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  • ऊँचे घर की बहू

    कमलेश कुमार निधि हमेशा अपनी क्लास में फर्स्ट आती जिसे देखकर उसके माता-पिता खुशी से फूले नहीं समाते। उसके पिता तो पूरे मुहल्ले में मिठाई बँटवाते। उनका सपना उसे ऊँचे पद पर देखना था और निधि उनकी चाहतों पर खरी उतरी भी। लेकिन विनय के घरवालों को उसका जॉब करना पसंद नहीं था। अतः उन्होंने यह कहकर कि उनके घर की बहुएं नौकरी नहीं करतीं उसके पंख काट दिये। वह विरोध करना चाहती थी पर उसे तो पता ही नहीं चला कि कब उसके पिता ने विनय के पिता को यह वचन दे दिया कि निधि नौकरी नहीं करेगी। इस शर्त के साथ विवाह संपन्न हो गया और उस वेदी में उसके उन्मुक्त आकाश में पंख पसार कर उड़ने के सपने भी खाक हो गये। उसके ससुराल वाले हमेशा उसे जली- कटी सुनाते रहते। सास तो रात-दिन यही कहती तुम्हारे बस का कुछ नहीं है, तुमसे कोई काम ढंग से होता ही नहीं। न जाने क्या करती रहीं मायके में.. अरे.. कोई लच्छन तो सीखा होता। अब वह कैसे बताये कि उसकी योग्यता को तो उनके पति के वचन निगल गये और पिता ने अपनी बेटी को ऊँचे घर की बहू बनाने के सपने की भेंट चढ़ा दिया, पर हर चीज़ की लिमिट होती है। वह यह सुन-सुन कर थक गई तो अपने आपको उनके सामने प्रूव करने की चाह मन में उपजने लगी और उसने एक स्कूल में संपर्क किया जहाँ उसके सर्टिफिकेट देखकर ही तुरंत ही उसको जॉब मिल गई। जब निधि ने घर आकर यह बताया तो सभी उसका मजाक बनाने लगे.. शक्ल देखी है अपनी.. पढ़ाने के लिए बहुत योग्यता की जरूरत होती है, खेल नहीं है टीचर बनना। अरे जाने दो न मांजी.. चार दिन बाद ही स्कूल वाले घर का रास्ता दिखा देंगे तब अपनी औकात अपने आप समझ में आ जायेगी। निधि पढ़ाने लगी और पढ़ाने का तरीका बहुत अच्छा था वह दिनोंदिन बच्चों की पहली पसंद बनती जा रही थी। जिसे देखो वही निधि मैम के गुण गाता। उसकी यह प्रसिद्धि उसके घरवालों के कानों तक भी पहुँचने लगी थी। आज उसे "बेस्ट टीचर" का अवार्ड मिलने जा रहा था। जिसके लिए स्कूल की तरफ से उसके पूरे परिवार को आमंत्रित किया गया था। जब उसकी सास ने यह देखा तो उनकी छाती पर सांप लोटने लगे। उन्होंने क्या समझा था, उसे और उनकी इसी जलन ने उसे कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया। *********

