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- अंतर्जातीय प्रेम विवाह
अमरेन्द्र भला हो अंतर्जातीय प्रेम विवाह का, जो आज नफरत को मिटा रहा। जाति और धर्म का, सीमा को लांघ रहा। न कोई जाति न कोई धर्म है, जो आज इससे अछूता रह गया। सब जाति-धर्म आज सब में है मिल रहा, ऊॅच और नीच का है झंझट मिट रहा। मैं सराहता हॅू उन जोड़ियों को, जो ये नेक काम कर रहा। इस पुनीत कार्य से वो, युगों से आ रही भेदभाव मिटा रहा। जो लग रहा था कल तक अभेद्य, आज उसको है भेदा जा रहा। भला हो अंतर्जातीय प्रेम विवाह का, जो आज नफरत को मिटा रहा। क्या ब्राह्मण क्या क्षत्रिय, क्या वैश्य क्या शुद्र बन रहा। सबमें हुआ अंतर्जातीय विवाह, कोई भी नहीं है इससे बाकी रह गया। मूर्खता होगा किसी को भी, जो तुम अछूत कह रहा। बहुत बड़ा है मानवतावादी वो, जो है प्रेम का अर्थ समझ रहा। महान है वो लोग जो आज, अंतर्जातीय विवाह को बढ़ावा दे रहा। आज रूढ़िवादी पुरातनपन्थ का, है देखो कैसे अंत हो रहा। कौन किस जाति और मजहब का रह गया, मुश्किल होगा कहना वो दिन आ रहा। मानव हैं हम मानव हमारी जाति, और मानवता ही केवल धर्म रह जायेगा। सब बकवास मिट जायेगा, आज सब एक हो रहा। भला हो अंतर्जातीय प्रेम विवाह का, जो आज नफरत को मिटा रहा। ******
- औरत
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव पिछले हफ्ते मेरी पत्नी को बुखार था। पहले दिन तो उसने बताया ही नहीं कि उसे बुखार है। दूसरे दिन जब उससे सुबह उठा नहीं गया तो मैंने यूं ही पूछ लिया कि तबीयत खराब है क्या? उसने कहा कि नहीं, तबीयत खराब तो नहीं है, हां थोड़ी थकावट है। मैं चुपचाप अखबार पढ़ने में मशगूल हो गया। जरा देर से उस दिन वो जगी और फटाफट उसने मेरे लिए चाय बनाई, बिस्किट दिए और मैं अखबार पढ़ते-पढ़ते चाय पीता रहा। मुझे पता लग चुका था कि उसे थोड़ा बुखार है, और ये बात मैंने उसे छू कर समझ भी ली थी। खैर, मैं यही सोचता रहा कि मामूली बुखार है, शाम तक ठीक हो जाएगा। उसने थोड़ें बुखार में ही मेरे लिए नाश्ता तैयार किया। नाश्ता करते हुए मैंने उसे बताया कि आज खाना बाहर है, इसलिए तुम खाना मत बनाना। उसने धीरे से कहा कि अरे ऐसी कोई बात नहीं, खाना तो बना दूंगी। लेकिन मैंने कहा कि नहीं, नहीं दफ्तर की कोई मीटिंग है, उसके बाद खाना बाहर ही है। फिर मैं तैयार होकर निकल गया। मैं पुरुष हूं। पुरुष मजबूत दिल के होते हैं। ऐसी मामूली बीमारी से पुरुष विचलित नहीं होते। मैं दफ्तर चला गया, फिर अपनी मीटिंग में मुझे ध्यान भी नहीं रहा कि पत्नी की तबीयत सुबह ठीक नहीं थी। खैर, शाम को घर आया, तो वो लेटी हुई थी। उसे लेटे देख कर भी दिमाग में एक बार नहीं आया कि यही पूछ लूं कि कैसी तबीयत है? वो लेटी रही, मैंने अपने कपड़े बदले और पूछ बैठा कि खाना? पत्नी ने मेरी ओर देखा और लेटे-लेटे उसने कहा कि अभी उठती हूं, बस अब ठीक हूं। जैसे ही उसने कहा कि मैं ठीक हूं, मुझे ध्यान आ गया कि अरे सुबह तो उसे बुखार था। खैर, अपनी शर्मिंदगी छिपाते हुए मैंने कहा कि कोई बात नहीं, तुम लेटी रहो। मैं रसोई में गया, मैंने अंदाजा लगाया कि उसने दोपहर में खाना नहीं खाया, क्योंकि खाना तो बना ही नहीं। मैंने फ्रिज से कुछ-कुछ निकाला, उसके लिए ब्रेड जैम लिया और अपने पति धर्म को निभाते हुए, खुद पर गर्व करते हुए उसके आगे खाने की प्लेट कर दी। पत्नी ने ब्रेड का एक टुकड़ा उठाया, मुझे आंखों से धन्यवाद कहा, और मन से कहा कि पति हो तो ऐसा हो, इतनी केयर करने वाला। मैंने एक दो बार यूं ही पूछ लिया कि तुम कैसी हो, कोई दवा दूं क्या? और अपने कम्यूटर आदि को देखता हुआ सो गया। पत्नी अगली सुबह जल्दी उठ गई, मुझे लगा कि वो ठीक हो गई है, और मैंने फिर उसके बुखार पर चर्चा नहीं की। मैंने मान लिया कि वो ठीक हो गई है। कल मुझे सर्दी हो गई थी। दो तीन बार छींक आ गई थी। घर गया तो पत्नी ने कहा कि तुम्हारी तो तबीयत ठीक नहीं है। उसने सिर पर हाथ रखा, और कहा कि बुखार तो नहीं है, लेकिन गला खराब लग रहा है। ऐसा करो तुम लेट जाओ, मैं सरसों का तेल गरम करके छाती में लगा देती हूं। मैंने एक दो बार कहा कि नहीं-नहीं ऐसी कोई बात नहीं। लेकिन पत्नी ने मुझे कमरे में भेज ही दिया। मैं बिस्तर पर लेटा ही था कि मेरे लिए शानदार काढ़ा बन कर आ गया। अब मेरा गला खराब था तो काढ़ा बनना ही था। काढ़ा पी कर लेट गया। फिर दस मिनट में गरमा गरम सूप सामने आ गया। उसने कहा कि गरम सूप से गले को पूरी राहत मिलेगी। सूप पिया तो वो मेरे पास आ गई, और मेरे सिर को सहलाने लगी। कहने लगी कि इतनी तबीयत खराब है, इतना काम क्यों करते हो? बचपन में जब कभी मुझे बुखार होता था, मां सारी रात मेरे सिरहाने बैठी रहती। मैं सोता था, वो जागती थी। आज मैं लेटा हुआ था, मेरी पत्नी मेरा सिर सहला रही थी। मैं धीरे-धीरे सो गया। जागा तो वो गले पर विक्स लगा रही थी। मेरी आंख खुली तो उसने पूछा, कुछ आराम मिल रहा है? मैंने हां में सिर हिलाया। तो उसने पूछा कि खाना खाओगे? मुझे भूख लगी थी, मैंने कहा, "हां।" उसने फटाफट रोटी, सब्जी, दाल, चटनी, सलाद मेरे सामने परोस दिए, और आधा लेटे-लेटे मेरे मुंह में कौर डालती रही। मैने चुपचाप खाना खाया, और लेट गया। पत्नी ने मुझे अपने हाथों से खिला कर खुद को खुश महसूस किया और रसोई में चली गई। मैं चुपचाप लेटा रहा। सोचता रहा कि पुरुष भी कैसे होते हैं? कुछ दिन पहले मेरी पत्नी बीमार थी, मैंने कुछ नहीं किया था। और तो और एक फोन करके उसका हाल भी नहीं पूछा। उसने पूरे दिन कुछ नहीं खाया था, लेकिन मैंने उसे ब्रेड परोस कर खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा था। मैंने ये देखने की कोशिश भी नहीं की कि उसे वाकई कितना बुखार था। मैंने ऐसा कुछ नहीं किया कि उसे लगे कि बीमारी में वो अकेली नहीं। लेकिन मुझे सिर्फ जरा सी सर्दी हुई थी, और वो मेरी मां बन गई थी। मैं सोचता रहा कि क्या सचमुच महिलाओं को भगवान एक अलग दिल देते हैं? महिलाओं में जो करुणा और ममता होती है वो पुरुषों में नहीं होती क्या? सोचता रहा, जिस दिन मेरी पत्नी को बुखार था, उस दोपहर जब उसे भूख लगी होगी और वो बिस्तर से उठ न पाई होगी, तो उसने भी चाहा होगा कि काश उसका पति उसके पास होता? मैं चाहे जो सोचूं, लेकिन मुझे लगता है कि हर पुरुष को एक जन्म में औरत बन कर ये समझने की कोशिश करनी ही चाहिए कि सचमुच कितना मुश्किल होता है, औरत होना। मां होना, बहन होना, पत्नी होना..। *******
- फ्लाइंग किस.....
