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  • मुस्कान

    सविता पाटील पलों से पल में… बह रही है ज़िन्दगी, हर पल कुछ हो नया, कह रही है ज़िन्दगी! तेरा होना न होना… कुछ तो फर्क करे, अखबारों में नहीं, पर अपनी बातों में… कोई तेरा जिक्र करे! किसी की यादों का… ऐसा हिस्सा बने, माथे पर शिकन नहीं, होठों पर मुस्कान बने!! *****

  • नजरिया

    डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव एक गाँव में अशोक कुमार नाम का कुम्हार रहता था। माँ – बाबा बचपन में ही गुजर गये थे अतः अशोक कुमार कुंवारा ही था। माँ – बाबा की मौत से उसके नाजुक ह्रदय को ऐसा आघात हुआ कि वह दिन–रात गुमसुम रहने लगा। गाँव वालों ने उसे बहुत समझाया किन्तु उसे समझ नहीं आया। फिर एक दिन वह गाँव से दूर एक पहाड़ी पर झोपड़ी बनाकर रहने लगा। किन्तु जीने के लिए अर्थोपार्जन तो करना ही था। कुछ दिन तक तो वह सदमे से निकल ही नहीं पाया किन्तु एक दिन उसे एक बाबा मिले। बाबा ने जब जाना कि वह पहाड़ी पर अकेला रहता है तथा उसके माता–पिता नहीं रहे तो वह भी उसके साथ रहने लगे। बाबा और कुम्हार की जोड़ी खूब जमी। बाबा ने धीरज बंधाया कि आना–जाना तो संसार का नियम है, बेटा! उसे इतना दुखी नहीं होना चाहिए तथा अपने नये जीवन की शुरुआत करना चाहिए। बाबा ने उसे याद दिलाया कि अपने पिता की शिक्षाओं का अनुसरण करें। कुमार को बात समझ में आ गई। उसने पिता के सिखाएं अनुसार कुमार ने मिट्टी के घड़े बनाना शुरू कर दिया। जब सभी घड़े बनकर तैयार हो गये तो वह उन्हें पकाने के लिए जंगल से लकड़ी लेने गया। जंगल से जब वह लकड़ी लेकर आ रहा था तो उसे प्यास लगी। लेकिन जंगल में पानी कहाँ मिलता। उसने एक पेड़ पर चढकर चारों और अपनी नज़रे दौड़ाई तो ज्ञात हुआ कि दूर एक सरोवर है। वह पेड़ से उतरकर लकड़ियों का गट्ठर अपने सिर पर रखकर सरोवर की ओर चल दिया। थोड़ी देर बाद जब वह वहाँ पहुंचा तो उसने देखा कि कुछ स्त्रियाँ सरोवर में जल क्रीड़ा कर रही थी। जैसे ही उन्होंने कुमार को देखा, उन्होंने उससे तुरंत पानी पीकर चले जाने का आग्रह किया। कुमार ने पानी पिया और चल दिया। किन्तु भीगे वस्त्रों में स्त्री के रूप सौन्दर्य का दर्शन, साथ ही यौवन की मादकता को देख कुमार का मन बार–बार उन्हें देखने को मचलने लगा। वह चाहता था कि वह उनसे मित्रता करें किन्तु अपरिचितों से बातचीत आरम्भ कैसे करें इसका उसे कोई ज्ञान नहीं था। और वैसे भी स्त्रियों ने उसे वहाँ से चले जाने को कहा था। इसलिए ललचाते हुए भी कुमार लाचार होकर चल दिया। "यौवन, यौवन को आकर्षित करता है। अतः बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि सावधान रहे।" घर पहुँचकर उसने आसमान की ओर देखा तो बादल घिर रहे थे अतः उसने लकड़ियों को काटकर घड़ों को उसपर जमाया। किन्तु इस समय भी उसके मानस पटल पर सरोवर वाला वही दृश्य नाच रहा था। अतः वह उन्हीं ख्यालों में खोया हुआ सो गया। उसे नींद इतनी गहरी आई कि बाहर हवाएं चलने का उसे कुछ भी आभास नहीं हुआ। कुछ देर बाद वर्षा आरम्भ हो गयी। उसके घड़े तथा लकड़ियाँ सभी बाहर ही पड़े थे अतः सभी घड़े टूट गये और लकड़ियाँ गीली हो गई। जब संध्या को बारिश थमने के बाद बाबा गाँव से आये तो देखा सभी घड़े टूट चुके हैं और लकड़ियाँ गीली हो चुकी हैं और कुमार अन्दर झोपड़ी में चैन की नींद ले रहा था। आंखे बंद चेहरे की मुस्कान को देख बाबा को उसकी मुर्खता पर हंसी आई। बाबा की हंसी सुनकर उसकी आंखे खुली तो उठकर भागा। लेकिन अब वह क्या कर सकता था। बारिश सब बर्बाद करके जा चुकी थी। उसे खुद पर बहुत गुस्सा आया अतः पास में पड़े एक पत्थर पर हाथ पीटकर वह अपना गुस्सा निकालने लगा। इतने में बाबा बोले – “कुमार! जहाँ तक मैं जानता हूँ तुम दिन में कभी नहीं सोते, फिर आज ऐसा क्या हो गया जो तुम्हें दिन में इतनी गहरी नींद आई कि बारिश आकर चली गई फिर भी नहीं उठे।” तो कुम्हार ने बाबा को सरोवर वाली पूरी घटना कह सुनाई। यह सुनकर बाबा बोले – “बेटा! स्त्री के जिस रूप की तुम आकांक्षा रखते हो उसके दर्शन मात्र से तुम्हारा यह हाल है तो यदि वह तुम्हें मिल गई तो फिर क्या होगा? अंदाजा लगा सकते हो। स्त्री को जिस रूप में तुमने देखा वस्तुतः वह एक विकार है। स्त्री के दैवीय दर्शन को अपने मानस में स्थापित करों तो वह तुम्हारे लिए अर्धांगिनी भी होगी और लाभकारी भी।” अब कुमार को समझ में आ गया था कि स्त्री को उसके देखने का नजरिया गलत था। अब वह सबको पवित्र दृष्टि से देखने लगा। कुछ दिनों बाद उसके कहने से बाबा ने एक स्त्री के घर वालों से बात की और उसका विवाह हो गया। अब भी वह बाबा की शिक्षा को नहीं भुला था। स्त्री का सम्मान उसके लिए सर्वोच्च था। यदि इसी तरह प्रत्येक व्यक्ति स्त्री को समझने लगे तो समाज कितना सुन्दर हो। सभी नारियों का भी सम्मान हो और सभी पुरुषों को भी अपने चरित्र पर गर्व हो। ऐसी कल्पना मात्र से ही मन प्रसन्न हो उठता है। आओ सब मिलकर संकल्प ले। "नारी का सम्मान हो, अपना देश महान हो। ******

