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  • गिद्ध

    श्यामल बिहारी महतो बैंक की सीढ़ियां उतरा ही था कि उन चारों ने सुदामा को घेर लिया था, जमीन पर मरा हुआ जानवर को जैसे गिद्ध घेर लेते हैं। फर्क सिर्फ इतना था। गिदध मरे हुए जानवरों को खाते हैं और ये चारों जिंदा लोगों की बोटी-बोटी नोच कर खाते हैं। सब अपना-अपना महीने भर का हिसाब लिए खडे थे। सबसे जल्दी में दारूवाला था, उसी ने पहले अपना मुंह खोला और बोला-"सुदामा, फटाफट मेरा डेढ़ हजार निकाल, तुम्हारा कमीना साथी करमचंद को भी पकड़ना है, साला फिर कहीं भाग न जाए"। "कल तो बारह सौ ही बताया था।" "और बाद में करमचंदवा के साथ दो बोतल पी गया था, उसका कौन देगा तुम्हारा बेटा। पीने के बाद तुमको होश रहता ही कहां है?" “मैं नहीं, वो करमचंद बोला था-वो देगा…।” “तुम बोला था - तुम दोगे। “और दारूवाले ने सुदामा का कालर पकड़ लिया- “चल जल्दी निकाल…।” सुदामा सहम गया। उसने तत्काल उसे डेढ़ हजार देकर चलता किया तो सूद वाला तन कर सामने खड़ा हो गया- "सुदामा, मेरा भी जल्दी से चुकता कर दो-पांच हजार बनता है।" “पांच हजार कैसे? तीन हजार मूल और एक हजार सूद - चार हजार न हुआ?" "और पिछले महीने समधी के आने पर दो हजार और लिया था उसका मूल और सूद कौन देगा। तुम्हारा बाप?" सुदामा सूद वाला से भी न बच सका। वो पूरे पांच हजार ले चलता बना। मीट और राशन दुकान वाले कब तक पीछे खड़े बगुले की तरह देखते रहते एक साथ दोनों सामने आ गये। "तीन हजार मेरा भी निकाल दो सुदामा भाई‌।" मीट वाला बोला। इस बार सुदामा ने कोई आना कानी नहीं की। चुप चाप तीन हजार दे दिया फिर बोला- "अभी आ रहा हूं। गुरदा-कलेजी रख देना।" "मेरे खाते में छह हजार चार सौ चालीस रूपए है - इस बार पूरा लूंगा।" राशन वाले सेठ ने लाठी ठोकते हुए सा कहा" इस बार डेढ़ हजार कैसे बढ़ गया सेठ जी?" सुदामा कुनमुनाया था। "समधी-समधीन आई थी तब दो दिन उन लोगों को शिकार-भात खिलाया था, भूला गया? तेल-मशाला किस भाव बिकता है मालूम है तुमको?" सेठ का तेवर कम नहीं हुआ-"खाने के समय ठूंस-ठूंस कर खाओगे और देने के समय खीच-खीच पूरा दो नहीं तो आज से उधार बंद।" "सेठ जी चार हजार ले लो- अगले महीने पूरा दे दूंगा।" सुदामा ने मिन्नत किया" बड़ी बेटी को सलवर कुरती खरीद देनी है। काफी पुराना हो गया है,-फटने भी लगा है।” "मुझे कुछ नहीं सुनना है, छः हजार चाहिए तो चाहिए ही, नहीं तो उधार बंद।" सेठ सीधे-सीधे धमकी पर उतर आया था। सेठ को न देने का मतलब घर का राशन पानी बंद। रोने और पैर पकड़ने पर भी सेठ का पत्थर कलेजा पिघलने वाला नहीं था, यह बात सुदामा भली-भांति जानता था। देने में ही भलाई था। चला तो हाथ में मात्र डेढ़ हजार रूपए था। आधा तनख्वाह पहले ही नागा में कट गया था और आधा आदमखोरों ने ले लिया। अब किस मुंह को लेकर घर जाए। बार-बार उसकी आंखों के सामने बड़ी बेटी सरिता का पुराना सलवर कमीज और छाती के बढ़ते आकार घूमने लगा था। देर रात वह घर पहुंचा। बच्चे सो चुके थे और पत्नी जाग रही थी। सालों बाद सुदामा कलेजी-गरदा लिए बगैर घर पहुंचा था। ******

