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  • मंथन मन का

    ममता खरे खुद से करती हूँ बातें, खुद ही खुश हो जाती हूँ। इस झंझावाती दुनियाँ से, अब मोह नहीं मै लगाती हूँ। बाहर से है भीड़ भरी, पर अंतस भारी सूनापन। स्पनंद रिक्त हृदय उनसे, अब भेद न मन के बताती हूँ। माया का मोह नहीं फिर भी, दंभ द्वेष ने जिनको जकड़ा। ऐसी मायावी दुनियाँ में, अब डुबकी नहीं लगाती हूँ। कितनी हूँ मैं सही गलत, अब मुझको होता फर्क नहीं। द्वंद्व झटक सन्मार्ग सफ़र, निशदिन करती जाती हूँ । ये वृथा व्यथा का सदियों से, घिरता आया ताना बाना। पल भर न भटके मन मेरा, अब प्रण मैं रोज उठाती हूँ। ******

  • दुख की सरिता गहरी

    महेन्द्र मुकुंन्द दुख की सरिता गहरी, अँखियाँ, जल बरसाना धीरे-धीरे, मेरा प्रण प्रियतम-सागर में, जा मिल जाना धीरे-धीरे। बागों में कलिकाओं पर, मंडराता था जो यौवन-मद में, अलि नहिं देखा पीछे फिर, उनका मुरझाना धीरे-धीरे। अभिलाषा-गोपन हिय की, अधरों तक पहुंची तो यह देखा, पत्थर से टकरा सब टूटा, ताना-बाना धीरे-धीरे। बंधन में क्यों बाँधा ऐसा, पर-प्रेमालय बंदी करके, इस घर में ही जीवन जीना, या मर जाना धीरे-धीरे। कानों में जब पिय-पग की, आहट आये तो धीरज रखना, भीगी-भीगी पलकों पर तुम, स्मित लाना धीरे-धीरे। ******

  • अगर जन्म उत्सव है।

    आचार्य जहान सिंह अगर जन्म उत्सव है, तो मृत्यु क्यों नही। आने-जाने वाला एक ही, फिर जश्न क्यों नही।। आने वाला, एक अनजान मेहमान। न जाने कैसा होगा वो इन्सान।। उस पर सब इतने मेहरबान। जश्न मनाये पूरा खानदान।। नाचगान-संगीत, दिल खोलकर दान। ऐसा क्या खास है श्रीमान।। जाने वाला, जाना पहचाना मेहमान। जांचा-परखा और वर्ता इन्सान।। बरसों का साथ, हर काम में उसका हाथ।। अच्छा-सच्चा समर्पित सिपाही। कर्म, दायित्व का निर्वाही।। सुख-दुख में एक समान। उसके परीक्षाफल में पहला स्थान।। किया उसने आपका नाम रोशन। उसके लिए कोई नही जश्न।। वो उत्सव का हकदार। तुम उसके कर्जदार।। ग़म-विलाप, दुख जिसके कंधों पर। लांधकर भेज देते है घाट पर।। अजनबी के लिए उत्सव। घर की शान के लिए बस आँसू।। 'जहान' यह तेरा कैसा ईमान। जब आने-जाने वाला, एक ही इन्सान।। ********