  • चंद्रकांता

    चंद्रकांता देवकीनंदन खत्री बयान – 1 शाम का वक्त है। कुछ-कुछ सूरज दिखाई दे रहा है। सुनसान मैदान में एक पहाड़ी के नीचे दो शख्स वीरेंद्र सिंह और तेज सिंह एक पत्थर की चट्टान पर बैठ कर आपस में बातें कर रहे हैं। वीरेंद्र सिंह की उम्र इक्कीस या बाईस वर्ष की होगी। यह नौगढ़ के राजा सुरेंद्र सिंह का इकलौता लड़का है। तेज सिंह राजा सुरेंद्र सिंह के दीवान जीत सिंह का प्यारा लड़का और कुँवर वीरेंद्र सिंह का दिली दोस्त, बड़ा चालाक और फुर्तीला, कमर में सिर्फ खंजर बांधे बगल में बटुआ लटकाए, हाथ में एक कमंद लिए बड़ी तेजी के साथ चारों तरफ देखता और इनसे बातें करता जाता है। इन दोनों के सामने एक घोड़ा कसा-कसाया दुरुस्त पेड़ से बंधा हुआ है। कुँवर वीरेंद्रसिंह कह रहे हैं, “भाई तेजसिंह! देखो मोहब्बत भी क्या बुरी बला है, जिसने इस हद तक पहुँचा दिया। कई दफ़ा तुम विजयगढ़ से राजकुमारी चंद्रकांता की चिट्ठी मेरे पास लाए और मेरी चिट्ठी उन तक पहुँचाई, जिससे साफ मालूम होता है कि जितनी मुहब्बत मैं चंद्रकांता से रखता हूँ, उतनी ही चंद्रकांता मुझसे रखती है। हालांकि हमारे राज्य और उसके राज्य के बीच सिर्फ पाँच कोस का फासला है। इस पर भी हम लोगों के किए कुछ भी नहीं बन पड़ता। देखो इस खत में भी चंद्रकांता ने यही लिखा है कि जिस तरह बने, जल्द मिल जाओ।” तेजसिंह ने जवाब दिया, “मैं हर तरह से आपको वहाँ ले जा सकता हूँ, मगर एक तो आजकल चंद्रकांता के पिता महाराज जय सिंह ने महल के चारों तरफ सख्त पहरा बैठा रखा है। दूसरे उनके मंत्री का लड़का क्रूर सिंह उस पर आशिक हो रहा है। ऊपर से उसने अपने दोनों ऐयारों को जिनका नाम नाजिम अली और अहमद खाँ है, इस बात की ताकीद करा दी है कि बराबर वे लोग महल की निगहबानी किया करें, क्योंकि आपकी मोहब्बत का हाल क्रूर सिंह और उसके ऐयारों को बखूबी मालूम हो गया है। चाहे चंद्रकांता क्रूर सिंह से बहुत ही नफरत करती है और राजा भी अपनी लड़की अपने मंत्री के लड़के को नहीं दे सकता, फिर भी उसे उम्मीद बंधी हुई है और आपकी लगावट बहुत बुरी मालूम होती है। अपने बाप के जरिए उसने महाराज जय सिंह के कानों तक आपकी लगावट का हाल पहुँचा दिया है और इसी सबब से पहरे की सख्त ताकीद हो गई है। आप को ले चलना अभी मुझे पसंद नहीं, जब तक कि मैं वहाँ जाकर फसादियों को गिरफ्तार न कर लूं।” “इस वक्त मैं फिर विजयगढ़ जाकर चंद्रकांता और चपला से मुलाकात करता हूँ, क्योंकि चपला ऐयारा और चंद्रकांता की प्यारी सखी है और चंद्रकांता को जान से ज्यादा मानती है। सिवाय इस चपला के मेरा साथ देने वाला वहाँ कोई नहीं है। जब मैं अपने दुश्मनों की चालाकी और कार्रवाई देख कर लौटूं तब आपके चलने के बारे में राय दूं। कहीं ऐसा न हो कि बिना समझे-बूझे काम करके हम लोग वहाँ ही गिरफ्तार हो जाएं।” वीरेंद्र – “जो मुनासिब समझो, करो। मुझको तो सिर्फ़ अपनी ताकत पर भरोसा है। लेकिन तुमको अपनी ताकत और ऐयारी दोनों का।” तेजसिंह – “मुझे यह भी पता लगा है कि हाल में ही क्रूर सिंह के दोनों ऐयार नाजिम और अहमद यहाँ आ कर पुनः हमारे महाराजा के दर्शन कर गए हैं। न मालूम किस चालाकी से आए थे। अफसोस, उस वक्त मैं यहाँ न था।” वीरेंद्र – “मुश्किल तो यह है कि तुम क्रूर सिंह के दोनों ऐयारों को फंसाना चाहते हो और वे लोग तुम्हारी गिरफ्तारी की फ़िक्र में हैं। परमेश्वर कुशल करे। खैर, अब तुम जाओ और जिस तरह बने, चंद्रकांता से मेरी मुलाकात का बंदोबस्त करो।” तेज सिंह फौरन उठ खड़े हुए और वीरेंद्र सिंह को वहीं छोड़ पैदल विजयगढ़ की तरफ रवाना हुए। वीरेंद्र सिंह भी घोड़े को दरख्त से खोल कर उस पर सवार हुए और अपने किले की तरफ चले गए।

