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- नमन मां शारदे
मुक्ता शर्मा पालते हैं जिद सभी बेकार की। बस यही तो है वजह तक़रार की जब से ऑंगन में लगी दीवार है। रौशनी आती नहीं उस पार की। बस अभी तो हम किनारे से लगे। बात मत छेड़ो अभी मंझधार की। दिल की बातों को हमेशा मानकर। जिंदगी की राह क्यों दुश्वार की। फुर्सतें किसको हैं इतनी देखिए। खैरियत जो पूछ लें बीमार की। सब इमारत के कंगूरे देखते। ईंट कब किसको दिखी आधार की। लड़कियां अव्वल हैं हर मैदान में। आजकल सुर्खी है ये अख़बार की। ******
- दरार
अंचल सिन्हा कमल बाबू को लगता है कि वे टूट से गए हैं। अबतक वे अपनों से दूर होते गए थे, तो भी किसी तरह अपने को सहेजे हुए थे। भाई, बहन और बाकी रिश्ते तो कब के टूट चुके थे। मां और पिताजी बरसों पहले स्वर्ग सिधार चुके थे। कैसे-कैसे कमल बाबू ने अपने को अबतक संभाले रखा था, सिर्फ इस उम्मीद में कि उनके बच्चों के बीच प्यार बना रहे। उनके बच्चे अच्छे हैं भी। दोनों भाई बहन एक दूसरे से सारी बातें शेयर करते रहे हैं। दोनों के बच्चे भी बहुत प्यारे हैं। कमल बाबू को लगता था कि चलो, उनकी अपने परिवार की दुनिया तो नहीं बन सकी, बच्चों के साथ वाली दुनिया ही सुखद हो। लेकिन आज अचानक उन्हें लगा कि उनकी आज की दुनिया भी अब बचेगी नहीं। छोटी-छोटी सी बात में बहू को परेशानी होने लगी है। पिछले दिनों बहुत छोटी सी बात पर बहू ने बेटी को जाने क्या-क्या कह दिया। बेटी ने रो कर कमल बाबू को कहा -- मेरा इरादा भाभी को किसी तरह से दुःखी करने का नहीं था, हल्का सा मज़ाक ही तो किया था, वह नाराज हो गयी। "कोई बात नहीं, "कमल बाबू ने बेटी को समझाया। फिर एक अभिभावक की तरह बहू को भी समझाने की कोशिश की, पर वह जैसे अड़ी सी रही। कमल बाबू चुप हो गए थे। वह समझते थे कि बेटा कुछ भी कह नहीं सकता। वह खुद अपनी जवानी के दिनों में यही सब झेल चुके थे। वह थके क़दमों से अपने कमरे की ओर चल पड़े। उन्हें लगा कि जल्दी ही उनका यह परिवार भी टूटने वाला है। उनके जीवन का कोई मतलब बचा है क्या? वह जल्दी से जल्दी इस दुनिया को अलविदा कहना चाहते हैं, कई बार ईश्वर से कहा भी, पर ईश्वर हो तब तो सुने। कमल बाबू का ईश्वर से भी भरोसा टूट चुका था। ईश्वर ने उनकी कौन सी बात सुनी। जवानी से आज तक कमल बाबू ने अपनी मानसिक शांति के लिए जो कुछ भी माँगा, उन्हें नहीं मिला। हां, ईश्वर ने इतना ज़रूर किया कि उन्हें और उनके परिवार को मरने नहीं दिया, खाने पीने और जीने का रास्ता बनाते रहे। लेकिन क्या जीवन केवल यही होता है? कमल बाबू थकी नज़रों से बस खिड़की के उस पार देखते रहे, देखते रहे। ******
- भ्रम
आचार्य जहान भ्रम का भ्रम ही रहना भला है। कुछ न होने से कुछ होना भला है। भ्रम टूटा तो टूटेगी और सरहदें बिखर जाएंगे तेरे सपने दूर हो जाएंगे तेरे अपने भ्रम सच और झूठ के बीच का क्रम इसीलिए तो भ्रम है। हर फूल में खुशबू न तलाशना ही भला है। उसकी मुस्कान दूर से देखना क्या बुरा है। रिश्तों में साफ चेहरे मत ढूंढना जहान बिगड़ते बनते चेहरे को देखना ही भला है। धुंधला आयना रखना भी क्या बुरा है। भ्रम का भ्रम ही रहना भला है। ******
- जीवन की मिठास
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव एक प्रोफ़ेसर क्लास ले रहे थे। क्लास के सभी छात्र बड़ी ही रूचि से उनके लेक्चर को सुन रहे थे। उनके पूछे गये सवालों के जवाब दे रहे थे। लेकिन उन छात्रों के बीच कक्षा में एक छात्र ऐसा भी था, जो चुपचाप और गुमसुम बैठा हुआ था। प्रोफ़ेसर ने पहले ही दिन उस छात्र को नोटिस कर लिया, लेकिन कुछ नहीं बोले। लेकिन जब 4-5 दिन तक ऐसा ही चला, तो उन्होंने उस छात्र को क्लास के बाद अपने केबिन में बुलवाया और पूछा, “तुम हर समय उदास रहते हो। क्लास में अकेले और चुपचाप बैठे रहते हो। लेक्चर पर भी ध्यान नहीं देते। क्या बात है? कुछ परेशानी है क्या?” “सर, वो…..” छात्र कुछ हिचकिचाते हुए बोला, “….