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  • नमन मां शारदे

    मुक्ता शर्मा होंठों पे तबस्सुम है आंखों में शरारे हैं। छू लेना न ग़लती से हम यार अंगारे हैं। अपने ही लहू से तो शादाब हुआ गुलशन। अहसास-ए-निदामत में डूबी ये बहारें हैं। इक बार मुस्कुरा कर कितनी ही दफा रोए। इस तरह जिंदगी के अहसान उतारे हैं। अपनी तो सभी चीजों से हमको मुहब्बत है। कैसे ये भला दे दें ये दर्द ‌हमारे हैं। बेहिस हैं जो दुनिया में कोई बात नहीं उनकी। मरना है उन्हीं का जो अहसास के मारे हैं। मकबूल हुए हैं गर कोई राज़ नहीं इसमें। कागज़ पे फकत दिल के जज़्बात उतारे हैं। तुम साथ हो तो कैसा मझधार का डर हमदम। कश्ती से नहीं अपनी अब दूर किनारे हैं। फरियाद अगर लेकर जाएं तो कहां जाएं। अंधों की निज़ामत में गूंगों की पुकारें हैं। *******

  • नानी का घर

    मुकेश ‘नादान’ नरेंद्र का शरीर इतना हृष्ट-पुष्ट था कि वे सोलह वर्ष की आयु में बीस वर्ष के लगते थे। इसका कारण था नियमित रूप से व्यायाम करना। वे कुश्ती का भी अभ्यास करते थे। शिमला मोहल्ला में कार्नवालिस स्ट्रीट के निकट एक अखाड़ा था, जिनकी स्थापना हिंदू मेले के प्रवर्तक नवगोपाल मित्र ने की थी। वहीं नरेंद्र अपने मित्रों के साथ व्यायाम करते थे। सर्वप्रथम मुक्केबाजी में उन्होंने चाँदी की तिली पुरस्कार के रूप में जीती थी। उस दौर में वे क्रिकेट के भी अच्छे खिलाड़ी थे। इसके अतिरिक्त उन्हें घुड़सवारी का भी शौक था। उनके इस शौक को पूरा करने के लिए विश्वनाथजी ने उन्हें एक घोड़ा खरीदकर दिया था। नरेंद्र की संगीत में विशेष रुचि थी। उनके संगीत शिक्षक उस्ताद बनी और उस्ताद कांसी घोषाल थे। पखावज और तबला बजाना उन्होंने अपने इन्हीं उस्तादों से सीखा। उनमें एक अच्छे वक्ता के गुण भी मौजूद थे। जब मेट्रोपोलिटन इंस्टीट्यूट के एक शिक्षक अवकाश ग्रहण करने वाले थे, तब स्कूल के वार्षिक पुरस्कार वितरण समारोह वाले दिन ही नरेंद्र ने उनके अभिनंदन समारोह का आयोजन किया। उनके सहपाठियों में से किसी में इतना साहस न हुआ कि कोई सभा को संबोधित करता। उस समय नरेंद्र ने आधे घंटे तक अपने शिक्षक के गुणों की व्याख्या की और उनके विछोह से उत्पन्न दुख का भी वर्णन किया। उनकी मधुर व तर्कसंगत वाणी ने सभी को अपने आकर्षण में बाँध लिया था। मैट्रिक पास करने के बाद नरेंद्र ने जनरल असेंबली कॉलेज में प्रवेश लिया और एफ.ए. की पढ़ाई करने लगे। उस समय उनकी आयु अठारह वर्ष थी। उनकी तीत्र बुद्धि तथा आकर्षक व्यक्तित्व ने अन्य छात्रों को ही नहीं, बल्कि अध्यापकों को भी आकर्षित किया। जल्द ही वहाँ उनके कई मित्र बन गए। कॉलेज में उनके विषय में उनके एक मित्र प्रियनाथ सिंह ने अपने संस्मरण में लिखा था- “नरेंद्र छेदो तालाब के निकट जनरल असेंबली कॉलेज में पढ़ते हैं। उन्होंने एफ.ए. वहीं से पास किया। उनमें असंख्य गुण हैं, जिसके कारण कई छात्र उनसे अत्यंत प्रभावित हैं। उनका गाना सुनकर वे आनंदमय हो उठते हैं, इसलिए अवकाश पाते ही नरेंद्र के घर जा पहुँचते हैं। जब नरेंद्र तर्कयुक्ति या गाना-बजाना आरंभ करते, तो समय कैसे बीत जाता है, साथी समझ ही नहीं पाते। इन दिनों नरेंद्र अपनी नानी के घर में रहकर अध्ययन करते हैं। नानी का घर उनके घर की निकटवर्ती गली में है। वह अपने पिता के घर केवल दो बार भोजन करने जाते हैं।” नानी का घर बहुत छोटा था। नरेंद्र ने उसका नाम तंग रखा था। वे अपने मित्रों से कहते थे, “चलो तंग में चलें।” उन्हें एकांतवास बहुत पसंद था। नरेंद्र में गंभीर चिंतन-शक्ति और तीक्ष्ण बुद्धि थी, जिसके बल पर वह सभी विषय बहुत थोड़े समय में सीख लेते थे। उनके लिए पाठ्य” पुस्तकें परीक्षा पास करने का साधन मात्र थीं। वह इतिहास, साहित्य और दर्शन की अधिकांश पुस्तकें पढ़ चुके थे, जिनसे उन्होंने अपने हृदय में ज्ञान का अपार भंडार संगृहीत कर लिया था। *******

