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  • मन मेरा

    अलका बहेटी दर्द अपना सागर ने ऐसे छलकाया, सीने के तूफान को सतह पर उठाया। चोट खाता है जो मोहब्बत में गहरी, वो ही तो काबिल शायर हो पाया। नींद रात भर करवटें बदलती रही, और इल्जाम सूनी यादों पर लगाया। पीले पड़े पत्तों को तो झड़ना ही था, महीनों के कटघरे में पतझड़ आया। पेड़ टुकुर टुकुर तकता रहा घरौंदा, उड़ा जो पंछी फिर लौट नहीं पाया। रिश्ते नाते तो बस सांसों से निभते, मरे बदन को तो अपनों ने जलाया। आसमान की बोली लगा रही ज़मीन, हवाई पंखों ने क्या खूब उसे उड़ाया। मौसम की राहों से आंखों में उतरे, बूंदों को*मन मेरा* कुछ ऐसा भाया। *********

  • कारवाँ गुज़र गया

    गोपाल दास नीरज स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे। कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे। नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई पात-पात झर गए कि शाख़-शाख़ जल गई चाह तो निकल सकी न पर उमर निकल गई गीत अश्क बन गए छंद हो दफन गए साथ के सभी दिऐ धुआँ पहन पहन गए और हम झुके-झुके मोड़ पर रुके-रुके उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे। कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे। क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा क्या जमाल था कि देख आइना मचल उठा इस तरफ़ जमीन और आसमाँ उधर उठा थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा एक दिन मगर यहाँ ऐसी कुछ हवा चली लुट गई कली-कली कि घुट गई गली-गली और हम लुटे-लुटे वक्त से पिटे-पिटे साँस की शराब का खुमार देखते रहे। कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे। हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ हो सका न कुछ मगर शाम बन गई सहर वह उठी लहर कि ढह गये किले बिखर-बिखर और हम डरे-डरे नीर नैन में भरे ओढ़कर कफ़न पड़े मज़ार देखते रहे। कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे। माँग भर चली कि एक जब नई-नई किरन ढोलकें धुमुक उठीं ठुमक उठे चरन-चरन शोर मच गया कि लो चली दुल्हन चली दुल्हन गाँव सब उमड़ पड़ा बहक उठे नयन-नयन पर तभी ज़हर भरी गाज़ एक वह गिरी पुँछ गया सिंदूर तार-तार हुई चूनरी और हम अजान से दूर के मकान से पालकी लिये हुए कहार देखते रहे। कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे। ********

  • कल की कल सोचेंगे

    अनजान सेठ जमनालाल बजाज ने संकल्प लिया था कि वे आजीवन स्वदेशी वस्तुओं का ही उपयोग करेंगे। उनकी प्रतिज्ञा यह भी थी कि वे प्रतिदिन किसी-न-किसी संत महात्मा या विद्वान् का सत्संग करेंगे। एक दिन वे एक संत का सत्संग करने पहुँचे। बातचीत के दौरान उन्होंने कहा, ‘महाराज, आप जैसे संतों के आशीर्वाद से मैंने अपने जीवन में आय के इतने साधन अर्जित कर लिए हैं कि मेरी सात पीढ़ियों को कमाने की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। आठवीं पीढ़ी की कभी-कभी मुझे चिंता होती है कि उसके भाग्य में पता नहीं क्या होगा?” संतजी ने कहा, ‘सेठजी, आठवीं पीढ़ी की चिंता आप न करें। कल सवेरे आप यहाँ आ जाएँ। आपकी सभी चिंताओं का समाधान हो जाएगा।’ सेठ जमनालाल बजाज सुबह-सुबह उनकी कुटिया पर जा पहुँचे। संत ने कहा, ‘सेठजी, गाँव के मंदिर के पास झाडू बनाने वाला एक गरीब परिवार झोंपड़पट्टी में रहता है। पहले आप उसे एक दिन के भोजन के लिए दाल-आटा दे आओ। उसके बाद मैं आपको वह युक्ति बताऊँगा।’ सेठ जमनालाल आटा-दाल लेकर उस झोंपड़ी पर पहुँचे। दरवाजे पर आवाज देते ही एक वृद्धा निकलकर बाहर आई। सेठजी ने उसे लाया हुआ खाद्यान्न थमाया, तो वह बोली, ‘बेटा, इसे वापस ले जा। आज का दाना पानी तो आ गया है।‘ जमनालालजी ने कहा, ‘तो कल के लिए इसे रख लो।’ वृद्धा बोली, ‘जब ईश्वर ने आज का इंतजाम कर दिया है, तो कल का भी वह अवश्य करेगा। आप इसे किसी जरूरतमंद को दे देना।’ वृद्धा के शब्द सुनकर सेठ जमनालाल बजाज पानी-पानी हो गए। उन्होंने विरक्ति और त्याग की मूर्ति उस वृद्धा के चरण छूकर आशीर्वाद माँगा और वापस हो गए। इस घटना के बाद वे स्वयं कहा करते थे, ‘कर्म करते रहो, ईश्वर की कृपा से आवश्यकताओं की पूर्ति स्वतः होती रहेगी।’ ********

  • यह दर्द कहां मैं छुपाऊं

    पिंकी सिंघल चाहूं जो रोना खुलकर मैं, तो कभी रो न पाऊं तुम ही बताओ, मैं हृदय में उठता दर्द कहां छुपाऊं बेहिसाब दर्द दिया माना तूने, यूं बहुत दूर मुझसे जाकर मैं सोचूं भी जो तुझसे दूर होना, तो कभी हो न पाऊं तुम हो गए हो शामिल, मेरे वजूद में कुछ इस तरह से कि चाहूं भी तुम्हें गर भुलाना, तो भुला न पाऊं मेरे जीने का सहारा बन गई हैं, सब स्मृतियां तुम्हारी तुम्हारी यादों को तुम ही बताओ, अब मैं कैसे बिसराऊं कोई समझे न कभी पीर यहां, किसी भी बेगाने की तुम्हारे सिवा बताओ, उम्मीद अब मैं किससे लगाऊं हो तुम ही इबादत मेरी, हैं ये सांसें भी तुमसे होकर जुदा तुमसे जीना अब, बड़ा मुश्किल मैं पाऊं लाफ़ानी है मेरा इश्क़ यह तुमसे, इतना जान लो तुम तुम्हारे सिवा बात यह बताओ और मैं किसको बताऊं है संतप्त रूह माना बहुत, तुमसे अज़ीज़ पर कुछ नहीं तुम्हें भूलने से पहले मेरी जान, जान से मैं जाऊं *******

