मैं शिव हो गया हूँ।
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मुकेश ‘नादान’
संन्यासी होने की साथ उन्हें बचपन से ही थी। एक दिन एक गेरुए वत्र को लपेटकर वे घूमने निकल रहे थे। यह देखकर माँ ने पूछा, "यह क्या रे?" वरिश्वर ने उल्लासपूर्वक ऊँचे स्वर में कहा, "मैं शिव हो गया हूँ।" उनमें ध्यान-प्रवणता भी थी। चड़ों के मुँह से उन्होंने सुना था कि ध्यान में निमग्न ऋषि-मुनियों की जटा बढ़कर धरती को छूने लगती है और धीरे-धीरे बरगद के पेड़ की जटा की तरह धरती में घुस जाती है।
सरल हृदय बालक वीरेश्वर ध्यान में बैठते और बीच-बीच में आँख खोलकर देखते कि उनकी जटा जमीन में प्रवेश कर गई है या नहीं। जब वे देखते कि वैसा नहीं हुआ है, तब दौड़ते हुए जाकर माँ से कहते, "माँ, ध्यान तो किया, जटा बड़ी कहाँ हुई?" माँ समझाती, "एकाध घंटा या एकाध दिन में नहीं होती, कई दिन लगते हैं।"
घर के सब लोग देखते थे, वीरेश्वर इसी तरह कभी अकेले अथवा कभी पड़ोस के बालकों के साथ ध्यान में बैठकर समय का ज्ञान खो बैठता है और अपने भाव में इस प्रकार तन्मय हो जाता है कि पुकारने पर कोई उत्तर नहीं मिल पाता। एक दिन नरेंद्र सीढ़ी वाले कमरे में घर की छत पर थे, इसी प्रकार ध्यान का खेल चल रहा था।
अचानक एक लड़के ने देखा कि घर में एक भयंकर साँप है। वह भय से चिल्ला उठा और वीरेश्वर को छोड़कर सभी लड़के घर से बाहर निकल भागे। लेकिन वीरेश्वर तब भी ध्यान में मग्न कम-चेतना से शून्य बैठा रहा। साथियों द्वारा शोरगुल करते हुए बार-बार पुकारने पर भी कोई उत्तर नहीं मिला। तब भयभीत ही झटपट दौड़कर बड़े-बुजुरगों को बुला लाए। उन लोगों ने आकर वह भयावह दृश्य देखा, आँखें मूंदकर बालक बैठा है। उसके सामने विषेला साँप फन फैलाए डोल रहा है। यह देखकर सबके प्राण सूख गए, साँसे थम गई। आवाज करने पर साँप बालक का अनिष्ट कर सकता है, इस भय से निरुपाय हो सभी चुपचाप खड़े रहे। थोड़ी देर बाद वह विषधर स्वयं ही चला गया। इसके बाद चैतन्य होने पर वीरेश्वर ने सबकुछ सुना, किंतु बोला, "मुझे तो कुछ पता ही नहीं चला।"
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