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- हींगवाला
सुभद्रा कुमारी चौहान लगभग पैंतीस साल का एक खान आंगन में आकर रुक गया। हमेशा की तरह उसकी आवाज सुनाई दी – ”अम्मा… हींग लोगी?” पीठ पर बंधे हुए पीपे को खोलकर उसने नीचे रख दिया और मौलसिरी के नीचे बने हुए चबूतरे पर बैठ गया। भीतर बरामदे से नौ-दस वर्ष के एक बालक ने बाहर निकलकर उत्तर दिया – ”अभी कुछ नहीं लेना है, जाओ!” पर खान भला क्यों जाने लगा? ज़रा आराम से बैठ गया और अपने साफे के छोर से हवा करता हुआ बोला- ”अम्मा, हींग ले लो, अम्मा! हम अपने देश जाता है, बहुत दिनों में लौटेगा।” सावित्री रसोईघर से हाथ धोकर बाहर आई और बोली – “हींग तो बहुत-सी ले रखी है खान! अभी पंद्रह दिन हुए नहीं, तुमसे ही तो ली थी।” वह उसी स्वर में फिर बोला – “हेरा हींग है माँ, हमको तुम्हारे हाथ की बोहनी लगती है। एक ही तोला ले लो, पर लो ज़रूर।” इतना कहकर फौरन एक डिब्बा सावित्री के सामने सरकाते हुए कहा – “तुम और कुछ मत देखो माँ, यह हींग एक नंबर है, हम तुम्हें धोखा नहीं देगा।“ सावित्री बोली – “पर हींग लेकर करूंगी क्या? ढेर-सी तो रखी है।” खान ने कहा – “कुछ भी ले लो अम्मा! हम देने के लिए आया है, घर में पड़ी रहेगी। हम अपने देश कू जाता है। ख़ुदा जाने, कब लौटेगा?” और खान बिना उत्तर की प्रतीक्षा किए हींग तौलने लगा। इस पर सावित्री के बच्चे नाराज़ हुये। सभी बोल उठे –“मत लेना माँ, तुम कभी न लेना। ज़बरदस्ती तौले जा रहा है।” सावित्री ने किसी की बात का उत्तर न देकर, हींग की पुड़िया ले ली। पूछा – “कितने पैसे हुए खान?” “पैंतीस पैसे अम्मा!” खान ने उत्तर दिया। सावित्री ने सात पैसे तोले के भाव से पाँच तोले का दाम, पैंतीस पैसे लाकर खान को दे दिये। खान सलाम करके चला गया। पर बच्चों को माँ की यह बात अच्छी न लगी। बड़े लड़के ने कहा – “माँ, तुमने खान को वैसे ही पैंतीस पैसे दे दिये। हींग की कुछ ज़रूरत नहीं थी।” छोटा माँ से चिढ़कर बोला – “दो माँ, पैंतीस पैसे हमको भी दो। हम बिना लिए न रहेंगे।” लड़की जिसकी उम्र आठ साल की थी, बड़े गंभीर स्वर में बोली – “तुम माँ से पैसा न मांगो। वह तुम्हें न देंगी। उनका बेटा वही खान है।” सावित्री को बच्चों की बातों पर हँसी आ रही थी। उसने अपनी हँसी दबाकर बनावटी क्रोध से कहा – “चलो-चलो, बड़ी बातें बनाने लग गए हो। खाना तैयार है, खाओ।” छोटा बोला – “पहले पैसे दो। तुमने खान को दिए हैं।” सावित्री ने कहा – “खान ने पैसे के बदले में हींग दी है। तुम क्या दोगे?” छोटा बोला – “मिट्टी देंगे।” सावित्री हँस पड़ी – “अच्छा चलो, पहले खाना खा लो, फिर मैं रुपया तुड़वाकर तीनों को पैसे दूंगी।” खाना खाते-खाते हिसाब लगाया। तीनों में बराबर पैसे कैसे बंटे? छोटा कुछ पैसे कम लेने की बात पर बिगड़ पड़ा –“कभी नहीं, मैं कम पैसे नहीं लूंगा!” दोनों में मारपीट हो चुकी होती, यदि मुन्नी थोड़े कम पैसे स्वयं लेना स्वीकार न कर लेती। कई महीने बीत गये। सावित्री की सब हींग खत्म हो गई। इस बीच होली आई। होली के अवसर पर शहर में खासी मारपीट हो गई थी। सावित्री कभी-कभी सोचती, हींग वाला खान तो नहीं मार डाला गया? न जाने क्यों, उस हींग वाले खान की याद उसे प्राय: आ जाया करती थी। एक दिन सवेरे-सवेरे सावित्री उसी मौलसिरी के पेड़ के नीचे चबूतरे पर बैठी कुछ बुन रही थी। उसने सुना, उसके पति किसी से कड़े स्वर में कह रहे हैं – “क्या काम है? भीतर मत जाओ। यहाँ आओ।” उत्तर मिला – “हींग है, हेरा हींग।” और खान तब तक आंगन में सावित्री के सामने पहुँच चुका था। खान को देखते ही सावित्री ने कहा – “बहुत दिनों में आए खान! हींग तो कब की खत्म हो गई।” खान बोला – “अपने देश गया था अम्मा, परसों ही तो लौटा हूँ।” “सावित्री ने कहा – “यहाँ तो बहुत ज़ोरों का दंगा हो गया है।” खान बोला – “सुना, समझ नहीं है लड़ने वालों में।” सावित्री बोली – “खान, तुम हमारे घर चले आये। तुम्हें डर नहीं लगा?” दोनों कानों पर हाथ रखते हुए खान बोला – “ऐसी बात मत करो अम्मा। बेटे को भी क्या माँ से डर हुआ है, जो मुझे होता?” और इसके बाद ही उसने अपना डिब्बा खोला और एक छटांक हींग तोलकर सावित्री को दे दी। रेजगारी दोनों में से किसी के पास नहीं थी। खान ने कहा कि वह पैसा फिर आकर ले जायेगा। सावित्री को सलाम करके वह चला गया। `इस बार लोग दशहरा दूने उत्साह के साथ मनाने की तैयारी में थे। चार बजे शाम को माँ काली का जुलूस निकलने वाला था। पुलिस का काफ़ी प्रबंध था। सावित्री के बच्चों ने कहा – “हम भी काली का जुलूस देखने जायेंगे।” सावित्री के पति शहर से बाहर गए थे। सावित्री स्वभाव से भीरु थी। उसने बच्चों को पैसों का, खिलौनों का, सिनेमा का, न जाने कितने प्रलोभन दिए, पर बच्चे न माने, सो न माने। नौकर रामू भी जुलूस देखने को बहुत उत्सुक हो रहा था। उसने कहा – “भेज दो न माँ जी, मैं अभी दिखाकर लिए आता हूँ।” लाचार होकर सावित्री को जुलूस देखने के लिए बच्चों को बाहर भेजना पड़ा। उसने बार-बार रामू को ताकीद की कि दिन रहते ही वह बच्चों को लेकर लौट आये। बच्चों को भेजने के साथ ही सावित्री लौटने की प्रतीक्षा करने लगी। देखते-ही-देखते दिन