लक्ष्मी रश्मि की शादी को अभी सात महीने ही हुए थे। बात तो अच्छे से होती है पतिदेव से पर प्यार होगा या नहीं ये कहना अब भी मुश्किल है। ठीक ठाक ही व्यवहार है या यूं कहें कि भले आदमी हैं। शादी के पहले दो बार प्यार हुआ था रश्मि को पर दोनों लड़कों से कुछ ख़ास नहीं चल सका रिश्ता और पुरुषों के बारे में उसकी राय बहुत सकारात्मक तो नहीं ही है। इस बात के लिए वो बिलकुल क्लीयर है कि प्यार नहीं हुआ है उसे मोहन से अभी भी। सुबह का समय है। सासू मां बैठकर योगा कर रही हैं और ससुर जी अपने पसंदीदा 'आर जे' कि आवाज़ और उसके द्वारा सुनाये जा रहे गाने का लुत्फ़ उठा रहे हैं। मोहन आँफिस के लिए तैयार हो चुके हैं और दाल रोटी सब्जी तीनों तैयार हैं। बस खाकर निकलेंगे। उनके जाने के बाद ही रश्मि सास ससुर को खाना देती है। सासू मां वैसे तो हर चीज़ में बहुत अच्छी हैं पर खाना बनाने में कोई चूक बरदाशत नही करती और क्यूंकि रश्मि अच्छा खाना बनाती है तो उनकी खूब बनती भी है। रश्मि ने खाना लगा दिया है और मोहन बड़े चाव से खा रहे हैं। सासू मां ने पूछा खाना कैसा है तो हाँथ, आँख और मुँह तीनों से कह दिया "लाजवाब"। सासू मां खुश और और रश्मि ने भी चैन की सांस ली। खाना खाकर अब मोहन अपनी टाई लेने गए और बोले "रश्मि टाई कहाँ है... ढूँढ़कर दो।" वो कमरे मे पहुंची तो देखा टाई मोहन के हाथ में ही है और वह मुस्कुरा रहे हैं। रश्मि समझ गयी मोहन उसे छेड़ रहे हैं। मुड़कर जाने लगी तो उसकी कलाई पकड़कर झटके से ऐसे खींचा अपनी तरफ कि उनके सीने से टकरा गई और तुरंत मोहन का वो हाथ जिससे उसे खींचा था वो रश्मि की कमर पे था। अपना चेहरा उसके चेहरे के बिलकुल करीब ला दिया और रश्मि ने अपना चेहरा घुमा लिया मोहन ने उसके कान के पास आकर कहा "जानेमन दाल में, नमक डालना भूल गई हो", इतना कहके उसकी कमर से हाथ हटा लिया और मुस्कुराने लगा। वो तुरंत भागी ताकि सास ससुर को खाना देने से पहले ऊपर से ही नमक डाल दे। इतने में मोहन नीचे उतर चुके थे, पर रश्मि को अफ़सोस होने लगा कि मुझे सासू मां की डाँट से बचाने के लिए मोहन बिना नमक की दाल ही खा गए। आज तक तो उसने फिल्मों में आसपास हर मर्द को दाल में नमक ना होने पर गुस्सा करते ही देखा था। उसे ऐसा ही तो जीवनसाथी चाहिए था, जो छोटी बात और छोटी गलती को छोटा ही रहने दे फिजूल में बड़ा बनाकर सबका मूड ना ख़राब करे। उसे मोहन पे प्यार आने लगा या यूं कहें प्यार होने लगा। वो झट से बालकनी में गयी कि बाय कर दे, पर मारे प्यार में फ्लाइंग किस दे बैठी मोहन ने भी किस को कैच करके जेब में रख लिया। और गाड़ी स्टार्ट करके चला गया। ये सारी हरकते पड़ोसन त्रिपाठी आंटी देख रही थी, और जैसे ही रश्मि कि नज़र उनपे पड़ी वह थम्सअप का इशारा करके हँसने लगीं। वो शर्मा कर अंदर भाग आई। ससुर जी के रेडियो में गाना बज रहा था। "आजा पिया तोहे प्यार दूँ....... गोरी बइयां तोपे वार दूँ" ......" ********
- पेट
विनय कुमार मिश्रा दुकान बंद करने का समय हो आया था। तभी दो औरतें और आ गईं। "भैया साड़ियां दिखा देना कॉटन की, चुनरी प्रिंट में" आज मेरी खुशी का ठिकाना नहीं है। आज पाँच महीने हो गए हैं, अपनी ये छोटी सी दुकान खोले। आज से पहले कभी ऐसा नहीं हुआ। आज सुबह से दस पंद्रह कस्टमर आ चुके हैं। और बिक्री भी ठीक ठाक हो गई है। सच बोलूं तो इस दुकान का किराया निकालना भी बहुत मुश्किल हो रहा था। रोज एक या दो साड़ी तो कभी एक सूट बेच पाता था। या कभी सिर्फ एक दो दुपट्टे ही। मैंने माँ की सारी जमा पूंजी लगा दिया है। सोचा था, माल ठीक रखूंगा तो लोग आएंगे ही। लेकिन लोग आते ही नहीं थे। दुकान भी मेन रोड से सटे एक पतली सी गली में मिली है। लोगों को तो ठीक से दिखता भी नहीं होगा। पर एक बोर्ड मेन रोड पर लगा रखा है मैंने। सामने मेन रोड पर ही एक सरदार जी की साड़ियों की दुकान है। इस छोटे शहर के ज्यादातर लोग उन्हीं की बड़ी दुकान से कपड़े लेते हैं। रोज सैकड़ों कस्टमर उनके दुकान पर आते हैं। पर लगता है, माँ के आशीर्वाद से उनके दुकान की रौनक मैं अब, कुछ कम कर दूँगा। आज खुशी के साथ हैरानी भी हो रही है। कल ही तो माँ से मैं फोन पर दुकान बंद कर गली से निकलते हुए बातें कर रहा था। "माँ चाचा ने ठीक ही कहा था कोई छोटी मोटी नौकरी कर ले। दुकान चलाना तेरे बस की बात नहीं। और इतनी पगड़ी देकर दुकान भी मिली तो एक गली में जहां ग्राहक ही नहीं पहुंच पाते। सारे ग्राहक तो मेन रोड पर बड़ी दुकान पर चले जाते हैं। किराया निकालना भी मुश्किल हो रहा है। परिवार कैसे चलेगा माँ, और बच्चों को कहां से पढ़ा पाऊंगा" मैं कल बहुत मायूस था। और परेशान भी। सच बताऊँ तो कल मैं रो पड़ा था माँ से ये सब कहते हुए। "कोई नहीं बेटा। अब दुकान खोल ही लिया है तो धैर्य रख। किसी चीज़ में सफलता अचानक नहीं मिलती। देखना भगवान सब ठीक करेंगे" माँ का आशीर्वाद ही है। कल ही उन्होंने कहा और आज दुकान पर थोड़ी रौनक हो आई है। "ये दोनों