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  • हरकचंद सावला

    हरीश दिवाकर करीब तीस साल का एक युवक मुंबई के प्रसिद्ध टाटा कैंसर अस्पताल के सामने फुटपाथ पर खड़ा था। युवक वहां अस्पताल की सीढिय़ों पर मौत के द्वार पर खड़े मरीजों को बड़े ध्यान दे देख रहा था। जिनके चेहरों पर दर्द और विवषता का भाव स्पष्ट नजर आ रहा था। इन रोगियों के साथ उनके रिश्तेदार भी परेशान थे। थोड़ी देर में ही यह दृष्य युवक को परेशान करने लगा। वहां मौजूद रोगियों में से अधिकांश दूर दराज के गांवों के थे, जिन्हें यह भी नहीं पता था कि क्या करें, किससे मिले? इन लोगों के पास दवा और भोजन के भी पैसे नहीं थे। टाटा कैंसर अस्पताल के सामने का यह दृश्य देख कर वह तीस साल का युवक भारी मन से घर लौट आया। उसने यह ठान लिया कि इनके लिए कुछ करूंगा। कुछ करने की चाह ने उसे रात-दिन सोने नहीं दिया। अंतत: उसे एक रास्ता सूझा.. उस युवक ने अपने होटल को किराये पर देकर कुछ पैसा उठाया। उसने इन पैसों से ठीक टाटा कैंसर अस्पताल के सामने एक भवन लेकर धर्मार्थ कार्य (चेरिटी वर्क) शुरू कर दिया। उसकी यह गतिविधि अब 27 साल पूरे कर चुकी है और नित रोज प्रगति कर रही है। उक्त चेरिटेबिल संस्था कैंसर रोगियों और उनके रिश्तेदारों को निशुल्क भोजन उपलब्ध कराती है। करीब पचास लोगों से शुरू किए गए इस कार्य में संख्या लगातार बढ़ती गई। मरीजों की संख्या बढऩे पर मदद के लिए हाथ भी बढऩे लगे। सर्दी, गर्मी, बरसात हर मौसम को झेलने के बावजूद यह काम नहीं रूका। यह पुनीत काम करने वाले युवक का नाम था हरकचंद सावला। एक काम में सफलता मिलने के बाद हरकचंद सावला ने जरूरतमंदों को निशुल्क दवा की आपूर्ति शुरू कर दी। इसके लिए उन्होंने मैडीसिन बैंक बनाया है, जिसमें तीन डॉक्टर और तीन फार्मासिस्ट स्वैच्छिक सेवा देते हैं। इतना ही नहीं कैंसर पीडि़त बच्चों के लिए खिलौनों का एक बैंक भी खोल दिया गया है। आपको जान कर आश्चर्य होगा कि सावला द्वारा कैंसर पीडि़तों के लिए स्थापित 'जीवन ज्योत ट्रस्ट आज 60 से अधिक प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। 57 साल की उम्र में भी सावला के उत्साह और ऊर्जा 27 साल पहले जैसी ही है। मानवता के लिए उनके योगदान को नमन करने की जरूरत है। यह विडंबना ही है कि आज लोग 20 साल में 200 टेस्ट मैच खेलने वाले सचिन को कुछ शतक और तीस हजार रन बनाने के लिए भगवान के रूप में देखते हैं। जबकि 10 से 12 लाख कैंसर रोगियों को मुफ्त भोजन कराने वाले को कोई जानता तक नहीं। यहां मीडिया की भी भूमिका पर सवाल है, जो सावला जैसे लोगों को नजर अंदाज करती है। यहां यह भी बता दे कि गूगल के पास सावला की एक तस्वीर तक नहीं है। यह हमें समझना होगा कि पंढरपुर, शिरडी में साई मंदिर, तिरुपति बाला जी आदि स्थानों पर लाखों रुपये दान करने से भगवान नहीं मिलेगा। परतुं बीते 27 साल से कैंसर रोगियों और उनके रिश्तेदारों को हरकचंद सावला के रूप में भगवान ही मिल गया है। ******

