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  • अपमान

    कृष्ण कांत श्रीवास्तव एक बार की बात हैं। गौतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ बैठकर, उन्हें कुछ समझा रहे थे। बुद्ध के सभी शिष्य, बुद्ध को बड़े ध्यान से सुन रहे थे। बुद्ध और उनके सभी भिक्षु, यह देखते हैं कि उनकी तरफ एक आदमी बड़ी तेजी से आ रहा है, और वह आदमी, बहुत क्रोध में है और वह कुछ बड़बड़ाता आ रहा है। उस व्यक्ति को देख, गौतम बुद्ध के कुछ शिष्य समझ जाते हैं कि यह व्यक्ति कुछ गलत करने के उद्देश्य से, गौतम बुद्ध के पास आ रहा है। इसीलिए गौतम बुद्ध के दो शिष्य दौड़कर, उस आदमी के पास चले जाते हैं और उसे रोक लेते हैं। वह उस व्यक्ति से पूछते हैं, कि तुम कौन हो और तुम्हें किससे मिलना है? वह व्यक्ति गौतम बुद्ध के शिष्यों से कहता है, कि मेरे रास्ते से हट जाओ, आज मैं इस बुद्ध को सबक सिखाकर ही रहूंगा। उस व्यक्ति की बात सुन गौतम बुद्ध के शिष्य, उस व्यक्ति को शांत करने की कोशिश करते हैं, पर वह व्यक्ति शांत नहीं होता है। बुद्ध उस व्यक्ति को देखते हैं और मुस्कुराते हैं। फिर अपने शिष्यों से कहते हैं, कि मेरे प्रिय भिक्षुओं, उसे आने दो मेरे पास, वह मुझसे कुछ कहना चाहता है। बुद्ध की आज्ञा का पालन करते हुए बुद्ध के भिक्षु, उस व्यक्ति के रास्ते से हटते हैं। फिर वह व्यक्ति बुद्ध के पास आकर खड़ा हो जाता है। जैसे ही व्यक्ति बुद्ध के पास पहुंचता है, वह बुद्ध को गालियां देना शुरू कर देता है। बुद्ध उस व्यक्ति की गलियां सुनते रहते हैं परन्तु उसे कोई भी उत्तर नही देते। बहुत देर तक बुद्ध को गालियां देने के बाद वह व्यक्ति अपने मन में सोचता है, कि मेरी गालियों का तो बुद्ध पर कोई भी असर नहीं हो रहा है। इसीलिए उस व्यक्ति का क्रोध, और भी ज्यादा बढ़ जाता है, और वह व्यक्ति बुद्ध के उपर थूक देता है। उसके बाद बुद्ध एक कपड़ा उठाकर, उस थूक को पोंछ देते हैं। यह देख कर गौतम बुद्ध के सभी भिक्षुक, क्रोध से भर जाते हैं। पर बिना बुद्ध के आज्ञा के, कोई भी भिक्षुक अपना क्रोध प्रकट नही करता। वह व्यक्ति दुबारा से बुद्ध के ऊपर थूकता है, और बुद्ध दुबारा से एक कपड़ा उठाते हैं, और उस थूक को साफ कर लेते हैं। फिर बुद्ध मुस्कुराकर इस व्यक्ति से कहते हैं, कि मित्र, तुम कुछ और कहना चाहते हो? जैसे ही वह व्यक्ति बुद्ध का यह प्रश्न सुनता है, वह व्यक्ति भीतर तक हिल जाता है। फिर वह व्यक्ति बुद्ध को कोई भी उत्तर नही दे पाता है और तुरंत वहाँ से चला जाता है। बुद्ध के सभी भिक्षुओं के मन में, यह प्रश्न होता है कि उस व्यक्ति ने बुद्ध का इतना अपमान किया, लेकिन बुद्ध ने उस व्यक्ति को यह क्यों कहा, कि क्या वह और कुछ कहना चाहता है। सभी भिक्षुओं में से एक भिक्षुक बुद्ध से कहता है कि आपने उस व्यक्ति से यह क्यों कहा कि क्या वह कुछ और कहना चाहता है। जब कि यह तो स्पष्ट था कि वो व्यक्ति यहां कुछ कहने नही आया था, बल्कि वह तो आपका अपमान करने आया था। वह व्यक्ति, बुद्ध का अपमान करके अपने घर तो चला जाता है लेकिन पूरी रात सो नहीं पाता है। उसके मन में सिर्फ यही प्रश्न घूमता रहता है, कि मैने बुद्ध का अपमान किया उन्हें गलियाँ भी दी, फिर भी उन्होंने मुझ से यह क्यों पूछा कि क्या मैं कुछ और कहना चाहता हूं? जब कि मैं वहाँ कुछ कहने नही बल्कि उनका अपमान करने गया हुआ था। अगले दिन वह व्यक्ति सुबह-सुबह जल्दी उठकर बुद्ध के पास चला जाता है और उनकी चरणो में लेट जाता है। बुद्ध के सभी शिष्य, उसको देखकर आश्चर्य चकित होते हैं, कि जो व्यक्ति, कल बुद्ध का अपमान करके गया हुआ था, आज वह रो रहा है, और बुद्ध के चरणों में पड़ा हुआ है। बुद्ध उस व्यक्ति को उठाते हैं, और उस व्यक्ति से कहते हैं, कि मित्र क्या तुम कुछ और कहना चाहते हो? इतने में ही बुद्ध का एक भिक्षुक, बुद्ध को टोकता है और उनसे पूछता है, कि बुद्ध, जब कल यह व्यक्ति आपका अपमान कर रहा था, तब भी आपने यही बात कही थी कि क्या तुम्हें कुछ और कहना है? और आज यह व्यक्ति, आपके चरणों में पड़ा रो रहा है? आप तब भी यही बात कह रहे हैं? इसका क्या अर्थ है? बुद्ध कृपा कर समझाइए हमें। बुद्ध कहते हैं, कि बात को कहने के लिए शब्द असमर्थ हैं, कल भी यह व्यक्ति मुझसे कुछ कहना चाहता था, पर शब्द असमर्थ थे। इसीलिए क्रोध में आकर उसने मुझ पर थूककर वो बात मुझसे कहने का प्रयास किया। और आज भी शब्द असमर्थ हैं और उसकी जगह इसके आंसू कह रहे हैं, जो यह कहना चाहता है। उसके बाद वह व्यक्ति बुद्ध से कहता है, कि बुद्ध, मुझे क्षमा कीजिए, मैने आपका अपमान किया है। बुद्ध कहते हैं, कि तुम्हें क्षमा मांगने की कोई भी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि क्रोध भी तुमने किया, और उसकी पीड़ा भी तुमने ही पाई है। इसमें तुमने दूसरे किसी को क्या नुकसान पहुंचाया है? बुद्ध अपने सभी भिक्षुओं, और उस व्यक्ति से कहते हैं कि “क्रोध जलते हुए अंगारे की तरह है, जिसे हम अपने हाथ में पकड़ते हैं किसी और पर फैंकने के लिए। लेकिन हम ये भूल जाते हैं कि सबसे पहले उस अंगारे से ख़ुद का ही हाथ जलता है।” *****

