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  • कर्म ही अपने

    रमेश चंद्र चंदेल सीता के रखवाले राम थे जब हरण हुआ तब कोई नहीं द्रोपदी के पांच पांडव थे जब चीर हरा तब कोई नहीं दशरथ के चार दुलारे थे जब प्राण तजे तब कोई नहीं रावण भी शक्तिशाली थे जब लंका जली तब कोई नहीं श्री कृष्ण सुदर्शनधारी थे जब तीर लगा तब कोई नहीं लक्ष्मण भी भारी योद्धा थे जब शक्ति लगी तब कोई नहीं सरसैया पर पड़े पितामह पीड़ा का सांक्षी कोई नहीं अभिमन्यु राज दुलारे थे पर चक्रव्यूह में कोई नहीं सच यही है दुनिया वालों संसार में अपना कोई नहीं जो लेख लिखे हमारे कर्मों ने उस लेख के आगे कोई नहीं। *****

  • पहली बारिश

    डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव सुबह-सुबह आंख खुली तो बारिश की रिमझिम बूंदें पड़ते हुए देखकर सुधा खुशी से झूम उठी। कितनी पसंद है उसे ये बारिश और उसमें भीगना। बचपन से लेकर जवानी की दहलीज तक कितनी खुश होकर भीगती थी वो अपने घर में। जहां उसे भीगने से रोकने वाला कोई नहीं था, बल्कि सब उसे बारिश के लिए दीवानी कहते थे। ना कभी बाबूजी ने रोका और ना कभी मां ने। बस हमेशा यही कहा कि अपनी मर्यादा की सीमाओं को मत लांघना और फिर उसकी शादी हो गई। यहां आकर भी उसे बारिश में भीगने का मन करता था। मगर शादी के पहले ही साल में एक बहु की सीमाओं में बंधी कभी चाहकर भी अपने मन की अपने जीवनसाथी मोहन से कुछ न कह पाई और सासूमां को कहने की इच्छा कैसे करती, जब उन्हें एकबार छतपर बारिश से भीगने से बचाने के तार से कपड़े उतार रही वो और उसकी सासूमां की नजर पड़ोसियों के यहां युवा जोड़े को बारिश में भीगते-हँसते देखकर उन्हें बेशर्म, बेहया और ना जाने क्या-क्या कहे जा रही थी। अगले साल आराध्या उसकी गोद में थी इसलिए वो खिड़की से बारिश की गिरती बूंदों का आनंद लेती रही। ये सब उसके पति मोहन ने ना जाने कब और कैसे नोटिस कर लिया। इसलिए कभी बहाने से बाइक पर समान लेकर आने के लिए तो कभी किसी बहाने से वो उसे बारिश में भीगने का मौका दिलवा दिया करते। आज फिर से सुबह से बारिश हो रही है। वो भी मानसून की पहली बारिश। बाहर बरामदे में बैठकर अखबार पढ़ रहे मोहन के समीप पहुंच कर सुधा बोली, आज आफिस नहीं जाना क्या आपने। नहीं आज छुट्टी है। भूल गयी आज वीरवार है वीकेंड आफ। कहकर मोहन दुबारा से अखबार पढ़ने लग गया। सुधा ने मोहन के हाथों से अखबार छीनकर बारिश की और इशारा किया तो मोहन ने मुस्कुरा कर बरामदे में दूसरी ओर बैठी मां की तरफ इशारा करते हुए कहा, कैसे। सुधा ने इशारा करते हुए कहा मुझे नहीं पता। मोहन ने अपनी असर्मथता जताई तो सुधा मुंह बनाकर बोली....हूह...प्लीज कुछ कीजिए ना। सुधा का रुआंसी चेहरा देखकर मोहन ने उसे इशारा करते हुए कहा, रुको कुछ करता हूं और अपनी बेटी आराध्या को इशारा करते हुए अपने पास बुलाया और उसके कान में कुछ कहा। आराध्या ने मुस्कुरा कर मां की और देखा और दोनों पैरों पर जोरों से ठुनक दी। ये देखकर सुधा सब समझ गई और विनती करने वाले अंदाज में मोहन से बोली सुनिए आरु बारिश में नहाने को पूछ रही है। जाने दो.... पहली बारिश का थोड़ा आनंद उसे भी लेने दो। सुधा की ओर देखकर मोहन ने मुस्कुरा कर कहा। पापा की सहमति पाते ही आराध्या बरामदे के पार जा पहुंची और मस्त होकर भीगने लगी। तभी मोहन की माता जी बरामदे से उठते हुए बोली, आराध्या, रुको पहली बारिश है, बीमार पड़ जाओगी, सर्दी लगेगी सो अलग। कापी-किताब निकाल लो और यहीं बैठकर बारिश का आनंद लो... चलो वापस आओ। लेकिन कौन सुनता, आराध्या तो हो गई-फुर्र और मस्त होकर भीगने लगी बारिश में। आखिर ये देखकर मोहन सुधा से बोला, जाओ सुधा आराध्या को लेकर लाओ। सुधा का मन-मयूर नाच उठा यह सुनते ही। वह पल्लू सँभालती जा कूदी बारिश की फुहारों में और फिर भीगती हुई आराध्या को पकड़ने का नाटक हो गया शुरू। बेटी तो थी ही खेलने के मूड में वो और दूर भाग गई। ये देखकर मोहन बोला, मैं लाता हूं मां...यह कहकर अखबार कुर्सी पर छोड़कर बिना ये सुने की मां आगे क्या कहेगी, वह भी बरामदे से उतर नीचे की ओर दौड़ गया। आराध्या काफी देर तक अपने मम्मी-पापा को दौड़ा-दौड़ा कर छकाती रही। दूर खडी बेटे-बहू की चालाकी समझकर मां दो पल वहीं खड़ी रही और उन सब के हंसते खिलखिलाते चेहरों को देखती रही। जैसे ही सुधा की नजर उस ओर गयी तो वह बस इतना ही बोल पाई... मां वो... रहने दो। सब समझती हूं तुम्हें क्या लगता है ये बाल धूप में सफेद किए हैं मैंने। दुनिया देखी है और तुम तो मेरे बच्चे हो नस नस से वाकिफ हूं तुम्हारी। भीग लो मगर शालीनता से और मर्यादा में। कहते हुए मां रसोई घर की और बढ़ी तो ये देखकर सुधा चौंक गई क्योंकि ये वक्त मां की चाय का होता है। इसलिए हकलाते हुए वह बोली...मां....आप रुकिए में अभी आपको चाय बनाकर देती हूं। नहीं बेटा....कहा ना तुम भीगों। जब तुम मुझे मां की तरह आदर सम्मान देती हो तो बेटियों की तरह कहना भी मानों। मै समझती हूं क्यों बारिश में ही मोहन को समान की याद आती है। तुम्हें भीगना पसंद है ना। तुम मुझसे शर्म करती हो मै नाराज ना हो जाऊं सोचकर। सुधा ये घर मेरी बेटी का भी है, जो तुम हो। मगर बेटा बड़ों से शर्म और आदर तमीज ये सब आराध्या को भी सीखाना है और याद रखना बच्चे अपने बड़ों को देखकर ही सीखते हैं। मां...आप रसोईघर में कयुं जा रहीं हैं आइए ना आप भी बारिश का आनंद लीजिए। सुधा ने मनुहार करते हुए कहा। हां आनंद तो मैं भी ले रहीं हूं बारिश का तुम बच्चों को हंसते खिलखिलाते हुए देखकर और इस आनंद को दोगुना करने के लिए ही में रसोईघर में जा रही हूं गर्मागर्म भजिया पकौड़ी तलने। मुस्कुरा कर मां ने जैसे ही ये कहा आराध्या जोरों से चिल्लाने लगी...या...हूं... मगर फिर मां की और फिर दादी मां की ओर देखकर कानों को हाथ लगाकर सौरी कहने लगी। ये देखकर मां के साथ-साथ मोहन और सुधा आराध्या को गोद में लेकर खिलखिलाकर हंसने लगे। *****