ढल चला। अंधेरा भी बढ़ने लगा, पर बच्चे न लौटे। अब सावित्री को न भीतर चैन था, न बाहर। इतने में उसे कुछ आदमी सड़क पर भागते हुए जान पड़े। वह दौड़कर बाहर आई, पूछा – ”ऐसे भागे क्यों जा रहे हो? जुलूस तो निकल गया न।” एक आदमी बोला – “दंगा हो गया जी, बडा भारी दंगा!” सावित्री के हाथ-पैर ठंडे पड़ गये। तभी कुछ लोग तेजी से आते हुए दिखे। सावित्री ने उन्हें भी रोका। उन्होंने भी कहा – “दंगा हो गया है!” अब सावित्री क्या करे? उन्हीं में से एक से कहा – “भाई, तुम मेरे बच्चों की खबर ला दो। दो लड़के हैं, एक लड़की। मैं तुम्हें मुँह मांगा इनाम दूंगी।” एक देहाती ने जवाब दिया – “क्या हम तुम्हारे बच्चों को पहचानते हैं माँ जी?” यह कहकर वह चला गया। सावित्री सोचने लगी, सच तो है, इतनी भीड़ में भला कोई मेरे बच्चों को खोजे भी कैसे? पर अब वह भी करें, तो क्या करें? उसे रह-रहकर अपने पर क्रोध आ रहा था। आखिर उसने बच्चों को भेजा ही क्यों? वे तो बच्चे ठहरे, ज़िद तो करते ही, पर भेजना उसके हाथ की बात थी। सावित्री पागल-सी हो गई। बच्चों की मंगल-कामना के लिए उसने सभी देवी-देवता मना डाले। शोरगुल बढ़कर शांत हो गया। रात के साथ-साथ नीरवता बढ़ चली। पर उसके बच्चे लौटकर न आये। सावित्री हताश हो गई और फूट-फूटकर रोने लगी। उसी समय उसे वही चिरपरिचित स्वर सुनाई पड़ा – “अम्मा!” सावित्री दौड़कर बाहर आई उसने देखा, उसके तीनों बच्चे खान के साथ सकुशल लौट आए हैं। खान ने सावित्री को देखते ही कहा – “वक्त अच्छा नहीं हैं अम्मा! बच्चों को ऐसी भीड़-भाड़ में बाहर न भेजा करो।” बच्चे दौड़कर माँ से लिपट गये। *******
- भीगी रातें
ग़ज़ल भीगी रातें शालिनी श्रीवास्तव 'शानु' छोटी लंबी तारों वाली, ख़्वाबों वाली रातें, ज़ाया कर दी मैंने तुझ पर जाने कितनी रातें। तिरे हिज्र में काटी मैंने वस्ल की सारी रातें बीत रही अब यूँ ही, अध सोई, अध जागी रातें। रात अंधेरी, घुप, तन््हाई और इक ख़ाली पन बस, तू क्या जाने कैसे कटती, मुझसे ऐसी रातें। शाने पर सिर रखके तेरे एक सुकूँ मिलता है, ख़्वाब सरीखी लगती हैं आगोश में तेरी रातें। मखमल के बिस्तर में सोने वाला क्या ही जाने, सीली लकड़ी, बुझता चूल्हा, पेट जलाती रातें। हाथ पकड़ बस इक दूजे का मीलों चलते जाते गीली-गीली सड़कों पर वो भीगी-भीगी रातें।
- When shadow disappear
Dr jahan singh 'jahan ' Sun arises. Day begins with test and trial. Night fades away. Exist dreamy land and rosy bed. Challenging day waiting ahead. Time tic tic and Sun up up. You dissolve in unknown crowd. Hello, hi, bye murmur and loud. Looking back OH! You are not alone Your shadow is with you. Rest world is strange and new. Struggle becoming long and long. Shadow becoming short and short. Shadow is wishing to leave you alone. In toughest time no one stands near. In mid noon even shadow disappear. ******
- मैं कवि हूं …
डॉ. जहान सिंह ‘जहान’ हां मैं कवि हूं। बिल्कुल नया हूं। अभी-अभी आया हूं। आपकी खुशी, अपना गम, प्रकृति का दर्द, जन्म का उल्लास, मृत्यु का विलाप, भूख का एहसास, वैभव की लालसा, जीवन की जिज्ञासा। ऐसा जहान अपने साथ लाया हूं। हां मैं कवि हूं। अभी-अभी आया हूं। चंद किताबों के बस्ते। कागज के लिखे कुछ दस्ते। टेबल, कुर्सी, लैंप, कलम। एक पुराने चित्रों का एल्बम। बस इतनी है मेरी पूंजी, सब पीछे छोड़ आया हूं। हां मैं कवि हूं। अभी-अभी आया हूं। प्रकृति की गोद, पहाड़ों का सफर रेत की तपती धूप, दरिया का संगीत, परिंदों की उछल कूद बस इनको साथ लाया हूं। हां मैं कवि हूं। अभी-अभी आया हूं। कभी मेरी तरह तुम भी निकलो सफर में। इस अनसुलझी जिंदगी की डगर में। चांद बनकर चांदनी, ढूंढो तारों सजी रातों में। दरिया की लहरों में खो जाओ बातों-बातों में। कभी घायल चिड़िया को पानी पिला कर देखो। उड़ते ही लौट कर तेरे पास आएगी। प्यार के उस स्पर्श को पहचान जाएगी। तपती रेत में तलासो, वो कैक्टस का फूल। जिसने तेरे इंतजार में सदियां गुजार दीं। सुनो कभी कोयल, मोर, सारस के गीत। झरनें का संगीत। पकड़ो कभी महकती हवाओं से, झूमती तितलियां। छू कर तो देखो कितनी मासूम हैं। शर्म से नजरें झुका गले लग जाएंगी। प्यार करके देखो, सभी से जीने का मकसद मिल जाएगा। बांट सको तो प्यार ही बांटो, जीवन जीना आ जाएगा। हां मैं कवि हूं। अभी-अभी आया हूं। बस यही बताने आया हूं। फिर मिलेंगे बात करेंगे। कितना बड़ा जहान है। वक्त आज इतना ही मेहरबान है। हां मैं कवि हूं। बिल्कुल नया हूं। अभी-अभी आया हूं। *****
- शैफ
