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अपनों की यादें

विजय शंकर प्रसाद.


अंतरंग साँस से प्रेरित है जीवन,
बेकाबू हालात से पस्त हो सहा।
मौत के तुल्य है तलब ज़हर,
कहीं तेरा आईना तक है तंहा।
एकतरफा इश्क का खेल तो निराला,
पानी-पानी हो व्यतीत बेपानी हर लम्हा।
शबनम का हरी घास पर परीक्षा,
सूरज की तपिश ने कुछ औरों कहा।
यक्ष दिखा नहीं तो मत दो दीक्षा,
धर्मराज और यमराज पर एतबार ढहा।
रिश्तों की होने लगी आज़ समीक्षा,
ख़्वाब हमेशा तो है न लहा।
खौफ़ में कुत्तों द्वारा नाहक़ भीक्षा,
हवा संग तू तो मैं भी बहा।
गर्म चाय मतलब इर्द-गिर्द ही धुआँ,
धूल से भिक्षुक गया है नहा।
पनिहारिन हेतु नहीं कहीं सही कुआँ,
मृगतृष्णा में दुविधा कि क्या हाँ?
गिलहरी को याद सामर्थ्य की सीमा,
बिल्ली से हटकर अलग है चूहा नन्हा।
अपनों की यादें दिल तक अटूट है,
उधारी या दान वरदान देशहित में कहाँ?
पत्थर का शहर में चकाचौंध है रब,
तभी तो छँटा नहीं तम आख़िर यहाँ।

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