मेरे अतीत में कुछ ऐसा हुआ है, जिसकी वजह से मैं परेशान रहता हूँ। समझ नहीं आता क्या करूं?” प्रोफ़ेसर भले व्यक्ति थे। उन्होंने उस छात्र को शाम को अपने घर पर बुलवाया। शाम को जब छात्र प्रोफ़ेसर के घर पहुँचा, तो प्रोफ़ेसर ने उसे अंदर बुलाकर बैठाया। फिर स्वयं किचन में चले गये और शिकंजी बनाने लगे। उन्होंने जानबूझकर शिकंजी में ज्यादा नमक डाल दिया। फिर किचन से बाहर आकर शिकंजी का गिलास छात्र को देकर कहा, “ये लो, शिकंजी पियो।” छात्र ने गिलास हाथ में लेकर जैसे ही एक घूंट लिया, अधिक नमक के स्वाद के कारण उसका मुँह अजीब सा बन गया। यह देख प्रोफ़ेसर ने पूछा, “क्या हुआ? शिकंजी पसंद नहीं आई?” “नहीं सर, ऐसी बात नहीं है। बस शिकंजी में नमक थोड़ा ज्यादा है।” छात्र बोला। “अरे, अब तो ये बेकार हो गया। लाओ गिलास मुझे दो, मैं इसे फेंक देता हूँ।” प्रोफ़ेसर ने छात्र से गिलास लेने के लिए अपना हाथ बढ़ाया। लेकिन छात्र ने मना करते हुए कहा, “नहीं सर, बस नमक ही तो ज्यादा है। थोड़ी चीनी और मिलायेंगे, तो स्वाद ठीक हो जायेगा।” यह बात सुन प्रोफ़ेसर गंभीर हो गए और बोले, “सही कहा तुमने। अब इसे समझ भी जाओ। ये शिकंजी तुम्हारी जिंदगी है। इसमें घुला अधिक नमक तुम्हारे अतीत के बुरे अनुभव है। जैसे नमक को शिकंजी से बाहर नहीं निकाल सकते, वैसे ही उन बुरे अनुभवों को भी जीवन से अलग नहीं कर सकते। वे बुरे अनुभव भी जीवन का हिस्सा ही हैं। लेकिन जिस तरह हम चीनी घोलकर शिकंजी का स्वाद बदल सकते हैं। वैसे ही बुरे अनुभवों को भूलने के लिए जीवन में मिठास तो घोलनी पड़ेगी ना। इसलिए मैं चाहता हूँ कि तुम अब अपने जीवन में मिठास घोलो।” प्रोफ़ेसर की बात छात्र समझ गया और उसने निश्चय किया कि अब वह बीती बातों से परेशान नहीं होगा। ******
- नूर
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव माँ आप जल्दी से अच्छी सी साड़ी पहन लो और हाँ जरा सा फेस पैक लगा लो, आपका रंग बहुत गहरा होता जा रहा है। अपनी पत्नी नीरजा को आवाज लगाते हुए श्री ने कहा-" सुनो! माँ को जरा सी क्रीम पाउडर भी लगा देना। आज शाम मेरी कंपनी के मालिक चाय पर आ रहें हैं।" माँ बिल्कुल स्मार्ट लगनी चाहिए।" जी.... इतना कहकर नीरजा सासु माँ के कमरे की तरफ बढ़ गयी। वह सासु माँ को साड़ी बदलने का, चेहरा चमकाने का पुरजोर प्रयास कर रही थी। मगर सासु माँ अपनी जिद्द पर अड़ी थी -"मुझे कुछ नहीं करना। जब शृंगार करने की उम्र थी तब क्रीम पाउडर न लगाया... जा तू अपना नाश्ते की तैयारी कर ... हाँ श्री को कह दियो कि अगर माँ को माँ कहने में शर्म आती है तो मैं अपने कमरे से बाहर नहीं आऊंगी। जब मेहमान चले जाएं तब बुला लेना बाहर.... ।" नीरजा तो सासु माँ की आदत से भलीभाँति परिचित थी। 10 साल में वह खूब समझती थी कि माँ नारियल सी हैं ऊपर से कड़क... अंदर से ममता का सागर.... आखिर 30 सालों तक अध्यापिका के रूप में काम किया है। शिक्षक तो स्वभाव से ही अनुशासित होते हैं। वह सासु माँ के कहे अनुसार बाहर आकर किचन में काम निबटाने लगी। कुछ ही देर में श्री के साथ लगभग उसी की हमउम्र समीर ने प्रवेश किया। नीरजा ने चाय नाश्ते की मेज सजा दी। कुछ देर में समीर ने कहा- "श्री! क्या आज माताजी कहीं गयी हुई हैं? उनके भी दर्शन हो जाते तो.... " श्री को बोलने से पहले ही नीरजा ने कहा- "माँ अपने कमरे में ही हैं। मैं बुलाती हूँ।" समीर ने कहा- "अरे! मैं वहीं माताजी से मिल लूँगा। उन्हें परेशान क्यों करना? श्री संकोच के साथ माँ के कमरे की तरफ चल दिया। श्री ने आवाज लगाते हुए कहा- "माँ! देखो आपसे समीर सर मिलने आए हैं।" माँ किताब को एक तरफ रखते हुए बोली- "आओ बेटा! मुझे लगा कि बच्चों के बीच में मैं क्या बात करूंगी बस इसीलिए.... समीर ने सादर प्रणाम कहा और चरण स्पर्श करने के बाद साथ पड़ी कुर्सी पर बैठ गया। बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो बातों-बातों में माँ ने गीता के श्लोक, कबीर की साखियाँ कितने प्रेरक प्रसंग कह डाले। समीर ने कुछ याद करने की कोशिश करते हुए पूछा - "आप लोग यहाँ कितने समय से हैं?" माँ ने कहा- "यहाँ आए तो चार पाँच साल ही हुए हैं। पहले हम आगरा में रहते थे। वहीं सरकारी स्कूल में मैंने 25 सालों तक पढ़ाया। समीर एकाएक बोल उठा - "क्या आप दीपिका मैम..... माँ हैरान होते हुए बोली... तुम मेरे नाम से कैसे.... मैम मैं भी उसी स्कूल में सिमर मैम की कक्षा में था। आपने मुझे कभी पढ़ाया नहीं पर मैंने आपको बहुत सुना है। आज भी वही आवाज, वही उर्जा वही विश्वास.... ये सब सुनकर माँ के चेहरे का विश्वास दोगुना हो गया। समीर ने चलते-चलते श्री से कहा - "मैम के ज्ञान की लौ से आज भी उनके चेहरे पर अनोखा नूर है।" श्री माँ की प्रशंसा सुनकर कुछ देर पहले की बात को याद कर मन ही मन खुद को छोटा महसूस कर रहा था। *****