''तुम बहुत ही स्वादिष्ट खाना बनाती हो। लाजवाब!!'' नितिन ने खाने के बाद अपनी चचेरी छोटी बहन नीलम की पाक-कला की प्रशंसा करते हुए कहा। ''धन्यवाद भाई साहब! आप तो जानते ही हैं बचपन से ही खाना खाने और बनाने का कितना शौक है मुझे।'' - नीलम ने खुश होते हुए कहा। ''ये तो सच है। तुम खाने में जान डाल देती हो।''- नितिन ने हामी भरी। ''कोशिश करती हूँ भैया। बल्कि, आदित्य भी मुझे आजकल रसोई में मदद करने लगा है। मेरी ही तरह इसे भी बड़ा मज़ा आता है नये-नए पकवान बनाने में।"- नीलम ने अपने बेटे आदित्य की ओर इशारा करते हुए कहा। ''अरे! क्या बात कर रही हो ?'' - बड़े भैया ने आश्चर्य से पूछा ? ''हाँ भाईसाहब! सब्जियाँ साफ़ करने और काटने में, केक, इडली के घोल बनाने में, और भी कितनी ही कामों में मदद कर देता है। पिज़्ज़ा और अलग-अलग तरह के सैंडविच, कई तरह के मिल्कशेक ये सब तो खुद ही बना लेता है। जब भी कुछ बनाती हूँ तो क्या-क्या सामान और मसाले डाल रही हूँ, कितनी मात्रा में डाल रही हूँ, सब जानना चाहता है।" - नीलम ने गर्व से बताया। ''सच में? क्या ये सच है आदित्य? जो भी तुम्हारी मम्मी कह रही हैं?'' - मामाजी ने अपने दस वर्षीय भांजे की ओर देखते हुए पूछा। ''जी मामाजी!'' - आदित्य ने विनम्रता से उत्तर दिया। ''बल्कि मैं तो और भी ज्यादा सहायता करना चाहता हूँ लेकिन मम्मी नहीं चाहती कि मैं ज्यादा गैस स्टोव के आस-पास रहूं। कहती हैं बच्चों के साथ सावधानी बरतना ज़रूरी है।" ''सही कहती है तुम्हारी माँ। लेकिन ये बताओ, ये लड़का होते हुए भी तुम्हें खाना बनाने का चस्का कहाँ से लग गया? नीलम को बचपन से शौक है लेकिन हम भाइयों ने तो कभी कोई इच्छा नहीं दिखायी। और वैसे भी लड़के तो तभी ये सब करते हैं जब और कोई चारा ही न हो। जब पढ़ाई या नौकरी करते समय घर से दूर अकेले रहना पड़े तो कभी चाय-कॉफी या मैगी बना ली। बस इतना ही। बाकी खाने के लिए या तो टिफ़िन लगा लिया कहीं से या किसी होटल से मंगा लिया। और घर में तो शादी के पहले माँ और शादी के बाद पत्नी होती ही है इस सबके लिए। अरे खाना तो लड़कियां बनाती हैं।'' - नितिन ने लगभग मज़ाक बनाते हुए कहा। नीलम और आदित्य उनकी बात सुनकर दंग रह गए। नीलम सोच रही थी कि अपने शौक के बारे में मामाजी से ऐसा सुनकर आदित्य को कैसा लग रहा होगा। जवाब भी आदित्य से ही मिला। ''ठीक है मामाजी। ये बताइये - हमारे देश का सबसे प्रसिद्ध शेफ कौन है?-'' उसने बड़ी गंभीरता से मामाजी से पूछा। मामाजी ने कुछ सोचते हुए कहा - ''एस. के." एक आदमी!!, एक पुरुष!! - हैं ना, मामाजी?- आदित्य ने चहकते हुए कहा। मामाजी कुछ न बोले। अब ये बताइये, हम जहाँ भी होटल, रेस्त्रां, ढाबे आदि में खाना खाने जाते हैं, वहां क्या देखते हैं? अधिकतर वहां खाना बनाने वाले और हमें परोसने वाले कौन होते हैं? आदमी ही ना? - आदित्य ने थोड़ा गर्व से कहा इस बार। अब मामाजी आदित्य की और देखकर मुस्कुरा रहे थे। भांजा सिर्फ खाना ही नहीं, बातें बनाने में भी होशियार है। ''तो फिर ये ''खाना तो लड़कियां बनाती हैं''- वाली बात कहाँ से सच हुयी?'' - आदित्य ने थोड़ा रूककर प्रश्न किया। अपने छोटे से भांजे के मुँह से इतनी तर्कसगंत बात सुनकर मामाजी का मुँह बंद हो गया और आँखें खुल गयीं। *********
- WE & THEY
Avighna Gautam Life to humans, Is a beautiful destiny As for animals, We all are enemy. They live in the world Of torture, sadness and scarcity With the shortage of life and food, And its intensity. We are harming animals, As if we are loopy Live and let live, And let them be happy. Afforestation is done, To protect trees They help animals to breathe, And to escape enemies. Poachers to an animal, Is like axe to a tree If hunting is put to a halt, Animals will feel free. Love nature, And love its inventions From hunters and poachers, Animals need preventions. ********
- घर का भेदी
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव बहुत पुरानी बात है। एक जंगल में हरे भरे एवं बड़े-बड़े बहुत सारे वृक्ष थे। उन वृक्षों पर तरह-तरह के पंछी चहचहाते रहते थे। सभी पेड़ बड़ी खुशहाली से उस जंगल में रहते थे, क्योंकि वह जंगल बहुत घना था। जिसके कारण वहां कोई लकड़हारा नहीं आता था। काफी साल गुजर गए एक दिन उनकी खुशनुमा जिंदगी में एक लकड़हारा आ गया। उसने कहा - अगर मैं इन सब पेड़ों को काट दूंगा, तो मुझे इनसे बहुत सारी लकड़ियां मिल जाएंगी और इन्हें बेचकर मैं बहुत सारा पैसा कमा लूंगा। यह सारी बातें सुनकर पेड़ चिंतित होने लगे। उन्होंने सोचा की अब हमें कोई नहीं बचा सकता। लेकिन उसी में से एक बूढ़े पेड़ ने कहा – फिक्र मत करो! उस लकड़हारे के हाथ में जो कुल्हाड़ी है, वह बिना हत्थे की है। बिना हत्थे के वह हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। लकड़हारे ने काफी देर तक बहुत परिश्रम किया। मगर कोई लाभ नहीं हुआ। उसने सोचा इतने मोटे-मोटे पेड़ों को कैसे काटू? मेरे पास तो कुल्हाड़ी भी बिना हत्थे की है। यही सब बातें सोच कर लकड़हारा वापिस अपने घर जाने लगा। यह देखकर सभी पेड़ कहने लगे- लकड़हारा हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाया। अगले दिन लकड़हारे को एक तरकीब सूझी, उसने सोचा - अगर मैं इस कुल्हाड़ी में लकड़ी का एक हत्था लगा दूं, तो मेरा काम आसान हो जाएगा। वह लकड़ी का हत्था कुल्हाड़ी में लगाकर फिर उसी जंगल में पहुंचा। सभी पेड़ लकड़हारे को फिर देख कर डर गए। क्योंकि अबकी बार उसके हाथ में जो कुल्हाड़ी थी, उसमें एक लकड़ी का हत्था लगा हुआ था। उनमें से एक पेड़ ने कहा- लगता है हम नहीं बच पाएंगे क्योंकि हमारी एक लकड़ी उसकी कुल्हाड़ी से जा मिली है। लकड़हारे ने सारे पेड़ काट डाले। लोहे की कुल्हाड़ी में लकड़ी का हत्था ना होता तो शायद पेड़ कटने से बच जाते। आखिर पेड़ की लकड़ी ही पेड़ों की दुश्मन बन गई। अगर लकड़ी की सहायता नहीं मिली होती तो लोहे की कुल्हाड़ी पेड़ को काट नहीं पाई होती। पेड़ का एक अंश लकड़ी कुल्हाड़ी से जुड़ गई थी। इसलिए उस लकड़ी ने ‘घर का भेदी लंका ढाए’ वाला काम किया। अब बेचारे पेड़ कैसे बच सकते थे? इसी प्रकार देश या समाज को अपने देश के ही गद्दारों से ज्यादा खतरा होता है। *******
