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- सच्चा सुख
राजीव कपूर एक बार एक स्वामी जी भिक्षा माँगते हुए एक घर के सामने खड़े हुए और उन्होंने आवाज लगायी, भिक्षा दे दे माते! घर से महिला बाहर आयी। उसने उनकी झोली मे भिक्षा डाली और कहा, “महात्मा जी, कोई उपदेश दीजिए!” स्वामी जी बोले, “आज नहीं, कल दूँगा। कल खीर बना के देना।” दूसरे दिन स्वामी जी ने पुन: उस घर के सामने आवाज दी – भिक्षा दे दे माते! उस घर की स्त्री ने उस दिन खीर बनायीं, जिसमे बादाम-पिस्ते भी डाले थे। वह खीर का कटोरा लेकर बाहर आयी। स्वामी जी ने अपना कमंडल आगे कर दिया। वह स्त्री जब खीर डालने लगी, तो उसने देखा कि कमंडल में गोबर और कूड़ा भरा पड़ा है। उसके हाथ ठिठक गए। वह बोली, “महाराज! यह कमंडल तो गन्दा है।” स्वामी जी बोले, “हाँ, गन्दा तो है, किन्तु खीर इसमें डाल दो।” स्त्री बोली, “नहीं महाराज, तब तो खीर ख़राब हो जायेगी। दीजिये यह कमंडल, में इसे शुद्ध कर लाती हूँ।” स्वामी जी बोले, मतलब जब यह कमंडल साफ़ हो जायेगा, तभी खीर डालो गी न ?” स्त्री ने कहा, “जी महाराज !” स्वामी जी बोले, मेरा भी यही उपदेश है। मन में जब तक चिन्ताओ का कूड़ा-कचरा और बुरे संस्करो का गोबर भरा है, तब तक उपदेशामृत का कोई लाभ न होगा। यदि उपदेशामृत पान करना है, तो प्रथम अपने मन को शुद्ध करना चाहिए, कुसंस्कारो का त्याग करना चाहिए, तभी सच्चे सुख और आनन्द की प्राप्ति होगी। क्योंकि आपकी अच्छी सोच ही आपके कार्य को निर्धारित करती है। सदैव प्रसन्न रहिये। जो प्राप्त है, पर्याप्त है। *******
- बेबसी
महेश कुमार केशरी मंदिर से लौटते वक्त केतकी को उसकी सहेली सुलोचना रास्ते में मिल गई थी। दोनों बहुत दिनों के बाद मिली थीं। दोनों मे़ं बातें होने लगी। हालचाल पूछने के बाद केतकी ने सुलोचना से पूछा- "और, बता, तेरी दोनों बेटियाँ कैसी हैं? स्कूल जा रहीं हैं या नहीं?" सुलोचना ह़ँसते हुए ही बोली- "हाँ जा रहीं हैं। एक छठी में पढ़ रही है। दूसरी आठवीं में पढ़ रही है।" तभी केतकी की नजर सुलोचना की बाँहों पर चली गई। जहाँ नीले-स्याह धब्बे उभर आये थें। केतकी से रहा ना गया तो उसकी बाँहों की तरफ इशारा करते हुए कौतूहल वश पूछा लिया- "सुलोचना, ये तेरी बाहों पर नीले धब्बे कैसे पड़ गयें हैं? देखो तो, गोरी, बाँहें कैसी काली पड़ गयी हैं।" केतकी के अपनत्व और मिठास भरे व्यवहार को सुनकर सुलोचना की आँखें भर आईं। माँ, जिंदा थीं तो हाल-चाल लेतीं थीं। पिता को छोड़कर अब तो कोई हाल-चाल लेना वाला भी नहीं रहा। बाहों पर के स्याह नीले धब्बे बादल बनकर केतकी की आँखों से बरसने लगे - "अरे, छोड़ो भी अब तो ये रोज-रोज की बात हो गई है। कर्मा रोज दारु पीकर आता है। और, मुझे रोज मारता-पीटता है। बच्चे छोटे-छोटे हैं, अभी, नहीं तो बच्चों को लेकर मायके अपने पिता के पास चली जाती। क्या करूँ बहुत मजबूर हू़ँ।" दु:ख की एक महीन रेखा सलवटों से भरे सुलोचना के चेहरे पर उभर आयी थीं। जहाँ सुख कभी उगा ही नहीं था। *******
- हमारे माता-पिता
डॉ. कृष्ण कांत श्रीवास्तव एक बार की बात है, एक जंगल में सेब का एक बड़ा पेड़ था। एक बच्चा रोज उस पेड़ पर खेलने आया करता था। वह कभी पेड़ की डाली से लटकता, कभी फल तोड़ता और कभी उछल-कूद करता था। सेब का पेड़ उस बच्चे से काफ़ी खुश रहता था। कई साल इस तरह बीत गये। अचानक एक दिन बच्चा कहीं चला गया और फिर लौट के नहीं आया, पेड़ ने उसका काफ़ी इंतज़ार किया पर वह नहीं आया। अब तो पेड़ उदास हो गया। कई वर्ष बाद वह बच्चा फिर से पेड़ के पास आया, पर वह अब कुछ बड़ा हो गया था। पेड़ उसे देखकर काफ़ी खुश हुआ और उसे अपने साथ खेलने के लिए कहा। पर बच्चा उदास होते हुए बोला कि अब वह बड़ा हो गया है। अब वह उसके साथ नहीं खेल सकता। बच्चा बोला कि अब मुझे खिलौने से खेलना अच्छा लगता है पर मेरे पास खिलौने खरीदने के लिए पैसे नहीं है। पेड़ बोला उदास ना हो तुम मेरे फल तोड़ लो और उन्हें बेच कर खिलौने खरीद लो। बच्चा खुशी-खुशी फल तोड़ के ले गया लेकिन वह फिर बहुत दिनों तक वापस नहीं आया। पेड़ बहुत दुखी हुआ। अचानक बहुत दिनों बाद बच्चा वापस आया अब जवान हो गया था, पेड़ बहुत खुश हुआ और उसे अपने साथ खेलने के लिए कहा पर लड़के ने कहा कि वह पेड़ के साथ नहीं खेल सकता। अब मुझे कुछ पैसे चाहिए क्योंकि मुझे अपने बच्चों के लिए घर बनाना है। पेड़ बोला मेरी शाखाएँ बहुत मजबूत हैं, तुम इन्हें काट कर ले जाओ और अपना घर बना लो। अब लड़के ने खुशी-खुशी सारी शाखाएँ काट डालीं और लेकर चला गया। वह फिर कभी वापस नहीं आया। बहुत दिनों बात जब वह वापस आया तो बूढ़ा हो चुका था। पेड़ बोला मेरे साथ खेलो पर वह बोला कि अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ, अब नहीं खेल सकता। पेड़ उदास होते हुए बोला कि अब मेरे पास न फल हैं और न ही लकड़ी अब मैं तुम्हारी मदद भी नहीं कर सकता। बूढ़ा बोला कि अब उसे कोई सहायता नहीं चाहिए बस एक जगह चाहिए जहाँ वह बाकी जिंदगी आराम से गुजर सके। पेड़ ने उसे अपने जड़ में पनाह दी और बूढ़ा हमेशा वहीं रहने लगा। सार - हमारे माता-पिता भी इसी पेड़ समान हैं, जो हमेशा हमारा सानिध्य चाहते हैं। परंतु हम अपनी जरूरत पर ही उनके नजदीक आते हैं। हमें अपना कुछ वक्त माता-पिता की सेवा में अवश्य व्यतीत करना चाहिए। ******
- एक था वाणासुर
आचार्य अंबरासन दैत्यराज बलि के सौ पुत्र थे। जिनमें वाणासुर सबसे बड़ा था। वाणासुर न सिर्फ आयु में ही अपने अन्य भाइयों से बड़ा था, अपितु बल, गुण और ओजस्विता में भी उन सबसे बढ़-चढ़कर था। उसके एक हजार भुजाएं थीं। वह परम शिव भक्त था और प्रतिदिन कैलाश पर्वत पर जाकर शिव के सम्मुख नृत्य किया करता था। अपने हाथों से विभिन्न वाद्य यंत्र बजाता और भगवान शिव को प्रसन्न करने की चेष्टाएं किया करता था। शिव प्रसन्न हुए और उससे वर मांगने को कहा, “बोलो पुत्र, क्या वर मांगते हो?” वाणासुर बोला, “भगवन, मेरे मन में किसी दुर्बल की उत्पीड़ित करने की अथवा देवताओं पर विजय प्राप्त करने की तनिक भी कामना नहीं है। यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो मुझे यह वर दीजिए कि आप मेरे नगर के रक्षक बन जाएं। इससे मुझे आपका प्रतिदिन सान्निध्य प्राप्त होता रहेगा।” “तथास्तु!” कहकर शिव अंतर्धान हो गए। अपने दिए गए वरदान के फलस्वरूप शिव और पार्वती कैलाश छोड़कर दैत्यपुरी शोणितपुर में आकार बस गए। वाणासुर की एक पुत्री थी। जिसका नाम उषा था। वह मां पार्वती से संगीत की शिक्षा प्राप्त करने लगी। उषा यौवन काल की दहलीज पर पहुंच चुकी थी। एक दिन उसने शिव-पार्वती को एकांत में रमण करते देखा तो उसके मन में वासना पैदा होने लगी। वह पति प्राप्त करने की इच्छा करने लगी। पार्वती उसे