  • परोपकार की शक्ति

    रूप किशोर श्रीवास्तव एक किसान के घर में एक चूहा, एक साँप, एक कबूतर और एक बकरा रहते थे। वे आपस में बहुत अच्छे दोस्त थे। एक दिन किसान चूहे से परेशान होकर एक चूहेदानी ले आया। चूहे ने जब देखा कि उसको पकड़ने के लिए यह चूहेदानी आई है तो वह डर गया। जब डर होता है तो अपने व्यथा व्यक्ति दूसरों को जरूर बताता है शायद कुछ मदद मिल सके। चूहे ने भी वही किया और अपने तीनों दोस्तों साँप, कबूतर और बकरे को बताया। उन लोगों ने उसकी बात पर कोई गौर इसलिए नहीं किया कि चूहेदानी से उनको क्या खतरा। लेकिन चूहा तो परेशान था इसलिए वो घर छोड़ कर बाहर भाग गया। रात्रि को किसान ने चूहेदानी का प्रयोग किया और चूहे को पकड़ने के लिए रोटी का टुकड़ा लगाया। चूहा तो पहले ही भाग गया था। सुबह साँप ने सोंचा चूहा तो फंस गया होगा चलो देखते हैं। चूहेदानी तो खाली थी और देखने के चक्कर में साँप उंसमें फंस गया। जब किसान की पत्नी ने चूहेदानी उठाई और बाहर ले जाकर खोला तो साँप निकल पड़ा और उसने किसान की पत्नी को काट लिया। यह देखकर तुरंत किसान ने साँप को मार दिया। साँप के काटने से किसान की पत्नी के शरीर में जहर फैलने लगा। तुरंत वैध को बुलाया गया। वैध ने औषधि के साथ शरीर में गर्मी पंहुचने के लिए कबूतर के रक्त की व्यवस्था करने को कहा। किसान ने जल्दी से कबूतर को मार दिया और उसका रक्त पत्नी को पिलाया। काफी इलाज़ के बाद वो ठीक न हो सकी और उसका देहांत हो गया। देहांत के बाद गाँव में खाना किया गया। भोजन के व्यवस्था के लिए बकरे को काट दिया गया। जब चूहा वापस आया तो कोई भी उसका मित्र नहीं था। अपने लिए कोई खतरा न समझते हुए यदि वो मित्र अपने दोस्त की सहायता करते तो शायद सब बच जाते। लेकिन स्वार्थवश उन्होने ऐसा नहीं किया। इस प्रकार उन्होंने परोपकार की शक्ति को ना पहचाना और अपने जीवन का अंत कर लिया। ******

  • पड़ोसन

    रवीन्द्रनाथ ठाकुर मेरी पड़ोसिन बाल-विधवा है। मानो वह जाड़ों की ओस, भीगी पतझड़ी हरसिंगार हो। सुहागरात की फूलों की सेज के लिए नहीं, वह केवल देवपूजा के लिए समर्पित थी। मैं उसकी पूजा मन-ही-मन किया करता था। उसके प्रति मेरा मनोभाव कैसा था, उसे मैं पूजा के अतिरिक्त किसी अन्य सुबोध शब्दों में प्रकट नहीं करना चाहता, दूसरों के सामने कभी नहीं, अपने प्रति भी नहीं। नवीन माधव मेरा बहुत ही घनिष्ठ एवं प्रिय मित्र है। उसे भी इस बारे में कुछ नहीं मालूम। इस प्रकार मैंने अपने अन्तरतम में जिस आवेश को छुपाकर साफ-सुथरा बना रखा था, उसके लिए भीतर-ही-भीतर गर्व का अनुभव भी करता था। परन्तु पहाड़ी नदी की तरह मन का वेग अपने जन्म-शिखर से बंधा नहीं रहना चाहता। किसी भी रास्ते को अपनाकर वह बाहर निकलने की कोशिश करता है। इसमें अगर वह सफल