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- दो बेटियों का पिता
तनु आर्या कभी-कभी ज़िंदगी हमें वहाँ रुला देती है, जहाँ हम सबसे कम उम्मीद करते हैं। लेकिन उसी जगह कोई ऐसी मुस्कान मिल जाती है, जो हमारे अंदर का इंसान जगा देती है। भगवान सीधे नहीं आते, वो छोटे-छोटे रूपों में हमें राह दिखाते हैं। कई बार वो रूप हमें स्टेशन की भीड़ में भी मिल जाता है। यह कहानी है लखनऊ के मशहूर उद्योगपति अभिषेक सूद की। उम्र पचास के करीब, करोड़ों की संपत्ति, आलीशान बंगला, गाड़ियाँ, शोहरत - सब कुछ था उसके पास। लेकिन अकेलापन उसकी सबसे बड़ी दौलत बन चुका था। पाँच साल पहले उसकी पत्नी आर्या का निधन हो गया था। कोई संतान नहीं थी। दिन-रात काम के बीच अब मुस्कुराने की वजह भी खो गई थी। एक शाम, बिजनेस मीटिंग के बाद अभिषेक स्टेशन पर उतर रहा था। बारिश हो रही थी। लोग भाग रहे थे। तभी दो छोटी बच्चियाँ उसके पास आईं। गीले कपड़े, नंगे पैर, कांपते हाथों से एक ने उसका कोट पकड़ा और मासूम आवाज़ में कहा, “पापा, हमें भूख लगी है, खाना खिला दो।” अभिषेक ठिठक गया। दिल एक पल के लिए रुक सा गया। उसकी आँखें उन दोनों के चेहरे पर टिक गईं। दोनों जुड़वा थीं - एक जैसी आँखें, एक जैसी मुस्कान। और अजीब बात, दोनों की आँखों में वही चमक थी जो कभी उसकी पत्नी आर्या की आँखों में हुआ करती थी। भीड़ के बीच वो कुछ सेकंड तक खड़ा रहा। फिर झुककर उन दोनों को गोद में उठा लिया। शायद उसे भी नहीं पता था कि वह क्यों रो रहा था। जब उन बच्चियों ने पहली बार मुस्कुरा कर कहा “धन्यवाद, पापा” तो उसके अंदर जैसे कोई खालीपन भर गया। उस दिन स्टेशन पर जो हुआ, वो ऊपर वाले का लिखा हुआ चमत्कार था जिसने एक करोड़पति को फिर से पिता बना दिया। अभिषेक उन्हें पास के ढाबे में ले गया। उनके लिए गर्म खाना मंगवाया। उस रात जब वह बच्चियों को घर ले जा रहा था, बारिश अब भी हो रही थी। लेकिन इस बार वह बारिश ठंडी नहीं लगी, उसमें एक अजीब सी गर्माहट थी। अगले दिन सुबह अभिषेक की आँख खुली, तो उसने देखा वही दो नन्ही बच्चियाँ ड्राइंग रूम के फर्श पर बैठी थीं। खिलखिलाकर हँस रही थीं। एक गुड़िया के बाल संवार रही थी, दूसरी उसे खाना खिलाने का नाटक कर रही थी। उनके चेहरों पर मासूम मुस्कान थी जो घर की दीवारों को भी जीवंत कर रही थी। अभिषेक ने धीरे से पूछा, “बेटा, तुम्हारा नाम क्या है?” बड़ी बच्ची बोली, “मैं आर्या हूँ।” छोटी ने कहा, “मैं अनवी।” अभिषेक के दिल में बिजली सी दौड़ गई। उसकी दिवंगत पत्नी का नाम भी आर्या ही था। उसने मुस्कुराकर कहा, “बहुत सुंदर नाम है तुम्हारे।” दोनों बच्चियाँ उसकी गोद में चढ़ गईं और वह पहली बार पिता की तरह मुस्कुराया। दिन गुजरते गए, अभिषेक ने उन दोनों को अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लिया। स्कूल में दाखिला करवाया, कपड़े, किताबें, और एक रंगीन नर्सरी रूम बनवाया। अब हर सुबह जब वह काम पर जाता, दोनों गले लगाकर कहतीं, “पापा जल्दी लौट आना।” उसके लिए यह तीन शब्द अब सबसे कीमती आवाज़ बन चुके थे। पर उसके मन में एक सवाल था—ये दोनों बच्चियाँ कौन हैं? उनका परिवार कहाँ है? जब भी वह यह बात पूछता, दोनों चुप हो जातीं। एक दिन उसने स्टेशन के आसपास जाकर लोगों से पूछा। एक बुजुर्ग ने बताया, “कुछ महीने पहले यहाँ ट्रेन में आग लग गई थी। कई लोग मारे गए। शायद वही बच्चियाँ बची होंगी। अभिषेक को एहसास हुआ कि शायद इन बच्चियों के सिर पर अब कोई नहीं है। उस रात उसने भगवान के आगे सिर झुकाया, “अगर इन बच्चियों की तकदीर में कोई नहीं, तो मुझे इनका सहारा बना दे।” अगले ही दिन उसने दोनों के नाम पर दत्तक प्रक्रिया शुरू की। कोर्ट में उसने कहा, “मैं इन्हें सिर्फ गोद नहीं ले रहा, इन्हें अपना जीवन दे रहा हूँ।” अब घर की हर दीवार पर हँसी थी। हर कमरे में जीवन की आवाजें। दोनों बच्चियाँ हर सुबह उसे जगातीं, और जब वह ऑफिस से लौटता, दरवाजे पर खड़ी होकर कहतीं, “पापा आ गए!” उसकी आँखें हर बार नम हो जातीं। उसे लगता उसकी पत्नी आर्या कहीं ऊपर से इन नन्ही बेटियों के जरिए उसकी अधूरी दुनिया पूरी कर रही है। धीरे-धीरे लखनऊ के समाज में यह बात फैल गई कि शहर का सबसे अमीर आदमी अब दो अनाथ बच्चियों का पिता बन गया है। कुछ लोगों ने सवाल उठाए, कुछ ने ताने दिए, लेकिन अभिषेक ने किसी की परवाह नहीं की। उसने कहा, “अगर इंसानियत पाप है, तो मैं इसे बार-बार करना चाहूँगा।” अब अभिषेक की जिंदगी बदल गई थी। उसकी सुबह उन दो छोटी हँसियों से शुरू होती, रात उनके गले लगकर खत्म होती। अब वो करोड़ों का बिजनेस संभालने वाला इंसान नहीं बल्कि एक साधारण पिता था, जो अपनी बेटियों की हर छोटी इच्छा में खुशी खोजता था। एक दिन स्कूल में पेरेंट्स डे था। आर्या और अनवी ने स्टेज पर कविता सुनाई, “पापा आप हमारी दुनिया हो।” अभिषेक की आँखें नम हो गईं। उस दिन उसे महसूस हुआ कि रिश्ते खून से नहीं, अपनाने से बनते हैं। समय बीता, अब अभिषेक की पहचान सिर्फ एक बिजनेस टाइकून की नहीं रही। लोग उसे दो बेटियों वाला पिता कहने लगे। कई अखबारों ने उसकी कहानी छापी। लखनऊ का अरबपति जिसने दो अनाथ बच्चियों को अपनाकर अपनी जिंदगी बदल दी। एक शाम, जब बारिश हो रही थी, अभिषेक ने बालकनी से देखा—आर्या और अनवी बारिश में भीग रही थीं, एक-दूसरे पर पानी उछाल रही थीं और हँस रही थीं। वो मुस्कुराया, उसकी आँखें भर आईं। उसने आसमान की ओर देखा और कहा, “आर्या, देखो तुम्हारे नाम वाली बेटियाँ मुझे फिर से जीना सिखा रही हैं।” अब उसका घर सिर्फ ईंटों का नहीं, भावनाओं का किला बन चुका था। समय के साथ आर्या और अनवी बड़ी होने लगीं। आर्या डॉक्टर बनना चाहती थी, अनवी ट्रस्ट का कार्यभार संभालना चाहती थी। अभिषेक अब बूढ़ा हो चला था, लेकिन उसकी मुस्कान पहले से ज्यादा गहरी थी। हर साल शादी की बरसी पर दोनों बेटियाँ ट्रस्ट में बच्चों के बीच खाना बाँटतीं। अभिषेक बच्चों की खिलखिलाहट सुनता और कहता, “आर्या, देखो, तुम्हारा नाम अब सिर्फ मेरी यादों में नहीं, इन मासूमों की मुस्कान में भी जिंदा है।” कुछ वर्षों बाद जब अभिषेक की उम्र अस्सी के पार चली गई, उसकी तबीयत बिगड़ने लगी। अस्पताल में भर्ती करवाया गया। वहीं दो बेटियाँ उसके पास थीं। उसने उनका हाथ थामा और धीमे स्वर में कहा, “मुझे गर्व है कि मैं तुम्हारा पिता हूँ। अगर आज भगवान मुझे बुला भी ले, तो मैं मुस्कुरा कर जाऊँगा, क्योंकि मेरी जिंदगी का हर खालीपन तुम दोनों ने भर दिया।” अभिषेक की सांसे थम गईं। लेकिन उसके चेहरे पर वही सुकून था। उसके बाद आर्या अनवी ट्रस्ट और भी बड़ा बन गया। अब वहाँ देश भर से बच्चे आते, पढ़ते, खेलते और कहते, “यह वह जगह है जहाँ हर बच्चा किसी का बन जाता है।” ट्रस्ट की दीवारों पर उसकी तस्वीर लगी थी, जिसके नीचे लिखा था—”जिसने दो बेटियाँ पाई, उसने पूरी दुनिया पाई।” लखनऊ के लोग अब उसे पापा अभिषेक कहकर याद करते थे। वह इंसान जिसने अकेलेपन की जगह अनगिनत बच्चों का प्यार पा लिया। उसकी कहानी अब स्कूलों में बच्चों को सिखाई जाती है - परिवार खून से नहीं, दिल से बनता है। कभी किसी को अपनाने से पहले मत सोचो कि वह तुम्हारा कौन है। क्योंकि शायद वही तुम्हें तुम्हारा असली अर्थ दे दे। *******
- प्रेम या आकर्षण