- गिद्ध
श्यामल बिहारी महतो बैंक की सीढ़ियां उतरा ही था कि उन चारों ने सुदामा को घेर लिया था, जमीन पर मरा हुआ जानवर को जैसे गिद्ध घेर लेते हैं। फर्क सिर्फ इतना था। गिदध मरे हुए जानवरों को खाते हैं और ये चारों जिंदा लोगों की बोटी-बोटी नोच कर खाते हैं। सब अपना-अपना महीने भर का हिसाब लिए खडे थे। सबसे जल्दी में दारूवाला था, उसी ने पहले अपना मुंह खोला और बोला-"सुदामा, फटाफट मेरा डेढ़ हजार निकाल, तुम्हारा कमीना साथी करमचंद को भी पकड़ना है, साला फिर कहीं भाग न जाए"। "कल तो बारह सौ ही बताया था।" "और बाद में करमचंदवा के साथ दो बोतल पी गया था, उसका कौन देगा तुम्हारा बेटा। पीने के बाद तुमको होश रहता ही कहां है?" “मैं नहीं, वो करमचंद बोला था-वो देगा…।” “तुम बोला था - तुम दोगे। “और दारूवाले ने सुदामा का कालर पकड़ लिया- “चल जल्दी निकाल…।” सुदामा सहम गया। उसने तत्काल उसे डेढ़ हजार देकर चलता किया तो सूद वाला तन कर सामने खड़ा हो गया- "सुदामा, मेरा भी जल्दी से चुकता कर दो-पांच हजार बनता है।" “पांच हजार कैसे? तीन हजार मूल और एक हजार सूद - चार हजार न हुआ?" "और पिछले महीने समधी के आने पर दो हजार और लिया था उसका मूल और सूद कौन देगा। तुम्हारा बाप?" सुदामा सूद वाला से भी न बच सका। वो पूरे पांच हजार ले चलता बना। मीट और राशन दुकान वाले कब तक पीछे खड़े बगुले की तरह देखते रहते एक साथ दोनों सामने आ गये। "तीन हजार मेरा भी निकाल दो सुदामा भाई।" मीट वाला बोला। इस बार सुदामा ने कोई आना कानी नहीं की। चुप चाप तीन हजार दे दिया फिर बोला- "अभी आ रहा हूं। गुरदा-कलेजी रख देना।" "मेरे खाते में छह हजार चार सौ चालीस रूपए है - इस बार पूरा लूंगा।" राशन वाले सेठ ने लाठी ठोकते हुए सा कहा" इस बार डेढ़ हजार कैसे बढ़ गया सेठ जी?" सुदामा कुनमुनाया था। "समधी-समधीन आई थी तब दो दिन उन लोगों को शिकार-भात खिलाया था, भूला गया? तेल-मशाला किस भाव बिकता है मालूम है तुमको?" सेठ का तेवर कम नहीं हुआ-"खाने के समय ठूंस-ठूंस कर खाओगे और देने के समय खीच-खीच पूरा दो नहीं तो आज से उधार बंद।" "सेठ जी चार हजार ले लो- अगले महीने पूरा दे दूंगा।" सुदामा ने मिन्नत किया" बड़ी बेटी को सलवर कुरती खरीद देनी है। काफी पुराना हो गया है,-फटने भी लगा है।” "मुझे कुछ नहीं सुनना है, छः हजार चाहिए तो चाहिए ही, नहीं तो उधार बंद।" सेठ सीधे-सीधे धमकी पर उतर आया था। सेठ को न देने का मतलब घर का राशन पानी बंद। रोने और पैर पकड़ने पर भी सेठ का पत्थर कलेजा पिघलने वाला नहीं था, यह बात सुदामा भली-भांति जानता था। देने में ही भलाई था। चला तो हाथ में मात्र डेढ़ हजार रूपए था। आधा तनख्वाह पहले ही नागा में कट गया था और आधा आदमखोरों ने ले लिया। अब किस मुंह को लेकर घर जाए। बार-बार उसकी आंखों के सामने बड़ी बेटी सरिता का पुराना सलवर कमीज और छाती के बढ़ते आकार घूमने लगा था। देर रात वह घर पहुंचा। बच्चे सो चुके थे और पत्नी जाग रही थी। सालों बाद सुदामा कलेजी-गरदा लिए बगैर घर पहुंचा था। ******
- ध्यान
डॉ. प्रदीप उपाध्याय आज फिर वे अलसुबह कॉलोनी के पार्क में आकर बैठ गए थे, रोजाना की ही तरह। उन्हें घुमने की कोई जल्दी भी तो नहीं थी। वैसे भी पार्क में कोई बहुत ज्यादा भीड़ नहीं थी क्योंकि सुबह जल्दी कौन उठता है! 'अलसाये से लोग हैं, नई पीढ़ी कहाँ हेल्थकांशस है।' सूना पार्क देखकर जैसे उन्होंने अपने आप से कहा। लेकिन तत्क्षण ही मन ही मन फिर बुदबुदाए-'पुरानी पीढ़ी के भी तो यही हाल हैं। या तो दिनभर गपशप मारने में लगी रहेगी, इधर-उधर की बुराई-भलाई करने या फिर घर के कामों में खोट निकालने में, बेटे-बहू की बुराई करने में या फिर टीवी से चिपकी रहेगी...बिल्कुल निठल्लों की तरह!' फिर उनके मन के किसी कोने से आवाज आई - 'अरे, बेचारी पुरानी पीढ़ी के लोग करें भी तो क्या करें! घर में किसी के पास उनसे बातचीत करने के लिए समय भी तो नहीं रहता...जिस तरह घर का कबाड़ घर में इधर-उधर पड़ा रहता है, ठीक उसी तरह बुजुर्गों की स्थिति हो गई है, उन पर कहाँ किसी का ध्यान रहता है।' 'लेकिन हमें भी तो सोचना चाहिए कि बच्चे स्वयं इतने व्यस्त रहते हैं कि उनके पास समय कहाँ से होगा! अब मेरे स्वयं के बेटा-बहू अपने काम-धंधे, नौकरी-चाकरी में लगे रहते हैं। जब इनसे फुर्सत पाएं तब तो वे माँ-बाप के पास बात करने बैठ पाएं और फिर जब काम से लौटते हैं तब तक तो उनका तेल निकल चुका होता है। इतने निढाल हो जाते हैं कि बस...जैसे तैसे नौकर-नौकरानियों के हाथों का खाना निगल लें और जाकर बिस्तर पर पड़ जाएं...