  • पुरुषों का सौंदर्य

    अर्चना पाण्डेय मैं फिलहाल बात करना चाहती हूँ पुरुषों पर, जिनके सौंदर्य को हमेशा अनदेखा किया गया है। कुछ पुरुष ऐसे भी होते हैं जो ज़िन्दगी भर अपना काम ईमानदारी से करते हैं, भरपूर प्रेम करते हैं, और नारीवादी भी होते हैं। तथाकथित नारीवादी युग में पुरुषों को सिर्फ दुश्मन मान लिया गया है और उन पर जमकर बरसा जाता है। हर बात पर जिस तरह से सारी महिलाएँ हमदर्दी की पात्र नहीं होती उसी तरह सारे पुरुष कोसने के लिए नहीं हैं। पुरुषों का अपना सौंदर्य है, फिर चाहे वो पिता के रूप में हो, पति के रूप में हो, दोस्त हो, प्रेमी हो, भाई हो या रास्ते से गुज़रता कोई भी पुरुष वो सिर्फ कमाकर देने वाली मशीन नहीं है। ज़िम्मेदारियों से दबकर खुद को वक़्त से पहले कमर झुकाकर बुजुर्ग की उपाधि पाने के लिए नहीं है। उसे रोना आएगा तो उसे भी रोने दीजिये ये कहकर उसके आंसू मत दबाइए कि तुम आदमी हो रोते हुए ज़रा देखो कैसे औरत जैसे लग रहे हो। उसे यह कहकर अकेला मत छोड़िए कि आदमी है, खुद सँभल जाएगा। पुरुष भी भावुकता के उसी धरातल पर रहते हैं जहाँ औरत होती हैं। उन्हें भी उतना ही प्यार चाहिए जितना कि औरत को। अच्छा लगता है जब वो गले लगाते हैं और औरत का सिर सीधा उनके दिल को छूता है। इससे खूबसूरत और क्या होता होगा। प्रेम आप कभी अकेले कर नहीं सकते इसमें तो सदैव ही दो लोगों की ज़रूरत पड़ेगी। नारी सौंदर्य पर कितना कुछ कहा गया है लिखा गया है, पुरुषों की अवहेलना की गई है, हो सकता है उन पर भी कहा गया हो। लेकिन, जितना कहा जाना चाहिए वो अभी बाकी है। ये एक पुरुष का ही सौन्दर्य है कि उसमें नारी बसती है तभी तो शिव अर्द्धनारीश्वर हैं। रोज़ की बातों में से सहेज कर देखिए आपके पुरुष आपके लिए कितने महत्वपूर्ण हैं। रास्ते पर चलते वक़्त अगर वो आपको साइड में करके ये कहते हैं कि इधर चलो ये गाड़ी वालें देखकर नहीं चलाते और खुद उस खतरे को मोल ले लेते हैं, तब उनकी ख़ूबसूरती झलकती है। किसी दुकान पर अन्य पुरुषों की भीड़ देखकर आपको ये कहकर रोक देते हैं कि तुम रुको मैं ले आता हूँ बहुत भीड़ है, तब अच्छा लगता है ना। और तब कैसा लगता है, जब आपको रोता देखकर वो ये कहते हैं कि 'अरे रो क्यों रही हो किसी ने कुछ कहा क्या? मुझे बताओ अभी देखता हूँ उसको तो।' फिर कोई ये कह दे, 'शेर सुनो' तब क्या हो। कुछ पुरूष सिर्फ औऱ सिर्फ मोहब्बत के ही काबिल होते हैं। आज भी हकीकत तो ये है कि औरतें उस लिहाज़ से बेहतर हैं कि काम करे‌ ना करे लेकिन पुरुष को कहाँ सहूलियत है कि घर बैठ जाए। कड़वा है लेकिन सच है। आप ढूँढकर देख लीजिए, बहुत कुछ मिल जाएगा जिसके लिए पुरुषों का धन्यवाद किया जा सके......!! *****

  • वक़्त

    नासिर कोई ताज़ा हवा चली है अभी कुछ तो नाज़ुक मिज़ाज हैं हम भी और ये चोट भी नई है अभी शोर बरपा है ख़ाना-ए-दिल में कोई दीवार सी गिरी है अभी भरी दुनिया में जी नहीं लगता जाने किस चीज़ की कमी है अभी तू शरीक-ए-सुख़न नहीं है तो क्या हम-सुख़न तेरी ख़ामुशी है अभी याद के बे-निशाँ जज़ीरों से तेरी आवाज़ आ रही है अभी शहर की बे-चराग़ गलियों में ज़िंदगी तुझ को ढूँडती है अभी सो गए लोग उस हवेली के एक खिड़की मगर खुली है अभी तुम तो यारो अभी से उठ बैठे शहर में रात जागती है अभी वक़्त अच्छा भी आएगा 'नासिर' ग़म न कर ज़िंदगी पड़ी है अभी *****