प्रांजुल अवस्थी मेहंदी का कार्यक्रम चल रहा था। शिखा के दोनो हाथों में उसके साजन का नाम लिखने के साथ - साथ सभी सखियां उसे, उसके होने वाले पति का नाम ले लेकर उसे छेड़ रही थीं। घर में सब रिश्तेदार रस्म रिवाजों में व्यस्त थे। तभी शिखा की मम्मी उसके पास आई और उसके सर पर प्यार से हाथ रखा। आंखों में आंसू और चेहरे पर मुस्कान लेकर पूछा,"तू खुश तो है न बेटा.." "हां मम्मा...." बस इतना ही बोल पाई शिखा बेटी के माथे को चूमकर शिखा की मां भी अपने कामों में लग गई। शिखा अपने मम्मी-पापा की इकलौती और लाडली बेटी थी। उसके पापा अमर जी और मम्मी अनीता जी ने उसे बहुत ही लाड़ दुलार से बड़ा किया था। अमर जी शिखा की हर ख्वाहिश पूरी करते थे। शिखा थी भी बहुत प्यारी.... अपने माता पिता की समझदार और आज्ञाकारी बेटी। स्कूल पास करके शिखा का कॉलेज में दाखिला करा दिया गया। कॉलेज का पहला दिन था। जैसे ही उसने क्लास में प्रवेश किया कुछ लड़के और लड़कियां उसकी रैगिंग के लिए बैठे थे। उन्हीं के बीच में साहिल भी था। साहिल कॉलेज का सबसे ज्यादा हैंडसम लड़का था और सब लड़के-लड़कियों के बीच में आकर्षण का केंद्र भी था। जैसे ही शिखा ने कक्षा में प्रवेश किया कि साहिल उसे अपलक देखता ही रह गया। शिखा के लंबे खुले बाल,गौरा रंग,तीखे नैन नक्श....और उपर से नीले रंग के सूट में वो किसी आसमान से उतरी हुई अप्सरा जैसी प्रतीत हो रही थी। सबने शिखा से उल्टे-सीधे सवाल पूछे और उसने हर सवाल का बहुत ही तहजीब से और सीधा सपाट जवाब दिया। लेकिन ना जाने क्यों साहिल कुछ बोल ही नहीं पाया। शिखा के जाने के बाद साहिल के दोस्तों ने उसको छेड़ना शुरू कर दिया। अब तो आए दिन साहिल शिखा को चुपके चुपके देखने लगा। अगर वो लाइब्रेरी में जाती तो ठीक उसके सामने वाली चेयर पर बैठ जाता और किताब की ओट से उसे निहारता रहता। जिस दिन शिखा कॉलेज नहीं आती, उस दिन साहिल का भी दिल नहीं लगता। ऐसे ही कॉलेज खत्म होने को आया लेकिन साहिल,शिखा को अपने मन की बात नहीं कह पाया। फिर एक दिन शिखा कैंटीन में बैठी थी उसे अकेले बैठा देखकर साहिल ने मौका पाकर पहले तो उससे इधर-उधर की बातें की। बात खत्म होने के बाद शिखा जैसे ही जाने को हुई तो साहिल ने उसका हाथ पकड़ लिया और कहा,"शिखा जब से मैंने तुम्हें देखा है हर पल तुम्हारे बारे में ही सोचता रहता हूं .....जाने कैसी कशिश है तुम्हारे अंदर..... जितना दूर जाने की कोशिश करता हूं.... उतना ही तुम्हें अपने करीब पाता हूं.. तुम्हें देखकर मेरे दिल को एक अजीब सा सुकून मिलता है और जब तुम कॉलेज नहीं आती....तो ना जाने क्यों मेरा मन नहीं लगता... आई लव यू...शिखा.." साहिल के मुंह से यह सब बातें सुनकर ना जाने क्यों शिखा के मुंह से भी एकाएक निकल गया "आई लव यू टू साहिल..." और अब तो रोज-रोज दोनों का ज्यादातर समय कैंटीन में व्यतीत होने लगा। इसी तरह से समय बीत रहा था। कॉलेज की पढ़ाई भी खत्म हो गई और दोनों अपना कैरियर बनाने में लग गए। कुछ दिन बाद शिखा ने साहिल को फोन पर कहा,"साहिल!! मेरे मम्मी- पापा मेरे लिए रिश्ता ढूंढ रहे हैं.... मैं क्या करूं..." "हां तो शादी कर लो ना.... इसमें इतना सोचने वाली कौन सी बात है..."साहिल ने जवाब दिया "मजाक मत करो साहिल!! तुम्हें पता है ना कि हम एक-दूसरे से कितना प्यार करते हैं ....तो क्या प्यार तुमसे और शादी किसी और से.... नहीं ....ये मुझसे नहीं होगा..."शिखा ने भावुक होकर कहा। "देखो शिखा!! इसके लिए तुम्हें कुछ समय तक इंतजार करना पड़ेगा ....ताकि मैं अपने घरवालों को हमारे बारे में बता सकूं..."शिखा को भी साहिल की बात जायज लगी। तभी एक दिन शिखा के लिए विनय का रिश्ता आया। उसके मम्मी-पापा को विनय और उसके घरवाले बहुत अच्छे लगे। विनय भी काफी पढ़ा लिखा और समझदार दिख रहा था। लेकिन शिखा, सिर्फ साहिल से ही शादी करना चाहती थी। उसने साहिल को फोन लगाकर कहा ,"साहिल!! तुम्हें पता है... मेरा रिश्ता पक्का हो गया है.... और बहुत जल्द सगाई भी होने वाली है..... मैं तुम्हारे अलावा किसी और की नहीं हो सकती ..... मैं क्या करूं..... मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है...."कहकर बुरी तरह से शिखा रोने लगी। शाहिल: "देखो शिखा!! जो हो रहा है होने दो.... अगर शादी हो जाती है, तो क्या हुआ..... शादी के बाद भी मैं तुमसे मिलता रहूंगा..." शिखा: "कैसी बातें कर रहे हो तुम साहिल !! तुम जानते भी हो कि तुम क्या कह रहे हो... तुम तो कोशिश करने से पहले ही हार मान रहे हो ...क्या यही तुम्हारा सच्चा प्यार था.... इतनी बातें जो तुम मुझसे करते थे ....क्या सब झूठ था..."" तभी पीछे से किसी लड़की ने साहिल को आवाज दी और साहिल ने जल्दी से फोन काट दिया। शिखा को सब कुछ बहुत अजीब सा लगने लगा। उसने वापस फोन मिलाया लेकिन साहिल ने फोन उठाने की बजाय उसका फोन कट कर दिया। यह सब शिखा को अंदर तक बेचैन कर गया। उसे महसूस हो रहा था कि कुछ तो है...जो या तो देख नहीं पा रही है.... या फिर उसका वहम भी हो। तभी एक दिन उसकी कॉलेज की एक सहेली उससे मिलने घर आती है। बातों बातों में पता चला कि साहिल की तो शादी हो चुकी है और काफी अमीर लड़की से उसने शादी कि ताकि अपना कैरियर बना सके। यह सब सुनकर शिखा को विश्वास ही नहीं हुआ... क्या ये वही साहिल था, जो सच्चे प्यार की डींगे भरता था। पूरी रात वो रोती रही। उसे साहिल के साथ बिताया हुआ हर पल याद आ रहा था। लेकिन वो अपने मन की तकलीफ किसी के साथ बांट भी नहीं सकती थी। उसके मम्मी-पापा ने जब उसे यूं उदास देखा तो पूछा," बेटा!! तुम खुश तो ही ना... जो लड़का हमने तुम्हारे लिए पसंद किया है ... अगर तुम्हें लगता है कि किसी भी वजह से वह तुम्हारे लायक नहीं है... तो तुम बेझिझक हमें बता सकती हो .." शिखा: "नहीं पापा!! ऐसी कोई बात नहीं है... आपने मेरे लिए जो सोचा होगा,वह अच्छा ही होगा..." विनय सगाई के बाद जब भी शिखा को मिलने के लिए कहता, तो शिखा कोई ना कोई बहाना लगाकर टालती रहती। एक-दो बार अगर विनय से मिली तो भी औपचारिक बातें करके रह गई। विनय को भी लगता था कि शायद वो शर्म के मारे बात नहीं कर पा रही हो । और आज मेहंदी के कार्यक्रम के बाद जब रात को सब सो गए तो शिखा अपने कमरे में जाकर जोर- जोर से रोने लगी। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वह क्या करें....? चाह कर भी वो साहिल को नहीं भूल पा रही थी। वो साहिल.... जो उसे धोखा दे चुका था। जाने क्यों वह उसके दिल में इस कदर छाया हुआ था कि उसकी हर छोटी से छोटी बात भी उसके जेहन में बस चुकी थी। लेकिन सबके सामने खुश होने का दिखावा कर रही थी। और फिर वह घड़ी भी आ गई, जब शिखा मांग में सिंदूर और गले में मंगलसूत्र पहनकर विनय की पत्नी के रूप में उसके घर आंगन में आ गई। ससुराल में बहुत सारी रस्मों के बाद जब शिखा को उसके कमरे में ले जाया गया, तो उसे चैन की सांस मिली। तभी रात को विनय कमरे में आया। उसे देख शिखा एकदम से घबरा गई। विनय: "आज हमारी शादी की पहली रात है.... क्या मैं आपसे कुछ पूछ सकता हूं...?" शिखा,"हां विनय जी!! पूछिए ना... जो पूछना चाहते है...? "शिखा मैं चाहता हूं कि पति-पत्नी बनने से पहले हम अच्छे दोस्त पहले बने। एक-दूसरे के दिल की बात बेझिझक दूसरे से कह पाए.... अगर आपके दिल में कोई भी ऐसी बात हो जो आपको लगता है कि मुझे पता होनी चाहिए तो बेझिझक आप मुझे कह सकती हैं.... मुझे अपना पति ना समझ कर एक दोस्त की तरह अपने दिल की बात मुझसे शेयर करिए और मैं वादा करता हूं मैं आपको गलत नहीं समझूंगा..." "ऐसी कोई बात नहीं है विनय जी ....."हड़बड़ा कर शिखा ने जवाब दिया। "कुछ तो बात है शिखा.... न जाने क्यों जब भी आपसे मिला और जब भी आप से बात की..... तो ऐसा लगता था कि जैसे आप मुझसे खिंची खींची सी रहती है। हर बार आप से पूछने की कोशिश की ..... लेकिन यह सोच कर रह गया कि ना जाने आप क्या सोचेंगी..... और शायद तब मेरा इतना हक भी नहीं था आप पर..... लेकिन अब आप मेरी पत्नी है और अब हम एक दूसरे से अपनी हर तकलीफ शेयर कर सकते हैं.... तो बताइए कौन है वह .....?" शिखा एकदम से चौंक गई। शिखा: "जी कौन.... किसके बारे में बात कर रहे हैं आप...." विनय: "शिखा यह आप भी अच्छे से जानती हैं कि मैं किसके बारे में बात कर रहा हूं....." शिखा की आंखों में आंसू आ गए। विनय ने उसका हाथ पकड़ कर प्यार से बिठाया। और कहा,"बस इन्हीं आंसुओं की वजह जानना चाहता हूं.... आपसे और वादा करता हूं अब आपकी आंखों में किसी भी वजह से आंसू नहीं आने दूंगा...." विनय की बातें सुनकर शिखा ने रोते हुए सब बात विनय से बताकर कहा,"मेरे साथ धोखा हुआ है.... जिसे मैंने प्यार किया..... मुझे पता ही नहीं चला कि उसके मन में क्या चल रहा है ......वो मुझे बेवकूफ बनाता रहा और मैं बनती रही...."" "नहीं शिखा!! बेवकूफ आप नहीं... वह इंसान था जिसने आप जैसी प्यारी लड़की की कीमत नहीं समझी....और आप जिसे प्यार का नाम देकर अपने दिल ही दिल में दुखी होती रहती हैं असल में वह सच्चा प्यार था ही नहीं .....