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  • नरक का मार्ग

    प्रेमचंद रात “भक्तमाल” पढ़ते-पढ़ते न जाने कब नींद आ गयी। कैसे-कैसे महात्मा थे जिनके लिए भगवत्-प्रेम ही सब कुछ था, इसी में मग्न रहते थे। ऐसी भक्ति बड़ी तपस्या से मिलती है। क्या मैं वह तपस्या नहीं कर सकती? इस जीवन में और कौन-सा सुख रखा है? आभूषणों से जिसे प्रेम हो जाने, यहां तो इनको देखकर आंखे फूटती है;धन-दौलत पर जो प्राण देता हो वह जाने, यहां तो इसका नाम सुनकर ज्वर-सा चढ़ आता हैं। कल पगली सुशीला ने कितनी उमंगों से मेरा श्रृंगार किया था, कितने प्रेम से बालों में फूल गूंथे। कितना मना करती रही, न मानी। आखिर वही हुआ जिसका मुझे भय था। जितनी देर उसके साथ हंसी थी, उससे कहीं ज्यादा रोयी। संसार में ऐसी भी कोई स्त्री है, जिसका पति उसका श्रृंगार देखकर सिर से पांव तक जल उठे? कौन ऐसी स्त्री है जो अपने पति के मुंह से ये शब्द सुने-तुम मेरा परलोग बिगाड़ोगी, और कुछ नहीं, तुम्हारे रंग-ढंग कहे देते हैं---और मनुष्य उसका दिल विष खा लेने को चाहे। भगवान्! संसार में ऐसे भी मनुष्य हैं। आखिर मैं नीचे चली गयी और ‘भक्तिमाल’ पढ़ने लगी। अब वृंदावन बिहारी ही की सेवा करुंगी उन्हीं को अपना श्रृंगार दिखाऊंगी, वह तो देखकर न जलेगे। वह तो हमारे मन का हाल जानते हैं। भगवान! मैं अपने मन को कैसे समझाऊं! तुम अंतर्यामी हो, तुम मेरे रोम-रोम का हाल जानते हो। मैं चाहती हुं कि उन्हें अपना इष्ट समझूं, उनके चरणों की सेवा करुं, उनके इशारे पर चलूं, उन्हें मेरी किसी बात से, किसी व्यवहार से नाममात्र, भी दु:ख न हो। वह निर्दोष हैं, जो कुछ मेरे भाग्य में था वह हुआ, न उनका दोष है, न माता-पिता का, सारा दोष मेरे नसीबों ही का है। लेकिन यह सब जानते हुए भी जब उन्हें आते देखती हूं, तो मेरा दिल बैठ जाता है, मुह पर मुरदनी सी-छा जाती है, सिर भारी हो जाता है, जी चाहता है इनकी सूरत न देखूं, बात तक करने को जी नही चाहता;कदाचित् शत्रु को भी देखकर किसी का मन इतना क्लांत नहीं होता होगा। उनके आने के समय दिल में धड़कन सी होने लगती है। दो-एक दिन के लिए कहीं चले जाते हैं तो दिल पर से बोझ उठ जाता है। हंसती भी हूं, बोलती भी हूं, जीवन में कुछ आनंद आने लगता है लेकिन उनके आने का समाचार पाते ही फिर चारों ओर अंधकार! चित्त की ऐसी दशा क्यों है, यह मैं नहीं कह सकती। मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि पूर्वजन्म में हम दोनों में बैर था, उसी बैर का बदला लेने के लिए उन्होंने मुझेसे विवाह किया है, वही पुराने संस्कार हमारे मन में बने हुए हैं। नहीं तो वह मुझे देख-देख कर क्यों जलते और मैं उनकी सूरत से क्यों घृणा करती? विवाह करने का तो यह मतलब नहीं हुआ करता! मैं अपने घर कहीं इससे सुखी थी। कदाचित् मैं जीवन-पर्यन्त अपने घर आनंद से रह सकती थी। लेकिन इस लोक-प्रथा का बुरा हो, जो अभागिन कनयाओं को किसी-न-किसी पुरुष के गलें में बांध देना अनिवार्य समझती है। वह क्या जानता है कि कितनी युवतियां उसके नाम को रो रही है, कितने अभिलाषाओं से लहराते हुए, कोमल हृदय उसके पैरो तल रौंदे जा रहे है? युवति के लिए पति कैसी-कैसी मधुर कल्पनाओं का स्रोत्र होता है, पुरुष में जो उत्तम है, श्रेष्ठ है, दर्शनीय है, उसकी सजीव मूर्ति इस शब्द के ध्यान में आते ही उसकी नजरों के सामने आकर खड़ी हो जाती है।लेकिन मेरे लिए यह शब्द क्या है। हृदय में उठने वाला शूल, कलेजे में खटकनेवाला कांटा, आंखो में गड़ने वाली किरकिरी, अंत:करण को बेधने वाला व्यंग बाण! सुशीला को हमेशा हंसते देखती हूं। वह कभी अपनी दरिद्रता का गिला नहीं करती; गहने नहीं हैं, कपड़े नहीं हैं, भाड़े के नन्हेंसे मकान में रहती है, अपने हाथों घर का सारा काम-काज करती है , फिर भी उसे रोते नही देखती अगर अपने बस की बात होती तो आज अपने धन को उसकी दरिद्रता से बदल लेती। अपने पतिदेव को मुस्कराते हुए घर में आते देखकर उसका सारा दु:ख दारिद्रय छूमंतर हो जाता है, छाती