ली कि शायद ही इस दुनिया में कोई और यह किक इतनी निपुणता से मार पाए, और दूसरा कि इस किक से बचने का एक ही उपाय है, और वह है विरोधी के बाएँ हाथ को पकड़कर उसे ज़मीन पर पटकना।” बालक समझ चुका था कि आज उसकी सबसे बड़ी कमजोरी ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बन चुकी थी। सार - जिसके अन्दर अपने सपनें को साकार करने की दृढ इच्छा होती है भगवान उसकी मदद के लिए कोई न कोई गुरु भेज देता है, ऐसा गुरु जो उसकी सबसे बड़ी कमजोरी को ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बना कर उसके सपनें को साकार कर सकता है। ******

  • दंड का अधिकारी

    मुकेश ‘नादान’ नरेंद्र की प्रारंभिक शिक्षा घर पर रहते हुए ही एक निजी अध्यापक के दूबारा शुरू हुई। कुछ समय बाद उनका दाखिला मेट्रोपोलिटन इंस्टीट्यूट' में करवा दिया गया। इस स्कूल में आकर भी नरेंद्र की चंचलता में कोई कमी न आई। वह पहले की तरह ही उद्‌डं, निर्भीक और चंचल बना रहा। एक दिन एक अध्यापक कक्षा में पढ़ा रहे थे और नरेंद्र अपने कुछ साथियों के साथ गप्पें लड़ा रहा था। यह देखकर अध्यापक को क्रोध आ गया। उन्होंने नरेंद्र की टोली में से एक-एक छात्र को खड़ा करके उसी विषय का प्रश्न पूछा, जो वे पढ़ा रहे थे। सभी छात्रों का ध्यान तो नरेंद्र की बातों की ओर था, फिर भला वे अध्यापक के प्रश्न का उत्तर कैसे दे पाते। सबसे बाद में अध्यापक ने नरेंद्र को खड़ा करके उससे भी वही प्रश्न पूछा। नरेंद्र ने बिना किसी हिचकिचाहट के अध्यापक के प्रश्न का सही-सही उत्तर दे दिया। अध्यापक नरेंद्र का सही उत्तर पाकर बड़े प्रसन्‍न हुए। उन्होंने उसे बैठने का आदेश दिया। अध्यापक द्वारा बैठने के लिए कहने पर भी नरेंद्र नीचे न बैठा तो अध्यापक बोले, “नरेंद्र, तुम्हारा उत्तर बिलकुल ठीक है। मैंने तुम्हें बैठने के लिए कहा है, खड़ा होकर दंड पाने के लिए नहीं।” “सर, मेरा उत्तर ठीक है, यह तो मैं भी जानता हूँ, किंतु फिर भी मैं दंड पाने का अधिकारी हूँ।” नरेंद्र ने गंभीरता से कहा। “क्यों? ” नरेंद्र की बात सुनकर अध्यापक ने हैरानी से पूछा। “क्योंकि सर, गप्पें तो मैं ही सुना रहा था। शेष सब तो सुन ही रहे थे।” नरेंद्र की बात सुनकर अध्यापक को बड़ा आश्चर्य हुआ। वे उसकी निर्भीकता और सत्यवादिता से बड़े प्रसन्‍न हुए। उसके पास आकर पीठ थपथपाते हुए बोले, “नरेंद्र, तुम्हारे बारे में मैं आज भविष्यवाणी करता हूँ कि तुम एक दिन निश्चय ही भारत के महान्‌ व्यक्ति बनोगे।" अध्यापक की भविष्यवाणी का नरेंद्र पर यह प्रभाव पड़ा कि इसके बाद नरेंद्र ने स्कूल में शरारत करना छोड़ दिया। अब उन्हें अपने उत्तरदायित्व का बोध हो गया था। वे इस बात के लिए गंभीर हो गए थे कि उसकी उद्‌डंताओं के कारण कोई यह न कह दे कि यही वह उद्‌डीं छात्र है, जिसके महान्‌ होने की अध्यापक ने भविष्यवाणी की है। ******

  • लौट जाते हैं, अब

    सविता पाटील चल, लौट जाते हैं अब चलते-चलते दूर तक निकल आए हैं अब! पलटकर देखूं तो, नज़र में कोई नहीं है, या तो मैं नहीं हूं किसी की… या कोई मेरी हद में नहीं है! किसी की आवाज़ भी… मुझ तक पहुंचती नहीं, और मेरी पुकार पलटती है मुझ पर! चल, लौट जाते हैं अब! *****