नहीं हो पाता, तो भीत-ही-भीतर कसक उत्पन्न करता है। इसलिए मैं यह सोच रहा था कि कविता में मैं अपने भाव प्रकट करूंगा, लेकिन कुंठा की मारी लेखनी ने किसी तरह भी आगे बढ़ना ना चाहा। बड़े आश्चर्य का विषय तो यह है कि ठीक इसी समय हमारे मित्र नवीन माधव को अचानक बड़े ही प्रबल वेग से कविता लिखने का शौक बढ़ने लगा, मानो अचानक भूचाल आ गया हो। उस बेचारे पर ऐसी दैवी विपत्ति पहले कभी न आई थी, इस कारण वह इस नई-नवेली हलचल के लिए बिल्कुल तैयार न था। उसके पास छंद, तुक आदि की पूंजी नहीं थी, फिर भी उसका दिल छोटा न हुआ, यह देखकर मैं दंग रह गया। कविता मानो बुढ़ापे की नई दुल्हन की तरह उस पर हावी हो गई। नवीन माधव को छंद तुक आदि की सहायता और संशोधन के लिए मेरी शरण लेनी पड़ी। कविता के बिषय नये नहीं थे, लेकिन पुराने भी नहीं थे। यानी उन्हें बिल्कुल नवीन भी कहा जा सकता है और काफी पुरातन भी। प्रेम की कवितायें थी, प्रियतमा के उद्देश्य में। मैंने उसे एक धक्का लगाते हुए पूछा, ”आखिर है कौन, बताओ भी।” नवीन ने हँसकर कहा, ”अब भी उनका पता नहीं लगा पाया हूँ।” नये लेखक को सहयोग देने में मुझे बड़ा संतोष मिला। नवीन की काल्पनिक प्रियतमा के प्रति मैंने अपने रूके आवेग का प्रयोग किया। बिना बच्चे की मुर्गी जिस तरह बत्तख का अंडा पा जाने पर भी उसे छाती के नीचे रखकर सेने लगती है, मैं अभागा भी उसी तरह नवीन माधव के भावों को अपने ह्रदय का सारा ताप देकर सेने लगा। अनाड़ी की रचनाओ का मैं ऐसे जोश-खरोश से संशोधन करने लगा कि वे करीब-करीब पंद्रह आने मेरी ही रचनायें बन गईं। नवीन आश्चर्य से कहता, ”ठीक यही बात तो मैं कहना चाहता था, पर कह नहीं पाता था, लेकिन तुममें यह सब भाव कहाँ से आ जाती है?” मैं भी कवि की तरह जवाब देता, “कल्पना से। इसका कारण यह है कि सत्य नीरव होता है और कल्पना वाचाल। सत्य घटनायें भाव स्त्रोत को पत्थर की तरह दबाये रखती हैं, कल्पना ही उसका मार्ग मुक्त करती है।” नवीन गंभीर चेहरा लिए कुछ देर सोचता, फिर कहता, ”देख रहा हूँ बात कुछ ऐसी ही है। ठीक कहते हो।” थोड़ी देर सोचने के बाद फिर कहा, ”ठीक ही कहते हो। सही बात है।” पहले ही बता चुका हूँ कि मेरे प्रेम में एक प्रकार का कातर संकोच है, इसीलिए मैं अपनी बात कुछ भी लिख नहीं सका। नवीन को पर्दे की तरह बीच में रखने के बाद ही मेरी लेखनी अपना मुँह खोल सकी। रचनायें मानो रस से पूर्ण हो ताप से फटने लगी। नवीन बोला, ”यह तो तुम्हारी ही रचना है। इसे तुम्हारे ही नाम से प्रकाशित करें।” मैंने कहा, ”भाई तुमने भी खूब कहा। मूल रचना तो तुम्हारी ही है, मैंने तो उसमें सिर्फ थोड़ा-सा रद्दोबदल कर दिया है।” धीरे-धीरे नवीन भी ऐसा ही समझने लगा। ज्योतिर्विद जिस प्रकार नक्षत्र के उदय की प्रतीक्षा में आकाश की ओर निहारा करता है, मैं भी उसी तरह कभी-कभी अपने बगल के मकान की खिड़की की ओर देखा करता था, इस बात