संगीत की शिक्षा देतीं, तो उषा का शिक्षा में मन न लगता। उसे भांति-भांति के विचार सताते रहते। पार्वती उसके विचारों को समझकर बोलीं, “क्या बात है उषा, आजकल तुम्हारा ध्यान कहाँ कहीं ओर अटका रहता है। मैं समझ गई। तू पति प्राप्त करने की कामना करने लगी है। थोड़े दिन धैर्य रख बेटी। अपने में तुझे एक पुरुष दिखाई देगा। वही भविष्य में तेरा जीवन साथी बनेगा।” इधर वाणासुर शिव से कह रहा था, “भगवन, आपने मुझे हजार भुजाएं तो दे दीं किंतु अब वह मुझे भार स्वरूप लगने लगी हैं। बेकार पड़े-पड़े मेरी बाहों में खुजली होने लगती है। मैं युद्ध करना चाहता हूं, जिससे मेरा आलस्य दूर हो सके। लेकिन कोई मेरी जोड़ का व्यक्ति धरा पर है ही नहीं।” भगवान शिव समझ गए कि वाणासुर के मन में अभिमान पनप उठा। वे बोले, “अदिह्र मत होओ पुत्र, तुमसे युद्ध करने योग्य व्यक्ति भी धरा पर अवतरित हो गया है। शीघ्र ही तुम्हारी यह इच्छा भी पूर्ण होने वाली है।” वाणासुर बोला, “लेकिन कब और मुझे मालूम कैसे होगा कि अमुक व्यक्ति ही मेरी बराबरी का है।” शिव ने उसे एक ध्वजा देकर कहा, “यह ध्वजा ले जाकर अपने भवन के द्वार पर लगा दो। जिस दिन यह अपने आप नीचे गिर जाए, उस दिन समझ लेना कि तुम्हारा प्रतिद्वंद्वी आ पहुंचा।” मनुष्य के जब बुरे दिन आते हैं तो उसकी बुद्धि स्वयं ही भ्रष्ट हो जाती है। भगवान शिव द्वारा क्रोध में कहे गए वह वचन सुनकर भी वाणासुर प्रसन्न हो गया और उसने खुशी-खुशी ध्वजा को ले जाकर अपने भवन पर गाड़ दिया। फिर वह प्रतीक्षा करने लगा कि देखें, ध्वजा कब गिरती है। दूसरी ओर वाणासुर के महल में उषा अपनी सखी चित्रलेखा से बात कर रही थी। चित्रलेखा वाणासुर के मंत्री कुंभांड की पुत्री थी। उषा के मुंह पर व्याकुलता देखकर चित्रलेखा ने पूछा, “क्या बात है सखी, आज तुम बहुत उद्विग्न हो। शरीर तो स्वस्थ है न?” उषा ने आह से भरते हुए कहा, “मेरे शरीर को कुछ नहीं हुआ है चित्रलेखा, मैं एक स्वप्न को लेकर व्याकुल हूं। रात स्वप्न में मैंने देखा कि एक परम तेजस्वी कामदेव के समान सुंदर युवक से मेरा विवाह हो गया है। फिर जब सपना टूटा तो सब कुछ गायब था। कुछ भी हो सखी, मैं तो तन मन से उस युवक को अपना पति मान चुकी हूं। मां भगवती ने भी मुझसे यही कहा था कि एक पुरुष तुझे स्वप्न में दिखाई देगा, वही तेरा पति बनेगा। तू मेरा एक काम कर दे।” चित्रलेखा बोली, “कहो राजकुमारी, तुम्हारा हर काम करके मुझे अतीव प्रसन्नता होगी। तुम काम तो बताओ।” उषा बोली, “तू तो चित्रकार है। अपनी कल्पना से कुछ ऐसे युवकों के चित्र बना, जैसे मैंने तुझसे उस स्वप्न पुरुष के बारे में बताया है। फिर मैं उसे पहचान लूंगी।” चित्रलेखा ने अपनी कल्पना के आधार पर चित्र बनाने आरंभ कर दिए और उन्हें उषा को दिखाने लगी। अंत में एक चित्र को देखकर उषा खुशी से चिल्ला उठी, “यही है, बिल्कुल यही है सखी, यही युवक रात को मेरे सपने में आया था।” चित्रलेखा चित्र को गौर से देखने लगी। मायावी दैत्य की पत्नी होने कारण चित्रलेखा स्वयं भी बहुत मायाविनी थी। उसने अनिरुद्ध को पहचान लिया, “अरे, यह तो अनिरुद्ध का रेखाचित्र है सखी, अनिरुद्ध प्रद्युम्न का पुत्र है और श्री कृष्ण का पौत्र है। वे लोग द्वारिका में रहते हैं।” उषा बोली, “कुछ करो सखी, कैसे भी हो मुझे इस युवक से मिला दो। तुम तो स्वयं अच्छी मायाविनी हो। द्वारिका जाकर इस युवक को उठा लाओ।” चित्रलेखा माया से द्वारिका पहुंची और सोते हुए अनिरुद्ध को बिस्तर समेत उठा लाई। सुबह जब अनिरुद्ध की आंख खुली और उसने अपने सामने उषा व चित्रलेखा को बैठे देखा तो आश्चर्य से बोला, “म…मैं कहां हूं और यह कौन-सी जगह है। तुम कौन हो?” चित्रलेखा बोली, “तुम इस समय शोणितपुर में राजकुमारी उषा के अतिथि हो यादव कुलनंदन, इन्हें पहचानो। कल रात तुम इनसे सपने में मिले थे।” कुछ क्षण बाद ही अनिरुद्ध को तुरंत याद आ गया कि राजकुमारी उषा को उसने भी सपने में देखा था और स्वप्न में ही उन्होंने परस्पर विवाह किया था। उसने अनुरागमयी दृष्टि से उषा की ओर देखा। फिर चित्रलेखा दोनों प्रेमियों को वहां छोड़कर चुपचाप बाहर निकल गई। काफी दिनों तक उन दोनों का गुपचुप प्रेम चलता रहा। चित्रलेखा के अलावा कोई तीसरा व्यक्ति नहीं जानता था कि राजकुमारी उषा ने अनिरुद्ध को अपने अंत:पुर में रखा हुआ है। लेकिन ऐसी बातें छुपती ही कहां है। अंत:पुर के रक्षकों द्वारा एक दिन वाणासुर तक यह समाचार पहुंची और क्रोध से भभकता हुआ वाणासुर अंत:पुर के में दाखिल हो गया। उसने राजकुमारी से कहा, “राजकुमारी, कौन है जिसे तूने अपने अंत:पुर में छिपा रखा है। शीघ्र बता अन्यथा…।” अचानक अपने पिता को अंत:पुर में आया देख राजकुमारी उषा सहम गई। किंतु अनिरुद्ध निर्भीक भाव से वाणासुर के सामने आकर बोला, “मुझे अनिरुद्ध कहते हैं। कृष्ण मेरे दादा हैं और पिता प्रद्युम्र हैं। हम लोग द्वारिका में रहते हैं।” अनिरुद्ध की बात सुनकर वाणासुर तलवार लिए अनिरुद्ध की ओर झपटकर बोला, “तेरी हिम्मत कैसे हुई कि तू वाणासुर की पुत्री के अंत:पुर में दाखिल हो गया। मैं अभी-तेरे टुकड़े-टुकड़े करता हूं।” अनिरुद्ध बोला, “मैं स्वयं नहीं आया दैत्यराज, लाया गया हूं। यकीन नहीं हो तो अपनी पुत्री से पूछ लो।” लेकिन वाणासुर ने उसकी बात का विश्वास नहीं किया। कुछ देर तक दोनों में युद्ध चलता रहा। फिर वाणासुर ने अनिरुद्ध को बंदी बना लिया। अनिरुद्ध के बंदी बनाने की खबर नारद द्वारा द्वारिका पहुंच गई। यह खबर सुनकर द्वारिका वासियों में क्रोध भर गया। कृष्ण अपनी सेना सहित शोणितपुर पर आक्रमण करने के लिए चल पड़े। कृष्ण सेना और दैत्य सेनाएं आपस में भिड़ गईं। कृष्ण और वाणासुर में भयंकर युद्ध छिड़ गया। दोनों ओर से अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग किया जाने लगा। वाणासुर के पुरपालक होने के कारण वाणासुर की ओर से भगवान शिव भी अपने गणों सहित मैदान में आ डटे। लेकिन कृष्ण के तीखे बाणों और सुदर्शन चक्र की मार से घबराकर दैत्य सेना भाग खड़ी हुई। शिवगण भी पीछे हट गए और स्वयं शिव भी कृष्ण के अमोघ अस्त्र से बेहोश हो गए। फिर श्री कृष्ण ने अपने चक्र से वाणासुर की भुजाएं काटनी शुरू कर दीं। उसकी भुजाएं कट-कटकर जमीन पर गिरने लगीं। पर तभी शिव की बेहोशी टूट गई। वे कृष्ण के पास पहुंचकर बोले, “आपका चक्र अमोघ है। किंतु मैंने इसे अभय-दान दिया है। मैं इसका रक्षक हूं। आप वाणासुर का हनन न करें।” भगवान शिव की बात सुनकर कृष्ण ने अपना चक्र झुका लिया, फिर बोले, “आपका प्रिय मेरा भी प्रिय है, देवाधिदेव, मैंने नृसिंह अवतार लेते समय प्रहलाद को वचन दिया था कि उसके किसी भी वशंज का वध नहीं करूंगा लेकिन इसने आपका अपमान किया है देव, इसे दंड तो मिलना ही चाहिए। इसके अधिकांश भुजाएं तो मैंने चक्र से पहले ही काट दी हैं। किंतु जीवन दान तो तभी मिल सकता है जब यह चतुर्भुज रहकर आपकी सेवा करे।” यह कहकर कृष्ण ने वाणासुर की शेष भुजाएं भी काट दीं और हजार भुजाओं में से उन्होंने सिर्फ चार भुजाएं शेष छोड़ दीं। फिर वाणासुर ने अनिरुद्ध और उषा का विवाह कर दिया। दोनों के विवाह बंधन में बंधने के बाद वाणासुर ने शोणितपुर छोड़ दिया और भगवान शिव के साथ ही उनके धाम कैलाश पर्वत पर चला गया। वह जब तक जिया, भगवान शिव की आराधना में लीन रहा और मरने के बाद उसे शिव लोक में स्थान मिला। ************
