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  • परिहास

    मनोज कुमार पुर्रे 'मौजी' हाथों में स्वेत ध्वजा लेकर अगर तुम कदम बढ़ा ना सको, मानवीय तत्वों व भावनाओं को जो स्वयं में जगा ना सको तो नाम में तुम्हारे उपहास ही लिखा जायेगा!! अपने समाज, कुल और महापुरुषों के गौरव के जो मान अगर बढ़ा ना सको तो तुमकों यहाँ पराजित व हताश ही लिखा जायेगा!! वीर गुरु बालकदास जैसा अगर तुम तलवार उठा ना सको, इंसानियत को तुम बचा न सको तो तुम्हारे लिए जीवनपर्यंत परिहास ही लिखा जायेगा!! तुम मानव-मानव एक को अगर चरितार्थ कर दिखा सको, गुरु घासीदास जी के बताए उद्देश्यों को अपना सको, तो तुम्हारे नाम से स्वर्णिम इतिहास ही लिखा जायेगा!! *******

  • मुस्कान

    संगीता मिश्र हरेक मुस्कान, हर आँसू जो कह जाये वो क़िस्सा है। जहां भर की गुनहगारी में मेरा भी तो हिस्सा है। तेरी उंगली पकड़ कर चल रही साये की तरह मैं झटक कर चल पड़ा तू, ऐ ख़ुदा, कैसा ये ग़ुस्सा है? नदी की तिश्नगी उसको लिये जाती है सागर तक वजूद उसका समन्दर है, कि सागर भी उसी-सा है। मेरी दादी जो बैठी चाँद पर, बुनतीं सियह रातें नुमायाँ इस क़दर, वो चाँद की मिट्टी का विरसा है। 'संगीता' की ग़ज़ल है ये मिसाल-ए-ख़ुद-एतिमादी सुख़न में सख़्त लोहे सी, कहन में जैसे सीसा है। *****

  • खूबसूरत

    अनजान एक अंधा लड़का एक इमारत की सीढ़ियों पर बैठा था। उसके पैरों के पास एक टोपी रखी थी। पास ही एक बोर्ड रखा था, जिस पर लिखा था, "मैं अंधा हूँ कृप्या मेरी मदद करें" टोपी में केवल कुछ सिक्के थे। वहां से गुजरता एक आदमी यह देख कर रुका, उसने अपनी जेब से कुछ सिक्के निकाले और टोपी में गिरा दिये। फिर उसने उस बोर्ड को पलट कर कुछ शब्द लिखे और वहां से चला गया। उसने बोर्ड को पलट दिया था जिससे कि लोग वह पढ़ें जो उसने लिखा था। जल्द ही टोपी को भरनी शुरू हो गई। अधिक से अधिक लोग अब उस अंधे लड़के को पैसे दे रहे थे। दोपहर को बोर्ड बदलने वाला आदमी फिर वहां आया। वह यह देखने के लिए आया था उसके शब्दों का लोगों पर क्या प्रभाव पड़ा? अंधे लड़के ने उसके क़दमों की आहट पहचान ली और पूछा, "आप सुबह मेरे बोर्ड को बदल कर गए थे? आपने बोर्ड पर क्या लिखा था?" उस आदमी ने कहा मैंने केवल सत्य लिखा था, मैंने तुम्हारी बात को एक अलग तरीके से लिखा, "आज एक बहुत खूबसूरत दिन है और मैं इसे नहीं देख सकता।" आपको क्या लगता है? पहले वाले शब्द और बाद वाले शब्द, एक ही बात कह रहे थे? बेशक दोनों संकेत लोगों को बता रहे थे कि लड़का अंधा था। लेकिन पहला संकेत बस इतना बता रहा था कि वह लड़का अंधा है। जबकि दूसरा संकेत लोगों को यह बता रहा था कि वे कितने भाग्यशाली हैं कि वे अंधे नहीं हैं। क्या दूसरा बोर्ड अधिक प्रभावशाली था? यह कहानी हमें यह बताती है कि, जो कुछ हमारे पास है उसके लिए हमें आभारी होना चाहिए। *******