  • एक सुंदर सीख

    कृष्ण कांत श्रीवास्तव एक पत्नी ने अपने पति से आग्रह किया कि वह उसकी छह कमियाँ बताए। जिन्हें सुधारने से वह बेहतर पत्नी बन जाए। पति यह सुनकर हैरान रह गया और असमंजस की स्थिति में पड़ गया। उसने सोचा कि मैं बड़ी आसानी से उसे ६ ऐसी बातों की सूची थमा सकता हूँ, जिनमें सुधार की जरूरत थी और ईश्वर जानता है कि वह ऐसी ६० बातों की सूची थमा सकती थी, जिसमें मुझे सुधार की जरूरत थी। परंतु पति ने ऐसा नहीं किया और कहा - 'मुझे इस बारे में सोचने का समय दो, मैं तुम्हें सुबह इसका जबाब दे दूँगा।' पति अगली सुबह जल्दी ऑफिस गया और फूल वाले को फोन करके उसने अपनी पत्नी के लिए छह गुलाबों का तोहफा भिजवाने के लिए कहा जिसके साथ यह चिट्ठी लगी हो, "मुझे तुम्हारी छह कमियाँ नहीं मालूम, जिनमें सुधार की जरूरत है। तुम जैसी भी हो मुझे बहुत अच्छी लगती हो।" उस शाम पति जब आफिस से लौटा तो देखा कि उसकी पत्नी दरवाज़े पर खड़ी उसका इंतज़ार कर रही थी। उसकी आंखौं में आँसू भरे हुए थे, यह कहने की जरूरत नहीं कि उनके जीवन की मिठास कुछ और बढ़ गयी थी। पति इस बात पर बहुत खुश था कि पत्नी के आग्रह के बावजूद उसने उसकी छह कमियों की सूची नहीं दी थी। इसलिए यथासंभव जीवन में सराहना करने में कंजूसी न करें और आलोचना से बचकर रहने में ही समझदारी है। ज़िन्दगी का ये हुनर भी आज़माना चाहिए, जंग अगर अपनों से हो तो हार जाना चाहिए!! पसीना उम्र भर का उसकी गोद में सूख जाएगा… हमसफ़र क्या चीज है ये बुढ़ापे में समझ आएगा..!! ******

  • अचूक मंत्र

    अनजान एक महिला एक बस में चढ़ी और एक आदमी के बगल में बैठने के क्रम में उसे अपने बैग से कई बार मार दिया। पुरुष चुप रहा, तो महिला ने उससे पूछा कि जब उसने उसे अपने बैग से मारा तो उसने शिकायत क्यों नहीं की? उस आदमी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "इतनी महत्वहीन बात से परेशान होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि हमारी एक साथ की यात्रा बहुत छोटी है, मैं अगले पड़ाव पर उतर रहा हूँ।” इस जवाब ने महिला को इतना परेशान किया कि उसने उस आदमी से उसे क्षमा करने के लिए प्रार्थना की और सोचा कि इन शब्दों को तो सोने के अक्षरों में लिखा जाना चाहिए। हम में से प्रत्येक को यह समझना चाहिए कि इस दुनिया में हमारा समय इतना कम है कि इसे बेकार तर्कों, ईर्ष्या, दूसरों को क्षमा न करने, असंतोष और बुरे व्यवहार के साथ व्यर्थ करना समय और ऊर्जा की एक हास्यास्पद बर्बादी है। क्या किसी ने आपका दिल तोड़ा? शांत रहो। यात्रा बहुत छोटी है। क्या किसी ने आपको धोखा दिया, धमकाया या अपमानित किया? आराम करें, तनावग्रस्त न हों, यात्रा बहुत छोटी है। क्या किसी ने बिना वजह आपका अपमान किया? शांत रहो, इसे नजरअंदाज करो, यात्रा बहुत छोटी है। क्या किसी ने ऐसी टिप्पणी की जो आपको पसंद नहीं आई। शांत रहें, नज़र अंदाज़ करें, क्षमा करें, उन्हें अपनी प्रार्थनाओं में रखें और बिना किसी कारण के उन्हें अभी भी प्यार करें, यात्रा बहुत छोटी है। कुछ लोग जो भी समस्याएँ हमारे सामने लाते हैं, वह समस्या तभी होती है जब हम उस पर विचार करें, याद रखें कि हमारी एक साथ यात्रा बहुत छोटी है। हमारी यात्रा कितनी लंबी है यह कोई नहीं जानता। कल किसी ने नहीं देखा। कोई नहीं जानता कि हम अपने पड़ाव पर अचानक कब पहुंच जाएं। हमारी एक साथ यात्रा बहुत छोटी है। आइए हम दोस्तों और परिवार की सराहना करें। उन्हें अच्छे हास्य में रखें। उनका सम्मान करें। आइए हम उनको आदरणीय भाव दें, हम स्वयं दयालु, प्रेममय और क्षमाशील बनें। हम वास्तव में कृतज्ञता और आनंद से भर जाएंगे, आखिरकार हमारी एक साथ यात्रा बहुत छोटी है। हर किसी के साथ अपनी मुस्कान साझा करें। अपना रास्ता चुनें कि आप जितना सुंदर बनना चाहते हैं, उतना ही सुंदर बनें। हमारी यात्रा बहुत छोटी है। *******

  • बरस से बातें

    नमिता गुप्ता “मनसी” जाते हुए बरस से बातें, जो कभी कही नहीं गईं सुअवसर के इंतज़ार में ठिठकी रहीं कहने और न‌ कहने के ठीक बीच के अंतराल पर, अंततः यह गईं अनकही सी!! कविताएं, जो अधूरी रहीं लेती रहीं उबासियां रफ ड्राफ्ट में पड़े पड़े!! किस्से, जो गढ़े नहीं जा सके अस्वीकृत ही रहे कभी सत्यता की कसौटी पर तो कभी भावनाओं की तर्ज़ पर!! होनी, जो होती रही अपने पूरे अनहोनेपन के साथ और उस ‘होने’ को झुठलाते फिरते रहे हम अपनी तमाम उम्र!! प्रेम, जिसे सबसे ज्यादा तलाशा गया, नहीं मिला जब भी मिला वक्त के बाद मिला, हार गया इस बरस भी!! रिक्तियों को भर देता है और अधिक खालीपन से ये बरस भी जाते-जाते छूट रहे हैं, हम भी और अधिक, इस जाते हुए बरस से!! ******