  • सफलता की सीख

    बहुत समय पहले की बात है, एक गांव में एक किसान रहता था। उसे अपने खेत में काम करने वालों की बड़ी ज़रुरत रहती थी लेकिन ऐसी खतरनाक जगह, जहाँ आये दिन आंधी-तूफ़ान आते रहते हों, कोई काम करने को तैयार नहीं होता था। किसान ने एक दिन शहर के अखबार में इश्तहार दिया कि उसे खेत में काम करने वाले एक मजदूर की ज़रुरत है। किसान से मिलने कई लोग आये लेकिन जो भी उस जगह के बारे में सुनता, वो काम करने से मना कर देता। अंततः एक सामान्य कद का पतला-दुबला अधेड़ व्यक्ति किसान के पास पहुंचा। किसान ने उससे पूछा, “क्या तुम इन परिस्थितयों में काम कर सकते हो?” “हाँ, बस जब हवा चलती है तब मैं सोता हूँ।” व्यक्ति ने उत्तर दिया। किसान को उसका उत्तर थोडा अजीब लगा लेकिन चूँकि उसे कोई और काम करने वाला नहीं मिल रहा था इसलिए उसने उस व्यक्ति को काम पर रख लिया। मजदूर मेहनती निकला, वह सुबह से शाम तक खेतों में भ्रमण करता, किसान भी उससे काफी संतुष्ट था। कुछ ही दिन बीते थे कि एक रात अचानक ही जोर-जोर से हवा बहने लगी, किसान अपने अनुभव से समझ गया कि अब तूफ़ान आने वाला है। वह तेजी से उठा, हाथ में लालटेन ली और मजदूर केझोपड़े की तरफ दौड़ा। “जल्दी उठो, देखते नहीं तूफ़ान आने वाला है, इससे पहले कि सब कुछ तबाह हो जाए कटी फसलों को बाँध कर ढक दो और बाड़ेके गेट को भी रस्सियोंसे कस दो।” किसान चीखा। मजदूर बड़े आराम से पलटा और बोला, “नहीं जनाब, मैंने आपसे पहले ही कहा था कि जब हवा चलती है तो मैं सोता हूँ।” यह सुन किसान का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया, जी में आया कि उस मजदूर को गोली मार दे, पर अभी वो आने वाले तूफ़ान से चीजों को बचाने के लिए भागा। किसान खेत में पहुंचा और उसकी आँखें आश्चर्य से खुली रह गयी, फसल की गांठें अच्छे से बंधी हुई थीं और तिरपाल से ढकी भी थी, उसके गाय-बैल सुरक्षित बंधे हुए थे और मुर्गियां भी अपने दडबों में थीं। बाड़े का दरवाज़ा भी मजबूती से बंधा हुआ था। सभी चीजें बिलकुल व्यवस्थित थी। नुक्सान होने की कोई संभावना नहीं बची थी। किसान अब मजदूर की यह बात कि “जब हवा चलती है तब मैं सोता हूँ।” समझ चुका था, और अब वो भी चैन से सो सकता था। हमारी ज़िन्दगी में भी कुछ ऐसे तूफ़ान आने तय हैं, ज़रुरत इस बात की है कि हम उसकी पहले से तैयारी रखें ताकि मुसीबत आने पर हम चैन से सो सकें। सार- यदि विद्यार्थी वर्षभर पढ़ाई करें तो परीक्षा के समय वह आराम से रह सकते हैं। ******

  • दिल्ली में …

    कमलेश पाण्डेय 'कमल' पूत सपूत हुआ है उसकी, लगी नौकरी दिल्ली में, अब घर कम आता ज़्यादातर, रहता है वह दिल्ली में। अम्मा बाबू नें देखी थी, सुन्दर और सुशील बहू, पूत व्याह कर लाया बीवी, रहती है जो दिल्ली में। बहू का दिल ना लगा गाँव में, रहती थी बेचैन यहाँ, देह तो उसकी रही गाँव में, दिल रहता था दिल्ली में। अम्मा बाबू जी ने चाहा, बहू यहीं पर रह जाये, बहू की ज़िद से हार पूत, ले आया उसको दिल्ली में। पूत सपूत बने इस खातिर, सब तकलीफ उठाया था, पेट काटकर अपना उसको, पढ़ने भेजा दिल्ली में। गाँव की खेती और गृहस्थी, बूढ़े कन्धे झेल रहे, बेटा बहू मंगाकर पिज्जा, करें नाश्ता दिल्ली में। बारिश में टूटे छप्पर से, गाँव में पानी टपक रहा, बेटा बहू फ्लैट में बैठे, चाय पी रहे दिल्ली में। मजदूरी करता बेटा और, बहू सम्भाले घर सारा, मंगरू अब आराम कर रहा, नहीं पढ़ाया दिल्ली में। पूत सपूत वही जो, सुख-दुख में मां-बाप के साथ रहे, वह सपूत कैसे कहलाये, रहता है जो दिल्ली में। *********

