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- आतप प्रताप
वीना उदय दिनकर के आतप से आकुल अवनि का आँचल है तृषित है जन-जन, व्याकुल तन-मन ठाँव ढूँढते वन-वन। लुप्त हुई मानो हरियाली, सूखी पत्ती-पत्ती औ डाली चिड़िया दुबक गई खोतों में, दादुर हुए कूप मंडूक सन्नाटे में उपवन। पिक मानो हुई काक समान, नहीं सुनाती रसमय गान मेहप्रिये ने नर्तन त्यागा, तनिक नहीं उल्लास है जागा कुपित है क्यों घनश्याम। सिंह, ब्याल, गजराज रीछ, सारे सामिष और निरामिष बैठ सघन - वन सरवर तीरे, एक दूजे के हुए हितैषी दिनकर दीपक राग सुनाए। त्राहि माम जन-जन ने पुकारा, वृष्टि यज्ञ कर मघवा को पुकारा आए देवेंद्र, आए पुरंदर, मेघों पर कर आरोहण मेघ मल्हार गाएँ हर्षित जन। ******
- दिल की सुन
सुमन मोहिनी वो वफ़ा करें या जफ़ा करें सब क़बूल सजदे में उनके हमने सर को झुकाया है। इस दिल की बेक़रारी क्या समझेगा वो जिसके लिए होशो हवास अपना गवाया है। ये दिल भी तो देखो कितना धोखेबाज़ है कहीं और जाकर इसने आशियां बसाया है। दिल और दिमाग़ की इस जद्दो ज़हद में आख़िर तो दिल का ही परचम लहराया है। ए ख़ुदा दुआ इस दिल की क़बूल कर ले उनके दरस को क्यों इतना तड़पाया है। दिल से दिल को राह तो है ये माना हमने फिर सदा वो मेरे दिल की सुन क्यों ना पाया है। दिल की तमन्ना कहीं दिल ही में ना रह जाए उनसे एक बार मुलाक़ात का मन बनाया है। इस दिल की हालत अब कौन समझेगा ‘सुमन’ सबने ही तो कर दिया हमको पराया है। ******
- समय का फेर
डॉ उर्मिला सिन्हा "यह कुलच्छिनी जन्म लेते मां को खा गई फिर बाप को। इसके साये से भी दूर रहना चाहिए। "ताई दांत पीस-पीस कर कोसे जा रही थी। सब का लात मार के साथ जूठन खा अनाथ बालिका रमा जैसे-तैसे ताई ताऊ बुआ दादी के सहारे बड़ी हुई। उस पर कोढ में खाज की तरह रमा का रुपवती होना किसी को फूटी आंख नहीं सुहाता था। क्योंकि फटे पुराने उतरन पहनकर भी उसका रुप दमक उठता। उसके सुंदरता के आगे घर की अन्य लड़कियां पानी भरती। फिर क्या था रमा को नीचा दिखाने के लिए "खा खा के मुटा रही है... काम के न काज के " चाची का गुस्सा सातवें आसमान पर रहता था। थर-थर कांपती रमा सिर झुकाये सबकी तीमारदारी में लगी रहती। उसकी बुद्धि भी बहुत तेज थी। जहाँ घर के अन्य बच्चे महंगे स्कूल में संसाधनों के साथ खींच-तीन कर पास होते वहीं सरकारी स्कूल में रमा को वजीफा मिलता। "ला ये पैसे हमें दे... मुफ्त खोरी की आदत पड़ी हुई है" जख्म पर नमक छिड़कने वालों की कमी न थी। ईश्वर की माया... ऐसे ही रोते-धोते गाली गलौज फजीहत के बीच अपने परिश्रम के बल पर रमा का चयन पहली ही बार में प्रशासनिक सेवा में चयन हो गया। पेपर मीडिया में रमा छा गई। पहचान वाले बधाईयां देने लगे। रमा को जली-कटी सुनाने वालों का मुंह बन गया। किंतु आदत से लाचार ताई जले पर नमक छिड़कने से बाज न आई, "देखना यह मनहूस लड़की वहां भी सुख से न रह पायेगी।" पडो़सी से रहा न गया बोल पड़ी, "अब तो बस करो... यही लड़की तुम लोगों का नाम रौशन की और इसी को भला-बुरा कह रही हो। अब तो जख्मों पर नमक छिड़कना बंद करो।" समय बदलते सबके मुंह पर ताले जड़ गये। *****
- जिंदगी की ओर