- पहला मानसून
एम.एस.ठाकरे आज खरीददारी करने मार्केट गई थी। सराफा से निकली तो मुझे अकेला पाकर उसने मुझे आवाज दे दी। मयूरी ,,,,,मयूरी , रुक जाओ ... मैं तो डर गई। शादी के पहले भी सबके सामने उससे मिलने से डर लगता था। जाने सब किस नजर से देखते थे और आज तो यहां ससुराल में। मैंने उसे नजरअंदाज किया। तो वो फिर से मेरे सामने आ गया। रुक जा जरा। फिर ...मैंने नजरे चुराते हुए कहा.. नहीं बाबा जाने दो...। लेकिन वह बिल्कुल पहले की तरह धीट था। धीरे-धीरे कदमों से मेरे साथ ही चल रहा था। एक बात तो बता। इतनी डरती क्यों हो मुझसे, उसने कहा। किसने कहा मैं डरती हूं। मैंने भी थोड़ा धीट बनते हुए उसे बोला। बताओ फिर भाग क्यों रही हो। वो बोला, “मैं कहां भाग रही हूं। बस तुम आने से पहले बताते नहीं हो ना। मैंने भी मन की बात कही। क्या मतलब कुछ भी जैसे कि अगर बताता तो मुझसे मिलने बड़ी सज धज के आने वाली थी। तुम भी ना ....मैं थोड़ी उससे चिढ गई थी। और उसको नजरअंदाज करके आगे कदम बढ़ा दी। मन तो बहुत हो रहा था कि उसके साथ चलते-चलते बात करूं पर कुछ सोचते हूए तेज चलने लगी। अरे .....मतलब बड़ी धीट हो तुम। हर साल मेरे लिए बचपन में लव लेटर लिखती थी। आज तो नहीं छोडूंगा तुम्हें और थोड़ा मेरे आगे आकर रास्ता रोक लिया। अरे मेरे सिरफिरे आशिक उसे लव लेटर नहीं। ऐसे (essay) कहते थे जो टीचर लिखवाती थी। मैंने सर को हाथ मारते हुए कहा, जाने दो मुझे। एक तो आज एक भी गाड़ी नहीं दिखाई दे रही। बस कुछ साधन मिल जाए नहीं तो यह मुझे पक्का पकड़ लेगा। फिर उसे चिढ़ाते हुए मैंने कहा, गाड़ी ना सही सामने टपरी है तो वहां पर चली जाती हूं। मैंने जीत की खुशी मनाते हुए कहा। लोग भी है वहां पर,,, हाथ जोड़कर कह रही हूं तिरछी मुस्कान के साथ वहां मत आ जाना मुझे शर्मिंदा करने। मैंने उसे आंख दिखाकर डराना चाहा। इन लोगों से डर नहीं लगता तुम्हें मुझसे तो बड़ा डर रही है। वो थोड़ा नाराज होते हुए बोला। अगर तुम्हारे साथ रहूंगी तो ऐसे भी यह लोग मुझे नहीं छोड़ेंगे। हां, वो तो है मेरे साथ तुम्हारी जोड़ी लगती भी तो खास है। उसने थोड़ा इतराते हुए कहा, “अब तो तुम्हें गले लगा ही लेता हूं। और वो धीरे-धीरे मेरे पास आ ही गया। मैं भी उसे मना नहीं कर पाई। आखिर चाहत तो मेरे मन में भी थी। मैंने भी मुस्कुराते हुए कहा तुम नहीं सुधरोगे।” सारी लोग-लाज छोड़कर मैं उसके साथ हो ली। थोड़ी देर बाद, अब जाने भी दो, मैंने कहा। ऐसे कैसे ....याद है तुम्हें एक बार स्कूल से छूटने के बाद तुम्हें और तुम्हारी सारी की सारी सखीओं को कैसे मजा चखाया था। उसने झूमते हुए कहा। हंसते हुए मैंने कहा, “हां ...हां ...याद आ गया। पता नहीं कहां-कहां मुंह छुपाए घूम रहे थे हम सब उस दिन, घर आने पर मम्मी ने मुझे और दीदी को कितना डांटा था। मतलब तुम्हारी मां भी हद करती है मुझे कोई कोरोनावायरस हूआ था जो मेरे साथ खेलने भरसे ही तुम लोग बीमार हो जाती। लगता है तुम्हारी मां को भी मुझे मजा दिखाना होगा। उसने मस्ती में कहा। अरे यार उनकी उम्र का तो लिहाज करो। वैसे पता है मेरे सिरफिरे मजनू यहां मां नहीं सासु मां है मेरी। हां पता है वहीं ना जिन्हें आचर पापड़ बनाना अच्छा लगता है। उसने असमंजस में कह दिया। तुम्हें कैसे पता। मैंने उसे डर से पूछा। अभी-अभी तुम्हारे घर से ही आ रहा हूं। तुम्हारी सास, देखो रिस्पेक्ट से जरा, मैंने आंख दिखाते हुए कहा। मेरे डर के छत के चक्कर काट रही है। तुम्हारी सासू मां। शरारती मुस्कान के साथ उसने कहा। क्या तुम मेरे घर पर चले गए थोड़ा तो तरस खाते कुछ किया तो नहीं। मैंने परेशान होते हुए पूछा - नहीं नहीं बस डरा कर आया हूं। उसने मेरे इर्द-गिर्द घूमते हुए कहा। अच्छा चलो अब जाने दो मुझे प्लीज। हां मैं क्या जाने दूंगा वहां देखो तुम्हारा जानू आ रहा है तुम्हें मुझसे बचाने मेरा दुश्मन लेकर छाता लेकर। जा उसके साथ वरना ये टपरी वाले देख ही रहे हैं। उसकी बातों में मेरे लिए चिंता थी। इतना कह वो जाने लगा तो मैंने उसे चिल्ला कर कहा रुक जाओ ना इनसे तो मिलो। तो मुझसे बोला दिखाई नहीं दे रहा उसे मुझसे कितना डर लगता है रेनकोट पहन के आया है। इसका तो बदला लूंगा जब गुस्से में रहूंगा। मैंने भी उसे हंसते हुए अलविदा किया। मेरा पहला प्यार मेरा मानसून जिसका हर बार मुझे बेसब्री से इंतजार रहता है। *******