  • बेवफ़ाई

    जिया घड़ी वो और चूड़ी मैं निकालूंगी कलाई से, बहुत उकता चुके हैं यार दोनों आशनाई से, उसे बस देखना ही आँख की बीनाई ले डूबा, उसे लिखते अगर तो हाथ जलता रोशनाई से, हमें जो साथ बतलाए वो इकवेशन नहीं बनती, मुझे क्या फ़ायदा होता है फिर मेरी पढ़ाई से, तुम्हें गर बेवफ़ा कहता है वो शख़्स यानी तुम, बड़े मशहूर हो जाओगे अपनी बेवफ़ाई से, जिन्हें मन्ज़िल तलब होगी वो ख़ुद पा लेंगे मन्ज़िल को, कोई आगे नहीं बढ़ता किसी की रहनुमाई से, सुकून ए दिल समझ लो या वसीला है ग़ज़लगोई, हमारा घर नहीं चलता वरना इस कमाई से! ******

  • Relationships

    Dr. Ranjana Srivastava Warp and Woof of the world Strength and buttress for all and one Whether in blood or in laws Relationships have their sternness and thaws. Some-times acrid at other elixir Abominable to so amiable and close to heart Used and thrown and picked in need Chameleon in inclination or fair in deed. Smile on face and heart in veil impertinence Still under the damnation of the first disobedience Restore! Save us from this flesh and blood attire What we were let us be as prior. Had we thrown out of Eden Not to sweat on our brows to eat our food But to love and be the lover of garden To breath in peace and final goal to brood. Life is a span from breath to death Trepidations and celebrations within their width I am eager to find a heartful heart Myself caged within and dearest to all. Great is Your benevolence! Your prayer is the balm Will cool hurts of my spirit and make me calm Oh! just a Luminous ray has taught me so Learn the art of letting go. ******