  • तीर्थ

    अनजान 'गाड़ी रोको बेटा।' कार की खिड़की से बाहर झाँक रहे रत्नेश बाबू ने सामने नजर आ रही बिल्डिंग पर आँखें गढ़ाए अपने बेटे आयुष से कहा। आयुष ने कार रोक कर साइड में खड़ी कर दी। रत्नेश बाबू दरवाजा खोल कर नीचे उतरे और पैदल चलते हुए बिल्डिंग के बाहर लगे लोहे के विशाल गेट से अंदर झाँकने लगे। उनकी आँखों में गर्व की चमक उभर आयी। आयुष ने यहीं से पढ़ाई की शुरुआत की थी। तब यहाँ की फीस भरना उनके सामर्थ्य के बाहर था पर बेटे के बेहत्तर भविष्य के लिए उन्होंने जैसे-तैसे सब सहन किया। उस समय का छोटा सा स्कूल आज शहर का सबसे प्रतिष्ठित कॉलेज था और आयुष एक बड़ा अधिकारी। उनके ओठों पर खिली गर्वीली मुस्कान और गाढ़ी हो गई थी। धीरे-धीरे चलते हुए वह स्कूल के बगल में बने पार्क तक पहुँच गए। वहाँ लगे झूलों को देख कर उन्हें वर्षों पुरानी एक घटना याद आ गयी। आयुष बचपन में उस बीच वाले झूले से अचानक फिसल गया था। उन्होंने छलांग लगा कर बेटे को सुरक्षित बचा लिया था। इस प्रयास में उनके दाएं हाथ में गहरी चोट आ गई थी। बाएं हाथ की उंगलियों से चोट के निशान को सहलाते हुए रत्नेश बाबू की आँखों में आयुष के लिए ढेर सारा स्नेह उमड़ आया। पार्क के बाहरी कोने में एक बड़ा सा मन्दिर बना था। वह जूते उतार कर मंदिर के भीतर गए और वहाँ स्थापित काली माता की मूर्ति के चरणों में सिर रख दिया। शादी के कई सालों बाद तक यशोधरा की गोद सूनी थी। उन्होंने और यशोधरा ने महीनों बिना नागा यहाँ माथा टेका तब आयुष का जन्म हुआ था। यशोधरा कहती थी कि उसका बेटा बड़ा हो कर उसे तीर्थ कराने ले जायेगा, लेकिन वक्त की हवा उसे उसकी अधूरी इच्छा के साथ उड़ा कर दूर गगन में ले गयी थी। उनकी आँखों की कोरें गीली हो गयी थीं। आयुष पिछले कई दिनों से उन्हें तीर्थ पर ले जाने की कह कर रहा था। उन्हें लगता था कि उम्र के अंतिम सोपान में पाँच वर्षीय पोते की तोतली बातों में जो सुख है वह किसी तीर्थ में कहाँ, इसलिए टाल रहे थे। अब बहू भी जिद करने लगी थी तो तैयार होना पड़ा। पोते को सोता छोड़ कर आये थे, वरना वह कभी नहीं आने देता। वह तीर्थ पर जाते समय इन स्मृतियों से साक्षात्कार कर जैसे यशोधरा से कह रहे थे कि तुम्हारा देखा सपना आज पूरा हो रहा है। वह वापिस आ कर कार में बैठ गए, पर मन अभी भी अतीत की सुगंधित गलियों से नाता जोड़े था। शहर निकलने के बाद आयुष एक पुरानी इमारत के बाहर कार रोक कर नीचे उतरा, तब उनकी तन्द्रा भंग हुयी। 'ये क्या है?' उन्होंने बाहर निकल कर असमंजस से पूछा। 'तीर्थ...।' उनकी ओर देखे बिना आयुष ने कहा और उन्हें लेकर भीतर गया। 'कहाँ ले आये बेटा।' वहाँ का नजारा देख कर रत्नेश बाबू का चेहरा सफेद पड़ गया, 'ये तो ओल्ड एज...।' वह आगे नहीं बोल पाये। आँसुओं के तीव्र सैलाब के साथ उनका कंठ अवरुद्ध हो गया था। ******