  • गधा रहा गधा ही

    अनजान एक जंगल में एक शेर रहता था। गीदड़ उसका सेवक था। जोड़ी अच्छी थी। शेरों के समाज में तो उस शेर की कोई इज्जत नहीं थी, क्योंकि वह जवानी में सभी दूसरे शेरों से युद्ध हार चुका था, इसलिए वह अलग-थलग रहता था। उसे गीदड़ जैसे चमचे की सख्त जरूरत थी जो चौबीस घंटे उसकी चमचागिरी करता रहे। गीदड़ को बस खाने का जुगाड़ चाहिए था। पेट भर जाने पर गीदड़ उस शेर की वीरता के ऐसे गुण गाता कि शेर का सीना फुलकर दुगना चौड़ा हो जाता। एक दिन शेर ने एक बिगड़ैल जंगली सांड का शिकार करने का साहस कर डाला। सांड बहुत शक्तिशाली था। उसने लात मारकर शेर को दूर फेंक दिया, जब वह उठने को हुआ तो सांड ने फां-फां करते हुए शेर को सींगों से एक पेड़ के साथ रगड़ दिया। किसी तरह शेर जान बचाकर भागा। शेर सींगों की मार से काफी जख्मी हो गया था। कई दिन बीते, परंतु शेर के जख्म ठीक होने का नाम नहीं ले रहे थे। ऐसी हालत में वह शिकार नहीं कर सकता था। स्वयं शिकार करना गीदड़ के बस की बात नहीं थी। दोनों के भूखो मरने की नौबत आ गई। शेर को यह भी भय था कि खाने का जुगाड़ समाप्त होने के कारण गीदड़ उसका साथ न छोड़ जाए। शेर ने एक दिन उसे सुझाया, 'देख, जख्मों के कारण मैं दौड़ नहीं सकता। शिकार कैसे करूं? तु जाकर किसी बेवकूफ-से जानवर को बातों में फंसाकर यहां ला। मैं उस झाड़ी में छिपा रहूंगा। गीदड़ को भी शेर की बात जंच गई। वह किसी मूर्ख जानवर की तलाश में घूमता-घूमता एक कस्बे के बाहर नदी-घाट पर पहुंचा। वहां उसे एक मरियल-सा गधा घास पर मुंह मारता नजर आया। वह शक्ल से ही बेवकूफ लग रहा था। गीदड़ गधे के निकट जाकर बोला 'पांय लागूं चाचा। बहुत कमजोर हो आए हो, क्या बात है?' गधे ने अपना दुखड़ा रोया, 'क्या बताऊं भाई, जिस धोबी का मैं गधा हूं, वह बहुत क्रूर है। दिनभर ढुलाई करवाता है और चारा कुछ देता नहीं।' गीदड़ ने उसे न्‍यौता दिया- 'चाचा, मेरे साथ जंगल चलो, वहां बहुत हरी-हरी घास है। खूब चरना तुम्हारी सेहत बन जाएगी।' गधे ने कान फड़फड़ाए- 'राम-राम। मैं जंगल में कैसे रहूंगा? जंगली जानवर मुझे खा जाएंगे।' 'चाचा, तुम्हें शायद पता नहीं कि जंगल में एक बगुला भगतजी का सत्संग हुआ था। उसके बाद सारे जानवर शाकाहारी बन गए हैं। गीदड़ बोला- अब कोई किसी को नहीं खाता और कान के पास मुंह ले जाकर दाना फेंका, 'चाचू, पास के कस्बे से बेचारी गधी भी अपने धोबी मालिक के अत्याचारों से तंग आकर जंगल में आ गई थी। वहां हरी-हरी घास खाकर वह खूब लहरा गई है, तुम उसके साथ घर बसा लेना।' गधे के दिमाग पर हरी-हरी घास और घर बसाने के सुनहरे सपने छाने लगे। वह गीदड़ के साथ जंगल की ओर चल दिया। जंगल में गीदड़ गधे को उसी झाड़ी के पास ले गया, जिसमें शेर छिपा बैठा था। इससे पहले कि शेर पंजा मारता, गधे को झाड़ी में शेर की नीली बत्तियों की तरह चमकती आंखें नजर आ गईं। वह डरकर उछला, गधा भागा और भागता ही गया। शेर बुझे स्वर में गीदड़ से बोला- 'भाई, इस बार मैं तैयार नहीं था। तुम उसे दोबारा लाओ इस बार गलती नहीं होगी।' गीदड़ दोबारा उस गधे की तलाश में कस्बे में पहुंचा। उसे देखते ही बोला- 'चाचा, तुमने तो मेरी नाक कटवा दी। तुम अपनी दुल्हन से डरकर भाग गए?' 'उस झाड़ी में मुझे दो चमकती आंखें दिखाई दी थीं, जैसी शेर की होती हैं। मैं भागता नहीं तो क्या करता?' गधे ने शिकायत की। गीदड़ नाटक करते हुए माथा पीटकर बोला- 'चाचा ओ चाचा! तुम भी पूरे मूर्ख हो। उस झाड़ी में तुम्हारी दुल्हन थी। जाने कितने जन्मों से वह तुम्हारी राह देख रही थी। तुम्हें देखकर उसकी आंखें चमक उठीं तो तुमने उसे शेर समझ लिया?' गधा बहुत लज्जित हुआ-क्योंकि गीदड़ की चालभरी बातें ही ऐसी थीं। गधा फिर उसके साथ चल पड़ा। जंगल में झाड़ी के पास पहुंचते ही शेर ने नुकीले पंजों से उसे मार गिराया। इस प्रकार शेर व गीदड़ का भोजन जुटा। शिक्षा : दूसरों की चिकनी-चुपड़ी बातों में आने की मूर्खता कभी नहीं करनी चाहिए। ******

  • व्यस्त रहो, मस्त रहो।

    डॉ. कृष्ण कांत श्रीवास्तव दरवाजा बंद करके वर्मा जी भी सोफे पर आकर धम्म से बैठ गए। शांता जी की आंखों से भी आंसू तो बह रहे थे। शांता जी ने एक नजर पूरे घर की ओर डाली, सारा घर अस्त-व्यस्त हो रहा था। रसोई में लड्डुओं का डब्बा जस का तस रखा था। रात भर जागकर शांता जी ने बड़े मन से देसी घी के लड्डू बनाए थे। शांता जी के बेटा, बहू दुबई में रहते थे। उनके दोनों जुड़वां पोते आठवीं क्लास में पढ़ते थे। जब से उन्होंने अपने घर आने की सूचना दी तो शांता जी की खुशी का कोई ठिकाना न था। बच्चे आखिर 4 साल बाद 20 दिन के लिए दिल्ली आ रहे थे। शांता जी की बेटी भी पूना में रहती थी। भाई-भाभी के आने की सूचना पाकर बेटी माधवी ने भी शनिवार इतवार को दिल्ली आकर भाई भाभी से मिलने का प्रोग्राम बनाया। माधवी की शादी पर 4 साल पहले ही बिट्टू घर आया था। वर्मा जी की घर से थोड़ी ही दूर पर किराने की दुकान थी। वह तो दुकान पर व्यस्त रहते थे लेकिन शांता जी बच्चों को बहुत मिस करती थी। बच्चों के आने पर शांता जी बहुत खुश हुई। 4 साल में बच्चे कितने बड़े हो गए थे। लेकिन वह अब उनसे बहुत ज्यादा बात नहीं कर रहे थे और सिर्फ अपने मोबाइलों में ही व्यस्त थे। बहुरानी भी दुबई से शांता जी के लिए एक सोने की चेन लाई थी। बच्चों को एक बार फिर घर में देखकर मानो घर फिर से सजीव हो उठा था। शांता जी ने बच्चों की पसंद का खाने का बहुत सारा सामान बना रखा था लेकिन किसी ने भी ज्यादा कुछ नहीं खाया। बहुरानी ने बताया कि उसके मायके में उसके चाचा की बेटी की शादी में उन्हें शामिल होना है इसलिए दूसरे ही दिन उन्होंने आगरा के लिए कैब बुला रखी थी। यह बात आने से पहले तो उन्होंने शांता जी को नहीं बताई थी। शांता जी के पास बहुत सी बातें थी जो कि वह बच्चों से करना चाहती थी लेकिन सब बच्चे अभी अपने कमरे में ही व्यस्त थे। कमरे से बाहर निकले तो बिट्टू ने पापा से गाड़ी की चाबी मांगी क्योंकि उन्होंने आगरा जाने के लिए मार्केट से शायद कुछ सामान लेना था। कमरे से बाहर निकले तो बिट्टू और बहु रानी दोनों ही मार्केट चले गए और रात देर तक ही आए। रघु और राघव अब भी मोबाइल के गेम में ही व्यस्त थे। शाम को अपने खाने के लिए उन्होंने डोमिनोज़ से पीज़ा मंगवा लिया था। बिट्टू भी बाहर से ही खाना खाकर आया था। रात को शांता जी ने सारा खाना वैसे ही फ्रिज में रख दिया‌। दूसरे दिन वे चारों आगरा के लिए रवाना हो गए थे। बहुरानी ने जाते हुए कहा कि वह अपने मायके मैं 1 सप्ताह रहेंगी। दूसरे दिन शनिवार को उनकी बेटी माधवी अपने पति के साथ पुणे से आई थी लेकिन बिट्टू ने तो अभी 6 दिन बाद आना था। बिट्टू की अनुपस्थिति में माधवी को भी अच्छा नहीं लग रहा था क्योंकि वह भी बिट्टू और भाभी से ही मिलने आई थी। उसका ख्याल था मां से तो वह कभी भी मिल सकती थी। पुणे से दिल्ली कोई ज्यादा दूर थोड़ी ना है हालांकि उसे दिल्ली आए हुए कितना समय हो गया था यह शांता जी ही समझ सकती है। माधवी के चेहरे से यह स्पष्ट हो रहा था कि उसका यहां आना व्यर्थ ही रहा। शांता जी माधवी से बोली "बिट्टू नहीं है तो क्या तू मुझसे मिलने नहीं आ सकती?" " मां हमारी नौकरी में बहुत व्यस्त शेड्यूल है।" कुछ समय बाद माधवी और दामाद जी भी कैब ले कर शायद किसी माल में घूमने के लिए चले गए। शांता जी ने बच्चों के खाने के लिए बहुत सा सामान बनाया हुआ था लेकिन कोई कुछ खाना ही नहीं चाहता था। शांता जी ने बेहद निराश होकर वर्मा जी से पूछा सब व्यस्त हैं तो क्या मैं खाली हूं? रात को बहुत देर तक माधुरी और शांता जी बात तो करते रहे लेकिन बच्चों से मिलने के लिए उन्होंने जैसे सपने सजाए थे वह सब चूर-चूर से हो रहे थे। अगले दिन रात को माथवी पुनः वापस अपने घर चली गई। कुछ दिन बाद जब बिट्टू आया तो शांता जी को महसूस हो रहा था जैसे कोई अनजाना परिवार घर में आ गया हो। वह लोग अपनी और बच्चों के लिए पानी की बोतलें भी अलग ही लाए थे। बच्चे मोबाइलों में व्यस्त थे। बिट्टू और बहुरानी भी काफी समय तक तो वह अपनी खरीदारी और दोस्तों से मिलने जुलने में ही व्यस्त रहे। बाकि के दिन भी पंख लगा कर यूं ही उड़ गए और बिट्टू के वापिस जाने का समय आ गया। शांता जी ने जब बिट्टू को उसकी पसंद के लड्डू बनाकर उसे अपने साथ दुबई में ले जाने का अनुरोध किया तो बिट्टू ने बताया कि पहले ही सामान बहुत ज्यादा हो गया है और अब वह लड्डू खाता भी नहीं है। शांता जी चुप थी। उनका सारा घर यूं ही फैला छोड़कर बच्चे जा चुके थे। वर्मा जी शांता जी को उदास देख कर बोले "हम दोनों को तो शुगर है, तुम घर में कीर्तन करवा लेना और सबको प्रसाद के रूप में यह लड्डू वितरण कर देना। शांता परेशान मत हो! बच्चे व्यस्त हैं और अपना परिवार सही से चला रहे हैं हम दोनों के लिए तो इतना ही बहुत है हमने अपनी जिम्मेदारियों को पूरा कर दिया।" "लेकिन वर्मा जी हम कोई पंछी तो नहीं जो बच्चे बड़े होते ही उड़ जाए" ,शांता जी बोली। "ऐसा कुछ नहीं है, तब अच्छा होता क्या जब हमारे बच्चे निकम्मे होकर हमारे साथ रहते होते?” तुम्हारी समस्या यह है कि तुम खाली ज्यादा हो। कल से तुम भी मेरे साथ दुकान पर आकर बैठ जाओ। मैं जल्दी ही दुकान में थोड़ी सी जगह बनाकर एक लेडीज कॉर्नर भी बना दूंगा। इस नकारात्मक सोच में कुछ नहीं रखा व्यस्त रहो और मस्त रहो। भविष्य की तैयारी करनी है तो जितना हो सके तुम औरों के काम आओ ताकि किसी समय और लोग भी तुम्हारे काम आ सके।" तभी एअरपोर्ट से बच्चों की वीडियो काल आई। सब बातें करने लगे। पाठकगण जिंदगी अपनी गति से चल रही है। जिंदगी के हर पल को जी कर खुद को व्यस्त और स्वस्थ रखना ही जरुरी है। ********