  • ध्यान

    डॉ. प्रदीप उपाध्याय आज फिर वे अलसुबह कॉलोनी के पार्क में आकर बैठ गए थे, रोजाना की ही तरह। उन्हें घुमने की कोई जल्दी भी तो नहीं थी। वैसे भी पार्क में कोई बहुत ज्यादा भीड़ नहीं थी क्योंकि सुबह जल्दी कौन उठता है! 'अलसाये से लोग हैं, नई पीढ़ी कहाँ हेल्थकांशस है।' सूना पार्क देखकर जैसे उन्होंने अपने आप से कहा। लेकिन तत्क्षण ही मन ही मन फिर बुदबुदाए-'पुरानी पीढ़ी के भी तो यही हाल हैं। या तो दिनभर गपशप मारने में लगी रहेगी, इधर-उधर की बुराई-भलाई करने या फिर घर के कामों में खोट निकालने में, बेटे-बहू की बुराई करने में या फिर टीवी से चिपकी रहेगी...बिल्कुल निठल्लों की तरह!' फिर उनके मन के किसी कोने से आवाज आई - 'अरे, बेचारी पुरानी पीढ़ी के लोग करें भी तो क्या करें! घर में किसी के पास उनसे बातचीत करने के लिए समय भी तो नहीं रहता...जिस तरह घर का कबाड़ घर में इधर-उधर पड़ा रहता है, ठीक उसी तरह बुजुर्गों की स्थिति हो गई है, उन पर कहाँ किसी का ध्यान रहता है।' 'लेकिन हमें भी तो सोचना चाहिए कि बच्चे स्वयं इतने व्यस्त रहते हैं कि उनके पास समय कहाँ से होगा! अब मेरे स्वयं के बेटा-बहू अपने काम-धंधे, नौकरी-चाकरी में लगे रहते हैं। जब इनसे फुर्सत पाएं तब तो वे माँ-बाप के पास बात करने बैठ पाएं और फिर जब काम से लौटते हैं तब तक तो उनका तेल निकल चुका होता है। इतने निढाल हो जाते हैं कि बस...जैसे तैसे नौकर-नौकरानियों के हाथों का खाना निगल लें और जाकर बिस्तर पर पड़ जाएं...और वहीं मोबाइल पर ऊंगलियाँ घुमाते-घुमाते नींद के आगोश में समा जाएं।' सामने मैदान में तीन-चार लोग अब घुमने के बाद योगासन और प्राणायाम कर रहे थे, उन पर दृष्टि रखते हुए उन्होंने फिर अपने से ही प्रतिवाद भी किया- 'अरे तो नौकरी या फिर काम-धंधा ये ही लोग कर रहे हैं! हमने तो जैसे नौकरी की ही नहीं झख ही मारी है! क्या हम काम नहीं करते थे? बड़े ही जिम्मेदार ओहदों पर रहे...सरकारी नौकरी करना क्या आसान काम था...वह भी अफसरी! कितना जवाबदारी का काम रहता था लेकिन तब भी बच्चों के लिए समय निकालना, उनकी पढ़ाई-लिखाई पर बराबर ध्यान रखना क्या सहज था! और फिर अम्मा-बाबूजी को कभी उपेक्षित भी तो नहीं छोड़ सकते थे। जब अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद भी उनको बराबर समय दिया, उनसे बातचीत भी करते रहते, उनकी सुख-सुविधा का भी बराबर ध्यान रखते रहे। वे कितना खुश हो जाते थे...उनके चेहरे पर कितना संतोष का भाव आ जाता था।' 'तो क्या तुम्हारे बच्चे तुम्हारा ध्यान नहीं रखते, वे स्वयं से प्रतिप्रश्न कर ही रहे थे कि उनकी विचार श्रृंखला तब भंग हो गई जब पास से गुजरते हुए एक युवती ने उनका अभिवादन किया और गुड मॉर्निंग कहा। उन्होंने भी जवाब में व्हेरी गुड मॉर्निंग कहा और पूछ लिया - 'बेटी, आज अकेले ही!' उनका ध्यान अभी भी बगीचे में योगासन और प्राणायाम की नौटंकी सी करते उन तीन-चार लोगों की तरफ लगा हुआ था। 'हाँ अंकल, आज राहुल साथ में नहीं आए। कल ऑफिस से बहुत देर से लौटे थे।' कहते हुए वह बगीचे के पॉथ-वे पर टहलने निकल गई। वे अभी भी बगीचे में लगी कुर्सी पर ही बैठे हुए थे और आने-जाने वालों पर निगाह रखकर अपना समय काट रहे थे। उस युवती के उत्तर ने उन्हें फिर विचार मग्न कर दिया। उन्होंने उस युवती से तो कुछ नहीं कहा और वैसे भी वह स्वयं भी उनसे आगे बातचीत करने के स्थान पर बिना इस बात की प्रतीक्षा किए कि वे शायद और भी कुछ कहना चाहेंगे, स्वयं ही आगे टहलने के लिए बढ़ गई थी। संभवतः वह जानती थी कि अन्य बड़े-बूढ़ों की तरह ही वे भी कुछ न कुछ लेक्चर ही झाडेंगे। बहरहाल, उनके दिमाग में कई बातें यहां-वहां हो रही थी, उन्होंने मन ही मन कहा भी- 'हो सकता है कि राहुल ने रात को कुछ ज्यादा ही ड्रिंक ले ली होगी, तभी तो सुबह देर तक पलंग तोड़ता पड़ा रहा होगा।' आजकल के बच्चों का क्या है, लापरवाह और गैरजिम्मेदार जो ठहरे! हम भी देर रात तक अपनी ड्यूटी बजाते थे और फिर पार्टियां भी क्या कम होती थीं। हफ्ते में एक-दो दिन ही घर पर डिनर कर पाते थे वरना तो रोजाना ही कहीं न कहीं! वैसे जहां पावर अपने हाथों में हो, वहां लोग अपने आगे-पीछे बने ही रहते हैं। कितना मान-सम्मान और पूछ-परख होती थी। अब हम रिटायर हो गए हैं, गैर तो गैर घरवालों की नजरों में भी बेमतलब के हो गए हैं। किसी को हमसे कोई मतलब ही नहीं। वरना तो एक समय था जब हमारे जलवे थे तब डिनर पार्टियों से लौटने पर लड़खड़ाते कदमों से जब बंगलें में प्रवेश करते थे तब भी किसी को गिला-शिकवा न होता था और अब महीने-पन्द्रह दिन में दो पैग की भी बात करते हैं तो घर सिर पर उठा लिया जाता है। रिटायर्ड आदमी की शायद घर में कोई वैल्यू ही नहीं रह जाती है। पत्नी का भी तो साथ नहीं मिलता है इस उम्र में! अन्यथा तब तो उन्हें भी किटी पार्टी से ही फुर्सत कहां मिलती थी। पार्टी के बाद भी सुबह जागने का हमारा वही क्रम रहता था। घर-परिवार की जिम्मेदारी के साथ अपनी नौकरी में भी तो जवाबदार बने रहे लेकिन आज कोई हमारी सलाह को तवज्जो ही नहीं देता।' 'अरे छोड़ो, वह तो पद-प्रतिष्ठा थी, सुख-सुविधा थी, अफसरी का रौब था और कहीं लूपलाइन में न डाल दिए जाओ, इसके लिए दिन-रात खटते रहते थे।' उनके मन के कोने से आवाज आई। 'नहीं-नहीं, ऐसा नहीं था। हमने स्वाभिमान के साथ नौकरी की। किसी की हिम्मत नहीं पड़ती थी कि कोई कुछ कह सके...घर में भी और बाहर भी।' उन्होंने स्वयं को बखाना। 'हा हा हा, स्वाभिमान, नौकरी में स्वाभिमान! स्वाभिमान की पट्टी तो घर-परिवार और रिश्तेदारों में बहुत पढ़ाते रहे, लेकिन सच बताओ कि क्या उच्चाधिकारियों के सामने अपना स्वाभिमान बनाए रख पाते थे! और फिर जिन्हें तुम टटपुँजिया नेता-पत्रकार कहते थे, वे ही तुम्हें तुम्हारी औकात दिखा जाते थे और तुम केवल मन मसोसकर रह जाते थे, तब का क्या! और हाँ, जब कुछ जरूरी और समयावधि के काम पूरे करना होते थे तब भी मातहतों की खुशामद करने में तुम कहाँ पीछे रहे। यह बात जरूर है कि बाद में आँख दिखाने और आँख फेर लेने में भी तुमसा कोई दूसरा नहीं रहा होगा।' 'चुप रहो, क्या फिजूल की बात लेकर बैठ गए। नौकरी-चाकरी में तो यह सब करना ही पड़ता है। साम, दाम, दंड, भेद की नीति अगर नहीं अपनाएं तो जीवन में कभी सफल हो ही नहीं सकते।' कहकर उन्होंने अपने मन को तसल्ली देनी चाही। इतनी देर में भीतर के अन्तर्द्वन्द्व से वे अब बहुत ज्यादा आहत हो चुके थे और अभी जल्दी घर लौटना भी नहीं चाह रहे थे। खुले आकाश में उड़ते पंछी का कतरे पंखों के साथ जिंदगी जीना क्या होता है, अब उन्हें समझ में आने लगा था। अतः पॉथ-वे पर बड़ी देर से टहल रहे दो-तीन अपने सम वय वृद्धों की तरह ही वे भी कदमों को लगभग घसीटते हुए चल पड़े लेकिन उनके दिमाग में फिर वही प्रश्न कुदबुदाने लगा जो उनके अन्तर्मन से चिल्ला-चिल्लाकर पूछ रहा था कि 'क्या तुम्हारे बच्चे भी तुम्हारा ध्यान नहीं रखते?' *********

