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Mar 1, 20261 min
हनुमान की खोज
बचपन में माँ की गोद में बैठकर उन्होंने रामायण की जो अपूर्व हृदयाकर्षक कहानी सुनी थी, वह दांपत्य जीवन के दुखमव अनुभव से व्यक्ति सईस की तिक वाणी से अचानक मलिन हो जाने पर भी कभी भी हृदय से मिट नहीं सकी, बल्कि पश्चिमी जीवन के आदर्श के संघर्ष में वह और अधिक स्पष्ट हो गई थी। खासकर रामायण के हनुमान का चरित्र उन्हें बाल्यकाल में बहुत ही आकृष्ट करता था। महावीर हनुमान का आदर्श उनके हृदय में सदैव देदीप्यमान रहता तथा रामायण-गान का समाचार पाते ही वे उसे सुनने दौड़ पड़ते थे।

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Feb 18, 20262 min
मैं शिव हो गया हूँ।
संन्यासी होने की साथ उन्हें बचपन से ही थी। एक दिन एक गेरुए वत्र को लपेटकर वे घूमने निकल रहे थे। यह देखकर माँ ने पूछा, "यह क्या रे?" वरिश्वर ने उल्लासपूर्वक ऊँचे स्वर में कहा, "मैं शिव हो गया हूँ।" उनमें ध्यान-प्रवणता भी थी। चड़ों के मुँह से उन्होंने सुना था कि ध्यान में निमग्न ऋषि-मुनियों की जटा बढ़कर धरती को छूने लगती है और धीरे-धीरे बरगद के पेड़ की जटा की तरह धरती में घुस जाती है।

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Feb 6, 20261 min
विवाह का प्रस्ताव
किसी समय नरेंद्रनाथ पिता की आज्ञा से अपने पिता के मित्र निमाईचंद बसु के ऑफिस में शिक्षार्थी (अपरेंटिस) के रूप में कार्य करते थे। प्रक्ताद्ध मेंसस के नियम के अनुसार उनका इक्कीसवाँ वर्ष पूरा होने पर, पिता की ही आज्ञा से इस लॉज में (तत्कालीन 234 ऐंकर एंड होप लॉज वर्तमान में, ग्रंड लॉज ऑफ इंडिया) भरती हुए। उन दिनों वकील, जज, सरकार के बड़े-बड़े अफसर आदि अनेक लोग फ्री मेंससों के दल में अपना नाम लिखवाते थे। इसी से विश्वनाथ सोचते थे कि वहाँ जाने से भावी सामाजिक जीवन में पुत्र को सुविधा होगी, क्योंकि वहा

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मुकेश ‘नादान’मुकेश ‘नादान’

मुकेश ‘नादान’

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