वो तो एक आकर्षण था.... जो समय के साथ खत्म हो जाता है ....बस जरूरत है तो आप को इस प्यार और आकर्षण के बीच का फर्क समझने की..." शिखा विनय की बातें गौर से सुन रही थी। उसने नोटिस किया कि यह सब कहते हुए विनय उसे ठीक वैसे ही समझा रहे थे.... जैसे उसके पापा उसे समझाते थे। विनय ने कहना जारी रखा,"शिखा भले ही आप साहिल से प्यार करती थी.... लेकिन अब हमारी शादी हो चुकी है..... मुझे आपके पास्ट से कोई परेशानी नहीं है.... लेकिन मैं सिर्फ इतना चाहता हूं कि मेरी पत्नी किसी की वजह से दुखी ना रहे और उस इंसान को भूलकर आगे बढ़े ...... आने वाली खुशियां आपका इंतजार कर रही हैं ..." शिखा,"आप ठीक कह रहे हैं विनय जी!! शायद मुझे इस बारे में ज्यादा सोचना ही नहीं चाहिए...." "हां शिखा!! मैं भी यही चाहता हूं कि अपनी पत्नी को वह सब खुशियां दूं जिसकी वह हकदार है.... आज आपने अपने पूर्व प्यार के बारे में सारी बातें स्पष्ट रूप से मुझे बता कर मुझे अपनी यादों और अपनी जिंदगी में शामिल कर लिया है.... और इस बात की मुझे बहुत ज्यादा खुशी है..." धीरे धीरे शिखा ने यह महसूस किया उसका पति कितना सुलझा हुआ और खुले विचारों वाला इंसान है। विनय का प्यार और अपने लिए परवाह देखकर शिखा भी उन्हें प्यार करने लगी फिर एक दिन विनय ने शिखा का हाथ पकड़कर कहा,"शिखा!! मैं सिर्फ इतना ही चाहता हूं कि धोखेबाज प्रेमी और झूठे प्रेम को भूल कर आप अपनी जिंदगी में आगे बढ़े...." शिखा: "विनय जी!! जब मैं फेरों के समय विवाहवेदी में आपके संग बैठी थी और आपके साथ सात फेरे लिए थे .... उसी समय मैंने अपने पास्ट को पीछे छोड़ दिया था..... और सब कुछ भुला कर पूरे मन से मैं सिर्फ और सिर्फ आप की हो गई थी... मेरा नाम आपके नाम के साथ जुड़ चुका है..... मेरी दुनिया आप से शुरू होकर आप पर ही खत्म हो जाती हैं..." शिखा की बातें सुनकर विनय खुश हो गया क्योंकि जब उसने शिखा को पहली बार देखा था तभी से उससे प्रेम करने लगा था और आज वह प्रेम पूरी तरह से उसका होने वाला था .... विनय: "क्या आप सच कह रही है.... " "हां विनय जी!! मैं बिल्कुल सच कह रही हूं..... इतना भरोसा तो अपनी पत्नी पर करेंगे ना आप... थैंक यू सो मच ..... मुझे इतनी अच्छी तरह से समझने के लिए... आई लव यू विनय..."कहकर विनय के गले से लग गई "अब यह तो बता दीजिए कि यह प्रेम है या आकर्षण...?" विनय ने हंसकर कहा,"हां हां धर्मपत्नी जी!! यह प्रेम ही है और आकर्षण तो आपकी तरह हमेशा रहेगा.."और इसी तरह दोनों हंसी खुशी अपनी जिंदगी बिताने लगे। *******
- Exploring the Cultural Significance of Rachnakunj in Modern India
Rachnakunj stands as a unique cultural landmark in India, blending tradition with contemporary relevance. It reflects the evolving identity of Indian society while preserving its rich heritage. Understanding Rachnakunj offers insight into how cultural spaces adapt and thrive in a rapidly changing world. Rachnakunj entrance highlighting traditional Indian architecture The Origins of Rachnakunj Rachnakunj began as a modest initiative to create a space where Indian art, literature, and traditions could be celebrated and nurtured. Founded in the late 20th century, it aimed to provide a platform for artists, writers, and thinkers to connect with the public. The name itself, combining "Rachna" (creation) and "Kunj" (grove or retreat), symbolizes a sanctuary for creative expression. This origin story is important because it highlights the intention behind Rachnakunj: to serve as a cultural hub that respects the past while encouraging new ideas. Over time, it has grown into a respected institution that hosts exhibitions, workshops, and performances. Rachnakunj’s Role in Preserving Indian Traditions One of the key contributions of Rachnakunj is its dedication to preserving traditional Indian arts and crafts. It actively supports artisans who practice age-old techniques, such as handloom weaving, pottery, and classical dance forms. By organizing exhibitions and fairs, Rachnakunj helps these crafts reach wider audiences, ensuring they remain economically viable. For example, the annual handicraft fair at Rachnakunj attracts visitors from across the country. This event not only showcases exquisite handmade products but also educates people about the cultural stories behind them. Such efforts strengthen the connection between modern consumers and traditional artisans. Promoting Contemporary Indian Art and Literature While rooted in tradition, Rachnakunj also embraces contemporary creativity. It provides a platform for emerging artists and writers to present their work. This balance between old and new makes Rachnakunj a dynamic cultural space. The center regularly hosts book launches, poetry readings, and art exhibitions that reflect current social themes. These events encourage dialogue on issues like identity, globalization, and social change. By doing so, Rachnakunj helps Indian culture stay relevant and responsive to modern challenges. Educational Programs and Community Engagement Rachnakunj’s impact extends beyond exhibitions and performances. It runs educational programs aimed at children and adults to foster appreciation for Indian culture. Workshops on traditional music, dance, and crafts are popular among participants of all ages. Community engagement is another important aspect. Rachnakunj collaborates with schools and local organizations to bring cultural education to underserved areas. This outreach helps build pride in cultural heritage and promotes inclusivity. Rachnakunj as a Model for Cultural Spaces in India The success of Rachnakunj offers lessons for other cultural institutions in India. Its approach combines respect for tradition with openness to innovation. This model supports sustainable cultural development by: Encouraging participation from diverse groups Creating economic opportunities for artists and artisans Fostering cultural education and awareness Adapting to changing social contexts without losing core values Such a balanced approach is essential for cultural spaces to thrive in modern India. Challenges and Future Directions Despite its achievements, Rachnakunj faces challenges common to many cultural institutions. Funding constraints, competition from digital entertainment, and changing audience preferences require continuous adaptation. To address these issues, Rachnakunj is exploring new partnerships and digital platforms. Virtual exhibitions and online workshops are being developed to reach broader audiences. These initiatives aim to complement physical events and ensure cultural engagement remains strong. The Broader Impact on Indian Society Rachnakunj’s influence goes beyond the arts. It contributes to social cohesion by bringing people together around shared cultural experiences. In a diverse country like India, such spaces help build understanding and respect among different communities. Moreover, by supporting traditional crafts and contemporary creativity, Rachnakunj plays a role in sustaining livelihoods and promoting cultural tourism. This has positive economic effects at the local and regional levels.