  • बेटा लौट आया

    अनजान वह बच्चा सड़क पर दौड़ रहा था, पीछे से ट्रक आता देख मनीषा भागी और बच्चे को बचा लिया। एक ठेले वाले ने मनीषा की हिम्मत की दाद दी और कहा," मैडम, आपको मानना पड़ेगा। वैसे यह ट्रक वाला दृश्य देखकर किसी भी माँ में हिम्मत आ जायेगी।" तभी उषा आकर मनीषा पर चिल्लाने लगी," कहाँ ले जा रही हो मेरे मोनू को, कल ही मैंने पढ़ा था कि शहर में बच्चे उठाने वाला गैंग सक्रिय हैं, तुम उसी गैंग की लगती हो, अभी पुलिस को बुलाती हूँ।" ठेले वाले ने उषा को रोका, बताया कि मनीषा ने कैसे अपनी परवाह न कर बच्चे को बचाया। फिर मनीषा से बोला,"जिस तरह आपने दौड़कर बच्चे को उठाया, छाती से चिपकाया मुझे लगा कि आप उसकी माँ है लेकिन माँ तो यह बहन निकली।" मनीषा ने कहा, "मैं इस बच्चे की माँ न सही परंतु माँ तो हूँ, हूँ नहीं थी। ऐसे ही मेरा बच्चा भी सड़क पर खेल रहा था, सामने से तेज गति से बाइक आ रही थी, मैं अपने बच्चे को बचाने भागी परंतु बदकिस्मती से गिर पड़ी। पास में दो महिलाएँ भी खड़ी थी, दोनों एक दूसरे को देख रही थी जैसे कह रही हो कि तुम जाओ बचाने, उस दिन उन दोनों में से किसी ने मेरे जैसी हिम्मत दिखा दी होती तो आज मेरा..।" मनीषा की ममता हाथों से चेहरा छिपाकर रो उठी। मनीषा के आँसू उषा की आँखों में आ गये। वह मनीषा से बोली, "बहन, माँ कभी थी' नहीं होती। मोनू को अपना बेटा ही समझिये, यह लीजिये मेरा कार्ड, मोनू से मिलने का जब मन करे आ जाइयेगा।" *******

  • अंतर्जातीय प्रेम विवाह

    अमरेन्द्र भला हो अंतर्जातीय प्रेम विवाह का, जो आज नफरत को मिटा रहा। जाति और धर्म का, सीमा को लांघ रहा। न कोई जाति न कोई धर्म है, जो आज इससे अछूता रह गया। सब जाति-धर्म आज सब में है मिल रहा, ऊॅच और नीच का है झंझट मिट रहा। मैं सराहता हॅू उन जोड़ियों को, जो ये नेक काम कर रहा। इस पुनीत कार्य से वो, युगों से आ रही भेदभाव मिटा रहा। जो लग रहा था कल तक अभेद्य, आज उसको है भेदा जा रहा। भला हो अंतर्जातीय प्रेम विवाह का, जो आज नफरत को मिटा रहा। क्या ब्राह्मण क्या क्षत्रिय, क्या वैश्य क्या शुद्र बन रहा। सबमें हुआ अंतर्जातीय विवाह, कोई भी नहीं है इससे बाकी रह गया। मूर्खता होगा किसी को भी, जो तुम अछूत कह रहा। बहुत बड़ा है मानवतावादी वो, जो है प्रेम का अर्थ समझ रहा। महान है वो लोग जो आज, अंतर्जातीय विवाह को बढ़ावा दे रहा। आज रूढ़िवादी पुरातनपन्थ का, है देखो कैसे अंत हो रहा। कौन किस जाति और मजहब का रह गया, मुश्किल होगा कहना वो दिन आ रहा। मानव हैं हम मानव हमारी जाति, और मानवता ही केवल धर्म रह जायेगा। सब बकवास मिट जायेगा, आज सब एक हो रहा। भला हो अंतर्जातीय प्रेम विवाह का, जो आज नफरत को मिटा रहा। ******