  • कौशल

    प्रेमचंद पंडित बलराम शास्त्री की धर्मपत्नी माया को बहुत दिनों से एक हार की लालसा थी और वह सैकडो ही बार पंडित जी से उसके लिए आग्रह कर चुकी थी, किन्तु पण्डित जी हीला-हवाला करते रहते थे। यह तो साफ-साफ ने कहते थे कि मेरे पास रूपये नही है—इनसे उनके पराक्रम में बट्टा लगता था—तर्कनाओं की शरण लिया करते थे। गहनों से कुछ लाभ नहीं एक तो धातु अच्छी नहीं मिलती,श् उस पर सोनार रुपसे के आठ-आठ आने कर देता है और सबसे बडी बात यह है कि घर में गहने रखना चोरो को नेवता देन है। घडी-भर श्रृगांर के लिए इतनी विपत्ति सिर पर लेना मूर्खो का काम है। बेचारी माया तर्क –शास्त्र न पढी थी, इन युक्तियों के सामने निरूत्तर हो जाती थी। पडोसिनो को देख-देख कर उसका जी ललचा करता था, पर दुख किससे कहे। यदि पण्डित जी ज्यादा मेहनत करने के योग्य होते तो यह मुश्किल आसान हो जाती । पर वे आलसी जीव थे, अधिकांश समय भोजन और विश्राम में व्यतित किया करते थे। पत्नी जी की कटूक्तियां सुननी मंजूर थीं, लेकिन निद्रा की मात्रा में कमी न कर सकते थे। एक दिन पण्डित जी पाठशाला से आये तो देखा कि माया के गले में सोने का हार विराज रहा है। हार की चमक से उसकी मुख-ज्योति चमक उठी थी। उन्होने उसे कभी इतनी सुन्दर न समझा था। पूछा –यह हार किसका है? माया बोली—पडोस में जो बाबूजी रहते हैं उन्ही की स्त्री का है। आज उनसे मिलने गयी थी, यह हार देखा , बहुत पसंद आया। तुम्हें दिखाने के लिए पहन कर चली आई। बस, ऐसा ही एक हार मुझे बनवा दो। पण्डित—दूसरे की चीज नाहक मांग लायी। कहीं चोरी हो जाए तो हार तो बनवाना ही पडे, उपर से बदनामी भी हो। माया—मैंतो ऐसा ही हार लूगी। २० तोले का है। पण्डित—फिर वही जिद। माया—जब सभी पहनती हैं तो मै ही क्यों न पहनूं? पण्डित—सब कुएं में गिर पडें तो तुम भी कुएं में गिर पडोगी। सोचो तो, इस वक्त इस हार के बनवाने में ६०० रुपये लगेगे। अगर १ रु० प्रति सैकडा ब्याज रखलिया जाय ता – वर्ष मे ६०० रू० के लगभग १००० रु० हो जायेगें। लेकिन ५ वर्ष में तुम्हारा हार मुश्किल से ३०० रू० का रह जायेगा। इतना बडा नुकसान उठाकर हार पहनने से क्या सुख? सह हार वापस कर दो , भोजन करो और आराम से पडी रहो। यह कहते हुए पण्डित जी बाहर चले गये। रात को एकाएक माया ने शोर मचाकर कहा –चोर,चोर,हाय, घर में चोर , मुझे घसीटे लिए जाते हैं। पण्डित जी हकबका कर उठे और बोले –कहा, कहां? दौडो,दौडो। माया—मेरी कोठारी में गया है। मैनें उसकी परछाईं देखी । पण्डित—लालटेन लाओं, जरा मेरी लकडी उठा लेना। माया—मुझसे तो डर के उठा नहीं जाता। कई आदमी बाहर से बोले—कहां है पण्डित जी, कोई सेंध पडी है क्या? माया—नहीं,नहीं, खपरैल पर से उतरे हैं। मेरी नीदं खुली तो कोई मेरे ऊपर झुका हुआ था। हाय रे, यह तो हार ही ले गया, पहने-पहने सो गई थी। मुए ने गले से निकाल लिया । हाय भगवान, पण्डित—तुमने हार उतार क्यां न दिया था? माया-मै क्या जानती थी कि आज ही यह मुसीबत सिर पडने वाली है, हाय भगवान्, पण्डित—अब हाय-हाय करने से क्या होगा? अपने कर्मों को रोओ। इसीलिए कहा करता था कि सब घडी बराबर नहीं जाती, न जाने कब क्या हो जाए। अब आयी समझ में मेरी बात, देखो, और कुछ तो न ले गया? पडोसी लालटेन लिए आ पहुंचे। घर में कोना –कोना देखा। करियां देखीं, छत पर चढकर देखा, अगवाडे-पिछवाडे देखा, शौच गृह में झाका, कहीं चोर का पता न था। एक पडोसी—किसी जानकार आदमी का काम है। दूसरा पडोसी—बिना घर के भेदिये के कभी चोरी नहीं होती। और कुछ तो नहीं ले गया? माया—और तो कुड नहीं गया। बरतन सब पडे हुए हैं। सन्दूक भी बन्द पडे है। निगोडे