  • जिम्मेदारी

    घर पर खुशियों का माहौल था। सभी ओर से बधाई मिल रही थी। रमेश और सुरेश ने अपनी माँ आरती देवी का नाम रोशन कर दिया था। उनकी सफलता का श्रेय उनकी माँ को जाता था। सब कुछ ठीक चल रहा था। बच्चे अपनी सफलता पर बेहद खुश थे। प्रतिदिन माँ के चरण छूकर अपने काम शुरू करते थे। आरती भी खुद को धन्य समझती थी। बिना पिता के बच्चे का पालन-पोषण करना कौन सा आसान काम था? वह अपने मालिक जय सिंह का धन्यवाद करती नहीं थकती थी। जय सिंह बड़े आदमी थे। उनका भरा-पूरा परिवार था। सुंदर पत्नी, बाल-बच्चे। वह कई कारखानों के मालिक थे। वह कमजोर तथा गरीबों की सहायता के लिए हमेशा तैयार रहते थे। आरती का पति भी इनके कारखाने में काम करता था। उसने कभी पति का सुख नहीं देखा था। अपने घर पर भी घोर गरीबी देखी थी और पति का हाल तो और भी बुरा था। उस पर वह एक नंबर शराबी, जुआरी था। वह पीड़ा से भर जाती थी। जब भी सुख की बात सोचती तो पति के हाथों पिटाई खाती। वह उसे बुरी तरह लताड़ता था। अपशब्दों से उसका सीना चीर कर रख देता था। उसे चरित्रहीन कहने से भी परहेज नहीं करता था। वह रो-रोकर बुरा हाल कर लेती थी। पर बच्चों के लिए सब कुछ सह लेती थी। आज शाम से घर पर दोनों भाई भरे बैठे थे। वह माँ का इंतजार कर रहे थे। जब से वह दफ्तर से वापस आए थे। माँ के आते ही वह उन पर बरस पड़े। माँ बड़ी परेशान थी। आज ना कोई दुआ-सलाम, ना कोई चरण-स्पर्श। आखिर ऐसा क्या हो गया मेरे बच्चे को? क्या हुआ बेटा? तुम ही बता दो। आज तुम अपनी माँ से इतना कड़वा क्यों बोल रहे हो? क्या इसलिए मैंने तुम्हें पढ़ाया-लिखाया था? क्या मैंने रात-दिन इसलिए मेहनत की थीं? यही दिन देखना बाकी रह गया था। रमेश गुस्से से चिल्लाया आपको माँ कहते हुए भी मुझें शर्म आ रही हैं। सुरेश भी कह रहा था, आपके कारण हमारा सिर सबके सामने शर्म से झुक गया है। लोग हमारी सफलता का श्रेय हमें ना देकर जयसिंह को दे रहे हैं। हम अपनी जुबान से उसका नाम भी नहीं लेना चाहते। तुम जयसिंह की रखैल हो। सभी हमें यही ताना मार रहे हैं। रखैल, तुम्हें शर्म नहीं आई माँ। इतना घटिया काम करते हुए। तुमने आज हमें जीते जी मार दिया है। हमारा मन कर रहा है हम नदी में कूद कर अपनी जान दे दें। फिर तुम अपनी मनमर्जी करती रहना। ना तुम्हें कोई टोकने वाला होगा। जितना जी चाहे रंगरलियाँ मनाती रहना। अपने यार जयसिंह के साथ। बच्चों के व्यंग्य-बाण ने आरती को तोड़ कर रख दिया था। काटो तो खून नहीं, उसे ऐसा महसूस हो रहा था। जैसे वह कुछ बोल नहीं सकती थी। उसकी आँखें रो रही थीं। वह चुपचाप उठकर घर से बाहर निकल गई। बच्चों ने उसे रोकने का कोई प्रयास नहीं किया। आरती आज खुद को बहुत जलील महसूस कर रही थी। वह नदी की तरफ बढ़ती जा रही थी। वह आज अपनी जीवन-लीला समाप्त कर देना चाहती थी। मन ही मन अतीत की यादें उसे तडपा रही थीं। वह खुद से कह रही थी आज जीवन समाप्त करने का क्या फायदा? उस दिन जीवन खत्म करती। जब इनका बाप भी तुम्हें चरित्रहीन कहा करता था। रोज ताने मारता था। मैंने अपना पूरा जीवन लगा दिया इनकी परवरिश करने में। वह मन ही मन कह रही थीं। हाँ, मैं हूँ चरित्रहीन। पर क्यों बनी मैं चरित्रहीन? इनके लिए, जब इनके पिता मुझें बीच में ही छोड़ कर चले गए थे। सिर्फ चार-पाँच साल के थे ये दोनों। कोई रोजगार नहीं था। कैसे पालती इन्हें, कोई सहारा देने को तैयार नहीं था? जब भी किसी से मदद की आशा करती तो बदले में सभी मेरी देह चाहते थे। उनकी भूखी नजरें मुझे नोंच डालना चाहती थीं। दुकान वाले बनिए ने तो लगभग मेरी इज्जत तार-तार कर ही दी थी उस दिन। सिर्फ दो किलो आटे के बदले में, यही मूल्य था मेरी इज्जत का, मेरी देह का। बड़ी मुश्किल से भागी थी बनिए से बचकर, फटे कपड़ों में अपने तन को छुपाती हुई रात के अंधेरे में किसी तरह घर पर पहुंची थी। मकान मालिक ने कह दिया था कि 'सुबह घर खाली कर देना।' उन्हें भी मेरी हालत पर दया नहीं आई थी। सभी को मेरा ही कसूर लग रहा था। शायद उस दिन पहली बार मुझ पर धब्बा लगा था चरित्रहीन होने का। कितने सवाल उठे थे मेरे मन में क्या मैं सचमुच चरित्रहीन हूँ? क्या किया था मैंने? मैं खुद को बचा लाई थी उसी पापी हाथों से, यही मेरा अपराध था। पर मैंने मुँह नहीं छिपाया था इस समाज से। बस मुझे तो एक ही बात पता थी मेरे बच्चे भूखे-प्यासे बैठे हैं। माँ हूँ ना, माँ की पीड़ा एक माँ ही समझ सकती है। पुरुष तो हमेशा ही औरतों को भोग की वस्तु समझते हैं। इससे ज्यादा उसका कोई मोल नहीं है, पुरुष की नजर में। वह नदी की तरफ दौड़ी जा रही थी। उसे आज भी वह दिन याद आ रहा था। जब जयसिंह सेठ के घर का काम मांगने गई तो उन्होंने मेरा बड़ा आदर-सम्मान किया था। इतना अपनापन दिखाया था कि अंदर ही अंदर मैं खुद को सम्मानित महसूस कर रही थी। पर कहीं ना कहीं एक डर था कि वह इस मान-सम्मान की आड़ में.... फिर खुद को धिक्कार दिया था मैंने। मैं मालिक के घर का काम बड़ी लगन से करती रहती थी। कभी शिकायत का मौका नहीं देती थी। उनका भी प्यार भरा हाथ मेरे सिर पर सदा रहता था। मुझे बहुत दुलार करते थे। क्या सभी बड़े आदमी इतनी आत्मीयता से भरे होते हैं? मैं खुद से सवाल करती थी। उस दिन रक्षाबंधन का त्यौहार था। सेठ जी की तीनों बहनें उन्हें बड़े प्यार से राखी बांध रही थीं। मैं घर के कामकाज में व्यस्त थी। पर फिर भी कनखियों से सेठ जी को निहार रही थी। मैं मन ही मन कह रही थी। ऐसा भाई तो सभी को मिले। कितनी भाग्यवान हैं सेठ जी की बहनें? पता नहीं सेठ जी ने मेरे मन की बात कब पढ़ ली? सेठ जी ने एक थाली और मंगवाई। उसमें रोली, अक्षत, मिठाई, एक सुंदर सी राखी रखी थी। सेठ जी ने अपनी पत्नी से कहा, मेरी छोटी बहन आरती देवी को बुलाओ। मैं अपना नाम सुनकर हैरान थी। छोटी बहन, तभी सेठ जी की पत्नी ने मुझसे कहा। अब चलो भी ननद जी। मुझे यकीन नहीं हो रहा था। सेठ जी ने अपना हाथ मेरी तरफ बढ़ाया दिया था। इशारे से कहा जल्दी करो बांध लो अपने भाई को प्यार के बंधन में। मैंने राखी उनके हाथों में सजा दी। मैं फूली नहीं समा रही थी खुशी के मारे। सेठ जी ने मुझे गले लगा लिया। अपनी बहनों के साथ मुझे भी कहा आज कुछ भी मांग लो अपने भाई से। मैं इतना ही कह सकी थी। मेरे बच्चे, सेठ जी ने कहा इनके पढ़ाने-लिखाने की जिम्मेदारी मेरी। जब तक वह तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं संभाल लेते। भाई ने तो अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी थी। पर रमेश, सुरेश समाज के बहकावे में आ गये। वह रो रही थी कोई भी उसके आँसू पोछने वाला नहीं था। आज भी रक्षाबंधन का त्यौहार था। सुबह से जयसिंह आरती का इंतजार कर रहे थे। जब दोपहर तक भी वह नहीं आई तो वह खुद ही चल पड़े, आरती के घर पर। अपनी प्यारी बहन से राखी बँधवाने के लिए। पर घर में तो मातम पसरा पड़ा था। आरती-आरती को आवाज देने से भी जब कोई जवाब नहीं मिला तो सेठ जी अंदर ही चले गए। उन्होंने बच्चों से सीधा एक ही सवाल किया, कहाँ हैं मेरी छोटी बहन आरती? जल्दी बुलाओ उसे, जब तक वह मुझे राखी नहीं बांधेगी। हम कुछ नहीं खाएंगे। इस प्रण को आरती भी निभा रही है, इतने सालों से। यह सुनकर रमेश और सुरेश के पैरों तले से जमीन खिसक गई। आप हमारी माँ को अपनी बहन मानते हैं। हाँ, बेटा वह पिछले बीस वर्षो से मुझे राखी बांध रही है। वह मेरी सबसे प्यारी बहन है। जो हमेशा मेरे पास रहती है। यह सुनते ही रमेश और सुरेश फफक-फफक कर रोने लगे। उन्होंने सारी बात सेठ जी को बता दी। सेठ जी तमतमा उठे। क्या खूब जिम्मेदारी निभाई है तुमने? तुम्हें शर्म नहीं आई। सभी आरती को ढूंढने निकले पड़े। आरती को नदी किनारे देखकर सेठ जी ने उसे गले लगा लिया। मेरी बहन तुमने यह कैसे सोच लिया कि मेरी जिम्मेदारी खत्म हो गई है? चलो मेरे साथ, दोनों बच्चे सेठ जी के पांव पकड़कर क्षमा याचना करते रहे। पर आरती नहीं रुकी। उसने इतना ही कहा तुम अपनी जिम्मेदारी संभालो, मैं अपनी जिम्मेदारी। रमेश और सुरेश खुद को अपराधी महसूस कर रहे थे कि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह क्यों नहीं किया? समाप्त ********