  • ब्रह्मसमाज का त्याग

    मुकेश ‘नादान’ बहुत समय बीतने के बाद नरेंद्र दक्षिणेश्वर नहीं आए। रामकृष्ण उन्हें देखने के लिए व्याकुल हो उठे। रविवार का दिन था, नरेंद्र से मिलने वे शहर की ओर चल दिए। मार्ग में उन्होंने सोचा, “आज रविवार है, नरेंद्र शायद घर पर न मिले, लेकिन शाम को कदाचित्‌ ब्रह्मसमाज की उपासना में भजन गाने जाए।' ऐसा सोचकर रामकृष्ण शाम के समय ब्रह्मसमाज के उपासक भवन में जाकर नरेंद्र को खोजने लगे। आचार्य बेदी पर उन्हें नरेंद्र खड़ा दिखाई दिया। नरेंद्र व्याख्यान दे रहा था। सरल-स्वभावी रामकृष्ण बेदी की ओर बढ़ गए। उपस्थित सज्जनों में से कई ने उन्हें पहचान लिया। उन्हें देखते ही कानाफूसी शुरू हो गई और लोग उचक-'उचककर उन्हें देखने लगे। रामकृष्ण बेदी के निकट पहुँचकर अचानक भावाविष्ट हो गए। उन्हें इस अवस्था में देखने की लोगों में और भी उत्सुकता बढ़ी। उपासना-गृह में गड़बड़ होती देखकर संचालकों ने गैस की बालियाँ बुझा दीं। अँधेरा हो जाने के कारण जनता में मंदिर से निकलने के लिए हड़बड़ी मच गई। नरेंद्र समझ गया था कि रामकृष्ण यहाँ मुझे देखने की लालसा में आए हैं। उसने अँधेरा होते ही उन्हें सँभाल लिया। रामकृष्ण की समाधि भंग हुई, तो वे किसी तरह उन्हें पिछले दरवाजे से बाहर निकाल लाए और गाड़ी में बैठाकर दक्षिणेश्वर पहुँचाया। रामकृष्ण के साथ ब्रह्म सदस्यों की अशिष्टता तथा उनका अभद्र व्यवहार देखकर नरेंद्र को गहरा सदमा पहुँचा। उन्होंने उसी दिन ब्रह्मसमाज को त्याग दिया। *****

  • डिलीवरी वाला

    रमाकांत शुक्ल "उफ्फ...मोबाइल भी गया" मैं मन ही मन बुदबुदाई। मूसलाधार बारिश में रोड पर घुटने तक पानी भर आया। मैं ऑफिस से आज इस कारण लेट भी हो गई। तीन सालों में ऐसा पहली बार हुआ है। पैदल ही सड़क पार करते समय फिसल गई और मोबाइल पानी में भीग कर खराब भी हो गया। ऑटो वाले कहीं दिख नहीं रहे हैं। दूसरे वाले रोड पर पानी कम लगता है। कुछ सोच उस तरफ बढ़ी। शायद उस रोड पर कोई ऑटो रिक्शा मिल जाए। एक तो अंधेरा और उसपर ये बारिश। डर भी लग रहा था। इस रोड को पार कर मैं दूसरी तरफ वाली रोड पर आई ही थी कि तभी चेहरे पर टार्च की रोशनी पड़ी। मैं किसी तरह हिम्मत कर के पास ही रोड किनारे एक शेड में पहुँची। रौशनी की दिशा से कुछ दो-तीन लोग आते दिखे। रात तो कोई ज्यादा नहीं पर इस छोटे शहर के हिसाब से ज्यादा ही है। मां परेशान हो रही होगी। मैंने भगवान को मन ही मन पुकारा। कोई एक ऑटो भेज दें। पर दूर-दूर कोई रिक्शा नज़र नहीं आ रहा था। वे तीनों मेरी ही तरफ बढ़ते आ रहे थे। मेरा गला सूखता गया। अचानक से वे उसी शेड में आकर मेरे आस-पास घेर कर खड़े हो गए। अजीब नज़रों से देखते जा रहे थे। एक दूसरे से भद्दी बातें कर रहे थे और नशे में लग रहे थे। मैं आँख बंद कर भगवान को याद करने लग गई। पर्स में रखा नेलकटर को मैंने कस कर मुठी में पकड़ लिया। तभी दूर से आती एक स्कूटी वहां से गुजर रही थी। कुछ दूर आगे बढ़कर वापस जहां मैं थी वहीं रुकी। स्कूटी देख समझ आया किसी रेस्टुरेंट का डिलीवरी वाला है। "मैडम! ऑटो या कोई रिक्शा वाला अब इस जगह नहीं रुकते, आपको आगे मोड़ पर मिलेंगे..आइये मैं आपको वहां तक छोड़ दूं।" तीनों उसे घूर रहे थे। मुझे और कुछ नहीं सूझा उस वक़्त। मैं जाकर स्कूटी के पीछे बैठ गई। डर अब भी लग रहा था। आगे मोड़ पर भी कोई ऑटो रिक्शा नहीं था। "आपको जाना कहा है?” "जे ब्लॉक...सुभाष नगर... उसने बिना कुछ बोले मुझे मेरे घर तक छोड़ दिया। इस भाई के लिए दिल से दुआएं निकल रही थीं। माँ घबराहट में मेरा बाहर ही इन्तजार कर रही थी। हमें छोड़ वो निकलने लगा। तो माँ ने जाते-जाते उससे पूछ लिया। "तुम कौन हो बेटे?” वो हेलमेट लगा ये कहता हुआ निकल गया। "मैं एक बेटी का बाप हूँ आँटी।” अच्छाई की शुरुआत क्यों ना हम भी खुद से करें, अगर कभी कोई बहन बेटी या माँ सुनसान रास्ते पर दिख जाए तो उसे अवसर ना मानकर जिम्मेदारी समझ कर घर तक सुरक्षित छोङ आए। ******