और वहीं मोबाइल पर ऊंगलियाँ घुमाते-घुमाते नींद के आगोश में समा जाएं।' सामने मैदान में तीन-चार लोग अब घुमने के बाद योगासन और प्राणायाम कर रहे थे, उन पर दृष्टि रखते हुए उन्होंने फिर अपने से ही प्रतिवाद भी किया- 'अरे तो नौकरी या फिर काम-धंधा ये ही लोग कर रहे हैं! हमने तो जैसे नौकरी की ही नहीं झख ही मारी है! क्या हम काम नहीं करते थे? बड़े ही जिम्मेदार ओहदों पर रहे...सरकारी नौकरी करना क्या आसान काम था...वह भी अफसरी! कितना जवाबदारी का काम रहता था लेकिन तब भी बच्चों के लिए समय निकालना, उनकी पढ़ाई-लिखाई पर बराबर ध्यान रखना क्या सहज था! और फिर अम्मा-बाबूजी को कभी उपेक्षित भी तो नहीं छोड़ सकते थे। जब अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद भी उनको बराबर समय दिया, उनसे बातचीत भी करते रहते, उनकी सुख-सुविधा का भी बराबर ध्यान रखते रहे। वे कितना खुश हो जाते थे...उनके चेहरे पर कितना संतोष का भाव आ जाता था।' 'तो क्या तुम्हारे बच्चे तुम्हारा ध्यान नहीं रखते, वे स्वयं से प्रतिप्रश्न कर ही रहे थे कि उनकी विचार श्रृंखला तब भंग हो गई जब पास से गुजरते हुए एक युवती ने उनका अभिवादन किया और गुड मॉर्निंग कहा। उन्होंने भी जवाब में व्हेरी गुड मॉर्निंग कहा और पूछ लिया - 'बेटी, आज अकेले ही!' उनका ध्यान अभी भी बगीचे में योगासन और प्राणायाम की नौटंकी सी करते उन तीन-चार लोगों की तरफ लगा हुआ था। 'हाँ अंकल, आज राहुल साथ में नहीं आए। कल ऑफिस से बहुत देर से लौटे थे।' कहते हुए वह बगीचे के पॉथ-वे पर टहलने निकल गई। वे अभी भी बगीचे में लगी कुर्सी पर ही बैठे हुए थे और आने-जाने वालों पर निगाह रखकर अपना समय काट रहे थे। उस युवती के उत्तर ने उन्हें फिर विचार मग्न कर दिया। उन्होंने उस युवती से तो कुछ नहीं कहा और वैसे भी वह स्वयं भी उनसे आगे बातचीत करने के स्थान पर बिना इस बात की प्रतीक्षा किए कि वे शायद और भी कुछ कहना चाहेंगे, स्वयं ही आगे टहलने के लिए बढ़ गई थी। संभवतः वह जानती थी कि अन्य बड़े-बूढ़ों की तरह ही वे भी कुछ न कुछ लेक्चर ही झाडेंगे। बहरहाल, उनके दिमाग में कई बातें यहां-वहां हो रही थी, उन्होंने मन ही मन कहा भी- 'हो सकता है कि राहुल ने रात को कुछ ज्यादा ही ड्रिंक ले ली होगी, तभी तो सुबह देर तक पलंग तोड़ता पड़ा रहा होगा।' आजकल के बच्चों का क्या है, लापरवाह और गैरजिम्मेदार जो ठहरे! हम भी देर रात तक अपनी ड्यूटी बजाते थे और फिर पार्टियां भी क्या कम होती थीं। हफ्ते में एक-दो दिन ही घर पर डिनर कर पाते थे वरना तो रोजाना ही कहीं न कहीं! वैसे जहां पावर अपने हाथों में हो, वहां लोग अपने आगे-पीछे बने ही रहते हैं। कितना मान-सम्मान और पूछ-परख होती थी। अब हम रिटायर हो गए हैं, गैर तो गैर घरवालों की नजरों में भी बेमतलब के हो गए हैं। किसी को हमसे कोई मतलब ही नहीं। वरना तो एक समय था जब हमारे जलवे थे तब डिनर पार्टियों से लौटने पर लड़खड़ाते कदमों से जब बंगलें में प्रवेश करते थे तब भी किसी को गिला-शिकवा न होता था और अब महीने-पन्द्रह दिन में दो पैग की भी बात करते हैं तो घर सिर पर उठा लिया जाता है। रिटायर्ड आदमी की शायद घर में कोई वैल्यू ही नहीं रह जाती है। पत्नी का भी तो साथ नहीं मिलता है इस उम्र में! अन्यथा तब तो उन्हें भी किटी पार्टी से ही फुर्सत कहां मिलती थी। पार्टी के बाद भी सुबह जागने का हमारा वही क्रम रहता था। घर-परिवार की जिम्मेदारी के साथ अपनी नौकरी में भी तो जवाबदार बने रहे लेकिन आज कोई हमारी सलाह को तवज्जो ही नहीं देता।' 'अरे छोड़ो, वह तो पद-प्रतिष्ठा थी, सुख-सुविधा थी, अफसरी का रौब था और कहीं लूपलाइन में न डाल दिए जाओ, इसके लिए दिन-रात खटते रहते थे।' उनके मन के कोने से आवाज आई। 'नहीं-नहीं, ऐसा नहीं था। हमने स्वाभिमान के साथ नौकरी की। किसी की हिम्मत नहीं पड़ती थी कि कोई कुछ कह सके...घर में भी और बाहर भी।' उन्होंने स्वयं को बखाना। 'हा हा हा, स्वाभिमान, नौकरी में स्वाभिमान! स्वाभिमान की पट्टी तो घर-परिवार और रिश्तेदारों में बहुत पढ़ाते रहे, लेकिन सच बताओ कि क्या उच्चाधिकारियों के सामने अपना स्वाभिमान बनाए रख पाते थे! और फिर जिन्हें तुम टटपुँजिया नेता-पत्रकार कहते थे, वे ही तुम्हें तुम्हारी औकात दिखा जाते थे और तुम केवल मन मसोसकर रह जाते थे, तब का क्या! और हाँ, जब कुछ जरूरी और समयावधि के काम पूरे करना होते थे तब भी मातहतों की खुशामद करने में तुम कहाँ पीछे रहे। यह बात जरूर है कि बाद में आँख दिखाने और आँख फेर लेने में भी तुमसा कोई दूसरा नहीं रहा होगा।' 'चुप रहो, क्या फिजूल की बात लेकर बैठ गए। नौकरी-चाकरी में तो यह सब करना ही पड़ता है। साम, दाम, दंड, भेद की नीति अगर नहीं अपनाएं तो जीवन में कभी सफल हो ही नहीं सकते।' कहकर उन्होंने अपने मन को तसल्ली देनी चाही। इतनी देर में भीतर के अन्तर्द्वन्द्व से वे अब बहुत ज्यादा आहत हो चुके थे और अभी जल्दी घर लौटना भी नहीं चाह रहे थे। खुले आकाश में उड़ते पंछी का कतरे पंखों के साथ जिंदगी जीना क्या होता है, अब उन्हें समझ में आने लगा था। अतः पॉथ-वे पर बड़ी देर से टहल रहे दो-तीन अपने सम वय वृद्धों की तरह ही वे भी कदमों को लगभग घसीटते हुए चल पड़े लेकिन उनके दिमाग में फिर वही प्रश्न कुदबुदाने लगा जो उनके अन्तर्मन से चिल्ला-चिल्लाकर पूछ रहा था कि 'क्या तुम्हारे बच्चे भी तुम्हारा ध्यान नहीं रखते?' *********