  • शब्दों का महत्त्व

    डॉ. कृष्ण कांत श्रीवास्तव हमारे जीवन में शब्दों का इतना महत्त्व क्यों है? ये शब्द ही है जो हमें अपने भविष्य को संवारने में सहयोग करते हैं। शब्दों में ही जीवन का सार छिपा हुआ हैं। सौहार्दपूर्ण आचरण और दूसरों के प्रति सम्मान रखने की भावना से ही व्यक्तित्व में आकर्षण आ सकता है। हमारे शब्दों से ही हमारा व्यक्तित्व, आचरण और व्यवहार जुड़े हुए हैं। शब्दों को चालाकियों से मुक्त करने की आवश्यकता है। हम सब इन शब्दों के आधार पर ही कमाते है, और जीवन में सफलता मिलेगी या नहीं यह सब हमारे शब्द, व्यवहार और कार्य करने की शैली पर निर्भर करता है। एक खुशमिजाज और सादगीपूर्ण जीवन बिताने के लिए हमें अपने बोलने और सोचने के तरीकों में सुधार करने की आवश्यकता होगी। ये बोल ही है जो हमें आसमान की ऊंचाइयों तक भी पहुंचा सकते हैं और जमीन पर औंधे मुंह भी गिरा सकते हैं। अपने जीवन में हर व्यक्ति अच्छा प्रयास करता है लेकिन सही दिशा में किया गया प्रयास हमेशा अच्छा परिणाम देता है। सही दिशा का चिंतन करने के लिए अच्छी समझ और कुशल होना बहुत जरूरी है। एक अच्छी समझ अच्छे शब्दों के निरंतर प्रयोग और व्यवहार की कुशलता से ही विकसित की जा सकती हैं। सफल होने के लिए प्रेरित करने वाले लोगों के साथ ज्यादा से ज्यादा जुड़े और उनकी बातों को, शब्दों को अपने जीवन में प्रयोग करने का प्रयास करें। कई बार हम अपने शब्दों में बदलाव करना चाहते हैं परन्तु नई आदतों को विकसित करने में असफल हो जाते हैं। शब्दों का इस्तेमाल बड़े ही सावधानी से करने की आवश्यकता है। इसीलिए कहा गया है कि सोच समझ कर बोलना ही हितकारी है। हमें अपने आंकलन में इन चीजों को प्राथमिकता देनी होगी। तभी हम अपने आप को बेहतर ढंग से विकसित कर सकते हैं। हम हमेशा नकारात्मक शब्दों को ज्यादा महत्व देते हैं। ये काम मुझसे नहीं होगा, मेरी तो इतनी बुद्धि ही नहीं है, मैं तो बहुत परेशान हूं, मेरे पास रुपए रुकते ही नहीं है इत्यादि। इन शब्दों को हम बड़े ही कुशलता से प्रयोग करते हैं बिना इनके नुकसान को समझे। जिस प्रकार मंत्रों का उच्चारण निरंतर करते रहने से ही मिलता है ठीक वैसे ही जब हम अपने जीवन में अच्छे और बुरे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं तो इनका सीधा असर हमारे व्यक्तित्व पर पड़ता है। अगर हम किसी से अपशब्द कहे तो क्या वो हमें एक भद्र पुरुष समझेगा? नहीं। किसी को अपशब्द बोल कर हम अपनी असभ्यता और अशिक्षित होने का प्रमाण देते हैं। क्या इस विषय में चिंतन करने की आवश्यकता नहीं है? क्या हमें अपने बारे में सोचने और समझने की जरूरत नहीं है। मैं समझता हूं कि इसकी बहुत अधिक आवश्यकता है। आपसी बातचीत में सदैव अच्छे शब्दों का चयन हमारे व्यक्तित्व और स्वभाव को बेहतर बनाने के लिए बहुत आवश्यक है। अच्छी आदतें को विकसित करना थोड़ा मुश्किल होता है लेकिन परिणामस्वरूप हमें जो पहचान मिलती है वो बेमिसाल होती हैं। बुरी आदतों को अपनाने की आवश्यकता नहीं पड़ती वो तो अच्छी आदतों के अभाव में स्वयं ही हमारे साथ आ जाती हैं। जिस तरह एक-एक ईंट से महल बन जाता है उसी तरह हमारे द्वारा बोले गए एक-एक शब्द से हमारे जीवन में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। जैसे सोने की अशुद्धता को हटाने के लिए उसे एक निश्चित डिग्री तक तपाया जाता है। वैसे ही हमें भी अपने शब्दों, अपने व्यवहार और अपने आचरण की पवित्रता बनाए रखने की आवश्यकता है। इन विशेषताओं को अपनाने में मेहनत तो करनी होगी क्योंकि बड़ा बदलाव लाने में समय और मेहनत दोनों की आवश्यकता होती है। शब्दों का संबंध प्रगाढ़ प्रेम से है, साथ ही शब्दों की तुलना तीर से भी की गई है। शब्दों को बदलने का मौका नहीं मिलता जीवन में इस बात को समझना बहुत जरूरी है। हमें खुद को प्रेरित करना होगा, स्वयं को ट्रेनिंग देने की आवश्यकता है। सब कुछ संभव है बस बिना घबराएं, बिना रूके कोशिश करनी होगी। कोशिश करना ही हमारे हाथ में है। आमतौर पर हम छोटी सफलता हासिल होने पर संतुष्ट हो जाते हैं और फिर अपने आप को स्थाई रूप दे देते हैं। ये संतुलन बनाना होगा, हमें संतोष रखते हुए भी आगे बढ़ने का लगातार प्रयास करना होगा। पूर्णता हासिल करना हमारा लक्ष्य नहीं होना चाहिए क्योंकि पूर्णता की लालसा में हम छोटे बदलावों से भी हाथ धो बैठते हैं। शब्दों का इतना प्रगाढ़ महत्व है हमारे जीवन में कि कुछ ग़लत शब्दों के प्रयोग से हमारा प्रगाढ़ मित्र भी तुरंत दुश्मन बन सकता है। दोबारा मित्र बनाने में समय लगता है। परिस्थितियां चाहें कितनी भी अच्छी या बुरी क्यों न हो कोशिश यही करनी चाहिए कि शब्दों का संतुलन बना कर रखा जाए। या फिर मौन रहकर भी अद्भुत परिणाम हासिल किए जा सकते। सफल होने के लिए शब्दों की सटीकता के साथ-साथ खुद को अच्छे विचारों और भावनाओं से भरपूर करते रहना होगा। दुनिया की परवाह किए बगैर स्वयं को बेहतर ढंग से विकसित करने का प्रयास करते रहना होगा। सीखने के लिए कभी भी आलस्य न करें। क्योंकि हमेशा सीखते रहने से हमारे व्यक्तित्व और जीवन में निखार आता रहता है। अच्छी आदतों और बातों को जितना जल्दी हो सके उतना सीख लेना आवश्यक है। अपने व्यवहार में परिवर्तन करके हम वो सब हासिल कर सकते है जिनकी सामान्य व्यक्ति कल्पना करता है। अपनी क्षमताओं को बेहतर बनाना ही हम सब का प्रयास होना चाहिए। सब एक दूसरे को पीछे धकेलने में लगे हुए हैं। अगर हम दूसरों की सफलताओं पर खुश होना सीख गए तो हमारे सफल होने की आधे से ज्यादा प्रतिशत संभावना बढ़ जाती है। अपनी शब्दावली का नियमित आंकलन एक बेहतर परिणाम दे सकता हैं। हमारे शब्द ही है जिनको लोग वर्षों तक याद रखते हैं। हालांकि, हमारी कोशिश यही होती है कि बेहतर ढंग से खुद को प्रस्तुत करें, अच्छा व्यवहार करें। लेकिन पूरी जानकारी के अभाव में और शब्दों को चालाकियों से प्रयोग करने के कारण हम व्यवहार कुशलता में पिछड़ते जा रहें हैं। पछतावा करने से बेहतर होगा कुछ रचनात्मक कार्य किए जाएं। शब्दों का बेहतर प्रयोग पर ही हमारी सफलता और खुशियां निर्भर करती है। *******

  • किसके साथ

    गोपेंद्र कुमार सिन्हा गौतम सोनेलाल शाह द्वारा ग्रामीणों को पूरे सावन देवधर जाने के लिए मुफ्त में बस उपलब्ध करवाने पर भगेडन पांडे ने बधाई देते हुए कहा शाह जी आप बड़े नेकदिल इंसान हैं जरा गांव की नाली साफ करवा देते तो ग्रामवासियों को नाली से उठ रही बदबू और उससे बीमारी फैलने के डर से मुक्ति मिलती। आप तो जानते ही हैं पिछले वर्ष बीमारी फैलने से ग्रामवासियों में किस तरह दहशत व्याप्त हो गई थी। वह तो शुक्र मनाइए डॉ. आर एस यादव का जिन्होंने अपनी जान पर खेलकर ग्रामवासियों की जान बचाई थी। फिर भी मंगल राजवंशी की जोरू का निधन हो गया था। जिसपर सोनेलाल शाह ने कहा 'गांव की सारी समस्याओं का जिम्मा क्या मेरे ऊपर है यह काम मेरा नहीं सरकार है, जाकर उनसे फरियाद कीजिए।' भगेड़न पांडे निराश हताश डॉ. आर एस यादव के पास पहुंचे और उनसे आग्रह किया कि इस वर्ष भी गांव में महामारी न फैल जाए इसके लिए गांव की नालियों में दवा का छिड़काव करवा दिया जाए। डॉक्टर ने उनकी बात सुनते ही अपने कंपाउंडर को निर्देश दिया कि कल हर हाल में गांव के प्रत्येक नालियों में दवा का छिड़काव सुनिश्चित किया जाए'। लेकिन डॉ यादव ने उन्हें सचेत करते हुए कहा दवा का छिड़काव तो हो जाएगा लेकिन यह अस्थाई व्यवस्था है, स्थाई निराकरण के लिए हर हाल में नाली की नियमित सफाई करवानी होगी। डॉक्टर से आश्वासन मिलने के बाद भगेड़न पांडे गांव में लौटे और सीधे गांव के 'फूले टोला' में जाकर लोगों से कहा, जहां के लोग ही पिछले साल ज्यादा प्रभावित हुए थे, 'अगर इस वर्ष भी गांव की नाली साफ नहीं हुई तो फिर से 'महामारी' फैल सकती है।' 'पुरुषोत्तम राज' जो उस टोले का सबसे पढ़ा लिखा नौजवान था उसने भगड़ेन पांडे की बात सुनते ही उन्हें आश्वस्त किया कि हम आपके साथ हैं। हमें हर हाल में गांव की नाली की सफाई करनी होगी। आप इसके लिए कल एक आम सभा बी पी मंडल लाइब्रेरी में बुलाईये। हम लोग वहीं विचार करेंगे, किस तरह से इस समस्या का समाधान होगा। उसी दिन संध्या को समूचे गांव में डुगडुगी पीटवा दी गई कि गांव में नाली सफाई के मुद्दे पर आगामी रविवार को 'बी पी मंडल लाइब्रेरी' में दोपहर 1:00 बजे से एक आम सभा आयोजित की गई है। सभा में शहर के मशहूर डॉक्टर 'आर एस यादव' भी पधार रहे हैं जिन्होंने पिछले वर्ष गांव के कई लोगों की जान बचाई थी। रविवार को सुबह से ही लाइब्रेरी के आसपास लोग इकट्ठा होने लगे और लाइब्रेरी परिसर की साफ-सफाई भी कर दी गई। क्योंकि बरसात के शुरुआत में हुई बारिश से लाइब्रेरी परिसर के कुछ हिस्से में घास फूंस उग आए थे। 12:00 बजे तक पूरी लाइब्रेरी ग्राम वासियों से अंट चुकी थी। निर्धारित समय से कुछ पहले ही डॉ यादव भी पहुंच गए। ग्रामवासियों ने उनका जोरदार स्वागत किया। जिसका नेतृत्व छेदी महतो, पुकार राम, वीरेंद्र भगत, सियामनी राजभर, कुलवंती पटेल, सोनी चौधरी, विमलेश्वरी यादव आदि ग्रामवासियों ने किया। जबकि सभा के लिए व्यवस्था भगेड़न पांडे, मनोहर कुमार, पुरूषोत्तम राज, जिया कुजूर एवं मोना यादव संभाल रहे थे। "डाक्टर यादव' ने सर्वप्रथम मंगल राजवंशी से मिलकर हाल-चाल जाना जिसकी जोरू पिछले वर्ष महामारी से काल कवलित हो गई थी। उधर बैठक की कार्रवाई शुरू हो गई। जिसकी अध्यक्षता गांव के सबसे वयोवृद्ध देव नारायण यादव को सौंपी गई। जो एक अवकाश प्राप्त कृषि परामर्शी एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं। साथ ही ग्रामवासियों के सुख-दुख में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते रहते हैं। एक-एक कर ग्रामवासियों ने अपने-अपने विचार व्यक्त किये। 'भगेड़न पांडे' ने सोनेलाल शाह और डाक्टर यादव' से हुई बात भी ग्रामवासियों के बीच रखी और उनसे कहा कि अब आप ही लोग अपना निर्णय दिजिए हमें किसके द्वारा तय किए गए रास्ते पर चलने की जरूरत है? ग्रामवासियों ने समवेत स्वर में कहा हमें 'डॉ यादव' द्वारा बताए गए रास्ते पर चलना चाहिए। जब हम बचेंगे तब तो कहीं की यात्रा करेंगे। हम सभी ग्रामीण कल सुबह से ही अपने-अपने घर के सामने नाली की सफाई करेंगे और उसे निकले कचरे को सड़क के किनारे गड्ढे में दबा देंगे जिसका उपयोग बाद में खेती के कार्यों में किया जाएगा। डॉ यादव ने अपने हाथ में माइक थामते हुए ग्रामवासियों को धन्यवाद दिया और उन्हें साफ सफाई के महत्व के बारे में समझाया। डॉक्टर यादव ने 'भगेड़न पांडे' के प्रयास को सराहा और ग्रामवासियों से कहा– ‘अगर गांव में एक भी जागरूक नागरिक होगा तो उस गांव का कोई इंसान क्या प्रकृति भी बाल बांका नहीं कर सकती।’ सभी लोगों ने एक सुर में जयकारा लगाते हुए कहा सबसे पहले 'साफ-सफाई' ताकि किसी को खरीदना नहीं पड़े 'दवाई'। जिएंगे तो 'यात्रा' गंदगी रही तो 'खतरा'। **********