  • अहमक

    मधु मधुमन पहले ख़ुद बेकली ढूँढते हैं। फिर सुकूं की घड़ी ढूँढते हैं। बख़्त में ही न हो शय जो अपने हम वही, बस वही ढूँढते हैं। जाने क्या हो गया है जहां को लोग हर चीज़ फ़्री ढूँढते हैं। दाग़ होते हैं चेहरे पे अपने आइने में कमी ढूँढते हैं। हम भी अहमक हैं जो इस सदी में पहले सी सादगी ढूँढते हैं। दोष तो है हमारा ही जो हम सब में संजीदगी ढूँढते हैं। प्यार मिलता नहीं हर किसी को ढूँढने को सभी ढूँढते हैं। दर्द दिल का सँभलता नहीं जब लोग तब शाइरी ढूँढते हैं। छोड़ ‘मधुमन‘ ये बातें पुरानी बात कोई नई ढूँढते हैं। *****

  • साड़ी कैसी है?

    उषा भारद्वाज क्या हुआ बहू? - सावित्री ने अपनी जगह पर बैठे-बैठे अपनी बहू रितु की तेज आवाज सुनकर पूछा। कुछ नहीं मां - प्रकाश उनके बेटे ने अपने रूम से जवाब दे दिया। सावित्री चुप होकर बैठ गई। थोड़ी देर बाद अक्कू के रोने की आवाज सुनाई पड़ी। क्या हुआ बेटा? - सावित्री अपने पोते का रोना सुनकर व्याकुल होकर वहां आ गई, जहां वह रो रहा था। अरे क्यों रो रहा है बेटा, क्या हो गया? लेकिन अक्कू बिना दादी की बात सुने रोता रहा। सावित्री ने देखा, उसने अपने ऊपर सब्जी गिरा ली थी। "अरे बेटा कोई बात नही, चुप हो जाओ।" तब तक रितु आ गई।" कितनी बार इसको मना किया प्लेट लेकर मत चला करो लेकिन यह मानता ही नही, और सब्जी अपने ऊपर गिरा ली। उसकी शर्ट उतारते उतारते रितु बडबडाती जा रही थी। कोई बात नहीं, हो जाता है, बच्चा ही तो है - सावित्री ने रितु को समझाते हुए कहा। तभी पीछे से प्रकाश की आवाज आई - मम्मी आप ऐसे समय मत बोला करिए, यह बहुत शरारती होता जा रहा है। सावित्री चुप हो गई और अपने कमरे में चली गई। थोड़ी देर बाद अक्कू उनके पास आया - दादी क्या कर रही हो? दादी मेरे साथ खेलोगी। मैं तुम्हारे जैसा कैसे खेल पाऊंगी। अभी कुछ ही मिनट बीते थे कि रितु की आवाज आयी - अक्कू चलो होमवर्क करना है। अक्कू मुंह बना कर वहां से खेलने का वादा करके चला गया। सावित्री सोचने लगी जब प्रकाश छोटा था जेठ-देवर उनका परिवार, सब एक साथ ही रहते थे। प्रकाश को छोटे से बड़े होने तक कभी प्यार से कभी समझा कर पढ़ाई के लिए प्रेरित किया। यहां तक कि छोटे-छोटे काम जिससे बच्चे आत्मनिर्भर बने वह भी सिखाया। एक दिन, रितु और प्रकाश मकान बनवाने के विषय में बात कर रहे थे सावित्री भी वही बैठी थी उन्होंने कुछ बोलना चाहा। तभी रितु ने कहा -"मम्मी आप नहीं जानती हैं, आजकल का डिजाइन बदल चुका है। सावित्री चुप हो गई। प्रकाश ने कहा - मम्मी अब सब बदल गया है। सावित्री चुप हो गई। इसीतरह अक्सर कोई बात हो जाती थी। और फिर सावित्री को चुप होना पड़ता। धीरे-धीरे सावित्री ने अपने आपको अपने कमरे तक ही सीमित कर लिया था। सुबह उठती स्नान ध्यान करतीं और फिर अपने कमरे में आ जाती कभी गीता पढतीं, अक्कू कभी आता तो उससे थोड़ी देर बात करती। टीवी देखती उसमें भागवत, भजन सुना करती थी। लेकिन कितनी देर ......