  • माई नेम इज स्मार्टफोन

    डॉ. जहान सिंह 'जहान' अब इसी का नाम है ज़िन्दगी। हर सुबह फोन पर दुआ-सलाम, बन्दगी। रात झूठ, छल, कपट मानसिक गन्दगी। पहले हम मोबाइल रखते थे। अब हम को मोबाइल रखता है।। हसांता वो, रुलाता वो जगाता वो, सुलाता वो। कुपोषित ज्ञान का दल दल है वो। दिन-रात की हल-चल है वो। घर बालों को बेघर कराता है वो। रिचार्ज हो या डिस्चार्ज हो तब घर बालों से संबाद करवाता है वो। अनपढ से लेकर पढे लिखो को किनारे लगाता है वो। गलती से नींद भी आजाये अगर तो एक खटक से जगाता है वो। बनके मालिक सबको अपने पीछे दौड़ता है वो। उंगली आपकी पर अपनी उंगलियों पर नचाता है वो। करदी जिन्दगी जिस के हवाले 'जहान' माई नेम इज स्मार्टफोन कहलाता है वो।। ******

  • स्त्री

    वंदना सक्सेना स्त्री केवल तन ही नहीं मन भी है पाकीज़गी है निर्मलता है जो समा लेती है सैकड़ों यातनाएं मन के अंदर जो तू देता है कभी सोचा वो देह से परे भी बहुत कुछ है अनन्त सम्भावनायें लिए वो तुम्हारे साथ कदम से कदम मिलाकर चलती है रंग जाती है उसी रंग में जिसमें तुम उसे देखना चाहते हो कभी माँ, कभी बहन कभी प्रेयसी तो कभी पत्नी बनकर गंगा की तरह तुम्हारे सब पाप खुद में समा लेती है तपती है सूरज की तरह तुम्हारे जीवन को प्रकाशमय करने के लिए तुम समुद्र भले सही पर खारे हो वो बहती है तुममें नदी की अविरल धारा की तरह तुममें आकर तुम्हारी हो जाती है चाहती कुछ नहीं बस हर रिश्ते में ईमानदार रहना और तुमसे भी वफ़ादारी चाहती है वज़ूद-ए-औरत तुम क्या समझोगे! शुष्क आँखों को भी उसके लिए पिघलना होगा उसकी तरह रात दिन जलना होगा तबस्सुम होठों पे लिए वो कैसे खपती है ये समझने के लिए तुम्हे मानवीयता से गुजरना होगा स्त्री बहुत कुछ है तन के सिवा हाँ तुम्हे ये समझना होगा। *****

  • खुशनुमा लम्हें

    जयकिशन गोयल अब लोग बुढ़ापा एंजॉय करने लगे, खुलकर जीने और हंसने लगे, खुद को पोते पोतियों में नहीं उलझाते, अपने जैसे दोस्तों संग ये वक्त बिताते। कोई लाचारी बेबसी अब नहीं दिखती, इनकी जिंदगी इनकी शर्तों पर गुज़रती, कभी ये गाने गाते, कभी ठुमके लगाते, अपनी कहानी सुनाते, खुलकर मुस्कुराते। इनकी किट्टीयां होती, जन्मदिन मनाते, अपनी पेंशन खुद पर ही ये लूटाते, ना ताना मारते, ना बहुओं की सुनते, अपने अधूरे सपने इस उम्र में बुनते। फेस बुक यू ट्यूब के ये दीवाने होते, इनके भी किस्से फंसाने होते, इनको भी दोस्तों का इंतजार होता, पार्क में रोज़ जमघट यार होता। अब के बुजुर्ग समझने लगे, जिंदगी के बचे लम्हें जीने लगे, समझ गए साथ कुछ नहीं जाने वाला, तो खुशनुमा लम्हें ये सहेजने लगे। ******

  • एक लड़की का परिवार

    डॉ. कृष्ण कांत श्रीवास्तव नलिनी के घर पर आज काफी मेहमान आए हुए थे। चूंकि उनके शहर में उनके किसी रिश्तेदार के यहां कार्यक्रम था। तो उसकी दो मासी और मामाजी कार्यक्रम में सम्मिलित होने आए थे। इसलिए सभी उनकी आवभगत में लगे हुए थे। एक हफ्ते बाद नलिनी के ममेरे भाई के बेटे का पहला जन्मदिन भी था। इसलिए मामाजी को कुछ खरीददारी भी करनी थी। इसलिए कार्यक्रम में सम्मिलित होने के बाद वे बाज़ार के लिए निकल गए। और दोनों मासी और नलिनी की मां आपस में बातें करने में व्यस्त हो गए। कुछ वक़्त बाद ही छोटी मासी की ट्रेन थी। और उनके निकलने का वक़्त हो गया था। तो वे सभी से विदा लेकर निकल गई। बड़ी मासी, मामाजी के साथ उनके घर ही जाने वाली थी। ताकि कुछ वक़्त वो नानीजी और बाकी सबके साथ रह सके। और फिर जन्मदिन में सम्मिलित होकर लौट आए। तभी मामाजी हाथों में सामान लिए घर में प्रवेश करते हैं। कुछ देर बाद उनकी भी ट्रेन का वक़्त होने वाला था। उन्होंने अंदर प्रवेश करते ही मासी से कहा - जीजी, उठो। गाड़ी का टाइम होने वाला है। इतने में नलिनी उनके लिए पानी ले आई। मामाजी और मासी स्टेशन के लिए घर से निकल पड़े। चूंकि मामाजी के पास सामान ज्यादा था। तो उन्होंने दो रिक्शा कर लिए। एक रिक्शा में मामाजी सारे सामान के साथ बैठ गए। और दूसरे रिक्शा में मासी और उनका सामान रखवा दिया। नलिनी मासी का कुछ सामान लिए उन्हें रिक्शा तक छोड़ने गई थी। रिक्शा से उतरते वक्त उसने मासी के पैर छुए। तो मासी ने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा - चल मेरे साथ। थोड़े दिन वहां रहना और फिर जन्मदिन के बाद वापस आ जाना। तो नलिनी ने यूं ही कह दिया - "मासी, मैं सहपरिवार आऊंगी।" तब मासी ने कहा - "सहपरिवार, तेरा कौन सा परिवार?" ये बात सुनकर नलिनी के चेहरे के भाव ही बदल गए। आंखो में नमी आ गई। पर जैसे-तैसे उसने अपने आंसू छुपा लिए। दरअसल नलिनी की शादी नहीं हुई थी। लाख कोशिशों के बाद भी उसका रिश्ता अभी पक्का नहीं हुआ था। पर इसका मतलब ये तो नहीं है कि उसका कोई परिवार नहीं है। अगर लड़की की शादी ना हो तो क्या उसका कोई परिवार नहीं होता। क्या उसके मां-बाप उसका परिवार नहीं हैं? उसके मन में कभी इस बात का मलाल नहीं हुआ था कि उसका रिश्ता नहीं हो पा रहा हैं या कभी होगा भी या नहीं। पर अपने ही रिश्तेदार और समाज के लोग उसे इस बात का एहसास कराने से नहीं चूकते। वो चाहती तो मासी की उस बात का जवाब दे सकती थी। पर उसके संस्कारों ने उसे किसी बड़े को उल्टा जवाब देने से रोक दिया। और वो बिना कुछ कहे घर वापस लौट आई। ******