  • मैं लिखती हूं…

    मीनाक्षी पाठक मन कही कह नही पाती तब कविताएं लिखती हूं दर्द दिल का जब सह नहीं पाती तब कविताएं लिखती हूं भीड़ मैं हूं खुद को जब तन्हा पाती तब कविताएं लिखती हूं खुशी और गम में जब तुमको नही पाती तब कविताएं लिखती हूं अंधेरी रातों में जब देख नही पाती तब कविताएं लिखती हूं जब सांसों की आवाज महसूस कर नही पाती तब कविताएं लिखती हूं जिंदगी का मर्म जब समझ नहीं पाती तब कविताएं लिखती हूं अपने ही शब्दो में जब खुद को ढूंढ नही पाती तब कविताएं लिखती हूं तुम्हे जब इन कविताओं में सुन नही पाती तब कविताएं लिखती हूं.... ******

  • ESCAPE

    Aastha Awasthi Sometimes I wonder Which is right The bower of darkness Or the shower of light? The dark assures Calm and composure. The light promises A dazzling exposure. But I stand here. Right on the threshold. And both the sides Are sights to behold. You can say that I am indecisive. I've been unsure. Meek and submissive. The dark I enjoy. It's complacent stagnation. The light is alluring It's an irresistible exhilaration. But then I'm no hero. I've faults many. The darkness is a shelter. It hides weakness any. Will the light be So very protective? Or will it be harsh. And cruelly invective? And the truth is That light doesn't last long It is darkness which Has the more endearing song I'm too scared to be Seduced by the light. But deep in the dark I dream of shining bright. *****

  • पंचिंग बैग

    निम्मी अरोड़ा बेटा घर में घुसते ही बोला, “मम्मी कुछ खाने को दे दो यार बहुत भूख लगी है। यह सुनते ही मैंने कहा,"बोला था ना ले जा कुछ कॉलेज, सब्जी तो बना ही रखी थी।” बेटा बोला, “यार मम्मी अपना ज्ञान ना अपने पास रखा करो। अभी जो कहा हूँ वो कर दो बस और हाँ, रात को ढंग का खाना बनाना। पहले ही मेरा दिन अच्छा नहीं गया है।” कमरे में गई तो उसकी आंख लग गई थी। मैंने जाकर उसको जगा दिया कि कुछ खा कर सो जाए। चीख कर वो मेरे ऊपर आया कि जब आँख लग गई थी तो उठाया क्यों तुमने? मैंने कहा तूने ही तो कुछ बनाने को कहा था। वो बोला, “मम्मी एक तो कॉलेज में टेंशन ऊपर से तुम यह अजीब से काम करती हो। दिमाग लगा लिया करो कभी तो।” तभी घंटी बजी तो बेटी भी आ गई थी। मैंने प्यार से पूछा, “आ गई मेरी बेटी कैसा था दिन?” बैग पटक कर बोली, “मम्मी आज पेपर अच्छा नहीं हुआ।” मैंने कहा, “कोई बात नहीं। अगली बार अच्छा कर लेना।” मेरी बेटी चीख कर बोली, “अगली बार क्या रिजल्ट तो अभी खराब हुआ ना। मम्मी यार तुम जाओ यहाँ से। तुमको कुछ नहीं पता।” मैं उसके कमरे से भी निकल आई। शाम को पतिदेव आए तो उनका भी मुँह लाल था। थोड़ी बात करने की कोशिश की, जानने की कोशिश कि तो वो भी झल्ला के बोले, “यार मुझे अकेला छोड़ दो। पहले ही बॉस ने क्लास ले ली है और अब तुम शुरू हो गई।” आज कितने सालों से यही सुनती आ रही थी। सबकी पंचिंग बैग मैं ही थी। हम औरतें भी ना अपनी इज्ज़त करवानी आती ही नहीं। मैं सबको खाना खिला कर कमरे में चली गई। अगले दिन से मैंने किसी से भी पूछना कहना बंद कर दिया। जो जैसा कहता कर के दे देती। पति आते तो चाय दे देती और अपने कमरे में चली जाती। पूछना ही बंद कर दिया कि दिन कैसा था? बेटा कॉलेज और बेटी स्कूल से आती तो मैं कुछ ना बोलती ना पूछती। यह सिलसिला काफी दिन चला। संडे वाले दिन तीनों मेरे पास आए और बोले तबियत ठीक है ना? क्या हुआ है इतने दिनों से चुप हो। बच्चे भी हैरान थे। थोड़ी देर चुप रहने के बाद में बोली। मैं तुम लोगो की पंचिंग बैग हूँ क्या? जो आता है अपना गुस्सा या अपना चिड़चिड़ापन मुझपे निकाल देता है। मैं भी इंतज़ार करती हूं तुम लोंगो का। पूरा दिन काम करके कि अब मेरे बच्चे आएंगे, पति आएंगे दो बोल बोलेंगे प्यार के और तुम लोग आते ही मुझे पंच करना शुरु कर देते हो। अगर तुम लोगों का दिन अच्छा नहीं गया तो क्या वो मेरी गलती है? हर बार मुझे झिड़कना सही है? कभी तुमने पूछा कि मुझे दिन भर में कोई तकलीफ तो नहीं हुई। तीनों चुप थे। सही तो कहा मैंने दरवाजे पे लटका पंचिंग बैग समझ लिया है मुझे। जो आता है मुक्का मार के चलता बनता है। तीनों शरमिंदा थे। दोस्तों हर माँ, हर बीवी अपने बच्चों और पति के घर लौटने का इंतज़ार करती है। उनसे पूछती है कि दिन भर में सब ठीक था या नहीं। लेकिन कभी-कभी हम उनको ग्रांटेड ले लेते हैं। हर चीज़ का गुस्सा उन पर निकालते हैं। कभी-कभी तो यह ठीक है लेकिन अगर ये आपके घरवालों की आदत बन जाए तो आप आज से ही सबका पंचिंग बैग बनना बंद कर दें। सभी महिलाओं को समर्पित* तुम… खुद को कम मत आँको, खुद पर गर्व करो। क्योंकि तुम हो तो थाली में गर्म रोटी है। ममता की ठंडक है, प्यार की ऊष्मा है। तुमसे, घर में संझा बाती है घर घर है। घर लौटने की इच्छा है। क्या बना है रसोई में आज झांककर देखने की चाहत है। तुमसे, पूजा की थाली है, रिश्तों के अनुबंध हैं पड़ोसी से संबंध हैं। घर की घड़ी तुम हो, सोना जागना खाना सब तुमसे है। त्योहार होंगे तुम बिन? तुम्हीं हो दीवाली का दीपक, होली के सारे रंग, विजय की लक्ष्मी, रक्षा का सूत्र! हो तुम। इंतजार में घर का खुला दरवाजा हो, रोशनी की खिडक़ी हो ममता का आकाश तुम ही हो। समंदर हो तुम प्यार का, तुम क्या हो… खुद को जानो! उन्हें बताओ जो तुम्हें जानते नहीं, कहते हैं। तुम करती क्या हो। ******