वह तो पिंजरे में बंद पक्षी की तरह हो गई थी, जो पंख होते हुए उड़ नहीं सकती थी। पिंजरे में बंद पक्षी बोलता है तब उसको सब बड़े प्यार से सुनते हैं, लेकिन वह तो बोल भी नहीं सकती थी। उनका मन होता था मगर अपनी बात किससे करें? गर्मी की छुट्टियां शुरु हो गई थी। हमेशा रितु अक्कू को लेकर अपनी गीता दीदी के पास देहरादून जाती थी। लेकिन इस बार वह नहीं जा पा रही थी। इसलिए गीता अपने बच्चों के साथ दो-चार दिन के लिए आई थी। सावित्री अपने कमरे में बैठी सब सुन रही थी। गीता थोड़ी देर बैठी। फिर बोली- रितु आंटी नहीं दिखाई पड़ रही है। रितु ने कहा- वह अपने कमरे में हैं। गीता उठी और सावित्री के कमरे में आई- आंटी प्रणाम! अरे! गीता आओ बैठो। पास पड़ी कुर्सी की तरफ इशारा किया बैठने के लिए। और सुनाइए कैसी हैं? मैं ठीक हूं बेटा, बुढ़ापा तो है ही। सावित्री अपने मन की पीड़ा को छिपाते हुए बोली। तुम बताओ तुम कैसी हो? मैं ठीक हूं आंटी। गीता ने उनको बड़े ध्यान से देखते हुए उत्तर दिया। दो दिन बीत गए थे। गीता ने रितु से पूछा- आंटी को कोई प्रॉब्लम है क्या? 2 साल पहले जब मैं आई थी तब तो बहुत हंसती-बोलती थी। सबके बीच में आकर बैठती थी। लेकिन इसबार तो वो एकदम खामोश सी हो गई हैं। बीमार है क्या? -गीता ने सावित्री की चुप्पी का रहस्य जानना चाहा। रितु ने कहा - नहीं दीदी वह बीमार नहीं है। वह ठीक हैं और वह बोलती भी हैं। लेकिन रितु मैं 2 दिन से आई हूं मैंने देखा कि वो एक बार भी मेरे पास खुद से आकर नहीं बैठी हैं और मैंने उनको अपने कमरे से भी बहुत कम निकलते देखा है।- गीता ने ऋतु की बात को ना मानते हुए कहा। "पता नहीं पहले तो खूब बोलती थी बीच-बीच में हम लोग बात करते थे उसमें भी अपनी राय देने लगती थीं, और फिर अब वो बूढ़ी हो गयी हैं। उनके समय और आज के समय में बहुत परिवर्तन आ गया। दीदी अब वैसा कुछ भी नहीं रहा जैसे पहले होता था"। -रितु ने वहीं पर बात खत्म करनी चाही। तू बुरा ना मान तो एक बात कहूं, जो इंसान पहले इतना बोलता था। हर काम करने के लिए आगे बढ़ता हो अगर वह बिना बीमारी के, बिना किसी समस्या के चुप हो जाए एक ही जगह बैठ जाए तो इसकी वजह कोई छोटी नहीं हो सकती है।- गीता ने कहा। गीता फिर बोली- रितु मैं तुझे जानती हूं तुम्हें ज्यादा किसी दूसरे का बीच में टोका टोकी पसंद नहीं है इसके लिए सिर्फ यही कहूँगी। माना कि परिवर्तन हो गया है समय में, माना कि हर चीज बदल रही है लेकिन तुम उनके अनुभवों से नये आइडियाज ले सकती हो, उनको छोटी-छोटी बातों में शामिल करो। उनको एहसास दिलाओ कि तुमको उनकी जरूरत है। इस उम्र में इंसान जब कुछ नहीं कर पाता तब किसी-किसी को अपना जीवन व्यर्थ लगने लगता है। आंटी की खामोशी का यही कारण है। कहां की बात लेकर आप बैठ गईं।- रितु ने बीच में गीता को टोकते हुए कहा। मगर गीता चुप नही हुई क्योंकि उसने सावित्री को इस उम्र में भी बच्चों की तरह चहकते हुए सुना था वो बोली- तुमने देखा है घर में भाभी मम्मी को हर छोटे-छोटे काम में शामिल कर लेती हैं। पौधों के बारे में कुछ पूंछना हो या अचार कैसे रखा जाता है? इस तरह की बहुत सी बातें इंसान को उसके महत्व का एहसास कराती हैं। रितु चुपचाप गीता की बातें सुनती रही। उसको यह एहसास हो गया था कि उससे बहुत बड़ी गलती हुई है। दूसरे दिन सावित्री जैसे ही रोज के कार्यों से निवृत्त होकर अपने कमरे में आयीं। पीछे से रितु चहकती हुई बोली- मम्मी देखिए ये साड़ी कैसी लग रही है? सावित्री के कानों में रितु के ये शब्द मिश्री की तरह घुल गए उनके होठों पर एक मुस्कान आ गई वो बड़े प्यार से बोली- "बहुत सुंदर लग रही है। इसका रंग तुम पर बहुत अच्छा लग रहा है।" इतना सुनकर रितु खिलखिला कर हंस दी जिसे देखकर सावित्री भी कुछ समय पहले की तरह हंस पड़ी दोनों सास बहू की हंसी मिल गई। *******