  • परिंदे की जात

    सूर्य देव मिश्रा लाल्टू ने घर को आखरी बार निहारा। घर जैसे उसके सीने में किसी कील की तरह धँस गया था। उसने बहुत कोशिश की लेकिन, कील टस से मस न हुई। उसने सामने खुले मैदान में नजर दौड़ाई। सामने बड़े-बड़े पहाड़ खूबसूरत वादियाँ। कौन इस जन्नत को छोड़ कर जाने की बात भी सोचता है। लेकिन वो अपने बूढ़े बाप और अपने बच्चों का चेहरा याद करता है। तो ये घाटी अब उसे मुर्दों का टीला ही जान पड़ती है। इधर घाटी में जबसे मजदूरों पर हमले बढ़ें हैं। उसके पिताजी और उसके बच्चों का हमेशा फोन आता रहता है। कि कहीं कुछ... । उसके बूढ़े पिता कोई बुरी घटना घाटी के बारे में सुनतें नहीं कि उसका मोबाइल घनघना उठता है। चिंता की लकीरें लाल्टू के चेहरे पर और घनी हो जातीं हैं। बूढ़ा असगर जाने कबसे आकर लाल्टू के बगल में खड़ा हो गया था। उसकी नजर अचानक बूढ़े असगर पर पड़ी। लाल्टू झेंपता हुआ बोला - "अरे चचा आईये बैठिये..l" "तुमने, तो जाने का इरादा कर ही लिया है। तो मैं क्या कहूँ..? लो यह पश्मीना साल है। रास्ते में ठंढ़ लगेगी तो ओढ़ लेना।" असगर चचा ने तह किये हुए साल को पन्नी से निकाला और लाल्टू के कंधे पर डाल दिया। इस अपनत्व की गर्मी के रेशे ने एक बार फिर, से लाल्टू की आँखें नम कर दीं। असगर चचा ने धीरे से उसके कँधे दबाये और हाथ से उसके कँधे को बहुत देर तक सहलाते रहें। असगर चचा को कहीं ये एहसास हुआ कि ज्यादा देर तक वो इस तरह रहें। तो उनकी भी आँखें भीगनें लगेंगी। उन्होनें विषयांतर किया, और बोले- "चाय पियोगे?" लाल्टू ने हाँ में सिर हिलायाl बूढ़े असगर ने नदीम को आवाज़ लगाई - "नदीम जरा दो कप चाय दे जाना। थोड़ी देर में नदीम दो प्यालों में गर्मा-गर्म चाय लेकर आ गया।" चाय पीते हुए बूढ़ा असगर बोला - "ठीक, है अब तुम भी क्या कर सकते हो? जब यहाँ लोग ड़र के साये में जीने को मजबूर हैं। वहाँ तुम्हारे वालिद और बच्चे परेशान हैं। यहाँ क्या है? फुचके अब ना बिकेंगे। तो चाय बेचने लगूँगा। आखिर कहीं भी रहकर कमाया खाया जा सकता है। तुम जहाँ रहो खुश रहो। अपने वालिद और अपने बच्चों को देखो। जमाना बहुत खराब आ गया। पहले लोग इंसानियत और कौम के लिए जान दे देतें थें। लेकिन, अब इन नालायकों को जेहाद और आतंकवाद के अलावा कुछ नहीं सूझता। जेहाद बुराई को खत्म करने के लिए किया जाता है। बुरा बनने के लिए नहीं। इस्लाम में कहीं नहीं लिखा है कि बेगुनाहों, और मजलूमों को कत्ल करो। ये सब वही लड़कें हैं। जिन्हें धर्म के नाम पर उकसाया जाता है। और सीमापार बैठे हुक्मरान इनसे खेलतें हैं।" बहुत देर से चुप बैठा नदीम भी आखिरकार चुप ना रह सका। बोला - "तमिलनाडु में एक कंपनी ने तो एक ऐसा विज्ञापन निकाला है। जिसमें लिखा है कि वो नौकरियाँ केवल हिंदुओं को देगा। मुसलमानों को नहीं। आखिर जो हो रहा है। एकतरफा तो नहीं हो रहा है ना।" अचानक से चचा के शब्दों में अफसोस उतर आया। वो नदीम को घूरते हुए बोले - "आज सालों पहले लाल्टू यहाँ आया था। और पता नहीं कितने मजदूर यहाँ काम की तलाश में आयें होंगे। ये देश जैसे तुम्हारा है वैसे लाल्टू का भी है। कोई भी कहीं भी देश के किसी भी हिस्से में जाकर मजदूरी कर सकता है। कमाने-खाने का हक सबको है। लाल्टू आज भी मुझे अपने वालिद की तरह ही मानता है। गोलगप्पे मैं बेलता हूँ। छानता वो है। रेंड़ी मैं लगता हूँ। रेंड़ी धकेलता वो है। मैंने कभी तुममें और लाल्टू में अंतर नहीं किया। बेचारा हर महीने जो कमाता है। अपने घर भेज देता है। साल -छह महीने में वो कभी घर जाता है। तो अपने बूढ़े बाप और बाल बच्चों से मिलने। मेरा खुदा गवाह है कि मैंने कभी इसे दूसरी किसी नजर से देखा हो। इस ढंग की हरकतें सियासदाँ करें। उनको शोभा देता होगा। हम तो इंसान हैं ऐसी गंदी हरकतें हमें शोभा नहीं देतीं। हम तो मिट्टी के लोग हैं। और हमारी जरूरतें रोटी पर आकर सिमट जाती है। रोटी के आगे हम सोच ही नहीं पाते। हिंदू-मुसलमान भरे पेट वालों लोगों के लिए होता है। खाली पेट वाले रोटी के पीछे दौड़ते हुए अपनी उम्र गँवा देतें हैं। इसलिए नदीम दुनियाँ में आये हो तो हमेशा नेकी करने की सोच रखो। बदी से कुछ नहीं मिलता बेटा। बेकार की अफवाहों पर ध्यान मत दो बेटा। इस तरह की अफवाहों पर कान देने से अपना ही नुकसान है, नदीम। ऐसी अफवाहें घरों में रौशनी नहीं करतीं। ना ही शाँति के लिये कँदीलें जलातीं हैं। बल्कि पूरे घर को आग लगा देतीं हैं। मैं उन नौजवानों से भी कहना चाहता हूँ। जो इस तरह के कत्लो-गारत में यकीन रखतें हैं। बेटा उनका कुछ नहीं जायेगा। लेकिन तबतक हमारा सबकुछ जल जायेगा।" बाहर की खिली हुई धूप में कुछ कबूतर उतर आयें थें। बूढ़ा असगर गेंहूँ के कुछ दाने कोठरी से निकाल लाया। और, उनकी तरफ फेंकनें लगा। ढ़ेर सारे कबूतर वहाँ दाना चुगने लगें। बूढ़ा असगर, उनकी ओर ऊँगली दिखाते हुए लाल्टू और नदीम से बोला - "देखो ये हमसे बहुत बेहतर हैं। अलग-अलग रंगों के होने के बावजूद ये एक साथ बैठकर दाना चुग रहें हैं। ये बहुत बुद्धिमान नहीं हैं। फिर, भी ये आपस में कभी नहीं लड़तें। लेकिन, आदमी इतना बुद्धिमान होने के बावजूद भी जातियों और मजहबों में बँटा हुआ है। इन कबूतरों से आदमी को बहुत सीखने की जरूरत है।" लाल्टू ने नजर दौड़ाई दोपहर धीरे-धीरे सुरमई शाम में तब्दील होने लगी थी। उसने एक बार रेंड़ी को छुआ। फिर, उन बर्तनों पर सरसरी निगाह दौड़ाई। बिस्तर को निहारा। ये सब वो आखिरी बार निहारा रहा था। पिछले दस-बारह सालों से वो कश्मीर के इस हिस्से में रेंड़ी लगाता आ रहा था। सब छूटा जा रहा था। उसकी बस किनारे आकर लगी। लाल्टू चलने को हुआ। बूढ़ा असगर दौड़कर बस तक आया। उसने लाल्टू को सीने से लगा लिया। लाल्टू और बूढ़ा दोनों रोने लगे। बूढ़ा असगर बोला - "अपना ख्याल रखना! कभी हमारी याद आये और हालात ठीक हो जायें तो चले आना।" "आप भी अपना ख्याल रखना बाबा।" झेंपता हुए वो बस की सीट पर बैठ गया। उसने बैग से पश्मीना शाल निकाला और ओढ़ लिया। सुरमई शाम धीरे-धीरे रात में बदल गई। *******