  • सच्चा हमसफ़र

    डॉ कृष्ण कांत श्रीवास्तव ट्रेन के ए.सी. कम्पार्टमेंट में मेरे सामने की सीट पर बैठी लड़की ने मुझसे पूछा "हैलो, क्या आपके पास इस मोबाइल की सिम निकालने की पिन है?" उसने अपने बैग से एक फोन निकाला, वह नया सिम कार्ड उसमें डालना चाहती थी। लेकिन सिम स्लॉट खोलने के लिए पिन की जरूरत पड़ती है, जो उसके पास नहीं थी। मैंने हाँ में गर्दन हिलाई और अपने क्रॉस बैग से पिन निकालकर लड़की को दे दी। लड़की ने थैंक्स कहते हुए पिन ले ली और सिम डालकर पिन मुझे वापिस कर दी। थोड़ी देर बाद वो फिर से इधर उधर ताकने लगी, मुझसे रहा नहीं गया.. मैंने पूछ लिया "कोई परेशानी?" वो बोली सिम स्टार्ट नहीं हो रही है, मैंने मोबाइल मांगा, उसने दिया। मैंने उसे कहा कि सिम अभी एक्टिवेट नहीं हुई है, थोड़ी देर में हो जाएगी। एक्टिव होने के बाद आईडी वेरिफिकेशन होगा, उसके बाद आप इसे इस्तेमाल कर सकेंगी। लड़की ने पूछा, आईडी वेरिफिकेशन क्यों? मैंने कहा " आजकल सिम वेरिफिकेशन के बाद एक्टिव होती है, जिस नाम से ये सिम उठाई गई है, उसका ब्यौरा पूछा जाएगा बता देना" लड़की बुदबुदाई "ओह्ह " मैंने दिलासा देते हुए कहा "इसमें कोई परेशानी की कोई बात नहीं" वो अपने एक हाथ से दूसरा हाथ दबाती रही, मानो किसी परेशानी में हो। मैंने फिर विन्रमता से कहा "आपको कहीं कॉल करना हो तो मेरा मोबाइल इस्तेमाल कर लीजिए" लड़की ने कहा "जी फिलहाल नहीं, थैंक्स, लेकिन ये सिम किस नाम से खरीदी गई है मुझे नहीं पता" मैंने कहा "एक बार एक्टिव होने दीजिए, जिसने आपको सिम दी है उसी के नाम की होगी" उसने कहा "ओके, कोशिश करते हैं" मैंने पूछा "आपका स्टेशन कहाँ है??" लड़की ने कहा "दिल्ली" और आप? लड़की ने मुझसे पूछा मैंने कहा "दिल्ली ही जा रहा हूँ, एक दिन का काम है, आप दिल्ली में रहती हैं या...?" लड़की बोली "नहीं नहीं, दिल्ली में कोई काम नहीं, ना ही मेरा घर है वहाँ" तो? मैंने उत्सुकता वश पूछा। वो बोली "दरअसल ये दूसरी ट्रेन है, जिसमें आज मैं हूँ, और दिल्ली से तीसरी गाड़ी पकड़नी है, फिर हमेशा के लिए आज़ाद" आज़ाद? लेकिन किस तरह की कैद से? मुझे फिर जिज्ञासा हुई किस कैद में थी ये कमसिन अल्हड़ सी लड़की.. लड़की बोली, उसी कैद में थी, जिसमें हर लड़की होती है। जहाँ घरवाले कहे शादी कर लो, जब जैसा कहे, वैसा करो। मैं घर से भाग चुकी हूं.. मुझे ताज्जुब हुआ, मगर अपने ताज्जुब को छुपाते हुए मैंने हंसते हुए पूछा "अकेली भाग रही हैं आप? आपके साथ कोई नजर नहीं आ रहा? " वो बोली "अकेली नहीं, साथ में है कोई।" कौन? मेरे प्रश्न खत्म नहीं हो रहे थे। दिल्ली से एक और ट्रेन पकड़ूँगी, फिर अगले स्टेशन पर वो जनाब मिलेंगे, और उसके बाद हम किसी को नहीं मिलेंगे.. ओह्ह, तो ये प्यार का मामला है। उसने कहा "जी" मैंने उसे बताया कि 'मैंने भी लव मैरिज की है।' ये बात सुनकर वो खुश हुई, बोली "वाओ, कैसे कब?" लव मैरिज की बात सुनकर वो मुझसे बात करने में रुचि लेने लगी। मैंने कहा "कब कैसे कहाँ? वो मैं बाद में बताऊंगा, पहले आप बताओ आपके घर में कौन कौन है? उसने होशियारी बरतते हुए कहा "वो मैं आपको क्यों बताऊं? मेरे घर में कोई भी हो सकता है, मेरे पापा माँ भाई बहन, या हो सकता है भाई ना हो सिर्फ बहनें हो, या ये भी हो सकता है कि बहने ना हो और 2-4 गुस्सा करने वाले बड़े भाई हो।" मतलब मैं आपका नाम भी नहीं पूछ सकता "मैंने काउंटर मारा" वो बोली, 'कुछ भी नाम हो सकता है मेरा, टीना, मीना, रीना, कुछ भी' बहुत बातूनी लड़की थी वो.. थोड़ी इधर-उधर की बातें करने के बाद उसने मुझे टॉफी दी जैसे छोटे बच्चे देते हैं क्लास में, बोली आज मेरा बर्थडे है। मैंने उसकी हथेली से टॉफी उठाते बधाई दी और पूछा "कितने साल की हुई हो?" वो बोली "18" "मतलब भागकर शादी करने की कानूनी उम्र हो गई आपकी।" वो "हंसी" कुछ ही देर में काफी फ्रैंक हो चुके थे हम दोनों, जैसे बहुत पहले से जानते हो एक दूसरे को.. मैंने उसे बताया कि "मेरी उम्र 35 साल है, यानि 17 साल बड़ा हूं।" उसने चुटकी लेते हुए कहा "लग तो नहीं रहे हो।" मैं मुस्कुरा दिया। मैंने उससे पूछा "तुम घर से भागकर आई हो, तुम्हारे चेहरे पर चिंता के निशान जरा भी नहीं है, इतनी बेफिक्री मैंने पहली बार देखी।" खुद की तारीफ सूनकर वो खुश हुई, बोली "मुझे उन जनाब ने, मेरे लवर ने पहले से ही समझा दिया था कि जब घर से निकलो तो बिल्कुल बिंदास रहना, घरवालों के बारे में बिल्कुल मत सोचना, बिल्कुल अपना मूड खराब मत करना, सिर्फ मेरे और हम दोनों के बारे में सोचना और मैं वही कर रही हूँ।" मैंने फिर चुटकी ली, कहा "उसने तुम्हें मुझ जैसे अनजान मुसाफिरों से दूर रहने की सलाह नहीं दी?" उसने हंसकर जवाब दिया "नहीं, शायद वो भूल गया होगा ये बताना।" मैंने उसके प्रेमी की तारीफ करते हुए कहा "वैसे तुम्हारा बॉय फ्रेंड काफी टैलेंटेड है, उसने किस तरह से तुम्हे अकेले घर से रवाना किया, नई सिम और मोबाइल दिया, तीन ट्रेन बदलवाई.. ताकि कोई ट्रेक ना कर सके, वेरी टैलेंटेड पर्सन।" लड़की ने हामी भरी, "बोली बहुत टैलेंटेड है वो, उसके जैसा कोई नहीं।" मैंने उसे बताया कि "मेरी शादी को 10 साल हुए हैं, एक बेटी है 8 साल की और एक बेटा 1 साल का, ये देखो उनकी तस्वीर।" मेरे फोन पर बच्चों की तस्वीर देखकर उसके मुंह से निकल गया "सो क्यूट" मैंने उसे बताया कि "ये जब पैदा हुई, तब मैं कुवैत में था, एक पेट्रो कम्पनी में बहुत अच्छी जॉब थी मेरी, बहुत अच्छी सेलेरी थी.. फिर कुछ महीनों बाद मैंने वो जॉब छोड़ दी, और अपने ही कस्बे में काम करने लगा।" लड़की ने पूछा जॉब क्यों छोड़ी?? मैंने कहा "बच्ची को पहली बार गोद में उठाया तो ऐसा लगा जैसे मेरी दुनिया मेरे हाथों में है, 30 दिन की छुट्टी पर घर आया था, वापस जाना था, लेकिन जा ना सका। इधर बच्ची का बचपन खर्च होता रहे उधर मैं पूरी दुनिया कमा लूं, तब भी घाटे का सौदा है। मेरी दो टके की नौकरी, बचपन उसका लाखों का.." उसने पूछा "क्या बीवी बच्चों को साथ नहीं ले जा सकते थे वहाँ?" मैंने कहा "काफी टेक्निकल मामलों से गुजरकर एक लंबे समय के बाद रख सकते हैं, उस वक्त ये मुमकिन नहीं था.. मुझे दोनों में से एक को चुनना था, आलीशान रहन-सहन के साथ नौकरी या परिवार.. मैंने परिवार चुना अपनी बेटी को बड़ा होते देखने के लिए। मैं कुवैत वापस गया था, लेकिन अपना इस्तीफा देकर लौट आया।" लड़की ने कहा "वेरी इम्प्रेसिव" मैं मुस्कुराकर खिड़की की तरफ देखने लगा। लड़की ने पूछा "अच्छा आपने तो लव मैरिज की थी न, फिर आप भागकर कहाँ गए? कैसे रहे और कैसे गुजरा वो वक्त? उसके हर सवाल और हर बात में मुझे महसूस हो रहा था कि ये लड़की लकड़पन के शिखर पर है, बिल्कुल नासमझ और मासूम छोटी बहन सी। मैंने उसे बताया कि हमने भागकर शादी नहीं की, और ये भी है कि उसके पापा ने मुझे पहली नजर में सख्ती से रिजेक्ट कर दिया था।" उन्होंने आपको रिजेक्ट क्यों किया? लड़की ने पूछा। मैंने कहा "रिजेक्ट करने का कुछ भी कारण हो सकता है, मेरी जाति, मेरा काम, घर परिवार, "बिल्कुल सही", लड़की ने सहमति दर्ज कराई और आगे पूछा "फिर आपने क्या किया?" मैंने कहा "मैंने कुछ नहीं किया, उसके पिता ने रिजेक्ट कर दिया वहीं से मैंने अपने बारे में अलग से सोचना शुरू कर दिया था। खुशबू ने मुझे कहा कि भाग चलते हैं, मेरी वाइफ का नाम खुशबू है..