  • बैल की पूँछ

    डॉ. कृष्ण कांत श्रीवास्तव एक बार एक नौजवान आदमी एक किसान की बेटी से शादी की इच्छा लेकर उसके पास गया। किसान ने उसकी ओर देखा और कहा, “युवक, खेत में जाओ। मैं एक-एक करके तीन बैल छोड़ने वाला हूँ। अगर तुम तीनों बैलों में से किसी भी एक बैल की पूँछ पकड़ लो तो मैं अपनी बेटी की शादी ख़ुशी-ख़ुशी तुमसे कर दूंगा।” नौजवान खेत में बैल की पूँछ पकड़ने की तीव्र इच्छा लेकर खड़ा हो गया। उसके बाद किसान ने अपने घर का दरवाजा खोला और एक बहुत ही बड़ा और खतरनाक बैल उस घर से निकला। नौजवान ने ऐसा बैल पहले कभी नहीं देखा था। बैल से डर कर नौजवान ने निर्णय लिया कि वह अगले बैल का इंतज़ार करेगा और वह एक तरफ हो गया जिससे बैल उसके पास से होकर निकल जाए। घर का दरवाजा फिर खुला। आश्चर्यजनक रूप से इस बार पहले से भी बड़ा और भयंकर बैल निकला। नौजवान ने सोचा कि इससे तो पहला वाला बैल ही ठीक था। बेकार में मैंने एक अच्छा अवसर गवां दिया। फिर उसने एक ओर होकर बैल को निकल जाने दिया। उसके बाद तीसरी औऱ आख़री बार दरवाजा खुला। नौजवान के चेहरे पर मुस्कान आ गई। इस बार उसमें से एक छोटा और मरियल सा बैल निकला। जैसे ही बैल नौजवान के पास नज़दीक आने लगा, नौजवान ने उसकी पूँछ पकड़ने के लिए मुद्रा बना ली ताकि उसकी पूँछ सही समय पर पकड़ ले। पर उस बैल की पूँछ थी ही नहीं.........!! नौजवान निराश हो गया और वह किसान को दिया गया अपना वचन भी हार गया। जिन्दगी अवसरों से भरी हुई है। कुछ सरल हैं तो कुछ कठिन, पर अगर हमनें एक बार अच्छा अवसर गवां दिया तो फिर शायद वह अवसर जीवन में दुबारा नहीं मिलेगा। अतः हमेशा प्रथम अवसर को ही अंतिम अवसर मानकर उसे हासिल करने का प्रयास करना समझदारी है। ******

  • सच्चा आईना

    अंजलि मोल भाव इश्क में क्या करते हो जानां नाज़ुक सा दिल मेरा कोई बाजार नहीं है। मरमर से बदन पे, फिसले हैं निगाहें दिल ए बर्बाद का अब कोई खरीदार नहीं है। ख्वाब सा चमका था कभी नीम स्याह आंखों में अब है खिज्र का आलम, गुल ऐ बहार नहीं है बिकते हैं नकली चेहरे मुँहमाँगी कीमतों पर अब सच्चे आईनों के तलबगार नहीं हैं। ******

  • पनिहारिन की सीख

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव एक साधु किसी नदी के पनघट पर गया और पानी पीकर पत्थर पर सिर रखकर सो गया। पनघट पर पनिहारिन आती-जाती रहती हैं। तो एक ने कहा - "आहा! साधु हो गया, फिर भी तकिए का मोह नहीं गया। पत्थर का ही सही, लेकिन रखा तो है।" पनिहारिन की बात साधु ने सुन ली। उसने तुरंत पत्थर फेंक दिया। दूसरी बोली-- "साधु हुआ, लेकिन खीज नहीं गई। अभी रोष नहीं गया, तकिया फेंक दिया।" तब साधु सोचने लगा, अब वह क्या करें? तब तीसरी बोली- "बाबा! यह तो पनघट है, यहां तो हमारी जैसी पनिहारिनें आती ही रहेंगी, बोलती ही रहेंगी, उनके कहने पर तुम बार-बार परिवर्तन करोगे तो साधना कब करोगे?" लेकिन चौथी ने बहुत ही सुन्दर और एक बड़ी अद्भुत बात कह दी - "क्षमा करना, लेकिन हमको लगता है, तुमने सब कुछ छोड़ा लेकिन अपना चित्त नहीं छोड़ा है, अभी तक वहीं का वहीं बने हुए है। दुनिया पाखण्डी कहे तो कहे, तुम जैसे भी हो, हरिनाम लेते रहो।" सच तो यही है, दुनिया का तो काम ही है कहना। आंखे बंद करोगे तो कहेंगे कि "ध्यान का नाटक कर रहा है।" चारो ओर देखोगे तो कहेंगे कि "निगाह का ठिकाना नहीं। निगाह घूमती ही रहती है।" और परेशान होकर आंख फोड़ लोगे तो यही दुनिया कहेगी कि "किया हुआ भोगना ही पड़ता है।" ईश्वर को राजी करना आसान है, लेकिन संसार को राजी करना असंभव है। दुनिया क्या कहेगी, उस पर ध्यान दोगे तो आप अपने लक्ष्य पर ध्यान नहीं लगा पाओगे दुनिया का तो काम हैं व्यंग्य करना, इसलिए अच्छे कर्म करते रहिए, भगवान का नाम लेते रहिए। क्या कहेगी दुनिया ये सोच के अपना आप खराब न करिए। *****