  • सूरज का सातवां घोड़ा

    धर्मवीर भारती इसके पहले कि मैं आपके सामने माणिक मुल्ला की अद्भुत निष्कर्षवादी प्रेम कहानियों के रूप में लिखा गया यह ‘सूरज का सातवां घोड़ा’नामक उपन्यास प्रस्तुत करूं, यह अच्छा होगा कि पहले आप जान लें कि माणिक मुल्ला कौन थे, यह हम लोगों को कहाँ मिले, कैसे उनकी प्रेम कहानी हम लोगों के सामने आई, प्रेम के विषय में उनकी धारणायें और अनुभव क्या थे तथा कहानी की टेक्निक के बारे में उनकी मौलिक उदभावनायें क्या थी। ‘थीं’का प्रयोग मैं इसलिए कर रहा हूँ कि मुझे यह नहीं मालूम कि आजकल कहाँ है? क्या कर रहे हैं? अब कभी उनसे मुलाकात होगी या नहीं और अगर सच में वे लापता हो गए हैं, तो कहीं उनके साथ उनकी अद्भुत कहानियाँ भी लापता हो ना जाये, इसलिए मैं आपके सामने पेश कर देता हूँ। एक जमाना था, जब वे हमारे मोहल्ले की मशहूर व्यक्ति थे। वहीँ पैदा हुए, वहीं बड़े हुए, वहीं शोहरत पाई और वहीं से लापता हो गये। हमारा मोहल्ला काफी बड़ा है, कई हिस्सों में बटा हुआ है और वे उस हिस्से के निवासी थे, जो सबसे ज्यादा रंगीन और रहस्यमय है और जिनकी नई और पुरानी पीढ़ी दोनों के बारे में अजब-गजब सी किवंदतियाँ मशहूर है। मुल्ला उनका उपनाम नहीं, जाति थी। कश्मीरी थे। कई पुश्तों से उनका परिवार यहाँ बसा हुआ था। वह अपने भाई और भाभी के साथ रहते थे। भाई और भाभी का तबादला हो गया था और वह पूरे घर में अकेले रहते थे। इतनी सांस्कृतिक स्वाधीनता तथा इतना कम्युनिस्ट एक साथ उनके घर में थी कि यद्यपि हम लोग उनके घर से बहुत दूर रहते थे लेकिन वही सब का अड्डा जमा रहता था। हम सब उन्हें गुरुवत मानते थे और उनका भी हम सबों पर निश्छल प्रेम था। वे नौकरी करते हैं या पढ़ते हैं, नौकरी करते हैं तो कहाँ, पढ़ते हैं तो कहाँ – यह भी हम लोग कभी नहीं जान पाये। उनके कमरे में किताबों का नामो-निशान भी नहीं था। हाँ कुछ अजब-गजब चीजें वहाँ थीं, जो अमूमन दूसरे लोगों के कमरे में नहीं पाई जाती। मसलन दीवार पर एक पुराने काले फ्रेम में एक फोटो जड़ा टंगा था। ‘खाओ बदन बनाओ’एक तख़्त में एक काली बेंट का बड़ा सुंदर चाकू रखा था। एक कोने में घोड़े की पुरानी नाल पड़ी थी और इसी तरह की कितनी ही अजीबोगरीब चीजें थीं, जिनका औचित्य हम लोग कभी नहीं समझ पाते थे। इनके साथ ही साथ हमें ज्यादा दिलचस्पी जिस बात में थी, वह यह थी कि जाड़ों में मूंगफलियाँ और गर्मियों में खरबूजे हमेशा मौजूद रहते थे और उनका स्वभाविक परिणाम था कि हम लोग भी हमेशा मौजूद रहते थे। अगर कभी फुर्सत हो, पूरा घर अपने अधिकार में हो, चार मित्र बैठे हो, तो निश्चित है कि घूम फिर कर वार्ता राजनीति पर आ टिकेगी और जब राजनीति में दिलचस्पी खत्म होने लगेगी, तो गोष्ठी की वार्ता प्रेम पर आ टिकेगी। कम से कम मध्यम वर्ग में तो इन दो विषयों के अलावा तीसरा विषय नहीं होता। माणिक मुल्ला का दखल जितना राजनीति में था उतना ही प्रेम में भी था। लेकिन जहाँ तक साहित्यिक वार्ता का प्रश्न था, वे प्रेम को तरजीह दिया करते थे। प्रेम के विषय में बात करते समय वे कभी-कभी कहावतों को अजब रूप में पेश किया करते थे और उनमें से ना जाने क्यों एक कहावत अभी तक मेरे दिमाग में चस्पा है। हालांकि उसका सही मतलब ना मैं तब समझा था ना अब। अक्सर प्रेम के विषय में अपने कड़वे मीठे अनुभवों से हम लोगों का ज्ञान वर्धन करने के बाद खरबूजा काटते हुए कहते थे – ‘प्यारे बंधुओ! कहावत में चाहे जो कुछ हो, प्रेम में खरबूजा चाहे चाकू पर गिरे या चाकू खरबूजे पर, नुकसान हमेशा चाकू का होता है। अतः जिसका व्यक्तित्व चाकू की तरह ना हो, उसे हर हालत में उस उलझन से बचना चाहिए।’ ऐसी कहावतें थीं, याद आने पर मैं लिखूंगा। लेकिन जहाँ तक कहानियों का प्रश्न था, उनकी निश्चित धारणा थी कि कहानियों की तमाम नस्लों में प्रेम कहानियाँ ही सबसे सफल साबित होती है। अतः कहानी में रोमांस का अंश जरूर होना चाहिए। लेकिन साथ ही हमें अपनी दृष्टि संकुचित नहीं कर लेनी चाहिए और कुछ ऐसा चमत्कार करना चाहिए कि वह समाज के लिए कल्याणकारी अवश्य हो। जब हम पूछते थे कि यह कैसे संभव है कि कहानियाँ प्रेम पर लिखी जाये, पर उनका प्रभाव कल्याणकारी हो। तब यह कहते थे कि यही तो चमत्कार है तुम्हारे माणिक मुल्ला, में जो अन्य किसी कहानीकार में है ही नहीं।

  • मैं कहानी हूं।

    डॉ. जहान सिंह “जहान” मैं कहानी हूं। और कहां नहीं हूं मैं? इसलिए कहानी हूं मैं। अनंत जगत की प्रथम नारी, प्रथम नर के प्रथम प्रेम से भाव प्रधान, शब्दविहीन उत्पन्न एक संस्कार हूं मैं। मेरा पहला रस श्रृंगार रस है। प्रेम के पालने में युगों-युगों तक निशचेतन स्वरूप, बंजारों सा जीवन, अनगिनत दिन-रातों का सफर, ध्वनि और संकेत ही मेरी जीवन वायु थी। मेरा पालना बदलता रहा, गोद बदलती रही। बचपन में भाषा से असमर्थ थी। हजारों हजार साल गूंगी रही। अपनी खुशी, दुख दर्द, ध्वनि और संकेतों द्वारा ही प्रसारित करती रही। मैं मां की लोरी, बाबा का पंचतंत्र, दादी की कथा, भाभी के गीत, शायर की गजल, कवि की कविता, नृत्यांगना की ठुमरी दादरा बनी। यह सब मेरे स्वरूप हैं। मेरे ही पहर हैं। मेरा परिवार बहुत बड़ा था। एक ही छत के नीचे रहते थे। शब्दों और व्याकरण के रण क्षेत्र ने मेरा परिवार बिखरा दिया। एक दूसरे से अलग हो गए। सबने अपने-अपने घर बसाये, नये शहर ढूंढे और बिछड़ गए। मैं बूढ़ी हो गई पर अपना घर न त्याग सकी। अकेली रह गई। लोगों ने भुलाने की बहुत कोशिश की, पर मेरा वजूद कोई मिटा ना सका। मैं भटकती रही और मुझे हजारों हजार साल कोई स्थाई जगह नहीं मिली। “जुबान से बोली गई कानों से सुनी गई कुछ याद रही कुछ भूल गई।” इंसान के सामने हजारों परेशानियां, प्रयास, खोज और विकास का खुला रास्ता, उत्साह, सफल-असफल प्रयोग। पर इस दौड़ में भी उसके साथ रही। फिर नया युग आया, पूर्ण भाषा विकसित हुई, कागज, रोशनाई, छापाखाना और फिर मिल गया मुझे मेरा घर। “किताब जो अब मेरा स्थाई पता है।” इस सब में श्रुति साधना का बड़ा योगदान है। मैं आभारी हूं। मुझे इस तरह जीवित रखा गया। रचयिता का मान, पाठक का सम्मान, समाज का ज्ञान, हर घर और पुस्तकालय की शान हूं मैं। मैं कहानी हूं। बच्चों का कौतूहल, युवा की शिक्षा, बुढ़ापे की साथी और जीने की आस मैं, उपवन का सौंदर्य, दरिया की रवानी, पहाड़ों का दृढ़ संकल्प, रेगिस्तान में कैक्टस का फूल, सागर की लहरों का संगीत, चांद की खूबसूरती, तारों की बारात, प्रभात की पहली किरण, पक्षियों का कलरव, हिरण की कुलाच, शेर की दहाड़, मां की कोख में क्रीडा करता बच्चा, पिता के हाथ में कुदाल, मेले की भीड़ में बेहाल, नारी की शर्म और नर का भ्रम हूं। लेखक जुबानी रोज गढी और सजोई जाती हूं। पल-पल भुलाई जाती हूं। दिन-रात सुनाई जाती हूं। संसार का रचयिता भी मेरी गोद में पला है। दुनिया के हर सिंगार में बसी हूं। जी हां मैं कहानी हूं। “कहने को अगर मैं ना हूं। तो यह ‘जहान’ बेजुबान हो जाए। कुछ पलों में ध्वनि और संकेतों का पाषाण युग हो जाए।” ******