- मोची की कहानी
संगीता जैन किसी शहर में एक मोची रहा करता था। उसके घर के पास ही उसकी एक छोटी-सी दुकान थी। उस दुकान में वह मोची जूते बनाने का काम करता था। तैयार जूतों को बेचकर जो भी पैसे मोची के हाथ लगते उन्हीं से वह अपने परिवार का पेट पालता था। हालांकि, मोची अपना काम बड़ी मेहनत और लगन से करता था, लेकिन धीरे-धीरे उसके जूते खरीदने वालों की संख्या कम होने लगी। ऐसे में उसे कम दाम पर अपने तैयार जूतों को बेचना पड़ता था। इसका नतीजा यह हुआ कि समय के साथ उसका सारा जमा पैसा भी खत्म हो चला। नौबत यह आ गई कि उसे घर चलाने के लिए अपनी पत्नी के गहने तक बेचने पड़ गए। इस कारण मोची बहुत उदास रहने लगा। उसको उदास देख मोची की पत्नी उसे दिलासा देती कि ऊपर वाले पर भरोसा रखो, सब ठीक हो जाएगा। भगवान हमारी मदद जरूर करेगा। पत्नी की यह बात सुनकर मोची झूठ-मूठ का मुस्कुरा देता और मन ही मन अपनी इस दशा को सोचकर चिंता में डूब जाता। एक समय ऐसा आया जब मोची की दुकान पर केवल एक जोड़ी ही जूते बचे। इसके अलावा, उसके पास और जूते बनाने का समान भी मौजूद नहीं रह गया था। वहीं, मुश्किल इस बात की थी कि उस एक जोड़ी जूते को खरीदने वाला भी कोई नहीं आ रहा था। जब कई दिनों तक उन जूतों को खरीदने कोई नहीं आया, तो मोची उन जूतों को लेकर बाजार की ओर चल दिया। बाजार में मोची के जूते बिक गए। जूते बेचने के बाद जो पैसे मिले, मोची ने उससे घर का जरूरी सामान खरीदा और घर वापस आने लगा, लेकिन तभी अचानक रास्ते में उसकी नजर एक बूढ़ी औरत पर पड़ी। वह औरत बहुत भूखी और बीमार थी। इसलिए, मोची ने कुछ पैसे उस बूढ़ी औरत को दे दिए। अब उसके पास और जूते बनाने के लिए सामान नहीं था। वह दुकान लौटा और वहां उसने एक चमड़े का टुकड़ा बचा देखा। उस टुकड़े से केवल एक जोड़ी जूता ही बन सकता था। तो जूते के लिए मोची ने टुकड़ा काटकर तैयार किया और यह सोचकर घर चला गया कि अब अंधेरा ज्यादा हो गया है। कल रोशनी में वह जूते तैयार करेगा। अगली सुबह जब वह जूते बनाने के लिए दुकान पहुंचा, तो उसे वहां कटे हुए चमड़े के टुकड़े की जगह एक तैयार जूते की जोड़ी मिली। वह जूते की जोड़ी इतनी खूबसूरत थी कि मोची उसे देखकर हैरान था। मोची ने उस जोड़ी को उठाया और फौरन बाजार की ओर रवाना हो गया। वो जूते इतने खूबसूरत थे कि मोची को उसकी अच्छी कीमत हासिल हुई। इस पर मोची बहुत खुश हुआ और हासिल हुए पैसों में से उसने कुछ पैसे जरूरतमंद लोगों को दिए। बाकी जो बचे उससे उसने जूते बनाने का सामान लिया। उस रात उसने दो जोड़ी जूतों के लिए चमड़ा काट कर रखा और घर वापस आ गया। अगली सुबह उसे फिर से वैसे ही खूबसूरत दो जोड़ी जूते तैयार मिले। उसने घर आकर यह पूरी बात अपनी पत्नी को बताई। मोची की पत्नी बोली, “देखा मैं कहती थी न कि भगवान हमारी मदद जरूर करेगा। ऊपर वाला सब कुछ देखता है। उसका ही किया है कि कोई नेक दिल हमारी इस तरह से मदद कर रहा है।” अब तो रोज जूते के लिए चमड़ा काट कर छोड़ने और अगले दिन बने बनाए सुंदर जूते पाने का सिलसिला ऐसे ही चलने लगा। धीरे-धीरे मोची की स्थिति सुधर गई और उसने अच्छा पैसा भी जमा कर लिया। तभी मोची की पत्नी एक दिन बोली, “हमें एक दिन रात को रुक कर पता लगाना चाहिए कि हमारे लिए इस तरह से जूते कौन बना रहा है।” यह सोचकर मोची और उसकी पत्नी रात को चमड़े का टुकडा छोड़कर दुकान में रुक गए। तभी उन्होंने देखा कि तीन बौने खिड़की से दूकान में घुसे और खुशी-खुशी जूते बनाने लगे। पूरी रात खूबसूरत जूते बनाने के बाद वह तीनों बौने खिड़की के रास्ते ही वापस चले गए। यह सब देखने के बाद मोची और उसकी पत्नी आपस में बात करने लगे कि इन तीन बौनों ने हमारी बहुत मदद की है। इसलिए, हमें भी इनके लिए कुछ करना चाहिए। इन्हें कुछ उपहार देना चाहिए। इस पर मोची ने अपनी पत्नी से पूछा, “बताओ आखिर इन्हें ऐसा क्या दिया जाए, जिससे इन्हें खुशी मिले।” इस पर पत्नी कहती है, “तुमने ध्यान दिया कि उनके कपड़े और जूते काफी पुराने हो गए हैं। मैं उनके लिए नए कपड़े सिल देती हूं। तुम उनके लिए जूते बना देना।” फिर क्या था मोची ने तीनों बौनों के लिए जूते बनाए और उसकी पत्नी ने तीनों के लिए सुंदर कपड़े तैयार किए। बाद में उन्हें ले जाकर दुकान में रख दिया और उस रात उन्होंने उन बौनों के लिए चमड़े का टुकड़ा नहीं छोड़ा। जब रात में तीनों बौने दूकान में घुसे तो अपने नाप के जूते और कपड़े पाकर काफी खुश हुए। उन्होंने कपडे और जूते पहने और खुशी-खुशी वहां से चले गए। उस दिन के बाद से कुछ दिन तक मोची ने गौर किया कि उसके द्वारा छोटे गए चमड़े के टुकड़े वैसे ही पड़े मिलते हैं। मोची समझ गया कि अब बौने उसकी मदद के लिए वहां नहीं आएंगे। उसकी स्थिति सुधर चुकी है और उसे अपना काम खुद करना होगा। इतने दिनों में मोची को लोगों की पसंद का अच्छी तरह अंदाजा हो गया था। इसलिए, उसने पूरी मेहनत के साथ बौनों जैसे जूते बनाए और उन्हें बाजार में बेचा। मोची द्वारा बनाए गए जूते भी लोगों को बहुत पसंद आए और उसका काम अब अच्छा चलने लगा। सीख : दूसरों द्वारा की गई मदद का आभार माने और उनसे सीख लें, न कि दूसरों पर निर्भर रहने लगें। *******
- किताबी ज्ञान
आशा तिवारी राज्य सरकार द्वारा संचालित कोरोना वार्ड में भर्ती एक टीचर सीलिंग फैन को देखते हुए, पढ़ने के लिए किताब उठाने ही वाली थी, तभी उनके फोन की घंटी बजी। वह एक बिना नाम वाला नंबर था। आमतौर पर वह ऐसे कॉल से बचती थी पर अस्पताल में अकेले और कुछ करने के लिए नहीं था इसलिए उन्होंने इस फ़ोन कॉल को जवाब देने का फैसला किया। स्पष्ट स्वर में एक पुरुष ने अपना परिचय दिया, "नमस्ते मैडम, मैं सत्येंद्र गोपाल कृष्ण दुबई से बात कर रहा हूँ। क्या मैं सुश्री सीमा कनकंबरन से बात कर रहा हूँ?" टीचर यह जानने के लिए उत्सुक थी कि वह कौन थे? उन्होंने कहा, "हाँ, आप सीमा से बात कर रहे हैं।" एक विराम के बाद वह बोले, "कुछ साल पहले मैडम, जब मैं 10 वीं कक्षा में था, तब आप मेरी क्लास टीचर थीं।" टीचर उन्हे नहीं पहचान पा रही थी। उन्होंने कहा, "मैं कोविड के कारण अस्पताल में भर्ती हूँ। अगर कोई जरूरी बात नहीं हो तो आप मुझे बाद में कॉल कर सकते हैं?" सत्येंद्र ने कहा, "मैडम मुझे आपकी बीमारी के बारे में 1995 बैच के टॉपर सुब्बू से पता चला।" टीचर ने कहा, "मैं सुब्बू को अच्छी तरह जानती हूँ, लेकिन मैं आपको नहीं पहचान पा रही हूँ।" "मैडम," सत्येंद्र ने बीच में रोकते हुए कहा, "आशा है कि आपको वह लंबा काला लड़का याद होगा जो आपका सबसे बड़ा सिरदर्द था। मैं पिछली बेंच पर बैठता था!" टीचर उस बैक बेंचर् के बारे में सोचने लगी! बातचीत दिलचस्प होती जा रही थी। टीचर ने किताब को साइड टेबल पर रख दिया और तकिए को खींचकर आराम से बैठते हुए पूछा, "आज अचानक से तुम्हे मेरी याद कैसे आ गई?" सत्येंद्र ने कहा, "मैडम, जब मुझे पता चला कि आप अस्पताल में भर्ती हैं, तो मैंने 1995 की कक्षा के सभी उपलब्ध दोस्तों के साथ एक कॉन्फ्रेंस कॉल के बारे में सोचा। मैं, हम में से 7 को इस कॉल पर लाने में सफल रहा। वे हमारी बातचीत सुन रहे हैं, मैडम। हमने सिर्फ आपके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना के लिए फोन किया है।" मैडम के शब्द अचानक लड़खड़ा गए, एक लंबे विराम के बाद उन्होंने पूछा, "अब मुझे अपने बारे में बताओ। तुम कहाँ हो?" सत्येंद्र ने जारी रखा, "मैडम, मैं दुबई में हूँ, मैं अपना खुद का बिज़नेस चलाता हूँ। पहले यहाँ नौकरी की तलाश में आया था पर अंत में एक उद्यमी के रूप में सफल हुआ। मेरी कंपनी में लगभग 2000 लोग हैं। जब हम 10वीं कक्षा में थे, तब अनुशासन के बारे में तो कक्षा में आपका आतंक था। लेकिन आप, हमेशा बड़े दिल से हमारे प्रति उदार भी रहीं और बैक बेंच पर सबसे अधिक शोर करने वाले मुझ जैसे अनुशासनहीन छात्रों पर विश्वास जताया। कक्षा में मैं बैक बेंचर्स का नेता था। मैडम, मुझे सबसे ज्यादा सजा मिलती थी, अक्सर आप मुझे क्लास के बाहर और कभी क्लास के अंदर, बेंच पर खड़ा कर देती। क्लास के दिनो के इन सभी अनुभवों और कभी-कभी क्लास में सबसे ऊपर, बेंच पर खड़े होने के अनुभवों ने मुझे जीवन में बहुत मदद की। इन सजाओं ने वास्तव