- जिम्मेदारी
घर पर खुशियों का माहौल था। सभी ओर से बधाई मिल रही थी। रमेश और सुरेश ने अपनी माँ आरती देवी का नाम रोशन कर दिया था। उनकी सफलता का श्रेय उनकी माँ को जाता था। सब कुछ ठीक चल रहा था। बच्चे अपनी सफलता पर बेहद खुश थे। प्रतिदिन माँ के चरण छूकर अपने काम शुरू करते थे। आरती भी खुद को धन्य समझती थी। बिना पिता के बच्चे का पालन-पोषण करना कौन सा आसान काम था? वह अपने मालिक जय सिंह का धन्यवाद करती नहीं थकती थी। जय सिंह बड़े आदमी थे। उनका भरा-पूरा परिवार था। सुंदर पत्नी, बाल-बच्चे। वह कई कारखानों के मालिक थे। वह कमजोर तथा गरीबों की सहायता के लिए हमेशा तैयार रहते थे। आरती का पति भी इनके कारखाने में काम करता था। उसने कभी पति का सुख नहीं देखा था। अपने घर पर भी घोर गरीबी देखी थी और पति का हाल तो और भी बुरा था। उस पर वह एक नंबर शराबी, जुआरी था। वह पीड़ा से भर जाती थी। जब भी सुख की बात सोचती तो पति के हाथों पिटाई खाती। वह उसे बुरी तरह लताड़ता था। अपशब्दों से उसका सीना चीर कर रख देता था। उसे चरित्रहीन कहने से भी परहेज नहीं करता था। वह रो-रोकर बुरा हाल कर लेती थी। पर बच्चों के लिए सब कुछ सह लेती थी। आज शाम से घर पर दोनों भाई भरे बैठे थे। वह माँ का इंतजार कर रहे थे। जब से वह दफ्तर से वापस आए थे। माँ के आते ही वह उन पर बरस पड़े। माँ बड़ी परेशान थी। आज ना कोई दुआ-सलाम, ना कोई चरण-स्पर्श। आखिर ऐसा क्या हो गया मेरे बच्चे को? क्या हुआ बेटा? तुम ही बता दो। आज तुम अपनी माँ से इतना कड़वा क्यों बोल रहे हो? क्या इसलिए मैंने तुम्हें पढ़ाया-लिखाया था? क्या मैंने रात-दिन इसलिए मेहनत की थीं? यही दिन देखना बाकी रह गया था। रमेश गुस्से से चिल्लाया आपको माँ कहते हुए भी मुझें शर्म आ रही हैं। सुरेश भी कह रहा था, आपके कारण हमारा सिर सबके सामने शर्म से झुक गया है। लोग हमारी सफलता का श्रेय हमें ना देकर जयसिंह को दे रहे हैं। हम अपनी जुबान से उसका नाम भी नहीं लेना चाहते। तुम जयसिंह की रखैल हो। सभी हमें यही ताना मार रहे हैं। रखैल, तुम्हें शर्म नहीं आई माँ। इतना घटिया काम करते हुए। तुमने आज हमें जीते जी मार दिया है। हमारा मन कर रहा है हम नदी में कूद कर अपनी जान दे दें। फिर तुम अपनी मनमर्जी करती रहना। ना तुम्हें कोई टोकने वाला होगा। जितना जी चाहे रंगरलियाँ मनाती रहना। अपने यार जयसिंह के साथ। बच्चों के व्यंग्य-बाण ने आरती को तोड़ कर रख दिया था। काटो तो खून नहीं, उसे ऐसा महसूस हो रहा था। जैसे वह कुछ बोल नहीं सकती थी। उसकी आँखें रो रही थीं। वह चुपचाप उठकर घर से बाहर निकल गई। बच्चों ने उसे रोकने का कोई प्रयास नहीं किया। आरती आज खुद को बहुत जलील महसूस कर रही थी। वह नदी की तरफ बढ़ती जा रही थी। वह आज अपनी जीवन-लीला समाप्त कर देना चाहती थी। मन ही मन अतीत की यादें उसे तडपा रही थीं। वह खुद से कह रही थी आज जीवन समाप्त करने का क्या फायदा? उस दिन जीवन खत्म करती। जब इनका बाप भी तुम्हें चरित्रहीन कहा करता था। रोज ताने मारता था। मैंने अपना पूरा जीवन लगा दिया इनकी परवरिश करने में। वह मन ही मन कह रही थीं। हाँ, मैं हूँ चरित्रहीन। पर क्यों बनी मैं चरित्रहीन? इनके लिए, जब इनके पिता मुझें बीच में ही छोड़ कर चले गए थे। सिर्फ चार-पाँच साल के थे ये दोनों। कोई रोजगार नहीं था। कैसे पालती इन्हें, कोई सहारा देने को तैयार नहीं था? जब भी किसी से मदद की आशा करती तो बदले में सभी मेरी देह चाहते थे। उनकी भूखी नजरें मुझे नोंच डालना चाहती थीं। दुकान वाले बनिए ने तो लगभग मेरी इज्जत तार-तार कर ही दी थी उस दिन। सिर्फ दो किलो आटे के बदले में, यही मूल्य था मेरी इज्जत का, मेरी देह का। बड़ी मुश्किल से भागी थी बनिए से बचकर, फटे कपड़ों में अपने तन को छुपाती हुई रात के अंधेरे में किसी तरह घर पर पहुंची थी। मकान मालिक ने कह दिया था कि 'सुबह घर खाली कर देना।' उन्हें भी मेरी हालत पर दया नहीं आई थी। सभी को मेरा ही कसूर लग रहा था। शायद उस दिन पहली बार मुझ पर धब्बा लगा था चरित्रहीन होने का। कितने सवाल उठे थे मेरे मन में क्या मैं सचमुच चरित्रहीन हूँ? क्या किया था मैंने? मैं खुद को बचा लाई थी उसी पापी हाथों से, यही मेरा अपराध था। पर मैंने मुँह नहीं छिपाया था इस समाज से। बस मुझे तो एक ही बात पता थी मेरे बच्चे भूखे-प्यासे बैठे हैं। माँ हूँ ना, माँ की पीड़ा एक माँ ही समझ सकती है। पुरुष तो हमेशा ही औरतों को भोग की वस्तु समझते हैं। इससे ज्यादा उसका कोई मोल नहीं है, पुरुष की नजर में। वह नदी की तरफ दौड़ी जा रही थी। उसे आज भी वह दिन याद आ रहा था। जब जयसिंह सेठ के घर का काम मांगने गई तो उन्होंने मेरा बड़ा आदर-सम्मान किया था। इतना अपनापन दिखाया था कि अंदर ही अंदर मैं खुद को सम्मानित महसूस कर रही थी। पर कहीं ना कहीं एक डर था कि वह इस मान-सम्मान की आड़ में.... फिर खुद को धिक्कार दिया था मैंने। मैं