- रक्षाबंधन
महेश कुमार केशरी आज रक्षा बंधन का त्योहार था। संजीव कहीं बाहर जाने वाला था। तभी मोबाईल की घंटी बजी। कोई नया नंबर था। चूँकि आज रक्षा बंधन था। इसलिये संजीव को डर था कि कहीं बहनों ने फोन ना किया हो। इसलिये उसने नज़रअंदाज़ करते हुए फोन काट दिया। इस बार संजीव की ये हरकत जगदंबा बाबू को नागवार गुजरी। अखबार एक तरफ रखते हुए संजीव से बोले, उठा लो तुम्हारी बहनों का नहीं है। क्योंकि, तुम्हारी बहनें जानतीं हैं कि मेरा भाई पैसों या अन्य जरूरतों को लेकर मेरा फोन नहीं उठाता। इसलिये अक्सर वो मेरे नंबर पर ही फोन करतीं हैं। तुम्हारे नंबर पर नहीं।" संजीव बढ़ती मँहगाई और घर के खर्चों से पहले ही परेशान था। अपने पिता से गुस्साते हुए बोला, आपको, ही सात बेटियों के बाद बेटा चाहिये था। आखिर, आपने एक बेटी से ही क्यों नहीं संतोष कर लिया था? एक बेटी तो ठीक ही थी। एक बेटे की चाहत में आप लगातार सात बेटियाँ पैदा करते चले गये। अगर, आप एक बेटी पर ही संतोष कर लेते तो मेरी जान सांसत में तो नहीं पड़ती।" अभी वो और भी बहुत कुछ कहने की सोच रहा था कि दरवाजे पर की कॉलबेल बजी। और संजीव अपनी बात कहते-कहते रूक गया। दरवाजा खोला तो दरवाजे पर अपनी बड़ी बहन लक्ष्मी को देखा। निशांत ने मामा को उलाहना देते हुए कहा- "मामा, कब से आपको फोन कर रहा था। आप फोन क्यों नहीं उठा रहे थें?" लक्ष्मी ने तंज किया- "मामा को लगा होगा मैनें फोन किया है। जेब ढीली करनी पड़ेगी। इसलिये फोन नहीं उठा रहा होगा। क्यों ठीक कह रही हूँ ना मैं?" लक्ष्मी ने संजीव को छेड़ा। संजीव इस सच्चाई को सुनकर जमीन में जैसे गड़ सा गया। औपचारिकतावश झुककर बड़ी बहन लक्ष्मी के पाँव छुए। साथ में भगना निशांत भी था। निशांत ने झुककर अपने मामा संजीव के पाँव छुए। लक्ष्मी अपने ही क्वार्टर और उसमें रखे फर्नीचर को देखकर मुग्ध हुए जा रही थी। अतीत जैसे जोंक की तरह उसके आत्मा को जकड़ता जा रहा था। अम्मा से जिद करके उसने क्रोशिये का काम सीखा था। जड़ी-मोती के निर्जीव तोते आज बीस साल पहले की कहानी कह रहें थें। लक्ष्मी की जब शादी हुई थी। उसके पति एक मामूली क्लर्क थें। बाद में स्थिति कुछ खराब हुई तो भाई और भाभी ने आँखें फेर लीं। संजीव सातों बहनों में से किसी का फोन कभी नहीं उठाता था। बेकार के खर्चों और आकस्मिक जरूरतों को बेवक्त झेलना उसे गैर-मुनासिब लगता। घर में रखा अचार का मर्तबान। तुलसी-पिंड़ा। उसकी अलमारी। सारी चीजें अपनी जगह ज्यों-की-त्यों जमा थीं। इन बीस सालों में किसी शरणार्थी की तरह वो ही बिलग हो गई थी घर से। अंतस में कुछ भींगने लगा तो उसने रूमाल से आँखों के कोर पोंछे। "और, सब घर में कैसे हैं, पापा? "लक्ष्मी की आवाज काँप रही थी। "सब, ठीक है, बेटा। बैठो ना। दामाद जी कैसे हैं?" जगदंबा बाबू की आवाज भी भींगने लगी थी। "पापा, इन बीस वर्षों में राजीव जी ने बहुत संघर्ष किया। और आज उसी क्लर्क की हैसियत से उठकर कंपनी के डायरेक्टर बन गये। आज लाखों रूपये का पैकेज है। निशांत, का एक फ्राँस की कंपनी में सलैक्शन हो गया है। कोठी, और बागान हम लोग छोड़कर कहीं जा नहीं सकते। इधर राजीव भी परमानेंट फ्राँस शिफ्ट होने की सोच रहें हैं। निशांत (एक फ्राँसिसी लड़की) जेनी से प्रेम करता है। वो भी सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, फ्राँस में। अगले महीने हमारे घर पर ही एँगेजमेंट होगी। संजीव - सुनंदा भाभी और पापा आप सब आईयेगा। फ्राँस में राजीव ने कुछ प्रापर्टी खरीदी है। उनका भी वहीं बिजनेस हो रहा है। पापा, मैं आपसे एक बात कहना चाह रही थी। हमारे अब्राड़ शिफ्ट होने के बाद हमारा नोएड़ा वाला घर खाली रहेगा। हमलोग तो अब्रोड शिफ्ट हो रहें हैं। राजीव जी ने एक फैसला किया है, कि हम अपना मकान संजीव और भाभी के नाम कर दें। ताकि भईया और भाभी और उनके बच्चों को रिटायरमेंट के बाद इधर-उधर ना भटकना पड़े। संजीव, अब मेरी ये आखिरी ख्वाहिश जरूर पूरी कर देना। आज रक्षाबंधन है। आज मैं अपने भाई को गिफ्ट दूँगी। जब हमारी परिस्थिति खराब थी। तब हम बहनों ने तुमसे बहुत कुछ लिया। लेकिन, आज ऊपर वाले की दया से हमारी सब बहनें अपने-अपने घरों में खुश हैं। इस बार मैं कुछ लेने नहीं देने आयी हूँ। इस घर ने और आपलोगों ने मुझे बहुत कुछ दिया है। संजीव मेरी बात मान लो। संजीव का भी गला रूँधने लगा था। उसने अपनी सहमति दे दी। सुनंदा पास में ही आकर ना जाने कब से खड़ी थी। उसने लक्ष्मी के पाँव छुए। फिर पूजा की थाली लेकर आई। थाली में राखी, रोली, कपूर और मिठाई थी। लक्ष्मी ने संजीव के लालाट पर तिलक लगाया और कलाई पर राखी बाँधी। फिर, आरती की। स्निग्धता और प्रेम एकाकार होकर लक्ष्मी की आँखों से बह रहे थें। उन आँखों में अपने भाई और अपने इस घर, की तरक्की के लिये ईश्वर से अनंत प्रार्थनायें थीं। राखी बाँधने के बाद लक्ष्मी चलने को हुई। तो संजीव ने अपनी बहन को एक पाँच सौ रूपये का एक नोट दिया। लेकिन, लक्ष्मी ने पाँच सौ का नोट ये कहते हुए लौटा दिया कि लक्ष्मी हमेशा देने के लिये आती है। लेने के लिये नहीं। संजीव ने मनुहार करते हुए कहा - "दीदी, आज के दिन तो कम-से-कम रूक जाओ।" लक्ष्मी दरवाजे तक जाती हुई बोली- "आज, केवल भाई से ही नहीं बल्कि अपनी छ: बहनों से मिलने भी निकली हूँ। और, कौन कहता है, कि रक्षाबंधन केवल भाईयों से मिलने का दिन होता है? ये दिन तो अपनी बहनों से मिलने का दिन भी होता है। उन्हें भी तो निशांत के एंगेजमेंट में बुलाना है। वैसे भी पीहर में हमारे लिये एक शाम से ज्यादा का समय नहीं होता। या मैनें ज्यादा कह दिया। कुछ घंटे ही हमारा पीहर में बसेरा होता है। शादी के बाद हम लड़कियाँ चिंडियाँ हो जातीं हैं। अपने ही घर में कुछ घंटों की मेहमान!" और, लक्ष्मी चिंड़ियाँ, बनकर अपने बाबुल के घोंसले से उड़ गई। आज, संजीव अपने ही नजरों में इतना गिर गया था, कि वो, अपने आप से ही आँखें नहीं मिला पा रहा था। आँखों से पश्चाताप के आँसू बह रहे थें। ************
- एक था राजा