  • औरत

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव पिछले हफ्ते मेरी पत्नी को बुखार था। पहले दिन तो उसने बताया ही नहीं कि उसे बुखार है। दूसरे दिन जब उससे सुबह उठा नहीं गया तो मैंने यूं ही पूछ लिया कि तबीयत खराब है क्या? उसने कहा कि नहीं, तबीयत खराब तो नहीं है, हां थोड़ी थकावट है। मैं चुपचाप अखबार पढ़ने में मशगूल हो गया। जरा देर से उस दिन वो जगी और फटाफट उसने मेरे लिए चाय बनाई, बिस्किट दिए और मैं अखबार पढ़ते-पढ़ते चाय पीता रहा। मुझे पता लग चुका था कि उसे थोड़ा बुखार है, और ये बात मैंने उसे छू कर समझ भी ली थी। खैर, मैं यही सोचता रहा कि मामूली बुखार है, शाम तक ठीक हो जाएगा। उसने थोड़ें बुखार में ही मेरे लिए नाश्ता तैयार किया। नाश्ता करते हुए मैंने उसे बताया कि आज खाना बाहर है, इसलिए तुम खाना मत बनाना। उसने धीरे से कहा कि अरे ऐसी कोई बात नहीं, खाना तो बना दूंगी। लेकिन मैंने कहा कि नहीं, नहीं दफ्तर की कोई मीटिंग है, उसके बाद खाना बाहर ही है। फिर मैं तैयार होकर निकल गया। मैं पुरुष हूं। पुरुष मजबूत दिल के होते हैं। ऐसी मामूली बीमारी से पुरुष विचलित नहीं होते। मैं दफ्तर चला गया, फिर अपनी मीटिंग में मुझे ध्यान भी नहीं रहा कि पत्नी की तबीयत सुबह ठीक नहीं थी। खैर, शाम को घर आया, तो वो लेटी हुई थी। उसे लेटे देख कर भी दिमाग में एक बार नहीं आया कि यही पूछ लूं कि कैसी तबीयत है? वो लेटी रही, मैंने अपने कपड़े बदले और पूछ बैठा कि खाना? पत्नी ने मेरी ओर देखा और लेटे-लेटे उसने कहा कि अभी उठती हूं, बस अब ठीक हूं। जैसे ही उसने कहा कि मैं ठीक हूं, मुझे ध्यान आ गया कि अरे सुबह तो उसे बुखार था। खैर, अपनी शर्मिंदगी छिपाते हुए मैंने कहा कि कोई बात नहीं, तुम लेटी रहो। मैं रसोई में गया, मैंने अंदाजा लगाया कि उसने दोपहर में खाना नहीं खाया, क्योंकि खाना तो बना ही नहीं। मैंने फ्रिज से कुछ-कुछ निकाला, उसके लिए ब्रेड जैम लिया और अपने पति धर्म को निभाते हुए, खुद पर गर्व करते हुए उसके आगे खाने की प्लेट कर दी। पत्नी ने ब्रेड का एक टुकड़ा उठाया, मुझे आंखों से धन्यवाद कहा, और मन से कहा कि पति हो तो ऐसा हो, इतनी केयर करने वाला। मैंने एक दो बार यूं ही पूछ लिया कि तुम कैसी हो, कोई दवा दूं क्या? और अपने कम्यूटर आदि को देखता हुआ सो गया। पत्नी अगली सुबह जल्दी उठ गई, मुझे लगा कि वो ठीक हो गई है, और मैंने फिर उसके बुखार पर चर्चा नहीं की। मैंने मान लिया कि वो ठीक हो गई है। कल मुझे सर्दी हो गई थी। दो तीन बार छींक आ गई थी। घर गया तो पत्नी ने कहा कि तुम्हारी तो तबीयत ठीक नहीं है। उसने सिर पर हाथ रखा, और कहा कि बुखार तो नहीं है, लेकिन गला खराब लग रहा है। ऐसा करो तुम लेट जाओ, मैं सरसों का तेल गरम करके छाती में लगा देती हूं। मैंने एक दो बार कहा कि नहीं-नहीं ऐसी कोई बात नहीं। लेकिन पत्नी ने मुझे कमरे में भेज ही दिया। मैं बिस्तर पर लेटा ही था कि मेरे लिए शानदार काढ़ा बन कर आ गया। अब मेरा गला खराब था तो काढ़ा बनना ही था। काढ़ा पी कर लेट गया। फिर दस मिनट में गरमा गरम सूप सामने आ गया। उसने कहा कि गरम सूप से गले को पूरी राहत मिलेगी। सूप पिया तो वो मेरे पास आ गई, और मेरे सिर को सहलाने लगी। कहने लगी कि इतनी तबीयत खराब है, इतना काम क्यों करते हो? बचपन में जब कभी मुझे बुखार होता था, मां सारी रात मेरे सिरहाने बैठी रहती। मैं सोता था, वो जागती थी। आज मैं लेटा हुआ था, मेरी पत्नी मेरा सिर सहला रही थी। मैं धीरे-धीरे सो गया। जागा तो वो गले पर विक्स लगा रही थी। मेरी आंख खुली तो उसने पूछा, कुछ आराम मिल रहा है? मैंने हां में सिर हिलाया। तो उसने पूछा कि खाना खाओगे? मुझे भूख लगी थी, मैंने कहा, "हां।" उसने फटाफट रोटी, सब्जी, दाल, चटनी, सलाद मेरे सामने परोस दिए, और आधा लेटे-लेटे मेरे मुंह में कौर डालती रही। मैने चुपचाप खाना खाया, और लेट गया। पत्नी ने मुझे अपने हाथों से खिला कर खुद को खुश महसूस किया और रसोई में चली गई। मैं चुपचाप लेटा रहा। सोचता रहा कि पुरुष भी कैसे होते हैं? कुछ दिन पहले मेरी पत्नी बीमार थी, मैंने कुछ नहीं किया था। और तो और एक फोन करके उसका हाल भी नहीं पूछा। उसने पूरे दिन कुछ नहीं खाया था, लेकिन मैंने उसे ब्रेड परोस कर खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा था। मैंने ये देखने की कोशिश भी नहीं की कि उसे वाकई कितना बुखार था। मैंने ऐसा कुछ नहीं किया कि उसे लगे कि बीमारी में वो अकेली नहीं। लेकिन मुझे सिर्फ जरा सी सर्दी हुई थी, और वो मेरी मां बन गई थी। मैं सोचता रहा कि क्या सचमुच महिलाओं को भगवान एक अलग दिल देते हैं? महिलाओं में जो करुणा और ममता होती है वो पुरुषों में नहीं होती क्या? सोचता रहा, जिस दिन मेरी पत्नी को बुखार था, उस दोपहर जब उसे भूख लगी होगी और वो बिस्तर से उठ न पाई होगी, तो उसने भी चाहा होगा कि काश उसका पति उसके पास होता? मैं चाहे जो सोचूं, लेकिन मुझे लगता है कि हर पुरुष को एक जन्म में औरत बन कर ये समझने की कोशिश करनी ही चाहिए कि सचमुच कितना मुश्किल होता है, औरत होना। मां होना, बहन होना, पत्नी होना..। *******