पैक कर दीजिए" उन्हें साड़ियां पसंद आ गई थीं। मैं उनका बिल बना रहा था तभी एक औरत बोल पड़ी। "सरदार जी ने ठीक कहा कि कॉटन की साड़ियां भी अच्छी मिल जाएगी यहां और दाम भी ठीक लगाते हैं।" "जी कौन सरदार जी?" "यही अपने बूटा जी साड़ी वाले। उनके पास चुनरी प्रिंट की साड़ियां नहीं थीं।" मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। बूटा जी अपने कस्टमर यहां क्यों भेज रहे हैं। उनके यहां तो खुद सारे कलेक्शन होते हैं। मैंने पैसे लेकर गल्ले में रख लिया। दुकान बंद कर उनके दुकान पर पहुंचा। वे भी दुकान बंद ही कर रहे थे। "बूटा सिंह जी, आपने अपने ग्राहकों को मेरी दुकान पर भेजा? "ओए नहीं जी! बस उन्हें जो चाहिए था वो मेरी दुकान पर नहीं था तो आपका दुकान बता दिया।" मैं जानता हूँ। इनके दुकान पर सब होता है। उनके वर्कर साड़ियां समेट रहे थे। उनमें कुछ वैसी ही साड़ियां भी थी। मैं ये देख फिर उनकी तरफ देखा। "इसमें आपका नुकसान नहीं होगा बूटा सिंह जी?" "नुकसान की क्या बात है जी, सबकी गृहस्थी चलनी चाहिए। तुम्हारा भी तो परिवार है।" शायद इन्होंने कल फोन पर माँ से मेरी बात सुन ली थी। "मैं इस बात पर खुश हो रहा था कि ये सब माँ के आशीर्वाद से हो रहा है पर ये सब आप ..?" "ओए नहीं पुत्तर! ये सब माँ का ही आशीर्वाद है, हम सब की माएँ तो एक सी ही तो होती हैं ना!" उन्हें देख, मैं खुद अपनी सोच पर शर्मिंदा था। मेरी आँखें नम हो आईं। वे मेरे कंधे पर हाथ रख ये कहते हुए निकल गए। "मेरी माँ ने मुझसे ये कहा था, अपने साथ साथ दूसरों के पेट का भी थोड़ा ख्याल रखना।" इस कॉम्पटीशन के दौर में ऐसी बातों की, कतई उम्मीद नहीं थी..! ******
- आत्महत्या
पूनम जो छोड़कर जा रहा हो, उसे खुशी से जाने दो, रोकना ना कभी, हो सकता है ऊपर वाले ने, तुम्हारे लिए, कुछ और बेहतर सोच रखा हो। आदतें जो लगी हुईं हैं, चाहे वो कोई काम, या फिर कोई इंसान, वो छूट भी सकती हैं। जब भी हो मन अशांत, गहरी सांसे लेते हुए, बोलो, नम: शिवाय। आत्महत्या कोई विकल्प नहीं, शिव की शरण लेते हुए, फिर से उठो, फिर एक नई कहानी लिखो, फिर एक नया इतिहास बनाओ, जीवन बहुत सुंदर है, इसे खत्म करने की न सोचो, वो भी उनके लिए, जिन्हें तुम्हारी कोई परवाह नहीं। भूल कैसे सकते हो, मां बाप का सबसे सच्चा प्यार, जिन्होंने तुम्हें आकार दिया। भगवान के दर्शन को साकार किया। प्रेम धरा के कण–कण में है। आंखे खोलकर देखो तो सही। बंद हुए त्रिनेत्र को जागृत करो तो सही। जो छोड़कर जा....... ******
- दिल की आवाज
मनीष कुमार ‘शुक्ल' बादल गरजे बिजली चमकी, अब केवल बरसात है बाकी। मेरे हिस्से सुबह नहीं है, एक यही बस रात है बाकी। एकटक तुझ को देख रही थी, और इसी में शाम हो गई। जो कहना था कह न पायी, कितनी सारी बात है बाकी। दिन तो जैसे बन के पखेरू, इक लम्हे में दूर हो गया। धड़कन-धड़कन दिल में मेरे, प्यार तेरा नासूर हो गया। महफ़िल हो या तन्हाई हो, तू ही तू महसूस हो मुझ को। हर पल तेरी सोच में रहना, अब मेरा दस्तूर हो गया। जब तक यह संसार है क़ायम, तू मेरा संसार रहेगा। जो भी मेरे हक़ की दुआ है, तू उस का हक़दार रहेगा। तेरे बिना सब तीज अधूरे, जप-तप पूजा-पाठ अधूरी। तब हर इक त्यौहार मनेगा, जब तू मेरे पास रहेगा। अब आना तो ऐसे आना, लौट के फिर न वापस जाना। एक तुझे खोने का डर है, और नहीं कुछ भी है पाना। बैरी नींद हुयी है मेरी, चैन न मुझ को इक पल आये। तू जो नहीं तो फूल भी काँटे, सुख न देता सेज-बिछौना। हँसते चेहरे मुझे चिढ़ाते, बैठ अकेले रोना होगा। ख़ून के आँसू बहा-बहा कर, दिल के दाग़ को धोना होगा। बस इतनी दरकार है तुझ से, और नहीं कुछ चाहत मेरी। मेरा महल-दुमहला सब कुछ, तेरे दिल का कोना होगा। *****
- मुफ्त की आया
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव वृद्धाश्रम के दरवाजे पर रोज एक कार आकर लगती थी। उस कार में से एक नौजवान उतरता और एक बुढ़ी महिला के पास जाकर बैठ जाता। एक आध घंटे तक दोनों के बीच कुछ वार्तालाप चलती फिर वह उठकर चला जाता। यह प्रक्रिया अनवरत चल रही थी। धीरे-धीरे सबको पता चल गया कि बुढ़ी महिला उस नौजवान की माँ हैं। आज फिर वह सुबह से आकर बैठा था और बार-बार माँ के पैर पकड़ माफ़ी मांग रहा था। दूर बैठे वृद्धाश्रम के गेट कीपर को रहा नहीं गया वह एक बुजुर्ग से बोला- "लोग कहते हैं कि औलाद की नीयत बदल जाती है पर यहाँ का दृश्य तो कुछ और ही कह रहा है।" बुजुर्ग महिला ने कहा- "ऐसा नहीं है भाई कि जो तुम्हारी आँखें देख रही हो वह सही हो। कोई बात तो जरूर होगी तभी लोग वृद्धाश्रम के दरवाजे तक आते हैं।" जब वह चला गया तो दरबान उस बुजुर्ग महिला के पास पहुंचा। हाल-चाल पूछने के क्रम में वह पूछ बैठा- "ताई आपसे मिलने जो लड़का आता है वह आपका बेटा है न!" बुढ़ी थोड़ी सकुचाते हुए हाँ में सिर हिलाकर चुप हो गईं। दरबान आगे बात बढ़ाते हुए बोला -"ताई बड़ा भला है आपका बेटा। कितनी मिन्नतें करता है। क्या आपको