  • मौन अखरता है।

    आलोकेश्वर चबडाल अखरता है शब्दकोश के शब्दों के यह, कान कतरता है, मौन अखरता है प्रिय तेरा, मौन अखरता है! निर्मम निर्दय निष्ठुर नीरस जो चाहे तू कह ले, मेरी नदिया तू बस मुझमें मंथर मंथर बह ले, तेरे रुक जाने से मेरा, प्राण ठहरता है, मौन अखरता है प्रिय तेरा, मौन अखरता है! मुख पर अंगुली धरे हुए हैं चूड़ी कंगन पायल, पलकों के घर चुप बैठे हैं मन के काले काजल, देखा देखी झुमका देखो, पेंग न भरता है, मौन अखरता है प्रिय तेरा, मौन अखरता है! जूही चम्पा और चमेली बोल रहीं हैं कब से, विद्रोही ये तेवर तेरे तोल रहीं हैं कबसे, अधिक क्रोध से बना बनाया, बाग बिखरता है, मौन अखरता है प्रिय तेरा, मौन अखरता है! आती जाती गंध छुआती अच्छी लगती है, गीत गजल तू छंद चुआती अच्छी लगती है, सुन कस्तूरी खोकर अपनी, कौन निखरता है मौन अखरता है प्रिय तेरा, मौन अखरता है! पुष्प वाटिका है तू मेरी प्रीत घटी है तुझसे, तुझसे मेरी अवधपुरी है पंचवटी है तुझसे, बता जरा कब राम सिया बिन, पार उतरता है मौन अखरता है प्रिय तेरा, मौन अखरता है!!! ******