डॉ कृष्ण कांत श्रीवास्तव बहुत समय पहले की बात है। किसी राज्य में एक राजा राज करता था। राजा की तीन खूबसूरत रानियां थी। राजा अपनी पहली पत्नी के व्यवहार और बातचीत से अत्याधिक प्रभावित था और उसे बहुत प्यार करता था। राजकाज के सभी कार्यों में राजा अपनी इस पत्नी को साथ रखता था। राजा की दूसरी पत्नी तीनों में सबसे अधिक सुंदर और युद्ध विद्या में निपुण थी, इसलिए राजा अपने दूसरे नंबर की पत्नी को भी बहुत अधिक महत्व देता था। विपरीत परिस्थितियों में राजा की दूसरी पत्नी राजा के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उनकी मदद करती थी। इसलिए राजा अपनी दूसरी पत्नी के साथ मित्रवत व्यवहार करता था और जब भी कोई परेशानी होती तो वह अपनी दूसरी पत्नी से सुझाव लेता था। राजा की तीसरी पत्नी असाधारण सुंदर तो थी परंतु बातचीत और युद्ध विद्या में उतनी निपुण नहीं थी। वह धार्मिक प्रवृत्ति की थी और अपने पति की लंबी उम्र के लिए सभी धार्मिक अनुष्ठान इत्यादि अवश्य करती थी। राजा अपनी तीसरी पत्नी से प्यार नहीं करता था, लेकिन उसकी तीसरी पत्नी उसको बहुत प्यार करती थी। राजा अपने राजकाज के कामो में बहुत ही व्यस्त रहता था। धीरे-धीरे राजा का स्वास्थ्य खराब रहने लगा। राजा को एक ऐसे असाध्य रोग ने घेर लिया जिसके कारण उसके बचने की बहुत ही कम उम्मीद रह गयी। अनेकों वैद्य राजा के उपचार में लग गए परंतु रोग था जो ठीक होने का नाम ही नहीं ले रहा था। राजा को आभास हो गया कि अब उसका अंत समय निकट है। राजा को मौत का भय सताने लगा। भय के कारण राजा अकेले नहीं मरना चाहता था। उसने अपनी पहली पत्नी को बुलाया और बोला, “मेरा अंत समय निकट है, कृपा कर आप हमारे साथ ऊपर भगवान के घर ऊपर चलो।” यह सुनकर वह बोली, “मैं आपके साथ नहीं जा सकती। मैं तो अभी और जीना चाहती हूं।” पहली पत्नी की बात सुनकर राजा बहुत निराश हुआ। उसके बाद राजा ने अपनी दूसरी पत्नी को याद किया। जब उसने सुना कि उसके पति उसको अपने साथ ले जाना चाहते हैं तो वह उनसे जाकर बोली, “मैं तो अभी जवान हूं मेरी उम्र ही क्या है? मैं आप के साथ नहीं जाउंगी। मैं आपके मरने के बाद दूसरी शादी कर लूंगी।” यह सुनकर राजा बहुत ही दुखी हुआ। अपनी दोनों पत्नियों की बात सुनने के बाद राजा ने अपनी तीसरी पत्नी को बुलाया ही नहीं। परंतु उसकी तीसरी पत्नी खुद चलकर आ गयी और बोली, “महाराज, मैं आपके साथ भगवान के घर चलने को तैयार हूं। जब आप ही ना होंगे तो हमारा इस संसार में रहने का क्या फायदा।” उसकी बात सुनकर राजा बहुत खुश हुआ। फिर दूसरे ही पल निराश होकर बोला, “मैंने पूरी जिन्दगी तुमको प्यार नहीं किया और आज तुम बिना शर्त मेरे साथ ऊपर भगवान के घर तक चलने के लिए तैयार हो गई। निश्चित तौर पर मुझसे अपने जीवन में बहुत बड़ी भूल हो गई, जो मैं तुमको पहचान नहीं सका। मैं इस भूल के लिए अपने को कभी माफ नहीं कर पाऊंगा।” मुझे मालूम है कि ईश्वर के घर सभी को अकेले ही जाना होता है। मैं तो केवल आप सभी लोगों की परीक्षा ले रहा था। आप मेरी इस परीक्षा में उत्तीर्ण हो गई, इसलिए मैं अपना राजपाट और सभी धन संपत्ति आपके हवाले करके जाता हूं। ऐसा कहकर राजा ने अपने प्राण त्याग दिए। यह कहानी हमें बताती है कि जीवन में प्यार उससे करो जो आपको प्यार करता हो, उससे नहीं जिसे आप पसंद करते हो। ********
- आखरी नाव
डॉ. जहान सिंह ‘जहान’ असम के घने जंगलों में खासी पहाड़ियों के बीच ब्रह्मपुत्र की उपनदी गरगई के किनारे पर बसी एक छोटी ढोंग बस्ती। गोल छप्पर नुमा झोपड़ी कुछ टूटे पत्थर और लकड़ी के बने आकार जिन्हें मकान कह सकते हैं। नंगे खेलते बच्चे, भोंकते कुत्ते, कीचड़ की सौगात में लिपटी गाय, भैंस, बकरियां, तीखे लाल, नीले, काले, पीले रंगों के कपड़े। शाल, चादर से यौवन ढकने की कोशिश करती युवतियां नई दुनिया से बहुत दूर दैनिक कार्यों में उल्झी। छोटे-छोटे पानी के गड्ढे, उन में हलचल करती मछलियां, इधर-उधर भागते मुर्गे, मुर्गियां। पान, सुपारी, मक्का, धान ही उनकी पूजी, जिसे बड़ी सफाई से टूटी झल्लियों या मिट्टी के बर्तनों में संजोकर कोने में रखती स्त्रियां। कपड़ों के टुकड़ों को कमर में बांधे हुक्का पीते, पान सुपारी खाते, अलसाये मर्द या तो मछली पकड़ने में या कंकड़ों के टुकड़ों से कोई शतरंज का जैसा खेल खेलने में ही लगे रहते। अमावस्या या पूर्णिमा को हाट-बाजार कर लेना बस। बाकी जीवन जीने का संघर्ष महिलाओं पर निर्भर रहता है। लगातार यही सामान्य जिंदगी जिसमें केवल रोटी, कपड़ा और मकान की जद्दोजहद ही शामिल रहती है। लेकिन यही सोया हुआ गांव कार्तिक मास में एक नगर के संसाधनों से सुसज्जित हो जाता है। यहां एक विशाल मेला दुर्गा पूजा के साथ लगना शुरू होता है। और पूरे एक मास तक चलता है। इसी बस्ती से कुछ दूर एक दुर्गम रास्ते पर ऊंची पहाड़ी है। जहां ‘काल मठ’ स्थापित है। जो दूर-दूर तक अपनी तांत्रिक विद्या के लिए जाना जाता है। इस पर फहराता लाल पताका, शंख घड़ियाल की ध्वनि स्वतः लोगों का ध्यान आकर्षित करती है। रोशनी का साधन उस पर जलती हुई मशाल जो वहां आने वालों को बहुत दूर से सम्मोहित करती है। और लोग खिचे चले आते हैं। ऐसा विश्वास कि वहां जाने वालों की हर मनोकामना पूरी होती है। खासतौर पर यदि मठाधीश तांत्रिक ‘स्वामी काल भैरव आनंद’ स्वयं आशीर्वाद देदें। मेले में आने जाने वाले मर्द, स्त्रियां सब कोशिश करते हैं कि उनके दर्शन हो जाए। कुछ आस्था विश्वास पर कुछ जिज्ञासा बस और विदेशी पर्यटक शोध कार्य की भावना पहुंच से पहुंचते रहते हैं। गोवहारी का मेट्रो जीवन, तेज दौड़ती जिंदगी। इंजीनियर सुबोध बरुआ ने अपनी इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त कर एक प्रसिद्ध बहुराष्ट्रीय कंपनी में सीनियर पद पर इस नगर में नौकरी कर ली। उनकी योग्य पत्नी डॉ. देवो मालती गोगोई बही के महिला कॉलेज में समाजशास्त्र की शिक्षिका है। छात्र-छात्राओं, विभाग एवं अपनी कॉलोनी में प्रसिद्ध एवं प्रिय है। इन दोनों के प्यार, पति-पत्नी के रिश्ते और अच्छे इंसान का लोग उदाहरण देते हैं। अगर कोई कमी थी तो शादी के बाद इतने वर्षों में मां-बाप ना बनने की। दोनों को आपस में कोई मलाल नहीं था। क्योंकि शिक्षित एवं समझदार हैं। लेकिन समाज की नजरें कभी-कभी विचलित कर देती थीं। हर वर्ष इंजीनियर सुबोध दो माह के लिए अमेरिका रहते थे। इन गर्मियों के अवकाश में डॉ. देवो मालती अपनी ससुराल में आ जाती है। जो टोंग बस्ती से चालीस मील की दूरी पर है। ससुराल में सब कुछ ठीक होते हुए भी सास का ताना, पिछड़े इलाके होने से हर औरत मर्द की कुछ ना कुछ इस प्रकार की छींटाकशी ‘बांझ स्त्री’ का संबोधन, तीज त्यौहार की पूजा में शामिल ना होने देना। बच्चों के जन्म पर किसी को प्यार से आशीर्वाद ना देने देना। बरगद पूजा में शामिल ना करना। कुंवारी लड़कियों को देर रात तक साथ में खेलने ना देना। इन छोटी-छोटी