कुसुम अग्रवाल मास्टर जी को रिटायर हुए 2 वर्ष बीत चुके थे पर जैसा जोश रिटायरमेंट के समय था अब वह नहीं रहा क्योंकि कोई लक्ष्य ही नहीं रहा जीवन का। वही रोज की घिसी पिटी दिनचर्या। दोनों लड़के विदेश में सेटल हो गए थे। अब वे और उनकी पत्नी ही घर पर थे। मास्टर जी रोजाना सुबह टहलने जाया करते थे। आज मास्टरजी जैसे ही घूमने जाने को हुए पीछे से उनकी पत्नी की आवाज आई। अरे! आज बादल हो रहे हैं कहां जा रहे हो? मास्टर जी बोले अभी ज्यादा नहीं है थोड़ी देर में घूम आऊंगा। लेकिन छाता लेते जाना और बारिश आ जाए तो रास्ते में कहीं रुक जाना मास्टर जी की पत्नी रुकमणी बोली। ठीक है मास्टर जी कहते हुए चल पड़े। चलते-चलते थोड़ी दूर ही पहुंचे थे कि बारिश होने लगी तब मास्टर जी ने देखा कि सामने एक नई टी स्टॉल खुली है जिस पर एक छोटा सा लड़का चाय बना रहा था। बारिश के कारण मास्टर जी ने उस टी स्टॉल पर रुकना ही उचित समझा। उस स्टॉल पर चाय बनाने वाले बच्चे की लंबाई लगभग तीन साढे तीन फुट थी। वह दुबला पतला फटी सी बनियान पहने और कमर के नीचे तौलिया बांधे हुआ था। मास्टर जी ने बच्चे से उसका नाम पूछा तो उसने बताया मां बाप ने बड़े प्यार से मेरा नाम मनन रखा था लेकिन अब लोग मुझे छोटू नाम से बुलाते हैं। मास्टर जी बोले तुम्हारे माता-पिता कहां रहते हैं छोटू। छोटू चुप रह गया और चाय बनाने लगा। मास्टर जी ने फिर पूछा तुमने तुम्हारे मां बाप के बारे में नहीं बताया। छोटू बोला क्या बताऊं साहब कुछ बताने को बचा ही नहीं। कोरोना ने पूरे परिवार को लील डाला वरना मेरा भी हंसता खेलता परिवार था। मेरे माता-पिता मजदूरी करते थे। कोरोना के चलते माता-पिता की मौत हो गई। अब मेरे परिवार में मैं और मेरी छोटी बहन ही रह गए हैं। इसलिए परिवार की जिम्मेदारी अब मुझ पर आ गई है। मास्टर जी बच्चे को देखने लगे। इतनी छोटी उम्र में इतनी बड़ी जिम्मेदारी, मास्टर जी ने आगे पूछा तुम्हारी छोटी बहन कहां है? छोटू बोला वह 8 बरस की है और दूसरे के घरों में झाड़ू पोछा करने जाती है। उसके बाद यही चाय की दुकान पर आ जाती है मेरे पास। मास्टर जी बच्चे को देखते रह गए। उनका मन भर आया पर बालक की आंखों में एक तेज था। जो मास्टर जी को उसकी ओर आकर्षित कर रहा था। मास्टरजी ने पूछा क्या तुम पहले पढ़ने जाते थे? वह बोला जी बिल्कुल जाता था पर कोरोना के चलते.............. पर मैं ईश्वर को धन्यवाद देता हूं कि मेरी बहन के लिए मैं रह गया। वरना ना जाने क्या होता। मास्टर जी की आंखों में बालक के लिए आंसू छलक आए। छोटू चाय छानकर सब को पकड़ाने लगा। बारिश भी रुक चुकी थी, लेकिन मास्टर जी का मन वहां से जाने को नहीं हुआ। मास्टर जी ने बच्चे से पूछा क्या अब भी तुम्हारा मन पढ़ने को करता है? बिल्कुल करता है लेकिन मैंने अपनी इच्छा को मन के कोने में दबा दिया क्योंकि अब ऐसा होना संभव नहीं है। मास्टर जी एकटक बालक को देखे जा रहे थे। उन्होंने बोला यदि तुम चाहो तो मैं तुम्हें पढ़ा सकता हूं और तुम्हारी बहन को भी पढ़ा दूंगा, तो क्या तुम पढ़ना पसंद करोगे? छोटू की आंखों से आंसू बहने लगे। उसने मास्टर जी के पांव छू लिए वह बोला। 1 वर्ष बीत गया, मेरे मां-बाप को गए लेकिन आज तक किसी नाते रिश्तेदार तक ने प्यार से मुझसे बात नहीं की। आज आपकी इतनी स्नेह भरी बातें सुनकर मेरा मन भर आया। मास्टर जी ने उसे गले लगा लिया और अगले दिन अपने घर का पता देकर रोज शाम को छोटू और उसकी बहन को आने को कहा। छोटू बहुत ही खुश हो गया और मास्टर जी को दिल से धन्यवाद देने लगा। छोटू ने कहा मैं और मेरी बहन आपके पास पढ़ने जरूर आएंगे लेकिन आपको भी मेरी दुकान पर रोज आना पड़ेगा और मुझसे मेरे हाथ की बनी चाय पीनी पड़ेगी। साथ ही कभी पैसे देने की बात मत कीजिएगा। मास्टर जी खुशी-खुशी मान गए और बालक के संघर्ष और स्वाभिमान की मन ही मन सराहना करते हुए अपने घर की ओर निकल पड़े। मास्टर जी आज बहुत प्रसन्न थे क्योंकि पूरे 2 वर्ष बाद आज उन्हें एक नया लक्ष्य जो मिल गया था। *******