गज-भर की हो जाती है। उसके प्रेमालिंगन में वह सुख है, जिस पर तीनों लोक का धन न्योछावर कर दूं। आज मुझसे जब्त न हो सका। मैंने पूछा—तुमने मुझसे किसलिए विवाह किया था? यह प्रश्न महीनों से मेरे मन में उठता था, पर मन को रोकती चली आती थी। आज प्याला छलक पड़ा। यह प्रश्न सुनकर कुछ बौखला-से गये, बगलें झाकने लगे, खीसें निकालकर बोले—घर संभालने के लिए, गृहस्थी का भार उठाने के लिए, और नहीं क्या भोग-विलास के लिए? घरनी के बिना यह आपको भूत का डेरा-सा मालूम होता था। नौकर-चाकर घर की सम्पति उडाये देते थे। जो चीज जहां पड़ी रहती थी, कोई उसको देखने वाला न था। तो अब मालूम हुआ कि मैं इस घर की चौकसी के लिए लाई गई हूं। मुझे इस घर की रक्षा करनी चाहिए और अपने को धन्य समझना चाहिए कि यह सारी सम्पति मेरी है। मुख्य वस्तु सम्पत्ति है, मै तो केवल चौकी दारिन हूं। ऐसे घर में आज ही आग लग जाये! अब तक तो मैं अनजान में घर की चौकसी करती थी, जितना वह चाहते हैं उतना न सही, पर अपनी बुद्धि के अनुसार अवश्य करती थी। आज से किसी चीज को भूलकर भी छूने की कसम खाती हूं। यह मैं जानती हूं। कोई पुरुष घर की चौकसी के लिए विवाह नहीं करता और इन महाशय ने चिढ़ कर यह बात मुझसे कही। लेकिन सुशीला ठीक कहती है, इन्हें स्त्री के बिना घर सुना लगता होगा, उसी तरह जैसे पिंजरे में चिड़िया को न देखकर पिंजरा सूना लगता है। यह हम स्त्रियों का भाग्य! मालूम नहीं, इन्हें मुझ पर इतना संदेह क्यो होता है। जब से नसीब इस घर में लाया हैं, इन्हें बराबर संदेह-मूलक कटाक्ष करते देखती हूं। क्या कारण है? जरा बाल गुथवाकर बैठी और यह होठ चबाने लगे। कहीं जाती नहीं, कहीं आती नहीं, किसी से बोलती नहीं, फिर भी इतना संदेह! यह अपमान असह्य है। क्या मुझे अपनी आबरु प्यारी नहीं? यह मुझे इतनी छिछोरी क्यों समझते हैं, इन्हें मुझपर संदेह करते लज्जा भी नहीं आती? काना आदमी किसी को हंसते देखता है तो समझता है लोग मुझी पर हंस रहे है। शायद इन्हें भी यही बहम हो गया है कि मैं इन्हें चिढ़ाती हूं। अपने अधिकार के बाहर से बाहर कोई काम कर बैठने से कदाचित् हमारे चित्त की यही वृत्ति हो जाती है। भिक्षुक राजा की गद्दी पर बैठकर चैन की नींद नहीं सो सकता। उसे अपने चारों तरफ शुत्र दिखायी देंगें। मै समझती हूं, सभी शादी करने वाले बुड्ढ़ो का यही हाल है। आज सुशीला के कहने से मैं ठाकुर जी की झांकी देखने जा रही थी। अब यह साधारण बुद्धि का आदमी भी समझ सकता हैकि फूहड़ बहू बनकर बाहर निकलना अपनी हंसी उड़ाना है, लेकिन आप उसी वक्त न जाने किधर से टपक पड़े और मेरी ओर तिरस्कापूर्ण नेत्रों से देखकर बोले—कहां की तैयारी है? मैंने कह दिया, जरा ठाकुर जी की झांकी देखने जाती हूं।इतना सुनते ही त्योरियां चढ़ाकर बोले—तुम्हारे जाने की कुछ जरुरत नहीं। जो अपने पति की सेवा नहीं कर सकती, उसे देवताओं के दर्शन से पुण्य के बदले पाप होता। मुझसे उड़ने चली हो । मैं औरतों की नस-नस पहचानता हूं। ऐसा क्रोध आया कि बस अब क्या कहूं। उसी दम कपड़े बदल डाले और प्रण कर लिया कि अब कभ दर्शन करने जाऊंगी। इस अविश्वास का भी कुछ ठिकाना है! न जाने क्या सोचकर रुक गयी। उनकी बात का जवाब तो यही था कि उसी क्षण घरसे चल खड़ी हुई होती, फिर देखती मेरा क्या कर लेते। इन्हें मेरा उदास और विमन रहने पर आश्चर्य होता है। मुझे मन-में कृतघ्न समझते है। अपनी समणमें इन्होने मरे से विवाह करके शायद मुझ पर एहसान किया है। इतनी बड़ी जायदाद और विशाल सम्पत्ति की स्वामिनी होकर मुझे फूले न समाना चाहिए था, आठो पहरइनका यशगान करते रहना चाहिये था। मैं यह सब कुछ न करके उलटे और मुंह लटकाए रहती हूं। कभी-कभी बेचारे पर दया आती है। यह नहीं समझते कि नारी-जीवन में कोई ऐसी वस्तु भी है जिसे देखकर उसकी आंखों में स्वर्ग भी नरकतुल्य हो जाता है। तीन दिन से बीमार हैं। डाक्टर कहते हैं, बचने की कोई आशा नहीं, निमोनिया हो गया है। पर मुझे न जाने क्यों इनका गम नहीं है। मैं इनती वज्र-हृदय कभी न थी।