  • घर की याद

    भवानीप्रसाद मिश्र आज पानी गिर रहा है, बहुत पानी गिर रहा है, रात-भर गिरता रहा है, प्राण मन घिरता रहा है, अब सवेरा हो गया है, कब सवेरा हो गया है, ठीक से मैंने न जाना, बहुत सोकर सिर्फ़ माना— क्योंकि बादल की अँधेरी, है अभी तक भी घनेरी, अभी तक चुपचाप है सब, रातवाली छाप है सब, गिर रहा पानी झरा-झर, हिल रहे पत्ते हरा-हर, बह रही है हवा सर-सर, काँपते हैं प्राण थर-थर, बहुत पानी गिर रहा है, घर नज़र में तिर रहा है, घर कि मुझसे दूर है जो, घर ख़ुशी का पूर है जो, घर कि घर में चार भाई, मायके में बहिन आई, बहिन आई बाप के घर, हायर रे परिताप के घर! आज का दिन दिन नहीं है, क्योंकि इसका छिन नहीं है, एक छिन सौ बरस है रे, हाय कैसा तरस है रे, घर कि घर में सब जुड़े हैं, सब कि इतने तब जुड़े हैं, चार भाई चार बहिनें, भुजा भाई प्यार बहिनें, और माँ बिन-पढ़ी मेरी, दुःख में वह गढ़ी मेरी, माँ कि जिसकी गोद में सिर, रख लिया तो दुख नहीं फिर, माँ कि जिसकी स्नेह-धारा का यहाँ तक भी पसारा, उसे लिखना नहीं आता, जो कि उसका पत्र पाता। और पानी गिर रहा है, घर चतुर्दिक् घिर रहा है, पिताजी भोले बहादुर, वज्र-भुज नवनीत-सा उर, पिताजी जिनको बुढ़ापा, एक क्षण भी नहीं व्यापा, जो अभी दौड़ जाएँ, जो अभी भी खिल-खिलाएँ, मौत के आगे न हिचकें, शेर के आगे न बिचकें, बोल में बादल गरजता, काम में झंझा लरजता, आज गीता पाठ करके, दंड दो सौ साठ करके, ख़ूब मुगदर हिला लेकर, मूठ उनकी मिला लेकर, जब कि नीचे आए होंगे नैन जल से छाए होंगे, हाय, पानी गिर रहा है, घर नज़र में तिर रहा है, चार भाई चार बहिनें, भुजा भाई प्यार बहिनें, खेलते या खड़े होंगे, नज़र उनकी पड़े होंगे। पिताजी जिनको बुढ़ापा, एक क्षण भी नहीं व्यापा, रो पड़े होंगे बराबर, पाँचवें का नाम लेकर, पाँचवाँ मैं हूँ अभागा, जिसे सोने पर सुहागा, पिताजी कहते रहे हैं, प्यार में बहते रहे हैं, आज उनके स्वर्ण बेटे, लगे होंगे उन्हें हेटे, क्योंकि मैं उन पर सुहागा बँधा बैठा हूँ अभागा, और माँ ने कहा होगा, दुःख कितना बहा होगा आँख में किस लिए पानी, वहाँ अच्छा है भवानी, वह तुम्हारा मन समझ कर, और अपनापन समझ कर, गया है सो ठीक ही है, यह तुम्हारी लीक ही है, पाँव जो पीछे हटाता, कोख को मेरी लजाता, इस तरह होओ न कच्चे, रो पड़ेगे और बच्चे, पिताजी ने कहा होगा, हाय कितना सहा होगा, कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ, धीर मैं खोता, कहाँ हूँ, गिर रहा है आज पानी, याद आता है भवानी, उसे थी बरसात प्यारी, रात-दिन की झड़ी झारी, खुले सिर नंगे बदन वह, घूमता फिरता मगन वह, बड़े बाड़े में कि जाता, बीज लौकी का लगाता, तुझे बतलाता कि बेला ने फलानी फूल झेला, तू कि उसके साथ जाती, आज इससे याद आती, मैं न रोऊँगा,—कहा होगा, और फिर पानी बहा होगा, दृश्य उसके बाद का रे, पाँचवे की याद का रे, भाई पागल, बहिन पागल, और अम्मा ठीक बादल, और भौजी और सरला,, सहज पानी, सहज तरला, शर्म से रो भी न पाएँ, ख़ूब भीतर छटपटाएँ, आज ऐसा कुछ हुआ होगा, आज सबका मन चुआ होगा। अभी पानी थम गया है, मन निहायत नम गया है, एक-से बादल जमे हैं, गगन-भर फैले रमे हैं, ढेर है उनका, न फाँकें, जो कि किरने झुकें-झाँकें, लग रहे हैं वे मुझे यों, माँ कि आँगन लीप दे ज्यों, गगन-आँगन की लुनाई, दिशा के मन से समाई, दश-दिशा चुपचार है रे, स्वस्थ की छाप है रे, झाड़ आँखें बंद करके, साँस सुस्थिर मंद करके, हिले बिन चुपके खड़े हैं, क्षितिज पर जैसे जड़े हैं, एक पंछी बोलता है, घाव उर के खोलता है, आदमी के उर बिचारे, किस लिए इतनी तृषा रे, तू ज़रा-सा दुःख कितना, सह सकेगा क्या कि इतना, और इस पर बस नहीं है, बस बिना कुछ रस नहीं है, हवा आई उड़ चला तू, लहर आई मुड़ चला तू, लगा झटका टूट बैठा, गिरा नीचे फूट बैठा, तू कि प्रिय से दूर होकर, बह चला रे पूर होकर दुःख भर क्या पास तेरे, अश्रु सिंचित हास तेरे! पिताजी का वेश मुझको, दे रहा है क्लेश मुझको, देह एक पहाड़ जैसे, मन कि बड़ का झाड़ जैसे एक पत्ता टूट जाए, बस कि धारा फूट जाए, एक हल्की चोट लग ले, दूध की नद्दी उमग ले, एक टहनी कम न होले, कम कहाँ कि ख़म न होले, ध्यान कितना फ़िक्र कितनी, डाल जितनी जड़ें उतनी! इस तरह का हाल उनका, इस तरह का ख़याल उनका, हवा, उनको धीर देना, यह नहीं जी चीर देना, हे सजीले हरे सावन, हे कि मेरे पुण्य पावन, तुम बरस लो वे न बरसें, पाँचवें को वे न तरसें, मैं मज़े में हूँ सही है, घर नहीं हूँ बस यही है, किंतु यह बस बड़ा बस है, इसी बस से सब विरस है, किंतु उससे यह न कहना, उन्हें देते धीर रहना, उन्हें कहना लिख रहा हूँ, मत करो कुछ शोक कहना, और कहना मस्त हूँ मैं, कातने में व्यस्त हूँ मैं, वज़न सत्तर सेर मेरा, और भोजन ढेर मेरा, कूदता हूँ, खेलता हूँ, दुःख डट कर ठेलता हूँ, और कहना मस्त हूँ मैं, यों न कहना अस्त हूँ मैं, हाय रे, ऐसा न कहना, है कि जो वैसा न कहना, कह न देना जागता हूँ, आदमी से भागता हूँ, कह न देना मौन हूँ मैं, ख़ुद न समझूँ कौन हूँ मैं, देखना कुछ बक न देना, उन्हें कोई शक न देना, हे सजीले हरे सावन, हे कि मेरे पुण्य पावन, तुम बरस लो वे न बरसें, पाँचवें को वे न तरसें। ******

  • विवेकानंद का जन्म

    मुकेश ‘नादान’ इस संसार में समय-समय पर अनेक महापुरुषों ने जन्म लिया। इन महापुरुषों में स्वामी विवेकानंद का नाम अग्रिम पंक्ति में लिया जाता है। अपने अनेक सामाजिक कार्यों एवं शिक्षा के क्षेत्र में अद्वितीय योगदान के कारण आज स्वामी विवेकानंद संपूर्ण विश्व में उच्च स्थान रखते हैं। 12 जनवरी, 1863 को प्रातःकाल में इस महापुरूष ने भारत की पावन धरती पर जन्म लिया। इस समय भारत में ब्रिटिश शासकों की हुकूमत थी और यहाँ के निवासी उनकी गुलामी के लिए मजबूर थे। कलकत्ता (वर्तमान में कोलकाता) में कायस्थ वंश के दत्त परिवारों में इनका परिवार अत्यंत समृद्ध था। इनके परदादा श्री राममोहन दत्त कलकत्ता हाई कोर्ट के प्रसिदृध वकील थे। श्री राममोहन के इकलौते पुत्र दुर्गाचरण भी अच्छे वकील थे, किंतु दुर्गाचरण धनलोलुप न होकर धर्मानुरागी थे। उन्होंने केवल पच्चीस वर्ष की आयु में संन्यास लेकर घर का त्याग कर दिया था, तब उनकी पत्नी की गोद में उनके एकमात्र पुत्र विश्वनाथ थे। उन्होंने भी वयस्क होकर वकालत का पैतृक धंधा अपनाया, लेकिन पारिवारिक परंपरा के अनुसार शात्र-चर्चा तथा अध्ययन के प्रति उनका विशेष अनुराग था। इन्हीं विश्वनाथ की पत्नी भुवनेश्वरी देवी ने स्वामी विवेकानंद जैसे महान्‌ पुत्र को जन्म दिया। इनके बचपन का नाम नरेंद्रनाथ था, किंतु इनकी माँ इन्हें 'वीरेश्वर' कहकर बुलाती थीं। नरेंद्र के जन्म से पूर्व भुवनेश्वरी देवी ने दो पुत्रियों को जन्म दिया था। बेटे का मुँह देखने की उनके मन में बहुत अभिलाषा थी। पुत्र-कामना से वे एक दिन इतनी ध्यानमग्न हुई कि उन्होंने साक्षात्‌ महादेव के दर्शन किए। उन्होंने देखा, भगवान्‌ शिव शिशु के रूप में उनकी गोद में आ बैठे हैं। स्वामी विवेकानंद के पैदा होने पर उन्हें यह विश्वास हो गया कि उनका बेटा शिव की कृपा से ही हुआ है। घर-परिवार में स्वामीजी को 'विले' नाम से पुकारा जाता था। नरेंद्र के बाद उनके दो भाई तथा दो बहनें और हुए। भुवनेश्वरी देवी एक धर्मपरायण महिला थीं, जबकि विश्वनाथ दत्त में धार्मिक कट्‌टरता लेशमात्र भी नहीं थी। नरेंद्र का स्वभाव भी ऐसा ही था। नरेंद्र बचपन से ही घर में होनेवाले लोकाचार तथा देशाचार के नियमों को नहीं मानते थे। इस कारण उन्हें माँ की बहुत डाँट खानी पड़ती थी। नरेंद्र का बाल मस्तिष्क यह समझ पाने में असमर्थ था कि आखिर भात की थाली छूकर बदन पर हाथ लगाने से क्या होता है? बाएँ हाथ से गिलास उठाकर पानी क्यों नहीं पीना चाहिए? या ऐसा करने पर हाथ क्यों धोना पड़ता है? जब कभी नरेंद्र अपने मस्तिष्क में उठते प्रश्नों के उत्तर अपनी माँ से जानना चाहते, तो वे संतोषजनक जवाब नहीं दे पाती थीं। ऐसे में नरेंद्र लोकाचारों का उल्लंघन करके देखते कि आखिर इससे क्या होता है? ********