को अस्वीकार नहीं कर सकता। कभी-कभी भक्त का वह बेचैनी से देखना सार्थक भी हो जाता। उस कर्मयोग में डूबी ब्रह्मचारिणी की सौम्य मुखश्री से शान्त शीतल ज्योति झिलमिलाकर क्षण भर में मेरे मन की सारी बेचैनी दूर कर देती थी। किन्तु उस दिन सहसा मैंने यह क्या देखा! मेरे चन्द्रलोक में क्या अब भी ज्वालामुखी जाग रहा है, वहाँ की सुनसान समाधि में डूबी पहाड़ी गुफा सा सारा अग्निदाह क्या अभी तरह पूरी तरह बुझा नहीं है? उस दिन वैशाख के तिपहर को पूर्वोतर दिशा में बादल घिर रहे थे। उस घिरी हुई आंधी की बादलों-भरी तेज चमक में मेरी पड़ोसन खिड़की के पास अकेली खड़ी थी। उस दिन उसकी शून्य डूबी घनी काली आँखों में मैंने दूर तक फैली हुई एक कसक देखी। तो, मेरे उस चन्द्रलोक में अब भी ताप है। अब भी वहाँ गर्म सांसो की हवा बहती है। वह देवताओं के लिए नहीं, मनुष्य के लिए ही है। उस दिन उस आंधी के प्रकाश में उसकी दोनो आँखों की तेज छटपटाहट उतावले पक्षी की तरह उड़ी चली जा रही थी, स्वर्ग की ओर नहीं, मानव-ह्रदय के घोसले की ओर। उत्सुक आकांक्षा से चमकती उस दृष्टि को देखने के बाद मेरे लिए अपने बेचैन मन को काबू करना मुश्किल हो गया। तब केवल दूसरे की कच्ची अनगढ़ कविताओं के संसोधन से मन नहीं भरा, मेरे अंदर भी किसी प्रकार का काम करने की चंचलता पैदा हो गई। तब मैंने यह निश्चय कर लिया कि बंगाल में भी विधवा-विवाह प्रचलित करने के लिए मैं अपनी सारी चेष्टा का प्रयोग करूंगा। केवल व्याखायान और लेख लिखकर नहीं, आर्थिक सहायता देने के लिए भी मैं आगे बढ़ा। नवीन मेरे साथ बहस करने लगा। उसने कहा, ”चिर वैधव्य में एक पवित्र शांति है, एकादशी की धुंधली चांदनी से प्रकाशित समाधि, भूमि की तरह उसमें एक महान सौंदर्य है। क्या वह विवाह की संभावना मात्र से नष्ट नहीं हो जाएगा?” ऐसे कवित्व की बातें सुनते ही मुझे गुस्सा आ जाता है। अकाल में खाने के अभाव में जो व्यक्ति घुल-घुलकर मर रहा हो, उसके पास हट्टा-कट्टा कोई व्यक्ति आकर यदि भोजन की भौतिकता के प्रति घृणा प्रकट करते हुए फूल की सुगंध और पक्षियों के गीत से मरते हुए का पेट भरना चाहे, तो वह कैसा लगता है? मैंने गुस्से में आकर कहा, ”सुनो नवीन, कलाकार कहते हैं कि खंडहर का भी एक सौंदर्य होता है, लेकिन किसी घर को सिर्फ चित्र के रूप में देखने से ही काम नहीं चलता चूंकि उस घर में रहना पड़ता है। कलाकार कुछ भी कहता रहे, उस घर की मरम्मत जरूरी है। वैधव्य के बारे में, दूर बैठकर तुम चाहे कितनी कवितायें लिखना चाहो, किन्तु यह तुम्हें याद रखना चाहिए कि उसमें आकांक्षाओं से भरा एक मानव-ह्रदय अपनी विचत्र वेदना के साथ वास करता है।” मेरा ख़याल था कि नवीन को मैं किसी भी तरह अपने दल में नहीं खींच सकूंगा, इसीलिए मैं उस दिन ज्यादा गर्मी से बातें कर रहा था, लेकिन सहसा मैंने देखा कि मेरे भाषण के अंत में उसने एक गहरी सांस ली और मेरी