  • अपनों की यादें

    विजय शंकर प्रसाद. अंतरंग साँस से प्रेरित है जीवन, बेकाबू हालात से पस्त हो सहा। मौत के तुल्य है तलब ज़हर, कहीं तेरा आईना तक है तंहा। एकतरफा इश्क का खेल तो निराला, पानी-पानी हो व्यतीत बेपानी हर लम्हा। शबनम का हरी घास पर परीक्षा, सूरज की तपिश ने कुछ औरों कहा। यक्ष दिखा नहीं तो मत दो दीक्षा, धर्मराज और यमराज पर एतबार ढहा। रिश्तों की होने लगी आज़ समीक्षा, ख़्वाब हमेशा तो है न लहा। खौफ़ में कुत्तों द्वारा नाहक़ भीक्षा, हवा संग तू तो मैं भी बहा। गर्म चाय मतलब इर्द-गिर्द ही धुआँ, धूल से भिक्षुक गया है नहा। पनिहारिन हेतु नहीं कहीं सही कुआँ, मृगतृष्णा में दुविधा कि क्या हाँ? गिलहरी को याद सामर्थ्य की सीमा, बिल्ली से हटकर अलग है चूहा नन्हा। अपनों की यादें दिल तक अटूट है, उधारी या दान वरदान देशहित में कहाँ? पत्थर का शहर में चकाचौंध है रब, तभी तो छँटा नहीं तम आख़िर यहाँ। ******

  • खुबसूरती का घमंड

    अंजना ठाकुर रश्मि को अपनी सुन्दरता पर बहुत घमंड था। इस वजह से वो अपनी छोटी बहन नूपुर को कभी भी अपने साथ कही नही ले जाती। रश्मि और नूपुर में दो साल का अंतर था। जहां रश्मि बला की खूबसूरत थी वहीं नूपुर दिखने में साधारण। जब भी दोनों बहनें साथ कही जाती तो रश्मि को तारीफ मिलती और नूपुर को ताने, कि ये तो इस घर की लगती ही नही। नूपुर फिर भी अपनी बहन को बहुत प्यार करती। पर रश्मि को अपने घमंड में उसका प्यार भी नही दिखता। नूपुर पढ़ाई के साथ घर के काम में भी मां का हाथ बता देती। धीरे-धीरे नूपुर हर काम में होशियार हो गई और संस्कारी तो बचपन से ही थी। मां रश्मि को कई बार समझाती, बेटा इतना घमंड अच्छा नही। खूबसूरती के साथ संस्कार भी जरूरी हैं। कल को पराए घर जाओगी ऐसे कोई पसंद नही करेगा। रश्मि बोलती मां मेरे लिए तो लाइन लग जाएगी रिश्तों की तुम नूपुर की चिंता करो। एक दिन एक ऊंचे परिवार का रिश्ता आया। लड़का भी बहुत सुंदर था। रश्मि के पांव तो जमीन पर नही पड़ रहे थे। लड़के वाले आए। नूपुर ने बहुत तैयारी करी और सबको सर्व भी कर रही थी। सब उसके संस्कार देख बहुत प्रभावित थे। गलती से नूपुर के हाथ से चटनी रश्मि के उपर गिर गई। रश्मि गुस्से में भूल गई कि सब बैठे हैं। अपनी आदत के अनुसार नूपुर को जलील करने लगी। ये सब देख लड़के वालों ने अपना इरादा बदल नूपुर का हाथ मांग लिया। लड़के को भी नूपुर पसंद थी। रश्मि की मां बोली पर रिश्ता तो रश्मि के लिए था। लड़के वालों ने कहा हमें लड़की बहुत सुंदर भले न हो परन्तु संस्कारी चाहिए। मां इतना अच्छा रिश्ता हाथ से नही जाने देना चाहती थी, तो उन्होंने हां कर दी। रश्मि का घमंड टूट चुका था। उसे समझ आ गया खूबसूरती ही सब कुछ नही होती। ********