यहां से ले जाना चाहता है?" बुढ़ी महिला ने एक बार फिर हाँ में सिर हिलाया। तब तक कुछ और बुजुर्ग महिला पुरुष उन दोनों के इर्द-गिर्द आकर खड़े हो गए। एक बुजुर्ग ने अपने को अनुभवी साबित करते हुए कहा- "कहते हैं कि औरत वसुधा की तरह धैर्यवान होती है। लेकिन आपको देखकर ऐसा नहीं लगता है।" `बुजुर्ग महिला सबकी बातें सुन रही थी पर किसी को कोई जबाव नहीं दिया। एक ने कहा- "अब जमाना बदल गया है भाई सहनशीलता बीते दिनों की बात हो गई अब महिला और पुरुष में कोई अन्तर नहीं है। सबको आजादी चाहिए। किसी को माँ बाप से और किसी को अपने बच्चों से।" पुरुष की अंतिम वाक्य सुनकर बुजुर्ग महिला की आँखें भर आईं। फिर भी कुछ नहीं बोला उन्होंने। अगले दिन फिर कार आकर खड़ी हो गई वृद्धाश्रम के दरवाजे पर। इस बार उस नौजवान के साथ एक महिला अपने गोद में एक छोटे बच्चे को लेकर खड़ी थी। दोनों एक साथ सामने मिन्नतें करने लगे। महिला ने अपने बच्चे को उनकी गोद में रख दिया और पांव पकड़ कर गिड़गिड़ाते हुए बोली- "माँजी हम दोनों को माफ कर दीजिये और अपने घर चलिये। आपको अपने पोते की कसम।" दरबान को रहा नहीं गया बोला- "बेटा तुम्हारी माँ नहीं जाना चाहती तो क्यूँ जबरदस्ती ले जाना चाहते हो। तुम लोग जैसे औलाद भगवान सबको दे। वर्ना आजकल के बच्चे जानबूझकर माँ बाप को वृद्धाश्रम में छोड़ जाते हैं।" इस बार बुजुर्ग महिला का धर्य टूट गया आंखों से आंसुओं की धारा बह चली। अपने आंचल से आंसुओं को रोकते हुए बोलीं- "आप शायद नहीं जानते दरबान जी! पति के दुनिया से जाते ही मेरी सारी जमा पूंजी इन लोगों ने ले ली। रोज एक रोटी के लिए मुझे घन्टों इंतजार करना पड़ता था। खड़ी खोटी सुनाकर रात-रात भर खून के आंसू रुलाया है इन लोगों ने। अंत में मुझे घर से चले जाने को कहा। आप सब बताईये कि मैं कहां जाती। आज भी कोई माफी मांगने नहीं आये हैं इन लोगों को दरअसल अपने बच्चे को संभालने के लिए एक आया की आवश्यकता है, जो मुझसे बेहतर इनको कोई मिल नहीं इसीलिए यह नाटक आपके सामने दिखा रहे हैं।" मैं अब इनके साथ उस नर्क में दोबारा नहीं जा सकती। बूढ़ी महिला की कहानी जानकर दरबान शर्म से पानी पानी हो गया और उसने लड़के को डांट कर वृद्ध आश्रम से बाहर निकाल दिया। ******
- बूढ़ी मां का बक्सा
डॉ. जहान सिंह ‘जहान’ बैलगाड़ी पर चलते-चलते मेरी कमर दुखने लगी है। बच्चों से मैंने सुना है कि अब आदमी आसमान में सैर करने लगा है। मेरे पास चंद तांबे के सिक्के, सिंदूर की पोटली, काजल की एक टूटी डिब्बी, नानी के लिए हुए कुछ चांदी के गहने। अपनी मां की दी हुई गुड़िया, कुछ बचपन के टूटी लकड़ी के खिलौने। एक पुराना एल्बम, शादी का एक जोड़ा जिसे संजोए सिर्फ करवा चौथ पर पहना, टूटा आईना, ऊन का गोला और सिलाई। बिटटी का स्वेटर तो शायद देना भूल गई। मां इन चीजों की रसीद ना दिखा पाई। कस्टम अधिकारी ने जहाज पर चढ़ने से रोक दिया। मैं थक कर फिर बैलगाड़ी में अपने सफर पर न जाने कितने दूर। मैं हवाई यात्रा करना चाहता हूं। ******
- उद्धार
प्रेमचंद हिंदू समाज की वैवाहिक प्रथा इतनी दुषित, इतनी चिंताजनक, इतनी भयंकर हो गयी है कि कुछ समझ में नहीं आता, उसका सुधार क्योंकर हो। बिरलें ही ऐसे माता−पिता होंगे जिनके सात पुत्रों के बाद एक भी कन्या उत्पन्न हो जाय तो वह सहर्ष उसका स्वागत करें। कन्या का जन्म होते ही उसके विवाह की चिंता सिर पर सवार हो जाती है और आदमी उसी में डुबकियां खाने लगता है। अवस्था इतनी निराशमय और भयानक हो गई है कि ऐसे माता−पिताओं की कमी नहीं है जो कन्या की मृत्यु पर ह्रदय से प्रसन्न होते है, मानों सिर से बाधा टली। इसका कारण केवल यही है कि देहज की दर, दिन दूनी रात चौगुनी, पावस−काल के जल−गुजरे कि एक या दो हजारों तक नौबत पहुंच गई है। अभी बहुत दिन नहीं गुजरे कि एक या दो हजार रुपये दहेज केवल बड़े घरों की बात थी, छोटी−छोटी शादियों पांच सौ से एक हजार तक तय हो जाती थीं; अब मामुली−मामुली विवाह भी तीन−चार हजार के नीचे तय नहीं होते। खर्च का तो यह हाल है और शिक्षित समाज की निर्धनता और दरिद्रता दिन बढ़ती जाती है। इसका अन्त क्या होगा ईश्वर ही जाने। बेटे एक दर्जन भी हों तो माता−पिता का चिंता नहीं होती। वह अपने ऊपर उनके विवाह−भार का अनिवार्य नहीं समझता, यह उसके लिए ‘कम्पलसरी’ विषय नहीं, ‘आप्शनल’ विषय है। होगा तों कर देगें; नही कह देंगे−−बेटा, खाओं कमाओं, कमाई हो तो विवाह कर लेना। बेटों की कुचरित्रता कलंक की बात नहीं समझी जाती; लेकिन कन्या का विवाह तो करना ही पड़ेगा, उससे भागकर कहां जायेगें ? अगर विवाह में विलम्ब हुआ और कन्या के पांव कहीं ऊंचे नीचे पड़ गये तो फिर कुटुम्ब की नाक कट गयी; वह पतित हो गया, टाट बाहर कर दिया गया। अगर वह इस दुर्घटना को सफलता के साथ गुप्त रख सका तब तो कोई बात नहीं; उसकों कलंकित करने का किसी का साहस नहीं; लेकिन अभाग्यवश यदि वह इसे छिपा न सका, भंडाफोड़ हो गया तो फिर माता−पिता के लिए, भाई−बंधुओं