न जाने वह मेरी कोमलता कहां चली गयी। किसी बीमार की सूरत देखकर मेरा हृदय करुणा से चंचल हो जाता था, मैं किसी का रोना नहीं सुन सकती थी। वही मैं हूं कि आज तीन दिन से उन्हें बगल के कमरे में पड़े कराहते सुनती हूं और एक बार भी उन्हें देखने न गयी, आंखो में आंसू का जिक्र ही क्या। मुझे ऐसा मालूम होता है, इनसे मेरा कोई नाता ही नहीं मुझे चाहे कोई पिशाचनी कहे, चाहे कुलटा, पर मुझे तो यह कहने में लेशमात्र भी संकोच नहीं है कि इनकी बीमारी से मुझे एक प्रकार का ईर्ष्यामय आनंद आ रहा है। इन्होने मुझे यहां कारावास दे रखा था—मैं इसे विवाह का पवित्र नाम नहींदेना चाहती---यह कारावास ही है। मैं इतनी उदार नहीं हूं कि जिसने मुझे कैद मे डाल रखा हो उसकी पूजा करुं, जो मुझे लात से मारे उसक पैरो का चूंमू। मुझे तो मालूम हो रहा था। ईश्वर इन्हें इस पाप का दण्ड दे रहे है। मै निस्सकोंच होकर कहती हूं कि मेरा इनसे विवाह नहीं हुआ है। स्त्री किसी के गले बांध दिये जाने से ही उसकी विवाहिता नहीं हो जाती। वही संयोग विवाह का पद पा सकता है। जिंसमे कम-से-कम एक बार तो हृदय प्रेम से पुलकित हो जाय! सुनती हूं, महाशय अपने कमरे में पड़े-पड़े मुझे कोसा करते हैं, अपनी बीमारी का सारा बुखार मुझ पर निकालते हैं, लेकिन यहां इसकी परवाह नहीं। जिसकाह जी चाहे जायदाद ले, धन ले, मुझे इसकी जरुरत नहीं! आज तीन दिन हुए, मैं विधवा हो गयी, कम-से-कम लोग यही कहते हैं। जिसका जो जी चाहे कहे, पर मैं अपने को जो कुछ समझती हूं वह समझती हूं। मैंने चूड़िया नहीं तोड़ी, क्यों तोड़ू? क्यों तोड़ू? मांग में सेंदुर पहले भी न डालती थी, अब भी नहीं डालती। बूढ़े बाबा का क्रिया-कर्म उनके सुपुत्र ने किया, मैं पास न फटकी। घर में मुझ पर मनमानी आलोचनाएं होती हैं, कोई मेरे गुंथे हुए बालों को देखकर नाक सिंकोड़ता हैं, कोई मेरे आभूषणों पर आंख मटकाता है, यहां इसकी चिंता नहीं। उन्हें चिढ़ाने को मैं भी रंग=-बिरंगी साड़िया पहनती हूं, और भी बनती-संवरती हूं, मुझे जरा भी दु:ख नहीं हैं। मैं तो कैद से छूट गयी। इधर कई दिन सुशीला के घर गयी। छोटा-सा मकान है, कोई सजावट न सामान, चारपाइयां तक नहीं, पर सुशीला कितने आनंद से रहती है। उसका उल्लास देखकर मेरे मन में भी भांति-भांति की कल्पनाएं उठने लगती हैं---उन्हें कुत्सित क्यों कहुं, जब मेरा मन उन्हें कुत्सित नहीं समझता ।इनके जीवन में कितना उत्साह है।आंखे मुस्कराती रहती हैं, ओठों पर मधुर हास्य खेलता रहता है, बातों में प्रेम का स्रोत बहताहुआजान पड़ता है। इस आनंद से, चाहे वह कितना ही क्षणिक हो, जीवन सफल हो जाता है, फिर उसे कोई भूल नहीं सकता, उसी स्मृति अंत तक के लिए काफी हो जाती है, इस मिजराब की चोट हृदय के तारों को अंतकाल तक मधुर स्वरों में कंपित रखसकती है। एक दिन मैने सुशीला से कहा---अगर तेरे पतिदेव कहीं परदेश चले जाए तो रोत-रोते मर जाएगी! सुशीला गंभीर भाव से बोली—नहीं बहन, मरुगीं नहीं , उनकी याद सदैव प्रफुल्लित करती रहेगी, चाहे उन्हें परदेश में बरसों लग जाएं। मैं यही प्रेम चाहती हूं, इसी चोट के लिए मेरा मन तड़पता रहता है, मै भी ऐसी ही स्मृति चाहती हूं जिससे दिल के तार सदैव बजते रहें, जिसका नशा नित्य छाया रहे। रात रोते-रोते हिचकियां बंध गयी। न-जाने क्यो दिल भर आता था। अपना जीवन सामने एक बीहड़ मैदान की भांति फैला हुआ मालूम होता था, जहां बगूलों के सिवा हरियाली का नाम नहीं। घर फाड़े खाता था, चित्त ऐसा चंचल हो रहा था कि कहीं उड़ जाऊं। आजकल भक्ति के ग्रंथो की ओर ताकने को जी नहीं चाहता, कही सैर करने जाने की भी इच्छा नहीं होती, क्या चाहती हूं वह मैं स्वयं भी नहीं जानती। लेकिन मै जो जानती वह मेरा एक-एक रोम-रोम जानता है, मैं अपनी भावनाओं को संजीव मूर्ति हैं, मेरा एक-एक अंग मेरी आंतरिक वेदना का आर्तनाद हो रहा है। मेरे चित्त की चंचलता उस अंतिम दशा को पहंच गयी है, जब मनुष्य को निंदा की न लज्जा रहती है और न भय। जिन लोभी, स्वार्थी माता-पिता ने मुझे कुएं में ढकेला, जिस पाषाण-हृदय प्राणी ने मेरी मांग में सेंदुर डालने का स्वांग किया, उनके प्रति मेरे मन में बार-बार दुष्कामनाएं उठती हैं। मैं उन्हे लज्जित करना चाहती हूं। मैं अपने मुंह में कालिख लगा कर उनके मुख में कालिख लगाना चाहती हूं मैअपने प्राणदेकर उन्हे प्राणदण्ड दिलाना चाहती हूं।