को ले ही जाना था तो मेरी चीजें ले जाता । परायी चीज ठहरी। भगवान् उन्हें कौन मुंह दिखाऊगी। पण्डित—अब गहने का मजा मिल गया न? माया—हाय, भगवान्, यह अपजस बदा था। पण्डित—कितना समझा के हार गया, तुम न मानीं, न मानीं। बात की बात में ६००रू० निकल गए, अब देखूं भगवान कैसे लाज रखते हैं। माया—अभागे मेरे घर का एक-एक तिनका चुन ले जाते तो मुझे इतना दु:ख न होता। अभी बेचारी ने नया ही बनावाया था। पण्डित—खूब मालूम है, २० तोले का था? माया—२० ही तोले को तो कहती थी? पण्डित—बधिया बैठ गई और क्या? माया—कह दूंगी घर में चोरी हो गयी। क्या लेगी? अब उनके लिए कोई चोरी थोडे ही करने जायेगा। पण्डित तुम्हारे घर से चीज गयी, तुम्हें देनी पडेगी। उन्हे इससे क्या प्रयोजन कि चोर ले गया या तुमने उठाकर रख लिया। पतिययेगी ही नही। माया –तो इतने रूपये कहां से आयेगे? पण्डित—कहीं न कहीं से तो आयेंगे ही,नहीं तो लाज कैसे रहेगी: मगर की तुमने बडी भूल । माया—भगवान् से मंगनी की चीज भी न देखी गयी। मुझे काल ने घेरा था, नहीं तो इस घडी भर गले में डाल लेने से ऐसा कौन-सा बडा सुख मिल गया? मै हूं ही अभागिनी। पण्डित—अब पछताने और अपने को कोसने से क्या फायदा? चुप हो के बैठो, पडोसिन से कह देना, घबराओं नहीं, तुम्हारी चीज जब तक लौटा न देंगें, तब तक हमें चैन न आयेगा। पण्डित बालकराम को अब नित्य ही चिंता रहने लगी कि किसी तरह हार बने। यों अगर टाट उलट देते तो कोई बात न थी । पडोसिन को सन्तोष ही करना पडता, ब्राह्मण से डाडं कौन लेता , किन्तु पण्डित जी ब्राह्मणत्व के गौरव को इतने सस्ते दामों न बेचना चाहते थे। आलस्य छोडंकर धनोपार्जन में दत्तचित्त हो गये। छ: महीने तक उन्होने दिन को दिन और रात को रात नहीं जाना। दोपहर को सोना छोड दिया, रात को भी बहुत देर तक जागते। पहले केवल एक पाठशाला में पढाया करते थे। इसके सिवा वह ब्राह्मण के लिए खुले हुए एक सौ एक व्यवसायों में सभी को निंदनिय समझते थे। अब पाठशाला से आकर संध्या एक जगह ‘भगवत्’ की कथा कहने जाते वहां से लौट कर ११-१२ बजे रात तक जन्म कुंडलियां, वर्ष-फल आदि बनाया करते। प्रात:काल मन्दिर में ‘दुर्गा जी का पाठ करते । माया पण्डित जी का अध्यवसाय देखकर कभी-कभी पछताती कि कहां से मैने यह विपत्ति सिर पर लीं कहीं बीमार पड जायें तो लेने के देने पडे। उनका शरीर क्षीण होते देखकर उसे अब यह चिनता व्यथित करने जगी। यहां तक कि पांच महीने गुजर गये। एक दिन संध्या समय वह दिया-बत्ति करने जा रही थी कि पण्डित जी आये, जेब से पुडिया निकाल कर उसके सामने फेंक दी और बोले—लो, आज तुम्हारे ऋण से मुक्त हो गया। माया ने पुडिया खोली तो उसमें सोने का हार था, उसकी चमक-दमक, उसकी सुन्दर बनावट देखकर उसके अन्त:स्थल में गुदगदी –सी होने लगी । मुख पर आन्नद की आभा दौड गई। उसने कातर नेत्रों से देखकर पूछा—खुश हो कर दे रहे हो या नाराज होकर1. पण्डित—इससे क्या मतलब? ऋण तो चुकाना ही पडेगा, चाहे खुशी हो या नाखुशी। माया—यह ऋण नहीं है। पण्डित—और क्या है, बदला सही। माया—बदला भी नहीं है। पण्डित फिर क्या है। माया—तुम्हारी ..निशानी? पण्डित—तो क्या ऋण के लिए कोई दूसरा हार बनवाना पडेगा? माया—नहीं-नहीं, वह हार चारी नहीं गया था। मैनें झूठ-मूठ शोर मचाया था। पण्डित—सच? माया—हां, सच कहती हूं। पण्डित—मेरी कसम? माया—तुम्हारे चरण छूकर कहती हूं। पण्डित—तो तमने मुझसे कौशल किया था? माया-हां? पण्डित—तुम्हे मालूम है, तुम्हारे कौशल का मुझे क्या मूल्य देना पडा। माया—क्या ६०० रु० से ऊपर? पण्डित—बहुत ऊपर? इसके लिए मुझे अपने आत्मस्वातंत्रय को बलिदान करना पडा। ******