- मौत से ठन गई
अटल बिहारी वाजपेयी ठन गई! मौत से ठन गई! जूझने का मेरा इरादा न था, मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई। मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं, ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं। मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ, लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ? तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ, सामने वार कर फिर मुझे आज़मा। मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र, शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर। बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं, दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं। प्यार इतना परायों से मुझको मिला, न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला। हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये, आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए। आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है, नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है। पार पाने का क़ायम मगर हौसला, देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई। मौत से ठन गई। *****
- आधार
प्रेमचंद सारे गॉँव में मथुरा का सा गठीला जवान न था। कोई बीस बरस की उमर थी। मसें भीग रही थी। गउएं चराता, दूध पीता, कसरत करता, कुश्ती लडता था और सारे दिन बांसुरी बजाता हाट में विचरता था। ब्याह हो गया था, पर अभी कोई बाल-बच्चा न था। घर में कई हल की खेती थी, कई छोटे-बडे भाई थे। वे सब मिलचुलकर खेती-बारी करते थे। मथुरा पर सारे गॉँव को गर्व था, जब उसे जॉँघिये-लंगोटे, नाल या मुग्दर के लिए रूपये-पैसे की जरूरत पडती तो तुरन्त दे दिये जाते थे। सारे घर की यही अभिलाषा थी कि मथुरा पहलवान हो जाय और अखाडे में अपने सवाये को पछाडे। इस लाड – प्यार से मथुरा जरा टर्रा हो गया था। गायें किसी के खेत में पडी है और आप अखाडे में दंड लगा रहा है। कोई उलाहना देता तो उसकी त्योरियां बदल जाती। गरज कर कहता, जो मन में आये कर लो, मथुरा तो अखाडा छोडकर हांकने न जायेंगे! पर उसका डील-डौल देखकर किसी को उससे उलझने की हिम्मत न पडती। लोग गम खा जाते। गर्मियों के दिन थे, ताल-तलैया सूखी पडी थी। जोरों की लू चलने लगी थी। गॉँव में कहीं से एक सांड आ निकला और गउओं के साथ हो लिया। सारे दिन गउओं के साथ रहता, रात को बस्ती में घुस आता और खूंटो से बंधे बैलो को सींगों से मारता। कभी-किसी की गीली दीवार को सींगो से खोद डालता, घर का कूडा सींगो से उडाता। कई किसानों ने साग-भाजी लगा रखी थी, सारे दिन सींचते-सींचते मरते थे। यह सांड रात को उन हरे-भरे खेतों में पहुंच जाता और खेत का खेत तबाह कर देता। लोग उसे डंडों से मारते, गॉँव के बाहर भगा आते, लेकिन जरा देर में गायों में पहुंच जाता। किसी की अक्ल काम न करती थी कि इस संकट को कैसे टाला जाय। मथुरा का घर गांव के बीच में था, इसलिए उसके खेतों को सांड से कोई हानि न पहुंचती थी। गांव में उपद्रव मचा हुआ था और मथुरा को जरा भी चिन्ता न थी। आखिर जब धैर्य का अंतिम बंधन टूट गया तो एक दिन लोगों ने जाकर मथुरा को घेरा और बोले—भाई, कहो तो गांव में रहें, कहीं तो निकल जाएं। जब खेती ही न बचेगी तो रहकर क्या करेगें? तुम्हारी गायों के पीछे हमारा सत्यानाश हुआ जाता है, और तुम अपने रंग में मस्त हो। अगर भगवान ने तुम्हें बल दिया है तो इससे दूसरो की रक्षा करनी चाहिए, यह नही कि सबको पीस कर पी जाओ। सांड तुम्हारी गायों के कारण आता है और उसे भगाना तुम्हारा काम है; लेकिन तुम कानों में तेल डाले बैठे हो, मानो तुमसे कुछ मतलब ही नही। मथुरा को उनकी दशा पर दया आयी। बलवान मनुष्य प्राय: दयालु होता है। बोला—अच्छा जाओ, हम आज सांड को भगा देंगे। एक आदमी ने कहा—दूर तक भगाना, नही तो फिर लौट आयेगा। मथुरा ने कंधे पर लाठी रखते हुए उत्तर दिया—अब लौटकर न आयेगा। चिलचिलाती दोपहरी थी। मथुरा सांड को भगाये लिए जाता था। दोंनो पसीने से तर थे। सांड बार-बार गांव की ओर घूमने की चेष्टा करता, लेकिन मथुरा उसका इरादा ताडकर दूर ही से उसकी राह छेंक लेता। सांड क्रोध से