मेरा नारीत्व लुप्त हो गया है,। मेरे हृदय में प्रचंड ज्वाला उठी हुई है। घर के सारे आदमी सो रहे है थे। मैं चुपके से नीचे उतरी , द्वार खोला और घर से निकली, जैसे कोई प्राणी गर्मी से व्याकुल होकर घर से निकले और किसी खुली हुई जगह की ओर दौड़े।उस मकान में मेरा दम घुट रहा था। सड़क पर सन्नाटा था, दुकानें बंद हो चुकी थी। सहसा एक बुढियां आती हुई दिखायी दी। मैं डरी कहीं यह चुड़ैल न हो। बुढिया ने मेरे समीप आकर मुझे सिर से पांव तक देखा और बोली ---किसकी राह देखरही हो मैंने चिढ़ कर कहा---मौत की! बुढ़िया---तुम्हारे नसीबों में तो अभी जिन्दगी के बड़े-बड़े सुख भोगने लिखे हैं। अंधेरी रात गुजर गयी, आसमान पर सुबह की रोशनी नजर आ रही हैं। मैने हंसकर कहा---अंधेरे में भी तुम्हारी आंखे इतनी तेज हैंकि नसीबों की लिखावट पढ़ लेती हैं? बुढ़िया---आंखो से नहीं पढती बेटी, अक्ल से पढ़ती हूं, धूप में चूड़े नही सुफेद किये हैं।। तुम्हारे दिन गये और अच्छे दिन आ रहे है। हंसो मत बेटी, यही काम करते इतनी उम्र गुजर गयी। इसी बुढ़िया की बदौलत जो नदी में कूदने जा रही थीं, वे आज फूलों की सेज पर सो रही है, जो जहर का प्याल पीने को तैयार थीं, वे आज दूध की कुल्लियां कर रही हैं। इसीलिए इतनी रात गये निकलती हू कि अपने हाथों किसी अभागिन का उद्धार हो सके तो करुं। किसी से कुछ नहीं मांगती, भगवान् का दिया सब कुछ घर में है, केवल यही इच्छा है उन्हे धन, जिन्हे संतान की इच्छा है उन्हें संतान, बस औरक्या कहूं, वह मंत्र बता देती हूं कि जिसकी जो इच्छा जो वह पूरी हो जाये। मैंने कहा---मुझे न धन चाहिए न संतान। मेरी मनोकामना तुम्हारे बस की बात नहीं है। बुढ़िया हंसी—बेटी, जो तुम चाहती हो वह मै जानती हूं; तुम वह चीज चाहती हो जो संसार में होते हुए स्वर्ग की है, जो देवताओं के वरदान से भी ज्यादा आनंदप्रद है, जो आकाश कुसुम है,गुलर का फूल है और अमावसा का चांद है। लेकिन मेरे मंत्र में वह शंक्ति है जो भाग्य को भी संवार सकती है। तुम प्रेम की प्यासी हो, मैं तुम्हे उस नाव पर बैठा सकती हूं जो प्रेम के सागर में, प्रेम की तंरगों पर क्रीड़ा करती हुई तुम्हे पार उतार दे। मैने उत्कंठित होकर पूछा—माता, तुम्हारा घर कहां है। बुढिया---बहुत नजदीक है बेटी, तुम चलों तो मैं अपनी आंखो पर बैठा कर ले चलूं। मुझे ऐसा मालूम हुआ कि यह कोई आकाश की देवी है। उसेक पीछ-पीछे चल पड़ी। आह! वह बुढिया, जिसे मैं आकाश की देवी समझती थी, नरक की डाइन निकली। मेरा सर्वनाश हो गया। मैं अमृत खोजती थी, विष मिला, निर्मल स्वच्छ प्रेम की प्यासी थी, गंदे विषाक्त नाले में गिर पड़ी वह वस्तु न मिलनी थी, न मिली। मैं सुशीला का –सा सुख चाहती थी, कुलटाओं की विषय-वासना नहीं। लेकिन जीवन-पथ में एक बार उलटी राह चलकर फिर सीधे मार्ग पर आना कठिन है? लेकिन मेरे अध:पतन का अपराध मेरे सिर नहीं, मेरे माता-पिता और उस बूढ़े पर है जो मेरा स्वामी बनना चाहता था। मैं यह पंक्तियां न लिखतीं, लेकिन इस विचार से लिख रही हूं कि मेरी आत्म-कथा पढ़कर लोगों की आंखे खुलें; मैं फिर कहती हूं कि अब भी अपनी बालिकाओ के लिए मत देखों धन, मत देखों जायदाद, मत देखों कुलीनता, केवल वर देखों। अगर उसके लिए जोड़ा का वर नहीं पा सकते तो लड़की को क्वारी रख छोड़ो, जहर दे कर मार डालो, गला घोंट डालो, पर किसी बूढ़े खूसट से मत ब्याहो। स्त्री सब-कुछ सह सकती है। दारुण से दारुण दु:ख, बड़े से बड़ा संकट, अगर नहीं सह सकती तो अपने यौवन-काल की उंमगो का कुचला जाना। रही मैं, मेरे लिए अब इस जीवन में कोई आशा नहीं । इस अधम दशा को भी उस दशा से न बदलूंगी, जिससे निकल कर आयी हूं। *******