  • विश्वास

    मुंशी प्रेमचंद उन दिनों मिस जोसी बम्बई सभ्य-समाज की राधिका थी। थी तो वह एक छोटी सी कन्या पाठशाला की अध्यापिका पर उसका ठाट-बाट, मान-सम्मान बड़ी-बडी धन-रानियों को भी लज्जित करता था। वह एक बड़े महल में रहती थी, जो किसी जमाने में सतारा के महाराज का निवास-स्थान था। वहॉँ सारे दिन नगर के रईसों, राजों, राज-कमचारियों का तांता लगा रहता था। वह सारे प्रांत के धन और कीर्ति के उपासकों की देवी थी। अगर किसी को खिताब का खब्त था तो वह मिस जोशी की खुशामद करता था। किसी को अपने या संबधी के लिए कोई अच्छा ओहदा दिलाने की धुन थी तो वह मिस जोशी की अराधना करता था। सरकारी इमारतों के ठेके; नमक, शराब, अफीम आदि सरकारी चीजों के ठेके; लोहे-लकड़ी, कल-पुरजे आदि के ठेके सब मिस जोशी ही के हाथो में थे। जो कुछ करती थी वही करती थी, जो कुछ होता था उसी के हाथो होता था। जिस वक्त वह अपनी अरबी घोड़ो की फिटन पर सैर करने निकलती तो रईसों की सवारियां आप ही आप रास्ते से हट जाती थी, बड़े दुकानदार खड़े हो-हो कर सलाम करने लगते थे। वह रूपवती थी, लेकिन नगर में उससे बढ़कर रूपवती रमणियां भी थी। वह सुशिक्षिता थीं, वक्चतुर थी, गाने में निपुण, हंसती तो अनोखी छवि से, बोलती तो निराली घटा से, ताकती तो बांकी चितवन से; लेकिन इन गुणो में उसका एकाधिपत्य न था। उसकी प्रतिष्ठा, शक्ति और कीर्ति का कुछ और ही रहस्य था। सारा नगर ही नही; सारे प्रान्त का बच्चा जानता था कि बम्बई के गवर्नर मिस्टर जौहरी मिस जोशी के बिना दामों के गुलाम है। मिस जोशी की आंखो का इशारा उनके लिए नादिरशाही हुक्म है। वह थिएटरो में दावतों में, जलसों में मिस जोशी के साथ साये की भॉँति रहते है। और कभी-कभी उनकी मोटर रात के सन्नाटे में मिस जोशी के मकान से निकलती हुई लोगो को दिखाई देती है। इस प्रेम में वासना की मात्रा अधिक है या भक्ति की, यह कोई नही जानता। लेकिन मिस्टर जौहरी विवाहित है और मिस जौशी विधवा, इसलिए जो लोग उनके प्रेम को कलुषित कहते है, वे उन पर कोई अत्याचार नहीं करते। बम्बई की व्यवस्थापिका-सभा ने अनाज पर कर लगा दिया था और जनता की ओर से उसका विरोध करने के लिए एक विराट सभा हो रही थी। सभी नगरों से प्रजा के प्रतिनिधि उसमें सम्मिलित होने के लिए हजारो की संख्या में आये थे। मिस जोशी के विशाला भवन के सामने, चौड़े मैदान में हरी-भरी घास पर बम्बई की जनता उपनी फरियाद सुनाने के लिए जमा थी। अभी तक सभापति न आये थे, इसलिए लोग बैठे गप-शप कर रहे थे। कोई कर्मचारी पर आक्षेप करता था, कोई देश की स्थिति पर, कोई अपनी दीनता पर—अगर हम लोगो में अगड़ने का जरा भी सामर्थ्य होता तो मजाल थी कि यह कर लगा दिया जाता, अधिकारियों का घर से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता। हमारा जरुरत से ज्यादा सीधापन हमें अधिकारियों के हाथों का खिलौना बनाए हुए है। वे जानते हैं कि इन्हें जितना दबाते जाओ, उतना दबते जायेगें, सिर नहीं उठा सकते। सरकार ने भी उपद्रव की आंशका से सशस्त्र पुलिस बुला ली। उस मैदान के चारों कोनो पर सिपाहियों के दल डेरा डाले पड़े थे। उनके अफसर, घोड़ों पर सवार, हाथ में हंटर लिए, जनता के बीच में निश्शंक भाव से घोंड़े दौड़ाते फिरते थे, मानों साफ मैदान है। मिस जोशी के ऊंचे बरामदे में नगर के सभी बड़े-बड़े रईस और राज्याधिकारी तमाशा देखने के लिए बैठे हुए थे। मिस जोशी मेहमानों का आदर-सत्कार कर रही थीं और मिस्टर जौहरी, आराम-कुर्सी पर लेटे, इस जन-समूह को घृणा और भय की दृष्टि से देख रहे थे। सहसा सभापति महाशय आपटे एक किराये के तांगे पर आते दिखाई दिये। चारों तरफ हलचल मच गई, लोग उठ-उठकर उनका स्वागत करने दौड़े और उन्हें ला कर मंच पर बैठा दिया। आपटे की अवस्था ३०-३५ वर्ष से अधिक न थी; दुबले-पतले आदमी थे, मुख पर चिन्ता का गाढ़ा रंग-चढ़ा हुआ था। बाल भी पक चले थे, पर मुख पर सरल हास्य की रेखा झलक रही थी। वह एक सफेद मोटा कुरता पहने थे, न पांव में जूते थे, न सिर पर टोपी। इस अद्धर्नग्न, दुर्बल, निस्तेज प्राणी में न जाने कौल-सा जादू था कि समस्त जनता उसकी पूजा करती थी, उसके पैरों में न जाने कौन सा जादू था कि समस्त जरत उसकी पूजा करती थी, उसके पैरो पर सिर रगड़ती थी। इस एक प्राणी के हाथों में इतनी शक्ति थी कि वह क्षण मात्र में सारी मिलों को बंद करा सकता था, शहर का सारा कारोबार मिटा सकता था। अधिकारियों को उसके भय से नींद न आती थी, रात को सोते-सोते चौंक पड़ते थे। उससे ज्यादा भंयकर जन्तु अधिकारियों की दृष्टि में दूसरा न था। ये प्रचंड शासन-शक्ति उस एक हड्डी के आदमी से थरथर कांपती थी, क्योंकि उस हड्डी में एक पवित्र, निष्कलंक, बलवान और दिव्य आत्मा का निवास था। २ आपटे नें मंच पर खड़ें हो कर पहले जनता को शांत चित्त रहने और अहिंसा-व्रत पालन करने का आदेश दिया। फिर देश में राजनितिक स्थिति का वर्णन करने लगे। सहसा उनकी दृष्टि सामने मिस जोशी के बरामदे की ओर गई तो उनका प्रजा-दुख पीड़ित हृदय तिलमिला उठा। यहां अगणित प्राणी अपनी विपत्ति की फरियाद सुनने के लिए जमा थे और वहां मेंजो पर चाय और बिस्कुट, मेवे और फल, बर्फ और शराब की रेल-पेल थी। वे लोग इन अभागों को देख-देख हंसते और तालियां बजाते थे। जीवन में पहली बार आपटे की जबान काबू से बाहर हो गयी। मेघ की भांति गरज कर बोले— ‘इधर तो हमारे भाई दाने-दाने को मुहताज हो रहे है, उधर अनाज पर कर लगाया जा रहा है, केवल इसलिए कि राजकर्मचारियों के हलवे-पूरी में कमी न हो। हम जो देश के राजा हैं, जो छाती फाड़ कर धरती से धन निकालते हैं, भूखों मरते हैं; और वे लोग, जिन्हें हमने अपने सुख और शाति की व्यवस्था करने के लिए रखा है, हमारे स्वामी बने हुए शराबों की बोतले उड़ाते हैं। कितनी अनोखी बात है कि स्वामी भूखों मरें और सेवक शराबें उड़ायें, मेवे खायें और इटली और स्पेन की मिठाइयां चलें! यह किसका अपराध है? क्या सेवकों का? नहीं, कदापि नहीं, हमारा ही अपराध है कि हमने अपने सेवकों को इतना अधिकार दे रखा है। आज हम उच्च स्वर से कह देना चाहते हैं कि हम यह क्रूर और कुटिल व्यवहार नहीं सह सकते। यह हमारें लिए असह्य है कि हम और हमारे बाल-बच्चे दानों को तरसें और कर्मचारी लोग, विलास में डूबें हुए हमारे करूण-क्रन्दन की जरा भी परवा न करते हुए विहार करें। यह असह्य है कि हमारें घरों में चूल्हें न जलें और कर्मचारी लोग थिएटरों में ऐश करें, नाच-रंग की महफिलें सजायें, दावतें उड़ायें, वेश्याओं पर कंचन की वर्षा करें। संसार में और ऐसा कौन देश होगा, जहां प्रजा तो भूखी मरती हो और प्रधान कर्मचारी अपनी प्रेम-क्रिड़ा में मग्न हो, जहां स्त्रियां गलियों में ठोकरें खाती फिरती हों और अध्यापिकाओं का वेष धारण करने वाली वेश्याएं आमोद-प्रमोद के नशें में चूर हों---- ३ एकाएक सशस्त्र सिपाहियों के दल में हलचल पड़ गई। उनका अफसर हुक्म दे रहा था—सभा भंग कर दो, नेताओं को पकड़ लो, कोई न जाने पाए। यह विद्रोहात्म व्याख्यान है। मिस्टर जौहरी ने पुलिस के अफसर को इशारे पर बुलाकर कहा—और किसी को गिरफ्तार करने की जरुरत नहीं। आपटे ही को पकड़ो। वही हमारा शत्रु है। पुलिस ने डंडे चलने शुरु किये। और कई सिपाहियों के साथ जाकर अफसर ने अपटे को गिरफ्तार कर लिया। जनता ने त्यौरियां बदलीं। अपने प्यारे नेता को यों गिरफ्तार होते देख कर उनका धैर्य हाथ से जाता रहा। लेकिन उसी वक्त आपटे की ललकार सुनाई दी—तुमने अहिंसा-व्रत लिया है और अगर किसी ने उस व्रत को तोड़ा तो उसका दोष मेरे सिर होगा। मैं तुमसे सविनय अनुरोध करता हूं कि अपने-अपने घर जाओं। अधिकारियों ने वही किया जो हम समझते थे। इस सभा से हमारा जो उद्देश्य था वह पूरा हो गया। हम यहां बलवा करने नहीं, केवल संसार की नैतिक सहानुभूति प्राप्त करने के लिए जमा हुए थे, और हमारा उद्देश्य पूरा हो गया। एक क्षण में सभा भंग हो गयी और आपटे पुलिस की हवालात में भेज दिए गये। ४ मिस्टर जौहरी ने कहा—बच्चा बहुत दिनों के बाद पंजे में आए हैं, राज-द्रोह का मुकदमा चलाकर कम से कम १० साल के लिए अंडमान भेंजूगां। मिस जोशी—इससे क्या फायदा? ‘क्यों? उसको अपने किए की सजा मिल जाएगी।’ ‘लेकिन सोचिए, हमें उसका कितना मूल्य देना पड़ेगा। अभी जिस बात को गिने-गिनाये लोग जानते हैं, वह सारे संसार में फैलेगी और हम कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगें। आप अखबारों में संवाददाताओं की जबान तो नहीं बंद कर सकते।’ ‘कुछ भी हो मैं इसे जेल में सड़ाना चाहता हूं। कुछ दिनों के लिए तो चैन की नींद नसीब होगी। बदनामी से डरना ही व्यर्थ है। हम प्रांत के सारे समाचार-पत्रों को अपने सदाचार का राग अलापने के लिए मोल ले सकते हैं। हम प्रत्येक लांछन को झूठ साबित कर सकते हैं, आपटे पर मिथ्या दोषारोपरण का अपराध लगा सकते हैं।’ ‘मैं इससे सहज उपाय बतला सकती हूं। आप आपटे को मेरे हाथ में छोड़ दीजिए। मैं उससे मिलूंगी और उन यंत्रों से, जिनका प्रयोग करने में हमारी जाति सिद्धहस्त है, उसके आंतरिक भावों और विचारों की थाह लेकर आपके सामने रख दूंगी। मैं ऐसे प्रमाण खोज निकालना चाहती हूं जिनके उत्तर में उसे मुंह खोलने का साहस न हो, और संसार की सहानुभूति उसके बदले हमारे साथ हो। चारों ओर से यही आवाज आये कि यह कपटी ओर धूर्त था और सरकर ने उसके साथ वही व्यवहार किया है जो होना चाहिए। मुझे विश्वास है कि वह षंड्यंत्रकारियों का मुखिया है और मैं इसे सिद्ध कर देना चाहती हूं। मैं उसे जनता की दृष्टि में देवता नहीं बनाना चाहतीं हूं, उसको राक्षस के रुप में दिखाना चाहती हूं। ‘ऐसा कोई पुरुष नहीं है, जिस पर युवती अपनी मोहिनी न डाल सके।’ ‘अगर तुम्हें विश्वास है कि तुम यह काम पूरा कर दिखाओंगी, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है। मैं तो केवल उसे दंड देना चाहता हूं।’ ‘तो हुक्म दे दीजिए कि वह इसी वक्त छोड़ दिया जाय।’ ‘जनता कहीं यह तो न समझेगी कि सरकार डर गयी?’ ‘नहीं, मेरे ख्याल में तो जनता पर इस व्यवहार का बहुत अच्छा असर पड़ेगा। लोग समझेगें कि सरकार ने जनमत का सम्मान किया है।’ ‘लेकिन तुम्हें उसके घर जाते लोग देखेंगे तो मन में क्या कहेंगे?’ ‘नकाब डालकर जाऊंगी, किसी को कानोंकान खबर न होगी।’ ‘मुझे तो अब भी भय है कि वह तुम्हे संदेह की दृष्टि से देखेगा और तुम्हारे पंजे में न आयेगा, लेकिन तुम्हारी इच्छा है तो आजमा देखों।’ यह कहकर मिस्टर जौहरी ने मिस जोशी को प्रेममय नेत्रों से देखा, हाथ मिलाया और चले गए। आकाश पर तारे निकले हुए थे, चैत की शीतल, सुखद वायु चल रही थी, सामने के चौड़े मैदान में सन्नाटा छाया हुआ था, लेकिन मिस जोशी को ऐसा मालूम हुआ मानों आपटे मंच पर खड़ा बोल रहा है। उसक शांत, सौम्य, विषादमय स्वरुप उसकी आंखों में समाया हुआ था। ५ प्रातःकाल मिस जोशी अपने भवन से निकली, लेकिन उसके वस्त्र बहुत साधारण थे और आभूषण के नाम शरीर पर एक धागा भी न था। अलंकार-विहीन हो कर उसकी छवि स्वच्छ, जल की भांति और भी निखर गयी। उसने सड़क पर आकर एक तांगा लिया और चली। अपटे का मकान गरीबों के एक दूर के मुहल्ले में था। तांगेवाला मकान का पता जानता था। कोई दिक्कत न हुई। मिस जोशी जब मकान के द्वार पर पहुंची तो न जाने क्यों उसका दिल धड़क रहा था। उसने कांपते हुए हाथों से कुंडी खटखटायी। एक अधेड़ औरत निकलकर द्वार खोल दिय। मिस जोशी उस घर की सादगी देख दंग रह गयी। एक किनारें चारपाई पड़ी हुई थी, एक टूटी आलमारी में कुछ किताबें चुनी हुई थीं, फर्श पर खिलने का डेस्क था ओर एक रस्सी की अलगनी पर कपड़े लटक रहे थे। कमरे के दूसरे हिस्से में एक लोहे का चूल्हा था और खाने के बरतन पड़े हुए थे। एक लम्बा-तगड़ा आदमी, जो उसी अधेड़ औरत का पति था, बैठा एक टूटे हुए ताले की मरम्मत कर रहा था और एक पांच-छ वर्ष का तेजस्वी बालक आपटे की पीठ पर चढ़ने के लिए उनके गले में हाथ डाल रहा था। आपटे इसी लोहार के साथ उसी घर में रहते थे। समाचार-पत्रों के लेख लिखकर जो कुछ मिलता उसे दे देते और इस भांति गृह-प्रबंध की चिंताओं से छुट्टी पाकर जीवन व्यतीत करते थें। मिस जोशी को देखकर आपटे जरा चौंके, फिर खड़े होकर उनका स्वागत किया और सोचने लगे कि कहां बैठाऊं। अपनी दरिद्रता पर आज उन्हें जितनी लाज आयी उतनी और कभी न आयी थी। मिस जोशी उनका असमंजस देखकर चारपाई पर बैठ गयी और जरा रुखाई से बोली---मैं बिना बुलाये आपके यहां आने के लिए क्षमा मांगती हूं किंतु काम ऐसा जरुरी था कि मेरे आये बिना पूरा न हो सकता। क्या मैं एक मिनट के लिए आपसे एकांत में मिल सकती हूं। आपटे ने जगन्नाथ की ओर देख कर कमरे से बाहर चले जाने का इशारा किया। उसकी स्त्री भी बाहर चली गयी। केवल बालक रह गया। वह मिस जोशी की ओर बार-बार उत्सुक आंखों से देखता था। मानों पूछ रहा हो कि तुम आपटे दादा की कौन हो? मिस जोशी ने चारपाई से उतर कर जमीन पर बैठते हुए कहा---आप कुछ अनुमान कर सकते हैं कि इस वक्त क्यों आयी हूं। आपटे ने झेंपते हुए कहा---आपकी कृपा के सिवा और क्या कारण हो सकता है? मिस जोशी---नहीं, संसार इतना उदार नहीं हुआ कि आप जिसे गांलियां दें, वह आपको धन्यवाद दे। आपको याद है कि कल आपने अपने व्याख्यान में मुझ पर क्या-क्या आक्षेप किए थे? मैं आपसे जोर देकर कहती हूं कि वे आक्षेप करके आपने मुझपर घोर अत्याचार किया है। आप जैसे सहृदय, शीलवान, विद्वान आदमी से मुझे ऐसी आशा न थी। मैं अबला हूं, मेरी रक्षा करने वाला कोई नहीं है? क्या आपको उचित था कि एक अबला पर मिथ्यारोपण करें? अगर मैं पुरुष होती तो आपसे ड्यूल खेलने का आग्रह करती। अबला हूं, इसलिए आपकी सज्जनता को स्पर्श करना ही मेरे हाथ में है। आपने मुझ पर जो लांछन लगाये हैं, वे सर्वथा निर्मूल हैं। आपटे ने दृढ़ता से कहा---अनुमान तो बाहरी प्रमाणों से ही किया जाता है। मिस जोशी—बाहरी प्रमाणों से आप किसी के अंतस्तल की बात नहीं जान सकते। आपटे—जिसका भीतर-बाहर एक न हो, उसे देख कर भ्रम में पड़ जाना स्वाभाविक है। मिस जाशी—हां, तो वह आपका भ्रम है और मैं चाहती हूं कि आप उस कलंक को मिटा दे जो आपने मुझ पर लगाया है। आप इसके लिए प्रायश्चित करेंगे? आपटे---अगर न करूं तो मुझसे बड़ा दुरात्मा संसार में न होगा। मिस जोशी—आप मुझपर विश्वास करते हैं। आपटे—मैंने आज तक किसी रमणी पर विश्वास नहीं किया। मिस जोशी—क्या आपको यह संदेह हो रहा है कि मैं आपके साथ कौशल कर रही हूं? आपटे ने मिस जोशी की ओर अपने सदय, सजल, सरल नेत्रों से देख कर कहा—बाई जी, मैं गंवार और अशिष्ट प्राणी हूं। लेकिन नारी-जाति के लिए मेरे हृदय में जो आदर है, वह श्रद्धा से कम नहीं है, जो मुझे देवताओं पर हैं। मैंने अपनी माता का मुख नहीं देखा, यह भी नहीं जानता कि मेरा पिता कौन था; किंतु जिस देवी के दया-वृक्ष की छाया में मेरा पालन-पोषण हुआ उनकी प्रेम-मूर्ति आज तक मेरी आंखों के सामने है और नारी के प्रति मेरी भक्ति को सजीव रखे हुए है। मै उन शब्दों को मुंह से निकालने के लिए अत्यंत दु:खी और लज्जित हूं जो आवेश में निकल गये, और मै आज ही समाचार-पत्रों में खेद प्रकट करके आपसे क्षमा की प्रार्थना करुंगा। मिस जोशी का अब तक अधिकांश स्वार्थी आदमियों ही से साबिका पड़ा था, जिनके चिकने-चुपड़े शब्दों में मतलब छुपा हुआ था। आपटे के सरल विश्वास पर उसका चित्त आनंद से गद्गद हो गया। शायद वह गंगा में खड़ी होकर अपने अन्य मित्रों से यह कहती तो उसके फैशनेबुल मिलने वालों में से किसी को उस पर विश्वास न आता। सब मुंह के सामने तो ‘हां-हां’ करते, पर बाहर निकलते ही उसका मजाक उड़ाना शुरु करते। उन कपटी मित्रों के सम्मुख यह आदमी था जिसके एक-एक शब्द में सच्चाई झलक रही थी, जिसके शब्द अंतस्तल से निकलते हुए मालूम होते थे। आपटे उसे चुप देखकर किसी और ही चिंता में पड़े हुए थें। उन्हें भय हो रहा था अब मैं चाहे कितना क्षमा मांगू, मिस जोशी के सामने कितनी सफाइयां पेश करूं, मेरे आक्षेपों का असर कभी न मिटेगा। इस भाव ने अज्ञात रुप से उन्हें अपने विषय की गुप्त बातें कहने की प्रेरणा की जो उन्हें उसकी दृष्टि में लघु बना दें, जिससे वह भी उन्हें नीच समझने लगे, उसको संतोष हो जाए कि यह भी कलुषित आत्मा है। बोले—मैं जन्म से अभागा हूं। माता-पिता का तो मुंह ही देखना नसीब न हुआ, जिस दयाशील महिला ने मुझे आश्रय दिया था, वह भी मुझे १३ वर्ष की अवस्था में अनाथ छोड़कर परलोक सिधार गयी। उस समय मेरे सिर पर जो कुछ बीती उसे याद करके इतनी लज्जा आती हे कि किसी को मुंह न दिखाऊं। मैंने धोबी का काम किया; मोची का काम किया; घोड़े की साईसी की; एक होटल में बरतन मांजता रहा; यहां तक कि कितनी ही बार क्षुधासे व्याकुल होकर भीख मांगी। मजदूरी करने को बुरा नहीं समझता, आज भी मजदूरी ही करता हूं। भीख मांगनी भी किसी-किसी दशा में क्षम्य है, लेकिन मैंने उस अवस्था में ऐसे-ऐसे कर्म किए, जिन्हें कहते लज्जा आती है—चोरी की, विश्वासघात किया, यहां तक कि चोरी के अपराध में कैद की सजा भी पायी। मिस जोशी ने सजल नयन होकर कहा—आज यह सब बातें