  • औलाद

    डॉ हेमा गार्गी गार्डन में लैपटॉप लिए एक लड़के से बुजुर्ग दम्पति ने कहा- "बेटा हमें फेसबुक का अकाउंट बना दो।" लड़के ने कहा- "लाइये अभी बना देता हूँ, कहिये किस नाम से बनाऊँ?" बुजुर्ग ने कहा- "लड़की के नाम से कोई भी अच्छा सा नाम रख लो।" लड़का ने अचम्भे से पूछा- "फेक अकाउंट क्यों?" बुजुर्ग ने कहा- "बेटा, पहले बना तो दो फिर बताता हूँ, क्यों?" बड़ो का मान करना उस लड़के ने सीखा था तो उसने अकाउंट बना ही दिया। अब उसने पूछा- "अंकल जी, प्रोफाइल इमेज क्या रखूँ?" तो बुजुर्ग ने कहा- "कोई भी हीरोइन जो आजकल के बच्चों को अच्छी लगती हो।" उस लड़के ने गूगल से इमेज सर्च करके डाल दी, फेसबुक अकाउंट ओपन हो गया। फिर बुजुर्ग ने कहा- "बेटा कुछ अच्छे लोगो को ऐड कर दो।" लड़के ने कुछ अच्छे लोगो को रिक्वेस्ट सेंड कर दी। फिर बुजुर्ग ने अपने बेटे का नाम सर्च करवा के रिक्वेस्ट सेंड करवा दी। . लड़का जो वो कहते करता गया जब काम पूरा हो गया तो उसने कहा, "अंकल जी अब तो आप बता दीजिये आपने ये फेक अकाउंट क्यों बनवाया?" बुजुर्ग की आँखे नम हो गयी, उनकी पत्नी की आँखों से तो आँसू बहने लगे। उन्होंने कहा- "मेरा एक ही बेटा है और शादी के बाद वो हमसे अलग रहने लगा। सालो बीत गए वो हमारे पास नहीं आता। शुरू-शुरू में हम उसके पास जाते थे तो वो नाराज हो जाता था। कहता आपको मेरी पत्नी पसंद नहीं करती। आप अपने घर में रहिये, हमें चैन से यहाँ रहने दीजिये। कितना अपमान सहते इसलिए बेटे के यहाँ जाना छोड़ दिया। एक पोता है और एक प्यारी पोती है, बस उनको देखने का बड़ा मन करता है। किसी ने कहा कि फेसबुक में लोग अपने फैमिली की और फंक्शन की इमेज डालते है, तो सोचा फेसबुक में ही अपने बेटे से जुड़कर उसकी फैमिली के बारे में जान लेंगे और अपने पोता पोती को भी देख लेंगे, मन को शांति मिल जाएगी। अब अपने नाम से तो अकाउंट बना नहीं सकते। वो हमें ऐड करेगा नहीं, इसलिए हमने ये फेक अकाउंट बनवाया।" बुजुर्ग दंपत्ति के नम आँखों को उनके पत्नी के बहते आँसुओं को देखकर उस लड़के का दिल भर आया और सोचने लगा कि माँ-बाप का दिल कितना बड़ा होता है जो औलाद के कृतघ्न होने के बाद भी उसे प्यार करते हैं और औलाद कितनी जल्दी माँ-बाप के प्यार और त्याग को भूल जाती है।" *******

  • चुभन

    विजय शंकर प्रसाद कल घुँघरू और घूंघट पर शुरू बात, कभी दोनों से ख़ता और फिर तहक़ीक़ात। सल्तनत हेतु कई दफ़ा और इल्ज़ामात, गिरफ़्त हेतु पिंजर और सियासी रहे बिसात। हसीनाओं से ये सब आख़िर हुए मालुमात, हुस्न के जरिये इश्क परिभाषित नहीं साक्षात। किताब से भ्रमित और गुलाब़ पर दृष्टिपात, काँटों का चुभन से असहमति नहीं अज्ञात। नाहक़ दौड़ और दख़ल कब है सपाट, अजनबी न सवाल तो क्यों फिसला ख़्यालात? हमें आँसुओं से कहाँ पर नहीं मुलाकात, कोरी कल्पना है क्या हँसी की बरसात? सूरज के उदय-अस्त पर क्या अब शह-मात, नमन से हंसों का जोड़ा क्या विख्यात? क्यों आज़ हो प्रियतमा आख़िरी बैठक आपात, क्या हुआ कश्तियों के डूबने के पश्चात? नदी के किनारे मंदिर तो कब व्याघात, भीड़ शाम में और सुबह-सुबह क्या-क्या आत्मसात? शरारत की क्या यामिनी और कब बहुबात, मौन हो किरदारों ने क्या दिया सौगात? ******

  • पितृ सम्मान

    स्वाती छीपा रात के दस बज रहे हैं और तुम अभी तक घर नहीं लौटे? कल से तुम्हारा बाहर जाना बंद। यह कमरे में धुंआ किस चीज का है? सिगरेट का पैकेट! लगता है अब तुम्हारी पॉकेट मनी बंद करनी पड़ेगी। मोबाइल लिए किधर चले जा रहे हो? बड़ों के पैर छूना कब सीखोगे? चिल्ला किस पर रहे हो, अपनी मां से बात करने की तमीज नहीं तुम्हें। यह सब तुम्हारे उन्हीं बिगड़े आवारा दोस्तों की संगत का असर है। अपने पापा की रोज-रोज की इन हिदायतो और रोक-टोक से तंग रोहन घर छोड़कर चला जाता है। पर रास्ते में उसका एक्सीडेंट हो जाता है। जब आंख खुलती है तो सामने देखता है, अस्पताल में उसके मम्मी पापा दो दिन से उसके लिए परेशान हुए बैठे हैं जो लगातार भगवान से उसके ठीक होने की प्रार्थना कर रहे थे। इस बात को छः महीने गुजर चुके हैं और साथ ही गुजर चुकी है, रोहन के मन में अपने पापा के लिए उत्पन्न हुई कड़वाहट। एक्सीडेंट के बाद रोहन को चलने में थोड़ी दिक्कत क्या हुई और चोटों के निशान भी थे जगह-जगह। तो उन दोस्तों ने जिनके लिए वह घर तक छोड़ कर जा रहा था उससे पीछा छुड़ा लिया और उसका मजाक तक बनाया। जबकि उसके पापा ने तो दिन रात एक कर कितना ख्याल रखा उसका। हर डॉक्टर, फिजियोथैरेपिस्ट, होम्योपैथी में दिखाया, मन्नत मांगी, भगवान के दर मत्था टेका। जो उसकी इच्छा होती लाकर देते, उससे हंसी मजाक करते रहते, ताकि उसका मन लगा रहे। जिसके फलस्वरूप आज वह पूर्णतः स्वस्थ है। आज विद्यालय में फादर्स डे के तहत विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया है। जहां सबको अपने पापा के बारे में कुछ कहना है। वहां कुछ तो इंटरनेट से रटे रटाये लेख बोल गए। कुछ कागज में लिखा पढ़ कर चले गए। पर रोहन अपने संग पापा को भी स्टेज पर लेकर गया। जहां पहले तो उनके चरण स्पर्श किए और फिर उनकी आंखों में अपने लिए सदा से ही ठहरे हुए प्रेम को जानकर, खुद के भी हृदय में उत्पन्न हुए प्रेमरत भावों को व्यक्त करना शुरू किया। जो कुछ इस प्रकार था... आदरणीय गुरुजनों, पिछले दिनों में घटित हुए कुछ घटनाक्रमों से मुझे इस बात का एहसास हुआ है कि यूं ही नहीं पिता का आसमान से ऊंचा स्थान रखा गया था। सम्मान यह उनके प्रेम दायित्वों का ऋणी हुआ था। क्योंकि पिता ही कर्तव्य पथ के सही मार्ग का अनुसरण करवाते हैं। कुमार्ग पर भटके हमारे मन को सन्मार्ग पर खींच लाते हैं। मैं उनकी छत्र छाया में खुद को सुरक्षित पाता हूं। निर्भीक होकर हर कठिनाई से जूझ जाता हूं। इसलिए अब दिल में ख्वाहिश भी यही रखता हूं कि मिले पिता हर खुशी तुम्हें। ना रोके मार्ग में कोई बाधा तुम्हें। तुम्हारे आशीष का साया हरदम मुझ पर बना रहे, ताकि साथ हमारा निर्विघ्न यूं ही कायम रहे। अब मेरे हृदय में सच्चा स्थान तुम्हारा अविचल ठहरा रहेगा, पाके तुम्हारे पूज्य चरण शीश मेरा यही झुका मिलेगा। सुनकर पूरा हॉल तालियों से गूंज उठता है। जिसकी तेज गड़गड़ाहट में दोनों पिता-पुत्र के नेत्रों से बहे प्रेम के निश्छल आंसू खामोशी से बहे जा रहे हैं और सदियों से चली आ रही पितृ सम्मान की आदर्श व्यवस्था का पुनः स्मरण करा रहे हैं। *******