  • सब्र का फल

    प्रदीप कुमार वर्मा मुकेश छब्बीस साल का एक खूबसूरत, होनहार नौजवान था। जब राज्य प्रशासनिक सेवा की परीक्षा पास कर वह एक उच्च पद पर आसीन हुआ, तब उसके सामने विवाह के लिए एक से एक खूबसूरत, पढ़ी-लिखी और नौकरीशुदा लड़कियों के रिश्तों की लाइन लग गयी थी। वह भलीभांति जानता था कि शादी-व्याह कोई बार-बार होने वाला काम नहीं है। एक बार जिससे शादी हो गयी, तो बस फिर सात जनमों का तो पता नहीं, पर इस जनम का साथ तो निभाना ही है। बचपन में पिता जी की मौत के बाद माँ ने कितनी कठिनाइयों से उसे पाला-पोसा, उसका भी उसे अंदाजा था। माँ ने अपने जीवन में बहुत कष्ट झेले हैं, अब जबकि वह सक्षम है, तो माँ को अधिकतम आराम और सुख पहुंचाना चाहता था। इस कारण भी अपनी शादी के लिए लड़की के चयन में वह अतिरिक्त सावधानी बरत रहा था। काफी सोच-विचार कर वह माँ और मामा जी की पसंद पर अपने लिए ममता को चुन लिया। ममता एक पढ़ी-लिखी और खूबसूरत लड़की थी, जिसके माता-पिता की बहुत पहले एक दुर्घटना में मौत हो गयी थी। उसका पालन पोषण उसके चाचा-चाची ने बड़े ही प्यार से किया था। ममता उसी शहर में स्थित एक सरकारी विद्यालय में शिक्षिका थी, जहाँ मुकेश की पोस्टिंग थी। रिश्ता तय होने के बाद उनकी आमने-सामने एक-दो बार ही मुलाक़ात हो सकी थी। कारण यह था कि मुकेश जहाँ एक प्रशासनिक अधिकारी था, वहीं ममता भी उसी शहर में स्थित एक सरकारी विद्यालय में शिक्षिका थी। दोनों को जानने-पहचानने वाले बहुत से लोग थे। उनको विवाह से पहले साथ-साथ घूमते–फिरते देख लोग तरह-तरह की बातें करते, मीडिया में भी बात फैलने का डर था। सो, वे आमने-सामने कम ही मिलते, पर मोबाइल पर घंटों बतियाते। कुल मिलाकर रिश्ता तय होने और शादी के बीच की तीन माह की अवधि में वे दोनों मोबाइल पर ही इतनी सारी बातें कर लिए कि अब उन्हें लगता ही नहीं कि वे तीन माह पहले एक दूसरे से एकदम अपरिचित थे। समय अपनी रफ्तार से निकलता गया। बहुत ही धूमधाम से उनकी शादी हो गई। और अब सुहागरात। सुहागरात... कितनी मिठास है इस शब्द में... हर युवक-युवती इसका सालों इंतजार करते हैं। इसके लिए कई सपने बुनते हैं। आज जब उसकी सुहागरात है, तो पता नहीं क्यों समय के साथ-साथ उसकी घबराहट बढ़ती ही जा रही थी। वैसे वह रोज ममता से घंटों बात कर लेता, पर यूँ आमने-सामने... एक ही कमरे में... पता नहीं कैसे वह सिचुएशन को हैंडल करेगा। इसी उधेड़बुन में वह समय भी आ गया जब उसकी ममेरी भाभी जी ने उसे उस कमरे में पहुंचा दिया, जहाँ दुल्हन के वेश में ममता उसका इंतजार कर रही थी। सच, ममता आज नई दुलहन के वेश में बहुत ही खूबसूरत लग रही थी। बिलकुल परी लोक की राजकुमारी जैसी। मुँह दिखाई की रस्म अदायगी और हीरे की अंगूठी उपहार में देने के बाद बोला, "ममता, आज मुझे पहली बार ये एहसास हो रहा है कि मोबाइल पर बात करना कितना आसान होता है। मुझे तो खुद पर तरस भी आ रहा है। कितना बड़ा बेवकूफ हूँ मैं।" "ऐसा क्यों कह रहे हैं जी आप? आप जैसे भी हैं, अच्छे हैं।" वह शर्माते हुए बोली। "हाँ, भारतीय नारी जो ठहरी। अब तो ऐसा बोलना ही पड़ेगा।" वह बोला। "नहीं जी, ऐसी कोई बात नहीं है। पर आप ऐसा क्यों कह रहे हैं।" "अरे भई, तुम कितनी खूबसूरत लड़की हो, तुमसे तो मुझे प्यार-मुहब्बत की बातें करनी थी, पर मैं ठहरा किताबी कीड़ा। पिछले तीन महीने से तुमसे साहित्य, कला, संस्कृति, राजनीति और पर्यावरण की चर्चा करता रहा हूँ। जबकि मुझे तो तुमसे प्यार-मोहब्बत की बातें करनी थी...." वह किसी तरह रौ में बोल गया। "तो अब कर लीजिए ना।" वह शर्माते हुए बोली। "हाँ जी, अब तो जिंदगीभर वही करनी होगी। वैसे भी आज तो हमारी सुहागरात है। तो शुरुआत प्रैक्टिकल से करें। थ्योरिटिकल क्लासेस तो जिंदगीभर चलती रहेगी।" मुकेश उसकी हाथों को हाथ में लेकर बोला। "मुकेश जी, आज मैं बहुत ज्यादा थक गई हूँ। सिर में बहुत दर्द भी हो रहा है। नींद भी आ रही है। प्रैक्टिकल फिर कभी।" ममता उनींदी आँखों से बोली। मुकेश के लिए यह अप्रत्याशित स्थिति थी। पर यह सोच कर कि अब तो जीवनभर का साथ है। जहाँ इतने साल इंतजार किए, वहीं कुछ दिन और। बोला, "ठीक है मैडम जी। जैसा आप ठीक समझें। आप यहाँ पलंग पर सो जाइए। मैं वहाँ सोफे पर सो जाऊँगा।" "नहीं जी, आप यहीं सो जाओ न, ऊधर पलंग पर ही। मैं इधर सो जाऊँगी।" वह एक तरफ खिसकती हुई बोली। "ठीक है" मुकेश दोनों के बीच एक तकिया रखकर बोला, "अब लाइट ऑफ करके चुपचाप सो जाओ। गुड नाईट।" "गुड नाईट।" वह बोली और कमरे की लाइट ऑफ कर दी। मुकेश को नींद नहीं आ रही थी। उसने ऐसे सुहागरात की तो कल्पना भी नहीं की थी। पर सच तो सामने ही था। सालों का इंतजार आज के इंतजार पर भारी पड़ रहा था। वह सोच रहा था कि पता नहीं किस बेवकूफ ने ऐसा लिखा है कि "जो मजा इंतजार में है, वह पाने में कहाँ?’’ मेरी तरह इंतजार किया होता तो पता नहीं वह क्या लिखता? लगभग घंटा भर का समय बीत गया। आज नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। वैसे पढ़ने-लिखने में उसकी बचपन से ही रुचि थी। जब भी उसे नींद नहीं आती, वह पढने बैठ जाता पर आज वह लाइट जलाकर पढ़ नहीं सकता था, क्योंकि ममता की नींद में खलल पड़ सकता था। सो, वह एक चद्दर ओढ़कर मोबाइल में ही एक कविता लिखने लगा। जिंदगी हर कदम परीक्षा लेती है इंसान हर कदम परीक्षा देता है फिर भी वह परीक्षा से क्यों डरता है... वह लिखने में मगन था, तभी ममता उसके चद्दर में घुसते हुए बोली, "वावो, क्या बात है किसके लिए शायरी लिखी जा रही है ?" चौंक पड़ा वह, बोला, "अरे, तुम अभी तक सोई नहीं। या एक नींद मार चुकी ?" "नींद नहीं आ रही है मुझे। किससे चैटिंग हो रही है? जरा हमें भी तो पता चले?" वह शरारत से बोली। "अब तक तो जिससे चैटिंग होती थी, वह कर नहीं सकता।" वह बोला। "क्यों? मैं आपको कभी किसी से चैटिंग के लिए मना नहीं करूंगी।" ममता बोली। "अरे यार, बाजू में सो रहे इंसान से भला कोई कैसे चैटिंग कर सकता है?" मुकेश बोला। "सही कह रहे हैं जी आप। पर प्यार-मोहब्बत की प्रैक्टिकल क्लास तो शुरू कर ही सकते हैं। दरअसल मैं परखना चाह रही थी कि आपको मेरी इच्छा-नाइच्छा की कितनी परवाह है?" वह मुकेश की बाहों में समाते हुए बोली। "तो इस परीक्षा का रिजल्ट कैसा रहा?" मुकेश की पकड़ मजबूत होती जा रही थी। "फर्स्टक्लास फर्स्ट। बधाई हो साहब जी। आपको सौ में सौ अंक मिले हैं।” वह मुकेश की गालों में चुबंन की झड़ी लगाते हुए बोली। ****************