  • मलाल

    डा. किरण पांचाल मैं रूठा, तुम भी रूठ गए, फिर मनाएगा कौन? आज दरार है, कल खाई होगी, फिर भरेगा कौन? मैं चुप, तुम भी चुप, इस चुप्पी को फिर तोडे़गा कौन? छोटी बात को, लगा लोगे दिल से, तो रिश्ता फिर निभाएगा कौन? दुखी मैं भी और तुम भी बिछड़कर, सोचो हाथ फिर बढ़ाएगा कौन? न मैं राजी न तुम राजी, फिर माफ़ करने का बड़प्पन दिखाएगा कौन? डूब जाएगा, यादों में दिल कभी, तो फिर धैर्य बंधायेगा कौन? एक अहम् मेरे, एक तेरे भीतर भी, इस अहम् को फिर हराएगा कौन? ज़िंदगी किसको मिली है सदा के लिए? फिर इन लम्हों में अकेला रह जाएगा कौन? मूंद ली दोनों में से, गर किसी दिन एक ने आँखें, तो कल इस बात पर फिर पछतायेगा कौन? **********

  • WINTERS

    -Avighna Gautam It was the day of freezing tail, The sky was engulfed with snowy dales. People were wrapped and operating twitter, Guess what! It was the first day of winter. I, too like all was wrapped in my blanket, With my freezing nose poked into a book, Engrossed in reading poems like “The Brook.” The clock was ticking again and again, With its alarm yelling at me. It stared me and said,” Get up young boy, The snow has covered the tree”. 6 a.m. was the time in my clock, I rather wanted to read than to talk. My feet were freezing just like ice, And the phone kept ringing twice and thrice. Slowly, I thought it was the time to leave bed, My hands were numb and my face was red. I didn’t want to get up at all, But after all I wanted to go for a stroll. Now I thought, let’s get to work, I got off the bed by giving a jerk. It was too cold outside the cover, I manifested not to take a shower. I walked out of my bed and saw, The sight of today was so low. As I touched the window pane, Outside ran a snowy train. I thumped out of my freezed room, Seeing all over the house, All I found was, Silence, loneliness a cat and a mouse. My parents were asleep in the room upstairs, I was the first one to give my eyes and outer spare. No one except me was awake, Now what for breakfast, should I make? I went outside and wandered about, The garden, the flowers and the racoon’s freezing snout. All were engaged in overcoming, The coldest, piercing, frosty winter shout. ***********

  • वो घर.......

    सविता सिंह मीरा वो घर....... वो मेरा पुराना घर थे बेपरवाह नहीं था डर सालों बाद जब पड़े कदम तैर गए वह सारे मंजर आने लगी हंसी की आवाजें ढूंढ रही थी कुछ मेरी निगाहें सब कुछ तो मिला मगर फीकी पड़ गई अब मुस्कुराहटें। देख दिवारें भी रो पड़ी बंद हो गई वह भी घड़ी किसी आशा से तकती थी जो इंतजार में मिली खड़ी। सजता था चुल्हा उसी ओर मां जगाती उठ हो गई भोर चारों तरफ फैला वीराना नहीं अब कोई भी शोर। अब तो है सबके अलग कमरे कौन उठाए किसी के नखरे पहले रहते थे सब एकत्रित आज लगता सब बिखरे बिखरे। अबकी मनाए वहीं त्योहार सजाएं सारे अंगना घर द्वार नींव ना बिखरे कभी भी इनका हम पर बड़ा उपकार। ******

  • मेरे ख्वाबों की गलियों में

    मधु मधुलिका मेरे ख्वाबों की गलियों में तेरी सूरत रहती है। ह्रदय के मन मंदिर में बसी तेरी मूरत रहती है। बनाया प्रेमग्रंथ पन्नो पर लिख नाम तुम्हारा, छलकती मेरे हर गीतों में तेरी चाहत रहती है। बाँध लिया तुमको पागल मन की लहरों ने, सुलगती साँसे मन की तरसती आंखें रहती है। उदास सुबह घोर अँधेरी लगे रात चाँदनी, बिन तेरे इस जीवन में तन्हाई रहती है। मृगतृष्णा सी भटक रही मैं तेरी तलाश में, साया बन तेरे साथ रहूँ ये हसरत रहती है। अंतर्मन में पाकर खुशबू खिला मन का गुलाब, आ जाओ अब मिलने उदास तबीयत रहती है। अकेले में अकेले संग तेरे करती हूँ मैं संवाद, यादों में तेरे पलकें आँसूओं से भीगी रहती हैं। ********