  • निर्वासन

    प्रेमचंद परशुराम– वहीं-वहीं दालान में ठहरो! मर्यादा—क्यों, क्या मुझमें कुछ छूत लग गई! परशुराम—पहले यह बताओं तुम इतने दिनों से कहां रहीं, किसके साथ रहीं, किस तरह रहीं और फिर यहां किसके साथ आयीं? तब, तब विचार...देखी जाएगी। मर्यादा—क्या इन बातों को पूछने का यही वक्त है; फिर अवसर न मिलेगा? परशुराम—हां, यही बात है। तुम स्नान करके नदी से तो मेरे साथ ही निकली थीं। मेरे पीछे-पीछे कुछ देर तक आयीं भी; मै पीछे फिर-फिर कर तुम्हें देखता जाता था,फिर एकाएक तुम कहां गायब हो गयीं? मर्यादा – तुमने देखा नहीं, नागा साधुओं का एक दल सामने से आ गया। सब आदमी इधर-उधर दौड़ने लगे। मै भी धक्के में पड़कर जाने किधर चली गई। जरा भीड़ कम हुई तो तुम्हें ढूंढ़ने लगी। बासू का नाम ले-ले कर पुकारने लगी, पर तुम न दिखाई दिये। परशुराम – अच्छा तब? मर्यादा—तब मै एक किनारे बैठकर रोने लगी, कुछ सूझ ही न पड़ता कि कहां जाऊं, किससे कहूं, आदमियों से डर लगता था। संध्या तक वहीं बैठी रोती रही।ै परशुराम—इतना तूल क्यों देती हो? वहां से फिर कहां गयीं? मर्यादा—संध्या को एक युवक ने आ कर मुझसे पूछा, तुम्हारेक घर के लोग कहीं खो तो नहीं गए है? मैने कहा—हां। तब उसने तुम्हारा नाम, पता, ठिकाना पूछा। उसने सब एक किताब पर लिख लिया और मुझसे बोला—मेरे साथ आओ, मै तुम्हें तुम्हारे घर भेज दूंगा। परशुराम—वह आदमी कौन था? मर्यादा—वहां की सेवा-समिति का स्वयंसेवक था। परशुराम –तो तुम उसके साथ हो लीं? मर्यादा—और क्या करती? वह मुझे समिति के कार्यलय में ले गया। वहां एक शामियाने में एक लम्बी दाढ़ीवाला मनुष्य बैठा हुआ कुछ लिख रहा था। वही उन सेवकों का अध्यक्ष था। और भी कितने ही सेवक वहां खड़े थे। उसने मेरा पता-ठिकाना रजिस्टर में लिखकर मुझे एक अलग शामियाने में भेज दिया, जहां और भी कितनी खोयी हुई स्त्रियों बैठी हुई थीं। परशुराम—तुमने उसी वक्त अध्यक्ष से क्यों न कहा कि मुझे पहुंचा दीजिए? पर्यादा—मैने एक बार नहीं सैकड़ो बार कहा; लेकिन वह यह कहते रहे, जब तक मेला न खत्म हो जाए और सब खोयी हुई स्त्रियां एकत्र न हो जाएं, मैं भेजने का प्रबन्ध नहीं कर सकता। मेरे पास न इतने आदमी हैं, न इतना धन? परशुराम—धन की तुम्हे क्या कमी थी, कोई एक सोने की चीज बेच देती तो काफी रूपए मिल जाते। मर्यादा—आदमी तो नहीं थे। परशुराम—तुमने यह कहा था कि खर्च की कुछ चिन्ता न कीजिए, मैं अपने गहने बेचकर अदा कर दूंगी? मर्यादा—सब स्त्रियां कहने लगीं, घबरायी क्यों जाती हो? यहां किस बात का डर है। हम सभी जल्द अपने घर पहुंचना चाहती है; मगर क्या करें? तब मैं भी चुप हो रही। परशुराम – और सब स्त्रियां कुएं में गिर पड़ती तो तुम भी गिर पड़ती? मर्यादा—जानती तो थी कि यह लोग धर्म के नाते मेरी रक्षा कर रहे हैं, कुछ मेरे नौकरी या मजूर नहीं हैं, फिर आग्रह किस मुंह से करती? यह बात भी है कि बहुत-सी स्त्रियों को वहां देखकर मुझे कुछ तसल्ली हो गईग् परशुराम—हां, इससे बढ़कर तस्कीन की और क्या बात हो सकती थी? अच्छा, वहां के दिन तस्कीन का आनन्द उठाती रही? मेला तो दूसरे ही दिन उठ गया होगा? मर्यादा—रात- भर मैं स्त्रियों के साथ उसी शामियाने में रही। परशुराम—अच्छा, तुमने मुझे तार क्यों न दिलवा दिया? मर्यादा—मैंने समझा, जब यह लोग पहुंचाने की कहते ही हैं तो तार क्यों दूं? परशुराम—खैर, रात को तुम वहीं रही। युवक बार-बार भीतर आते रहे होंगे? मर्यादा—केवल एक बार एक सेवक भोजन के लिए पूछने आयास था, जब हम सबों ने खाने से इन्कार कर दिया तो वह चला गया और फिर कोई न आया। मैं रात-भर जगती रही। परशुराम—यह मैं कभी न मानूंगा कि इतने युवक वहां थे और कोई अन्दर न गया होगा। समिति के युवक आकाश के देवता नहीं होत। खैर, वह दाढ़ी वाला अध्यक्ष तो जरूर ही देखभाल करने गया होगा? मर्यादा—हां, वह आते थे। पर द्वार पर से पूछ-पूछ कर लौट जाते थे। हां, जब एक महिला के पेट में दर्द होने लगा था तो दो-तीन बार दवाएं पिलाने आए थे। परशुराम—निकली न वही बात!