लेकिन तीखी बातों ने डॉ. मालती के जीवन में इतनी कड़वाहट भर दी कि सब कुछ होते हुए जीवन आधारहीन निरुद्देश प्रतीत होने लगा। पढ़ी-लिखी होने के नाते, सब सहज तरीके से सहन करती। डॉ. मालती अंदर से बिखर चुकी थी। मेले की चर्चा कई बार सुनी ‘काल मठ’ के स्वामी की शक्तियों के बारे में गांव की औरतों की आए दिन बातचीत से डॉक्टर मालती को अनायास ‘काल मठ’ ने सम्मोहित करना प्रारंभ कर दिया। और इंजीनियर सुबोध के आने पर ‘काल मठ’ जाने का मन बना लिया। उसने सुबोध से कहा कि मैं यहां दो महीने से बोर हो रही हूं। चलो पास में ही मेला लगा है, घूम आए। मेरा मन भी बहल जाएगा। अमेरिका से आए सुबोध को मेले में जाने का प्रस्ताव अटपटा सा जरूर लगा। फिर भी मालती की खुशी के लिए हां कर दी। मठ तक पहुंचने के लिए नदी पार करनी पड़ती है। इस कार्य के लिए एक ही मोटर बोट चलती है। जो यात्रियों को इस पार से उस पार पहुंचाती है। मेले का शोर, चाट, मिठाई, फलों की दुकान, कपड़े, इत्र, मिट्टी के खिलौनों से लेकर लोकगीत, नाटक, नृत्य-मंडली, जादू, सर्कस, नट के कर्तव्य, मौत का कुआं, एक मिनट में फोटो, पर्यटन, टॉकीज में चलचित्र, एक बिल्कुल नया अनुभव सुबोध और मालती को। मालती ने सुबोध से निवेदन किया कि उस मठ में एक बहुत सिद्ध तांत्रिक रहते हैं, चलो दर्शन करें। मैं एक समाजशास्त्री हूं और आप तकनीकी वैज्ञानिक। जिज्ञासा के अनुरूप एक अच्छा अनुभव होगा। सुबोध तुरंत जवाब दिया, “I don't believe in such things if you want to go you can, I will enjoy here.” मालती का अंतर्द्वंद जिज्ञासा और कुछ प्राप्त करने की उत्कंठा ने बरबस चलने को मजबूर कर दिया। मालती बोली, “You'll Wait here till I Returns.” सुबोध ने बड़ी नम्रता से Yes बोला। मालती चल दी, रास्ता दुर्गम घुमावदार सीढ़ियां और घना जंगल ज्यादातर यात्री वापस लौट रहे थे। शाम होने को थी, कुछ बरसात की संभावना बन रही थी। जो इस क्षेत्र में सामान्य बात है। मालती थकी हारी ऊपर पहुंची। अंधेरा होने लगा था, लेकिन अंदर एक अनोखी इच्छाशक्ति प्रेरणा सूत्र का कार्य कर रही थी। अंधेरा होने लगा था। काल मठ द्वार पर अजीब सा सन्नाटा। मालती बिना रुके अंदर चली गई और तांत्रिक स्वामी काल भैरव आनंद के कक्ष में प्रवेश कर गई। अद्भुत आकर्षण लाल तमतमाता हुआ चेहरा, सुदृढ़ शरीर, बलिष्ठ भुजाएं, रुद्राक्ष के माला से लिपटी गर्दन, चौड़ी छाती, चारों तरफ जलती आग, बंद आंखें, ललाट पर सूर्य की किरणें जैसा प्रकाश बिखेरता तिलक। एक अजीब सी वातावरण में सम्मोहक खुशबू। मालती के अंदर मां बनने की इच्छा का ज्वालामुखी फूट पड़ा। उसने अनचाहे अनजाने में अपने वत्र उतार दिए और नग्न अवस्था में पुकार कर बोली। “काल भैरव स्वामी” देख मेरी तरफ मैं भी नारी हूं। मुझसे मेरी नारी होने का अधिकार कोई नहीं छीन सकता। बिना “मां” का स्वरूप लिए नारी अधिकार हीन होती है। स्वामी तांत्रिक आंख खुलते हैं। आंखों से अचानक तेज रोशनी निकलती है और आकाश में भयानक बिजली कड़कती है। मालती भय से तांत्रिक की बाहों में समा जाती है। मालती के शरीर में अनगिनत ज्वालामुखी फूटने का एहसास होता है। बाहर बहुत तेज बारिश होने लगती है। मालती अर्थ चेतना अवस्था से जब वापस आती है, तो घबरा कर अपने को ठीक करती है। शरीर में अजीब सा दर्द, लेकिन अंदर पूर्ण तृप्ति, संतोष एवं सुख की चरम सीमा की अनुभूति। बहुत देर होने से सुबोध भी ‘मठ’ के पास पहुंच गया। बाहर से सुबोध की आवाज आती है, “यदि पूजा-पाठ हो गया हो तो चलो।” तब तक हूटर की आवाज जोर-जोर से सुनाई देती है। यह जाने वाली आखरी नाव है। आज 23 अक्टूबर है। यदि नाव मिली तो कल अमेरिका जाने वाली फ्लाइट छूट जाएगी। तेज कदमों से सुबोध और मालती नाव की तरफ चल पड़े। बरसात हो रही थी। रुक-रुक कर बिजली भी कड़क रही थी। आज ना जाने क्यों मालती को सुबोध का हाथ पकड़ना अच्छा लग रहा था। अंदर की क्षणिक उत्पन्न हुई आत्मग्लानि, मालती ने अपने चेहरे पर हाथ फेरते हुए दरिया में त्याग दी। मैं एक स्त्री हूं। मुझे पूर्ण जीने का अधिकार है। यह प्राकृतिक का सत्य है। जिसे झूठलाया नहीं जा सकता। रात में सुबोध की अमेरिकी यात्रा की कहानी सुनते और प्यार करते-करते कब दोनों सो गए पता ही नहीं चला। समय आगे बढ़ा और मालती मां बनी। एक सुंदर सी कन्या को जन्म दिया। खबर से सुबोध के घर में खुशी छा गई। वहीं गर्मी का अवकाश, गांव का मेला, मालती का मठ में पहुंचना, स्वामी के दर्शन की लालसा में। लेकिन पुजारी ने बताया कि पिछले 23 अक्टूबर को स्वामी जी ब्रह्मलीन हो गए हैं। और उनके सिंहासन पर ‘मालती’ के फूल रखे हैं, आप दर्शन कर ले। मालती की आंखें नम थी। सुबोध कुछ समझ पाता उससे पहले मालती ने पूछा, “क्या जीवन स्थानांतरित किया जा सकता है?, नहीं मालूम।” आखरी नाव का हूटर जाने का संकेत दे रहा था। ********
- व्यक्तित्व और प्रकृति
डॉ कृष्ण कांत श्रीवास्तव कभी-कभी चीजों को स्वाभाविक रूप से होने देना ही बुद्धिमानी कहलाता हैं। इस सुंदर जीवन के लिए ईश्वर का धन्यवाद। इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रकृति हमेशा से ही सबको आकर्षित करती रही है। प्रकृति अपनी निरंतरता, अडिगता, अखंडता के कारण ही ताकतवर और सर्वशक्तिमान है। हम सब इसका ही हिस्सा हैं। स्वभाविक तौर पर ये सब मौलिक गुण हमारे अंदर मौजूद हैं। लेकिन भाग दौड़ भरी जिंदगी में हमने कृत्रिमता को ही सब कुछ मान लिया है और अपने आप को विकसित करने की बजाय पतन की ओर धकेलते जा रहे हैं। जिंदगी को बेहतर तरीके से जीने का साधारण सा नुस्खा है कि हर चीज में समझदारी दिखाने से खुद को बचाने का प्रयास करना। प्रकृति ही समझदार है। कभी-कभी चीजों को स्वाभाविक रूप से होने देना ही बुद्धिमानी कहलाता हैं। कृत्रिमता का परिणाम तो हम ही जान चुके हैं। हमें छोटी-छोटी बातों से ऊपर उठकर अपने अंदर प्राकृतिक गुणों को विकसित करने की आवश्यकता हैं। जीवन में दौड़ने की अपेक्षा सहजता से और झुक कर चलना ज्यादा बेहतर साबित होता हैं। कहावत भी है कि अकड़ कर चलना तो मुर्दों की पहचान होती है, झुकता वहीं है जिसमें जान होती हैं। अतः कोशिश यही होनी चाहिए कि खुद को स्वाभाविकता की ओर बढ़ाते चले। सफलता, कामयाबी, धन दौलत ये सब तो अपने आप मिलने लगते हैं जब हम छोटी-छोटी बातों से ऊपर उठकर अपने अंदर प्राकृतिक गुणों को और ज्यादा विकसित करने लगते हैं। हमें अपने सीमित समय में ही अपने आप को बेहतर बनाना होगा क्योंकि समय को दोबारा हासिल नहीं किया जा सकता। परिवर्तन स्थाई हैं। इस बात को समझना होगा। केवल तभी हम अपने आप को और ज्यादा कुशल बना सकते हैं। स्मार्ट बनने की अपेक्षा स्मार्ट वर्क करने की ज्यादा जरूरत है। जीवन की इस सुन्दरता को बढ़ाने की कोशिश ही हमारी वास्तविक सफलता होगी। प्रकृति को कुछ देने के बाद ही हासिल करने की संभावना ज्यादा रहती हैं। हम अपने जीवन की खुबसूरती को और भी बेहतर बना सकते हैं। जिस प्रकार प्रकृति की प्रत्येक वस्तु बहुत सुंदर होती है ठीक वैसे ही हमारा जीवन भी बहुत सुंदर होता है।