  • बरगद का पेड़

    अनजान मैं उस हरकारे के बच्चों को भी उसी समय से देख रहा था जिस समय से मैं उस बरगद के पेड़ को देखा करता था पेड़ के आसपास और भी लत्तरें थींl पेड़ की फुनगियों के बीच से कई कोंपलें फूटीं और पेड़ की कोपलों ने धीरे-धीरे बड़ा होना शुरू कियाl हरकारे के चार बच्चे थेंl हरकारे के बच्चे जमींदारों के यहाँ काम करते थें मैं देख रहा था पेड़ को और उसके साथ खिले कोंपलों को बढ़तेl हरकारे के बच्चों और पेंड़ को मैनें इंच-इंच बढ़ते देखा .. इस बीच पेड़ के आसपास का समय भी बीतता रहाl कोंपलें भी धीरे-धीरे लत्तरों में बदलीं फिर लतरें तना बन गईं..! और, पेड़ के आस-पास खड़े हो गये वो पेंड़ के रक्षार्थ..! साथ-साथ जन्मी और भी कोंपलें पहले लत्तर बनीं फिर तना और फिर हरकारे के बच्चों की तरह वो भी फैल गईं अनंत दिशाओं में ..! लत्तरों ने बारिश झेला, धूप भी लत्तरें, ठिठुरती रहीं ठंड में तब भी साथ-साथ थींl सुख-दु:ख साथ-साथ महसूसा! लत्तरों ने वसंत देखा पतझड़ भी! बड़े होने के बाद हरकारे के बच्चों ने कभी नहीं पूछा अपने सगे भाइयों से उनका हाल ! भाईयों ने फिर कभी आँगन में साथ बैठकर घूप या गर्मी पर बात नहीं की .. समय बीतता रहा ऋतुएँ, बदलती रहीं लेकिन, हरकारे के लड़के दु:ख भी अकेले पी गये ..दु:ख भी नहीं बाँटा किसी से ..! सालों से कभी साथ बैठकर किसी समस्या का सामाधान वो खोज नहीं पायेl फिर, साथ बैठकर कभी नहीं देख पाये भोर होने के बाद ओस में नहाई हुई फसल! या सुबह की कोई उजास .. पता नहीं कितने साल बीत गयेl जब गाँव में काम मिलना बँद हो गया फिर, वो कहीं कमाने चले गये दिल्ली या पँजाब .. बूढ़ा हरकारा जब मरा तो दाह संस्कार भी गाँव के लोगों ने किया! हरकारे के लड़कों ने फिर कभी पलटकर नहीं देखा गाँव! हरकारे की मौत से दु:खी होकर बूढ़ा होता मकान भी एक दिन ढह कर गिर गयाl लेकिन, तब भी हरकारे के लड़के नहीं लौटे .. ! लेकिन, बूढ़े पेंड़ की हिफाजत में आज भी खड़े थें युवा पेंड़..! पेंड़ अब अपनी दहलीज की झिलंगी खाट पर पड़ा रहताl बूढ़ा, पेंड चिलम भरकर पीता .. और, शेखी बघारता गाँव में कि उसकी डयोढ़ी ..बहुत मजबूत हैं ..! और कि, वो युवा पेंड़ों की हिफाजत में है ..! तब से आदमी भी पेंड़ होना चाहता है! *********

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