  • मैं मदिरालय हूं।

    डॉ. जहान सिंह ‘जहान’ “देश का देशी मदिरालय।” हताशा, निराशा, हर गम का औषधालय।। चिंता हरक, कष्ट निवारक, थके हुओं का विश्रामालय। टीन की चादर, घास का छप्पर या मिट्टी का खपरैला। टूटा दरवाजा, गीला फर्श, बेंच, तख्त सब मैला।। भले निवास हो उसका टूटा फूटा एक मकान। पर करता सबका स्वागत सबका सम्मान।। चाट पकौड़ी, लाई चना या हो आलू बंडा। मूली गाजर, कटे टमाटर या मुर्गी का अंडा।। साइकिल, रिक्शा, ऑटो, पैदल दूर खड़ा है गाड़ीवान। एक दूसरे का स्वागत करता हर आने जाने वाला मेहमान।। कोई आया लड़ के पीने, कोई पीके लड़ने जाएगा। यह सब किस्से सौ ग्राम लगने के बाद बताएगा।। दृश्य 01 :- एक रुपए का गिलास, दो रुपए का पानी, पांच रुपए के सिगरेट, मसाला या बीड़ी का बंडल ना किसी तरह का झगड़ा, ना कोई गड़बड़झाला। ईमानदारी का लेनदेन, करे ना कोई घोटाला।। उसूल का पहला पैग एक झटके में फिर चेहरे पर मुस्कराना। होता है तो होने दो लीवर फेफड़ों का नुकसान।। रेट लिस्ट में आंखें गढाते। पव्वा, अध्धा का गणित लगाते।। फिर दोस्तों के पास आ जाते। मिलकर आपस में संजीदा हो जाते।। सब जेब टटोलते, मुस्कुराते और अध्धी का जतन बनाते। उन पैसों में, किसी के बच्चों की किताबें, किसी के पत्नी की पायल, किसी के मां बाप की दवाई किसी के राशन का उधार शामिल हो जाता। यह सही या गलत समाज के चिंतकों पर छोड़ देता। चलो अब दरिया का रुख मोड़ देते हैं।। दृश्य 02 :- नाक विदारक बदबू, सांस उखाड़ू धुँआ, कान पकाता शोर। हंसना, रोना, चिल्लाना और गाना करते बोर।। कुछ घंटों में मदिरालय बचपन छोड़, जवानी में कदम रख लेता है। फिर क्या हर खिलाड़ी जो अध्धी के लिए चंदा करता है। वह लाखों और करोड़ों में खेलने की बात करता है।। कुछ संवाद:- मैं खुद्दार हूं। बाप की भी नहीं सुनता, लाखों की दौलत पर ठोकर मार दी। और अब शान से रिक्शा चलाता हूं, आदि, आदि।। सब एक दूसरे की वाहवाही करते। अंदर से मुस्कुराते। जानते हैं कि बाहर निकलते ही जैसे मदिरा हल्की हो जाएगी। यह बंदा भी हल्का हो जाएगा।। डरते-डरते यदि घर होगा तो घर जाएगा। नहीं तो प्लेटफार्म या फुटपाथ पर सो जाएगा।। दृश्य 03 :- लोहे की जाली में बंद, एक मुखी द्वार वाली खिड़की, मध्यम प्रकाश जीवित या जीवित सा दिखने वाला, भीतर से बहुत थका हुआ सेल्समैन एक हाथ में पैसा, दूसरे हाथ में पाउच का आदान-प्रदान करते-करते सुशुप्ता की अवस्था में जाने लगा है। रात गहरी हो रही है। नशा और नींद से बोझिल सब मदिरा प्रेमी उठ चले। जेब खाली, पेट में मदिरा, शरीर अनियंत्रित कल फिर मिलेंगे वादे के साथ बिखर जाते हैं। मदिरालय बंद हो जाता है। पर एक गहरी संवेदना का संदेश छोड़ जाता है। यहां दुखी आता है और सुखी हो जाता है। एक दो घड़ी के लिए ही सही। दुनिया के पाखंडों से दूर, सरल, जात-पात, धर्म, ऊंच-नीच, अमीरी-गरीबी की सीमा से उठकर एक मानव धर्म में बंध जाता है। कितना अद्भुत, पवित्र एहसास भर जाता है। क्या आम जीवन में ऐसा मानव धर्म हम स्थापित नहीं कर सकते? एक प्रश्न? ******