उन्मत्त होकर कभी-कभी पीछे मुडकर मथुरा पर तोड करना चाहता लेकिन उस समय मथुरा सामना बचाकर बगल से ताबड-तोड इतनी लाठियां जमाता कि सांड को फिर भागना पडता कभी दोनों अरहर के खेतो में दौडते, कभी झाडियों में। अरहर की खूटियों से मथुरा के पांव लहू-लुहान हो रहे थे, झाडियों में धोती फट गई थी, पर उसे इस समय सांड का पीछा करने के सिवा और कोई सुध न थी। गांव पर गांव आते थे और निकल जाते थे। मथुरा ने निश्चय कर लिया कि इसे नदी पार भगाये बिना दम न लूंगा। उसका कंठ सूख गया था और आंखें लाल हो गयी थी, रोम-रोम से चिनगारियां सी निकल रही थी, दम उखड गया था; लेकिन वह एक क्षण के लिए भी दम न लेता था। दो ढाई घंटो के बाद जाकर नदी आयी। यही हार-जीत का फैसला होने वाला था, यही से दोनों खिलाडियों को अपने दांव-पेंच के जौहर दिखाने थे। सांड सोचता था, अगर नदी में उतर गया तो यह मार ही डालेगा, एक बार जान लडा कर लौटने की कोशिश करनी चाहिए। मथुरा सोचता था, अगर वह लौट पडा तो इतनी मेंहनत व्यर्थ हो जाएगी और गांव के लोग मेंरी हंसी उडायेगें। दोनों अपने–अपने घात में थे। सांड ने बहुत चाहा कि तेज दौडकर आगे निकल जाऊं और वहां से पीछे को फिरूं, पर मथुरा ने उसे मुडने का मौका न दिया। उसकी जान इस वक्त सुई की नोक पर थी, एक हाथ भी चूका और प्राण भी गए, जरा पैर फिसला और फिर उठना नशीब न होगा। आखिर मनुष्य ने पशु पर विजय पायी और सांड को नदी में घुसने के सिवाय और कोई उपाय न सूझा। मथुरा भी उसके पीछे नदी में पैठ गया और इतने डंडे लगाये कि उसकी लाठी टूट गयी। अब मथुरा को जोरो से प्यास लगी। उसने नदी में मुंह लगा दिया और इस तरह हौंक-हौंक कर पीने लगा मानो सारी नदी पी जाएगा। उसे अपने जीवन में कभी पानी इतना अच्छा न लगा था और न कभी उसने इतना पानी पीया था। मालूम नही, पांच सेर पी गया या दस सेर लेकिन पानी गरम था, प्यास न बुंझी; जरा देर में फिर नदी में मुंह लगा दिया और इतना पानी पीया कि पेट में सांस लेने की जगह भी न रही। तब गीली धोती कंधे पर डालकर घर की ओर चल दिया। लेकिन दस पांच पग चला होगा कि पेट में मीठा-मीठा दर्द होने लगा। उसने सोचा, दौड कर पानी पीने से ऐसा दर्द अकसर हो जाता है, जरा देर में दूर हो जाएगा। लेकिन दर्द बढने लगा और मथुरा का आगे जाना कठिन हो गया। वह एक पेड के नीचे बैठ गया और दर्द से बैचेन होकर जमीन पर लोटने लगा। कभी पेट को दबाता, कभी खडा हो जाता कभी बैठ जाता, पर दर्द बढता ही जाता था। अन्त में उसने जोर-जोर से कराहना और रोना शुरू किया; पर वहां कौन बैठा था जो, उसकी खबर लेता। दूर तक कोई गांव नही, न आदमी न आदमजात। बेचारा दोपहरी के सन्नाटे में तडप-तडप कर मर गया। हम कडे से कडा घाव सह सकते है लेकिन जरा सा-भी व्यतिक्रम नही सह सकते। वही देव का सा जवान जो कोसो तक सांड को भगाता चला आया था, तत्वों के विरोध का एक वार भी न सह सका। कौन जानता था कि यह दौड उसके लिए मौत की दौड होगी! कौन जानता था कि मौत ही सांड का रूप धरकर उसे यों नचा रही है। कौन जानता था कि जल जिसके बिना उसके प्राण ओठों पर आ रहे थे, उसके लिए विष का काम करेगा। संध्या समय उसके घरवाले उसे ढूंढते हुए आये। देखा तो वह अनंत विश्राम में मग्न था। एक महीना गुजर गया। गांववाले अपने काम-धंधे में लगे। घरवालों ने रो-धो कर सब्र किया; पर अभागिनी विधवा के आंसू कैसे पुंछते। वह हरदम रोती रहती। आंखे चांहे बन्द भी हो जाती, पर ह्रदय नित्य रोता रहता था। इस घर में अब कैसे निर्वाह होगा? किस आधार पर जिऊंगी? अपने लिए जीना या तो महात्माओं को आता है या लम्पटों ही को। अनूपा को यह कला क्या मालूम? उसके लिए तो जीवन का एक आधार चाहिए था, जिसे वह अपना सर्वस्व समझे, जिसके लिए वह जिये, जिस पर वह घमंड करे। घरवालों को यह गवारा न था कि वह कोई दूसरा घर करे। इसमें बदनामी थी। इसके सिवाय ऐसी सुशील, घर के कामों में कुशल, लेन-देन के मामलो में इतनी चतुर और रंग रूप की ऐसी सराहनीय स्त्री का किसी दूसरे के घर पड जाना ही उन्हें असह्रय था। उधर अनूपा के मैककवाले एक जगह बातचीत पक्की कर रहे थे। जब सब बातें तय हो गयी, तो एक दिन अनूपा का भाई उसे विदा कराने आ पहुंचा। अब तो घर में खलबली मची। इधर कहा गया, हम विदा न करेगें। भाई ने कहा, हम बिना विदा कराये मानेंगे नही। गांव के आदमी जमा हो गये, पंचायत होने लगी। यह निश्चय हुआ कि