  • असली दौलत

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव एक गांव में एक श्याम बहादुर नाम का एक किसान अपनी पत्नी और चार लड़कों के साथ रहता था। श्याम बहादुर खेतों में मेहनत करके अपने परिवार का पेट पालता था। लेकिन उसके चारो लड़के आलसी थे। जो गांव में वैसे ही इधर-उधर घूमते रहते थे। एक दिन श्याम बहादुर ने अपनी पत्नी से कहा कि अभी तो मैं खेतों में काम कर रहा हूँ। लेकिन मेरे बाद इन लड़कों का क्या होगा। इन्होंने तो कभी मेहनत भी नहीं की है। ये तो कभी खेत में भी नहीं गए। श्याम बहादुर की पत्नी ने कहा कि धीरे-धीरे ये भी काम करने लगेंगे। समय बीतता गया और श्याम बहादुर के लड़के कोई काम नहीं करते थे। एक बार श्याम बहादुर बहुत बीमार पड़ गया। वह काफी दिनों तक बीमार ही रहा। उसने अपनी पत्नी को कहा कि वह चारों लड़को को बुला कर लाये। उसकी पत्नी चारों लड़को को बुलाकर लायी। श्याम बहादुर ने कहा लगता है कि अब मैं ज्यादा दिनों तक जिन्दा नहीं रहूँगा। श्याम बहादुर को चिंता थी कि उसके जाने के बाद उसके बेटों का क्या होगा। इसलिए उसने कहा बेटों मैने अपने जीवन में जो भी कुछ कमाया है वह खजाना अपने खेतों के निचे दबा रखा है। मेरे बाद तुम उसमें से खजाना निकालकर आपस में बाँट लेना। यह बात सुनकर चारों लड़के खुश हो गए। कुछ समय बाद श्याम बहादुर की मृत्यु हो गयी। श्याम बहादुर की मृत्यु के कुछ दिनों बाद उसके लड़के खेत में दबा खजाना निकालने गए। उन्होंने सुबह से लेकर शाम तक सारा खेत खोद दिया। लेकिन उनको कोई भी खजाना नज़र नहीं आया। लड़के घर आकर अपनी माँ से बोले माँ पिताजी ने हमसे झूठ बोला था। उस खेत में हमें कोई खजाना नहीं मिला। उसकी माँ ने बताया कि तुम्हारे पिताजी ने जीवन में यही घर और खेत ही कमाया है। लेकिन अब तुमने खेत खोद ही दिया है तो उसमे बीज बो दो। इसके बाद लड़को ने बीज बोये और माँ के कहेनुसार उसमे पानी देते गए। कुछ समय बाद फसल पक कर तैयार हो गयी। जिसको बेचकर लड़कों को अच्छा मुनाफा हुआ। जिसे लेकर वह अपनी माँ के पास पहुंचे। माँ ने कहा कि तुम्हारी मेहनत ही असली खजाना है। यही तुम्हारे पिताजी तुमको समझाना चाहते थे। सीख: हमें आलस्य को त्यागकर मेहनत करना चाहिए। मेहनत ही इंसान की असली दौलत है। *********

  • जग में जीना

    यूं ही हुआ नहीं आना है, निभना है कुछ निभाना है! तेरी मेरी को कहते नहीं जिंदगी, प्रेम पर प्रीत की परत चढ़ाना है! प्रगति के पथ पर चलना है, कष्टों दुष्टों से बचना है! पल पल ऐसा जीना हो हर पल हर दिन का गहना हो ! जब तक भी जग में जीना हो, बहे प्रेम प्रीत की सरिताएं, अपनों के लिए पसीना हो, सबके लिए जीना हो! जीवन श्रम हो, सत्कर्म हो जीवन, प्रेम भावना है जीवन जीवन पल-पल साधना, जीवन क्षण क्षण की साधना! दुखियों के दुख पीना जब तक भी जग में जीना हो! *****

  • एक जैसे दु:ख

    महेश कुमार केशरी बाहर की गर्मी और तपिस देखकर ही लोगों के पसीने छूट रहे थें। पारा पैंतालिस के पार चल रहा था। पशु-पक्षी, चिड़ियाँ-चुग्गे सब ईश्वर से प्रार्थना कर रहें थें, कि जल्दी से बारिश हो और पारा कुछ नीचे गिरे। लेकिन जयवर्धन सुबह से ही काम में जुटा हुआ था। रेत को बोरियों में भरकर दो तल्ले पर धीरे-धीरे चढ़ा रहा था। जयवर्धन, साठ साल से कम का नहीं है। इतने उम्र तक तो लोग रिटायर होकर घरों में सुख-सुविधा के मजे उड़ाते हैं। जयवर्धन को उसके बच्चों ने घर से निकाल दिया है। जवानी में जयवर्धन हट्टा-कट्ठा था। पैसे कमाता था तो जमकर खाता भी था। अब हड्डियों का केवल ढाँचा ही बचा है। वैसी खाली इमारत जो कभी भी ढह सकती है। जुगल ठेकेदार रेत की धीमी ढुलाई से खीज गया था। मजदूरों को उसने ठेके पर लगाया था। काम को तीन दिनों में खत्म होना था। लेकिन किसी तरह वो दो दिनों में ही काम को निपटाना चाह रहा था। ताकि कुछ ज्यादा पैसे वो बचा सके। जुगल ने जयवर्धन को डपटा- "अबे, थोड़ा जल्दी-जल्दी पैर चला। इस तरह से सीढ़ियाँ चढेगा तो हफ्ते भर में भी काम खत्म नहीं होगा।" जयवर्धन गमछे से पसीना पोंछते हुए बोला- "हाँ बाबू अभी जल्दी करता हूँ। बस तुरंत अभी खत्म करता हूँ।" स्टेन साहब से रहा ना गया। वो, जुगल से बोले- "अरे भाई, सुबह से वो बेचारा इतनी गर्मी में काम कर रहा है। कम-से-कम उसे कुछ खाने के लिये तो पूछ लो। आखिर वो भी तो आदमी है। हमारी-तुम्हारी जब इतनी भीषण गर्मी से जान निकल रही है। तो क्या वो इंसान नहीं है? वो, बिना कुछ खाये-पिये खटे जा रहा है। जाओ उसे कुछ खाने को दो और कुछ देर आराम करने को कहो।" जब जुगल ने कुछ नहीं कहा तो, स्टेन साहब ने अपनी तरफ से जयवर्धन को आवाज दी- "जयवर्धन .... अरे भाई जयवर्धन तुम कब तक काम करते रहोगे यार। उन्होंने जेब से एक सौ रूपये का नोट निकाला और सामने के होटल की तरफ इशारा करते हुए बोले। जाओ रे भले मानस उस होटल से कुछ खाकर आओ। काहे फोकट में जान देने पर तुले हो भाई जाओ।" स्टेन साहब करोड़ों की कोठी और कई शापिंग कांपलेक्स के मालिक थें। लेकिन बेटा सात समंदर पार विदेश में अपने बच्चों के साथ रहता था। वो भी साठ के करीब ही थें। अचानक जयवर्धन का दु:ख उन्हें अपना ही दु:ख लगने लगा था। और वो भीतर-ही-भीतर कहीं रीतने लगे थें। और, ठेकेदार सारा माजरा समझने के चक्कर में था। वो उजबकों की तरह अपने मालिक स्टेन साहब को घूरे जा रहा था। ************

