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विवाह का प्रस्ताव

मुकेश ‘नादान’

किसी समय नरेंद्रनाथ पिता की आज्ञा से अपने पिता के मित्र निमाईचंद बसु के ऑफिस में शिक्षार्थी (अपरेंटिस) के रूप में कार्य करते थे। प्रक्ताद्ध मेंसस के नियम के अनुसार उनका इक्कीसवाँ वर्ष पूरा होने पर, पिता की ही आज्ञा से इस लॉज में (तत्कालीन 234 ऐंकर एंड होप लॉज वर्तमान में, ग्रंड लॉज ऑफ इंडिया) भरती हुए। उन दिनों वकील, जज, सरकार के बड़े-बड़े अफसर आदि अनेक लोग फ्री मेंससों के दल में अपना नाम लिखवाते थे। इसी से विश्वनाथ सोचते थे कि वहाँ जाने से भावी सामाजिक जीवन में पुत्र को सुविधा होगी, क्योंकि वहाँ कई पदाधिकारियों और प्रभावशाली व्यक्तियों के साथ परिचय होगा।

इसी बीच समय-समय पर नरेंद्र के विवाह का प्रस्ताव भी आया करता। कई धनी और संभंत व्यक्ति नरेंद्र को दामाद बनाना चाहते थे तथा विश्वनाथ भी चाहते थे कि इस वैवाहिक संबंध के द्वारा पुत्र की सांसारिक उन्नति हो।

खासकर एक प्रस्ताव काफी आकर्षक था। इस संबंध के हो जाने पर नरेंद्र उन दिनों की अत्यंत वांछित आई.एस.सी. नौकरी के उद्देश्य से शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंग्लैंड जा पाते। किंतु नरेंद्र इससे सहमत नहीं हुए। अन्य जो प्रस्ताव आए थे, वे सब भी किसी-न-किसी कारण से निष्फल हो गए। नरेंद्र के हृदय में मानव-जीवन का एक बड़ा ऊँचा मानदंड स्थिर था, जो हर कदम पर उनके जीवन की गति का नियमन करता रहता था। अगल-बगल की परिस्थितियाँ उस नियम-अनुशासन का अतिक्रमण करने में सर्वथा असमर्थ थीं। संगीत, आमोदप्रियता आदि ने उन्हें कई क्षेत्रों में अवांछित मित्रों के बीच रख दिया, तथापि नीति-बोध ने उन्हें कभी लक्ष्यभष्ट नहीं होने दिया। सांसारिक प्रलोभन भी उनके लिए व्यर्थ सिद्ध हो चुके थे।

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