  • REFUGEE

    Akriti Singh Class IX Allen House Public School, Ghaziabad At dawn came in sinister shadows Suddenly the world went pitch black Not a soul anywhere, for there was an attack, Forced out of our homes Moved into a barren land In the middle of nowhere we now stand. The Sun earlier a friend, turned into a foe Oh, how mighty it was, the Earth surrendered and the wind refused to blow. Walked and walked just to reach a strange looking place Filled with strange creatures looking at us with dismay. Confused, asked mother where we stood In response received a kind smile But the look in her eyes I clearly understood. Days had passed since I last ate Hunger stirring inside of me A native came with bread I was filled with glee She walked away to her house Whilst we were out. Soon struck the realization No land now was ours and we belonged to no land We were to walk a path which no step had trodden black. *****

  • शीत ऋतु

    देवेन्द्र देशज सर-सर पछुआ चल रही, रूप रखी विकराल। सूर्य संग है मित्रता, रातों संग मलाल।। कम्बल से संबल मिला, राहत देती आग। चाहत बढ़ती चाय से, ठंड गई फिर भाग।। बिगड़े और बिगाड़ती, जीवन के सुरताल। इतनी भीषण ठंड में, क्वारे करें मलाल।। पानी से परहेज़ हो, पत्नी से प्यार। लगे रजाई प्रेमिका, पलंग लगे संसार।। तन मन में उमंग भरे, शीतल मन्द समीर। शीत काल में ही प्रिए, बलिष्ठ बने शरीर।। ******