मैंने दो टूक मना कर दिया। वो दो दिन तक लगातार जोर देती रही, कि भाग चलते हैं। मैं मना करता रहा.. मैंने उसे समझाया कि "भागने वाले जोड़े में लड़के की इज़्ज़त पर कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता, जबकि लड़की के पूरे कुल की इज्ज़त धुल जाती है। भगाने वाला लड़का उसके दोस्तों में हीरो माना जाता है, लेकिन इसके विपरीत जो लड़की प्रेमी संग भाग रही है, वो कुल्टा कहलाती है, मुहल्ले के लड़के उसे चालू कहते है। बुराइयों के तमाम शब्दकोष लड़की के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं। भागने वाली लड़की आगे चलकर 60 साल की वृद्धा भी हो जाएगी तब भी जवानी में किये उस कांड का कलंक उसके माथे पर से नहीं मिटता। मैं मानता हूँ कि लड़का-लड़की को तौलने का ये दोहरा मापदंड गलत है, लेकिन हमारे समाज में है तो यही, ये नजरिया गलत है, मगर सामाजिक नजरिया यही है।, वो अपने नीचे का होंठ दांतों तले पीसने लगी, उसने पानी की बोतल का ढक्कन खोलकर एक घूंट पिया। मैंने कहा अगर मैं उस दिन उसे भगा ले जाता तो उसकी माँ तो शायद कई दिनों तक पानी भी ना पीती, इसलिए मेरी हिम्मत ना हुई कि ऐसा काम करूँ.. मैं जिससे प्रेम करूँ, उसके माँ बाप मेरे माँ बाप के समान ही है, चाहे शादी ना हो, तो ना हो। कुछ पल के लिए वो सोच में पड़ गई, लेकिन मेरे बारे में और अधिक जानना चाहती थी, उसने पूछा "फिर आपकी शादी कैसे हुई? मैंने बताया कि "खुशबू की सगाई कहीं और कर दी गई थी। धीरे-धीरे सबकुछ नॉर्मल होने लगा था। खुशबू और उसके मंगेतर की बातें भी होने लगी थी फोन पर, लेकिन जैसे-जैसे शादी नजदीक आने लगी, उन लोगों की डिमांड बढ़ने लगी।" डिमांड मतलब 'लड़की ने पूछा' डिमांड का एक ही मतलब होता है, दहेज की डिमांड। परिवार में सबको सोने से बने तोहफे दो, दूल्हे को लग्जरी कार चाहिए, सास और ननद को नेकलेस दो वगैरह-वगैरह, बोले हमारे यहाँ रीत है। लड़का भी इस रीत की अदायगी का पक्षधर था। वो सगाई मैंने तुड़वा डाली..इसलिए नहीं की सिर्फ मेरी शादी उससे हो जाये, बल्कि ऐसे लालची लोगों में खुशबू कभी खुश नहीं रह सकती थी। ना उसका परिवार, फिर किसी तरह घरवालों को समझा बुझा कर मैं फ्रंट पर आ गया और हमारी शादी हो गई। ये सब किस्मत की बात थी.. लड़की बोली "चलो अच्छा हुआ आप मिल गए, वरना वो गलत लोगों में फंस जाती।" मैंने कहा "जरूरी नहीं कि माता पिता का फैसला हमेशा सही हो, और ये भी जरूरी नहीं कि प्रेमी जोड़े की पसन्द सही हो.. दोनों में से कोई भी गलत या सही हो सकता है..काम की बात यहाँ ये है कि कौन ज्यादा वफादार है।" लड़की ने फिर से पानी का घूंट लिया और मैंने भी.. लड़की ने तर्क दिया कि "हमारा फैसला गलत हो जाए तो कोई बात नहीं, उन्हें ग्लानि नहीं होनी चाहिए।" मैंने कहा "फैसला ऐसा हो जो दोनों का हो, बच्चों और माता-पिता दोनों की सहमति, वो सबसे सही है। बुरा मत मानना मैं कहना चाहूंगा कि तुम्हारा फैसला तुम दोनों का है, जिसमे तुम्हारे पेरेंट्स शामिल नहीं है, ना ही तुम्हें इश्क का असली मतलब पता है अभी।" उसने पूछा "क्या है इश्क़ का सही अर्थ?" मैंने कहा "तुम इश्क में हो, तुम अपना सबकुछ छोड़कर चली आई ये सच्चा इश्क़ है, तुमने दिमाग पर जोर नहीं दिया ये इश्क है, फायदा नुकसान नहीं सोचा ये इश्क है...तुम्हारा दिमाग़ दुनियादारी के फितूर से बिल्कुल खाली था, उस खाली जगह में इश्क का फितूर भर दिया गया। जिन जनाब ने इश्क को भरा क्या वो इश्क में नहीं है.. यानि तुम जिसके साथ जा रही हो वो इश्क में नहीं, बल्कि होशियारी हीरोगिरी में है। जो इश्क में होता है वो इतनी प्लानिंग नहीं कर पाता है, तीन ट्रेनें नहीं बदलवा पाता है, उसका दिमाग इतना काम ही नहीं कर पाता.. कोई कहे मैं आशिक हुँ, और वो शातिर भी हो ये नामुमकिन है। मजनूं इश्क में पागल हो गया था, लोग पत्थर मारते थे उसे, इश्क में उसकी पहचान तक मिट गई। उसे दुनिया मजनूं के नाम से जानती है, जबकि उसका असली नाम कैस था, जो नहीं इस्तेमाल किया जाता। वो शातिर होता तो कैस से मजनूं ना बन पाता। फरहाद ने शीरीं के लिए पहाड़ों को खोदकर नहर निकाल डाली थी और उसी नहर में उसका लहू बहा था, वो इश्क़ था। इश्क़ में कोई फकीर हो गया, कोई जोगी हो गया, किसी मांझी ने पहाड़ तोड़कर रास्ता निकाल लिया..किसी ने अतिरिक्त दिमाग़ नहीं लगाया..चालाकी नहीं की । लालच, हवस और हासिल करने का नाम इश्क़ नहीं है.. इश्क समर्पण करने को कहते हैं, जिसमें इंसान सबसे पहले खुद का समर्पण करता है, जैसे तुमने किया, लेकिन तुम्हारा समर्पण हासिल करने के लिए था, यानि तुम्हारे इश्क में लालच की मिलावट हो गई। लकड़ी अचानक खो सी गई.. उसकी खिलख़िलाहट और खिलंदड़ापन एकदम से खमोशी में बदल गया.. मुझे लगा मैं कुछ ज्यादा बोल गया, फिर भी मैंने जारी रखा, मैंने कहा "प्यार तुम्हारे पापा तुमसे करते हैं, कुछ दिनों बाद उनका वजन आधा हो जाएगा, तुम्हारी माँ कई दिनों तक खाना नहीं खाएगी ना पानी पियेगी.. जबकि आपको अपने आशिक को आजमा कर देख लेना था, ना तो उसकी सेहत पर फर्क पड़ता, ना दिमाग़ पर, वो अक्लमंद है, अपने लिए अच्छा सोच लेता। आजकल गली मोहल्ले के हर तीसरे लौंडे लपाटे को जो इश्क हो जाता है, वो इश्क नहीं है, वो सिनेमा जैसा कुछ है। एक तरह की स्टंटबाजी, डेरिंग, अलग कुछ करने का फितूर..और कुछ नहीं। लड़की का चेहरे का रंग बदल गया, ऐसा लग रहा था वो अब यहाँ नहीं है, उसका दिमाग़ किसी अतीत में टहलने निकल गया है। मैं अपने फोन को स्क्रॉल करने लगा.. लेकिन मन की इंद्री उसकी तरफ थी। थोड़ी ही देर में उसका और मेरा स्टेशन आ गया.. बात कहाँ से निकली थी और कहाँ पहुँच गई.. उसके मोबाइल पर मैसेज टोन बजी, देखा, सिम एक्टिवेट हो चुकी थी.. उसने चुपचाप बैग में से आगे का टिकट निकाला और फाड़ दिया.. मुझे कहा एक कॉल करना है, मैंने मोबाइल दिया.. उसने नम्बर डायल करके कहा "सोरी पापा, और सिसक-सिसक कर रोने लगी, सामने से पिता भी फोन पर बेटी को संभालने की कोशिश करने लगे.. उसने कहा पिताजी आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए मैं घर आ रही हूँ..दोनों तरफ से भावनाओं का सागर उमड़ पड़ा।" हम ट्रेन से उतरे, उसने फिर से पिन मांगी, मैंने पिन दी.. उसने मोबाइल से सिम निकालकर तोड़ दी और पिन मुझे वापस कर दिया ******