मै इन धूर्तों की नस-नस पहचानता हूं। विशेषकर तिलक-मालाधारी दढ़ियलों को मैं गुरू घंटाल ही समझता हूं। तो वे महाशय कई बार दवाई देने गये? क्यों तुम्हारे पेट में तो दर्द नहीं होने लगा था.? मर्यादा—तुम एक साधु पुरूष पर आक्षेप कर रहे हो। वह बेचारे एक तो मेरे बाप के बराबर थे, दूसरे आंखे नीची किए रहने के सिवाय कभी किसी पर सीधी निगाह नहीं करते थे। परशुराम—हां, वहां सब देवता ही देवता जमा थे। खैर, तुम रात-भर वहां रहीं। दूसरे दिन क्या हुआ? मर्यादा—दूसरे दिन भी वहीं रही। एक स्वयंसेवक हम सब स्त्रियों को साथ में लेकर मुख्य-मुख्य पवित्र स्थानो का दर्शन कराने गया। दो पहर को लौट कर सबों ने भोजन किया। परशुराम—तो वहां तुमने सैर-सपाटा भी खूब किया, कोई कष्ट न होने पाया। भोजन के बाद गाना-बजाना हुआ होगा? मर्यादा—गाना बजाना तो नहीं, हां, सब अपना-अपना दुखड़ा रोती रहीं, शाम तक मेला उठ गया तो दो सेवक हम लोगों को ले कर स्टेशन पर आए। परशुराम—मगर तुम तो आज सातवें दिन आ रही हो और वह भी अकेली? मर्यादा—स्टेशन पर एक दुर्घटना हो गयी। परशुराम—हां, यह तो मैं समझ ही रहा था। क्या दुर्घटना हुई? मर्यादा—जब सेवक टिकट लेने जा रहा था, तो एक आदमी ने आ कर उससे कहा—यहां गोपीनाथ के धर्मशाला में एक आदमी ठहरे हुए हैं, उनकी स्त्री खो गयी है, उनका भला-सास नाम है, गोरे-गोरे लम्बे-से खूबसूरत आदमी हैं, लखनऊ मकान है, झवाई टोले में। तुम्हारा हुलिया उसने ऐसा ठीक बयान किया कि मुझे उसस पर विश्वास आ गया। मैं सामने आकर बोली, तुम बाबूजी को जानते हो? वह हंसकर बोला, जानता नहीं हूं तो तुम्हें तलाश क्यो करता फिरता हूं। तुम्हारा बच्चा रो-रो कर हलकान हो रहा है। सब औरतें कहने लगीं, चली जाओं, तुम्हारे स्वामीजी घबरा रहे होंगे। स्वयंसेवक ने उससे दो-चार बातें पूछ कर मुझे उसके साथ कर दिया। मुझे क्या मालूम था कि मैं किसी नर-पिशाच के हाथों पड़ी जाती हूं। दिल मैं खुशी थी किअब बासू को देखूंगी तुम्हारे दर्शन करूंगी। शायद इसी उत्सुकता ने मुझे असावधान कर दिया। परशुराम—तो तुम उस आदमी के साथ चल दी? वह कौन था? मर्यादा—क्या बतलाऊं कौन था? मैं तो समझती हूं, कोई दलाल था? परशुराम—तुम्हे यह न सूझी कि उससे कहतीं, जा कर बाबू जी को भेज दो? मर्यादा—अदिन आते हैं तो बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। परशुराम—कोई आ रहा है। मर्यादा—मैं गुसलखाने में छिपी जाती हूं। परशुराम –आओ भाभी, क्या अभी सोयी नहीं, दस तो बज गए होंगे। भाभी—वासुदेव को देखने को जी चाहता था भैया, क्या सो गया? परशुराम—हां, वह तो अभी रोते-रोते सो गया। भाभी—कुछ मर्यादा का पता मिला? अब पता मिले तो भी तुम्हारे किस काम की। घर से निकली स्त्रियां थान से छूटी हुई घोड़ी हैं। जिसका कुछ भरोसा नहीं। परशुराम—कहां से कहां लेकर मैं उसे नहाने लगा। भाभी—होनहार हैं, भैया होनहार। अच्छा, तो मै जाती हूं। मर्यादा—(बाहर आकर) होनहार नहीं हूं, तुम्हारी चाल है। वासुदेव को प्यार करने के बहाने तुम इस घर पर अधिकार जमाना चाहती हो। परशुराम –बको मत! वह दलाल तुम्हें कहां ले गया। मर्यादा—स्वामी, यह न पूछिए, मुझे कहते लज्ज आती है। परशुराम—यहां आते तो और भी लज्ज आनी चाहिए थी। मर्यादा—मै परमात्मा को साक्षी देती हूं, कि मैंने उसे अपना अंग भी स्पर्श नहीं करने दिया। पराशुराम—उसका हुलिया बयान कर सकती हो। मर्यादा—सांवला सा छोटे डील डौल काआदमी था।