में मुझे पूरी कक्षा के बारे में एक व्यापक दृष्टिकोण विकसित करने में मदद की। मैं उन्हीं सीखों को अपने जीवन और व्यवसाय में लागू कर रहा हूँ। मैडम, आज मैं जो कुछ भी हूँ, उसके लिए मैं हमेशा आपका ऋणी रहूँगा।" टीचर को बोलने में कठिनाई हो रही थी। जैसे ही सत्येंद्र ने अपनी कहानी जारी रखी, टीचर अपने विचारों में कुछ दशक पीछे 1995 की कक्षा में चली गई... ...1995 की कक्षा। हाँ कक्षा में सबसे लंबा काला लड़का, वह शैतान बच्चों का नेता था! क्लास में हमेशा देर से आता, क्लास से गायब रहता, पिक्चर देखने चले जाता! वह कभी होमवर्क करके नहीं लाता था। वह जो बार-बार टीचर्स रूम में अपनी सजा कम करने के लिए बात करने आ जाता था। वह शिक्षकों के लिए एक परेशानी बना हुआ था लेकिन कक्षा में बहुत लोकप्रिय था। उसके दोस्त उसे बहुत पसंद करते थे। और वह वहाँ दुबई कैसे पहुँच गया? अचानक टीचर के विचारों में बाधा आ गई थी... दूसरे छोर से सत्येंद्र से पूछा, "मैडम, क्या आप सुन पा रही हैं?" मैडम ने कहाँ, "हाँ मैं सुन रही हूँ!" उन्होंने जारी रखा, "सत्येंद्र, मैंने स्कूल के बाद, तुम्हारे बारे में कभी नहीं सुना। मैं इतनी हैरान और खुश हूँ कि तुमने मुझे फोन किया, वह भी अपने दोस्तों के साथ कॉन्फ्रेंस कॉल पर! मैं तुम सब के बारे में जानना चाहती हूँ।" ग्रुप कॉल में अन्य छह में से तीन लोग अलग-अलग देशों में इंजीनियर थे। एक दिल्ली में डॉक्टर, एक शिलांग में पुजारी और अंत में सुब्बू क्लास का टॉपर था। सुब्बू ने कहा, "मैडम मैं चार्टर्ड अकाउंटेंट हूँ। मैं सत्येंद्र का मुख्य वित्तीय प्रबंधक हूँ!" टीचर को विश्वास नहीं हुआ, उसने पूछा "तुम कैसे?" उसने कहा, "हाँ मैडम,सत्येंद्र के साथ जुड़ने से पहले मैं के पी एम जी (KPMG) कंपनी के साथ था। लेकिन, सत्येंद्र के साथ काम करके मैं एक संतुष्ट पेशेवर और एक खुशहाल पारिवारिक जीवन जी रहा हूँ।" जब तक उनमें से प्रत्येक ने अपनी कहानी सुनाई, तब तक लगभग 40 मिनट हो चुके थे, सत्येंद्र ने लंबी बात के लिए माफी मांगी और अपनी प्रिय शिक्षिका के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की और केरल की अपनी अगली यात्रा के दौरान उनसे मिलने का वादा किया। उस कोविड आइसोलेशन वार्ड में अकेले बैठे हुए, शिक्षिका की आँखों से आँसू छलक पड़े। उनके दिल में खुशी की लहर दौड़ गई और उनकी आँखों से आँसू रुक ही नहीं रहे थे। इस बात ने उन्हें भावविभोर कर दिया था, कि उनके छात्र उन्हें अनुशासन सिखाने व दयावान होने के लिए याद रखते हैं। वे यह सोच कर भी शुक्रगुज़ार व खुश थीं, कि उनके सभी छात्र जीवन में सफल एवं सुखी थे। और ना केवल वो छात्र जो स्कूल से ही अच्छा प्रदर्शन करते आए हैं, बल्कि वे बच्चे जो बहुत ही शैतान लगते थे, उन्होंने भी अपने जीवन से शिक्षाएँ लेकर बहुत तरक्की की है। वे सत्येंद्र के बारे में सोचने लगीं, "यह लड़का अपने पाठ्यक्रम के बाहर, किताबों से बाहर के, असल जीवन के ज्ञान का प्रयोग कर इतना आगे बढ़ रहा है। बार-बार दण्ड मिलने, आखिरी बेंच पर खड़े होने से, उसे चौकस होने व व्यापक दृष्टिकोण विकसित करने का मौका मिल गया। कक्षा से गायब रहने पर पकड़े जाने से, उसने बहुत कम उम्र में जोखिमों को कम करना और दूर करना सीख लिया। दोपहर के भोजन के समय शिक्षक कक्ष में आकर अपनी सजा को कम करने की बातचीत के दौरान उसने समझौते की कला हासिल की। जो रिश्ते उसने उस समय बनाए थे, वे आज भी इतने मज़बूत हैं। और लगता है कि उसने गणित में जो अंक गंवाए थे, वह उसने वास्तविक जीवन के अनुभव के लिए बचा रखे थे! और सुब्बू ने गणित में जो 100% अंक प्राप्त किए थे, वह अब सत्येंद्र द्वारा बचाये गए नंबरों पर काम कर रहा है। अद्भुत!" उन्होंने सोचा, दो साल की महामारी में स्कूलबंदी, बच्चों के चरित्र निर्माण पर भारी असर डाल रही है। घर बैठे और डिजिटल रूप से सीखकर वे अंक प्राप्त कर सकते हैं पर जीवन के अनुभवों के बारे में क्या? हमें और भी सत्येंद्र और सुब्बू जैसों की ज़रूरत है। तभी समाज का विकास होगा। तभी यह धारणा विकसित होगी, कि शिक्षा केवल कक्षा की चार दीवारी में, केवल किताबों से नहीं मिलती। शिक्षा एक प्रक्रिया है, जहाँ '10% हम स्कूल में सीखते हैं, 20% साथियों से, और 70% जीवन की राह पर।' यह कहानी एक वास्तविक जीवन की घटना से प्रेरित है। "किताबी ज्ञान हमारे जीवन की चुनौतियों और परेशानियों को कम नहीं कर सकता है I यह केवल एक नीव की तरह से काम करता है I व्यावहारिक अनुभव हमारे भौतिक और आध्यात्मिक जीवन में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं I" *******
- नीलकंठ
गुलशन नंदा असावधानी से पर्दा उठाकर ज्यों ही आनंद ने कमरे में प्रवेश किया, वह सहसा रुक गया। सामने सोफे पर हरी साड़ी में सुसज्जित एक लड़की बैठी कोई पत्रिका देखने में तल्लीन थी। आनंद को देखते ही वह चौंककर उठ खड़ी हुई। 'आप!' सकुवाते स्वर में उसने पूछा, 'जी, मैं रायसाहब घर पर हैं क्या?' 'जी नहीं, अभी ऑफिस से नहीं लौटे।' 'और मालकिन। आनंद ने पायदान पर जूते साफ करते हुए पूछा। 'जरा मार्किट तक गई हैं। 'घर में और कोई नहीं?' 'संध्या है, उनकी बेटी! अभी आती है।' वह साड़ी का पल्लू ठीक करती हुई बोली। 'आपको पहले देखने का कभी...।' 'जी, मैं सहेली हूँ उसकी। वह बात काटते हुए बोली, 'आप बैठिए, मैं उसे अभी बुलाकर लाती हूँ।' जैसे ही वह संध्या को बुलाने दूसरे कमरे की ओर मुड़ी, किनारे रखी मेज से टकरा गई, फिर अपने को संभालती हुई शीघ्रता से भाग गई। आनंद उसकी अस्त-व्यस्त दशा देख मुस्कुरा उठा और दीवार पर लगे चित्रों को देखने लगा। कुछ समय तक न संध्या और न उसकी सखी ही आई तो आनंद ने बिना आहट किए दूसरे कमरे में प्रवेश किया। सामने वह लड़की खड़ी बाथरूम का किवाड़ खटखटा रही थी। आनंद हौले से एक ओर हट गया। 'अभी कितनी देर और है तुझे !' लड़की ने तनिक ऊँचे स्वर में पूछा। 'चिल्लाए क्यों जा रही है, कह जो दिया आती हूँ, परंतु वह कौन है?' भीतर से सुनाई दिया। 'मैं क्या जानूं? बैठक में बैठा देवी जी की प्रतीक्षा कर रहा है।' 'तू चलकर उसका मन बहला जरा, मैं अभी आई।' 'वाह! अतिथि तुम्हारा और मनोरंजन करें हम।' साथ ही चिटखनी खुलने की आवाज सुनाई पड़ी।
- मालकिन मैं या तुम
गीता तिवारी शादी की उम्र हो रही थी और मेरे लिए लड़कियां देखी जा रही थीं। मैं मन ही मन काफी खुश था कि चलो कोई तो ऐसा होगा जिसे मैं अपना हमसफर बोलूंगा, जिसके साथ जब मन करे प्यार करूंगा। मेरी अच्छी खासी नौकरी थी, घर में बूढ़ी मां और पापा थे, और इतनी कमाई थी कि अपने पत्नी का खर्चा उठा सकूं। ये सारी बातें सोच-सोचकर खुश होता था। मां की उम्र भी हो गई थी, तो एक प्वाइंट ये भी लोगों को बताता कि मुझे शादी की कोई जल्दी नहीं, ये तो मां हैं जिनकी उम्र निकल रही है, उनके लिए शादी करनी है। लोग भी मेरी बात मानते, लेकिन मन में तो मेरे भी चाहत थी कि मेरी शादी हो जाए। मेरी शादी दिव्या से फिक्स हो गई। मैंने दिव्या को बोला कि हम आगे जाकर बहुत अच्छी जिंदगी जीने वाले हैं, क्योंकि मेरे घर में कोई नहीं है। बस तुम्हें मेरे मां-बाप का ध्यान रखना होगा। दिव्या ने तुरंत बोला, "आपके मां-बाप भी मेरे मां-बाप हो जाएंगे शादी के बाद।" दिव्या की अच्छी बातों से मुझे दिन-रात और ज्यादा प्रेम होने लगा था। कभी परिवार संभालने की बातें, कभी शरारत भरी रोमांटिक बातें सुनकर मैं बहुत खुश था। मानो एक परफेक्ट जिंदगी मुझे मिल गई हो। शादी के बाद हम दोनों घूमने गए, सब कुछ बहुत अच्छा था। ना जाने क्यों इस पल हम दोनों को ऐसा लगता था कि बस हम एक-दूसरे से लिपटे रहें। अब जिनकी शादी हुई होगी, वो समझ पा रहे होंगे कि मैं क्या बोलना चाहता हूं। घूमने के बाद जब घर आया, तो ज्यादातर समय ऑफिस के लिए ही होता था। छुट्टी में जब कभी मम्मी-पापा बाहर जाते, तो दिव्या मैडम मूड में रहती थी। कब, क्या, कहां, कैसे हो जाता था, पता नहीं चलता था। मुझे अब लगने लगा था कि एक ऐसी पत्नी मिली है, जो घर की जरूरतों को समझती है, साथ में मेरी शारीरिक जरूरतों का भी ध्यान रखती है। संबंध बनाने के लिए खुद ही पहल करती है, और यदि कभी मैं कर दूं तो माना नहीं करती बल्कि पूरा