अनूपा पर छोड दिया जाय, जो चाहे करे। यहां वालो को विश्वास था कि अनूपा इतनी जल्द दूसरा घर करने को राजी न होगी, दो-चार बार ऐसा कह भी चुकी थी। लेकिन उस वक्त जो पूछा गया तो वह जाने को तैयार थी। आखिर उसकी विदाई का सामान होने लगा। डोली आ गई। गांव-भर की स्त्रिया उसे देखने आयीं। अनूपा उठ कर अपनी सांस के पैरो में गिर पडी और हाथ जोडकर बोली—अम्मा, कहा-सुनाद माफ करना। जी में तो था कि इसी घर में पडी रहूं, पर भगवान को मंजूर नही है। यह कहते-कहते उसकी जबान बन्द हो गई। सास करूणा से विहृवल हो उठी। बोली—बेटी, जहां जाओं वहां सुखी रहो। हमारे भाग्य ही फूट गये नही तो क्यों तुम्हें इस घर से जाना पडता। भगवान का दिया और सब कुछ है, पर उन्होने जो नही दिया उसमें अपना क्या बस; बस आज तुम्हारा देवर सयाना होता तो बिगडी बात बन जाती। तुम्हारे मन में बैठे तो इसी को अपना समझो: पालो-पोसो बडा हो जायेगा तो सगाई कर दूंगी। यह कहकर उसने अपने सबसे छोटे लडके वासुदेव से पूछा—क्यों रे! भौजाई से शादी करेगा? वासुदेव की उम्र पांच साल से अधिक न थी। अबकी उसका ब्याह होने वाला था। बातचीत हो चुकी थी। बोला—तब तो दूसरे के घर न जायगी न? मां—नही, जब तेरे साथ ब्याह हो जायगी तो क्यों जायगी ? वासुदेव-- तब मैं करूंगा। मां—अच्छा, उससे पूछ, तुझसे ब्याह करेगी। वासुदेव अनूप की गोद में जा बैठा और शरमाता हुआ बोला—हमसे ब्याह करोगी? यह कह कर वह हंसने लगा; लेकिन अनूप की आंखें डबडबा गयीं, वासुदेव को छाती से लगाते हुए बोली ---अम्मा, दिल से कहती हो? सास—भगवान् जानते है! अनूपा—आज यह मेंरे हो गये? सास—हां सारा गांव देख रहा है। अनूपा—तो भैया से कहला भेजो, घर जायें, मैं उनके साथ न जाऊंगी। अनूपा को जीवन के लिए आधार की जरूरत थी। वह आधार मिल गया। सेवा मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति है। सेवा ही उस के जीवन का आधार है। अनूपा ने वासुदेव को लालन-पोषण शुरू किया। उबटन और तैल लगाती, दूध-रोटी मल-मल के खिलाती। आप तालाब नहाने जाती तो उसे भी नहलाती। खेत में जाती तो उसे भी साथ ले जाती। थोडे की दिनों में उससे हिल-मिल गया कि एक क्षण भी उसे न छोडता। मां को भूल गया। कुछ खाने को जी चाहता तो अनूपा से मांगता, खेल में मार खाता तो रोता हुआ अनूपा के पास आता। अनूपा ही उसे सुलाती, अनूपा ही जगाती, बीमार हो तो अनूपा ही गोद में लेकर बदलू वैध के घर जाती, और दवायें पिलाती। गांव के स्त्री-पुरूष उसकी यह प्रेम तपस्या देखते और दांतो उंगली दबाते। पहले बिरले ही किसी को उस पर विश्वास था। लोग समझते थे, साल-दो-साल में इसका जी ऊब जाएगा और किसी तरफ का रास्ता लेगी; इस दुधमुंहे बालक के नाम कब तक बैठी रहेगी; लेकिन यह सारी आशंकाएं निमूर्ल निकलीं। अनूपा को किसी ने अपने व्रत से विचलित होते न देखा। जिस ह्रदय में सेवा को स्रोत बह रहा हो—स्वाधीन सेवा का—उसमें वासनाओं के लिए कहां स्थान? वासना का वार निर्मम, आशाहीन, आधारहीन प्राणियों पर ही होता है चोर की अंधेरे में ही चलती है, उजाले में नही। वासुदेव को भी कसरत का शोक था। उसकी शक्ल सूरत मथुरा से मिलती-जुलती थी, डील-डौल भी वैसा ही था। उसने फिर अखाडा जगाया। और उसकी बांसुरी की तानें फिर खेतों में गूजने लगीं। इस भाँति १३ बरस गुजर गये। वासुदेव और अनूपा में सगाई की तैयारी होने लगीं। लेकिन अब अनूपा वह अनूपा न थी, जिसने १४ वर्ष पहले वासुदेव को पति भाव से देखा था, अब उस भाव का स्थान मातृभाव ने लिया था। इधर कुछ दिनों से वह एक गहरे सोच में डूबी रहती थी। सगाई के दिन ज्यो-ज्यों निकट आते थे, उसका दिल बैठा जाता था। अपने जीवन में इतने बडे परिवर्तन की कल्पना ही से उसका कलेजा दहक उठता था। जिसे बालक की भॉति पाला-पोसा, उसे पति बनाते हुए, लज्जा से उसका मुंख लाल हो जाता था। द्वार पर नगाडा बज रहा था। बिरादरी के लोग जमा थे। घर में गाना हो रहा था! आज सगाई की तिथि थी: सहसा अनूपा ने जा कर सास से कहा—अम्मां मैं तो लाज के मारे मरी जा रही हूं। सास ने भौंचक्की हो कर पूछा—क्यों बेटी, क्या है? अनूपा—मैं सगाई न करूंगी। सास—कैसी बात करती है बेटी? सारी तैयारी हो गयी। लोग सुनेंगे तो क्या कहेगें? अनूपा—जो चाहे कहें, जिनके नाम पर १४ वर्ष बैठी रही उसी के नाम पर अब भी बैठी रहूंगी। मैंने समझा था मरद के बिना औरत से रहा न जाता होगा। मेंरी तो भगवान ने इज्जत आबरू निबाह दी। जब नयी उम्र के दिन कट गये तो अब कौन चिन्ता है! वासुदेव की सगाई कोई लडकी खोजकर कर दो। जैसे अब तक उसे पाला, उसी तरह अब उसके बाल-बच्चों को पालूंगी। ******