  • जज़्बात

    विनीता तिवारी चुरा हर चीज़ ग़ैरों की वो अक्सर बात करते हैं। कि ये तेरा मेरा इंसान को बर्बाद करते हैं। मुहब्बत ज़िंदगी में ग़र मिले सच्ची तो बेह्तर है। वरना लोग बस मतलब से आँखें चार करते हैं। उठा के लाश काँधों पर वो अपनी जी रहा कब से कहाँ हैं वो, जो जीने का ये ढंग निर्यात करते हैं। कराते मंदिर-ओ-मस्जिद को लेकर आपसी झगड़े ख़ुदा और राम को ये लोग ही बदनाम करते हैं। बड़े झाँसे, बड़े वादे वही कर पाते हैं सबसे जो कुछ करके दिखाने में नहीं विश्वास करते हैं। न जाने कौनसी शालीन दुनिया में रहे हो तुम यहाँ तो हर कदम पर लोग बस कुहराम करते हैं। *****

  • पहला कदम

    डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव "माँ, क्या आप कभी डेट पर गए हो?”, सुमित का प्रश्न सुन कविता चौंक गई। "डेट?” उसके जमाने में ये सब बातें कहाँ होती थीं। छोटा शहर, जहाँ हर कोई एक दूसरे की जन्मकुंडली तक से परिचित था। कोई बात किसी से छुपती नहीं थी। फिर बाबूजी का कठोर अनुशासन, कभी हिम्मत ही नहीं हुई कि इस विषय पर कुछ सोचे भी, दोस्ती करना व डेट पर जाना तो दूर की बात थी। उसे एक क़िस्सा अभी भी याद है। शायद बीएससी के सेकंड ईयर में थी। को-एड कॉलेज था। शहर के महिला कॉलेज में विज्ञान के विषय नहीं थे, इसीलिए यहाँ पढ़ने की अनुमति मिली थी। बाबूजी के सख़्त निर्देशों के साथ। कक्षा में दिवाकर नाम का एक लड़का था। उसने कई बार उसकी नज़रों को खुद पर महसूस किया था, पर कभी बातचीत नहीं हुई। दिवाकर को पता नहीं कैसे ज्ञात हुआ, उसने, उसके जन्मदिन पर, एक महँगा-सा कलम लाकर "हैपी बर्थडे” कहते हुए उसके सामने डेस्क पर रख दिया। उन दिनों किसी लड़के द्वारा तोहफ़ा देना कोई मामूली बात नहीं होती थी। उसका दिल ज़ोर से धक-धक करने लगा पर उस नीले-सुनहरे पेन को उठाने या छूने की हिम्मत नहीं हुई उसे। वह अपना बैग उठाकर दूसरी जगह बैठ गई। उनके बीच जो कुछ भी अजन्मा-सा रिश्ता था, वह उसी दिन दफ़न भी हो गया, पर उसे आज भी एक-एक बात याद है। शायद मन के किसी कोने में…. "कोई बात नहीं माँ, इतना सोचने की ज़रूरत नहीं है। आप तैयार हो जाइए हम डेट पर चल रहे हैं।” "पागल है क्या, कोई माँ के साथ भी डेट पर जाता है भला?” "क्यों? क्या गर्ल फ़्रेंड के साथ ही जाते हैं?” हँसने लगा सुमित। "मैं तो आपके साथ ही जाऊँगा। सुंदर-सी साड़ी पहन के तैयार हो जाइए, आख़िर ये आपका पहला डेट है।” बेटे के ज़िद के आगे उसने हथियार डाल दिए। तैयार होकर निकली तो उछल पड़ा, "वाउ माँ, आज तो सबकी नज़रें आप पर ही होगीं।” "चल हट, पिटना है क्या?” उसने हँसते हुए एक धौल जमा दी उसके पीठ पर। मानो बेटे ने उसे ज़िंदगी की सबसे हसीन शाम तोहफ़े में दे दी हो। सबसे पहले उसे कपड़ों की दुकान पर ले गया। "शॉर्टलिस्ट करते है माँ। आप पहले पाँच आउट्फ़िट्स छाँट लो फिर फ़ाइनल करेंगे।” पर उसे अंतिम पाँच में से एक पसंद नहीं करने दिया सुमित ने… पाँचो ले लिए। पहली बार जीवन में उसके लिए इतने कपड़े ख़रीदे गए थे। फिर वे एक मूवी देखने गए, उसके फ़ेवरेट हिरोइन की। वहाँ से निकले तो एक महँगे रेस्टोरेंट में डिनर करने चले गए। "बताओ माँ क्या खाना है?” "तेरा जो जी चाहे ऑर्डर कर दे, मुझे तो सब पसंद है।” "अच्छा। तभी उस दिन फ़ोन पर मौसी से कह रही थी कि बरसों से पनीर टिक्का नहीं खाया क्योंकि सुमित के पापा को पनीर से ऐलर्जी है?” "हाँ तो है ना। उनका पेट….” "आपको तो नहीं है न? मगर आप कभी भी अपनी पसंद ज़ाहिर नहीं करती। आज ऑर्डर आप ही करेंगी। सब कुछ अपनी पसंद का।” "बचपन से देखा है माँ, मेरी पसंद, पापा की, दादी की पसंद को ही आपने अपनी पसंद बना ली है। कपड़े भी पापा के पसंद के ही लेती हो। घर की साज-सज्जा दादी के इच्छा अनुसार ही होता है। आपकी पसंद की अहमियत क्यों नहीं माँ? क्या आपको लगता है कि आप कुछ करना चाहेंगी तो पापा मना कर देंगे। मगर अपनी स्थिति को बेहतर करने के लिए पहला कदम तो आप ही को उठाना होगा न माँ, वरना सब रौंदते हुए निकल जाएँगे।” *******