  • रिश्तों का महत्व

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव घर की नई नवेली इकलौती बहू एक प्राइवेट बैंक में बड़े ओहदे पर थी। उसकी सास तकरीबन एक साल पहले ही गुज़र चुकी थी। घर में बुज़ुर्ग ससुर औऱ उसके पति के अलावा कोई न था। पति का अपना कारोबार था। पिछले कुछ दिनों से बहू के साथ एक विचित्र बात होती। बहू जब जल्दी-जल्दी घर का काम निपटा कर ऑफिस के लिए निकलती ठीक उसी वक़्त ससुर उसे आवाज़ देते और कहते बहू, मेरा चश्मा साफ कर मुझें देती जा। लगातार ऑफिस के लिए निकलते समय बहू के साथ यही होता। काम के दबाव औऱ देर होने के कारण क़भी-कभी बहू मन ही मन झल्ला जाती लेकिन फ़िर भी अपने ससुर को कुछ बोल नहीं पाती। जब बहू अपने ससुर के इस आदत से पूरी तरह ऊब गई तो उसने पूरे माजरे को अपने पति के साथ साझा किया। पति को भी अपने पिता के इस व्यवहार पर बड़ा ताज्जुब हुआ लेकिन उसने अपने पिता से कुछ नहीं कहा। पति ने अपनी पत्नी को सलाह दी कि तुम सुबह उठते के साथ ही पिताजी का चश्मा साफ करके उनके कमरे में रख दिया करो, फिर ये झमेला समाप्त हो जाएगा। अगले दिन बहू ने ऐसा ही किया औऱ अपने ससुर के चश्मे को सुबह ही अच्छी तरह साफ करके उनके कमरे में रख आई। लेकिन फ़िर भी उस दिन वही घटना पुनः हुई औऱ ऑफिस के लिए निकलने से ठीक पहले ससुर ने अपनी बहू को बुलाकर उसे चश्मा साफ़ करने के लिए कहा। बहू गुस्से में लाल हो गई लेकिन उसके पास कोई चारा नहीं था। बहू के लाख उपायों के बावजूद ससुर ने उसे सुबह ऑफिस जाते समय आवाज़ देना नहीं छोड़ा। धीरे-धीरे समय बीतता गया औऱ ऐसे ही कुछ वर्ष निकल गए। अब बहू पहले से कुछ बदल चुकी थी। धीरे-धीरे उसने अपने ससुर की बातों को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया और फ़िर ऐसा भी वक़्त चला आया जब बहू अपने ससुर को बिलकुल अनसुना करने लगी। ससुर के कुछ बोलने पर वह कोई प्रतिक्रिया नहीं देती औऱ बिलकुल ख़ामोशी से अपने काम में मस्त रहती। गुज़रते वक़्त के साथ ही एक दिन बेचारे बुज़ुर्ग ससुर भी गुज़र गए। समय का पहिया कहाँ रुकने वाला था, वो घूमता रहा घूमता रहा। छुट्टी का एक दिन था। अचानक बहू के मन में घर की साफ़ सफाई का ख़याल आया। वो अपने घर की सफ़ाई में जुट गई। तभी सफाई के दौरान मृत ससुर की डायरी उसके हाथ लग गई। बहू ने जब अपने ससुर की डायरी को पलटना शुरू किया तो उसके एक पन्ने पर लिखा था- "दिनांक 24-08-09... आज के इस भागदौड़ औऱ बेहद तनाव व संघर्ष भरी ज़िंदगी में, घर से निकलते समय, बच्चे अक्सर बड़ों का आशीर्वाद लेना भूल जाते हैं जबकि बुजुर्गों का यही आशीर्वाद मुश्किल समय में उनके लिए ढाल का काम करता है। बस इसीलिए, जब तुम चश्मा साफ कर मुझे देने के लिए झुकती थी तो मैं मन ही मन, अपना हाथ तुम्हारे सिर पर रख देता था क्योंकि मरने से पहले तुम्हारी सास ने मुझें कहा था कि बहू को अपनी बेटी की तरह प्यार से रखना औऱ उसे ये कभी भी मत महसूस होने देना कि वो अपने ससुराल में है औऱ हम उसके माँ बाप नहीं हैं। उसकी छोटी-मोटी गलतियों को उसकी नादानी समझकर माफ़ कर देना। वैसे मेरा आशीष सदा तुम्हारे साथ है बेटा!! डायरी पढ़कर बहू फूट-फूटकर रोने लगी। आज उसके ससुर को गुजरे ठीक 2 साल से ज़्यादा समय बीत चुके हैं लेकिन फ़िर भी वो रोज़ घर से बाहर निकलते समय अपने ससुर का चश्मा साफ़ कर, उनके टेबल पर रख दिया करती है, उनके अनदेखे हाथ से मिले आशीष की लालसा में। जीवन में हम रिश्तों का महत्व महसूस नहीं करते हैं, चाहे वो किसी से भी हो, कैसे भी हो और जब तक महसूस करते हैं तब तक वह हमसे बहुत दूर जा चुके होते हैं। इसलिए, रिश्तों के महत्व को समझें और उनको सहेज कर रखें। *********

  • JIMMY YOU ARE SWEET

    Dr. Jahan Singh 'JAHAN' Jimmy is wild beautiful lamb. Out of wilderness it came. To my vast ranch in deep wood. Near blue mountains with snow hood. A water stream across the green meadow. Trees in golden sun cast its shadow. It's sheer beauty of nature. Spread Likes God's signature. Jimmy dressed in white fur. Large brown eyes, soft long ear. Black horns in making. Walk like a doll dancing. Munching delicate grass green. Pearl white teeth showing in between. Jimmy has great human bond age. Love for young and old age. Playful with my family kids Krish, shaan, uddu, ladoo, akki. All happy go and lucky. Jimmy is love for all in ranch. Horse, dog, cow, even wooden bench. Some time Jimmy jumps in kitchen for tasty dish. Stay till he fulfil his wish. My little sweet Jimmy. Always love for me. ******

  • भविष्यवाणी

    मुकेश ‘नादान’ यह घटना सन्‌ 1877 की है, जब नरेंद्र अपने पिता के पास रायपुर चले आए थे। इस समय नरेंद्र पेट की बीमारी से पीडित थे। उन दिनों रायपुर में कोई शिक्षा सदन नहीं था, जिस कारण विश्वनाथ स्वयं अपने पुत्र को पढ़ाते थे। वहाँ रहकर नरेंद्र के स्वास्थ्य में सुधार होने लगा था। नरेंद्र के चरित्र का वास्तविक निर्माण रायपुर में हुआ। विश्वनाथ उन दिनों अवकाश पर थे, अतः अपने पुत्र को पूरा समय दे पाते थे। पाठय-पुस्तकों के अतिरिक्त नरेंद्र ने इतिहास, दर्शन तथा साहित्य संबंधी पुस्तकों को भी पढ़ना शुरू कर दिया था। उनकी स्मरणशक्ति तो तीव्र थी ही, उन्होंने शीघ ही बँगला साहित्य भी पढ़ लिया था। विश्वनाथ अपने पुत्र की इस विशेषता पर बड़े अचंभित होते थे। उनके घर नित्य रायपुर के ज्ञानी-गुणी व्यक्तियों का ताँता लगा रहता था, जिनके साथ विश्वनाथ साहित्य, दर्शन आदि विभिन्‍न विषयों पर चर्चा करते रहते थे। उस समय अधिकांशत: नरेंद्र भी पिता के साथ उपस्थित रहते थे और वाद-विवाद ध्यान से सुनते थे। कभी-कभी पिता के प्रोत्साहन पर नरेंद्र भी इस चर्चाओं में भाग लेते थे। उनके विचार सुनकर उपस्थित जन मुग्ध हो उठते थे। विश्वनाथ के एक मित्र बंग साहित्य के प्रसिदृध लेखक थे। एक दिन वे साहित्य पर वाद-विवाद करने लगे, तो उन्होंने नरेंद्र को भी इस चर्चा में बुला लिया। नरेंद्र ने जब बंग साहित्य पर उनसे चर्चा आरंभ की और प्रसिद्ध लेखकों की तर्कसंगत आलोचना की, तो वे चकित रह गए और बोले, “तुम अवश्य ही बंग भाषा को गौरवान्वित करोगे।” उनकी यह भविष्यवाणी आगे चलकर सत्य सिद्ध हुई। नरेंद्र के किशोर मन पर अपने पिता के व्यक्तित्व का गंभीर प्रभाव पड़ा। विश्वनाथ नरेंद्र की उद्‌डंता पर उन्हें कभी डाँटते नहीं थे, बल्कि प्रेम से समझाकर उन्हें सुधारने का प्रयास करते थे। नरेंद्र के पिता की इच्छा थी कि नरेंद्र की प्रतिभा का पूर्ण विकास हो और वह मात्र शिक्षा सदन के अध्ययन तक ही सीमित न रहे। विश्वनाथ की ज्ञान-गरिमा, उदारता तथा दूसरों के दुख में दुखी हो उठना, इन सभी बातों ने नरेंद्र पर गहरा प्रभाव डाला था। दो वर्ष रायपुर में रहकर नरेंद्र जब वापस आए, तो उनमें शारीरिक तथा मानसिक रूप से बहुत परिवर्तन आ चुका था। उनका पुनः मेट्रोपोलिटन में दाखिला हुआ, तब उन्होंने नौवीं और दसवीं कक्षा की एक वर्ष में ही तैयारी की। यही नहीं, दोनों कक्षाओं की परीक्षा में उन्होंने प्रथम श्रेणी प्राप्त की। इससे न सिर्फ उनके कुटुंबीजन बल्कि अध्यापक भी बहुत प्रसन्‍न हुए। ********