  • एक रात

    रबीन्द्रनाथ टैगोर की कहानी एक ही पाठशाला में सुरबाला के साथ पढ़ा हूँ, और बउ-बउ खेला हूँ। उसके घर जाने पर सुरबाला की माँ मुझे बड़ा प्यार करतीं और हम दोनों को साथ बिठाकर कहतीं, ‘वाह, कितनी सुंदर जोड़ी है।’ छोटा था, किन्तु बात का अभिप्राय प्रायः समझ लेता था। सुरबाला पर अन्य सर्वसाधारण की अपेक्षा मेरा कुछ विशेष अधिकार था, यह धारणा मेरे मन में बद्धमूल हो गई थी। इस अधिकार-मद से मत्त होकर उस पर मैं शासन और अत्याचार न करता होऊं, ऐसी बात न थी। वह भी सहिष्णुभाव से हर तरह से मेरी फ़रमाइश पूरी करती और दण्ड वहन करती। मुहल्ले में उसके रूप की प्रशंसा थी, किन्तु बर्बर बालक की दृष्टि में उस सौंदर्य का कोई महत्त्व नहीं था। तो बस यही जानता था कि सुरबाला ने अपने पिता के घर में मेरा प्रभुत्व स्वीकार करने के लिए ही जन्म लिया है, इसीलिए वह विशेष रूप से मेरी अवहेलना की पात्री है। मेरे पिता चौधरी जमींदार के नायब थे। उनकी इच्छा थी, मेरे काम करने योग्य होते ही मुझे जमींदारी-सरिश्ते का काम सिखाकर कहीं गुमाश्तागिरी दिला दें। किन्तु मैं मन-ही-मन इसका विरोधी था। हमारे मुहल्ले के नीलरतन जिस तरह भागकर कलकत्ता में पढ़ना-लिखना सीखकर कलक्टर साहब के नाजिर हो गए थे, उसी तरह मेरे जीवन का लक्ष्य भी अत्युच्च था। ‘कलक्टर का नाजिर न बन सका, तो जजी अदालत का हेड क्लर्क हो जाऊंगा।’ – मैंने मन ही मन यह निश्चय कर लिया था। मैं हमेशा देखता कि मेरे पिता इन अदालत जीवियों का बहुत सम्मान करते थे; अनेक अवसरों पर मछली-तरकारी, रुपये पैसे से उनकी पूजार्चना करनी पड़ती; यह बात भी मैं बाल्यावस्था से ही जानता था; इसलिए मैंने अदालत के छोटे कर्मचारी, यहां तक कि हरकारों को भी अपने हृदय में बड़े सम्मान का स्थान दे रखा था। ये हमारे बंगाल के पूज्य देवता थे, तेतीस कोटि देवताओं के छोटे-छोटे नवीन संस्करण। कार्य-सिद्धि-लाभ के संबंध में स्वयं सिद्धिदाता गणेश की अपेक्षा इनके प्रति लोगों में आंतरिक निर्भरता कहीं अधिक थी, अतएव पहले गणेश को जो कुछ प्राप्त होता था, वह आजकल इन्हें मिलता था। नीलरतन के दृष्टांत से उत्साहित होकर मैं एक दिन विशेष सुविधा पाकर कलकत्ता भाग गया। पहले तो गांव के एक परिचित व्यक्ति के घर ठहरा, उसके बाद पढ़ाई के लिए पिता से भी थोड़ी-बहुत सहायता मिलने लग गई। पढ़ना-लिखना नियमपूर्वक चलने लगा। इसके अतिरिक्त मैं सभा-समितियों में भी योग देता। देश के लिए प्राण-विसर्जन करने की तत्काल आवश्यकता है, इस विषय में मुझे कोई संदेह न था। किन्तु, यह दुस्साध्य कार्य किस प्रकार किया जा सकता है, यह मैं नहीं जानता था; न इसका कोई दृष्टांत ही दिखाई पड़ता था। पर इससे मेरे उत्साह में कोई कमी नहीं आई। हम देहाती थे, कम उम्र में ही प्रौढ़ बुद्धि रखने वाले कलकत्ता वालों की तरह हर चीज का मजाक उड़ाना हमने नहीं सीखा था; इसलिए हम लोग चंदे की किताब लेकर भूखे-प्यासे दोपहर की धूप से दर-दर भीख मांगते फिरते, किनारे खड़े होकर विज्ञापन बांटते, सभा-स्थल में जोकर बेंच-कुर्सी लगाते, दलपति के बारे में किसी के कुछ कहने पर कमर बांधकर मार-पीट करने पर उतारू हो जाते। शहर के लड़के हमारे ये लक्षण देखकर हमें गंवार कहते। आया तो था नाजिर सरिश्तेदार बनने, पर मैजिनी, गैरीबाल्डी बनने की तैयारी करने लग गया। इसी समय मेरे पिता और सुरबाला के पिता ने एकमत होकर सुरबाला के साथ मेरा विवाह कर देने का निश्चय किया। मैं पंद्रह वर्ष की अवस्था में कलकत्ता भाग आया था। उस समय सुरबाला की अवस्था आठ वर्ष थी। अब मैं अठारह वर्ष का था। पिता के अनुसार मेरे विवाह की आयु धीरे-धीरे निकली जा रही थी। पर मैंने मन-ही-मन यह प्रतिज्ञा कर ली थी कि आजीवन अविवाहित रहकर स्वदेश के लिए मर मिटूंगा। मैंने पिता से कहा, ‘पढ़ाई पूरी किये बिना मैं विवाह नहीं कर सकता।’’ दो-चार महीने के बाद ही खबर मिली कि वकील रामलोचन बाबू के साथ सुरबाला का विवाह हो गया है। मैं तो पतित भारत की चंदा-वसूली के काम में व्यस्त था, मुझे यह समाचार अत्यंत तुच्छ मालूम पड़ा। एन्ट्रेंस पास कर लिया था। फर्स्ट ईयर आर्ट्स में जाने का विचार था कि तभी पिता की मृत्यु हो गई। परिवार में मैं अकेला नहीं था; माता थीं और दो बहनें। अतएव कॉलेज छोड़कर काम की तलाश में निकलना पड़ा। बहुत कोशिशों के बाद नोआखाली डिवीजन के एक छोटे-से शहर के एन्ट्रेंस स्कूल में असिस्टैण्ट मास्टर का पद मिला। सोचा, ‘मेरे उपयुक्त काम मिल गया। उपदेश तथा उत्साह प्रदान करके प्रत्येक विद्यार्थी को भावी भारत का सेनापति बना दूंगा।’ काम आरंभ कर दिया। देखा, भारतवर्ष के भविष्य की अपेक्षा आसन्न इम्तहान की चिंता कहीं ज्यादा की जाती थी। छात्रों को ग्रामर और एलजेबरा के बाहर की कोई बात बताते ही हेडमास्टर नाराज हो जाते। दो एक महीने में मेरा उत्साह ठंडा पड़ गया। हमारे जैसे प्रतिभाहीन लोग घर में बैठकर तो अनेक प्रकार की कल्पनाएं करते रहते हैं, पर अंत में कर्म-क्षेत्र में उतरते ही कंधे पर हल का बोझ ढोते हुए पीछे से पूंछ मरोड़ी जाने पर भी सिर झुकाए सहिष्णु भाव से प्रतिदिन खेत गोड़ने का काम कर संध्या को भर-पेट चारा पाकर ही संतुष्ट रहते हैं; फिर कूद-फांद करने का उत्साह नहीं बचता। आग लगने के डर से एक-न-एक मास्टर को स्कूल में ही रहना पड़ता। मैं अकेला था, इसलिए यह भार मेरे ही ऊपर आ पड़ा। स्कूल के बड़े आठचाला से सटी हुई एक झोंपड़ी में मैं रहता। स्कूल बस्ती से कुछ दूर एक बड़ी पुष्कणी के किनारे था। चारों ओर सुपारी, नारियल और मदार के पेड़ तथा स्कूल से लगे आपस में सटे हुए नीम के दो पुराने विशाल पेड़ छाया देते रहते। अभी तक मैंने एक बात का उल्लेख नहीं किया, न मैंने उसे उस योग्य ही समझा। यहां के सरकारी वकील रामलोचन राय का घर हमारे स्कूल के पास ही था और उनके साथ उनकी स्त्री मेरी बाल्य-सखी सुरबाला थी, यह मैं जानता था। रामलोचन बाबू के साथ मेरा परिचय हुआ। सुरबाला के साथ मेरा बचपन में परिचय था, यह रामलोचन बाबू जानते थे या नहीं, मैं नहीं जानता। मैंने भी नया परिचय होने के कारण उस विषय में कुछ कहना उचित न समझा। यही नहीं सुरबाला किसी समय मेरे जीवन के साथ किसी रूप में जुड़ी हुई थी, यह बात मेरे मन में ठीक तरह से उठी ही नहीं। एक दिन छुट्टी के रोज रामलोचन बाबू से भेंट करने उनके घर गया था। याद नहीं किस विषय पर बातचीत हो रही थी, शायद वर्तमान भारतवर्ष दुरव्यस्था के संबंध में। यह बात न थी कि वे उसके लिए विशेष चिंतित और उदास थे, किन्तु विषय ऐसा था कि हुक्का पीते-पीते उस पर एक-डेढ़ घण्टे तक यों ही शौकिया दुःख प्रकट किया जा सकता था। तभी बगल के कमरे में चूड़ियों की हल्की-सी खनखनाहट, साड़ी की सरसराहट और पैरों की भी कुछ आहट सुनाई पड़ी। मैं अच्छी तरह समझ गया कि जंगले की संध से कोई कौतूहलपूर्ण आँखें मुझे देख रही हैं। मुझे तत्काल वे आँखें याद ही आईं-विश्वास, सरलता और बालसुलभ प्रीति से छलछलाती दो बड़ी-बड़ी आँखें, काली-काली पुतलियाँ, घनी काली पलकें, और स्थिर स्निग्ध दृष्टि। सहसा मेरे हृत्पिंड को मानो किसी ने अपनी कड़ी मुट्ठी में भींच लिया। वेदना से मेरा अंतर झनझना उठा। लौटकर घर आ गया, किन्तु वह व्यथा बनी रही। पढ़ना-लिखना, जो भी करता किसी तरह मन का भार दूर न हो पाता। शाम के समय मैं कुछ शांत-चित्त होकर सोचने लगा कि आखिर ऐसा हुआ क्यों। उत्तर में मन बोल उठा, ‘तुम्हारी वह सुरबाला कहाँ गई ?’ मैंने कहा, ‘मैंने तो उसे स्वेच्छा से ही छोड़ दिया था। वह क्या मेरे लिए ही बैठी रहती।’ मन के भीतर से कोई बोला, ‘उस समय जिसे चाहते ही पा सकते थे, अब उसे सिर पटककर मर जाने पर भी एक बार देखने तक का अधिकार तुम्हें नहीं मिल सकता। बाल्यावस्था की वह सुरबाला तुम्हारे कितने ही निकट क्यों न रहे, चाहे तुम उसकी चूड़ियों की खनक सुनते रहो, उसके बालों की सुगंध की महक पाते रहो, किन्तु तुम्हारे बीच में एक दीवार बराबर बनी रहेगी।’ मैंने कहा, “जाने भी दो, सुरबाला मेरी कौन है।” उत्तर मिला, “आज सुरबाला तुम्हारी कोई नहीं है, लेकिन सुरबाला तुम्हारी क्या नहीं हो सकती थी ?” सच बात है, सुरबाला मेरी क्या नहीं हो सकती थी। जो मेरी सबसे अधिक अंतरंग, सबसे निकटवर्त्तिनी, मेरे जीवन के समस्त सुख-दुःख की सहभागिनी हो सकती थी। वह अब इतनी दूर, इतनी पराई हो गई है कि आज उसको देखना और बात करना भी अपराध है, उसके विषय में सोचना पाप है। और यह रामलोचन न जाने कहां से आ गया, बस दो-एक रटे-रटाए मंत्र पढ़कर सुरबाला को पलक मारते ही एक झपटरे में धरती के और सब लोगों से छीन ले गया। रामलोचन के घर की दीवारों में जो सुरबाला थी, वह रामलोचन की भी अपेक्षा मेरी अधिक थी। यह बात मैं किसी भी प्रकार मन से नहीं निकाल पाता था। शायद यह बात असंगत थी फिर भी अस्वाभाविक नहीं थी। तबसे और किसी भी काम में मन नहीं लग सका। दोपहर के समय क्लास में जब छात्र गुनगुनाते रहते, बाहर सन्नाटा छाया रहता; नीम की निंबौलियों की महक होती, तब भीतर कुछ होता। मन कुछ चाहता मगर उसका रूप साफ न होता। स्कूल की छुट्टी होने पर अपने बड़े कमरे में अकेले मन न लगता, लेकिन यदि कोई मिलने चला आए, तो भी मन बड़ा अझेल हो जाता। संध्या समय पुष्करिणी के किनारे सुपारी-नारियल के वृक्षों की अर्थहीन मर्मर ध्वनि सुनते-सुनते सोचता, ‘मनुष्य-समाज एक जटिल भ्रमजाल है। ठीक समय पर ठीक काम करना किसी को नहीं सूझता, बाद में अनुपयुक्त समय पर अनुचित वासना लेकर अस्थिर होकर मर जाता है।’ “तुम्हारे जैसा आदमी सुरबाला का पति होकर आजीवन बड़े सुख से रह सकता था; तुम तो होने चले थे गैरीबाल्डी, और अंत में हुए एक देहाती स्कूल के असिस्टेण्ट मास्टर! और रामलोचन राय वकील विवाह करके सरकारी वकील बनकर अच्छा खासा रोजगार करने लगा। जिस दिन दूध में धुएं की बू आती, वह सुरबाला को डांट देता और जिस दिन उसका मन प्रसन्न रहता, उस दिन सुरबाला के लिए गहने बनवा देता। अपने मोटी थुलथुली देह पर अचकन डाले, वह परम संतुष्ट रहता। वह कभी भी तालाब के किनारे बैठकर आकाश के तारों की ओर देखता हुआ आहें भरते हुए शाम नहीं गुजारता।” एक बड़े मुकद्दमे में रामलोचन कुछ दिन के लिए बाहर गया था। अपने स्कूल- भवन में मैं जिस तरह अकेला था, शायद उस दिन सुरबाला भी अपने घर में उसी तरह अकेली थी। मुझे याद है, उस दिन सोमवार था। सवेरे से ही आकाश में बादल थे। दस बजे से टप-टप बारिश शुरू हो गई थी। आकाश की दशा देखकर हैड-मास्टर ने जल्दी छुट्टी कर दी। काले-काले मेघ सारे दिन आकाश में घूमते रहे। दूसरे दिन तीसरे पहर से मूसलाधार बारिश शुरू हुई और आंधी चलने लगी। ज्यों-ज्यों रात होने लगी बारिश और आंधी का वेग भी बढ़ने लगा। पहले पुरवैया चल रही थी। फिर उत्तर तथा उत्तर-पूर्व की ओर से हवा बहने लगी। उस रात सोने का प्रयल करना व्यर्थ था। खयाल आया, “इस दुर्योग के समय सुरबाला घर में अकेली है!” हमारा स्कूल-भवन उनके घर की अपेक्षा कहीं अधिक मजबूत था, कई बार मन में आया, “उसे स्कूल-भवन में बुला लाऊं और मैं पुष्करिणी के किनारे रात बिता लूं।’ किन्तु किसी भी तरह तय नहीं कर पाया। रात एक-डेढ़ पहर गई होगी कि सहसा बाढ़ आने की आवाज सुनाई पड़ी। समुद्र बढ़ा आ रहा था। घर से बाहर निकला। सुरबाला के घर की ओर चला। रास्ते में अपनी पृष्करिणी का किनारा पड़ा। वहाँ तक आते-आते पानी मेरे घुटनों तक पहुँच गया था। मैं ज्यों ही किनारे पर जाकर खड़ा हुआ, त्यों ही एक और तरंग आ पहुँची। हमारे तालाब के किनारे का एक हिस्सा लगभग दस-ग्यारह हाथ ऊँचा था। जिस समय मैं किनारे पर चढ़ा उसी समय विपरीत दिशा से एक और व्यक्ति भी चढ़ा। व्यक्ति कौन था? यह सिर से लेकर पैर तक मेरी संपूर्ण अंतरात्मा समझ गई थी। और उसने भी मुझे पहचान लिया था इसमें मुझे संदेह नहीं। और तो सब-कुछ डूबा हुआ था, केवल पांच-छह हाथ के उस द्वीप पर हम दोनों प्राणी आकर खड़े हुए थे। प्रलयकाल था। आकाश से तारे गायब। धरती के सब प्रदीप बुझे हुए थे। उस समय कोई बात करने में भी हानि नहीं थी। किन्तु एक भी शब्द न निकला। दोनों केवल अंधकार की ओर ताकते रहे। आज संसार छोड़कर सुरबाला मेरे पास आकर खड़ी थी। मुझे छोड़कर आज सुरबाला का कोई नहीं था। कब से बीते हुए उस शैशव-काल में सुरबाला किसी जन्मान्तर के बाद किसी प्राचीन रहस्यान्धकार पर उतराती हुई इस सूर्य चन्द्रालोकित जनाकीर्ण पृथ्वी के ऊपर मेरी ही बगल में आकर खड़ी हुई थी। जन्म-स्त्रोत ने उस नवकलिका को मेरे पास लाकर फेंक दिया था, मृत्यु-स्त्रोत ने उस विकसित पुष्प को भी मेरे ही पास ला फेंका। इस समय केवल एक और लहर की जरूरत थी, जो सदैव के लिए हमें एक कर देती। वह लहर न आए। पति-पुत्र, घर-धन-जन को लेकर सुरबाला चिरकाल तक सुख से रहे। मैंने इसी रात में महाप्रलय के किनारे अनन्त आनंद का स्वाद पा लिया। रात समाप्त होने को आई। आंधी थम गई। पानी उतर गया। सुरबाला बिना कुछ कहे घर चली गई, मैं भी बिना कुछ कहे अपने घर चला आया। मैंने सोचा, ‘मैं नाजिर भी नहीं हुआ, सरिश्तेदार भी नहीं हुआ, गैरीबाल्डी भी नहीं हुआ, मैं एक टूटे-फूटे स्कूल का असिस्टेंट मास्टर रह गया। मेरे इस संपूर्ण जीवन में केवल क्षण-भर के लिए एक अनंत रात्रि का उदय हुआ था। शायद वही जीवन की एकमात्र चरम सार्थकता थी।’ (बउ-बउ=छोटी बालिकाओं का खेल; जिसमें बहू के समान सजकर, घूंघट निकालकर गृहिणी का अभिनय करती हैं।) *******