हर इंसान के जीवन की अलग खूबसूरती होती हैं। लेकिन लगातार विपरीत परिस्थितियों के चलते हम इसकी खूबसूरती को भूल बैठे हैं। जीवन की इस सुन्दरता को बढ़ाने की कोशिश ही हमारी वास्तविक सफलता होगी। दौलत कमाना और जीवन को खुशहाल और समृद्ध बनाना दोनों एक दूसरे से भिन्न हैं। जरूरी नहीं कि दौलत कमाने के बाद खुशी मिलें परन्तु खुश रहकर धन कमाना सामान्य की अपेक्षा ज्यादा आसान होता हैं। इंसान जन्म के समय स्वाभाविक रूप से खुश होता है। उसे कोई चिंता, दुःख, निराशा परेशान नहीं करती। हमें कम से कम अपने शरीर का ध्यान रखने की अनिवार्य रूप से आवश्यकता है। जिंदगी हमसे सिर्फ इतना चाहती है कि हम सब अपने मूल रूप को कभी भी न भूलें। वास्तव में दौलत की चाह में हमारे बुनियादी गुण लगातार कम होते जा रहे हैं। हम सब कुछ भूलें बैठे हैं। हमें कम से कम अपने शरीर का ध्यान रखने की अनिवार्य रूप से आवश्यकता है ताकि हम सुख समृद्धि का उपभोग कर सकें लेकिन हमारी इस चाहत ने हमें बुरी तरह से भटका दिया है। अच्छी बातें अब हमें अजनबी सी प्रतीत होती है। नैतिक मूल्य एक विषय बन कर के रह गए हैं। महत्वकांक्षी लोगों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता। हमें सोचना होगा, समझना होगा कि आखिर कहां जा रहे है हम? कम होती कृतज्ञता का आखिर क्या कारण है? आज़ हमारे पास कामयाबी हासिल करने के लिए लगभग सभी साधन मौजूद हैं लेकिन सफलता चुनिंदा लोगों को ही मिल रही है। जीवन में कुछ कर गुजरने वाले लोग दूसरों की परवाह नहीं करते। आत्मनिर्भरता महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक हैं। हालांकि, हम आत्मनिर्भर है परंतु छोटी सी परेशानी आने पर दूसरों से अपेक्षा करते हैं कि वो लोग आएं और हमारी सहायता करें। आत्मनिर्भर व्यक्ति सामान्य की तुलना में आत्मविश्वास से भरपूर होता है। जीवन में कुछ कर गुजरने वाले लोग दूसरों की परवाह नहीं करते। उनको अपनी प्रशंसा और आलोचना से कोई सरोकार नहीं होता। प्रकृति भी हमसे यही उम्मीद रखती है कि हम आत्मविश्वास से लबरेज जीवंतता से भरपूर जीवन को जीएं। बिगड़ती दिनचर्या और बुरी आदतों के वश में होकर हम खुद के साथ बहुत अन्याय कर रहे हैं। और मज़े की बात ये है कि हमें इस का पता तब चलता है जब बहुत देर हो चुकी होती हैं। हमें इंतजार नहीं करना हमें खुशी-खुशी कार्य करते रहना है। यही आधारभूत आदतों में से एक हैं। दुनिया के महानतम लोगों ने जीवन की छोटी-छोटी बातों को बड़ा महत्व दिया। निरंतर प्रयास ही सबसे महत्वपूर्ण कदम होता हैं। हम अक्सर छोटी-छोटी बातों को अनदेखा कर देते हैं जबकि इन बातों का हमारे जीवन में बड़ा महत्व होता हैं। दुनिया के महानतम लोगों ने जीवन की छोटी-छोटी बातों को बड़ा महत्व दिया। हम छोटी बातों को कम ध्यान देते है क्योंकि हम बड़ा हासिल करना चाहते हैं। बिना इसके जाने कि बड़ा बनने के लिए छोटी-छोटी चीज़ों का ध्यान रखना अनिवार्य शर्त है। ऐसी परिस्थिति में हमें समझदारी से काम करने की कोशिश करनी होगी और साथ ही किसी भी प्रकार की गलतफहमियां का शिकार होने से बचना होगा। कई बार तो ऐसा लगता है जैसे हमारे बिना दुनिया ही थम जाएगी। इस तरह की जीवनशैली से खुद को दूर रखने की आवश्यकता है। इस खूबसूरत जीवन के लिए ईश्वर को धन्यवाद देना आवश्यक हैं। विपरीत परिस्थितियों में धैर्य और संतुलन बनाए रखना ही सबसे महत्वपूर्ण है। सुख में धैर्य, साहस और आत्मविश्वास रखना अपेक्षाकृत आसान होता हैं परन्तु दुःख, निराशा और असफलताओं की अवस्था में खुद को प्रेरित करना, उत्साह बनाए रखना बेहद कठिन परंतु आवश्यक हो जाता हैं। अक्सर हम असफल लोगों को देखकर जीते हैं कि उन्होंने भी प्रयास किया था, दिन रात मेहनत करने के बाद भी उनको कामयाबी नहीं मिली इत्यादि। इसकी अपेक्षा हमें सफल लोगों के विषय में ज्यादा से ज्यादा सोचने, समझने और पढ़ने की जरूरत है। जीवन में संतोष रखना जरूरी है लेकिन खुद के विकास को कभी भी कम न होने दें। जिसने सीखना छोड़ दिया उसका जीवन बिना पतवार की नाव जैसा हो जाता है। अपने रिमोट को अपने हाथों में ही रखना हितकारी होगा। **********
- लक्ष्मण रेखा
"मंगलम भगवान विष्णु, मंगलम गरूडध्वज, मंगलम पुण्डरीकाक्ष, मंगलाय तनो हरि!!" हॉल में पंडित जी के पवित्र वेद मंत्रों की ध्वनि गूँज रही थी । अंबर और अवनि पावन अग्नि के समक्ष परिणय सूत्र में बँधने के लिए की जाने वाली अनेक रस्मों से थके थके से नजर आ रहे थे। अँबर तो मन ही मन कब से सोच रहा था कि पंडित फेरे डालने के विधि विधान सम्पूर्ण करें तो जल्दी से विदाई बेला आये। तब जरा सी देर लेटकर अपनी कमर सीधी करने का मौका मिल जाए। तभी पंडित जी की आवाज़ गूँजी-- "जजमान अब दूल्हे की बहिन या बुआ यहाँ आकर दूल्हे के पटके को दुल्हन की चुनरी से बाँध दीजिए। अब दूल्हा दुल्हन सप्तपदी फेरों के लिए तैयार हैं। और हाँ, हमारे जजमान जी, आप जरा बिटिया रानी के शगुन नेग का लिफाफा भी तैयार रखिए।" पंडित जी के हल्के-फुल्के हँसोड स्वभाव अंदाज से परिचित, हाल में मौजूद सभी रिश्तेदार हँसी की फुहारें छोड़ रहे थे। पंडित के कहने पर दीदी ने अवनि के साथ अँबर का गठबंधन कर दिया। गहरे रंग के जामुनी जोड़े में सजी संवरी अवनि का रूप सौन्दर्य देखते ही बनता था, बसरा मोती और कुंदन के जड़ाऊ चमकते गहनों में उसका अप्रतिम सौंदर्य की रूप माधुरी पान से अँबर के चकोर नैना तृषित से थे । बेहद मँहगें दुल्हन के साज सिंगार में फालतू दिखावटीपन की बनावट नहीं थी। अवनि की शालीनता और सौम्यता उसके व्यवहार से लक्षित हो रही थी। दुल्हन की बेशकीमती सजी पोशाक और आभूषण में उसका गोरा कुंदन सा बदन अप्सराओं सा निखर उठा। अबंर ने भी दुल्हन के रंग से मैच करते हल्के जामनी रंग की शेरवानी पहनी थी। साथ में सफेद लकदक मोतियों की माला जो दूर से जामुनी रंग वाली किरणों से झिलमिल कर रही थी।