- हृदय का स्पंदन
राजीव लोचन यह उस ज़माने की बात है, जब लड़के-लड़की की शादी उनके माता-पिता या बड़े भाई-बहन तय कर देते थे। आज के ज़माने की तरह लड़का-लड़की न तो एक दूसरे को देखते थे और न ही मिलते थे। माता-पिता के कहे अनुसार ही शादी कर लेते थे। यह कहानी राजीव व परी की है। राजीव लुधियाना शहर का रहने वाला बहुत ही सुंदर नौजवान है, एक बैंक में काम करता है, अपना घर व संयुक्त परिवार है। परी फिरोजपुर के पास एक छोटे-से गाँव में रहती है। लंबी-पतली, सुंदर। घर के सभी कामों में दक्ष। उसकी बहन की शादी लुधियाना में हुई है। एक दिन जब वह किसी काम से बैंक जाती है तो राजीव को देखकर उसे अपनी छोटी बहन का ख्याल आ जाता है। वह जाँच-पड़ताल करती है तथा राजीव के घरवालों से बात करके परी के लिए रिश्ता माँग लेती है। राजीव के घरवाले भी उसकी शादी जल्दी करवाना चाहते हैं, इसलिए वे इस शर्त पर हाँ कर देते हैं कि लड़की शादी के बाद नौकरी नहीं करेगी। दोनों तरफ़ से रिश्ता तय हो जाने के बाद शादी की तारीख आ जाती है पर राजीव और परी ने एक दूसरे को कभी नहीं देखा, न ही फोन पर बात की, पर हाँ एक दूसरे को खत ज़रूर लिखे थे, वे भी छिपकर। शादी के दिन राजीव बहुत खुश था कि वह अपनी दुल्हन परी को देखेगा, परंतु परी तो उसके सामने ऐसे आई जैसे गठरी में किसी को लपेटा हो, चेहरा बिल्कुल भी नज़र नहीं आ रहा था। आखिर उनके रिवाज़ था कि शादी से पहले लड़का-लड़की एक दूसरे को नहीं देखते। राजीव के सारे अरमानों पर पानी फिर गया। शादी के बाद जब वे घर वापिस आए तो कमरे में जब राजीव ने परी को देखा तो देखता ही रह गया। परी ने जब राजीव की ओर देखा तो उनकी आँखें चार हो गईं। उन दोनों को उनके सब्र का मीठा फल मिल गया। दोनों ने आँखों ही आँखों में जिन्दगी भर एक दूसरे का साथ निभाने का वादा कर लिया। *******
- विजेता मेंढक
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव बहुत समय पहले की बात है एक सरोवर में बहुत सारे मेंढक रहते थे। सरोवर के बीचों-बीच एक बहुत पुराना धातु का खम्भा भी लगा हुआ था, जिसे उस सरोवर को बनवाने वाले राजा ने लगवाया था। खम्भा काफी ऊँचा था और उसकी सतह भी बिलकुल चिकनी थी। एक दिन मेंढकों के दिमाग में आया कि क्यों ना एक रेस का आयोजन किया जाए। रेस में भाग लेने हेतु प्रतियोगियों को खम्भे पर चढ़ना होगा, और जो सबसे पहले ऊपर पहुँच जाएगा वही विजेता माना जाएगा। रेस का दिन आ पंहुचा, चारों तरफ बहुत भीड़ थी। आस-पास के इलाकों से भी कई मेंढक इस रेस में हिस्सा लेने पहुचे। माहौल में सरगर्मी थी, हर तरफ शोर ही शोर था। रेस शुरू हुई। लेकिन खम्भे को देखकर भीड़ में एकत्र हुए किसी भी मेंढक को ये यकीन नहीं हुआ कि कोई भी मेंढक ऊपर तक पहुंच पायेगा। हर तरफ यही सुनाई देता “अरे ये बहुत कठिन है” “वो कभी भी ये रेस पूरी नहीं कर पायंगे।” “सफलता का तो कोई सवाल ही नहीं, इतने चिकने खम्भे पर चढ़ा ही नहीं जा सकता।” और यही हो भी रहा था, जो भी मेंढक कोशिश करता, वो थोडा ऊपर जाकर नीचे गिर जाता। कई मेंढक दो-तीन बार गिरने के बावजूद अपने प्रयास में लगे हुए थे। पर भीड़ तो अभी भी चिल्लाये जा रही थी, “ये नहीं हो सकता, असंभव”, और वो उत्साहित मेंढक भी ये सुन-सुनकर हताश हो गए और अपना प्रयास छोड़ दिया। लेकिन उन्हीं मेंढकों के बीच एक छोटा सा मेंढक था, जो बार-बार गिरने पर भी उसी जोश के साथ ऊपर चढ़ने में लगा हुआ था। वो लगातार ऊपर की ओर बढ़ता रहा, और अंततः वह खम्भे के ऊपर पहुँच गया और इस रेस का विजेता बना। उ सकी जीत पर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ, सभी मेंढक उसे घेर कर खड़े हो गए और पूछने लगे, “तुमने यह असंभव काम कैसे कर दिखाया, भला तुम्हें अपना लक्ष्य प्राप्त करने की शक्ति कहाँ से मिली, ज़रा हमें भी तो बताओ कि तुमने ये विजय कैसे प्राप्त की?” तभी पीछे से एक आवाज़ आई “अरे उससे क्या पूछते हो, वो तो बहरा है।” सार - हमारे अन्दर अपना लक्ष्य प्राप्त करने की काबीलियत होती है, पर हम अपने चारों तरफ मौजूद नकारात्मकता की वजह से खुद को कम आंक बैठते हैं। और हमने जो बड़े-बड़े सपने देखे होते हैं उन्हें पूरा किये बिना ही अपनी ज़िन्दगी गुजार देते हैं। ******