  • अधूरी कहानी

    समीर उपाध्याय अक्षत और आभा दोनों कॉलेज में साथ पढ़ते थे। दोनों के बीच प्रेम के अंकुर फूटे। दोनों ने जीवन भर एक दूसरे का साथ निभाने की प्रतिज्ञा भी ली। अक्षत एक सामान्य घर से था और आभा एक बड़े घर की बेटी थी। इसलिए आभा के माता-पिता अक्षत को अपनाने के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने आभा को समझा कर एक बहुत बड़े उद्योगपति के साथ उसकी शादी करवा दी। इस प्रकार अक्षत और आभा की प्रेम कहानी अधूरी रह गई। आज पूरे देढ़ साल बाद अक्षत और आभा की एक शॉपिंग मॉल में मुलाकात हो गई। आभा - "अक्षत, आज तुम्हें देखकर अतीत की पुरानी यादें फिर ताजा हो गई।" अक्षत - "अब बीते हुए कल को याद करने से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है।" आभा - "आज अक्षय तृतीया है। तुम्हें याद होगा एक बार अक्षय तृतीया के दिन हम दोनों शिव मंदिर में गए थे और मैंने शिवजी की अक्षत से पूजा की थी और पति के रूप में तुम्हें पाने की प्रार्थना की थी।" अक्षत - "लेकिन अब इन सब बातों का कोई फायदा नहीं है।" आभा - "मम्मी-पापा का सामना करने की मुझमें हिम्मत नहीं थी। लेकिन अब वे नहीं रहे।" अक्षत - "लेकिन तुम्हारी शादी तो एक बहुत बड़े उद्योगपति के साथ हुई थी ना?" आभा - "छ: महीने पहले एक विमान दुर्घटना में वे चल बसे। अक्षत, आज अक्षय तृतीया का दिन है। मैं चाहती हूं कि आज शिव मंदिर तुम मेरे साथ चलो, क्योंकि मैं शिवजी पर अक्षत चढ़ाकर तुम्हें पाने की प्रार्थना करना चाहती हूं। अब हमारा एक होने का रास्ता सरल हो गया है।" अक्षत - "आभा, तुम्हारी शिव पूजा तुम्हें मुबारक। बेहतर यही होगा कि तुम अपने लिए किसी दूसरे मार्ग की तलाश कर लो।" आभा - "अक्षत, मुझे माफ कर दो।" अक्षत - "मेरी शादी रंगोली के साथ हो चुकी है। तुम्हारे जाने के बाद मेरे एकाकी और नीरस जीवन में रंगोली ने जीवन के सारे रंग भर दिए हैं। उसका निर्मल और निश्चल प्रेम ही मेरे लिए सब कुछ है। उसके त्याग, विश्वास और समर्पण भाव से मेरा जीवन रंगों से सजी हुई रंगोली जैसा बन गया है। अब मैं उस रंगोली में दूसरे रंग भरना नहीं चाहता।" यह कहते हुए अक्षत आगे चल दिया और आभा वहीं पर खड़ी उसे देखती रह गई। ********