के लिए संसार में मुंह दिखाने को नहीं रहता। कोई अपमान इससे दुस्सह, कोई विपत्ति इससे भीषण नहीं। किसी भी व्याधि की इससे भयंकर कल्पना नहीं की जा सकती। लुत्फ तो यह है कि जो लोग बेटियों के विवाह की कठिनाइयों को भोगा चुके होते है वहीं अपने बेटों के विवाह के अवसर पर बिलकुल भुल जाते है कि हमें कितनी ठोकरें खानी पड़ी थीं, जरा भी सहानुभूति नही प्रकट करतें, बल्कि कन्या के विवाह में जो तावान उठाया था उसे चक्र−वृद्धि ब्याज के साथ बेटे के विवाह में वसूल करने पर कटिबद्ध हो जाते हैं। कितने ही माता−पिता इसी चिंता में ग्रहण कर लेता है, कोई बूढ़े के गले कन्या का मढ़ कर अपना गला छुड़ाता है, पात्र−कुपात्र के विचार करने का मौका कहां, ठेलमठेल है। मुंशी गुलजारीलाल ऐसे ही हतभागे पिताओं में थे। यों उनकी स्थिति बूरी न थी। दो−ढ़ाई सौ रुपये महीने वकालत से पीट लेते थे, पर खानदानी आदमी थे, उदार ह्रदय, बहुत किफायत करने पर भी माकूल बचत न हो सकती थी। सम्बन्धियों का आदर−सत्कार न करें तो नहीं बनता, मित्रों की खातिरदारी न करें तो नही बनता। फिर ईश्वर के दिये हुए दो पुत्र थे, उनका पालन−पोषण, शिक्षण का भार था, क्या करते ! पहली कन्या का विवाह टेढ़ी खीर हो रहा था। यह आवश्यक था कि विवाह अच्छे घराने में हो, अन्यथा लोग हंसेगे और अच्छे घराने के लिए कम−से−कम पांच हजार का तखमीना था। उधर पुत्री सयानी होती जाती थी। वह अनाज जो लड़के खाते थे, वह भी खाती थी; लेकिन लड़कों को देखो तो जैसे सूखों का रोग लगा हो और लड़की शुक्ल पक्ष का चांद हो रही थी। बहुत दौड़−धूप करने पर बचारे को एक लड़का मिला। बाप आबकारी के विभाग में ४०० रु० का नौकर था, लड़का सुशिक्षित। स्त्री से आकार बोले, लड़का तो मिला और घरबार−एक भी काटने योग्य नहीं; पर कठिनाई यही है कि लड़का कहता है, मैं अपना विवाह न करुंगा। बाप ने समझाया, मैने कितना समझाया, औरों ने समझाया, पर वह टस से मस नहीं होता। कहता है, मै कभी विवाह न करुंगा। समझ में नहीं आता, विवाह से क्यों इतनी घृणा करता है। कोई कारण नहीं बतलाता, बस यही कहता है, मेरी इच्छा। मां बाप का एकलौता लड़का है। उनकी परम इच्छा है कि इसका विवाह हो जाय, पर करें क्या? यों उन्होने फलदान तो रख लिया है पर मुझसे कह दिया है कि लड़का स्वभाव का हठीला है, अगर न मानेगा तो फलदान आपको लौटा दिया जायेगा। स्त्री ने कहा−−तुमने लड़के को एकांत में बुलावकर पूछा नहीं? गुलजारीलाल−−बुलाया था। बैठा रोता रहा, फिर उठकर चला गया। तुमसे क्या कहूं, उसके पैरों पर गिर पड़ा; लेकिन बिना कुछ कहे उठाकर चला गया। स्त्री−−देखो, इस लड़की के पीछे क्या−क्या झेलना पड़ता है? गुलजारीलाल−−कुछ नहीं, आजकल के लौंडे सैलानी होते हैं। अंगरेजी पुस्तकों में पढ़ते है कि विलायत में कितने ही लोग अविवाहित रहना ही पसंद करते है। बस यही सनक सवार हो जाती है कि निर्द्वद्व रहने में ही जीवन की सुख और शांति है। जितनी मुसीबतें है वह सब विवाह ही में है। मैं भी कालेज में था तब सोचा करता था कि अकेला रहूंगा और मजे से सैर−सपाटा करुंगा। स्त्री−−है तो वास्तव में बात यही। विवाह ही तो सारी मुसीबतों की जड़ है। तुमने विवाह न किया होता तो क्यों ये चिंताएं होतीं ? मैं भी क्वांरी रहती तो चैन करती। इसके एक महीना बाद मुंशी गुलजारीलाल के पास वर ने यह पत्र लिखा−− ‘पूज्यवर, सादर प्रणाम। मैं आज बहुत असमंजस में पड़कर यह पत्र लिखने का साहस कर रहा हूं। इस धृष्टता को क्षमा कीजिएगा। आपके जाने के बाद से मेरे पिताजी और माताजी दोनों मुझ पर विवाह करने के लिए नाना प्रकार से दबाव डाल रहे है। माताजी रोती है, पिताजी नाराज होते हैं। वह समझते है कि मैं अपनी जिद के कारण विवाह से भागता हूं। कदाचिता उन्हे यह भी सन्देह हो रहा है कि मेरा चरित्र भ्रष्ट हो गया है। मैं वास्तविक कारण बताते हुए डारता हूं कि इन लोगों को दु:ख होगा और आश्चर्य नहीं कि शोक में उनके प्राणों पर ही बन जाय। इसलिए अब तक मैने जो बात गुप्त रखी थी, वह आज विवश होकर आपसे प्रकट करता हूं और आपसे साग्रह निवेदन करता हूं कि आप इसे गोपनीय समझिएगा और किसी दशा में भी उन लोगों के कानों में इसकी भनक न पड़ने दीजिएगा। जो होना है वह तो होगा है, पहले ही से क्यों उन्हे शोक में डुबाऊं। मुझे ५−६ महीनों से यह अनुभव हो रहा है कि मैं क्षय रोग से ग्रसित हूं। उसके सभी लक्षण प्रकट होते जाते है। डाक्टरों की भी यही राय है। यहां सबसे अनुभवी जो दो डाक्टर हैं, उन दोनों ही से मैने अपनी आरोग्य−परीक्षा करायी और दोनो ही ने स्पष्ट कहा कि तुम्हे सिल है। अगर माता−पिता से यह कह दूं तो वह रो−रो कर मर जायेगें। जब यह निश्चय है कि मैं संसार में थोड़े ही दिनों का मेहमान हूं तो मेरे लिए विवाह की कल्पना करना भी पाप है। संभव है कि मैं विशेष प्रयत्न करके साल दो साल जीवित रहूं, पर वह दशा और भी भयंकर होगी, क्योकि अगर कोई संतान हुई तो वह भी मेरे संस्कार से अकाल मृत्यु पायेगी और कदाचित् स्त्री को भी इसी रोग−राक्षस का भक्ष्य बनना पड़े। मेरे अविवाहित रहने से जो बीतेगी, मुझ पर बीतेगी। विवाहित हो जाने से मेरे साथ और कई जीवों का नाश हो जायगा। इसलिए आपसे मेरी प्रार्थना है कि मुझे इस बन्धन में डालने के लिए आग्रह न कीजिए, अन्यथा आपको पछताना पड़ेगा। सेवक ‘हजारीलाल।’ पत्र पढ़कर गुलजारीलाल ने स्त्री की ओर देखा और बोले−−इस पत्र के विषय में तुम्हारा क्या विचार हैं। स्त्री−−मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि उसने बहाना रचा है। गुलजारीलाल−−बस−बस, ठीक यही मेरा भी विचार है। उसने समझा है कि बीमारी का बहाना कर दूंगा तो आप ही हट जायेंगे। असल में बीमारी कुछ नहीं। मैने तो देखा ही था, चेहरा चमक रहा था। बीमार का मुंह छिपा नहीं रहता। स्त्री−−राम नाम ले के विवाह करो, कोई किसी का भाग्य थोड़े ही पढ़े बैठा है। गुलजारीलाल−−यही तो मै सोच रहा हूं। स्त्री−−न हो किसी डाक्टर से लड़के को दिखाओं । कहीं सचमुच यह बीमारी हो तो बेचारी अम्बा कहीं की न रहे। गुलजारीलाल−तुम भी पागल हो क्या? सब हीले−हवाले हैं। इन छोकरों के दिल का हाल मैं खुब जानता हूं। सोचता होगा अभी सैर−सपाटे कर रहा हूं, विवाह हो जायगा तो यह गुलछर्रे कैसे उड़ेगे! स्त्री−−तो शुभ मुहूर्त देखकर लग्न भिजवाने की तैयारी करो। हजारीलाल बड़े धर्म−सन्देह में था। उसके पैरों में जबरदस्ती विवाह की बेड़ी डाली जा रही थी और वह कुछ न कर सकता था। उसने ससुर का अपना कच्चा चिट्ठा कह सुनाया; मगर किसी ने उसकी बालों पर विश्वास न किया। मां−बाप से अपनी बीमारी का हाल कहने का उसे साहस न होता था। न जाने उनके दिल पर क्या गुजरे, न जाने क्या कर बैठें? कभी सोचता किसी डाक्टर की शहदत लेकर ससूर के पास भेज दूं, मगर फिर ध्यान आता, यदि उन लोगों को उस पर भी विश्वास न आया, तो? आजकल डाक्टरी से सनद ले लेना कौन−सा मुश्किल काम है। सोचेंगे, किसी डाक्टर को कुछ दे दिलाकर लिखा लिया होगा। शादी के लिए तो इतना आग्रह हो रहा था, उधर डाक्टरों ने स्पष्ट कह दिया था कि अगर तुमने शादी की तो तुम्हारा जीवन−सुत्र और भी निर्बल हो जाएगा। महीनों की जगह दिनों में वारा−न्यारा हो जाने की सम्भावाना है। लग्न आ चुकी थी। विवाह की तैयारियां हो रही थीं, मेहमान आते−जाते थे और हजारीलाल घर से भागा−भागा फिरता था। कहां चला जाऊं? विवाह की कल्पना ही से उसके प्राण सूख जाते थे। आह ! उस अबला की क्या गति होगी ? जब उसे यह बात मालूम होगी तो वह मुझे अपने मन में क्या कहेगी? कौन इस पाप का प्रायश्चित करेगा ? नहीं, उस अबला पर घोर अत्याचार न करुंगा, उसे वैधव्य की आग में न जलाऊंगा। मेरी जिन्दगी ही क्या, आज न मरा कल मरुंगा, कल नहीं तो परसों, तो क्यों न आज ही मर जाऊं। आज ही जीवन का और उसके साथ सारी चिंताओं को, सारी विपत्तियों का अन्त कर दूं। पिता जी रोयेंगे, अम्मां प्राण त्याग देंगी; लेकिन एक बालिका का जीवन तो सफल हो जाएगा, मेरे बाद कोई अभागा अनाथ तो न रोयेगा। क्यों न चलकर पिताजी से कह दूं? वह एक−दो दिन दु:खी रहेंगे, अम्मां जी दो−एक रोज शोक से निराहार रह जायेगीं, कोई चिंता नहीं। अगर माता−पिता के इतने कष्ट से एक युवती की प्राण−रक्षा हो जाए तो क्या छोटी बात है? यह सोचकर वह धीरे से उठा और आकर पिता के सामने खड़ा हो गया। रात के दस बज गये थे। बाबू दरबारीलाल चारपाई पर लेटे हुए हुक्का पी रहे थे। आज उन्हे सारा दिन दौड़ते गुजरा था। शामियाना तय किया; बाजे वालों को बयाना दिया; आतिशबाजी, फुलवारी आदि का प्रबन्ध किया। घंटो ब्राहमणों के साथ सिर मारते रहे, इस वक्त जरा कमर सीधी कर रहें थे कि सहसा हजारीलाल को सामने देखकर चौंक पड़ें। उसका उतरा हुआ चेहरा सजल आंखे और कुंठित मुख देखा तो कुछ चिंतित होकर बोले−−क्यों लालू, तबीयत तो अच्छी है न? कुछ उदास मालूम होते हो। हजारीलाल−−मै आपसे कुछ कहना चाहता हूं; पर भय होता है कि कहीं आप अप्रसन्न न हों। दरबारीलाल−−समझ गया, वही पुरानी बात है न ? उसके सिवा कोई दूसरी बात हो शौक से कहो। हजारीलाल−−खेद है कि मैं उसी विषय में कुछ कहना चाहता हूं। दरबारीलाल−−यही कहना चाहता हो न मुझे इस बन्धन में न डालिए, मैं इसके अयोग्य हूं, मै यह भार सह नहीं सकता, बेड़ी मेरी गर्दन को तोड़ देगी, आदि या और कोई नई बात ? हजारीलाल−−जी नहीं नई बात है। मैं आपकी आज्ञा पालन करने के लिए सब प्रकार तैयार हूं; पर एक ऐसी बात है, जिसे मैने अब तक छिपाया था, उसे भी प्रकट कर देना चाहता हूं। इसके बाद आप जो कुछ निश्चय करेंगे उसे मैं शिरोधार्य करुंगा। हजारीलाल ने बड़े विनीत शब्दों में अपना आशय कहा, डाक्टरों की राय भी बयान की और अन्त में बोलें−−ऐसी दशा में मुझे पूरी आशा है कि आप मुझे विवाह करने के लिए बाध्य न करेंगें। दरबारीलाल ने पुत्र के मुख की और गौर से देखा, कहे जर्दी का नाम न था, इस कथन पर विश्वास न आया; पर अपना अविश्वास छिपाने और अपना हार्दिक शोक प्रकट करने के लिए वह कई मिनट तक