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मेरे हमनशीं

संपदा ठाकुर


गुज़रे लम्हें याद करे या तुझ को याद करे,

ऐ ज़िंदगी तूही बता दे कैसे तुझे शाद करे।

तू नसीब बनकर मेरा सर पर चमकता रहे,

तु मेरा ज़हां फिर क्यु ना घर आबाद करे।

मुक़द्दर से मिला तू ये ज़िस्म ए जाँ वार दू,

तेरी बांहो से जुदा कैसे उम्र ए बर्बाद करे।

कितने दर्द ए ऊरूग़ो ज़वाल से ग़ुज़री जाँ,

कैसे ख़ुशी वास्ते अज़िय्यत ए तादाद करे।

ऐ मेरे हमनशीं हमकदम तुझसे मेरा वज़ूद,

ये आरज़ू बाहों में श्वासों को आज़ाद करे।

खुदाया मेरी अना उनके सरपरस्त रखना,

ता उम्र तुझसे वास्ता ये दुआ उम्रे बाद करे।

मेरे दस्त ए नक़्श ए हयात को बनाऐ रख

‘संपदा’ क्या-क्या खोया-पाया हिसाब करे।

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