  • सत्य की खोज

    मुकेश ‘नादान’ बात उस समय की है जब नरेंद्र ने सत्य की खोज में न जाने कितनी ही पुस्तकें पढ़ डाली थीं। वे अपने अध्ययन से किसी उद्देश्य को प्राप्त करना चाहते थे। वास्तव में वह अध्ययन के माध्यम से सत्य की खोज करना चाहते थे। जिसे वे सत्य की कसौटी पर खरा पाते, उसकी मन-प्राण से रक्षा करते। जब उन्हें लगता कि सामने वाला उस सत्य को झूठ साबित करने के लिए उद्यत है तो नरेंद्र तुरंत उससे तर्क-वितर्क करने लगते और उसे परास्त करके ही शांत होते। उनके मन में न किसी के प्रति द्वेष था और न ही वे अपनी बात ऊँची रखने के लिए कुतर्क का सहारा लेते थे, फिर भी उनसे परास्त व्यक्ति उन्हें दंभी कहते थे, किंतु नरेंद्र ने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया कि कोई उनके विषय में क्या कह रहा है। उनके स्वभाव से परिचित छात्र उनका बहुत आदर करते थे। जनरल असेंबली कॉलेज के अध्यक्ष विलियम हेस्टी बहुत सज्जन व्यक्ति थे। वह बड़े विदृवान्‌, कवि और दार्शनिक भी थे। नरेंद्र अपने कुछ प्रतिभाशाली साथियों के साथ नियमित रूप से उनके पास जाकर दर्शनशात्र का अध्ययन किया करता था। हेस्टी साहब नरेंद्र की बहुमुखी प्रतिभा की बहुत प्रशंसा करते थे। एक बार नरेंद्र ने जब कॉलेज के “दार्शनिक क्लब' में किसी मत विशेष का सूक्ष्म विश्लेषण किया, तो हेस्टी साहब ने प्रसन्‍न होकर कहा, “नरेंद्र दर्शनशात्र का अति उत्तम छात्र है। जर्मनी और इंग्लैंड के तमाम विश्वविद्यालयों में एक भी ऐसा छात्र नहीं है, जो इसके समान मेधावी हो।" नरेंद्र की जिज्ञासा उनकी बढ़ती आयु और अध्ययन के अनुपात में तीव्र होती जा रही थी। वह जानना चाहते थे कि मानव जीवन का उद्देश्य क्या है? क्या वास्तव में इस जड़-जगत्‌ को संचालित करने वाली कोई सर्वशक्तिमान ईश्वरीय सत्ता है? ऐसे अनगिनत प्रश्नों के उत्तर खोजने की चेष्टा में उनका मन उलझा रहता। हालाँकि उनमें बाल्यावस्था से ही धर्मभावना विद्यमान थी, किंतु सत्य को जानने की अभिलाषा में उनका मन अशांत रहता था। पाश्चात्य विज्ञान तथा दर्शनशात्र का अध्ययन उनके मन में संदेह उत्पन्न करता था। जब भी वह किसी धर्म-प्रचारक को ईश्वर के विषय में उपदेश देते हुए सुनते, तो वह तुरंत पूछते, “महाशय, क्या आपने ईश्वर के दर्शन किए हैं?" सकारात्मक अथवा नकारात्मक उत्तर देने के स्थान पर धर्म-प्रचारक अपने उपदेशों के माध्यम से उन्हें संतुष्ट करने का प्रयास करते, किंतु नरेंद्र इन सांप्रदायिक बातों को सुन-सुनकर विरक्‍्त हो चुके थे। अपने प्रश्न का उन्हें किसी से सत्यता की कसौटी पर सही उत्तर नहीं मिलता था। नरेंद्र की अपने पिता से विरासत में मिली आलोचना-प्रवृत्ति पर पाश्चात्य विचारों का प्रभाव बढ़ गया था। इसी कारण नरेंद्र को आत्मिक शांति प्राप्त नहीं हो पा रही थी। उन्हें खोज थी ऐसे व्यक्ति की, जो जीता-जागता आदर्श हो। और इसी दूबंदूव के चलते नरेंद्र अपने कुछ मित्रों के साथ ब्रह्मसमाज के सदस्य बन गए। तब तक ब्रह्मसमाज आदिब्रह्मसमाज और अखिल भारतीय ब्रह्मसमाज, इन दो भागों में विभक्त हो चुका था। इनके नेता क्रमशः देवेंद्रनाथ ठाकुर और केशबचंद्र सेन थे। केशवचंद्र सेन से बंगाली नौजवान काफी प्रभावित थे। केशव और उनके अनुयायी ईसाइयत के रंग में रँगे हुए थे तथा उनका रवैया सनातन हिंदू धर्म की उच्चतम मान्यताओं के एकदम विपरीत था। लेकिन नरेंद्र की इन मान्यताओं में आस्था थी। संदेववादी होते हुए भी उनमें अन्य नौजवानों जैसी उद्‌डंता तथा अराजकता नहीं थी। उन्होंने आदिब्रह्मसमाज को चुना था। ब्रह्मसमाज की प्रत्येक रविवारीय उपासना में नरेंद्र सम्मिलित होते थे। साथ ही अपने मधुर कंठ से ब्रह्म संगीत सुनाकर श्रोताओं का मन मोह लेते थे, किंतु वे उपासना के विषय में दूसरे सदस्यों से सहमत नहीं थे। उन्हें ब्रह्मसमाज में त्याग तथा निष्ठा की कमी अनुभव होती थी। जहाँ भी वह असत्य की छाप देखते, निर्भीक भाव से उसकी आलोचना करते थे, फिर भी उन्हें सत्य के दर्शन नहीं हुए। एक दिन देवेंद्रनाथ ठाकुर ने उपदेश देते हुए नरेंद्र से कहा, “तुम्हारे प्रत्येक अंग में योगियों की छाया स्पष्ट झलकती है। ध्यान करने से तुम्हें शांति तथा सत्य की प्राप्ति होगी।” 'लगनशील नरेंद्र उसी दिन से ध्यानानुराग में रम गए। थोड़ा खाना, चटाई पर सोना, सफेद धोती पहनना तथा शारीरिक कठोरता का पालन करना उन्होंने अपना नियम बना लिया। उन्होंने अपने घर के निकट किराए पर कमरा ले रखा था। उनके परिवार वाले समझते थे कि घर पर पढ़ाई में असुविधा होती होगी, इसी कारण नरेंद्र अलग कमरा लेकर रह रहा है। विश्वनाथजी ने भी कभी नरेंद्र की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने की चेष्टा नहीं की। नरेंद्र अध्ययन, संगीत आदि की चर्चा करने के पश्चात्‌ अपना शेष समय साधना-भजन में बिताते थे। इस तरह दिन बीतने लगे, लेकिन उनकी सत्य की खोज पूर्ण नहीं हुई। समय बीतने के साथ-साथ उन्हें समझ में आने लगा कि सत्य को प्रत्यक्ष रूप से देखने के लिए किसी ऐसे व्यक्ति के चरण-कमलों में बैठकर शिक्षा लेनी होगी, जिसने स्वयं सत्य का साक्षात्कार किया हो। साथ ही उन्होंने निर्णय लिया कि यदि मैं सत्य की खोज न कर सका, तो इसी प्रयल में प्राण दे दूँगा। *******

  • वो प्यार नहीं कर पाएंगे

    आँचल सक्सैना सच कहते हैं यार, नहीं कर पाएंगे उनसे आंखें चार, नहीं कर पाएंगे चेहरा देखे वो केवल, दिल ना देखे हम इतना श्रृंगार, नहीं कर पाएंगे मेरे दिल पर, तेरा जितना कब्ज़ा है बाकी दावेदार, नहीं कर पाएंगे शहद बनाते हैं जो, रस को पी-पीकर फूलों से तकरार, नहीं कर पाएंगे इतना ग़ुस्सा, इतनी उलझन, बेचैनी ऐसे तो वो प्यार नहीं कर पाएंगे इस जीवन में जो कुछ करना है, आँचल हम, सबके अनुसार नहीं कर पाएंगे। ******