- मुल्यांकन
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव एक बार एक शहर के मशहूर व्यापारी को एक महिला ने रात्रि भोज पर निमंत्रित किया। वैसे तो वह काफी व्यस्त रहते थे, लेकिन फिर भी उन्होंने उस महिला का निमंत्रण स्वीकार कर लिया। जिस दिन का निमंत्रण था, उस दिन व्यापारी की व्यस्तता कुछ ज्यादा ही निकल आई। निमंत्रण स्वीकार किया है तो जाना तो था ही, इसलिए वह जल्दी-जल्दी काम खत्म करने लगा। जैसे-तैसे सारा काम निपटा कर वह महिला के घर पहुंचे। उन्हें देखते ही उस महिला की आंखें एकबारगी तो खुशी से चमक उठीं, लेकिन अगले ही क्षण उसके चेहरे पर निराशा के भाव आ गए। दरअसल व्यापारी काम खत्म करके उन्हीं कपड़ों में वहां आ गए था। महिला की मायूसी का कारण पता चलने पर उन्होंने कहा कि 'देर हो जाने की वजह से उन्हें कपड़े बदलने का समय ही नहीं मिला।' लेकिन महिला न मानी। उसने कहा, ‘आप अभी तुरंत मोटरगाड़ी में बैठकर घर जाइए और अच्छे से वस्त्र पहनकर आइए।’ ‘ठीक है, मैं अभी गया और अभी आया।’ यह कहकर व्यापारी घर चला गया । जब लौटकर आये तो उन्होंने बहुत कीमती कपड़े पहने हुए थे। थोड़ी देर बाद अचानक सबने देखा कि व्यापारी आइसक्रीम तथा अन्य खाने की चीजों को अपने कपड़ों पर पोत रहा हैं। यह सब करते हुए व्यापारी बोला ‘खाओ मेरे कपड़ो, खाओ। निमंत्रण तुम्हीं को मिला है। तुम ही खाओ।’ ‘यह आप क्या कर रहे हैं?’* सब बोल पड़े। व्यापारी ने कहा, ‘मैं वही कर रहा हूं मित्रो, जो मुझे करना चाहिए। यहां निमंत्रण मुझे नहीं, मेरे कपड़ों को मिला है। इसलिए आज का खाना तो मेरे कपड़े ही खाएंगे।’ उनके यह कहते ही पार्टी में सन्नाटा छा गया। निमंत्रण देने वाली महिला की भी शर्मिंदगी की कोई सीमा नहीं रही। व्यापारी की बात का आशय वह समझ चुकी थी कि व्यक्ति का मूल्यांकन उसकी प्रतिभा और आचरण से किया जाना चाहिए, कपड़ों से नहीं। *******
- मेरे हमनशीं
संपदा ठाकुर गुज़रे लम्हें याद करे या तुझ को याद करे, ऐ ज़िंदगी तूही बता दे कैसे तुझे शाद करे। तू नसीब बनकर मेरा सर पर चमकता रहे, तु मेरा ज़हां फिर क्यु ना घर आबाद करे। मुक़द्दर से मिला तू ये ज़िस्म ए जाँ वार दू, तेरी बांहो से जुदा कैसे उम्र ए बर्बाद करे। कितने दर्द ए ऊरूग़ो ज़वाल से ग़ुज़री जाँ, कैसे ख़ुशी वास्ते अज़िय्यत ए तादाद करे। ऐ मेरे हमनशीं हमकदम तुझसे मेरा वज़ूद, ये आरज़ू बाहों में श्वासों को आज़ाद करे। खुदाया मेरी अना उनके सरपरस्त रखना, ता उम्र तुझसे वास्ता ये दुआ उम्रे बाद करे। मेरे दस्त ए नक़्श ए हयात को बनाऐ रख ‘संपदा’ क्या-क्या खोया-पाया हिसाब करे। ******
- शिकवा
प्रीती शुक्ला कहा उसने के इश्क है तुमसे... मगर दिल से कहा नहीं। कह रहा था बस दूर से... पास आया तो कुछ कहा नहीं। कहा था उस से कि कहो... राहे सफर में साथ कब तलक, कहा तो ज़िंदगी भर है मगर... मैं ही हूँ ज़िंदगी, ये कहा नहीं। इस दिले दागदार में.... इतनी जगह कहाँ के पालूं इन्हें, मेरी ये हसरतें करेगा पूरी... उसने भी कभी कहा नहीं। तेरे जैसा कोई और नहीं... हो सकता लिख के भेजा है,, मगर उसने आने के लिए.... खत में कुछ भी कहा नहीं। दरबदर होने से पहले सम्हाले जाते... तो बचा लेते वो हमें, सारी दुनिया को किये इशारे.... मगर मुझसे कुछ कहा नही। किसी ने पूछा तो पता प्रीत का.... उसकी गलियों का ही दिया, ले जाएगा मांग सिंदूरी कर..... ये अबतक उसने कहा नहीं। ****
- वरदान