मुझसे क्यों कर रहे हैं? मैं इनका उल्लेख करके आपको कितना बदनाम कर सकतीं हूं, इसका आपको भय नहीं है? आपटे ने हंसकर कहा—नहीं, आपसे मुझे भय नहीं है। मिस जोशी—अगर मैं आपसे बदला लेना चाहूं, तो? आपटे---जब मैं अपने अपराध पर लज्जित होकर आपसे क्षमा मांग रहा हूं, तो मेरा अपराध रहा ही कहाँ, जिसका आप मुझसे बदला लेंगी। इससे तो मुझे भय होता है कि आपने मुझे क्षमा नहीं किया। लेकिन यदि मैंने आपसे क्षमा न मांगी तो मुझसे तो बदला न ले सकतीं। बदला लेने वाले की आंखें यो सजल नहीं हो जाया करतीं। मैं आपको कपट करने के अयोग्य समझता हूं। आप यदि कपट करना चाहतीं तो यहां कभी न आतीं। मिस जोशी—मै आपका भेद लेने ही के लिए आयी हूं। आपटे---तो शौक से लीजिए। मैं बतला चुका हूं कि मैंने चोरी के अपराध में कैद की सजा पायी थी। नासिक के जेल में रखा गया था। मेरा शरीर दुर्बल था, जेल की कड़ी मेहनत न हो सकती थी और अधिकारी लोग मुझे कामचोर समझ कर बेंतो से मारते थे। आखिर एक दिन मैं रात को जेल से भाग खड़ा हुआ। मिस जोशी—आप तो छिपे रुस्तम निकले! आपटे--- ऐसा भागा कि किसी को खबर न हुई। आज तक मेरे नाम वारंट जारी है और ५०० रु0 का इनाम भी है। मिस जोशी----तब तो मैं आपको जरुर पकड़ा दूंगी। आपटे---तो फिर मैं आपको अपना असल नाम भी बता देता हूं। मेरा नाम दामोदर मोदी है। यह नाम तो पुलिस से बचने के लिए रख छोड़ा है। बालक अब तक तो चुपचाप बैठा हुआ था। मिस जोशी के मुंह से पकड़ाने की बात सुनकर वह सजग हो गया। उन्हें डांटकर बोला—हमाले दादा को कौन पकड़ेगा? मिस जोशी---सिपाही और कौन? बालक---हम सिपाही को मालेंगे। यह कहकर वह एक कोने से अपने खेलने वाला डंडा उठा लाया और आपटे के पास वीरोचिता भाव से खड़ा हो गया, मानो सिपाहियों से उनकी रक्षा कर रहा है। मिस जोशी---आपका रक्षक तो बड़ा बहादुर मालूम होता है। आपटे----इसकी भी एक कथा है। साल-भर होता है, यह लड़का खो गया था। मुझे रास्ते में मिला। मैं पूछता-पूछता इसे यहां लाया। उसी दिन से इन लोगों से मेरा इतना प्रेम हो गया कि मैं इनके साथ रहने लगा। मिस जोशी---आप अनुमान कर सकते हैं कि आपका वृतान्त सुनकर मैं आपको क्या समझ रही हूं। आपटे---वही, जो मैं वास्तव में हूं---नीच, कमीना धूर्त.... मिस जोशी---नहीं, आप मुझ पर फिर अन्याय कर रहे है। पहला अन्याय तो क्षमा कर सकती हूं, यह अन्याय क्षमा नहीं कर सकती। इतनी प्रतिकूल दशाओं में पड़कर भी जिसका हृदय इतना पवित्र, इतना निष्कपट, इतना सदय हो, वह आदमी नहीं देवता है। भगवन्, आपने मुझ पर जो आक्षेप किये वह सत्य हैं। मैं आपके अनुमान से कहीं भ्रष्ट हूं। मैं इस योग्य भी नहीं हूं कि आपकी ओर ताक सकूं। आपने अपने हृदय की विशालता दिखाकर मेरा असली स्वरुप मेरे सामने प्रकट कर दिया। मुझे क्षमा कीजिए, मुझ पर दया कीजिए। यह कहते-कहते वह उनके पैंरो पर गिर पड़ी। आपटे ने उसे उठा लिया और बोले----ईश्वर के लिए मुझे लज्जित न करो। मिस जोशी ने गद्गद कंठ से कहा---आप इन दुष्टों के हाथ से मेरा उद्धार कीजिए। मुझे इस योग्य बनाइए कि आपकी विश्वासपात्री बन सकूं। ईश्वर साक्षी है कि मुझे कभी-कभी अपनी दशा पर कितना दुख होता है। मैं बार-बार चेष्टा करती हूं कि अपनी दशा सुधारुं; इस विलासिता के जाल को तोड़ दूं, जो मेरी आत्मा को चारों तरफ से जकड़े हुए है, पर दुर्बल आत्मा अपने निश्चय पर स्थित नहीं रहती। मेरा पालन-पोषण जिस ढंग से हुआ, उसका यह परिणाम होना स्वाभाविक-सा मालूम होता है। मेरी उच्च शिक्षा ने गृहिणी-जीवन से मेरे मन में घृणा पैदा कर दी। मुझे किसी पुरुष के अधीन रहने का विचार अस्वाभाविक जान पडता था। मैं गृहिणी की जिम्मेदारियों और चिंताओं को अपनी मानसिक स्वाधीनता के लिए विष-तुल्य समझती थी। मैं तर्कबुद्धि से अपने स्त्रीत्व को मिटा देना चाहती थी, मैं पुरुषों की भांति स्वतंत्र रहना चाहती थी। क्यों किसी की पांबद होकर रहूं? क्यों अपनी इच्छाओं को किसी व्यक्ति के सांचे में ढालू? क्यों किसी को यह अधिकार दूं कि तुमने यह क्यों किया, वह क्यों किया? दाम्पत्य मेरी निगाह में तुच्छ वस्तु थी। अपने माता-पिता की आलोचना करना मेरे लिए अचित नहीं, ईश्वर उन्हें सद्गति दे, उनकी राय किसी बात पर न मिलती थी। पिता विद्वान् थे, माता के लिए ‘काला अक्षर भैंस बराबर’ था। उनमें रात-दिन वाद-विवाद होता रहता था। पिताजी ऐसी स्त्री से विवाह हो जाना अपने जीवन का सबसे बड़ा दुर्भाग्य समझते थे। वह यह कहते कभी न थकते थे कि तुम मेरे पांव की बेड़ी बन गयीं, नहीं तो मैं न जाने कहां उड़कर पहुंचा होता। उनके विचार मे सारा दोष माता की अशिक्षा के सिर था। वह अपनी एकमात्र पुत्री को मूर्खा माता से संसर्ग से दूर रखना चाहते थे। माता कभी मुझसे कुछ कहतीं तो पिताजी उन पर टूट पड़ते—तुमसे कितनी बार कह चुका कि लड़की को डांटो मत, वह स्वयं अपना भला-बुरा सोच सकती है, तुम्हारे डांटने से उसके आत्म-सम्मान का कितना धक्का लगेगा, यह तुम नहीं जान सकतीं। आखिर माताजी ने निराश होकर मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया और कदाचित् इसी शोक में चल बसीं। अपने घर की अशांति देखकर मुझे विवाह से और भी घृणा हो गयी। सबसे बड़ा असर मुझ पर मेरे कालेज की लेडी प्रिंसिपल का हुआ जो स्वयं अविवाहित थीं। मेरा तो अब यह विचार है कि युवको की शिक्षा का भार केवल आदर्श चरित्रों पर रखना चाहिए। विलास में रत, कालेजों के शौकिन प्रोफेसर विद्यार्थियों पर कोई अच्छा असर नहीं डाल सकते। मैं इस वक्त ऐसी बात आपसे कह रही हूं। पर अभी घर जाकर यह सब भूल जाऊंगी। मैं जिस संसार में हूं, उसकी जलवायु ही दूषित है। वहां सभी मुझे कीचड़ में लतपत देखना चाहते है। मेरे विलासासक्त रहने में ही उनका स्वार्थ है। आप वह पहले आदमी हैं जिसने मुझ पर विश्वास किया है, जिसने मुझसे निष्कपट व्यवहार किया है। ईश्वर के लिए अब मुझे भूल न जाइयेगा। आपटे ने मिस जोशी की ओर वेदना पूर्ण दृष्टि से देखकर कहा—अगर मैं आपकी कुछ सेवा कर सकूं तो यह मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी। मिस जोशी! हम सब मिट्टी के पुतले हैं, कोई निर्दोर्ष नहीं। मनुष्य बिगड़ता है तो परिस्थितियों से, या पूर्व संस्कारों से। परिस्थितियों का त्याग करने से ही बच सकता है, संस्कारों से गिरने वाले मनुष्य का मार्ग इससे कहीं कठिन है। आपकी आत्मा सुन्दर और पवित्र है, केवल परिस्थितियों ने उसे कुहरे की भांति ढंक लिया है। अब विवेक का सूर्य उदय हो गया है, ईश्वर ने चाहा तो कुहरा भी फट जाएगा। लेकिन सबसे पहले उन परिस्थितियों का त्याग करने को तैयार हो जाइए। मिस जोशी—यही आपको करना होगा। आपटे ने चुभती हुई निगाहों से देख कर कहा—वैद्य रोगी को जबरदस्ती दवा पिलाता है। मिस जोशी – मैं सब कुछ करुगीं। मैं कड़वी से कड़वी दवा पियूंगी यदि आप पिलायेंगे। कल आप मेरे घर आने की कृपा करेंगे, शाम को? आपटे---अवश्य आऊंगा। मिस जोशी ने विदा देते हुए कहा---भूलिएगा नहीं, मैं आपकी राह देखती रहूंगी। अपने रक्षक को भी लाइएगा। यह कहकर उसने बालक को गोद मे उठाया ओर उसे गले से लगा कर बाहर निकल आयी। गर्व के मारे उसके पांव जमीन पर न पड़ते थे। मालूम होता था, हवा में उड़ी जा रही है, प्यास से तड़पते हुए मनुष्य को नदी का तट नजर आने लगा था। ६ दूसरे दिन प्रात:काल मिस जोशी ने मेहमानों के नाम दावती कार्ड भेजे और उत्सव मनाने की तैयारियां करने लगी। मिस्टर आपटे के सम्मान में पार्टी दी जा रही थी। मिस्टर जौहरी ने कार्ड देखा तो मुस्कराये। अब महाशय इस जाल से बचकर कहां जायेगे। मिस जोशी ने उन्हें फसाने के लिए यह अच्छी तरकीब निकाली। इस काम में निपुण मालूम होती है। मैने समझा था, आपटे चालाक आदमी होगा, मगर इन आन्दोलनकारी विद्राहियों को बकवास करने के सिवा और क्या सूझ सकती है। चार ही बजे मेहमान लोग आने लगे। नगर के बड़े-बड़े अधिकारी, बड़े-बड़े व्यापारी, बड़े-बड़े विद्वान, समाचार-पत्रों के सम्पादक, अपनी-अपनी महिलाओं के साथ आने लगे। मिस जोशी ने आज अपने अच्छे-से-अच्छे वस्त्र और आभूषण निकाले हुए थे, जिधर निकल जाती थी मालूम होता था, अरुण प्रकाश की छटा चली आरही है। भवन में चारों ओर सुगंध की लपटे आ रही थीं और मधुर संगीत की ध्वनि हवा में गूंज रहीं थी। पांच बजते-बजते मिस्टर जौहरी आ पहुंचे और मिस जोशी से हाथ मिलाते हुए मुस्करा कर बोले—जी चाहता है तुम्हारे हाथ चूम लूं। अब मुझे विश्वास हो गया कि यह महाशय तुम्हारे पंजे से नहीं निकल सकते। मिसेज पेटिट