  • पराई नहीं होती बेटी

    डॉ. कृष्ण कांत श्रीवास्तव एक बार एक पिता ने अपनी बेटी की सगाई करवाई। लड़का बड़े अच्छे घर से था, इसलिए माता-पिता दोनों बहुत खुश थे। लड़के के साथ लड़के के पूरे परिवार का स्वभाव भी बड़ा अच्छा था। पिता को अपनी बेटी की शादी अच्छे घर में पक्का होने पर राहत भी महसूस हो रहा थी। शादी से एक सप्ताह पहले लड़के वालों ने लड़की के पिता को अपने घर खाने पर बुलाया....! उस लड़की के पिता की तबीयत ठीक नहीं थी फिर भी वे ना न कह सके। लड़के वालों ने बड़े ही आदर सत्कार से उनका स्वागत किया। फ़िर लडकी के पिता के लिए चाय आई। लेकिन शुगर की वजह से लडकी के पिता को चीनी वाली चाय से दूर रहने के लिए कहा गया था। पिता अपनी लड़की के होने वाली ससुराल में थे, इसलिए उन्होंने बिलकुल चुप रह कर चाय अपने हाथ में ले ली। चाय कि पहली चुस्की लेते ही वो चौक से गये। चाय में चीनी बिल्कुल ही नहीं थी और इलायची भी डली हुई थी। वो सोच मे पड़ गये कि ये लोग भी हमारी जैसी ही चाय पीते हैं शायद। जब दोपहर में उन्होंने खाना खाया, वो भी बिल्कुल उनके घर जैसा। उसके बाद दोपहर में आराम करने के लिए दो तकिये, पतली चादर मौजूद थे। उठते ही उन्हें निम्बू पानी का शर्बत दिया गया। वहाँ से विदा लेते समय उनसे रहा नहीं गया तो वे हैरानी वश पूछ बैठे.....श्रीमान जी, मुझे क्या खाना है, क्या पीना है, मेरी सेहत के लिए क्या अच्छा है या डॉक्टरों ने मेरे लिए क्या वर्जित किया है, ये परफेक्टली आपको कैसे पता है? पिता की पूरी बात सुनने के बाद बेटी की सास ने धीरे से कहा कि कल रात को ही आपकी बेटी का फ़ोन आ गया था औऱ उसने बेहद विनम्रता से कहा था कि मेरे पापा स्वभाव से बड़े सरल हैं, बोलेंगे कुछ नहीं लेकिन प्लीज अगर हो सके तो आप उनका ध्यान रखियेगा। पूरी बात सुनकर पिता की आंखों में पानी भर आया। लड़की के पिता जब अपने घर पहुँचे तो घर के ड्राइंग रूम में लगी अपनी स्वर्गवासी माँ के फोटो से हार निकाल दिया। जब पत्नी ने उनसे पूछा कि ये क्या कर रहे हो तो लडकी के पिता बोले-मेरा आजीवन ध्यान रखने वाली मेरी माँ इस घर से कहीं नहीं गयी है, बल्कि वो तो मेरी बेटी के रुप में इस घर में ही रहती है। और फिर पिता की आंखों से आंसू छलक गये ओर वो फफक कर रो पड़े। साथ में माँ भी रोने लगी। दुनिया में सब कहते हैं ना कि बेटी है, एक दिन इस घर को छोड़कर चली जायेगी लेकिन बेटियां कभी भी अपने माँ-बाप के घर से नहीं जाती, बल्कि वो हमेशा उनके दिल में रहती हैं। *******

  • चरित्रहीन

    संजय सक्सेना एक बार एक बुजुर्ग को उनके बातो से प्रभावित हो एक औरत ने उन्हें अपने घर खाने का निमंत्रण दिया। बुजुर्ग निमंत्रण स्वीकार कर उस औरत के घर भोजन के लिए चल पड़े। रास्ते में जब लोगों ने उस औरत के साथ बुजुर्ग को देखा तो, एक आदमी उनके पास आया और बोला कि आप इस औरत के साथ कैसे? बुजुर्ग ने बताया कि वह इस औरत के निमंत्रण पर उसके घर भोजन के लिए जा रहे हैं, यह जानने के बाद उस व्यक्ति ने कहा कि आप इस औरत के घर न जाऐं आप की अत्यंत बदनामी होगी, क्योंकि यह औरत चरित्रहीन है। इसके बावजूद बुजुर्ग न रुके, कुछ ही देर में यह बात जंगल में आग की तरह फैल गई। आनन फानन में गांव का मुखिया दौडता हुआ आ गया और बुजुर्ग से उस औरत के यहां न जाने का अनुरोध करने लगा। विवाद होता देख बुजुर्ग ने सबको शांत रहने को कहा, फिर मुस्कराते हुए मुखिया का एक हाथ अपने हाथ में कस कर पकड़ लिया और बोले क्या अब तुम ताली बजा सकते हो? मुखिया बोला एक हाथ से भला कैसे ताली बजेगी। इस पर बुजुर्ग मुस्कुराते हुए बोले जैसे एक हाथ से ताली नहीं बज सकती तो अकेली औरत कैसे चरित्रहीन हो सकती है जब तक कि एक पुरुष उसे चरित्रहीन बनने पर बाध्य न करे। चरित्रहीन पुरुष ही एक औरत को चरित्रहीन बनाने में जिम्मेदार है। यह कैसी विडम्बना है कि इस कथित "पुरुष प्रधान समाज के अभिमान में ये पुरुष अपनी झूठी शान के लिए औरत को केवल अपने उपभोग की वस्तु भर समझता है और भूल जाता है कि जिस औरत को वह चरित्रहीन कह रहा है, उसका जिम्मेदार वह स्वयं है। *******

  • मोबाइल और बच्चे

    डॉ राम शरण सेठ मोबाइल आ गया है। बचपन छीनता जा रहा है।। परिवार में संवेदनाओ से। नाता दूर हो गया है।। रिश्तों की समझदारी। कुछ न कुछ कम हो गई है।। मानसिक और शारीरिक हीनता। दिन पर दिन बढ़ती जा रही है।। सजीव से बात ना करके। निर्जीव से बात करने की चलन बढ़ गई है।। आंखों की रोशनी बचपन। में कम हो रही है।। जो वृद्धावस्था के रोग थे। वह बचपन में लग रहे हैं।। बात-बात पर चिढ़ना और गुस्साना। यह लगातार बढ़ता जा रहा है।। क्योंकि दोनों के बीच में। कहीं न कहीं मोबाइल आ गया है।। यह दोनों कहीं न कहीं। एक दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं।। जिसकी शुरुआत बचपन। में ही हो गई है।। हम सभी को संभालना होगा। और बच्चो को समझाना होगा।। मोबाइल और बच्चों के संबंध में। सामंजस्य सरल तरीके से बनाना होगा।। ******