नताशा हर्ष गुरनानी पति देव से लड़ाई हो गई जो आज तक कभी नहीं हुई। मेरे लिए लाल साड़ी लाए थे जो मुझे बिल्कुल भी पसंद नही आई। पहली बार लड़ाई हुई एक नया अनुभव हुआ पर साथ में रोना भी बहुत आया और मन दुखी हुआ सो अलग। रोते-रोते मंदिर में बैठ गई और भगवान से कहा कि भगवान कुछ तो चमत्कार कर दो। अरे ये क्या भगवान सामने प्रगट हो गए और बोले क्या चाहिए बोलो। अब तो मैं डर गई कि भगवान जी मेरे सामने है या मैं उनके पास पहुंच गई। खुद को चुखोटी काटी, अरे नही नहीं मैं तो अभी जिंदा हूं। बोलो तुम्हें क्या वरदान चाहिए। भगवान जी मुझे कोई अनोखा फिल्मी वरदान चाहिए। फिल्मी वरदान, ठीक है दिया, आज के बाद तुम जब-जब लाल साड़ी पहनोगी तब-तब तुम अदृश्य हो जाओगी बिलकुल मिस्टर इंडिया के अनिल कपूर की तरह। भगवान जी उसे तो लाल कांच से देख पाते थे और आप मुझे लाल साड़ी पहना कर गुम कर रहे है। यही तो ट्विस्ट है यहां, अगर तुमने लाल साड़ी पहनी तब ही तुम अदृश्य हो पाओगी वर्ना नही। भगवान जी सुबह पति देव से लड़ाई लाल साड़ी को लेके ही हुई थी। इसलिए तो तुम्हें लाल साड़ी का वरदान दिया है। अब जाओ बाजार और लाओ ढेर सारी लाल साड़ी उन्हे पहनों और अदृश्य होकर जो मन करे वो करो। और भगवान जी गायब। हे भगवान ये कैसा वरदान दे दिया लाल साड़ी ही तो नहीं पहननी थी। अब एक साड़ी रखी है उसे पहनकर बाहर निकली मोहल्ले में किसी ने देखा नही वाह-वाह मैं सही में अदृश्य हो गई। साड़ी की दुकान पर गई वहां जितनी लाल साड़ी थी सब उठा ली और लेके जाने लगी दुकान वाले को लाल साड़ी इधर से उधर घूमते दिख रही थी पर मैं नहीं वाह-वाह ये तो मजा आ गया। घर में लाल साड़ियों का ढेर लग गया। शाम को जब पतिदेव के सामने लाल साड़ी पहन कर आई ताकि वो मुझे देख खुश हो जाए पर ये क्या मैं तो इनको दिख ही नही रही। ये सारे घर में मुझे ढूंढ रहे है और मै इनके सामने इतनी सज धज के खड़ी हूं फिर भी नही दिख रही इनको। हे भगवान ये तो लोचा हो गया। भगवान जी ये नही चलेगा ऐसा ट्विस्ट हटाइए कुछ ऐसा करिए कि अपने पति को लाल साड़ी में दिख जाऊँ। भगवान जी वापस आए और बोले तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता मैँ अपना वरदान वापस लेके जा रहा हूं। अरे अरे सुनिए तो तब तक पतिदेव आ गए और बोले कहा चली गई थी और किसे बुला रही थी मैं तो तुम्हे कब से ढूंढ रहा था। फिर उनकी नजरें जो मुझ पर गई और मुझ पर ही ठहर गई। *******
- स्त्री और पुरुष
प्रेमचंद विपिन बाबू के लिए स्त्री ही संसार की सुन्दर वस्तु थी। वह कवि थे और उनकी कविता के लिए स्त्रियों के रुप और यौवन की प्रशसा ही सबसे चिंताकर्षक विषय था। उनकी दृष्टि में स्त्री जगत में व्याप्त कोमलता, माधुर्य और अलंकारों की सजीव प्रतिमा थी। जबान पर स्त्री का नाम आते ही उनकी आंखे जगमगा उठती थीं, कान खड़ें हो जाते थे, मानो किसी रसिक ने गाने की आवाज सुन ली हो। जब से होश संभाला, तभी से उन्होंने उस सुंदरी की कल्पना करनी शुरु की जो उसके हृदय की रानी होगी; उसमें ऊषा की प्रफुल्लता होगी, पुष्प की कोमलता, कुंदन की चमक, बसंत की छवि, कोयल की ध्वनि—वह कवि वर्णित सभी उपमाओं से विभूषित होगी। वह उस कल्पित मूत्रि के उपासक थे, कविताओं में उसका गुण गाते, वह दिन भी समीप आ गया था, जब उनकी आशाएं हरे-हरे पत्तों से लहरायेंगी, उनकी मुरादें पूरी हो होगी। कालेज की अंतिम परीक्षा समाप्त हो गयी थी और विवाह के संदेशे आने लगे थे। विवाह तय हो गया। बिपिन बाबू ने कन्या को देखने का बहुत आग्रह किया, लेकिन जब उनके मांमू ने विश्वास दिलाया कि लड़की बहुत ही रुपवती है, मैंने अपनी आंखों से देखा है, तब वह राजी हो गये। धूमधाम से