  • धोखेबाज

    डॉ. कृष्ण कांत श्रीवास्तव सालों पहले एक गांव में सूरज नाम का किसान अपनी पत्नी के साथ रहता था। किसान बूढ़ा था, लेकिन उसकी पत्नी जवान थी। इसी वजह से किसान की पत्नी दुखी रहती थी। वो हमेशा अपने ही जैसे जवान पुरुष से शादी करने की चाहत मन में रखती थी। महिला के मन की बात को एक चोर समझ गया। वो रोज महिला का पीछा करने लगा। एक दिन उसने किसान की पत्नी को ठगने के विचार से उसे एक झूठी कहानी सुनाई। चोर ने कहा, “सालों पहले मेरी पत्नी मुझे छोड़कर चली गई थी। अब मैं अकेला हूं। मैं तुम्हारी सुंदरता पर मोहित हो गया हूं और तुम्हें अपने साथ शहर ले जाना चाहता हूं।” स्त्री यह सुनते ही खुश हो गई। वो फटाफट बोली, “ठीक है मैं तुम्हारे साथ चलूंगी, लेकिन मेरे पति के पास बहुत धन है। पहले मैं उसे ले आती हूं। उन पैसों से हम जीवनभर आराम से रहेंगे।” यह सुनकर चोर ने कहा कि ठीक है तुम जाओ और लौटकर इसी जगह आना मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा। स्त्री घर पहुंची, तो देखा कि पति गहरी नींद में था। महिला ने सारे जेवर और नकदी को पोटली में बांधा और चोर के पास चली गई। किसान की पत्नी को आते देखकर चोर के मन में हुआ, अब मैं बहुत जल्दी धनवान बनने वाला हूं। बस अब इस महिला से पीछा छुड़ाने की तरकीब निकालनी होगी। तभी किसान की पत्नी चोर के पास पहुंची। उसके पहुंचते ही दोनों दूसरे शहर की ओर निकल गए। कुछ दूर चलने के बाद रास्ते में एक नदी मिली। नदी को देखते ही चोर को एक तरकीब सूझ गई। वह महिला से बोला, “देखो, नदी गहरी है। इसे मैं तुम्हें पार करवाऊंगा, लेकिन पहले मैं यह पोटली नदी के उस पार रखूंगा फिर तुम्हें साथ ले जाऊंगा।” स्त्री को चोर पर पूरा विश्वास था उसने कहा, “हां, ऐसा करना ठीक रहेगा।” फिर चोर ने कहा, “देखो, तुमने भारी जेवर पहने हैं। ये जेवर भी तुम मुझे दे दो, ताकि तुम्हें नदी पार करने में कोई बाधा न हो।” यह सुनते ही किसान की पत्नी ने अपने सारे जेवर चोर को दे दिए। पोटली में बंधा धन और महिला के जेवर लेकर चोर नदी के पार चला गया। महिला उसके लौटने का इंतजार करती रही, लेकिन वो फिर कभी लौट कर नहीं आया। अब महिला को बहुत दुख हुआ और उसकी आंखों से आंसू बहने लगे, लेकिन पछतावे के लिए तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उसका सारा पैसा और जेवर लेकर चोर जा चुका था। सार : धोखेबाजी का फल हमेशा बुरा ही होता है। व्यक्ति जैसा बोता है, वैसा ही काटता है। इसलिए, कहा जाता है कि हमेशा हर रिश्ते में ईमानदारी दिखानी चाहिए। *******