  • फ्लाइंग किस.....

    लक्ष्मी रश्मि की शादी को अभी सात महीने ही हुए थे। बात तो अच्छे से होती है पतिदेव से पर प्यार होगा या नहीं ये कहना अब भी मुश्किल है। ठीक ठाक ही व्यवहार है या यूं कहें कि भले आदमी हैं। शादी के पहले दो बार प्यार हुआ था रश्मि को पर दोनों लड़कों से कुछ ख़ास नहीं चल सका रिश्ता और पुरुषों के बारे में उसकी राय बहुत सकारात्मक तो नहीं ही है। इस बात के लिए वो बिलकुल क्लीयर है कि प्यार नहीं हुआ है उसे मोहन से अभी भी। सुबह का समय है। सासू मां बैठकर योगा कर रही हैं और ससुर जी अपने पसंदीदा 'आर जे' कि आवाज़ और उसके द्वारा सुनाये जा रहे गाने का लुत्फ़ उठा रहे हैं। मोहन आँफिस के लिए तैयार हो चुके हैं और दाल रोटी सब्जी तीनों तैयार हैं। बस खाकर निकलेंगे। उनके जाने के बाद ही रश्मि सास ससुर को खाना देती है। सासू मां वैसे तो हर चीज़ में बहुत अच्छी हैं पर खाना बनाने में कोई चूक बरदाशत नही करती और क्यूंकि रश्मि अच्छा खाना बनाती है तो उनकी खूब बनती भी है। रश्मि ने खाना लगा दिया है और मोहन बड़े चाव से खा रहे हैं। सासू मां ने पूछा खाना कैसा है तो हाँथ, आँख और मुँह तीनों से कह दिया "लाजवाब"। सासू मां खुश और और रश्मि ने भी चैन की सांस ली। खाना खाकर अब मोहन अपनी टाई लेने गए और बोले "रश्मि टाई कहाँ है... ढूँढ़कर दो।" वो कमरे मे पहुंची तो देखा टाई मोहन के हाथ में ही है और वह मुस्कुरा रहे हैं। रश्मि समझ गयी मोहन उसे छेड़ रहे हैं। मुड़कर जाने लगी तो उसकी कलाई पकड़कर झटके से ऐसे खींचा अपनी तरफ कि उनके सीने से टकरा गई और तुरंत मोहन का वो हाथ जिससे उसे खींचा था वो रश्मि की कमर पे था। अपना चेहरा उसके चेहरे के बिलकुल करीब ला दिया और रश्मि ने अपना चेहरा घुमा लिया मोहन ने उसके कान के पास आकर कहा "जानेमन दाल में, नमक डालना भूल गई हो", इतना कहके उसकी कमर से हाथ हटा लिया और मुस्कुराने लगा। वो तुरंत भागी ताकि सास ससुर को खाना देने से पहले ऊपर से ही नमक डाल दे। इतने में मोहन नीचे उतर चुके थे, पर रश्मि को अफ़सोस होने लगा कि मुझे सासू मां की डाँट से बचाने के लिए मोहन बिना नमक की दाल ही खा गए। आज तक तो उसने फिल्मों में आसपास हर मर्द को दाल में नमक ना होने पर गुस्सा करते ही देखा था। उसे ऐसा ही तो जीवनसाथी चाहिए था, जो छोटी बात और छोटी गलती को छोटा ही रहने दे फिजूल में बड़ा बनाकर सबका मूड ना ख़राब करे। उसे मोहन पे प्यार आने लगा या यूं कहें प्यार होने लगा। वो झट से बालकनी में गयी कि बाय कर दे, पर मारे प्यार में फ्लाइंग किस दे बैठी मोहन ने भी किस को कैच करके जेब में रख लिया। और गाड़ी स्टार्ट करके चला गया। ये सारी हरकते पड़ोसन त्रिपाठी आंटी देख रही थी, और जैसे ही रश्मि कि नज़र उनपे पड़ी वह थम्सअप का इशारा करके हँसने लगीं। वो शर्मा कर अंदर भाग आई। ससुर जी के रेडियो में गाना बज रहा था। "आजा पिया तोहे प्यार दूँ....... गोरी बइयां तोपे वार दूँ" ......" ********