साथ देती है। अब जिंदगी में इससे अच्छा क्या होगा? फालतू में मेरे दोस्त बोलते थे कि शादी मत करो, लाइफ खराब हो जाती है। हमारी शादी को 2 महीने हुए थे, दिव्या ने बोला, "अजी, मुझे साड़ी में दिक्कत होती है, क्या मैं घर पर सूट पहन सकती हूं?" मैंने तुरंत बोला, "हां, क्यों नहीं पहन सकती हो, चलो अभी दिलाता हूं।" हम दोनों बाजार से घर आए, मम्मी ने उसके हाथ में सूट देखा, कुछ बोली नहीं। अगली सुबह जब वह नहाकर सूट पहनकर निकली, तो मम्मी ने बोला, "तुमने सूट क्यों पहन लिया? हमारे यहां शादी के 6 महीने तक नई बहू को सिर्फ साड़ी पहननी होती है। रोज कोई न कोई देखने आता है, सबके सामने सूट पहनकर जाओगी, अच्छा नहीं लगेगा। और बार-बार दिन भर कपड़ा बदलो, ये भी अच्छा नहीं है।" इस पर दिव्या ने मां को सॉरी बोला और बोली, "मैंने तो इनसे पूछकर लिया था।" तभी मां बोलती हैं, "ये कौन होता है ये सब डिसाइड करने वाला? अभी मैं हूं तो मैं करूंगी, जब मैं मर जाऊं तो जैसे मन वैसे रहना।" इसे सुनने के बाद आज मुझे पहली बार घर में अपनी औकात का पता चला। मासूमियत से दिव्या मेरी तरफ देख रही थी, शायद ये बताना चाहती थी कि मेरी वजह से उसे डांट पड़ गई। पत्नी प्रेम में लिप्त होकर मैंने मां से बोल दिया, "अरे मम्मी, उसकी गलती नहीं है, मुझसे पूछी थी वो।" मां ने तुरंत बोला, "2 महीने हुआ नहीं और आगए पत्नी का पक्ष लेने। इस घर में मालिक मैं हूं या तुम हो?" अब मेरे पास कोई जवाब नहीं था, हम दोनों एक-दूसरे को देखे और अंदर चले गए। इस बात से दिव्या डर गई थी और अब वह हर काम मां से पूछकर करने लगी। लेकिन मां के लिए ये भी एक आफत, अब उनका कहना था कि तुम 28 साल की हो, तुम्हें खुद बुद्धि होनी चाहिए कि क्या करना है, क्या नहीं। हर चीज के लिए मेरे पास मत आया करो। लेकिन अब इस बार दिव्या भी चिढ़ गई, पर मां से कुछ बोली नहीं। जब मैं ऑफिस से आया तो अंदर आते ही मां बोलने लगी, "तुम्हारी धर्मपत्नी को बुद्धि नाम की चीज नहीं है।" मैंने मां को समझाया कि जाने दो, सीख जाएगी, थोड़ा समय दो। इस पर मां ने मुझसे मुंह फूला लिया और उदास रोते मन से कहा, "तुम बदल गए हो।" और पीछे से धीरे-धीरे मेरे पिता जी देखते हुए हंस रहे थे, मानो ऐसा जता रहे हों कि कैसे उन्होंने पहले ही भविष्य देखा हुआ था। इसके बाद कमरे में गया तो वहां दिव्या का मुंह फूला हुआ था। कमरे में घुसते ही उसने मुझसे बोला, "मैं कितनी भी कोशिश कर लूं, मां कभी खुश नहीं होती। हर चीज की एक सीमा होती है और यह सारी बातें सीमा से भी ऊपर हैं।" मैंने उसे पकड़ा और बोला, "घबराओ मत, थोड़ा समय लगेगा मां को संभलने में, क्योंकि तुम्हारे अलावा उनका कोई और नहीं है। वह तुम्हें अपना मानती हैं इसलिए तुमसे ऐसी बातें करती हैं। चलो, चल के नीचे खाना खाते हैं, बहुत तेज भूख लगी है।" ऐसा बोलकर हम नीचे आते हैं और मैं मन में ही सोचता हूं, दिव्या को तो मैं धीरे से किसी भी तरह से मना लूंगा, एक रात की बात है, एक बार जहां लिपट के सोया, सब कुछ सुबह ठीक हो जाएगा। मां के लिए कुछ सोचना पड़ेगा। नीचे खाना खाने के बाद मैं और दिव्या अपने कमरे में जाते हैं। दिव्या अभी भी थोड़ी नाराज लग रही थी। मैंने उसे बोला, "क्यों मां की बात का इतना बुरा मानती हो?" उसने तुरंत मुझसे बोला, "मेरी कोई गलती भी नहीं होती और हर चीज के लिए मुझे दोषी ठहरा दिया जाता है। मैं कुछ अच्छा भी करने जाती हूं तो उसमें भी मेरी बुराई निकल जाती है।" मैंने उसे जोर से गले लगाया और बोला, "ऐसा कुछ नहीं है, समय के साथ सारी चीज ठीक हो जाएगी।" और अब बारी थी कुछ करने की, लेकिन उसने मुझे अपने से दूर कर दिया और बोला, "मेरा मन नहीं है।" अब जो मुझे लगता था कि एक रात लिपट के सोने से अगली सुबह सब कुछ ठीक हो जाएगा, यह बातें झूठी समझ आने लगीं। धीरे-धीरे हर छोटी-छोटी चीज पर घर में लड़ाई झगड़ा होने लगा। मां को दिव्या की कुछ चीजें पसंद नहीं आतीं और दिव्या को मां की बहुत सारी चीजें नहीं पसंद आतीं। दिव्या का कहना था कि घर उसका भी है और हर छोटी चीज के लिए परमिशन लेना उसे ठीक नहीं लगता। उधर मां का कहना था कि इस गृहस्थी को मैंने बसाया है और तुम्हें हैंडओवर किया है, इसलिए अभी भी इसकी मालकिन मैं ही हूं। तुम्हें जो भी पूछना है मुझसे पूछ कर करो। दोनों अपनी बात पर बिल्कुल सही थीं। एक तरफ दिव्या, जिसके साथ मुझे पूरी जिंदगी बितानी थी, दूसरी तरफ मेरी मां, जिन्होंने इस गृहस्ती को संभाला था, मुझे पाल-पोसकर बड़ा किया था। लेकिन इन दोनों की लड़ाई का असर सीधा-सीधा मेरे ऊपर दिख रहा था और मैं पिसता जा रहा था। धीरे-धीरे बात कहीं ज्यादा बढ़ने लगी और घर में प्रतिदिन लड़ाई झगड़े की नौबत आ गई। अब मुझे भी लगने लगा था कि जो मेरे दोस्त बोलते थे कि शादी करने से बहुत ज्यादा खुशी नहीं मिलती, बल्कि लाइफ में टेंशन आता है, वह क्यों बोलते थे। इसी तरह एक दिन अत्यधिक बात बढ़ने पर मैं रात को दोनों लोगों के कमरे में गया। सबसे पहले मैं मां के कमरे में गया और मां को समझाया, "देखो मां, तुम दोनों के झगड़े की वजह से मेरा करियर खराब हो रहा है और मैं ठीक से रह नहीं पा रहा हूं। मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकता और ना मैं दिव्या को छोड़ सकता हूं। तो इसलिए थोड़ी नरम हो जाओ, जो चीज जैसे चल रही है, चलने दो।" इस बार मैं थोड़ा कठोर था। मां से तुरंत बोलने के बाद मैं अपनी पत्नी के कमरे में गया और यही बात उससे भी कही, "देखो, मां की उम्र हो चुकी है। यदि तुम यह सोच रही हो कि मां अपने आप को बदल सकती हैं, तो यह होना मुमकिन नहीं है। बदलना तुम्हें खुद को होगा, जिसमें मैं तुम्हारा पूरा साथ दूंगा। मैं ना तुम्हें छोड़ सकता हूं, क्योंकि तुम मेरा भविष्य हो, और ना मैं अपनी मां को छोड़ सकता हूं, क्योंकि उन्होंने मुझे पाल-पोस कर इस लायक बनाया है। तो कोई बीच का रास्ता निकालो और घर में शांति से रहो।" यह बात होने के कुछ दिन बाद धीरे-धीरे चीजें फिर से संभालने लगीं। *******
- रामू का चमत्कार
श्रीपाल शर्मा कभी-कभी जिंदगी हमें ऐसे मोड़ पर ले आती है, जहाँ ना पैसा काम आता है, ना ताकत, ना ओहदा। बस एक उम्मीद बचती है, जो अक्सर किसी अनजाने चेहरे से मिल जाती है। कहते हैं, भगवान जब मदद भेजता है, तो वह अक्सर ऐसी शक्ल में आता है, जिसे हम नजरअंदाज कर देते हैं। यह कहानी है दिल्ली के मशहूर अरबपति विक्रम मल्होत्रा की। उसकी पत्नी मीरा आईसीयू में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही थी। सारे नामी डॉक्टर जवाब दे चुके थे। लाखों रुपए, बड़ी टीम, आधुनिक मशीनें - सब कुछ था। लेकिन किसी के पास मीरा की सांसें वापस लाने का जवाब नहीं था। विक्रम का चेहरा झुका हुआ था। उसके पास दौलत का हर जरिया था, लेकिन उस वक्त वह बिल्कुल असहाय महसूस कर रहा था। वह पास की बेंच पर बैठकर भगवान से रहम की भीख मांग रहा था। “हे भगवान, अगर तू कहीं है तो मुझे एक उम्मीद दे, एक रास्ता दिखा।” तभी पीछे से एक धीमी आवाज आई, “साहब, अगर आप इजाजत दें तो मैं आपकी बीवी को बचा सकता हूं।” विक्रम ने मुड़कर देखा - सामने अस्पताल का दुबला-पतला सफाई कर्मी रामू खड़ा था, हाथ में पोछा पकड़े हुए। विक्रम के चेहरे पर पहले हैरानी, फिर हल्की सी हंसी आई, “तू मेरी बीवी को बचाएगा?” लेकिन कुछ ही मिनटों बाद वही हंसी सन्नाटे में बदल गई। क्योंकि जो हुआ, उसने पूरे आईसीयू, डॉक्टरों और खुद विक्रम की सोच को हिला दिया। रामू ने आगे बढ़कर मीरा के माथे पर हाथ रखा, उसकी हथेली में एक अजीब सी गर्माहट थी। उसने मीरा का हाथ थामा और शांत स्वर में प्रार्थना करने लगा। कुछ ही देर बाद मीरा की सांसों में हल्की सी हरकत दिखाई दी। मॉनिटर पर ग्राफ स्थिर होने लगे। डॉक्टर हैरान हो गए, नर्सें दौड़ पड़ीं। विक्रम की आंखों से आंसू बहने लगे। मीरा की उंगलियां हिली, पलकें कांपीं, और आखिरकार उसकी आंखें खुल गईं। डॉक्टरों ने कहा, “यह तो किसी चमत्कार से कम नहीं।” विक्रम के पांव जैसे जमीन से चिपक गए। उसकी आंखों से बहते आंसू अब सिर्फ दुख के नहीं थे, उनमें विश्वास और आभार भी था। बाहर खड़े लोग अब कहने लगे, “यह साधारण सफाई कर्मी नहीं, यह तो खुद