बारात निकली और विवाह का मुहूर्त आया। वधू आभूषणों से सजी हुई मंडप में आयी तो विपिन को उसके हाथ-पांव नजर आये। कितनी सुंदर उंगलिया थीं, मानों दीप-शिखाएं हो, अंगो की शोभा कितनी मनोहारिणी थी। विपिन फूले न समाये। दूसरे दिन वधू विदा हुई तो वह उसके दर्शनों के लिए इतने अधीर हुए कि ज्यों ही रास्ते में कहारों ने पालकी रखकर मुंह-हाथ धोना शुरु किया, आप चुपके से वधू के पास जा पहुंचे। वह घूंघट हटाये, पालकी से सिर निकाले बाहर झांक रही थी। विपिन की निगाह उस पर पड़ गयी। यह वह परम सुंदर रमणी न थी जिसकी उन्होने कल्पना की थी, जिसकी वह बरसों से कल्पना कर रहे थे---यह एक चौड़े मुंह, चिपटी नाक, और फुले हुए गालों वाली कुरुपा स्त्री थी। रंग गोरा था, पर उसमें लाली के बदले सफदी थी; और फिर रंग कैसा ही सुंदर हो, रुप की कमी नहीं पूरी कर सकता। विपिन का सारा उत्साह ठंडा पड़ गया---हां! इसे मेरे ही गले पड़ना था। क्या इसके लिए समस्त संसार में और कोई न मिलता था? उन्हें अपने मांमू पर क्रोध आया जिसने वधू की तारीफों के पुल बांध दिये थे। अगर इस वक्त वह मिल जाते तो विपिन उनकी ऐसी खबर लेता कि वह भी याद करते। जब कहारों ने फिर पालकियां उठायीं तो विपिन मन में सोचने लगा, इस स्त्री के साथ कैसे मैं बोलूगा, कैसे इसके साथ जीवन काटंगा। इसकी ओर तो ताकने ही से घृणा होती है। ऐसी कुरुपा स्त्रियां भी संसार में हैं, इसका मुझे अब तक पता न था। क्या मुंह ईश्वर ने बनाया है, क्या आंखे है! मैं और सारे ऐबों की ओर से आंखे बंद कर लेता, लेकिन वह चौड़ा-सा मुंह! भगवान्! क्या तुम्हें मुझी पर यह वज्रपात करना था। विपिन हो अपना जीवन नरक-सा जान पड़ता था। वह अपने मांमू से लड़ा। ससुर को लंबा खर्रा लिखकर फटकारा, मां-बाप से हुज्जत की और जब इससे शांति न हुई तो कहीं भाग जाने की बात सोचने लगा। आशा पर उसे दया अवश्य आती थी। वह अपने का समझाता कि इसमें उस बेचारी का क्या दोष है, उसने जबरदस्ती तो मुझसे विवाह किया नहीं। लेकिन यह दया और यह विचार उस घृणा को न जीत सकता था जो आशा को देखते ही उसके रोम-रोम में व्याप्त हो जाती थी। आशा अपने अच्छे-से-अच्छे कपड़े पहनती; तरह-तरह से बाल संवारती, घंटो आइने के सामने खड़ी होकर अपना श्रृंगार करती, लेकन विपिन को यह शुतुरगमज-से मालूम होते। वह दिल से चाहती थी कि उन्हें प्रसन्न करुं, उनकी सेवा करने के लिए अवसर खोजा करती थी; लेकिन विपिन उससे भागा-भागा फिरता था। अगर कभी भेंट हो जाती तो कुछ ऐसी जली-कटी बातें करने लगता कि आशा रोती हुई वहां से चली जाती। सबसे बुरी बात यह थी कि उसका चरित्र भ्रष्ट होने लगा। वह यह भूल जाने की चेष्टा करने लगा कि मेरा विवाह हो गया है। कई-कई दिनों क आशा को उसके दर्शन भी न होते। वह उसके कहकहे की आवाजे बाहर से आती हुई सुनती, झरोखे से देखती कि वह दोस्तों के गले में हाथ डालें सैर करने जा रहे है और तड़प कर रहे जाती। एक दिन खाना खाते समय उसने कहा—अब तो आपके दर्शन ही नहीं होतें। मेरे कारण घर छोड़ दीजिएगा क्या ? विपिन ने मुंह फेर कर कहा—घर ही पर तो रहता हूं। आजकल जरा नौकरी की तलाश है इसलिए दौड़-धूप ज्यादा करनी पड़ती है। आशा—किसी डाक्टर से मेरी सूरत क्यों नहीं बनवा देते ? सुनती हूं, आजकल सूरत बनाने वाले डाक्टर पैदा हुए है। विपिन— क्यों नाहक चिढ़ती हो, यहां तुम्हे किसने बुलाया था ? आशा— आखिर इस मर्ज की दवा कौन करेंगा ? विपिन— इस मर्ज की दवा नहीं है। जो काम ईश्चर से ने करते बना उसे आदमी क्या बना सकता है? आशा – यह तो तुम्ही सोचो कि ईश्वर की भुल के लिए मुझे दंड