  • पेट

    विनय कुमार मिश्रा दुकान बंद करने का समय हो आया था। तभी दो औरतें और आ गईं। "भैया साड़ियां दिखा देना कॉटन की, चुनरी प्रिंट में" आज मेरी खुशी का ठिकाना नहीं है। आज पाँच महीने हो गए हैं, अपनी ये छोटी सी दुकान खोले। आज से पहले कभी ऐसा नहीं हुआ। आज सुबह से दस पंद्रह कस्टमर आ चुके हैं। और बिक्री भी ठीक ठाक हो गई है। सच बोलूं तो इस दुकान का किराया निकालना भी बहुत मुश्किल हो रहा था। रोज एक या दो साड़ी तो कभी एक सूट बेच पाता था। या कभी सिर्फ एक दो दुपट्टे ही। मैंने माँ की सारी जमा पूंजी लगा दिया है। सोचा था, माल ठीक रखूंगा तो लोग आएंगे ही। लेकिन लोग आते ही नहीं थे। दुकान भी मेन रोड से सटे एक पतली सी गली में मिली है। लोगों को तो ठीक से दिखता भी नहीं होगा। पर एक बोर्ड मेन रोड पर लगा रखा है मैंने। सामने मेन रोड पर ही एक सरदार जी की साड़ियों की दुकान है। इस छोटे शहर के ज्यादातर लोग उन्हीं की बड़ी दुकान से कपड़े लेते हैं। रोज सैकड़ों कस्टमर उनके दुकान पर आते हैं। पर लगता है, माँ के आशीर्वाद से उनके दुकान की रौनक मैं अब, कुछ कम कर दूँगा। आज खुशी के साथ हैरानी भी हो रही है। कल ही तो माँ से मैं फोन पर दुकान बंद कर गली से निकलते हुए बातें कर रहा था। "माँ चाचा ने ठीक ही कहा था कोई छोटी मोटी नौकरी कर ले। दुकान चलाना तेरे बस की बात नहीं। और इतनी पगड़ी देकर दुकान भी मिली तो एक गली में जहां ग्राहक ही नहीं पहुंच पाते। सारे ग्राहक तो मेन रोड पर बड़ी दुकान पर चले जाते हैं। किराया निकालना भी मुश्किल हो रहा है। परिवार कैसे चलेगा माँ, और बच्चों को कहां से पढ़ा पाऊंगा" मैं कल बहुत मायूस था। और परेशान भी। सच बताऊँ तो कल मैं रो पड़ा था माँ से ये सब कहते हुए। "कोई नहीं बेटा। अब दुकान खोल ही लिया है तो धैर्य रख। किसी चीज़ में सफलता अचानक नहीं मिलती। देखना भगवान सब ठीक करेंगे" माँ का आशीर्वाद ही है। कल ही उन्होंने कहा और आज दुकान पर थोड़ी रौनक हो आई है। "ये दोनों पैक कर दीजिए" उन्हें साड़ियां पसंद आ गई थीं। मैं उनका बिल बना रहा था तभी एक औरत बोल पड़ी। "सरदार जी ने ठीक कहा कि कॉटन की साड़ियां भी अच्छी मिल जाएगी यहां और दाम भी ठीक लगाते हैं।" "जी कौन सरदार जी?" "यही अपने बूटा जी साड़ी वाले। उनके पास चुनरी प्रिंट की साड़ियां नहीं थीं।" मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। बूटा जी अपने कस्टमर यहां क्यों भेज रहे हैं। उनके यहां तो खुद सारे कलेक्शन होते हैं। मैंने पैसे लेकर गल्ले में रख लिया। दुकान बंद कर उनके दुकान पर पहुंचा। वे भी दुकान बंद ही कर रहे थे। "बूटा सिंह जी, आपने अपने ग्राहकों को मेरी दुकान पर भेजा? "ओए नहीं जी! बस उन्हें जो चाहिए था वो मेरी दुकान पर नहीं था तो आपका दुकान बता दिया।" मैं जानता हूँ। इनके दुकान पर सब होता है। उनके वर्कर साड़ियां समेट रहे थे। उनमें कुछ वैसी ही साड़ियां भी थी। मैं ये देख फिर उनकी तरफ देखा। "इसमें आपका नुकसान नहीं होगा बूटा सिंह जी?" "नुकसान की क्या बात है जी, सबकी गृहस्थी चलनी चाहिए। तुम्हारा भी तो परिवार है।" शायद इन्होंने कल फोन पर माँ से मेरी बात सुन ली थी। "मैं इस बात पर खुश हो रहा था कि ये सब माँ के आशीर्वाद से हो रहा है पर ये सब आप ..?" "ओए नहीं पुत्तर! ये सब माँ का ही आशीर्वाद है, हम सब की माएँ तो एक सी ही तो होती हैं ना!" उन्हें देख, मैं खुद अपनी सोच पर शर्मिंदा था। मेरी आँखें नम हो आईं। वे मेरे कंधे पर हाथ रख ये कहते हुए निकल गए। "मेरी माँ ने मुझसे ये कहा था, अपने साथ साथ दूसरों के पेट का भी थोड़ा ख्याल रखना।" इस कॉम्पटीशन के दौर में ऐसी बातों की, कतई उम्मीद नहीं थी..! ******