अँबर के सौन्दर्य को द्विगुणित कर रही थी। साथ में झकाझक सफेद अलीगढ़ी पायजामा था। सुरूचिपूर्ण खूबसूरती से सजा धजा अँबर दूल्हे के वेष में बहुत ही मनमोहक लग रहा था। पंडित जी के कहने पर अब वे दोनों धीरे धीरे चलते हुए अग्नि के चारों ओर फेरे लगा रहे थे। पंडित जी ने अपनी आदत के अनुसार अवनि और अँबर को हँसी खुशी सात फेरों का महत्व बताते जा रहे थे। उन दोनों से सुख दुख में साथ निभाने की रस्में कसमें भी पूरी कराते हुए पंडित जी अवनि से बोले कि-- " आज से आप दोनों एक दूसरे के साथ वचनबद्ध होकर मंगल परिणय सूत्र में बँध गए हैं। बिटिया रानी चार फेरे में तुम्हारे कदम पहले बढ़ेंगे और अँबर तुम्हारा अनुसरण करेगा।" "ससुराल में परिजनों की सेवा सुश्रुषा एवं पति की मान मर्यादा का ध्यान रखते हुए तुम्हें जीवन में हम-कदम बनकर अँबर का सुख दुख की मुश्किल घड़ी में साथ निभाना होगा ।" "और अँबर तीन फेरे में तुम्हारे कदम पहले आगे बढ़ेंगे जिसमें जीवन सुचारू रूप से चलाने के लिए अवनि बिटिया तुम्हारा अनुसरण करेगी। और इसके लिए तुम्हें अवनि बिटिया के भरण पोषण के साथ उसके सुख दुख का पूरा ध्यान रखना होगा। जीवन चर्या की नौकरी व्यवसाय आदि कार्य को अपनाते हुए अपने जीवन के स्वर्णिम पल अवनि की झोली में खुशी खुशी डालने होंगे।" "आज पावन अग्नि को साक्षी मानकर आप दोनों वैवाहिक बँधन में बँध गए हैं। आज से आप दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। रिश्तों को पावन मजबूत बनाने के लिए आप दोनों को जिन्दगी में,एक दूसरे से कोई भी दुराव छिपाव नहीं रखना चाहिए।" बात ही बात में पंडित जी ने दूल्हे दुल्हन को सात फेरों के वचन आदि समझाकर शादी की रस्में पूरी करा दी। नियम से सारी रस्में निभाने के बाद जल्दी ही विदाई बेला भी आ पहुँची। आज उनकी लाडली बिटिया मायके का घर आँगन छोड़कर आज ससुराल की देहरी पर जा रही है। मन को लाख समझाने के बाद भी अवनि के पापा और मम्मी का जी हल्कान हुआ जा रहा था। बाबुल का नैहर छोड़ते हुए अवनि की आँखों से आँसुओं की गंगा यमुना बह रहीं थीं। सबसे गले मिलकर अवनि अँबर के साथ गाड़ी में बैठ गई और करीब एक घंटे बाद गाड़ी जाकर अँबर के घर के बाहर खड़ी हो गई। अँबर की मम्मी ने बहुरानी की आरती उतारी। चावल से भरे कलश को दाँयें पैर से आगे लुढ़का कर घर की लक्ष्मी अवनि का गृह प्रवेश हो गया। शादी के अवसर पर घर आये हुए रिश्तेदारों की गहमागहमी में दस पन्द्रह दिन कैसे बीत गए अवनि को पता ही नहीं चला। इन दिनों किसी खास रिश्तेदार परिचित के घर से खाने का बुलावा आया रहता जहाँ ये दोनों खुशियाँ बिखेरते हुए जाते और खा पीकर हँसी खुशी वापस आते थे। लेकिन इन पन्द्रह दिनों में अवनि ने महसूस किया कि हँसता मुस्कुराता अँबर उसके साथ मजाक मस्ती करने के मूड में रहता था। किन्तु जैसे ही अवनि अधिक करीब आने की कोशिश करती वो चिहुँक कर पीछे हट जाता । घबराहट और पसीने से लथपथ बिना कुछ कहे मुँह फेरकर सो जाता। अवनि का सारा मूड़ खराब हो जाता। शुरू में अवनि ने सोचा था कि शायद विवाह के समय में अधिक काम काज का जोर पड़ने से अँबर उसकी परवाह नहीं कर पाते हैं। उन्हें थकावट के कारण जल्दी नींद आ जाती है। लेकिन अब तो दो महीने बीत गए थे और इन पति-पत्नी के बीच में आपसी दूरियाँ जस की तस बनी हुई थी। खिले हुए गुलाब के फूल सी अवनि का चेहरा अब धीरे धीरे मुरझाने लगा। अँबर का मूड़ अधिकतर उखड़ा हुआ रहता। ऐसे हालात में हँसती मुस्कुराती अवनि का सौन्दर्य रस मुरझाने लगा । कुछ समय पश्चात अँबर की दीदी जब कुछ दिन के लिए घर पर रहने आई तो अवनि और उसकी दीदी में खुलकर सारी बातें खुलकर हुई। दोनों के बीच में परस्पर सहज सम्बन्ध स्थापित करने के लिए अवनि की ननद ने एक आइडिया प्लान किया । और उन दोनों को पाँच दिन के टूर पर बाहर घूमने भेज दिया। ना ना नुकुर,नुकुर करते हुए बहन की जिद और अवनि की खुशी के लिए अँबर को घूमने आना पड़ा। यहाँ इन दोनों को अब पूरे दिन साथ रहना था।अब दोनों के बीच कामकाज का भी कोई बहाना नहीं था। आखिर अँबर भी कब तक सच्चाई से आँखें चुरा सकता था। एक दिन संध्या समय होटल के हाल में दोनों डायनिंग हाल में बैठे थे। मद्धम नीली पीली लाल रोशनी के बीच होटल के मंच पर स्थानीय मशहूर सिंगर अपना जादूभरा गीत संगीत का कार्यक्रम पेश कर रहे थे। "जब कोई बात बिगड़ जाए, जब कोई मुश्किल पड़ जाये, तुम देना साथ मेरा हमनवां।" ये दोनों एक दूसरे की आंखों में आंखें डालकर लाइट वाली रेड वाइन सिप कर रहे थे। आज दोनों ने पहली बार मदिरा का स्वाद चखा था। हल्का हल्का सुरूर छाने पर वे दोनों अपने रूम में लौट आए। आज अवनि अँबर के मन की उलझी डोर को सुलझाने की कोशिश कर रही थी। इसलिए अँबर को बातों में उलझाकर कालिज समय की बातें कहने सुनने लगी। किसी प्रकार से अँबर के मन के भीतर छिपा दर्द, अनजान भय बाहर निकल आए। यही सोचकर, खान-पान, नयी मूवी,नये पुराने हिंदी फिल्मी गानें,पहनावे की पसंद नापसंद, से लेकर वे दोनों अपने कालिज समय की बातें शेयर करने लगे। अचानक लड़खड़ाती आवाज में अँबर के मुँह से निकला कि-- " अ..व...नि...तुम जानती हो ना कि मैं... नपुंसक... हूँ...।" "ऐसा मुझे मेरे साथ पढ़ने वाली लड़की नीरा ने कहा था।" "वो मुझसे प्यार करने का दम भरती थी । मैं भी उसपर खुलकर पैसे खर्च करता था। एक दिन मैंने उसे अपने सबसे अच्छे मित्र से मिलवाया तो उसने नीरा को धोखेबाज कहकर मुझे उससे सावधान रहने के लिए कहा था।" उस दिन उस दोस्त की कही गई बात मुझे बहुत बुरी लगी थी। किंतु अपने दोस्त की बात का झूठ सच जानने के लिए एक दिन मैं नीरा को होटल ताज में लेकर गया। तब सच में नीरा ने लाज शर्म की सारी दीवारें तोड़कर खुद को मेरे सामने पेश कर दिया।" "उसी दिन से प्यार को खेल समझने वाली नीरा का घिनौना सच देखकर मुझे प्यार के नाम से नफरत सी हो गई। तब वहाँ होटल के कमरे में मौका मिलने पर भी मैंने नीरा को छुआ तक नहीं।" " सामने व्यंजन भरी थाली सजी रखी हो, और भूखा इंसान खाने से इंकार कर दें तो इसमें बनाने वाले व्यक्ति को अपना बहुत अपमान लगता है। नीरा को भी बहुत बुरा लगा था। इसी बात को मुद्दा बनाकर उसने अपनी इस बेइज्जती का बदला मुझे खूब खरी खोटी सुनाकर निकाला। घर परिवार से दूर, होस्टल में रहने वाली आजाद ख्याल नीरा ने उस समय मुझे बहुत कुछ उल्टा सीधा बोला। रोज कपड़ों की तरह अपने बाय फ्रेंड बदलने वाली नीरा के व्यंग बाण, कटु आक्षेप से मेरा कलेजा बुरी तरह से छलनी हो गया।" इसलिए मैंने कालिज में अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ दी। और पिताजी के पास वापस अपने घर आकर मैंने पिताजी के व्यवसाय को सँभाल लिया। मम्मी की जिद के कारण यहाँ आने के कुछ दिन बाद ही मेरा तुमसे विवाह हो गया। अपनी बात कहते-कहते अँबर नशे की झोंक में अवनि के काँधें पर झूल गया। अब समझदार पढ़ी लिखी अवनि, अँबर के अपने से दूरी बना कर रहने और बेरूख़ी भरे व्यवहार का कारण समझ चुकी थी। सारी बातें सुनकर बहुत प्यार से अँबर के बालों को सहलाते हुए अवनि बोली कि-- "अँबर आप सोचो,यदि एक लड़की धोखेबाज थी, तो उसके जैसे ही संसार की सारी लड़कियाँ तो धोखेबाज नहीं हो जाती?" "और ना ही उसके ताना मारने से आप नपुंसक साबित हो जाते हैं।" "बल्कि यह बात तो आपके हृदय की संवेदनशील मनोवृत्ति को प्रकट करती है कि मौका मिलने पर भी आपने किसी लड़की के रूप सौन्दर्य जाल का गलत फायदा नहीं उठाया।" "वरन आपने रिश्तों की पावन मर्यादा का पालन किया। वो लड़की नीरा दोस्ती और प्यार के रिश्तों में सूक्ष्म लक्ष्मण रेखा की वर्जना समझने के काबिल ही नहीं थी।" इन सब बातों के लिए स्वयं को दोषी ठहराना बंद करो। और बेकार की बातों का बोझ दिमाग से उतार कर फेंक दो। और अब आराम से सोने की कोशिश करो। धीरे-धीरे अँबर का माथा सहलाते हुए प्यार मनुहार भरे अंदाज में कहकर अवनि ने कमरे की बत्ती बुझा दी । सारी बातों के सुलझे सिरे जोड़ कर अवनि एक निर्णय पर पहुँच गयी । और उसने शहर लौटकर सबसे पहले मनोवैज्ञानिक काउंसलर की मदद से अँबर के मन का वहम दूर करने का मन बना लिया। ****************