गहरी चिंता में मग्न रहे। इसके बाद पीड़ित कंठ से बोले−−बेटा, इस इशा में तो विवाह करना और भी आवश्यक है। ईश्वर न करें कि हम वह बुरा दिन देखने के लिए जीते रहे, पर विवाह हो जाने से तुम्हारी कोई निशानी तो रह जाएगी। ईश्वर ने कोई संतान दे दी तो वही हमारे बुढ़ापे की लाठी होगी, उसी का मुंह देखरेख कर दिल को समझायेंगे, जीवन का कुछ आधार तो रहेगा। फिर आगे क्या होगा, यह कौन कह सकता है ? डाक्टर किसी की कर्म−रेखा तो नहीं पढ़ते, ईश्वर की लीला अपरम्पार है, डाक्टर उसे नहीं समझ सकते । तुम निश्चिंत होकर बैठों, हम जो कुछ करते है, करने दो। भगवान चाहेंगे तो सब कल्याण ही होगा। हजारीलाल ने इसका कोई उत्तर नहीं दिया। आंखे डबडबा आयीं, कंठावरोध के कारण मुंह तक न खोल सका। चुपके से आकर अपने कमरे मे लेट रहा। तीन दिन और गुजर गये, पर हजारीलाल कुछ निश्चय न कर सका। विवाह की तैयारियों में रखे जा चुके थे। मंत्रेयी की पूजा हो चूकी थी और द्वार पर बाजों का शोर मचा हुआ था। मुहल्ले के लड़के जमा होकर बाजा सुनते थे और उल्लास से इधर−उधर दौड़ते थे। संध्या हो गयी थी। बरात आज रात की गाड़ी से जाने वाली थी। बरातियों ने अपने वस्त्राभूष्ण पहनने शुरु किये। कोई नाई से बाल बनवाता था और चाहता था कि खत ऐसा साफ हो जाय मानों वहां बाल कभी थे ही नहीं, बुढ़े अपने पके बाल को उखड़वा कर जवान बनने की चेष्टा कर रहे थे। तेल, साबुन, उबटन की लूट मची हुई थी और हजारीलाल बगीचे मे एक वृक्ष के नीचे उदास बैठा हुआ सोच रहा था, क्या करुं? अन्तिम निश्चय की घड़ी सिर पर खड़ी थी। अब एक क्षण भी विल्म्ब करने का मौका न था। अपनी वेदना किससे कहें, कोई सुनने वाला न था। उसने सोचा हमारे माता−पिता कितने अदुरदर्शी है, अपनी उमंग में इन्हे इतना भी नही सूझता कि वधु पर क्या गुजरेगी। वधू के माता−पिता कितने अदूरर्शी है, अपनी उमंग मे भी इतने अन्धे हो रहे है कि देखकर भी नहीं देखते, जान कर नहीं जानते। क्या यह विवाह है? कदापि नहीं। यह तो लड़की का कुएं में डालना है, भाड़ मे झोंकना है, कुंद छुरे से रेतना है। कोई यातना इतनी दुस्सह, कर अपनी पुत्री का वैधव्य् के अग्नि−कुंड में डाल देते है। यह माता−पिता है? कदापि नहीं। यह लड़की के शत्रु है, कसाई है, बधिक हैं, हत्यारे है। क्या इनके लिए कोई दण्ड नहीं ? जो जान−बूझ कर अपनी प्रिय संतान के खुन से अपने हाथ रंगते है, उसके लिए कोई दण्ड नहीं? समाज भी उन्हे दण्ड नहीं देता, कोई कुछ नहीं कहता। हाय ! यह सोचकर हजारीलाल उठा और एक ओर चुपचाप चल दिया। उसके मुख पर तेज छाया हुआ था। उसने आत्म−बलिदान से इस कष्ट का निवारण करने का दृढ़ संकल्प कर लिया था। उसे मृत्यु का लेश−मात्र भी भय न था। वह उस दशा का पहुंच गया था जब सारी आशाएं मृत्यु पर ही अवलम्बित हो जाती है। उस दिन से फिर किसी ने हजारीलाल की सूरत नहीं देखी। मालूम नहीं जमीन खा गई या आसमान। नादियों मे जाल डाले गए, कुओं में बांस पड़ गए, पुलिस में हुलिया गया, समाचार−पत्रों मे विज्ञप्ति निकाली गई, पर कहीं पता न चला । कई हफ्तो के बाद, छावनी रेलवे से एक मील पश्चिम की ओर सड़क पर कुछ हड्डियां मिलीं। लोगो को अनुमान हुआ कि हजारीलाल ने गाड़ी के नीचे दबकर जान दी, पर निश्चित रुप से कुछ न मालुम हुआ। भादों का महीना था और तीज का दिन था। घरों में सफाई हो रही थी। सौभाग्यवती रमणियां सोलहो श्रृंगार किए गंगा−स्नान करने जा रही थीं। अम्बा स्नान करके लौट आयी थी और तुलसी के कच्चे चबूतरे के सामने खड़ी वंदना कर रही थी। पतिगृह में उसे यह पहली ही तीज थी, बड़ी उमंगो से व्रत रखा था। सहसा उसके पति ने अन्दर आ कर उसे सहास नेत्रों से देखा और बोला−−मुंशी दरबारी लाल तुम्हारे कौन होते है, यह उनके यहां से तुम्हारे लिए तीज पठौनी आयी है। अभी डाकिया दे गया है। यह कहकर उसने एक पार्सल चारपाई पर रख दिया। दरबारीलाल का नाम सुनते ही अम्बा की आंखे सजल हो गयीं। वह लपकी हुयी आयी और पार्सल स्मृतियां जीवित हो गयीं, ह्रदय में हजारीलाल के प्रति श्रद्धा का एक उद्−गार−सा उठ पड़ा। आह! यह उसी देवात्मा के आत्मबलिदान का पुनीत फल है कि मुझे यह दिन देखना नसीब हुआ। ईश्वर उन्हे सद्−गति दें। वह आदमी नहीं, देवता थे, जिसने अपने कल्याण के निमित्त अपने प्राण तक समर्पण कर दिए। पति ने पूछा−−दरबारी लाल तुम्हारी चचा हैं। अम्बा−−हां। पति−−इस पत्र में हजारीलाल का नाम लिखा है, यह कौन है? अम्बा−−यह मुंशी दरबारी लाल के बेटे हैं। पति−−तुम्हारे चचरे भाई ? अम्बा−−नहीं, मेरे परम दयालु उद्धारक, जीवनदाता, मुझे अथाह जल में डुबने से बचाने वाले, मुझे सौभाग्य का वरदान देने वाले। पति ने इस भाव कहा मानो कोई भूली हुई बात याद आ गई हो−−आह! मैं समझ गया। वास्तव में वह मनुष्य नहीं देवता थे। *******
- खुदगर्ज़