दे रहे हो। संसार में कौन ऐसा आदमी है जिसे अच्छी सूरत बुरी लगती हो, किन तुमने किसी मर्द को केवल रुपहीन होने के कारण क्वांरा रहते देखा है, रुपहीन लड़कियां भी मां-बाप के घर नहीं बैठी रहतीं। किसी-न-किसी तरह उनका निर्वाह हो ही जाता है; उसका पति उप पर प्राण ने देता हो, लेकिन दूध की मक्खी नहीं समझता। विपिन ने झुंझला कर कहा—क्यों नाहक सिर खाती हो, मै तुमसे बहस तो नहीं कर रहा हूं। दिल पर जब्र नहीं किया जा सकता और न दलीलों का उस पर कोई असर पड़ सकता है। मैं तुम्हे कुछ कहता तो नहीं हूं, फिर तुम क्यों मुझसे हुज्जत करती हो ? आशा यह झिड़की सुन कर चली गयी। उसे मालूम हो गया कि इन्होने मेरी ओर से सदा के लिए ह्रदय कठोर कर लिया है। विपिन तो रोज सैर-सपाटे करते, कभी-कभी रात को गायब रहते। इधर आशा चिंता और नैराश्य से घुलते-घुलते बीमार पड़ गयी। लेकिन विपिन भूल कर भी उसे देखने न आता, सेवा करना तो दूर रहा। इतना ही नहीं, वह दिल में मानता था कि वह मर जाती तो गला छुटता, अबकी खुब देखभाल कर अपनी पसंद का विवाह करता। अब वह और भी खुल खेला। पहले आशा से कुछ दबता था, कम-से-कम उसे यह धड़का लगा रहता था कि कोई मेरी चाल-ढ़ाल पर निगाह रखने वाला भी है। अब वह धड़का छुट गया। कुवासनाओं में ऐसा लिप्त हो गया कि मरदाने कमरे में ही जमघटे होने लगे। लेकिन विषय-भोग में धन ही का सर्वनाश होता, इससे कहीं अधिक बुद्धि और बल का सर्वनाश होता है। विपिन का चेहरा पीला लगा, देह भी क्षीण होने लगी, पसलियों की हड्डियां निकल आयीं आंखों के इर्द-गिर्द गढ़े पड़ गये। अब वह पहले से कहीं ज्यादा शोक करता, नित्य तेल लगता, बाल बनवाता, कपड़े बदलता, किन्तु मुख पर कांति न थी, रंग-रोगन से क्या हो सकता ? एक दिन आशा बरामदे में चारपाई पर लेटी हुई थी। इधर हफ्तों से उसने विपिन को न देखा था। उन्हे देखने की इच्छा हुई। उसे भय था कि वह सन आयेंगे, फिर भी वह मन को न रोक सकी। विपिन को बुला भेजा। विपिन को भी उस पर कुछ दया आ गयी आ गयी। आकार सामने खड़े हो गये। आशा ने उनके मुंह की ओर देखा तो चौक पड़ी। वह इतने दुर्बल हो गये थे कि पहचनाना मुशिकल था। बोली—तुम भी बीमार हो क्या? तुम तो मुझसे भी ज्यादा घुल गये हो। विपिन—उंह, जिंदगी में रखा ही क्या है जिसके लिए जीने की फिक्र करुं ! आशा—जीने की फिक्र न करने से कोई इतना दुबला नहीं हो जाता। तुम अपनी कोई दवा क्यों नहीं करते? यह कह कर उसने विपिन का दाहिन हाथ पकड़ कर अपनी चारपाई पर बैठा लिया। विपिन ने भी हाथ छुड़ाने की चेष्टा न की। उनके स्वाभाव में इस समय एक विचित्र नम्रता थी, जो आशा ने कभी ने देखी थी। बातों से भी निराशा टपकती थी। अक्खड़पन या क्रोध की गंध भी न थी। आशा का ऐसा मालुम हुआ कि उनकी आंखो में आंसू भरे हुए है। विपिन चारपाई पर बैठते हुए बोले—मेरी दवा अब मौत करेगी। मै तुम्हें जलाने के लिए नहीं कहता। ईश्वर जानता है, मैं तुम्हे चोट नहीं पहुंचाना चाहता। मै अब ज्यादा दिनों तक न जिऊंगा। मुझे किसी भयंकर रोग के लक्षण दिखाई दे रहे है। डाक्टर नें भी वही कहा है। मुझे इसका खेद है कि मेरे हाथों तुम्हे कष्ट पहुंचा पर क्षमा करना। कभी-कभी बैठे-बैठे मेरा दिल डूब दिल डूब जाता है, मूर्छा-सी आ जाती है। यह कहतें-कहते एकाएक वह कांप उठे। सारी देह में सनसनी सी दौड़ गयी। मूर्छित हो कर चारपाई पर गिर पड़े और हाथ-पैर पटकने लगे। मुंह से फिचकुर निकलने लगा। सारी देह पसीने से तर हो गयी। आशा का सारा रोग हवा हो गया। वह महीनों से बिस्तर न छोड़ सकी थी। पर इस समय उसके शिथिल अंगो में विचित्र स्फुर्ति दौड़ गयी। उसने तेजी से उठ कर विपिन को अच्छी तरह लेटा दिया और उनके मुख पर पानी के छींटे देने लगी। महरी भी दौड़ी आयी और पंखा झलने लगी। पर भी विपिन ने आंखें न खोलीं। संध्या होते-होते उनका मुंह टेढ़ा हो गया और बायां अंग शुन्य पड़ गया। हिलाना तो दूर रहा, मूंह से बात निकालना भी मुश्किल हो गया। यह मूर्छा न थी, फालिज था। फालिज के भयंकर रोग में रोगी की सेवा करना आसान काम नहीं है। उस पर आशा महीनों से बीमार थी। लेकिन उस रोग के सामने वह पना रोग भूल गई। 