- घमंडी राजा
डॉ कृष्ण कांत श्रीवास्तव बहुत समय पहले की बात है। किसी राज्य में एक राजा राज करता था। वह बहुत ही घमंडी था। लोगों को कुछ भी नहीं समझता था। लोगों पर अत्याचार करता था और परेशान करता था। वह जबरदस्ती कर वसूलता था। एक दिन उस राजा ने सभी से कर वसूलने के लिए अपने सेनापति को भेजा। जब सेनापति अपने साथ कुछ सिपाहियों को लेकर कर वसूलने के लिए जा रहे थे। तो रास्ते में उन्हें एक आदमी मिला। सेनापति ने उस आदमी से कहा कि तुमने बहुत समय से अपना कर नहीं दिया है। सेनापति की बात सुनकर आदमी ने कहा कि मेरे पास अभी कर चुकाने लायक धन नहीं है। सेनापति उसे पकड़ कर अपने साथ ले गए और उसे राजा के सामने उपस्थित किया। सेनापति ने राजा से कहा कि यह व्यक्ति राज्य का निवासी है और कर देने से मना कर रहा है। इस पर क्रोधित होकर राजा ने कहा कि इसे अगले दिन बुलाना। मैं इसे सजा सुनाऊंगा। आदमी बहुत गिड़गिड़ाया और कहने लगा महाराज मुझे माफ कर दीजिए। मेरे पास इतना धन नहीं है। मैं आप का कर चुकाने में असमर्थ हूं। मैं तो अपने और अपने परिवार का पेट पालने भर का भी धन नहीं कमा पाता हूं। मैं राज्य का कर कैसे चुका पाऊंगा। तभी राज्य में एक साधु महाराज पधारे। उन्होंने देखा कि राजा अपने ही राज्य की जनता पर अत्याचार कर रहे हैं। साधु ने राजा से कहा कि आप ऐसा क्यों कर रहे हैं। साधु महाराज की बात सुनकर, राजा ने कहा कि अगर तुम भी ज्यादा सवाल जवाब करोगे तो मैं तुम्हें भी सजा सुना दूंगा। क्योंकि मैं इस देश का राजा हूं और मुझे अपनी प्रजा से कर वसूल करने का अधिकार है। मैं अत्यंत शक्तिशाली हूं और मैंने अपनी शक्ति के बल पर कई राज्य के राजाओं को पराजित कर उनके राज्य को अपने राज्य में मिला है। यह व्यक्ति हमारे राज्य में रहता है और हमारे राज्य की समस्त सुविधाओं का उपयोग करता है। इसलिए इसे कर तो देना ही होगा। इस पर साधू ने कहा कि अगर तुम सब कुछ जीत चुके हो तो मेरे एक सवाल का उतर दो। अगर तुमने सही-सही उत्तर दिया तो मैं समझ लूंगा कि तुम चक्रवर्ती सम्राट हो और तुम्हें अपने राज्य की जनता से कर वसूलने का अधिकार है। साधु ने राजा से कहा कि महाराज आप हमारे साथ चलें। मैं आपको एक ऐसे स्थान पर ले चलूंगा। जहां बहुत अधिक सोने, चांदी और हीरे जवाहरात एकत्रित हैं। आप अपनी आवश्यकता अनुसार जितना चाहे उतना सोना चांदी वहां से ला सकते हैं। राजा बहुत लालची था। वह उस स्थान पर जाने के लिए तैयार हो गया। राजा का लालच देखकर साधु ने एक शर्त रखी। कहा महाराज वहां पर आपको अकेले ही जाना होगा। आप अपने साथ अपने सैनिकों को नहीं ले जा सकते। राजा ने साधु की शर्त स्वीकार कर ली और साधु के साथ जंगल की ओर चल दिया। चलते-चलते शाम हो गई। राजा और साधु सघन जंगल के बीच पहुंच गए। अत्याधिक थकान के कारण राजा को भूख और प्यास लगने लगी। यहां घने जंगल में भूख और प्यास मिटाने की कोई सुविधा नहीं थी। घने जंगल के बीच राजा अपने राज्य को जाने का रास्ता भी भटक गया। राजा ने साधु से कहा, “मैं बहुत थक गया हूं और मुझे अत्यधिक भूख और प्यास सता रही है, मुझे पानी पिलवा दीजिए।” साधु ने राजा से कहा कि महाराज, अभी तो हम लोगों ने आधी दूरी भी तय नहीं की है। राजा बोले महाराज इस वक्त मुझे धन नहीं भोजन चाहिए। यदि मुझे भोजन ना मिला तो मैं यहीं पर अपना दम तोड़ दूंगा। महात्मा बोले ठीक है महाराज मैं आपके भोजन की व्यवस्था करता हूं। कुछ समय के बाद साधु राजा के सामने एक व्यक्ति को लेकर उपस्थित हुआ। उसके पास थोड़ा सा भोजन और पानी था। साधु ने उस व्यक्ति से कहा, “हे महानुभाव, यह सज्जन आपके राजा हैं और इस समय भूख और प्यास से व्याकुल हैं। आप अपने हिस्से का खाना और पानी राजा को दे दीजिए, महान कृपा होगी। व्यक्ति बोला कि यदि राजा अपनी सारी धन-संपत्ति मुझे देने का वादा करें तो मैं इस वक्त अपना भोजन और पानी इन्हें दे दूंगा। मरता क्या न करता राजा भूख और प्यास से बहुत अधिक व्याकुल था। राजा ने उसकी बात तुरंत मान ली और भोजन पानी ले लिया। दूसरे दिन महल में आकर साधु ने राजा को समझाया। साधु ने कहा, “देखो राजन जिस प्रकार कल तुम अपनी भूख और प्यास के बदले पूरा राज्य देने के लिए तैयार हो गए थे, उसी प्रकार आपके राज्य की गरीब जनता भी अपने बच्चों के खाना पानी के लिए जी तोड़ मेहनत करती है। ऐसे में यदि वह राज्य का कर ना दे पाए तो उसे दंडित नहीं करना चाहिए। राजा को बात समझ में आ गई। उसने साधु का अत्यधिक आदर सत्कार कर विदा किया। और अपने घमंड को त्याग कर राज्य की जनता के सुख के लिए कार्य करना प्रारंभ कर दिया। कहते हैं कि फलों से लदा पेड़ लचक जाता है। उसी प्रकार धन से संपन्न व्यक्ति को जरूरतमंद लोगों की अवश्य मदद करनी चाहिए। ***********
- मेरी कहानी
अनामिका सोचा न था जो लिखूंगी कभी वो मेरी ही कहानी होगी। याद आयेगी वो रह-रहकर जो-जो यादें पुरानी होंगी। रुक-रुक करके वो टीसेंगी बन आँख में पानी होंगी। काग़ज़ पर तो न उतरी होगी पर सब याद जुब़ानी होंगी। आत्मा मर चुकी होगी शायद तन में हरकतें बाक़ी होंगी। अभी जिंदा हूँ ये बताने को मुझे धड़कनें सुनानी होंगी। महलों में तो रही हूँ मगर गलतफ़हमी मिटानी होगी। किसी ख़्वाब ने कहा था कि एक दिन तुम रानी होगी। सोचा न था जो लिखूंगी कभी वो मेरी ही कहानी होगी। अगर कुछ बातें बतानी होंगी तो कुछ बातें छुपानी होंगी। *******
- वहम
सविता सिंह मीरा अब खुद में ही रम गयी बता तो दूं सारी बातें जता तो दूं सारी जज्बाते यशोधरा उर्मिला की भांति जागी हूं कितनी ही रातें। ध्येय था सिद्धार्थ लक्ष्मण का मेरा भी भाव समर्पण का उनका तो लक्ष्य हुआ पूरा पर आया ना पल अपने मिलन का। किसी और के होकर आए तुम मैं तुम में हो गई थी गुम अनुराग था मेरा मीरा सा इसलिए खुद को लिया है चुन। अब मैं खुद में ही रम गयी कभी मचली कभी थम गयी अब भाते मुझको यह दर्पण रही सही सारी वहम गयी। मैं अब खुद में ही रम गयी। *******