  • MORNING SUN

    Ahana Gupta When the morning sun comes up high, It brightly lights up the whole sky. When the moon makes a sigh, And the darkness says goodbye. The summit of the hills blush with the first ray, All trees dance in their own way. The flowers and the leaves say, Hurrah! it's the beginningof the day. The blissfulanimals say good morning to all, The golden drop of sunshine fall. When comes up the fire ball, The birds chirp from trees tall. *******

  • बस यूँ ही

    दीपशिखा- मुहब्बत तेरा शाना चाहता है, कोई आँसू बहाना चाहता है। असर है आशिक़ी का इक समुन्दर, नदी में डूब जाना चाहता है। बदल बैठा है फ़ितरत ये परिंदा, कफ़स में आबो दाना चाहता है। हमेशा से है आदम की ये फ़ितरत, कि वर्जित फल ही खाना चाहता है। अँधेरे उसको भी क्या बख़्श देंगे, जो सूरज को बुझाना चाहता है। मेरा किरदार अपने वास्ते अब, कोई बेहतर फ़साना चाहता है। मेरे आँसू गवाही दे रहे हैं, कि ग़म भी मुस्कुराना चाहता है। वही क्यों जाने हम सब देखते हैं, ज़माना जो दिखाना चाहता है। जनाज़ा है 'शिखा' ये हसरतों का, जिसे दिल ख़ुद उठाना चाहता है। ******

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