  • अक्स

    अंशिता दुबे मेरी अस्थियों को विसर्जित मत करना गंगा मैली हो जाएगी मेरे समर्पण के स्वरूप को मिटा नहीं पायेगी मेरी संवेदनाओं को मिला नहीं पायेगी उस घाट पर शायद तुम नहीं मिलोगे मेरा भटकता वज़ूद अकेला क्या करेगा रहने देना मेरी अस्थियां थोड़ा और इंतजार कर लुंगी मैं लावारिस सी क्योंकि मेरा प्रेम तो पराकाष्ठा पार कर चुका होगा आत्मा की शुद्धता में समाहित होगा देख लेना मेरी अस्थियों में इक तुम्हारा अक्स मिलेगा ! *********

  • पिया के देश जाना है

    डॉ. ममता परिहार पिया के देश जाना है सुभग श्रृंगार तन मंडित, सजा है वेणु अलकों में। छिपी एक स्वप्न की दुनिया, सिसकती भीगी पलकों में। हथेली नाम प्रियतम का, अलक्तक संग सजे नूपुर। निखरती माँग मणिराजी, बजे संगीत मध्यम सुर। विदा ले जन्म-दाता से, यह आँगन छोड़ जाना है। पिया के देश जाना है। पिया के देश जाना है। माँ आँचल नेह का निर्झर, छिपा है क्षीरनिधि पावन। किया पयपान अमृत सा, हुआ पोषित यह तन जीवन। सजाया रूप परियों सा, सँवारी मन की कोमलता। दी शिक्षा मान, गौरव की , सिखाई कुल की पावनता। परिष्कृत कर दिया जीवन, हुआ निजता का अवबोधन। बताया धर्म-संस्कृति भी, सिखाया ईश आराधन। हुई अभिसिक्त जिस आँचल, वो आँचल छोड़ जाना है। पिया के देश जाना है। पिया के देश जाना है। पकड़ उँगली चलाया है, रहे बनकर सदा संबल। पिता प्रतिबिंब हर क्षण का, किया है पुष्ट आत्मबल। दिया संसार का परिचय, व सम्बंधों की गरिमा का। हो उन्नत भाल पौरुष से, हो यश स्त्रीत्व महिमा का। नयन है प्रेम से पूरित, मगर कर्तव्य आभासित। दिखे हैं कर्मयोगी से, करें जीवन को परिभाषित। मिली जहाँ ज्ञान की दीक्षा, वो साधन छोड़ जाना है। पिया के देश जाना है। पिया के देश जाना है। मिला जो माँ से बाबा से, वो निधियाँ ले के आई हूँ। सफल सम्मानमय जीवन की, विधियाँ साथ लायी हूँ। न तोलो उस तुला से, अर्थ से बस अर्थ ही तोले। जो शिक्षा, ज्ञान, गौरव, मान, को बस व्यर्थ ही बोले। करो मत मान मर्दन है पिता की आत्म का टुकड़ा। न घायल तन करो, बरसों सँवारा माँ ने यह मुखड़ा। सहेजो घर की लक्ष्मी को, वही है मूल धन घर का। मिटा दो मन की निर्ममता, न समिधा अब करो तन का। भटकते किसलिए दर-दर, यहीं सब छोड़ जाना है। पिया के देश जाना है। पिया के देश जाना है। *******

  • हादसे

    रीनू तेरे शहर में हादसे होते रहे, बेफिक्र हम तो चैन से सोते रहे l इंतजार में कटती रही ये जिन्दगी, यूं आह भर भर रात दिन रोते रहे l उसकी नजर सीधी पड़े तो गुल खिले, गर वो खफा फिर भार ही ढोते रहे। अपनी खुशी कायम रहे बस इसलिये, कांटें किसी की राह में बोते रहें। बढ़ने लगे शिकवे गिले यूं बेसबब, बैचैन से हम होश ही खोते रहे l हमको समझ आयी नहीं तेरी अदा, रीनू भला क्यो ये सितम होते रहे l *******

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