नीचा कुरता पहने हुए था। परशुराम—गले में ताबीज भी थी? मर्यादा—हां,थी तो। परशुराम—वह धर्मशाले का मेहतर था।मैने उसे तुम्हारे गुम हो जाने की चर्चा की थी। वहउस दुष्ट ने उसका वह स्वांग रचा। मर्यादा—मुझे तो वह कोई ब्रह्मण मालूम होता था। परशुराम—नहीं मेहतर था। वह तुम्हें अपने घर ले गया? मर्यादा—हां, उसने मुझे तांगे पर बैठाया और एक तंग गली में, एक छोटे- से मकान के अन्दर ले जाकर बोला, तुम यहीं बैठो, मुम्हारें बाबूजी यहीं आयेंगे। अब मुझे विदित हुआ कि मुझे धोखा दिया गया। रोने लगी। वह आदमी थोडी देर बाद चला गया और एक बुढिया आ कर मुझे भांति-भांति के प्रलोभन देने लगी। सारी रात रो-रोकर काटी दूसरे दिन दोनों फिर मुझे समझाने लगे कि रो-रो कर जान दे दोगी, मगर यहां कोई तुम्हारी मदद को न आयेगा। तुम्हाराएक घर डूट गया। हम तुम्हे उससे कहीं अच्छा घर देंगें जहां तुम सोने के कौर खाओगी और सोने से लद जाओगी। लब मैने देखा किक यहां से किसी तरह नहीं निकल सकती तो मैने कौशल करने का निश्चय किया। परशुराम—खैर, सुन चुका। मैं तुम्हारा ही कहना मान लेता हूं कि तुमने अपने सतीत्व की रक्षा की, पर मेरा हृदय तुमसे घृणा करता है, तुम मेरे लिए फिर वह नहीं निकल सकती जो पहले थीं। इस घर में तुम्हारे लिए स्थान नहीं है। मर्यादा—स्वामी जी, यह अन्याय न कीजिए, मैं आपकी वही स्त्री हूं जो पहले थी। सोचिए मेरी दशा क्या होगी? परशुराम—मै यह सब सोच चुका और निश्चय कर चुका। आज छ: दिन से यह सोच रहा हूं। तुम जानती हो कि मुझे समाज का भय नहीं। छूत-विचार को मैंने पहले ही तिलांजली दे दी, देवी-देवताओं को पहले ही विदा कर चुका:पर जिस स्त्री पर दूसरी निगाहें पड चुकी, जो एक सप्ताह तक न-जाने कहां और किस दशा में रही, उसे अंगीकार करना मेरे लिए असम्भव है। अगर अन्याय है तो ईश्वर की ओर से है, मेरा दोष नहीं। मर्यादा—मेरी विवशमा पर आपको जरा भी दया नहीं आती? परशुराम—जहां घृणा है, वहां दया कहां? मै अब भी तुम्हारा भरण-पोषण करने को तैयार हूं।जब तक जीऊगां, तुम्हें अन्न-वस्त्र का कष्ट न होगा पर तुम मेरी स्त्री नहीं हो सकतीं। मर्यादा—मैं अपने पुत्र का मुह न देखूं अगर किसी ने स्पर्श भी किया हो। परशुराम—तुम्हारा किसी अन्य पुरूष के साथ क्षण-भर भी एकान्त में रहना तुम्हारे पतिव्रत को नष्ट करने के लिए बहुत है। यह विचित्र बंधन है, रहे तो जन्म-जन्मान्तर तक रहे: टूटे तो क्षण-भर में टूट जाए। तुम्हीं बताओं, किसी मुसलमान ने जबरदस्ती मुझे अपना उच्छिट भोलन खिला दियया होता तो मुझे स्वीकार करतीं? मर्यादा—वह.... वह.. तो दूसरी बात है। परशुराम—नहीं, एक ही बात है। जहां भावों का सम्बन्ध है, वहां तर्क और न्याय से काम नहीं चलता। यहां तक अगर कोई कह दे कि तुम्हारें पानी को मेहतर ने छू निया है तब भी उसे ग्रहण करने से तुम्हें घृणा आयेगी। अपने ही दिन से सोचो कि तुम्हारेंसाथ न्याय कर रहा हूं या अन्याय। मर्यादा—मै तुम्हारी छुई चीजें न खाती, तुमसे पृथक रहती पर तुम्हें घर से तो न निकाल सकती थी। मुझे इसलिए न दुत्कार रहे हो कि तुम घर के स्वामी हो और कि मैं इसका पलन करतजा हूं। परशुराम—यह बात नहीं है। मै इतना नीच नहीं हूं। मर्यादा—तो तुम्हारा यहीं अतिमं निश्चय है? परशुराम—हां, अंतिम। मर्यादा-- जानते हो इसका परिणाम क्या होगा? परशुराम—जानता भी हूं और नहीं भी जानता। मर्यादा—मुझे वासुदेव ले जाने दोगे? परशुराम—वासुदेव मेरा पुत्र है। मर्यादा—उसे एक बार प्यार कर लेने दोगे? प रशुराम—अपनी इच्छा से नहीं, तुम्हारी इच्छा हो तो दूर से देख सकती हो। मर्यादा—तो जाने दो, न देखूंगी। समझ लूंगी कि विधवा हूं और बांझ भी। चलो मन, अब इस घर में तुम्हारा निबाह नहीं है। चलो जहां भाग्य ले जाय। ********