15 दिनों तक विपिन की हालत बहुत नाजुक रही। आशा दिन-के-दिन और रात-की-रात उनके पास बैठी रहती। उनके लिए पथ्य बनाना, उन्हें गोद में सम्भाल कर दवा पिलाना, उनके जरा-जरा से इशारों को समझाना उसी जैसी धैयशाली स्त्री का काम था। अपना सिर दर्द से फटा करता, ज्वर से देह तपा करती, पर इसकी उसे जरा भी परवा न थी। १५ दिनों बाद विपिन की हालत कुछ सम्भली। उनका दाहिना पैर तो लुंज पड़ गया था, पर तोतली भाषा में कुछ बोलने लगे थे। सबसे बुरी गत उनके सुन्दर मुख की हुई थी। वह इतना टेढ़ा हो गया था जैसे कोई रबर के खिलौने को खींच कर बढ़ा दें। बैटरी की मदद से जरा देर के लिए बैठे या खड़े तो हो जाते थे¬; लेकिन चलने−फिरने की ताकत न थी। एक दिनों लेटे−लेटे उन्हे क्या ख्याल आया। आईना उठा कर अपना मुंह देखने लगे। ऐसा कुरुप आदमी उन्होने कभी न देखा था। आहिस्ता से बोले−−आशा, ईश्वर ने मुझे गरुर की सजा दे दी। वास्तव में मुझे यह उसी बुराई का बदला मिला है, जो मैने तुम्हारे साथ की। अब तुम अगर मेरा मुंह देखकर घृणा से मुंह फेर लो तो मुझेसे उस दुर्व्यवहार का बदला लो, जो मैने, तुम्हारे साथ किए है। आशा ने पति की ओर कोमल भाव से देखकर कहा−−मै तो आपको अब भी उसी निगाह से देखती हुं। मुझे तो आप में कोई अन्तर नहीं दिखाई देता। विपिन−−वाह, बन्दर का−सा मुंह हो गया है, तुम कहती हो कि कोई अन्तर ही नहीं। मैं तो अब कभी बाहर न निकलूंगा। ईश्वर ने मुझे सचमुच दंड दिया। बहुत यत्न किए गए पर विपिन का मुंह सीधा न हुआ। मुख्य का बायां भाग इतना टेढ़ा हो गया था कि चेहरा देखकर डर मालूम होता था। हां, पैरों में इतनी शक्ति आ गई कि अब वह चलने−फिरने लगे। आशा ने पति की बीमारी में देवी की मनौती की थी। आज उसी की पुजा का उत्सव था। मुहल्ले की स्त्रियां बनाव−सिंगार किये जमा थीं। गाना−बजाना हो रहा था। एक सेहली ने पुछा−क्यों आशा, अब तो तुम्हें उनका मुंह जरा भी अच्छा न लगता होगा। आशा ने गम्भीर होकर कहा−मुझे तो पहले से कहीं मुंह जरा भी अच्छा न लगता होगा। ‘चलों, बातें बनाती हो।’ ‘नही बहन, सच कहती हुं; रुप के बदले मुझे उनकी आत्मा मिल गई जो रुप से कहीं बढ़कर है।’ विपिन कमरे में बैठे हुए थे। कई मित्र जमा थे। ताश हो रहा था। कमरे में एक खिड़की थी जो आंगन में खुलती थी। इस वक्त वह बन्दव थी। एक मित्र ने उसे चुपके से खोल दिया। एक मित्र ने उसे चुपके दिया और शीशे से झांक कर विपिन से कहा−− आज तो तुम्हारे यहां पारियों का अच्छा जमघट है। विपिन−बन्दा कर दो। ‘अजी जरा देखो तो: कैसी−कैसी सूरतें है! तुम्हे इन सबों में कौन सबसे अच्छी मालूम होती है ? विपिन ने उड़ती हुई नजरों से देखकर कहा−−मुझे तो वहीं सबसे अच्छी मालूम होती है जो थाल में फुल रख रही है। ‘वाह री आपकी निगाह! क्या सूरत के साथ तुम्हारी निगाह भी बिगड़ गई? मुझे तो वह सबसे बदसुरत मालूम होती है।’ ‘इसलिए कि तुम उसकी सूरत देखते हो और मै उसकी आत्मा देखता हूं।’ ‘अच्छा, यही मिसेज विपिन हैं?’ ‘जी हां, यह वही देवी है। *******
- OH! MOTHER EARTH!