  • हम तीन

    डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव एक औरत ने तीन सन्तों को अपने घर के सामने देखा। वह उन्हें जानती नहीं थी। औरत ने कहा – “कृपया भीतर आइये और भोजन करिए।” संत बोले – “क्या तुम्हारे पति घर पर हैं?” औरत – “नहीं, वे अभी बाहर गए हैं।” संत –“हम तभी भीतर आयेंगे जब वह घर पर हों।” शाम को उस औरत का पति घर आया और औरत ने उसे यह सब बताया। पति – “जाओ और उनसे कहो कि मैं घर आ गया हूँ और उनको आदर सहित बुलाओ।” औरत बाहर गई और उनको भीतर आने के लिए कहा। संत बोले – “हम सब किसी भी घर में एक साथ नहीं जाते।” “पर क्यों?” – औरत ने पूछा। उनमें से एक संत ने कहा – “मेरा नाम धन है।” फ़िर दूसरे संतों की ओर इशारा कर के कहा – “इन दोनों के नाम सफलता और प्रेम हैं। हममें से कोई एक ही भीतर आ सकता है। आप घर के अन्य सदस्यों से मिलकर तय कर लें कि भीतर किसे निमंत्रित करना है।” औरत ने भीतर जाकर अपने पति को यह सब बताया। उसका पति बहुत प्रसन्न हो गया और बोला –“यदि ऐसा है तो हमें धन को आमंत्रित करना चाहिए। हमारा घर खुशियों से भर जाएगा।” पत्नी – “मुझे लगता है कि हमें सफलता को आमंत्रित करना चाहिए।” उनकी बेटी दूसरे कमरे से यह सब सुन रही थी। वह उनके पास आई और बोली – “मुझे लगता है कि हमें प्रेम को आमंत्रित करना चाहिए। प्रेम से बढ़कर कुछ भी नहीं हैं।” “तुम ठीक कहती हो, हमें प्रेम को ही बुलाना चाहिए” – उसके माता-पिता ने कहा। औरत घर के बाहर गई और उसने संतों से पूछा – “आप में से जिनका नाम प्रेम है वे कृपया घर में प्रवेश कर भोजन गृहण करें।” प्रेम घर की ओर बढ़ चले। बाकी के दो संत भी उनके पीछे चलने लगे। औरत ने आश्चर्य से उन दोनों से पूछा – “मैंने तो सिर्फ़ प्रेम को आमंत्रित किया था। आप लोग भीतर क्यों जा रहे हैं?” उनमें से एक ने कहा – “यदि आपने धन और सफलता में से किसी एक को आमंत्रित किया होता तो केवल वही भीतर जाता। आपने प्रेम को आमंत्रित किया है। प्रेम कभी अकेला नहीं जाता। प्रेम जहाँ-जहाँ जाता है, धन और सफलता उसके पीछे जाते हैं। ******

  • अद्भुत प्यार

    सरोज माहेश्वरी लॉन में पंक्तिबद्ध कुर्सियां लगी थी। आज वृद्धाश्रम की संख्या में एक अंक और बढ़ऩे वाला था। नियमानुसार नवीन आगन्तुक को अपने साथियों के समक्ष अपना परिचय देना होता हैं। काले शूट बूट में एक़ स्मार्ट ज्येष्ठ नागरिक का आगमन हुआ। जोरदार तालियों से साथियों ने स्वागत किया। बिना भूमिका के रामनाथ जी ने बताया "मैं रामनाथ अरोरा" अपनी मर्जी से इस वृद्धाश्रम में आया हूं। एक वर्ष पूर्व पत्नी राधा का देहान्त हृदयगति रुक जाने से हो गया। जीवन में एकाकीपन छा गया। बच्चे अपनी-अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त हैं। मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं है। धन, नौकर चाकर, गाड़ी, घर की कोई कमी नहीं है। यह एकाकीपन मुझे कहीं अवसाद में न पहुंचा दे, इससे बचने के लिए मैंने हमउम्र साथिय़ों के साथ रहने का निर्णय लिया है। कविता, कहानी, लेख लिखता हूं। दो लाइन सुनाना पंसद करूँगा। जीवन की इस संध्या में, हम कहीं गुम न हो जाएं। जी ले जी भर के हम, आओ साथ-साथ गुनगुनाएँ।। सदा शांत रहने वाली पुष्पादेवी अपनी डायरी में कुछ न कुछ लिखती रहती थीं। पति के मृत्यु के उपरांत वह भी इस आश्रम में आईं थीं। प्रत्युत्तर में पुष्पादेवी ने साहस करके अपनी लिखी लाइन बोलते हुए कहा। चलो अब हम सब मिलकर, कुछ ऐसा कर दिखाएं। याद करे ये ज़माना, अपनी बेबसी पे न आंसू बहाएं।। तालियों से ऐसा शमा बंधा गया। अब तो अक्सर रामनाथ जी एवं पुष्पाजी एक साथ देखे जाते, एक दूसरे को अपने लिखे उद्गार सुनाते। एक दूसरे का सानिध्य दोनों को रास आने लगा और न जाने कब दोनों की "आँखें चार हो गईं" पता ही न चला। आश्रम में लोग गलत नज़ारों से देखने लगे, परन्तु वे दोऩों मानसिक एवं भावनात्मक रूप से एक दूसरे के समीप आ गए थे। एक दूसरे के बिना रहना अब उन्हें असम्भव लगने लगा। उनका यह प्यार कहीं बदनामी की डगर पर न बढ़ जाए, वे शादी करके अपने प्यार के नाम देना चाहते थे। शादी करके दोनों ने एक साथ रहने का निर्णय किया तो बेटों ने पुरज़ोर विरोध दिया। राजनाथ जी के पोते प्रशांत और पुष्पादेवी के पोते राघव को जब दादा-दादी की पवित्र प्रेम कहानी का पता लगा तब दोनों के पोतों ने पूरी जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेकर कोर्ट और समाज में ससम्मान ऐसे अद्भुत प्रेमियों को मिलाकर पुण्य का काम किया। ******

  • बदरा कहां गए

    अशोक कुमार बाजपेई ओ बदरा तुम कहां गए बेचैन सभी की आंखें हैं तुम तो सुधि भूल गए ओ बदरा तुम कहां गए। पिछले माह तुम आए थे आकर खुब जल बरसाए थे इस माह तुम सुधि न लीनी दें जैसे सब को भूल गए ओ बदरा तुम कहां गए। अब तो बदरा आ जाओ और हमें ना तड़पाओ इस उमस से निजात दिलाओ थोड़ी तो गर्मी कम कर जाओ जल्दी आओ जल्दी आओ तुम कैसे रास्ता भूल गए । ओ बदरा तुम कहां गए । *****

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