  • इनाम का साझेदार

    दिनेश कुमार गुप्त राजदरबार से सम्मानित होने के कई दिन बाद गोनू झा ने विचार किया कि अब दरबार में भी जाना चाहिए। राजा ने उन्हें अपना प्रमुख सलाहकार नियुक्त किया था। यद्यपि राजा ने प्रसन्न होकर उन्हें यह छूट दे दी थी कि गोनू झा जितने दिन चाहें अपने घर रहें और जब चाहें दरबार में आ जाएं। परंतु साथ ही यह भी कहा था कि राजकीय आवश्यकता पड़ने पर उन्हें अवश्य उपस्थित होना पड़ेगा। गोनू झा ने दरबार जाने का विचार बना लिया और सज-धजकर चल पड़े। उन्हें इतनी प्रसिद्धि तो मिल चुकी थी कि मार्ग में जो भी मिलता वही उन्हें सम्मान देता। सबसे मिलते हुए गोनू झा राजमहल पहुंचे। राजमहल के फाटक पर द्वारपाल खड़ा था। "आइए पंडित जी, आपने तो सारे मिथिला में धूम मचा दी है।" "सब मां काली का आशीर्वाद है भाई।" "दरबार जा रहे हैं?" "हां भई, महाराज के दर्शन करने की इच्छा है" "अच्छी बात है। पर पंडित जी, हमारी भी इच्छा सुन लेते।" "सुनाओ।" "बात यह है कि मैं यहां चौबीस घंटे पहरेदारी करता हूं। मुश्किल बात है फिर भी करता हूं। मेरा कुनबा इतना बड़ा है कि वेतन से गुजारा नहीं हो पाता। इसके लिए मैं आप जैसे सज्जनों का आश्रय लेता हूं। मैं जानता हूं कि आप दरबार से लौटेंगे तो कुछ न कुछ पुरस्कार लेकर ही लौटेंगे। तो अंदर जाने से पूर्व आप वायदा करें कि जो भी पुरस्कार मिले उसमें से कुछ भाग आप मुझे भी दें।" "भाई, यह तो दरबार में जाने की घूस हुई।" गोनू झा मुस्कुराए। "जो भी आप समझें। मेरा कुनबा बड़ा है।" "तो राजा साहब से कहकर वेतन बढवाओ। महाराज बहुत दयालु हैं। वह अपने कर्मचारी का कष्ट सुनकर जरूर द्रवित होंगे।" "उसकी क्या आवश्यकता है प्रभो। मेरा काम तो दरबारियों से चल रहा है। सब अपने पुरस्कार का एक भाग खुशी-खुशी दे जाते हैं।" "और जो तुम्हारा हिस्सा न दे तब क्या करते हो?" "हालांकि ऐसा कभी हुआ नहीं है। हमारे दरबार में ऐसा कोई भी कंजूस नहीं जो इस गरीब की सहायता न करे। फिर भी ऐसा कोई अवसर आया तो मैं भी द्वारपाल हूं। ढेर सारे हथकंडे जानता हूं।" "बात तो तुम्हारी ठीक है भाई। फिर तो तुमसे बनाकर रखनी पड़ेगी। तुम्हें नाराज करने का अर्थ है अपना अहित करना।" गोनू झा ने कहा। "आप तो समझदार हैं। मैं साधारण द्वारपाल भले हूं पर मेरी भी कुछ औकात है महाराज के यहां।" "और भई, घूसखोर तो वैसे भी फंदेबाज होते हैं।" "आप जानते ही हैं।" द्वारपाल हंसा। ठीक है। मुझे यदि दरबार में पुरस्कार मिलता है तो (आज का सारा पुरस्कार) मैं तुम्हें दूंगा। मैं वचन देता हूं।" "जाइए अब। दरबार में इस समय मगध का एक पंडित बैठा है। उससे शास्त्रार्थ कीजिए और ढेर सारा इनाम पाइए।" गोनू झा दरबार में पहुंचे तो सारे दरबारी हर्ष से खड़े हो गए। गोनू झा आ गए। गोनू झा आ गए।" मिथिला नरेश भी हर्षित होकर सिंहासन से उठ खड़े हुए। गोनू झा ने महाराज का अभिवादन किया। "आओ गोनू झा, उचित समय पर आए हो। हम अभी सोच रहे थे कि आज आपकी उपस्थिति अनिवार्य थी। खैर, आसन ग्रहण करें।" गोनू झा ने अपना आसन ग्रहण किया। फिर शास्त्रार्थ शुरू हो गया। मगध का पंडित और मिथिला का एक विद्वान आमने-सामने बैठे थे। "महोदय, जो बिन पैरों के चलता हो, बिन वाणी के बोलता हो, ऐसा पंडित कौन है?" मगध के पंडित ने प्रश्न किया तो मिथिला का पंडित सोच में पड़ गया। ऐसा तो भगवान ही है। पर शंकित थे तो उत्तर न दिया। "निर्धन जो दूध पीता है, वह किस रंग का होता है।" मिथिला का विद्वान चकराया। दूध का तो एक ही रंग होता है। "अंतिम प्रश्न, काजल से भी काला क्या?" विद्वान ने सिर झुका लिया। मगध का पंडित अकड़ गया। "क्या कोई और विद्वान इस दरबार में नहीं है।" वह सगर्व बोला। महाराज ने गोनू झा की तरफ देखा तो वह उठकर मगध के पंडित के सामने जा बैठे। मगध के पंडित ने गोनू झा पर दृष्टिपात किया। वेश-भूषा निपट देहाती थी। सोचा कि यह क्या जानता होगा? "किसान! मगध पंडित ने मुस्कुराकर कहा- "अभी मेरे तीन प्रश्न तुमने सुने ही होंगे। मैं उन्हें पुनः दोहराता हूं। उनके उत्तर दे दो।" प्रश्न दोहराए गए। गोनू झा मुस्कराए। "महोदय! आपका पहला प्रश्न अति सरल है। बिना पैरों के दूर-दूर तक गमन करने वाला और बिना वाणी के भी सब कुछ कह देने वाला पत्र होता है।" गोनू झा ने बताया-"दूसरा प्रश्न भी कठिन नहीं है, गरीब का दूध तो पानी होता है। संसार में कितने ही गरीब हैं जो पानी पीकर भी पहलवानों को पटक देते हैं। उनके दूध का रंग नहीं होता बल्कि उनके दूध में भाव होता है।" दरबार में तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी। "महोदय।" गोनू झा ने आगे कहा-"आपका अंतिम प्रश्न है कि काजल से भी कला क्या होता है। महाराज, काजल से भी काला होता है कलंक। यह ऐसी कालिख है जो मरने के बाद भी इंसान के चरित्र से छूट नहीं सकती। मैंने ठीक कहा न पंडित जी।" मगध का पंडित हतप्रभ रह गया। देहाती ने बाजी मार ली थी। "महोदय, अब मैं एकमात्र प्रश्न पूछूंगा।" गोनू झा ने कहा। "पू....पूछिए।" आप इस समय कौन हैं? "मैं....मैं....