  • सबसे बहुमूल्य वस्तु

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव एक जाने माने प्रवक्ता ने हाथ में पांच सौ का नोट लहराते हुए अपनी सेमीनार शुरू की। हाल में बैठे सैकड़ों लोगों से उसने पूछा, “ये पांच सौ का नोट कौन लेना चाहता है?” हाथ उठना शुरू हो गए। फिर उसने कहा, “मैं इस नोट को आपमें से किसी एक को दूंगा पर उससे पहले मुझे ये कर लेने दीजिये।” और उसने नोट को अपनी मुट्ठी में मोड़ना शुरू कर दिया। और फिर उसने पूछा, “कौन है जो अब भी यह नोट लेना चाहता है?” अभी भी लोगों के हाथ उठने शुरू हो गए। अच्छा” उसने कहा, “अगर मैं ये कर दूं?” और उसने नोट को नीचे गिराकर पैरों से कुचलना शुरू कर दिया। उसने नोट उठाया, वह अब मुड़कर बिल्कुल गन्दा हो गया था। क्या अभी भी कोई है जो इसे लेना चाहता है?” और एक बार फिर हाथ उठने शुरू हो गए। सार - नोट कितना भी पुराना या गंदा क्यों ना हो परंतु उसका मूल्य कम नहीं होता। इसी प्रकार यदि आपका व्यक्तित्व साफ है तो आपके साथ चाहे जो हुआ हो या भविष्य में जो हो जाए, आपका मूल्य कम नहीं होता। आप स्पेशल हैं, इस बात को कभी मत भूलिए। ******

  • मन का मीत

    प्रियांशी बरनवाल मीत आए सदा, तुम बहारे लिए। प्यार के खूबसूरत नजारे लिए।। आईना बन सुबह शाम देखा जिन्हें। मस्त हूँ मानकर भाग्य रेखा जिन्हें। प्रेम माला सजी है तुम्हारे लिए। प्यार के खूबसूरत नजारे लिए।। मीत आए सदा, तुम बहारे लिए। प्यार के खूबसूरत नजारे लिए।। प्यार का एक नगमा सुनाती रहूँ। देखकर आपको मुस्कुराती रहूँ। राह में हम भटकते सितारें लिए। प्यार के खूबसूरत नजारे लिए।। मीत आए सदा, तुम बहारे लिए। प्यार के खूबसूरत नजारे लिए।। मैंने जबसे तुम्हारा सजदा किया। उस घड़ी ही तुझे ये दिल दे दिया। चार नयनों के हमने इशारे लिए। प्यार के खूबसूरत नजारे लिए।। मीत आए सदा, तुम बहारे लिए। प्यार के खूबसूरत नजारे लिए।। *******

  • शिक्षक का कोप

    मुकेश ‘नादान’ नरेंद्र बहुत ही निर्भीक तथा दृढ़ संकल्प वाला बालक था। उनकी इच्छा के विरूद्ध उनसे कार्य करवाना मानो लोहे के चने चबाने जैसा था। यह घटना भी उसी समय से संबंध रखती है। नरेंद्र जिस विद्यालय में पढ़ते थे, उस विद्यालय के एक शिक्षक बड़े क्रोधी थे। आवश्यकता महसूस करते ही वे छात्रों को कठोर शारीरिक दंड दिया करते। एक दिन शिक्षक एक बालक को उसके उद्डं व्यवहार के लिए पीट रहे थे, तब उनकी इस अकारण उन्मत्तता, विकट मुखभंगिमा आदि देखकर नरेंद्र अपनी हँसी नहीं रोक सके। इसके फलस्वरूप शिक्षक का सारा क्रोध नरेंद्र के ऊपर आ गिरा और उन्हें पीटते-पीटते वे कहने लगे, “कहो, फिर कभी मेरी ओर देखकर नहीं हँसोगे।” नरेंद्र के ऐसा नहीं कहने पर शिक्षक ने और अधिक पीटना शुरू किया और दोनों हाथों से उनके कान मलने लगे। यहाँ तक कि कान पकड़कर ऊँचा उठाते हुए उन्हें बेंच पर खड़ा कर दिया। इससे एक कान छिल गया और खून रिसने लगा। तब भी नरेंद्र उस प्रकार की प्रतिज्ञा करने को सहमत नहीं हुए और क्रोध से भरकर कहने लगे, “मेरे कान नहीं मलिएगा! मुझे पीटने वाले आप कौन होते हैं? मेरी देह पर हाथ नहीं लगाइएगा!” इसी समय सौभाग्यवश श्रीईश्वरचंद्र विद्यासागर वहाँ आ पहुँचे। नरेंद्र ने फफकते-फफकते सारी घटना उनसे कह सुनाई और हाथों में पुस्तकें उठाते हुए कहा कि मैं सदा के लिए यह विद्यालय छोड़कर जा रहा हूँ। विद्यासागर ने उन्हें अपने कमरे में ले जाकर काफी सांत्वना दी। बाद में इस प्रकार के दंड विधान के संबंध में और भी जानकारी मिलने पर यह आदेश दिया गया कि विद्यालय में इस प्रकार का दंड नहीं दिया जाएगा। इधर घर में भुवनेश्वरी ने जब घटना का विवरण सुना, तब उन्होंने दुख और क्षोभ से विह्वल होकर कहा, “मैं अपने बच्चे को ऐसे विद्यालय में अब नहीं जाने दूँगी।” किंतु नरेंद्रनाथ का मन तब तक शांत हो गया था। पहले की भाँति ही वे उस विद्यालय में जाने लगे, उनका कान ठीक होने में कई दिन लग गए थे। खेल-कूद और लिखने-पढ़ने के साथ-साथ उनके चरित्र के और भी कई आयाम इसी समय खुलने लगे। संगीत के प्रति उनमें एक जन्मजात और स्वाभाविक आकर्षण था। भिखारी गायकों का दल जब दरवाजे पर खड़ा होकर ढोल बजाते हुए गाना गाता, तब वे उसे आग्रहपूर्वक सुना करते। टोले-मुहल्ले में रामायण आदि का गान होने पर वे वहाँ भी उपस्थित होते। इसी समय उन्होंने पाकविद्या भी सीखी। साथियों को लेकर खेल के बहाने वे रसोई की सारी वस्तुओं को एकत्र करते और उन सबसे चंदा भी लेते, किंतु अधिकांश व्यय उन्हें स्वयं वहन करना होता। मुख्य रसोइया स्वयं होते। यद्यपि वे मिर्ची का अधिक प्रयोग करते थे, किंतु इसके पश्चात्‌ भी खाना विलक्षण बनता था। *********

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