  • आत्महत्या

    पूनम जो छोड़कर जा रहा हो, उसे खुशी से जाने दो, रोकना ना कभी, हो सकता है ऊपर वाले ने, तुम्हारे लिए, कुछ और बेहतर सोच रखा हो। आदतें जो लगी हुईं हैं, चाहे वो कोई काम, या फिर कोई इंसान, वो छूट भी सकती हैं। जब भी हो मन अशांत, गहरी सांसे लेते हुए, बोलो, नम: शिवाय। आत्महत्या कोई विकल्प नहीं, शिव की शरण लेते हुए, फिर से उठो, फिर एक नई कहानी लिखो, फिर एक नया इतिहास बनाओ, जीवन बहुत सुंदर है, इसे खत्म करने की न सोचो, वो भी उनके लिए, जिन्हें तुम्हारी कोई परवाह नहीं। भूल कैसे सकते हो, मां बाप का सबसे सच्चा प्यार, जिन्होंने तुम्हें आकार दिया। भगवान के दर्शन को साकार किया। प्रेम धरा के कण–कण में है। आंखे खोलकर देखो तो सही। बंद हुए त्रिनेत्र को जागृत करो तो सही। जो छोड़कर जा....... ******

  • दिल की आवाज

    मनीष कुमार ‘शुक्ल' बादल गरजे बिजली चमकी, अब केवल बरसात है बाकी। मेरे हिस्से सुबह नहीं है, एक यही बस रात है बाकी। एकटक तुझ को देख रही थी, और इसी में शाम हो गई। जो कहना था कह न पायी, कितनी सारी बात है बाकी। दिन तो जैसे बन के पखेरू, इक लम्हे में दूर हो गया। धड़कन-धड़कन दिल में मेरे, प्यार तेरा नासूर हो गया। महफ़िल हो या तन्हाई हो, तू ही तू महसूस हो मुझ को। हर पल तेरी सोच में रहना, अब मेरा दस्तूर हो गया। जब तक यह संसार है क़ायम, तू मेरा संसार रहेगा। जो भी मेरे हक़ की दुआ है, तू उस का हक़दार रहेगा। तेरे बिना सब तीज अधूरे, जप-तप पूजा-पाठ अधूरी। तब हर इक त्यौहार मनेगा, जब तू मेरे पास रहेगा। अब आना तो ऐसे आना, लौट के फिर न वापस जाना। एक तुझे खोने का डर है, और नहीं कुछ भी है पाना। बैरी नींद हुयी है मेरी, चैन न मुझ को इक पल आये। तू जो नहीं तो फूल भी काँटे, सुख न देता सेज-बिछौना। हँसते चेहरे मुझे चिढ़ाते, बैठ अकेले रोना होगा। ख़ून के आँसू बहा-बहा कर, दिल के दाग़ को धोना होगा। बस इतनी दरकार है तुझ से, और नहीं कुछ चाहत मेरी। मेरा महल-दुमहला सब कुछ, तेरे दिल का कोना होगा। *****