मालिक के घर का काम बड़ी लगन से करती रहती थी। कभी शिकायत का मौका नहीं देती थी। उनका भी प्यार भरा हाथ मेरे सिर पर सदा रहता था। मुझे बहुत दुलार करते थे। क्या सभी बड़े आदमी इतनी आत्मीयता से भरे होते हैं? मैं खुद से सवाल करती थी। उस दिन रक्षाबंधन का त्यौहार था। सेठ जी की तीनों बहनें उन्हें बड़े प्यार से राखी बांध रही थीं। मैं घर के कामकाज में व्यस्त थी। पर फिर भी कनखियों से सेठ जी को निहार रही थी। मैं मन ही मन कह रही थी। ऐसा भाई तो सभी को मिले। कितनी भाग्यवान हैं सेठ जी की बहनें? पता नहीं सेठ जी ने मेरे मन की बात कब पढ़ ली? सेठ जी ने एक थाली और मंगवाई। उसमें रोली, अक्षत, मिठाई, एक सुंदर सी राखी रखी थी। सेठ जी ने अपनी पत्नी से कहा, मेरी छोटी बहन आरती देवी को बुलाओ। मैं अपना नाम सुनकर हैरान थी। छोटी बहन, तभी सेठ जी की पत्नी ने मुझसे कहा। अब चलो भी ननद जी। मुझे यकीन नहीं हो रहा था। सेठ जी ने अपना हाथ मेरी तरफ बढ़ाया दिया था। इशारे से कहा जल्दी करो बांध लो अपने भाई को प्यार के बंधन में। मैंने राखी उनके हाथों में सजा दी। मैं फूली नहीं समा रही थी खुशी के मारे। सेठ जी ने मुझे गले लगा लिया। अपनी बहनों के साथ मुझे भी कहा आज कुछ भी मांग लो अपने भाई से। मैं इतना ही कह सकी थी। मेरे बच्चे, सेठ जी ने कहा इनके पढ़ाने-लिखाने की जिम्मेदारी मेरी। जब तक वह तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं संभाल लेते। भाई ने तो अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी थी। पर रमेश, सुरेश समाज के बहकावे में आ गये। वह रो रही थी कोई भी उसके आँसू पोछने वाला नहीं था। आज भी रक्षाबंधन का त्यौहार था। सुबह से जयसिंह आरती का इंतजार कर रहे थे। जब दोपहर तक भी वह नहीं आई तो वह खुद ही चल पड़े, आरती के घर पर। अपनी प्यारी बहन से राखी बँधवाने के लिए। पर घर में तो मातम पसरा पड़ा था। आरती-आरती को आवाज देने से भी जब कोई जवाब नहीं मिला तो सेठ जी अंदर ही चले गए। उन्होंने बच्चों से सीधा एक ही सवाल किया, कहाँ हैं मेरी छोटी बहन आरती? जल्दी बुलाओ उसे, जब तक वह मुझे राखी नहीं बांधेगी। हम कुछ नहीं खाएंगे। इस प्रण को आरती भी निभा रही है, इतने सालों से। यह सुनकर रमेश और सुरेश के पैरों तले से जमीन खिसक गई। आप हमारी माँ को अपनी बहन मानते हैं। हाँ, बेटा वह पिछले बीस वर्षो से मुझे राखी बांध रही है। वह मेरी सबसे प्यारी बहन है। जो हमेशा मेरे पास रहती है। यह सुनते ही रमेश और सुरेश फफक-फफक कर रोने लगे। उन्होंने सारी बात सेठ जी को बता दी। सेठ जी तमतमा उठे। क्या खूब जिम्मेदारी निभाई है तुमने? तुम्हें शर्म नहीं आई। सभी आरती को ढूंढने निकले पड़े। आरती को नदी किनारे देखकर सेठ जी ने उसे गले लगा लिया। मेरी बहन तुमने यह कैसे सोच लिया कि मेरी जिम्मेदारी खत्म हो गई है? चलो मेरे साथ, दोनों बच्चे सेठ जी के पांव पकड़कर क्षमा याचना करते रहे। पर आरती नहीं रुकी। उसने इतना ही कहा तुम अपनी जिम्मेदारी संभालो, मैं अपनी जिम्मेदारी। रमेश और सुरेश खुद को अपराधी महसूस कर रहे थे कि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह क्यों नहीं किया? समाप्त ********
- परिंदे की जात
सूर्य देव मिश्रा लाल्टू ने घर को आखरी बार निहारा। घर जैसे उसके सीने में किसी कील की तरह धँस गया था। उसने बहुत कोशिश की लेकिन, कील टस से मस न हुई। उसने सामने खुले मैदान में नजर दौड़ाई। सामने बड़े-बड़े पहाड़ खूबसूरत वादियाँ। कौन इस जन्नत को छोड़ कर जाने की बात भी सोचता है। लेकिन वो अपने बूढ़े बाप और अपने बच्चों का चेहरा याद करता है। तो ये घाटी अब उसे मुर्दों का टीला ही जान पड़ती है। इधर घाटी में जबसे मजदूरों पर हमले बढ़ें हैं। उसके पिताजी और उसके बच्चों का हमेशा फोन आता रहता है। कि कहीं कुछ... । उसके बूढ़े पिता कोई बुरी घटना घाटी के बारे में सुनतें नहीं कि उसका मोबाइल घनघना उठता है। चिंता की लकीरें लाल्टू के चेहरे पर और घनी हो जातीं हैं। बूढ़ा असगर जाने कबसे आकर लाल्टू के बगल में खड़ा हो गया था। उसकी नजर अचानक बूढ़े असगर पर पड़ी। लाल्टू झेंपता हुआ बोला - "अरे चचा आईये बैठिये..l" "तुमने, तो जाने का इरादा कर ही लिया है। तो मैं क्या कहूँ..? लो यह पश्मीना साल है। रास्ते में ठंढ़ लगेगी तो ओढ़ लेना।" असगर चचा ने तह किये हुए साल को पन्नी से निकाला और लाल्टू के कंधे पर डाल दिया। इस अपनत्व की गर्मी के रेशे ने एक बार फिर, से लाल्टू की आँखें नम कर दीं। असगर चचा ने धीरे से उसके कँधे दबाये और हाथ से उसके कँधे को बहुत देर तक सहलाते रहें। असगर चचा को कहीं ये एहसास हुआ कि ज्यादा देर तक वो इस तरह रहें। तो उनकी भी आँखें भीगनें लगेंगी। उन्होनें विषयांतर किया, और बोले- "चाय पियोगे?" लाल्टू ने हाँ में सिर हिलायाl बूढ़े असगर ने नदीम को आवाज़ लगाई - "नदीम जरा दो कप चाय दे जाना। थोड़ी देर में नदीम दो प्यालों में गर्मा-गर्म चाय लेकर आ गया।" चाय पीते हुए बूढ़ा असगर बोला - "ठीक, है अब तुम भी क्या कर सकते हो? जब यहाँ लोग ड़र के साये में जीने को मजबूर हैं। वहाँ तुम्हारे वालिद और बच्चे परेशान हैं। यहाँ क्या है? फुचके अब