Dr. Jahan Singh Jahan You are the most beautiful daughter of universe! As pure as prayer’s sonnet & verse!! Every life blooms in your cradle! Poor in hut & king in castle!! May it be weaver nest Ropeway of spider web Army of penguins Pyramid of termites Cunning monkey or gentle donkey! Polar bear or spring dear!! Wild ostrich or domestic dove! They are your babies of love!! They love you, never hurt you! OH! You are pretty mother! In green clad of forest! Deep blue oceans are your eyes! Valley of flowers in your neck! With crown of Himalayas Rivers are veins & atmosphere in lungs. Life to carry Make us eat, drink & be marry!! OH! Mother looking so cool! Sun, Moon & Stars join your school!! Alas! Mother your thankless child is human! A wisest fool, A wickedest tool! Making you sick, full of tears! Snatching smile and raining fears!! I know mother you pardon all wrongs! Still you sing sweet songs!! OH! Wisest fool it’s your turn! Care your mother and bring smile! She has to walk miles & miles!! OH! Mother earth you are beautiful! BEAUTIFUL & BEAUTIFUL!! *****
- खामोशी दे दी..
नीलम गुप्ता जो लोग मेरे बोलने से बहुत परेशान थे मैने उनको तोहफ़े में ख़ामोशी दे दी किसी बात पर अपनी राय नहीं देती मैने चुप्पी अब अधरों पे धर ली हां, बहुत टोकते थे कहते थे तुम कितना बोलती हो हर जगह ही अपना मुंह खोलती हो हर बात पे खिखिलाती रहती हो कभी चुप क्यों नहीं रह पाती हो मैने भी ख़ामोशी से दोस्ती कर ली हर बात को मानने की हामी भर ली किसी बात पर विरोध जताती नहीं अपनी राय किसी को बताती नहीं उनको अब नई शिकायत हो गई घर में इतनी उदासी क्यों है जी क्या किसी की मौत हो गई मैने भी ख़ामोशी से कह दिया हां, मौत ही तो हो गई मुस्कुराहट की खिलखिलाहट की बेरोक, टोक बोलने की.... अपनी तरह कहने, सुनने की एक इंसान से उसके तरह होने की ये मौत नहीं तो फ़िर और क्या है... *******
- बंधन तोड़ो सुख से जियो
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव एक बार एक व्यक्ति कुछ हालातों से मजबूर अपनी ही धुन में खोया-खोया कहीं चला जा रहा था। दिमाग में हजारों सवाल, तभी उसकी नजर एक विशाल हाथी पर पड़ी, जिसे महावत ने एक पतली रस्सी से बांध रखा था। सारे सवाल किनारे हो गए और अब उसके मन में यह बात चल रही थी कि इतना बड़ा हाथी जो मोटी चेन को भी तोड़ सकता है, उसके लिए ऐसी क्या मुश्किल है जो वह इतनी पतली सी रस्सी के सहारे भी बंधा हुआ खड़ा है। वह रस्सी को तोड़ने का कोई प्रयास नहीं कर रहा है। उत्सुकतावश वह व्यक्ति महावत के पास गया। उस व्यक्ति ने पूछा, यह हाथी अपनी जगह से इधर उधर क्यों नहीं भागता और रस्सी क्यों नहीं तोड़ता है? महावत ने जवाब दिया, जब यह हाथी छोटा था तब भी हम इसी रस्सी से इसे बांधते थे। जब यह छोटा था, तो बार-बार इस रस्सी को तोड़ने की कोशिश करता था पर कभी तोड़ ही नहीं पाया। कारण, तब उसमें इतनी शक्ति नहीं थी। मगर, बार-बार रस्सी तोड़ने की नाकाम कोशिश करने के कारण हाथी को यह विश्वास हो गया कि रस्सी को तोड़ना असंभव है। आज बड़ा हो जाने और काफी शक्तिशाली हो जाने के बाद भी उसके मन में यह बात जम गई है कि वह रस्सी को नहीं तोड़ पाएगा। यही सोचकर वह रस्सी को तोड़ने की अब कोशिश भी नहीं करता है। यह सुनकर वह व्यक्ति दंग रह गया। उस व्यक्ति के दिमाग में जो हजारों सवाल चल रहे थे, उनका जवाब अब उसे मिल चुका था। पुरानी नाकामियों ने उसके भी मन में असफल होने का डर बिठा दिया था। मगर, हाथी की कहानी ने उसके दिमाग के जाले साफ कर दिए थे। उस हाथी की तरह हममें से भी कई लोग ऐसे हैं, जो अपने जिंदगी में कई नाकामियों के बाद हार मानकर बैठ जाते हैं। कोशिश करना छोड़ देते हैं। मगर, सफलता उन्हें ही मिलती है, जो बार-बार प्रयास करते रहते हैं। सार - असफलता जीवन का एक हिस्सा है, और निरंतर प्रयास करने से ही सफलता मिलती है। यदि आप भी ऐसे किसी बंधन में बंधें हैं जो आपको अपने सपने सच करने से रोक रहा है तो उसे तोड़ डालिए। ******