ईश्वर का भेजा हुआ दूत है।” जब माहौल थोड़ा शांत हुआ, विक्रम तेजी से रामू के पास गया और कांपती आवाज में पूछा, “रामू, तुमने यह कैसे किया? बड़े-बड़े डॉक्टर हार मान चुके थे, मशीनें जवाब दे चुकी थीं, और तुम्हारे स्पर्श से मेरी पत्नी जिंदा हो उठी। यह चमत्कार कैसे हुआ?” रामू ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “साहब, मैं कोई डॉक्टर नहीं हूं। मेरी मां कहा करती थी कि बीमार शरीर को सिर्फ दवा नहीं, बल्कि सच्चे मन की दुआ और विश्वास की भी जरूरत होती है। मेरी बीवी भी इसी अस्पताल में इलाज ना मिलने के कारण चल बसी थी। उस दिन मैंने ठान लिया कि मैं दूसरों की जान बचाने की कोशिश जरूर करूंगा। आज वही दुआ मैंने आपकी बीवी के लिए मांगी थी।” विक्रम का दिल भर आया। उसने भावुक स्वर में कहा, “रामू, आज तुमने मुझे सिखाया कि असली दौलत पैसे से नहीं, दिल से होती है। तुम्हारे जैसे लोग ही इस दुनिया को जीने लायक बनाते हैं।” उस दिन अस्पताल की दीवारों ने एक ऐसा सबक देखा जिसे किताबों में नहीं लिखा जाता। अमीरी और गरीबी का फर्क मिट गया था। वहां सिर्फ इंसानियत की जीत थी और एक साधारण सफाई कर्मी की सच्चाई ने करोड़ों की सोच बदल दी थी। कभी-कभी भगवान मंदिरों में नहीं, बल्कि किसी साधारण इंसान के हाथों में मिल जाते हैं। ******
- विश्वास की मूर्ति
शिव शंकर सुजीत मार्केट में चलते चलते अचानक से दौड़ने लगता है और दौड़ते हुए जाकर एक महिला के आगे रूक जाता है। और दौड़ने की वजह से हाफ रहा होता है। महिला - बड़े आश्चर्य से देखते हुए बोली, अरे सुजीत तुम, मुझे तो यकीन ही नही हो रहा है कि, इतने दिनों बाद आज हम दोनों फिर से मिले हैं। सुजीत ने हांफते हुए कहा कि, मैं बड़ी देर से तुम्हें देख रहा था लेकिन ठीक से पहचान नहीं पा रहा था इसलिए बोल नहीं पाया लेकिन जब देखा कि तुम अब चली जाओगी तो मुझे दौड़ना पड़ा, तुम्हारा परिचय पूछने के लिए, लेकिन यह अच्छा हुआ कि तुम मुझे देखते ही पहचान ली। महिला - और तुम मुझे क्यों नहीं पहचान पा रहे थे। सुजीत - अरे! हाई स्कूल में जब थे तभी के मिले थे तब से लेकर कितने वर्ष बीत गए। वैसे भी लड़कियों में ज्यादा परिवर्तन हो जाता है, खास कर शादी होने के बाद तो चाल ढाल पहनावा मेकअप सबकुछ ही बदल जाता है। महिला - ओ.. हो.. लेकिन तुम नही बदले जैसे पहले हंसी मजाक करते थे वैसे आज भी। रत्ना, अच्छा यह बताओ कि तुम इधर कहा जा रही थी ? रत्ना - मैं अपने कमरे पर जा रही थी मेरे पति का तबादला हो गया इसी शहर में इसलिए यही पास में किराए का मकान ले रखा है । सुजीत - अरे इसी रास्ते से तो मैं रोज अपने आफिस जाता हूं अब तुम मेरा नम्बर लिख लो फिर मिलेंगे। रत्ना - अरे इतनी भी क्या जल्दी है इस शहर में भला कोई अपना तो मिला। अब चलो मेरे साथ मेरे पति आफिस से आते ही होंगे उनसे मिलवा दूं और मेरे हाथ की एक कप चाय भी पी लेना। रत्ना के जिद करने पर सुजीत उसके साथ उसके कमरे पर जाता है और रत्ना ने अपने पति से सुजीत का परिचय कराती है, चाय पिलाती है। सुजीत - अच्छा मेरी पत्नी मेरा इन्तजार कर रही होगी। मै चलता हूं। रत्ना और उसके पति - अच्छा ठीक है मिलते रहिएगा। सुजीत का अब बार बार आना जाना हंस हंस कर बतलाना एक दूसरे की बातें शेयर करना। रत्ना के पति के दिल में ठेस पहुचा रहीं थी वह सोचने लगा कि कहीं यह दोनों मुझे धोखा तो नहीं दें रहे हैं या फिर कही इन लोगो का पुराना अफेयर तो नहीं है अब उसे उन लोगो का मिलना बात करना बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था। किन्तु रत्ना और सुजीत ऐसे घुल मिल गए थे जैसे दोनों एकही घर के हो। एक दिन रत्ना के पति घर नहीं थे और सुजीत और रत्ना शापिंग कर रहे थे कपड़े चूज कर रहे थे कि न जाने कहां से रत्ना के पति देख रहे थे लेकिन वे उस समय वहां कुछ नहीं कहे और सीधे घर पहुंच गए। और रत्ना के घर पहुंचते ही। पति - कहा से मुंह उठाए चली आ रही हो? रत्ना - शापिंग कर के, मगर आप ऐसे क्यों बोल रहे है? पति - और नहीं तो कैसे बोलूं, अरे शुकर मना, नहीं तो मेरी जगह कोई दूसरा होता तो अब तक तुम्हें धक्के मारकर घर से बाहर निकाल चुका होता। रत्ना - मगर क्यों? मेरी ग़लती क्या है? पति - अच्छा तो अब यह भी बताना पड़ेगा कि तुमने किया क्या है, ग़ैर मर्द के साथ शापिंग कर रही हो, गुलछर्रे उड़ा रही हो और हमसे पूछती हो कि मेरी ग़लती क्या है? रत्ना - क्या बकते हो! सुजीत ऐसा वैसा नहीं है। एसी घिनौनी बातें करने से पहले तुम्हें सोचना चाहिए। पति - अच्छा तो अब तुम उसका पक्ष भी लेने लगी,कि ऐसा वैसा नहीं है। अरे मैं भी आदमी पहचानता हूं। वह जबसे तेरी सूरत देखा है तूं पतंग की तरह उसकी तरफ खिंची जा रही हो। रत्ना - मै आपको कैसे समझाऊं मैं उसे बचपन से जानती हूं वह बेहद शरीफ और नेक इन्सान है और अगर तुम्हें उस पर विश्वास नहीं है तो ठीक है लेकिन मैं तुम्हारी पत्नी हूं मुझ पर तो तुम्हें भरोसा होना चाहिए। पति - कैसा विश्वास किसका भरोसा ऐ भरोसा का ही तो नतीजा है। अब आज से उसका मिलना जुलना बंद। रत्ना - मिलना जुलना बंद तो क्या मैं उसकी तरफ देखती भी नहीं यदि तुम मुझे पहले ही बता देते कि तुम्हें बुरा लग रहा है। लेकिन एक बात याद रखना कि हर इंसान बुरा नहीं होता। और अगर मैं बुरी नही हूं तो कोई और बुरा रहकर भी मेरा क्या कर सकता है। रत्ना रोते हुए घर के अन्दर चली जाती है। अगले एक दिन बाद रविवार था। सुजीत सुबह रत्ना के घर पहुंच कर दरवाजा नांक करता है। अन्दर से रत्ना के पति ने दरवाजा खोला, सामने सुजीत को देखकर बोले, आ गये सुबह सुबह मिलने, मेरी पत्नी है वो। क्यों हम लोगों का जीना हराम कर रखा है तुमने, अगर तुमको पसंद थी तो इसी से शादी क्यों नहीं कर ली कम से कम मैं तो परेशानी से बच जाता। सुजीत - भाई साहब आप गलत इल्जाम लगा रहे है । रत्ना के पति - दूर हो जाओ मेरे सामने से और आज से कभी दिखाई मत देना। सुजीत सोचता हुआ अपने घर वापस आ गया। सुजीत की पत्नी - आप शान्त क्यों बैठे हैं? क्या रत्ना आज नहीं मिली या रत्ना किसी परेशानी में हैं। सुजीत - कुछ नहीं। सुजीत की पत्नी - आप मुझसे कभी झूठ नहीं बोलते फिर आज क्यों? सच बताओं मुझे! क्या हुआ है? सुजीत सब बातें अपनी पत्नी को बता देता है। सुजीत की पत्नी रत्ना के घर आ जाती है और दरवाजा नाक करती है और रत्ना के पति दरवाजा खोलते है। मै सुजीत की पत्नी आप से बात करने आई हूं। रत्ना के पति - जी बताइए क्या बात है। सुजीत की पत्नी - आप ने हमारे पति को क्या कहा और क्यों कहा? रत्ना के पति - जी मेरी आड़ में मेरी पत्नी के साथ शापिंग कर रहे थे। सुजीत की पत्नी - तो क्या हो गया अरे आप के लिए वह जूता ले रही थी और मेरे लिए वो साड़ी ले रहे थे। और एक बात बता दूं प्यार विश्वास का होता है। आप न जाने कैसे पति है जो अपनी पत्नी को न पहचान पाए वो दूसरे को क्या पहचान पाएगा। फिलहाल वो आपकी पत्नी है मुझे कोई लेना देना नहीं। लेकिन एक बात ध्यान से सुन लीजिए कि आपको हमारे पति पर इस तरह से इल्जाम लगाने का कोई हक नहीं। लेकिन वो प्यार भी केवल मुझसे ही करते है। इसलिए ध्यान रखिएगा आगे से हमारे पति को ऐसी तकलीफ मत दीजिएगा । सुजीत की पत्नी वापस चली जाती है लेकिन रत्ना के पति सोच में डूब जाते है। एक औरत को अपने पति पर इतना गुमान, इतना विश्वास, इतना प्रेम और एक मैं? ******
- रसीद का आखिरी नाम