  • अंतिम मुलाकात

    संस्मरण अंतिम मुलाकात त्रिपुरा सुंदरी मेरे पिता एक बार दिल्ली आये और उस समय मैं वहां ओखला स्थित जामिया मिल्लिया इस्लामिया में पढ़ता था। वह गांव से नवल सिंह के साथ मुझसे मिलने यहां आये थे और सुबह में नौ - दस बजे के आसपास उनको मैंने यूनिवर्सिटी में देखा। दिल्ली आने कि कार्यक्रम शायद उन्होंने आकस्मिक रूप से ही बनाया था और उस समय एसटीडी सेवा शुरू नहीं हुई थी। हमलोग पत्र व्यवहार से ही आपसी बातों का आदान प्रदान किया करते थे। यह 1990-91 के आसपास की घटना होगी। नवल सिंह के छोटे बेटे उदयशंकर उस समय सैनिक अधिकारी के रूप में दिल्ली में ही तैनात थे और इंडिया गेट के पास पंडारा हाउस में रहते थे। अपने पिता नवल सिंह को उन्होंने दिल्ली घूमने के लिए बुलाया था और इसी दौरान नवल सिंह ने पिता जी को भी साथ में दिल्ली चलने के लिए कहा था और इस प्रकार पिता जी दिल्ली आये और दो-तीन दिन नवल सिंह के साथ उदयशंकर जी के घर पर ही ठहरे। यह जनवरी का महीना था और पिता जी 26 जनवरी के आसपास दिल्ली आये थे। उदयशंकर जी ने इस दौरान राजपथ पर गणतंत्र दिवस का परेड देखने के लिए पिता जी के साथ मेरा पास भी बनवा दिया था। इस दिन यानी 25 जनवरी की रात में मैं भी पंडारा हाउस में ही उदयशंकर जी के आवास पर रुका और सुबह परेड देखने गया। इस दिन राजपथ पर राष्ट्रपति आर. वेंकटरमण ने भारतीय पुलिस सेवा के बिहार कैडर के एक अधिकारी रणधीर वर्मा जो धनबाद में एस.पी. थे उनको मृत्योपरांत देश में वीरता के सर्वोच्च सम्मान अशोक चक्र से अलंकृत किया था। वे धनबाद में बैंक लुटेरों के साथ मुठभेड़ में शहीद हो गये थे। उनकी पत्नी रीता वर्मा ने यह सम्मान ग्रहण किया था। इसके अगले दिन पिता जी के साथ दिल्ली परिवहन निगम की दिल्ली दर्शन बस सेवा से हम दिल्ली के दर्शनीय स्थलों पर घूमने भी गये। पिता जी इसके अगले दिन मगध एक्सप्रेस से गांव लौट गये थे। नवल सिंह को अपने बेटे उदयशंकर के पास अभी कुछ दिन और रुकना था। पिता जी को ट्रेन में मैं चढ़ाने गया था और उनका स्लीपर क्लास में रिजर्वेशन था। इसके बाद पिता जी से मुलाकात नहीं हो पायी क्योंकि गांव लौटने के चार-पांच महीने के बाद ब्रेन हेमरेज से उनका देहांत हो गया। उनके निधन के बारे में अगले दिन मुझे टेलीग्राम से पता चला और फिर शाम में मगध एक्सप्रेस से बड़हिया रवाना हुआ लेकिन यहां मेरे आने से पहले मेरे बड़े भाई ने उनका दाहसंस्कार कर दिया था। जिस समय मेरे भाई ने पटना से मुझे टेलीग्राम भेजा था उस समय वह पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती थे और लिहाजा मैं पटना स्टेशन पर उतरकर वहीं गया लेकिन अस्पताल में पिछले दिन भर्ती होने वाले मरीजों की सूची को रजिस्टर में देखकर अस्पताल के लोगों ने पिछले दिन देर रात में उनके देहांत के बारे में बताया। इसके बाद मैं इस अस्पताल के बाहर नेशनल फार्मेसी नामक दुकान पर इस वाकये के बारे में जानकारी प्राप्त करने गया। इसके मालिक नरेंद्र प्रताप सिंह मेरे पिता जी के परिचित थे और पटना में बी. ए. की पढ़ाई के दौरान मेरे पिता जी को इनके पिता सीताराम सिंह ने होम टीचर के तौर पर अपने घर में आश्रय प्रदान किया था और बाद में पिता जी डिप्टी कलक्टर बन गये थे। नेशनल फार्मेसी के लोगों को पिता जी के देहांत के बारे में पता था और उनमें से कोई आदमी पिता जी के शव वाहन पर साथ गांव भी गया था। उनसे सारी बातें मालूम हुईं। उस समय पानी बरस रहा था और मैं किसी तरह पटना स्टेशन फिर वापस लौटकर आया और आधी रात में लालकिला एक्सप्रेस से बड़हिया पहुंचा और उस समय बिहार में बिजली ज्यादा नहीं रहती थी मैं किसी कुली के साथ अंधेरे में बाजार को पार करने के बाद गांव पहुंचा और बाहर बरामदे में भाइयों को कुछ पड़ोसियों और रिश्तेदारों के साथ सोया देखा। मेरे आने की खबर सुनकर मां भी भीतर घर से बाहर निकल आयी और रोने लगी। ************

  • तमाशा

    सम्पदा ठाकुर हमें नहीं भाते जरा भी लोग झूठे और मक्कार यह गले लगा कर पीठ पीछे करते हैं वार ऐसे लोग खुद को बहुत समझते हैं होशियार ठगते रहते हैं सबको बनकर उसके वफादार इनके होते हैं मुख में राम और रखते हैं बगल में छुरी ऐसे लोगों का का क्या कहिए इनकी तो होती ही है नियत बुरी अपनी चिकनी चुपड़ी बातों से सबको ठगते रहते हैं जनाब ये सोचते हैं इनकी तरह नहीं है कोई चालाक एक भी मौका नहीं छोड़ते यह करने को घात इसे लगता है नहीं समझ पा रहा है कोई भी इनकी चाल मगर इन्हें नहीं पता यहां सब बैठे हैं उस्ताद बोलते नही है मगर, देखते हैं तमाशा बैठकर कि कौन कहां तक गिर सकता है यार। ******

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