मैं मगध का ब्राह्मण हूं। मेरा नाम भोजराज...." "श्रीमंत, क्षमा चाहूंगा। यह मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं है।" गोनू झा विनीत स्वर में बोले-"आप इस समय मिथिला के दरबार में पराजित विद्वान हैं और आज के दिन आपका यही परिचय है।" पंडित को मानना पड़ा कि देहाती उचित ही कह रहा था। "वाह। वाह गोनू झा, वाह!" मिथिला नरेश ने कहा- "तुम विद्वानों के विद्वान हो। समय का जैसा विश्लेषण तुम करते हो, वह किसी परम विद्वान द्वारा ही सम्भव है। हम बहुत प्रसन्न हुए। आज हम पुरस्कार में तुम्हें वह वस्तु देंगे जो तुम्हारी इच्छा होगी। मांग लो। आज भले ही मिथिला का सिंहासन मांग लो। हमें जरा भी संकोच नहीं होगा।" गोनू झा ने हाथ जोड़कर राजा का अभिनंदन किया। "मांगो गोनू झा क्या मांगना है?" मिथिला नरेश ने कहा। "महाराज, आपकी दया के अतिरिक्त और क्या मांगू। आपने मुझे इतना सम्मान दिया है कि मैं धन्य हो गया।" गोनू झा बोले। "सम्मान व्यक्ति को उसकी योग्यता और उसका उचित प्रदर्शन दिलाता है। आप विद्वान हैं और निश्चित ही सम्मान के योग्य है। पुरस्कार तो सम्मान का निमित्त है, साधन है। अतः आप हमें यह अवसर प्रदान करें।" "महाराज, आज मैं पुरस्कार में एक विचित्र चीज मांगना चाहता हूं।" "निश्चिंत होकर मांगो । हम वचन देते हैं कि यदि वह विचित्र चीज मिथिला राज्य के किसी भी कोने में है तो हम वह चीज आपको देंगे।" "ठीक है महाराज। मैं आज पुरस्कार में सौ कोड़े चाहता हूं।" सारा दरबार भौंचक्का रह गया। "पंडितजी, यह कैसा पुरस्कार मांग बैठे!" राजा हैरानी से बोला। "मैंने कहा था कि मैं आज विचित्र चीज मांगने जा रहा हूं। अतः अपने वचन के अनुसार मुझे यह पुरस्कार दें महाराज।" महाराज ने विवशता से गर्दन हिलाई और दंडनायक को आदेश दिया कि गोनू झा को सौ कोड़े लगाए। सारा दरबार गोनू झा के इस विचित्र कौतुक पर हत् प्रभ था। क्या मूर्खता दिखाई गोनू झा ने। दंड्नायक अपना कोड़ा लेकर गोनू झा के समीप आ गया। "महाराज, कृपा करके राजमहल के फाटक पर खड़े द्वारपाल को बुलाया जाए। क्योंकि मैं उसे वचन देकर आया हूं कि दरबार में आज जो भी पुरस्कार मुझे प्राप्त होगा वह सारा मैं उसे दूंगा। आज मेरे द्वारा प्राप्त सौ कोड़ो के पुरस्कार का वही अधिकारी है। मेरे पुरस्कार में साझीदार है।" हम....हम समझे नहीं गोनू झा।'महाराज ने पूछा। "महाराज किसी भी राज्य की उन्नति को निष्कंटक और सुचारु रखने में राज्य के सुरक्षा कर्मियो का योगदान अधिक होता है। यदि सुरक्षा तंत्र भ्रष्ट हो जाता है तो प्रगति प्रभावित होती है। हमारे राजमहल का प्रहरी इसी मार्ग का राही हैं। वह प्रत्येक दरबारी को भय दिखाकर दरबार में प्राप्त पुरस्कार का कुछ हिस्सा ले लेता है।" गोनू झा ने बताया। महाराज क्रोध में भर उठे। "क्या यह सत्य है?" राजा ने दरबारियों से पूछा। कई दरबारियों के सिर सहमति में हिले। 'उस द्वारपाल को तत्काल दरबार में बुलाया जाए।" महाराज ने आदेश दिया। "महाराज, मैं चाहता हूं कि पहले मेरे वचन के अनुसार मेरे पुरस्कार को उसे दे दिया जाए। एक प्रकार से यह उसका दंड भी होगा।" तब तक द्वारपाल भी दरबार में आ गया। "आओ प्रहरी, आज गोनू झा ने मगध के विद्वान को शास्त्रार्थ में पराजित करके जो पुरस्कार पाया है, वह तुम्हारा है। आओ अपना पुरस्कार प्राप्त करो।" द्वारपाल थर-थर कांप उठा। उसने कातर दृष्टि से गोनू झा को देखा। "भाई, इस प्रकार क्या देखते हो। आज पुरस्कार में मुझे सौ कोड़े मिले हैं। वचन के अनुसार सारा पुरस्कार तुम्हारा है।" गोनू झा बोले। द्वारपाल दौड़कर गोनू झा के पैरों में गिर पड़ा। "क्षमा पंडित जी, क्षमा! मैं मूर्ख भूल गया था कि मैं किससे पंगा ले रहा हूं। भविष्य में मैं कभी ऐसा अपराध न करूंगा।' "भाई, यहां क्षमा और दंड का अधिकार महाराज को है। मैंने तो जो वचन दिया था मात्र उसे निभा रहा हूं। "गोनू झा ने कहा। द्वारपाल रो-रोकर महाराज से क्षमा मांगने लगा। "प्रहरी, तुम्हारा अपराध क्षमा योग्य नहीं है। तुम हमारे राज्य में भ्रष्टाचार का बीज बोने का कुचक्र रच रहे थे। दंड्नायक, इस अपराधी को इसका पुरस्कार देकर राज्य से बाहर कर दिया जाए..." "और इसके परिवार के भरण-पोषण का भार राजकोष उठाए।" गोनू झा ने तत्काल जोड़ा, जिसे मिथिला नरेश ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। द्वारपाल को उसके किए का दंड मिल गया। "गोनू झा, वास्तव में ही तुम बुद्धिमान और कर्त्तव्यनिष्ठ हो। तुमने अपने पद के अनुसार अपना कर्त्तव्य निभाया है। राज्य को एक आगामी संकट से बचाया है। तुम्हारे पास बुद्धि, कर्त्तव्य और दया जैसे सभी गुण हैं। हमें गर्व है कि तुम हमारे प्रमुख सलाहकारों में से एक हो।" इस प्रकार गोनू झा ने दरबार में पहले ही दिन अपनी धाक जमा ली। बड़े ही विनोदपूर्ण तरीके से उन्होंने एक भ्रष्ट द्वारपाल को दंडित कराकर यह संदेश दे दिया था कि वह मात्र विनोदपूर्ण ही नहीं थे बल्कि गम्भीर सलाहकार भी थे। महाराज ने उस दिन भी गोनू झा को ढेर सारा पुरस्कार दिया। ******