रेखा जौहरी दिल्ली की गलियों में सुबह की हल्की रोशनी फैली थी। सड़क किनारे रसीद का छोले कुलचे वाला ठेला था, जिस पर टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था – “रसीद का छोले कुलचे”। रसीद के पास अपनी मां का दिया ताबीज, बाप की पुरानी साइकिल और ठेले का जंग लगा चम्मच ही उसकी पूरी दुनिया थी। रसीद कम बोलता था, लेकिन उसकी आँखों में अनगिनत कहानियाँ छिपी थीं। गली के बच्चे उसे ‘रसीद भाई’ कहते, कभी वो उन्हें मुफ्त में कुलचे देता, कभी कहानी सुनाता। हर रोज दोपहर को एक बूढ़ा आदमी वहाँ से गुजरता, साफ कपड़े, चमकदार जूते, माथे पर शिकन। रसीद उसे पहचानता नहीं था, लेकिन बूढ़ा हर बार अजीब नजर से उसे देखता, जैसे कोई पुराना पन्ना फिर सामने आ गया हो। एक दिन, जब वह आदमी छोले कुलचे खाने आया, रसीद ने उसकी उंगली में वही सोने की अंगूठी देखी, जो उसने अपने पिता के हाथ में देखी थी। उसके पिता, सलीम मियां, एक मिल में काम करते थे। मिल बंद हो गई थी, और उस ऑर्डर को रद्द करने वाले थे विष्णु मेहरा – वही आदमी। उस दिन सलीम मियां ने कहा था, “रसीद, मेहनत कभी धोखा नहीं देती, लेकिन लोग दे देते हैं।” गरीब छोले-कुलचे वाले लडके ने अमीर आदमी को ऐसा सबक सिखाया कि पूरा शहर देखता रह गया फिर जो हुआ…. रसीद के भीतर बचपन की भूख, मां की बीमारी, बाप की बेबसी सब उमड़ आई। उसने विष्णु से पूछा, “साहब, आपको सलीम मियां याद हैं?” विष्णु ने चौंक कर कहा, “इतने पुराने नाम अब याद कहां रहते हैं बेटा।” रसीद बस मुस्कुरा दिया, लेकिन उसकी मुस्कान के पीछे तूफान था। उस रात, रसीद ने ठेला बंद किया और देर तक बैठा रहा। वह सोच रहा था, “अगर अब्बू को नौकरी से नहीं निकाला होता, तो शायद अम्मी जिंदा होती।” अगले दिन उसने ठेले पर नया बोर्ड लगाया – “रसीद का आखिरी नाम”। लोगों ने पूछा, “नाम क्यों बदला?” रसीद ने कहा, “कभी-कभी इंसान को अपना जवाब याद रखना पड़ता है।” अब उसके छोले में दर्द का स्वाद घुल गया था। विष्णु रोज आता, रसीद बिना बोले खाना परोसता। धीरे-धीरे विष्णु की आंखों में अपराध-बोध आने लगा। तीसरे हफ्ते विष्णु ने कहा, “तुम्हारे छोले में कुछ है बेटे, जो किसी और के खाने में नहीं।” रसीद ने जवाब दिया, “यह नमक बाजार से नहीं, जख्मों से निकला है। रात गहरी थी। रसीद ने आसमान की तरफ देखा, जैसे अपने बाप से बातें कर रहा हो। अगले दिन उसने बोर्ड लगाया – “आज सिर्फ भूखे को खाना मुफ्त”। भीड़ लग गई। शाम को विष्णु आया, संकोच से पूछा, “आज खाना फ्री क्यों?” रसीद ने जवाब दिया, “कभी किसी ने सबका काम बंद करवा दिया था। आज उसी की याद में सबका खाना खुला है।” विष्णु अब रोज आने लगा, सिर झुकाकर बैठता। एक दिन रसीद ने उसके सामने अपने पिता का इस्तीफा पत्र रखा। विष्णु की आंखों में पछतावा था। रसीद ने कहा, “सुधार माफी से बड़ा है। अगर मजदूरों की फैमिली याद है, तो चलिए उनकी जिंदगी में फिर से रोटी जलाएं – इस बार प्यार की।” विष्णु ने सारी बची रकम लंगर में लगा दी। अब वह रोज ठेले पर आता, कभी पैसे लेकर, कभी चाय। रसीद अब गली का बेटा बन गया था, जिसने सबको सिखा दिया – माफी किसी को छोटा नहीं, बड़ा बनाती है। एक दिन पत्रकार ने पूछा, “आप दिल्ली के सबसे ईमानदार छोले वाले कहलाते हैं, क्या कहना चाहेंगे?” रसीद मुस्कुराया, “जब जमीर जिंदा हो, पेशा छोटा नहीं होता।” समय बीता, ठेले की जगह कम्युनिटी किचन बन गया। एक शाम विष्णु को दिल का दौरा पड़ा। अस्पताल में उसने रसीद से कहा, “मेरे नाम के आगे अपना नाम जोड़ लो।” रसीद बोला, “साहब, अब आपका नाम मेरे छोले में पहले ही घुल चुका है।” विष्णु मुस्कुरा कर चला गया। रसीद ने ठेले की दीवार पर लिखवाया – “नाम मिट जाते हैं, नेक काम कभी नहीं।” अब हर गरीब, मजदूर, बेसहारा इंसान वहां खाना खाता और दीवार को देखकर कहता – यही है असली इंसाफ। एक बच्चा पूछता, “अंकल, नाम क्या है आपका?” रसीद मुस्कुराता, “बेटा, नाम जरूरी नहीं – जिस छोले में किसी का दर्द घुल जाए, वही रसीद का आखिरी नाम है।” *****
- बंद मुट्ठी
रजनीकांत द्विवेदी एक बार की बात है, एक राजा ने घोषणा की कि वह कुछ दिनों के लिए पूजा करने के लिए अपने राज्य के मंदिर में जाएगा। जैसे ही मंदिर के पुजारी को यह खबर मिली, उसने राजा की यात्रा के लिए सब कुछ सही करने के लिए मंदिर को सजाने और रंगने का काम शुरू कर दिया। इन खर्चों को पूरा करने के लिए पुजारी ने 6,000 रुपये का कर्ज लिया। जिस दिन राजा मंदिर पहुंचे, उन्होंने दर्शन, पूजा और अर्चना की। समारोह के बाद, उन्होंने आरती की थाली में दान (दक्षिणा) के रूप में चार रुपये रखे और फिर अपने महल में लौट आए। जब पुजारी ने देखा कि पूजा की थाली में सिर्फ़ चार रुपये रखे गए हैं, तो वह बहुत क्रोधित हुआ। उसे उम्मीद थी कि राजा, सर्वोच्च शासक होने के नाते, बहुत बड़ी रकम देगा, लेकिन उसे सिर्फ़ चार रुपये मिले! इस बात की चिंता में कि वह कर्ज कैसे चुकाएगा, उसने एक योजना बनाई। पुजारी ने राजा से प्राप्त एक वस्तु की नीलामी करने का फैसला किया। उसने पास के एक गाँव में नीलामी की घोषणा की, लेकिन वस्तु को अपनी बंद मुट्ठी में छिपा लिया, ताकि कोई न देख सके कि वह क्या है। लोगों ने सोचा कि राजा की वस्तु बहुत कीमती होगी, इसलिए उन्होंने तुरंत बोली लगानी शुरू कर दी। नीलामी की शुरुआत 10,000 रुपये से हुई, जो देखते ही देखते 50,000 रुपये तक पहुंच गई, लेकिन पुजारी ने फिर भी वस्तु बेचने से इनकार कर दिया। नीलामी की खबर आखिरकार राजा के कानों तक पहुंची। राजा ने तुरंत अपने सैनिकों को पुजारी को बुलाने के लिए भेजा और उसे नीलामी में अपनी वस्तु न बेचने के लिए कहा। इसके बजाय, राजा ने पुजारी को वस्तु के बदले में सवा लाख (1,25,000) रुपये देने की पेशकश की , जिससे लोगों के सामने उसकी गरिमा बच गई। उस क्षण से, यह कहानी इस कहावत का स्रोत बन गई: “जब डेढ़ लाख की बंद मुट्ठी खुली, तो उसका मूल्य राख से भी अधिक था!” यह कहावत इस बात का प्रतीक है कि कैसे छिपी हुई और महत्वहीन लगने वाली चीजें पहली नज़र में जितनी दिखती हैं, उससे कहीं अधिक मूल्यवान हो सकती हैं। यह कहावत आज भी प्रचलन में है। *******
- मेरा फ़र्ज
अरुण कुमार गुप्ता पिताजी के जाने के बाद आज पहली दफ़ा हम दोनों भाईयों में जम कर बहसबाजी हुई। फ़ोन पर ही उसे मैंने उसे खूब खरी-खरी सुना दी। पुश्तैनी घर छोड़कर मैं कुछ किलोमीटर दूर इस सोसायटी में रहने आ गया था। उन तंग गलियों में रहना मुझे और मेरे बच्चों को कतई नहीं भाता था। हम दोनों मियां-बीबी की अच्छी खासी तनख्वाह के बूते हमने ये बढ़िया से फ्लैट ले लिया। सीधे-साधे से हमारे पिताजी ने कोई वसीयत तो की नहीं पर उस पुश्तैनी घर पर मेरा भी तो बराबर का हक बनता है। छोटा भाई मना नहीं करता, लिखा-पढ़ी को भी राजी है पर दिक्कत अब ये है कि वो मेरे वाले हिस्से में कोचिंग सेंटर खोलना चाह रहा है। उसकी टीचर की नौकरी सात महीने पहले छूट चुकी है। दो महीने पहले ही आस-पास कहीं किराये का कमरा लेकर कोचिंग सेंटर खोला है। फोन पर कह रहा था, "आपके वाले हिस्से में कोचिंग सेंटर खोल लूँ तो मेरा किराया बच जाएगा।" अब भला ये क्या बात हुई। चीज मेरी बरतेगा वो। ऊपर से मेरी धर्मपत्नी भी उसी की बात को सही ठहराते हुए बोली, "खोलने दो ना उसे कोचिंग सेंटर, छोटा भाई है आपका। मुश्किल में है कुछ सहारा ही हो जायेगा। आखिर बड़े भाई हो कुछ तो फ़र्ज बनता है कि नहीं।" अब क्या बोलता, अखबार मेज पर पटका, थैला उठाया और सब्जी लेने निकल आया। मंडी में घुसते ही महीने भर से नदारद अपना सब्जी वाला भईया नज़र आया। कई सालों से उससे ही सब्ज़ी लेता आ रहा हूँ। फटाफट वहीं जा पहुंचा। "कहाँ ग़ायब हो गया था रे, महीना हो गया मुझे इधर-उधर से औने-पौने दाम में सब्जी लेते हुए।" "गाँव गया था साब जी। छोटे भाई की माली हालत खराब हो गई थी। गया और सब ठीक कर आया। घर में ही छोटी सी दुकान करा दी। बापू नहीं है तो क्या हुआ बड़ा भाई भी तो बाप समान होता है ना, साब जी।" ये सुनकर लगा जैसे मैं जम सा गया। थैला वहीं छोड़कर ऑटो लिया और उन जानी पहचानी तंग गलियों से होता हुआ अपने पुराने घर जा पहुँचा। बाहर खेलते हुए भाई के दोनों बच्चे मुझे देखते ही ''ताऊ जी, ताऊ जी" कहकर लिपट गए। आवाज सुनकर छोटा भी बाहर निकल आया। मैं उसे डाँटते हुए बोला, "क्यूँ रे, बहुत बड़ा हो गया है तू। मैंने जरा सा कुछ बोल क्या दिया, तुझ से तो पलट कर फ़ोन भी ना किया गया।" "अपने जब साफ़-साफ़ मना कर दिया तो फिर फोन क्यूँ करता।" "हाँ-हाँ जैसे तू तो मेरी हर बात मानता है।" "क्यों नहीं मानता आप बोल कर तो देखो।" "ये कुछ पैसे हैं रख ले, तेरी कोचिंग सेंटर के फर्नीचर की मरम्मत के लिए। यहाँ शिफ़्ट करने से पहले सब ठीक करा लियो।" "मतलब मैं यहाँ अपना..........। आपका ये एहसान मैं.........।" कहते-कहते उसका गला भर आया। "एहसान नहीं पगले, ये तो मेरा फ़र्ज है जो मैं भूल गया था।" और ये बोलते हुए मेरी आँखें.........। *******