ना बिकेंगे। तो चाय बेचने लगूँगा। आखिर कहीं भी रहकर कमाया खाया जा सकता है। तुम जहाँ रहो खुश रहो। अपने वालिद और अपने बच्चों को देखो। जमाना बहुत खराब आ गया। पहले लोग इंसानियत और कौम के लिए जान दे देतें थें। लेकिन, अब इन नालायकों को जेहाद और आतंकवाद के अलावा कुछ नहीं सूझता। जेहाद बुराई को खत्म करने के लिए किया जाता है। बुरा बनने के लिए नहीं। इस्लाम में कहीं नहीं लिखा है कि बेगुनाहों, और मजलूमों को कत्ल करो। ये सब वही लड़कें हैं। जिन्हें धर्म के नाम पर उकसाया जाता है। और सीमापार बैठे हुक्मरान इनसे खेलतें हैं।" बहुत देर से चुप बैठा नदीम भी आखिरकार चुप ना रह सका। बोला - "तमिलनाडु में एक कंपनी ने तो एक ऐसा विज्ञापन निकाला है। जिसमें लिखा है कि वो नौकरियाँ केवल हिंदुओं को देगा। मुसलमानों को नहीं। आखिर जो हो रहा है। एकतरफा तो नहीं हो रहा है ना।" अचानक से चचा के शब्दों में अफसोस उतर आया। वो नदीम को घूरते हुए बोले - "आज सालों पहले लाल्टू यहाँ आया था। और पता नहीं कितने मजदूर यहाँ काम की तलाश में आयें होंगे। ये देश जैसे तुम्हारा है वैसे लाल्टू का भी है। कोई भी कहीं भी देश के किसी भी हिस्से में जाकर मजदूरी कर सकता है। कमाने-खाने का हक सबको है। लाल्टू आज भी मुझे अपने वालिद की तरह ही मानता है। गोलगप्पे मैं बेलता हूँ। छानता वो है। रेंड़ी मैं लगता हूँ। रेंड़ी धकेलता वो है। मैंने कभी तुममें और लाल्टू में अंतर नहीं किया। बेचारा हर महीने जो कमाता है। अपने घर भेज देता है। साल -छह महीने में वो कभी घर जाता है। तो अपने बूढ़े बाप और बाल बच्चों से मिलने। मेरा खुदा गवाह है कि मैंने कभी इसे दूसरी किसी नजर से देखा हो। इस ढंग की हरकतें सियासदाँ करें। उनको शोभा देता होगा। हम तो इंसान हैं ऐसी गंदी हरकतें हमें शोभा नहीं देतीं। हम तो मिट्टी के लोग हैं। और हमारी जरूरतें रोटी पर आकर सिमट जाती है। रोटी के आगे हम सोच ही नहीं पाते। हिंदू-मुसलमान भरे पेट वालों लोगों के लिए होता है। खाली पेट वाले रोटी के पीछे दौड़ते हुए अपनी उम्र गँवा देतें हैं। इसलिए नदीम दुनियाँ में आये हो तो हमेशा नेकी करने की सोच रखो। बदी से कुछ नहीं मिलता बेटा। बेकार की अफवाहों पर ध्यान मत दो बेटा। इस तरह की अफवाहों पर कान देने से अपना ही नुकसान है, नदीम। ऐसी अफवाहें घरों में रौशनी नहीं करतीं। ना ही शाँति के लिये कँदीलें जलातीं हैं। बल्कि पूरे घर को आग लगा देतीं हैं। मैं उन नौजवानों से भी कहना चाहता हूँ। जो इस तरह के कत्लो-गारत में यकीन रखतें हैं। बेटा उनका कुछ नहीं जायेगा। लेकिन तबतक हमारा सबकुछ जल जायेगा।" बाहर की खिली हुई धूप में कुछ कबूतर उतर आयें थें। बूढ़ा असगर गेंहूँ के कुछ दाने कोठरी से निकाल लाया। और, उनकी तरफ फेंकनें लगा। ढ़ेर सारे कबूतर वहाँ दाना चुगने लगें। बूढ़ा असगर, उनकी ओर ऊँगली दिखाते हुए लाल्टू और नदीम से बोला - "देखो ये हमसे बहुत बेहतर हैं। अलग-अलग रंगों के होने के बावजूद ये एक साथ बैठकर दाना चुग रहें हैं। ये बहुत बुद्धिमान नहीं हैं। फिर, भी ये आपस में कभी नहीं लड़तें। लेकिन, आदमी इतना बुद्धिमान होने के बावजूद भी जातियों और मजहबों में बँटा हुआ है। इन कबूतरों से आदमी को बहुत सीखने की जरूरत है।" लाल्टू ने नजर दौड़ाई दोपहर धीरे-धीरे सुरमई शाम में तब्दील होने लगी थी। उसने एक बार रेंड़ी को छुआ। फिर, उन बर्तनों पर सरसरी निगाह दौड़ाई। बिस्तर को निहारा। ये सब वो आखिरी बार निहारा रहा था। पिछले दस-बारह सालों से वो कश्मीर के इस हिस्से में रेंड़ी लगाता आ रहा था। सब छूटा जा रहा था। उसकी बस किनारे आकर लगी। लाल्टू चलने को हुआ। बूढ़ा असगर दौड़कर बस तक आया। उसने लाल्टू को सीने से लगा लिया। लाल्टू और बूढ़ा दोनों रोने लगे। बूढ़ा असगर बोला - "अपना ख्याल रखना! कभी हमारी याद आये और हालात ठीक हो जायें तो चले आना।" "आप भी अपना ख्याल रखना बाबा।" झेंपता हुए वो बस की सीट पर बैठ गया। उसने बैग से पश्मीना शाल निकाला और ओढ़ लिया। सुरमई शाम धीरे-धीरे रात में बदल गई। *******
- मौन अखरता है।
आलोकेश्वर चबडाल अखरता है शब्दकोश के शब्दों के यह, कान कतरता है, मौन अखरता है प्रिय तेरा, मौन अखरता है! निर्मम निर्दय निष्ठुर नीरस जो चाहे तू कह ले, मेरी नदिया तू बस मुझमें मंथर मंथर बह ले, तेरे रुक जाने से मेरा, प्राण ठहरता है, मौन अखरता है प्रिय तेरा, मौन अखरता है! मुख पर अंगुली धरे हुए हैं चूड़ी कंगन पायल, पलकों के घर चुप बैठे हैं मन के काले काजल, देखा देखी झुमका देखो, पेंग न भरता है, मौन अखरता है प्रिय तेरा, मौन अखरता है! जूही चम्पा और चमेली बोल रहीं हैं कब से, विद्रोही ये तेवर तेरे तोल रहीं हैं कबसे, अधिक क्रोध से बना बनाया, बाग बिखरता है, मौन अखरता है प्रिय तेरा, मौन अखरता है! आती जाती गंध छुआती अच्छी लगती है, गीत गजल तू छंद चुआती अच्छी लगती है, सुन कस्तूरी खोकर अपनी, कौन निखरता है मौन अखरता है प्रिय तेरा, मौन अखरता है! पुष्प वाटिका है तू मेरी प्रीत घटी है तुझसे, तुझसे मेरी अवधपुरी है पंचवटी है तुझसे, बता जरा कब राम सिया बिन, पार उतरता है मौन अखरता है प्रिय तेरा, मौन अखरता है!!! ******