  • अदल बदल

    आचार्य चतुरसेन शास्त्री का उपन्यास चैप्टर 1 माया भरी बैठी थी। मास्टर हरप्रसाद ने ज्योंही घर में कदम रखा, उसने विषदृष्टि से पति को देखकर तीखे स्वर में कहा – ‘यह अब तुम्हारे आने का समय हुआ है? इतना कह दिया था कि आज मेरा जन्मदिन है, चार मिलने वालियाँ आयेंगी, बहुत कुछ बंदोबस्त करना है, ज़रा जल्दी आना। सो, उल्टे आज शाम ही कर दी।’ ‘पर लाचारी थी प्रभा की माँ, देर हो ही गई!’ ‘कैसे हो गई? मैं कहती हूँ, तुम मुझसे इतना जलते क्यों हो? इस तरह मन में आंठ-गांठ रखने से फ़ायदा? साफ क्यों नहीं कह देते कि तुम्हें मैं फूटी आँखों भी नहीं सुहाती!’ ‘यह बात नहीं है प्रभा की माँ, तनख्वाह मिलने में देर हो गई। एक तो आज इंस्पेक्टर स्कूल में आ गए, दूसरे आज फीस का हिसाब चुकाना था, तीसरे कुछ ऑफिस का काम भी हैडमास्टर साहब ने बता दिया, सो करना पड़ा। फिर आज तनख्वाह मिलने का दिन नहीं था, कहने-सुनने से हैडमास्टर ने बंदोबस्त किया।’ ‘सो उन्होंने बड़ा अहसान किया। बात करनी भी तुमसे आफ़त है। मैं पूछती हूँ कि देर क्यों कर दी? आप लगे आल्हा गाने। देखूं, रुपये कहाँ हैं? मास्टर साहब ने कोट अभी-अभी खूटी पर टांगा ही था, उसके जेब से पर्स निकालकर आंगन में उलट दिया। दस-दस रुपये के चार नोट जमीन पर फैल गए। उन्हें एक-एक गिनकर माया ने नाक-भौं चढ़ाकर कहा – ‘चालीस ही हैं, बस?’ ‘चालीस ही पाता हूँ, ज्यादा कहाँ से मिलते?’ ‘अब इन चालीस में क्या करूं? ओढूं या बिचाऊं? कहती हूँ, छोड़ दो इस मास्टरी की नौकरी को, छदाम भी तो कार की आमदनी नहीं है। तुम्हारे ही मिलने वाले तो हैं वे बाबू तोताराम, रेल में बाबू हो गए हैं। हर वक्त घर भरा-पूरा रहता है। घी में घी, चीनी में चीनी, कपड़ा-लत्ता, और दफ्तर के दस बुली चपरासी, हाजिरी भुगताते हैं वह जुदा। वे क्या तुमसे ज्यादा पढ़े हैं? क्यों नहीं रेल-बाबू हो जाते?’ ‘वे सब तो गोदाम से माल चुराकर लाते हैं प्रभा की माँ। मुझसे तो चोरी हो नहीं सकती। तनख्वाह जो मिलती है, उसी में गुजर-बसर करनी होगी। ‘करनी होगी, तुमने तो कह दिया। पर इस महंगाई के जमाने में कैसे? ‘इससे भी कम में गुज़र करते हैं लोग प्रभा की माँ।’ ‘वे होंगे कमीन, नीच। मैं ऐसे छोटे घर की बेटी नहीं हूँ।’ ‘पर अपनी औकात के मुताबिक ही तो सबको अपनी गुजर-बसर करनी चाहिए। इसमें छोटे-बड़े घर की क्या बात है? अमीर आदमी ही बड़े आदमी नहीं होते, प्रभा की माँ।’ ‘ना, बड़े आदमी तो तुम हो, जो अपनी जोरू को रोटी-कपड़ा भी नहीं जुटा सकते। फिर तुम्हें ऐसी ही किसी कछारिन-महरिन से ब्याह करना चाहिए था। तुम्हारे घर का धंधा भी करती, इधर-उधर चौका-बरतन करके कुछ कमा भी लाती। बी०ए०, एम०ए० होते, तो वह भी बी०ए०, एम०ए० आ जाती और दोनों ही बाहर मजे करते। क्या ज़रूरत थी, गृहस्थ बसाने की?’ मास्टर साहब चुप हो गए। वे पत्नी से विवाद करना नहीं चाहते थे। कुछ ठहरकर उन्होंने कहा – ‘जाने दो प्रभा की माँ, आज झगड़ा मत करो।’ वे थकित भाव से उठे, अपने हाथ से एक गिलास पानी उड़ेला और पीकर चुपचाप कोट पहनने लगे। वे जानते थे कि आज चाय नहीं मिलेगी। उन्हें ट्यूशन पर जाना था। माया ने कहा – ‘जल्दी आना, और टयूशन के रुपये भी लेते आना।’ मास्टरजी ने विवाद नहीं बढ़ाया। उन्होंने धीरे से कहा – ‘अच्छा!’ और घर से बाहर हो गए।‘ बहुत रात बीते जब वे घर लौटे, तो घर में खूब चहल-पहल हो रही थी। माया की सखी-सहेलियाँ सजी-धजी गा-बजा रही थीं। अभी उनका खाना-पीना नहीं हुआ था। माया ने बहुत-सा सामान बाजार से मंगा लिया था। पूड़ियाँ तली जा रही थीं और घी की सौंधी महक घर में फैल रही थी। पति के लोट आने पर माया ने ध्यान नहीं दिया। वह अपनी सहेलियों की आवभगत में लगी रही। मास्टर साहब बहुत देर तक अपने कमरे में पलंग पर बैठे माया के आने और भोजन करने की प्रतीक्षा करते रहे, और न जाने कब सो गए। प्रातः जागने पर माया ने पति से पूछा – ‘रात को भूखे ही सो रहे तुम, खाना नही खाया?’ ‘कहाँ, तुम काम में लगी थीं, मुझे पड़ते ही नींद आई, तो फिर आँख ही नहीं खुली।’ ‘मैं तो पहले ही जानती थी कि बिना इस दासी के लाए तुम खा नहीं सकते। रोज ही चाकरी बजाती हूँ। एक दिन मैं तनिक अपनी मिलने वालियों में फंस गई तो रूठकर भूखे ही सो रहे। सो एक बार नहीं सौ बार सो रहो, यहाँ किसी की धौंस नहीं सहने वाले हैं।’ ‘नहीं प्रभा की माँ, इसमें धौंस की क्या बात है? मुझे नींद आ ही गई।’ ‘आ गई तो अच्छा हुआ, अब महीने के खर्च का क्या होगा?’ ‘ट्यूशन ही के बीस रुपये जेब में पड़े हैं, उन्हीं में काम चलाना होगा।’ ‘ट्यूशन के बीस रुपये? वे तो रात काम में आ गए। मैंने ले लिए थे। ‘वे भी खर्च कर दिए?’ ‘बड़ा कसूर किया, अभी फांसी चढ़ा दो।’ ‘नहीं, नहीं, प्रभा की माँ, मेरा ख़याल था, चालीस रुपयों में तुम काम चला लोगी, बीस बच रहेंगे। इससे दब-भींचकर महीना कट जायेगा।’ ‘यह तो रोज का रोना है। तकदीर की बात है, यह घर मेरी ही फूटी तकदीर में लिखा था। पर क्या किया जाए, अपनी लाज तो ढकनी ही पड़ती है। लाख भूखे-नंगे हों, परायों के सामने तो नहीं रह सकते। वे सब बड़े घर की बहू-बेटियाँ थीं, कोई खटीक-चमारिन तो थी ही नहीं। फिर साठ-पचास रुपये की औकात ही क्या है?’ मास्टर साहब चिंता से सिर खुजलाने लगे। उन्हें कोई जवाब नहीं सूझा। महीने का खर्च चलेगा कैसे, यही चिंता उन्हें सता रही थी। अभी दूध वाला आएगा, धोबी आएगा। वे इस माह में जूता पहनना चाहते थे, बिल्कुल काम लायक न रह गया था। परन्तु अब जूता तो एक ओर रहा, अन्य आवश्यक खर्च की चिंता सवार हो गई। पति को चुप देखकर माया झटके से उठी। उसने कहा – ‘अब इस बार तो कसूर हो गया भई, पर अब किसीको न बुलाऊंगी। इस अभागे घर में तो पेट के झोले को भर लिया जाए, तो ही बहुत है।’ उसने रात का बासी भोजन लाकर पति के सामने रख दिया।

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