  • सच की जीत

    डॉ. कृष्ण कांत श्रीवास्तव एक दिन एक घुड़सवार अपने गुस्सैल घोड़े को बेचने के लिए बाजार ले जा रहा था। चलते-चलते उसे भूख लगी और वो खाना खाने के लिए एक बाग़ में रुक गया। उसने एक पेड़ से घोड़े को बांध दिया। घोडा पेड़ के नीचे लगी घास को खाने लगा और वो घुड़सवार भी खाना खाने लगा। तभी एक व्यक्ति अपने गधे के साथ आया और उसी पेड़ पर अपने गधे को बांधने लगा। यह देख घोड़े का मालिक बोला, ‘भाई अपने इस गधे को इस पेड़ पर मत बांधो, मेरा घोड़ा बहुत ही गुस्सैल है वह तुम्हारे इस गधे को मार डालेगा। गधे का मालिक बोला, “यह पेड़ केवल तुम्हारा नहीं है और मैं इस पर ही अपने गधे को बाँधूगा।” घोड़े का मालिक बोला, “यदि तुम मेरी बात नहीं मानोगे तो तुम खुद इसके जिम्मेदार होंगे।” गधे का मालिक नहीं माना और गधे को उसी पेड़ पर बांधकर चला गया। घोड़े ने उस गधे को लाते मारकर नीचे गिरा दिया। इससे पहले की घोड़े का मालिक उसे संभाल पाता घोड़े ने लाते मार-मार कर गधे को मार दिया। तभी गधे का मालिक आया और अपने मरे हुए गधे को देखकर चिल्लाने लगा, “अरे यह क्या तुम्हारे घोड़े ने मेरे गधे को मार दिया है अब मुझे मेरा गधा ला कर दो, नहीं तो मैं तुम्हें यहां से नहीं जाने दूंगा। घोड़े का मालिक बोला, ‘मैंने तो तुम्हें पहले ही कहा था कि मेरा घोड़ा गुस्सैल है। वह तुम्हारे इस गधे को मार देगा पर तुमने मेरी एक बात ना मानी। अब इसकी जिम्मेदारी तुम्हारी है, क्योंकि मैं पहले ही तुम्हें सावधान कर चुका था।” दोनों व्यक्ति बहस करने लगे। तभी एक राहगीर यह देख उनके पास आया और बोला, ‘तुम दोनों को राजा के दरवार जाना चाहिए वही न्याय करेंगे। दोनों सलाह मानकर राजा के दरबार की ओर न्याय के लिए चल दिए। दरवार में राजा ने गधे के मालिक से पूछा पूरी बात बताओ तुम्हार गधा कैसे मरा। गधे का मालिक बोला, “महाराज मेरा गधा और इसका घोडा एक ही पेड़ पर बंधें थे कि अचानक इसका घोडा पागल हो गया और उसने मेरे गधे को मार दिया। राजा ने घोड़े के मालिक से पूछा, ‘क्या तुम्हारे घोड़े ने ही गधे को मारा है, बताओ। तुम बोल क्यों नहीं रहे हो। क्या यह सच है। बार-बार पूछने पर भी घोड़े का मालिक कुछ नहीं बोला। राजा बोला “क्या तुम बहरे और गूंगे हो? क्या तुम बोल नहीं सकते? फिर गधे का मालिक अचानक बोला, महाराज यह व्यक्ति गूंगा बहरा नहीं है। पहले तो यह मुझसे खूब चीख-चीख कर बोल रहा था कि अपने घोड़े को इधर मत बांधों, मेरा घोड़ा इस गधे को मार देगा। अब आपके सामने गूंगा बहरा बनने का नाटक कर रहा है। यह सुन घोड़े का मालिक बोला, महाराज क्षमा करें, यह व्यक्ति बार-बार झूठ बोल रहा था। मैंने चुप रहने का नाटक किया जिससे यह अपने मुँह से सचाई बोल दे और इसने ऐसा ही किया। यह सुनकर राजा मुस्कुराने लगे और बोले “इसका मतलब इसने तुम्हें पहले ही सावधान कर दिया था कि घोडा गुस्सैल है। गधे को यहाँ मत बांधों पर तुमने इसकी बात नहीं मानी और फिर भी अपना गधा वही बाँध दिया। तुम्हारा झूठ पकड़ा गया है और अब तुम इसके लिए खुद जिम्मेदार हो। सार : झूठ नहीं बोलना चाहियें। झूठ को कितना भी छुपा लें सच सामने आ ही जाता है और झूठ पकड़ा जाता है। *******

  • बंद मुट्ठी

    दिवाकर पांडे आज़ मुनिया ने अपना और अपनी सास का किचिन हमेशा के लिए अलग कर लिया यह कहते हुए कि अब हमसे आपकी न नुकर और टोका-टाकी और नहीं सही जायेगी। देखने में ये भले अच्छा ना लगे पर सास को तो जैसे मन की मुराद मिल गई। जबसे बहु घर में आई है घर के काम और बढ़ गए कम तो नहीं हुए क्योंकि बहु ने कभी भी घर के कामों में रुचि नहीं दिखाई और न ही हमारे प्रति कोई अपनापन। जब देखो अपना सजना संवरना और मोबाइल पर अपने दोस्तों से घंटों बातें करना। और जब जी में आए उठकर मायके चल देना। बेटा भी उसकी इन हरकतों का विरोध नहीं करता। वह तो जैसे अपनी पत्नी के रूप सौंदर्य का गुलाम होकर रह गया है। सास अपने किचिन में कुछ पकाने की तैयारी कर रही थी कि उनकी रिश्ते की ननद अचानक उनके घर आ गयी। रामकली भाभी क्या कर रही हो? खाना पकाने की तैयारी कर रही हूं जीजी। ऐसा कहते हुए रामकली ने ननद के चरण स्पर्श कर लिए। आपकी बहुरानी कहां हैं? होंगी अपने कमरे में। क्यों? कुछ बात है क्या? हां, मैने बस इतना ही कहा कि बहु रोज-रोज ये जंक फूड, ये पैकेट वाली चीजें, बाहर का खाना तुम्हारी और तुम्हारे पेट में पल रहे बच्चे की सेहत के लिए ठीक नहीं हैं मेरा इतना कहना बहु को नागवार गुजरा और उसने मुझसे बात करना बंद कर दिया और आज तो किचिन भी अलग हो गया। भाभी आपकी बहु इस शहर के प्रतिष्ठित शंभूदयाल जी की बेटी है ना? हां,, वही है। वह तो बड़ी सुंदर और बहुत पढ़ी लिखी है। मुनिया की योग्यता और सुंदरता पर मुग्ध होकर ही एक बार हमने अपने बेटे का विवाह प्रस्ताव उनके घर भेजा था। काफी अनुनय विनय के बाद भी बात ना बन सकी। बाद में पता चला कि लड़के का रंग सांवला है। हमने सोचा था कि पढ़ी-लिखी बहु आएगी तो घर संवर जायेगा परन्तु आपकी बातें सुनकर तो लग रहा है कि जो हुआ सो अच्छा ही हुआ। अब हम कह सकते हैं कि "हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती।" रामकली ने एक लंबी सांस भरी और बोली हां, जीजी किसी ने सच ही कहा है कि बन्द मुट्ठी लाख की खुल जाए तो खाक की। ******