- सच्चा गुरु
मुकेश ‘नादान’ नरेंद्र की उस समय जो मन:स्थिति थी, उसके विषय में स्वामी सारदानंद ने अपने ग्रंथ 'श्रीरामकृष्ण लीला प्रंग' में लिखा है, “मैं सोच में पड़ गया कि इच्छा मात्र से यह पुरूष अगर मेरे जैसे प्रबल इच्छा-शक्ति वाले मन को और दृढ़ संस्कार युक्त गठन को इस प्रकार मिट्टी के लोटे की भाँति तोड़-फोड़कर अपने अनुरूप ढाल सकता है, तो फिर यह पागल कैसे हो सकता है? लेकिन पहली भेंट में ही एकांत में ले जाकर इन्होंने मुझे जिस तरह संबोधित किया, उसे क्या कहा जाए? बुद्धि का उन्मेष होने के अनंतर खोज तथा तर्कयुक्ति की सहायता से प्रत्येक वस्तु तथा व्यक्ति के विषय में एक मत स्थिर किए बिना मैं कभी निश्चिंत नहीं हो सका। इसी स्वभाव में आज एक प्रंड आघात लगा। इससे इस संकल्प का उदय हुआ कि जैसे भी हो, इस अद्भुत पुरूष के स्वभाव तथा शक्ति की बात अवश्य समझनी चाहिए।” नरेंद्र जिसे आदर्श के रूप में खोज रहे थे, वे वही थे। फिर भी नरेंद्र जैसे दृढ़ संस्कारयुक्त व्यक्ति के लिए भी श्रीरामकृष्ण जैसे अदूभुत पुरूष को एकाएक गुरु के रूप में धारण करना संभव नहीं था। अतः उन्होंने श्रीरामकृष्ण की परीक्षा लेने का निश्चय किया। एक दिन सुबह के समय, जब नरेंद्र अपने मित्रों के साथ अध्ययन में जुटे थे, उन्हें किसी के पुकारने का स्वर सुनाई दिया- घनरेन, नरेन!” स्वर सुनते ही नरेंद्र हड़बड़ाकर तेजी से दुवार खोलने के लिए लपके। उस स्वर को वे पहचानते थे। आगंतुक श्रीरामकृष्ण ही थे। नरेंद्र को देखते ही श्रीरामकृष्ण की आँखों में आँसू भर आए। वे बोले, “तू इतने दिनों से आया क्यों नहीं?” नरेंद्र उन्हें आदर सहित भीतर ले आए। आसन ग्रहण करने के पश्चात् श्रीरामकृष्ण ने उन्हें अंदेशे खाने को दिए, जिन्हें नरेंद्र ने अपने मित्रों में भी बाँटा। इसके पश्चात् श्रीरामकृष्ण ने नरेंद्र से भजन गाने को कहा। नरेंद्र ने 'जागो माँ कुल वुंक्तडलिनी' भजन गाया। भजन आरंभ होते ही रामकृष्ण भावविभोर हो उठे और समाधि में लीन हो गए उन्हें संज्ञाशून्य होता देखकर नरेंद्र के मित्र भयभीत हो उठे। तब नरेंद्र बोला, “भयभीत मत होओ। वे संज्ञाशुन्य नहीं हुए हैं, बल्कि भावविभोर हुए हैं। दूसरा भजन सुनकर पुन: चेतना में आ जाएँगे।” नरेंद्र का कथन सत्य सिद्ध हुआ। नरेंद्र ने अन्य भजन गाने आरंभ किए, तो रामकृष्णजी की चेतना लौट आई। गीतों का सिलसिला समाप्त होने पर श्रीरामकृष्ण नरेंद्र को आग्रहपूर्वक दक्षिणेश्वर ले गए। नरेंद्र यदि कुछ दिनों तक दक्षिणेश्वर जाकर श्रीरामकृष्ण से भेंट नहीं करते थे, तो वे व्याकुल हो उठते थे। ******
- अर्धांगिनी
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव लेफ्टिनेंट कर्नल की नवेली पत्नी सीमा ने जैसे ही पति के पार्थिव शरीर को झंडे में लिपटे हुए देखा, जोर से फफक पड़ी। अपने दिवंगत पति के माथे को चूम कर वह बहुत रोई। इतना रोई कि नाक और आँख सिंदूर की तरह लाल हो गये, परंतु उसके माथे की लाली गायब थी। दोनों की शादी के अभी मात्र छः महीने ही हुए थे। खेलने-खाने की उम्र में सीमा विधवा हो गई। अब उसके जीवन में न कोई रंग रहा, न ही रस। उसे लगा, जीना बेकार है। आखिर, करे तो क्या करे? इसी ऊहापोह में वह कई महीनों से मर-मर कर जी रही थी। अचानक एक दिन, वाश रूम में लगे आईने ने उसे धिक्कारते हुए कहा, "अपनी सुरत तो देख, पच्चीस वर्ष की है, और चालीस की लगती है। आँखों के पास झुर्रियाँ और बाल सफ़ेद दिख रहे हैं। पढ़ी-लिखी होकर अपना ये हाल बना लिया।" सुनकर वह धक्क सी रह गयी। तुरंत कमरे में जाकर पति के तस्वीर को गले से लगाया और घंटों तक अपने दुखों को आँसूओं के सैलाब से धोती रहीं। एकाएक उसके मन से काला, सघन बादल छंट गया, सुनहरी धूप निकल आई। सीमा के उजड़े जीवन में मानो फिर से बहार छा गयी। आत्मविश्वास भरे लहजे में उसने पति की तस्वीर से कहा, "प्रिय, आपसे वादा करती हूँ कि इस तरह रो कर मैं अपना जीवन बर्बाद नहीं करूँगी। आपकी तरह मैं भी देश के लिए शहीद हो जाना चाहती हूँ। आखिर, आपकी अर्धांगिनी जो हूँ।" वह तैयार होकर सेना में भर्ती के लिए आवेदन करने निकलने लगी। जाते समय उसने अपना चेहरा आईने में फिर से देखा। इसबार आईना मुस्कुरा कर उसे 'जय जवान' कह रहा था। ******