बोलीं---मिस जोशी दिलों का शिकार करने के लिए ही बनाई गई है। मिस्टर सोराब जी---मैंने सुना है, आपटे बिलकुल गंवार-सा आदमी है। मिस्टर भरुचा---किसी यूनिवर्सिटी में शिक्षा ही नहीं पायी, सभ्यता कहां से आती? मिस्टर भरुचा---आज उसे खूब बनाना चाहिए। महंत वीरभद्र डाढ़ी के भीतर से बोले---मैंने सुना है नास्तिक है। वर्णाश्रम धर्म का पालन नहीं करता। मिस जोशी---नास्तिक तो मै भी हूं। ईश्वर पर मेरा भी विश्वास नहीं है। महंत---आप नास्तिक हों, पर आप कितने ही नास्तिकों को आस्तिक बना देती हैं। मिस्टर जौहरी---आपने लाख की बात कहीं मंहत जी! मिसेज भरुचा—क्यों महंत जी, आपको मिस जोशी ही न आस्तिक बनाया है क्या? सहसा आपटे लोहार के बालक की उंगली पकड़े हुए भवन में दाखिल हुए। वह पूरे फैशनेबुल रईस बने हुए थे। बालक भी किसी रईस का लड़का मालूम होता था। आज आपटे को देखकर लोगो को विदित हुआ कि वह कितना सुदंर, सजीला आदमी है। मुख से शौर्य निकल रहा था, पोर-पोर से शिष्टता झलकती थी, मालूम होता था वह इसी समाज में पला है। लोग देख रहे थे कि वह कहीं चूके और तालियां बजायें, कही कदम फिसले और कहकहे लगायें पर आपटे मंचे हुए खिलाड़ी की भांति, जो कदम उठाता था वह सधा हुआ, जो हाथ दिखलाता था वह जमा हुआ। लोग उसे पहले तुच्छ समझते थे, अब उससे ईर्ष्या करने लगे, उस पर फबतियां उड़ानी शुरु कीं। लेकिन आपटे इस कला में भी एक ही निकला। बात मुंह से निकली ओर उसने जवाब दिया, पर उसके जवाब में मालिन्य या कटुता का लेश भी न होता था। उसका एक-एक शब्द सरल, स्वच्छ, चित्त को प्रसन्न करने वाले भावों में डूबा होता था। मिस जोशी उसकी वाक्यचातुरी पर फुल उठती थी? सोराब जी---आपने किस यूनिवर्सिटी से शिक्षा पायी थी? आपटे---यूनिवर्सिटी में शिक्षा पायी होती तो आज मैं भी शिक्षा-विभाग का अध्यक्ष होता। मिसेज भरुचा—मैं तो आपको भयंकर जंतु समझती थी? आपटे ने मुस्करा कर कहा—आपने मुझे महिलाओं के सामने न देखा होगा। सहसा मिस जोशी अपने सोने के कमरे में गयी ओर अपने सारे वस्त्राभूषण उतार फेंके। उसके मुख से शुभ्र संकल्प का तेज निकल रहा था। नेंत्रो से दबी ज्योति प्रस्फुटित हो रही थी, मानों किसी देवता ने उसे वरदान दिया हो। उसने सजे हुए कमरे को घृणा से देखा, अपने आभूषणों को पैरों से ठुकरा दिया और एक मोटी साफ साड़ी पहनकर बाहर निकली। आज प्रात:काल ही उसने यह साड़ी मंगा ली थी। उसे इस नये वेश में देख कर सब लोग चकित हो गये। कायापलट कैसी? सहसा किसी की आंखों को विश्वास न आया; किंतु मिस्टर जौहरी बगलें बजाने लगे। मिस जोशी ने इसे फंसाने के लिए यह कोई नया स्वांग रचा है। ‘मित्रों! आपको याद है, परसों महाशय आपटे ने मुझे कितनी गांलियां दी थी। यह महाशय खड़े हैं। आज मैं इन्हें उस दुर्व्यवहार का दण्ड देना चाहती हूं। मैं कल इनके मकान पर जाकर इनके जीवन के सारे गुप्त रहस्यों को जान आयी। यह जो जनता की भीड़ गरजते फिरते है, मेरे एक ही निशाने पर गिर पड़े। मैं उन रहस्यों के खोलने में अब विलंब न करुंगी, आप लोग अधीर हो रहे होगें। मैंने जो कुछ देखा, वह इतना भंयकर है कि उसका वृतांत सुनकर शायद आप लोगों को मूर्छा आ जायेगी। अब मुझे लेशमात्र भी संदेह नहीं है कि यह महाशय पक्के देशद्रोही है....’ मिस्टर जौहरी ने ताली बजायी ओर तालियों के हॉल गूंज उठा। मिस जोशी---लेकिन राज के द्रोही नहीं, अन्याय के द्रोही, दमन के द्रोही, अभिमान के द्रोही--- चारों ओर सन्नाटा छा गया। लोग विस्मित होकर एक दूसरे की ओर ताकने लगे। मिस जोशी---गुप्त रुप से शस्त्र जमा किए है और गुप्त रुप से हत्याऍं की हैं......... मिस्टर जौहरी ने तालियां बजायी और तालियां का दौगड़ा फिर बरस गया। मिस जोशी—लेकिन किस की हत्या? दु:ख की, दरिद्रता की, प्रजा के कष्टों की, हठधर्मी की ओर अपने स्वार्थ की। चारों ओर फिर सन्नाटा छा गया और लोग चकित हो-हो कर एक दूसरे की ओर ताकने लगे, मानो उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं है। मिस जोशी—महाराज आपटे ने डकैतियां की और कर रहे हैं--- अब की किसी ने ताली न बजायी, लोग सुनना चाहते थे कि देखे आगे क्या कहती है। ‘उन्होंने मुझ पर भी हाथ साफ किया है, मेरा सब कुछ अपहरण कर लिया है, यहां तक कि अब मैं निराधार हूं और उनके चरणों के सिवा मेरे लिए कोई आश्रय नहीं है। प्राण्धार! इस अबला को अपने चरणों में स्थान दो, उसे डूबने से बचाओ। मैं जानती हूं तुम मुझे निराश न करोंगें।’ यह कहते-कहते वह जाकर आपटे के चरणों में गिर पड़ी। सारी मण्डली स्तंभित रह गयी। ७ एक सप्ताह गुजर चुका था। आपटे पुलिस की हिरासत में थे। उन पर चार अभियोग चलाने की तैयारियां चल रहीं थी। सारे प्रांत में हलचल मची हुई थी। नगर में रोज सभाएं होती थीं, पुलिस रोज दस-पांच आदमियां को पकड़ती थी। समाचार-पत्रों में जोरों के साथ वाद-विवाद हो रहा था। रात के नौ बज गये थे। मिस्टर जौहरी राज-भवन में मेंज पर बैठे हुए सोच रहे थे कि मिस जोशी को क्यों कर वापस लाएं? उसी दिन से उनकी छाती पर सांप लोट रहा था। उसकी सूरत एक क्षण के लिए आंखों से न उतरती थी। वह सोच रहे थे, इसने मेरे साथ ऐसी दगा की! मैंने इसके लिए क्या कुछ नहीं किया? इसकी कौन-सी इच्छा थी, जो मैने पूरी नहीं की इसी ने मुझसे बेवफाई की। नहीं, कभी नहीं, मैं इसके बगैर जिंदा नहीं रह सकता। दुनिया चाहे मुझे बदनाम करे, हत्यारा कहे, चाहे मुझे पद से हाथ धोना पड़े, लेकिन आपटे को नहीं छोड़ूगां। इस रोड़े को रास्ते से हटा दूंगा, इस कांटे को पहलू से निकाल बाहर करुंगा। सहसा कमरे का दरवाजा खुला और मिस जाशी ने प्रवेश किया। मिस्टर जौहरी हकबका कर कुर्सी पर से उठ खड़े हुए, यह सोच रहे थे कि शायद मिस जोशी ने निराश होकर मेरे पास आयी हैं, कुछ रुखे, लेकिन नम्र भाव से बोले---आओ बाला, तुम्हारी याद में बैठा था। तुम कितनी ही बेवफाई करो, पर तुम्हारी याद मेरे दिल से नहीं निकल सकती। मिस जोशी---आप केवल जबान से कहते है। मिस्टर जौहरी—क्या दिल चीरकर दिखा दूं? मिस जोशी—प्रेम प्रतिकार नहीं करता, प्रेम में दुराग्रह नहीं होता। आप मेर खून के प्यासे हो रहे हैं, उस पर भी आप कहते हैं, मैं तुम्हारी याद करता हूं। आपने मेरे स्वामी को हिरासत में डाल रखा है, यह प्रेम है! आखिर आप मुझसे क्या चाहते हैं? अगर आप समझ रहे हों कि इन सख्तियों से डर कर मै आपकी शरण आ जाऊंगी तो आपका भ्रम है। आपको अख्तियार है कि आपटे को काले पानी भेज दें, फांसी चढ़ा दें, लेकिन इसका मुझ पर कोई असर न होगा। वह मेरे स्वमी हैं, मैं उनको अपना स्वामी समझती हूं। उन्होने अपनी विशाल उदारता से मेरा उद्धार किया। आप मुझे विषय के फंदो में फंसाते थे, मेरी आत्मा को कलुषित करते थे। कभी आपको यह खयाल आया कि इसकी आत्मा पर क्या बीत रही होगी? आप मुझे आत्मशुन्य समझते थे। इस देवपुरुष ने अपनी निर्मल स्वच्छ आत्मा के आकर्षण से मुझे पहली ही मुलाकात में खींच लिया। मैं उसकी हो गयी और मरते दम तक उसी की रहूंगी। उस मार्ग से अब आप हटा नहीं सकते। मुझे एक सच्ची आत्मा की जरुरत थी, वह मुझे मिल गयी। उसे पाकर अब तीनों लोक की सम्पदा मेरी आंखो में तुच्छ है। मैं उनके वियोग में चाहे प्राण दे दूं, पर आपके काम नहीं आ सकती। मिस्टर जौहरी---मिस जोशी। प्रेम उदार नहीं होता, क्षमाशील नहीं होता। मेरे लिए तुम सर्वस्व हो, जब तक मैं समझता हूं कि तुम मेरी हो। अगर तुम मेरी नहीं हो सकती तो मुझे इसकी क्या चिंता हो सकती है कि तुम किस दिशा में हो? मिस जोशी—यह आपका अंतिम निर्णय है? मिस्टर जौहरी—अगर मैं कह दूं कि हां, तो? मिस जोशी ने सीने से पिस्तौल निकाल कर कहा---तो पहले आप की लाश जमीन पर फड्रकती होगी और आपके बाद मेरी, बोलिए। यह आपका अंतिम निर्णय निश्चय है? यह कहकर मिस जोशी ने जौहरी की तरफ पिस्तौल सीधा किया। जौहरी कुर्सी से उठ खड़े हुए और मुस्कर बोले—क्या तुम मेरे लिए कभी इतना साहस कर सकती थीं? जाओं, तुम्हारा आपटे तुम्हें मुबारक हो। उस पर से अभियोग उठा लिया जाएगा। पवित्र प्रेम ही मे यह साहस है। अब मुझे विश्वास हो गया कि तुम्हारा प्रेम पवित्र है। अगर कोई पुराना पापी भविष्यवाणी कर सकता है तो मैं कहता हूं, वह दिन दूर नहीं है, जब तुम इस भवन की स्वामिनी होगी। आपटे ने मुझे प्रेम के क्षेत्र में नहीं, राजनीति के क्षेत्र में भी परास्त कर दिया। सच्चा आदमी एक मुलाकात में ही जीवन बदल सकता है, आत्मा को जगा सकता है और अज्ञान को मिटा कर प्रकाश की ज्योति फैला सकता है, यह आज सिद्ध हो गया। ********