विनीता तिवारी चुरा हर चीज़ ग़ैरों की वो अक्सर बात करते हैं। कि ये तेरा मेरा इंसान को बर्बाद करते हैं। मुहब्बत ज़िंदगी में ग़र मिले सच्ची तो बेह्तर है। वरना लोग बस मतलब से आँखें चार करते हैं। उठा के लाश काँधों पर वो अपनी जी रहा कब से कहाँ हैं वो, जो जीने का ये ढंग निर्यात करते हैं। कराते मंदिर-ओ-मस्जिद को लेकर आपसी झगड़े ख़ुदा और राम को ये लोग ही बदनाम करते हैं। बड़े झाँसे, बड़े वादे वही कर पाते हैं सबसे जो कुछ करके दिखाने में नहीं विश्वास करते हैं। न जाने कौनसी शालीन दुनिया में रहे हो तुम यहाँ तो हर कदम पर लोग बस कुहराम करते हैं। *****
- इश्क
सुमन मोहिनी ये इश्क एक दरिया है, इसमें जो डूब गया, फिर वो तर नही पाया है। इश्क एक आग भी है, इसमें जो झुलस गया, फिर वो बच नहीं पाया है। है इश्क एक इबादत भी, सजदे में सर इसके जिसने झुकाया है, समझो उसने फिर जन्नत को पाया है। इश्क है एक सुखद एहसास, जिसने इश्क़ किया है, वही समझ इसे पाया है। इश्क एक प्रेरणा है, कितने ही लोगों को तराश कर, हीरा इसने बनाया है। इश्क एक लगाव है, एक दूसरे से इसने कितने ही, प्रेमियों को मिलाया है। इश्क एक बवंडर भी है, तबाह इसने, कितनी ही जिंदगियों को किया है। इश्क एक वरदान भी है, कितनी ही जिंदगियों को, जीवन दान इसने दिया है। इश्क एक अभिशाप भी है, इसने बर्बाद भी कितनी ही, जिंदगियों को किया है। इश्क है एक मृगमरीचिका , जाने कितनों को इसने, राह भटकाया है। चाहे जैसा भी है ये इश्क़, हर रंग रूप में भाया है, इश्क ने गर रुलाया है, तो इश्क़ ने ही हंसाया है, गर इश्क सताता है, तो मनाता भी है। जीवन जीने का आधार ही, सिर्फ और सिर्फ इश्क को पाया है। ***
- आज ही क्यों नहीं?
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव एक बार की बात है कि एक शिष्य अपने गुरु का बहुत आदर-सम्मान किया करता था। गुरु भी अपने इस शिष्य से बहुत स्नेह करते थे। लेकिन वह शिष्य अपने अध्ययन के प्रति आलसी और स्वभाव से दीर्घसूत्री था। सदा स्वाध्याय से दूर भागने की कोशिश करता तथा आज के काम को कल के लिए छोड़ दिया करता था। अब गुरूजी कुछ चिंतित रहने लगे कि कहीं उनका यह शिष्य जीवन-संग्राम में पराजित न हो जाये। आलस्य में व्यक्ति को अकर्मण्य बनाने की पूरी सामर्थ्य होती है। ऐसा व्यक्ति बिना परिश्रम के ही फलोपभोग की कामना करता है। वह शीघ्र निर्णय नहीं ले सकता और यदि ले भी लेता है, तो उसे कार्यान्वित नहीं कर पाता। यहाँ तक कि अपने पारिवारिक दायित्वों के प्रति भी सजग नहीं रहता है और न भाग्य द्वारा प्रदत्त सुअवसरों का लाभ उठाने की कला में ही प्रवीण हो पता है। उन्होंने मन ही मन अपने शिष्य के कल्याण के लिए एक योजना बना ली। एक दिन एक काले पत्थर का एक टुकड़ा उसके हाथ में देते हुए गुरु जी ने कहा –‘मैं तुम्हें यह जादुई पत्थर का टुकड़ा, मात्र दो दिनों के लिए दे कर, नजदीक के एक दूसरे गाँव जा रहा हूँ। तुम जिस भी लोहे की वस्तु को इससे स्पर्श करोगे, वह स्वर्ण में परिवर्तित हो जायेगी। पर याद रहे कि दूसरे दिन ठीक सूर्यास्त के पश्चात मैं इसे तुमसे वापस ले लूँगा।’ शिष्य इस सुअवसर को पाकर बड़ा प्रसन्न हुआ लेकिन आलसी होने के कारण उसने अपना पहला दिन यह कल्पना करते-करते बिता दिया कि जब उसके पास बहुत सारा स्वर्ण होगा तब वह कितना प्रसन्न, सुखी, समृद्ध और संतुष्ट रहेगा, इतने नौकर-चाकर होंगे कि उसे पानी पीने के लिए भी नहीं उठाना पड़ेगा। फिर दूसरे दिन जब वह प्रातःकाल जागा, उसे अच्छी तरह से स्मरण था कि आज स्वर्ण पाने का दूसरा और अंतिम दिन है। उसने मन में पक्का विचार किया कि आज वह गुरूजी द्वारा दिए गये काले पत्थर का लाभ ज़रूर उठाएगा। उसने निश्चय किया कि वो बाज़ार से लोहे के बड़े-बड़े सामान खरीद कर लायेगा और उन्हें स्वर्ण में परिवर्तित कर देगा। दिन बीतता गया, पर वह इसी सोच में बैठा रहा कि अभी तो बहुत समय है, कभी भी बाज़ार जाकर सामान ले आएगा। उसने सोचा कि अब तो दोपहर का भोजन करने के पश्चात ही सामान लेने निकलूंगा। पर भोजन करने के बाद उसे विश्राम करने की आदत थी, और उसने बजाये उठ के मेहनत करने के थोड़ी देर आराम करना उचित समझा। पर आलस्य से परिपूर्ण उसका शरीर नीद की गहराइयों में खो गया, और जब वो उठा तो सूर्यास्त होने को था। अब वह जल्दी-जल्दी बाज़ार की तरफ भागने लगा, पर रास्ते में ही उसे गुरूजी मिल गए उनको देखते ही वह उनके चरणों पर गिरकर, उस जादुई पत्थर को एक दिन और अपने पास रखने के लिए याचना करने लगा लेकिन गुरूजी नहीं माने और उस शिष्य का धनी होने का सपना चूर-चूर हो गया। इस घटना की वजह से शिष्य को एक बहुत बड़ी सीख मिल गयी। उसे अपने आलस्य पर पछतावा होने लगा, वह समझ गया कि आलस्य उसके जीवन के लिए एक अभिशाप है और उसने प्रण किया कि अब वो कभी भी काम से जी नहीं चुराएगा और एक कर्मठ, सजग और सक्रिय व्यक्ति बन कर दिखायेगा। सार - यदि हम सफल, सुखी, भाग्यशाली, धनी अथवा महान बनना चाहते हैं तो आलस्य और दीर्घसूत्रता को त्यागकर, अपने अंदर विवेक, कष्टसाध्य श्रम, और सतत् जागरूकता जैसे गुणों को विकसित करना होगा। ******