  • अंतिम सीख

    रमा शंकर मिश्र सीबा वर्षो से ज्ञानेश के घर में नौकरानी का काम करती थी। उसको सबसे ज़्यादा लगाव ज्ञानेश के दादाजी से था। दादाजी के तो "हाथ पैर" ही जैसे सीबा थी। घर के काम निपटाकर जो समय बचता वह दादाजी के साथ ही बीतता। कभी-कभी देर रात तक बातें करते-करते सीबा वहीं सो जाती। सीबा के कारण ज्ञानेश के म़म्मी-पापा दादाजी की ओर से निश्चिन्त रहते। ज्ञानेश की दोनों दीदीयां भी सीबा को अपने आगे-पीछे दौडातीं रहती। सीबा दीदी-दीदी कहकर उनको खुश रखती, उसके चेहरे पर जरा भी झल्लाहट नहीं दिखाई देती। सीबा उम्र में उनसे दो-चार साल छोटी थी, रूप-सौन्दर्य में तो सीबा के क्या कहना? वह ज्ञानेश के दादा-दादी की पुरानी नौकरानी की बेटी थी जिसकी सड़क हादसे में मौत हो चुकी थी। दादा-दादी ने सीबा को अपने पास ही रख लिया। जब तक वह छोटी थी तब तक उसे पढ़ाया, आठवीं कक्षा पास करने के बाद उसे घर के काम में लगा दिया। दादी के देहांत के बाद दादाजी, सीबा को सिर्फ अपनी जिम्मेदारी मानने लगे। बड़ी दीदी की शादी पर ज्ञानेश घर आया। तब उसने देखा - सीबा के बिना तो घर में किसी का काम ही नहीं चल रहा है। शायद सभी उस पर विश्वास करते हैं; परंतु कम पढ़ी-लिखी होने के कारण कई समस्याओ को सीबा अपनी सूझ-बूझ से सुलझाने का असफल प्रयास करती। उसकी "प्रयास प्रवृत्ति" को ध्यान में रखते हुए ज्ञानेश ने अपने मम्मी-पापा व दादा से कहा कि छोटी दीदी की शादी के बाद, बाजार से सामान लाना, घरेलू हिसाब-किताब रखना, बीमारी में आप लोगों को अस्पताल लेकर जाना, दवाईयों को देख-पढ़कर लाना, छोटे-मोटे bill pay करना जैसे आदि कार्यो को करने में आप लोगों को मुश्किल आएगी? इसलिए सीबा को दसवीं का प्राइवेट फार्म भरवा देते हैं। सीबा भी पढ-लिख जाएगी, हमारा भी काम आसान हो जाएगा। सबको यह बात खूब पसंद आई। पढ़ाई-लिखाई की बात सुनकर पहले तो सीबा कुछ हड़बड़ाई। बाद में ज्ञानेश के निर्देशानुसार पढ़ाई में रम गयी। इन पांच-छ सालों के अंदर ही छोटी दीदी की भी शादी हो गई। ज्ञानेश भी पढ़ाई पूरी करके जाब पर लगा गया। सीबा ने तो अकेले घर का सारा काम करने के बाद B.A. top class करके सबको हैरान ही कर दिया। इसी बीच ज्ञानेश की छोटी दीदी के ससुराल पक्ष के एक रिश्तेदार की ओर से सीबा के लिए रिश्ता आया। मम्मी-पापा तो जैसे इस रिश्ते का इंतजार कर रहे थे। अब वे हर हाल में सीबा को निपटा देना चाह रहे थे। पर ज्ञानेश ने एतराज करते हुए कहा- सीबा ये रिश्ता तुम्हें पसंद है, तो वहां तुम्हारी शादी होगी वरना नहीं। सीबा बोली- आप लोगों ने मेरे माता-पिता, भाई-बहन बनकर मुझे शिक्षा जैसे अनमोल रत्न को पाने का मौक़ा दिया। आपसे बड़ा हितैषी कौन हो सकता है मेरा? आप मेरे लिए जैसा घर-वर ढूंढेंगे वह मुझे सहर्ष स्वीकार होगा। ज्ञानेश फिर बोला- सीबा तुम ये ना सोचो कि हमने तुम्हें पढ़ने आदि का मौका दिया, इसलिए हमारे सभी निर्णय तुम्हें स्वीकार होंगे। तुम ये सोचो कि आने वाले जीवन में हम प्रत्यक्ष रूप से तुम्हारे साथ नहीं होंगे। तब तुम्हें हर परिस्थिति को अपने अनुकूल बनाना पढेगा। अब सीबा को समझ आया कि ज्ञानेश को उसके भविष्य की कितनी चिंता है। दादाजी ने ज्ञानेश से कहा- तुम नई पीढ़ी के हो। वर सहित उसके घर वालों को बुला लो, सीबा की सहमति होगी तो बात आगे बढ़ेगी, वरना नहीं। सीबा की संतुष्टि और सहमति के बाद ज्ञानेश ने उसकी शादी भी अपनी बहिनों के ही समान धूमधाम से की। सीबा विदाई के समय दादाजी के गले लगकर बहुत देर तक रोती रही। दादाजी ने उसे समझाकर कहा- सीबा! समझाने लायक बातें मैंने पहले ही तुम्हें समझा दी है मुझे संतोष है कि तुम अच्छे घर-परिवार में जा रही हो। एक बात फिर कहता हूं- जैसे तुम यहां रहती थी, ससुराल में भी वैसे ही रहना। यह मेरी अंतिम सीख है। ********

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