  • सौदा

    महेश कुमार केशरी "मुझे ये सब कुछ ठीक नहीं लग रहा है? "जग्गू बाबू ने निर्विकार भाव से निर्लिप्त होकर जैसे अपने आप से कहा। लेकिन, पता नहीं कैसे ये बात प्रमोद बाबू के कानों में चली गई थी। वो बैठक से बाहर जा रहें थें। शायद किचेन से प्लेट लेने। और तभी जग्गू बाबू की बात प्रमोद बाबू के कानों में पड़ी थी। आज प्रमोद के बड़े बेटे प्रयाग की शादी की बात चल रही थी। और लड़की वाले आज प्रयाग के फैमिली से मिलने आये थें। ऋचा नोएड़ा में किसी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती है। वैसे प्रमोद बाबू का बेटा प्रयाग भी सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, मुंबई में। चौबीस लाख का सालाना पैकेज मिलता है। शादी के बाद प्रयाग, ऋचा को लेकर मुंबई में रहेगा। एक बड़ा फ्लैट खरीदा है, उसने मुंबई में साढ़े चार करोड़ का। "नहीं, कुछ नहीं, ऐसे ही।" जग्गू बाबू टालने की गरज से बोले। लेकिन, प्रमोद ने अपने पिता के मन को टटोला - "ठीक है, आप मुझे अपना नहीं समझते तो मत बताईये।" "अरे, नहीं-नहीं ऐसी कोई बात नहीं है। तुम बैठो मेरे पास।" और जग्गू बाबू ने प्रमोद का हाथ खींचकर वहीं सोफे पर अपने पास बिठा लिया और बोले - "तुम जानते हो मुझे, सबसे खराब बात क्या लगी कि लड़की वालों ने प्रयाग को सैलरी सीट दिखाने को कहा। क्या उनको हमारी बात पर विश्वास नहीं था? और प्रयाग को देखो उसने भी अपनी सैलरी सीट तपाक से दिखा दिया। पुराने समय में लोग लड़के का खानदान, गुण-दोष, चाल-चरित्र देखते थें। अभी के समय में लोग सैलरी सीट देखने लगे हैं। आदमी में लाख ऐब हों। सब तनख्वाह छुपा लेती है। आखिर, ये कैसा समय आ गया है? जब हम सौदा करने लगे हैं। रिश्ते नहीं।" "अरे पापा, आप भी किन पुराने ख्यालातों में गुम रहने वाले इंसानों में से हैं। अभी जमाना बदल गया है। लोग शान से दिखावा करते हैं। ऋचा के माँ-बाप ने भी तो ऋचा की सैलरी सीट दिखाई थी। ऋचा का सालाना पैकेज बारह लाख का है। जब लड़की वाले होकर सैलरी सीट दिखा सकते हैं। तो हम लड़के वाले होकर सैलरी सीट क्यों ना दिखायें? आखिर हम उनसे कम हैं क्या किसी बात में। प्रमोद बाबू ने गर्व के साथ सीना तानकर कहा था। और, आजकल हर जगह ऐसा ही हो रहा है। सब लोग ऐसा ही कर रहें हैं।" इतना कहकर वो उठने को हुए। तभी जग्गू बाबू ने प्रमोद को टोका -"अभी मेरी बात खत्म नहीं हुई है, बैठो।" प्रमोद बाबू वहीं सोफे पर फिर बैठ गये। जग्गू बाबू ने प्रमोद का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा - "बेटे, प्रमोद इसी लालच और दिखावे ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा है। अभी प्रयाग की शादी नहीं हुई है। और वो हमसे अलग एक फ्लैट खरीदकर रहने के लिये तैयारी कर रहा है। आखिर, इसी लालच और दिखावे ने आदमी को स्वार्थी और कमजोर बना दिया है। एकल परिवार की सोच बढ़ा दी है। पता नहीं इतना पैसा लोग कमाकर क्या करेंगें? जिसको देखो वही पैसे की पीछे भाग रहा है। एक मिनट रूककर साँस लेने की फुरसत भी नहीं है आज के आदमी के पास। दिनरात पैसा कमाते हैं। बच्चों को पढ़ाते हैं। बच्चे देश-विदेश में जाकर सेटल हो जाते हैं। फिर, वहीं के होकर रह जाते हैं। ना कभी आना ना कभी जाना। कभी गलती से दो दिनों के लिये आ भी गये। तो माँ-बाप से मिलने आने से पहले ही जाने का टिकट भी करवा लते हैं। दो-दिन के लिये आते हैं तो अपनी व्यस्तता दिन भर गिनवाते रहते हैं। आज अलाने से मीटिंग कैंसल करनी पड़ी है। आज फलाने बच्चे का स्कूल मिस हो गया। कभी दो मिनट फोन पर ढँग से बात हो गई, तो हो गई। नहीं तो वो भी नहीं। इतनी आपा-धापी वाली जिंदगी हमें तो कभी रास नहीं आई बेटा। सही मायने में हमारा पुराना ग्रामीण ढाँचा वाला पारिवारिक जीवण ही अच्छा था। शादी में जाते थें, तो महीनों रहकर आते थें। गाँव में हँसी-कहकहे महीनों गूँजते रहते थें। संबंधो में एक तरह की मिठास थी, अपनापन था। वो सबकुछ अब नहीं बचा है। संयुक्त परिवार था। तब लोग साथ मिल-जुलकर रहते थें। खाते थे, पीते थें। आज की तरह एक-दूसरे को पछाड़कर आगे बढ़ने की होड़ तब हममें नहीं थी। आज कल शादी नहीं हो रही है, बेटा। सौदा हो रहा है सौदा। एक बात और मैं कहना चाहूँगा, तुमसे। मेरा क्या है बेटा मैं तो कुछ दिनों का मेहमान हूँ। तुम अपना देख लो, अपनी पत्नी का देख लो। बूढ़ापा तुम्हें अकेले ही काटना है। अच्छा, अब चलता हूँ। चार बज गये हैं। थोड़ा घूमकर आता हूँ।" जग्गू बाबू सोफे की टेक लेकर खड़े हुए। और छड़ी खटखटाते हुए बाहर हवाखोरी के लिये निकल पड़े। *******

  • A Better Planet

    Ahana Gupta Increasing population, increasing pollution, What will happen of the nation? People dying day by day, To stop pollution there is no way. Diseases spreading all around, Way to stop pollution yet not found. Increasing garbage every day, To manage it is the only way. Different dustbins should be in use, Don't forget to follow the three R's rule. Stop throwing garbage just anywhere, Everyone should be aware. Keep your surroundings clean in and out, Spreading the message of cleanliness, it's all about Maintain cleanliness all around, If you want the society safe and sound. Don't destroy the nature for selfish means, Make it a pleasant place for human beings. If we keep the earth clean and green, It will be the best place ever seen. ******

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