  • अपनेपन की मिठास

    अनजान “मैं तो सुबह से घूम-घूम कर थक गई हूं और कितना घूमना है।” रानी ने कहा। “अरे, अभी से थक गई हो ये तो कुछ भी नहीं है। ऐसे थकोगी तो बड़े-बड़े किलों को कैसे देखोगी। ऐतिहासिक स्थलों को देखने के लिए बहुत चलना पड़ता है और सीढ़ियां भी चढ़नी पड़ती हैं।” श्याम ने कहा। “फिर भी घूमते हुए बहुत समय हो गया है। मुझे तो भूख लग रही है और प्यास भी।” “हां, तो चलो हम सभी कुछ खा लेते हैं।” जतिन ने कहा। “चलो किसी होटल में चलते हैं।” श्याम बोले। नही, ये हमारा शहर है। आज मैं आप सब को अपनी मन पसंद दुकान से कुछ अपनी पसंद की स्वादिष्ट चीजे खिलाऊंगा।” और जतिन ने एक गली की तरफ इशारा किया, चलो वहां चलते हैं। रानी ने उस पतली सी गली को देखकर ही बुरा सा मुंह बना लिया और जतिन से बोली, “चलो हम तो उस होटल में चलते हैं। वहां आराम से बैठकर कुछ अच्छा खायेंगे।” सभी सहमत हुए। होटल में बैठकर सभी ने अपनी-अपनी पसंद की चीजों का ऑर्डर दे दिया। “अरे, जतिन कहां चले गए उन्हें क्या खाना है। वो भी ऑर्डर कर देते।” परंतु जतिन वहां नहीं थे। श्याम उनको देखने होटल के बाहर चले गए। वहां उन्होंने देखा तो जतिन उसी पतली गली में एक दुकान के सामने खड़े होकर मजे से कुछ खाते हुए दिखाई दिए। श्याम वापस आ गए। तब तक सबके मनपसंद ऑर्डर टेबिल पर आ चुके थे। सब खाने में व्यस्त हो गए। खाना खाकर जब सभी होटल से बाहर आए तो जतिन जी भी वही खड़े हुए दिखाई दिए। “अरे, आप भी कुछ खा लीजिए। कहां चले गए थे आप?” रानी ने पूछा। जतिन ने डकार लेते हुए कहा मैंने भरपेट रबड़ी-इमारती और कचौड़ी समोसा खाया है वह दुकान वाला सबसे अच्छी इमारती बनाता है। मेरा तो और कहीं खाने का मन ही नहीं करता। जो भी खाओ मन तृप्त हो जाता हैं और मैं तो घर के लिए लेकर भी जाता हूं। एक पैकेट की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा। हां, वो होटल वाला भी सब चीजें अच्छी बनाता है। फूले हुए भटूरे, कुरकुरा डोसा और मजेदार चाइनीज। वाह !! क्या स्वाद है सभी चीजों में। सभी ने एक स्वर में कहा। हां, होटल वाले भी अच्छा बनाते हैं परन्तु बात आत्म संतुष्टि की है जो मुझे इसी दुकान पर मिलती है। मैंने बचपन से ही मोहन हलबाई की दुकान की रबड़ी, इमारती खाई है जो मुझे आज भी पसंद है। बहुत देर से सुन रही रानी ने कहा यह तो जतिन जी अपने शहर की अपनेपन की मिठास है जो सब जगह नहीं मिलती है। ******

  • मेरी अभिलाषा

    मोहिनी शर्मा मैं वो कल बनना नहीं चाहती, जिसमें सिर्फ शेरों शायरी की बातें हो। मैं वो आज बनना चाहती हूं, जिसमें तुम्हारी, मेरी और जीवन, की ढेरों प्यारी बातें हो। जिसमें सलीक़ा हो जीने का, थोड़ी खट्टी थोड़ी मीठी तकरार हो, मैं वो ग़ज़ल बनना चाहूँगी, जिसे तुम गाओ मेरे लिए। मैं वो बहार बनना चाहूँगी । जिसमें कुछ गुनगुनाओ तुम मेरे लिए। हर मौसम हम साथ रहे, एक खूबसूरत एहसास की तरह। मैं वो शब्द बनना चाहूँगी, जिसे तुम बोलो रोज सुबह शाम मेरे लिए। मैं वक़्त की वो याद बनना चाहती हूं, जिसे जब भी तुम पढ़ो तो मुस्कराओ मेरे लिए। मैं वो कल बनना नहीं चाहती, जिसमें सिर्फ शेरों शायरी की बातें हो। मैं वो आज बनना चाहती हूं, जिसमें तुम्हारी मेरी और जीवन की ढेरों प्यारी बातें हो। *****

  • यादें

    ओम प्रकाश तिवारी बात-बात में बात हो गई। पार उमरिया साठ हो गई।। अम्मा ने जो की बतकहियाँ। आज वही ज़ज्बात हो गई।। पिता तुम्हारे संघर्षों की। सीख मेरी सौगात हो गई।। उतने पाँव पसारे जितनी। चादर की औकात हो गई।। ऐसा प्यार मिला मित्रों का। जब चाहा बरसात हो गई।। तीन बेटियाँ रत्न स्वरूपा। मिलीं तो फिर क्या बात हो गई।। जीवन साथी साथ तुम्हारा। खुशियाँ सब खैरात हो गई।। ऋतु वसंत बन गई जिंदगी। सब कुछ रातों-रात हो गई।। *******

  • Earth

    Acharya jahan Oh ! Large heart Mother Earth. You only follow rule of Give, gave and given. We made hell out of this heaven. Robbed your beautiful green dress. Stolen your blue water pools. Hurt your body with sharp blasting tools . Oh ! Mother you are in the hands of cruel sons. Poisoned your air to suffocate. Made you thirsty, hungry and breathless. All our such acts are senseless. How long you will continue this journey. How long you will endure this agony. Robbing your health and wealth. Singing the last song of death. Oh! Mother earth They forget if mother goes. Can offspring survive. No, how hard they strive . Beware its thunder blunder. Stop changing nature's calendar. *******

  • तुम हो किंचित निकट यहीं

    तुम हो किंचित निकट यहीं महेन्द्र मुकुंन्द पिय! तुम हो किंचित निकट यहीं.......... ऐसा होता आभास मुझे। मृदु-गंध-पवन तन छू मेरा, देकर जाती विश्वास मुझे। तजि लोक-लाज, सब को विसारि, तेरी छवि में सब को भूली। सावन की शीत-समीर बही , मैं स्मृति के झूला झूली। घनघोर घटाओं का गर्जन, दामिनि दमके हिय कम्प करे, यह दिवस लगे वैरी मुझको, अब भाता नहीं उजास मुझे। पिय! तुम हो किंचित निकट यहीं......... अनुप्राणित प्राण किए तुमको, जग-बंधन तोड़ दिए मैंने। होतव्य! सुकृत-कृत-अकृत सब, हवि आहुति छोड़ दिए मैंने। छवि दरश परे यह परम-लालसा, पीर घनी देती मुझको, हृग पथराये हैं पथ देखत, छोड़े जाती हैं साँस मुझे। पिय! तुम हो किंचित निकट यहीं ...........

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