  • मुफ्त की आया

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव वृद्धाश्रम के दरवाजे पर रोज एक कार आकर लगती थी। उस कार में से एक नौजवान उतरता और एक बुढ़ी महिला के पास जाकर बैठ जाता। एक आध घंटे तक दोनों के बीच कुछ वार्तालाप चलती फिर वह उठकर चला जाता। यह प्रक्रिया अनवरत चल रही थी। धीरे-धीरे सबको पता चल गया कि बुढ़ी महिला उस नौजवान की माँ हैं। आज फिर वह सुबह से आकर बैठा था और बार-बार माँ के पैर पकड़ माफ़ी मांग रहा था। दूर बैठे वृद्धाश्रम के गेट कीपर को रहा नहीं गया वह एक बुजुर्ग से बोला- "लोग कहते हैं कि औलाद की नीयत बदल जाती है पर यहाँ का दृश्य तो कुछ और ही कह रहा है।" बुजुर्ग महिला ने कहा- "ऐसा नहीं है भाई कि जो तुम्हारी आँखें देख रही हो वह सही हो। कोई बात तो जरूर होगी तभी लोग वृद्धाश्रम के दरवाजे तक आते हैं।" जब वह चला गया तो दरबान उस बुजुर्ग महिला के पास पहुंचा। हाल-चाल पूछने के क्रम में वह पूछ बैठा- "ताई आपसे मिलने जो लड़का आता है वह आपका बेटा है न!" बुढ़ी थोड़ी सकुचाते हुए हाँ में सिर हिलाकर चुप हो गईं। दरबान आगे बात बढ़ाते हुए बोला -"ताई बड़ा भला है आपका बेटा। कितनी मिन्नतें करता है। क्या आपको यहां से ले जाना चाहता है?" बुढ़ी महिला ने एक बार फिर हाँ में सिर हिलाया। तब तक कुछ और बुजुर्ग महिला पुरुष उन दोनों के इर्द-गिर्द आकर खड़े हो गए। एक बुजुर्ग ने अपने को अनुभवी साबित करते हुए कहा- "कहते हैं कि औरत वसुधा की तरह धैर्यवान होती है। लेकिन आपको देखकर ऐसा नहीं लगता है।" `बुजुर्ग महिला सबकी बातें सुन रही थी पर किसी को कोई जबाव नहीं दिया। एक ने कहा- "अब जमाना बदल गया है भाई सहनशीलता बीते दिनों की बात हो गई अब महिला और पुरुष में कोई अन्तर नहीं है। सबको आजादी चाहिए। किसी को माँ बाप से और किसी को अपने बच्चों से।" पुरुष की अंतिम वाक्य सुनकर बुजुर्ग महिला की आँखें भर आईं। फिर भी कुछ नहीं बोला उन्होंने। अगले दिन फिर कार आकर खड़ी हो गई वृद्धाश्रम के दरवाजे पर। इस बार उस नौजवान के साथ एक महिला अपने गोद में एक छोटे बच्चे को लेकर खड़ी थी। दोनों एक साथ सामने मिन्नतें करने लगे। महिला ने अपने बच्चे को उनकी गोद में रख दिया और पांव पकड़ कर गिड़गिड़ाते हुए बोली- "माँजी हम दोनों को माफ कर दीजिये और अपने घर चलिये। आपको अपने पोते की कसम।" दरबान को रहा नहीं गया बोला- "बेटा तुम्हारी माँ नहीं जाना चाहती तो क्यूँ जबरदस्ती ले जाना चाहते हो। तुम लोग जैसे औलाद भगवान सबको दे। वर्ना आजकल के बच्चे जानबूझकर माँ बाप को वृद्धाश्रम में छोड़ जाते हैं।" इस बार बुजुर्ग महिला का धर्य टूट गया आंखों से आंसुओं की धारा बह चली। अपने आंचल से आंसुओं को रोकते हुए बोलीं- "आप शायद नहीं जानते दरबान जी! पति के दुनिया से जाते ही मेरी सारी जमा पूंजी इन लोगों ने ले ली। रोज एक रोटी के लिए मुझे घन्टों इंतजार करना पड़ता था। खड़ी खोटी सुनाकर रात-रात भर खून के आंसू रुलाया है इन लोगों ने। अंत में मुझे घर से चले जाने को कहा। आप सब बताईये कि मैं कहां जाती। आज भी कोई माफी मांगने नहीं आये हैं इन लोगों को दरअसल अपने बच्चे को संभालने के लिए एक आया की आवश्यकता है, जो मुझसे बेहतर इनको कोई मिल नहीं इसीलिए यह नाटक आपके सामने दिखा रहे हैं।" मैं अब इनके साथ उस नर्क में दोबारा नहीं जा सकती। बूढ़ी महिला की कहानी जानकर दरबान शर्म से पानी पानी हो गया और उसने लड़के को डांट कर वृद्ध आश्रम से बाहर निकाल दिया। ******

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