सारी बातें मान लीं। मुझे और भी बहुत-सी अच्छी-अच्छी बातें करनी थीं, पर उसने उसका मौका ही नहीं दिया। लगभग हफ्ते भर के बाद नवीन ने आकर कहा, “तुम अगर मदद करो, तो मैं खुद विधवा-विवाह करने को तैयार हूँ।” मेरी समझ में एक बात आ गई कि उसकी प्रियतमा काल्पनिक नहीं है। कुछ अरसे से वह एक विधवा नारी को दूर से प्यार करता रहा है, पर किसी से उसने यह प्रकट नहीं किया। जिस मासिक पत्र में नवीन की, उर्फ मेरी कवितायें प्रकाशित होती थीं, वे पत्रिकायें ठीक जगह पर पहुँच जाया करती थीं। वे कवितायें व्यर्थ नहीं गईं। बिना मेल-मुलाकात के ही ह्रदय आकर्षित करने का यह उपाय मेरे मित्र ने ढूंढ़ निकाला था। लेकिन नवीन का कहना है कि उसने कोई षडयंत्र कर ऐसी तरकीब निकाली हो, सो बात नहीं। यहाँ तक कि उसका खयाल था कि वह विधवा पढ़ना भी नहीं जानती थी। मासिक पत्रिका बिना मूल्य विधवा के भाई के मांग पर भिजवा देता था। वह केवल मन को तसल्ली-भर देने का पागलपन था। उसे ऐसा लगता था कि देवता के लिए पुष्पांजलि चढ़ाई जा रही है। वे जानें या न जानें, स्वीकार करें या न स्वीकार करें। कई बहानों के जरिये विधवा के भाई से नवीन ने मित्रता कर ली थी। नवीन का कहना है कि इसमें भी उसका कोई उद्देश्य न था। जिससे प्रेम किया जाए, उसके निकट-संबंधियों का संग भी मधुर लगता है। अंत में भाई सख्त बीमार पड़ा, तो इस सिलसिले में बहिन के साथ उसकी भेंट कैसे हुई, वह एक लंबी कथा है। कवि के साथ कविता में वर्णित विषय का प्रत्यक्ष परिचय हो जाने के बाद कविता के संबंध में दोनों में बड़ी चर्चा हो चुकी थी और यह चर्चा छपी कविताओं में ही सीमित थी, ऐसा नहीं कहा जा सकता। `हाल में मुझसे बहस में हारकर नवीन ने उस विधवा से मिलकर विवाह का प्रस्ताव किया। पहले-पहल उसे किसी प्रकार स्वीकृति न मिली। तब नवीन ने मेरी सारी युक्तियों का प्रयोग कर और उनके साथ अपनी आँखों के दो-चार बूंद आँसू मिलाकर उसे संपूर्ण रूप से हरा दिया। अब सब कुछ तय है, केवल विधवा के अभिभावक यानी उसके फूफा कुछ रूपया चाहते हैं। मैंने कहा, ”अभी लो।” नवीन बोला, ”इसके अलावा एक बात और है। शादी के बाद पिता जी पांच-छ: महीने तक ज़रूर खर्चा देना बंदकर देंगे और तब तक दोनों का खर्च निभाने के लिए तुम्हें इंतज़ाम करना होगा।” मैंने मुँह से कुछ न कहकर एक चेक काट दिया और कहा, ”अब उसका नाम बताओ। मेरे साथ जब तुम्हारी कोई प्रतियोगिता नहीं, तो परिचय देने में तुम्हें किस बात का डर है? मैं तूम्हें छूकर सौगंध खाता हूँ कि उनके नाम कोई कविता नहीं लिखूंगा और अगर लिखूं भी, तो उनके भाई के पास न भेजकर तुम्हारे पास भेज दिया करूंगा।” नवीन ने कहा, “अरे इसके लिए मुझे कोई डर नहीं। विधवा-विवाह की लाज से वह गड़ी जा रही है, इसलिए उसने तुम लोगों से इस बारे में कोई चर्चा करने को बार-बार मना कर दिया है, पर अब छिपाना बेकार है। वह तुम्हारी ही पड़ोसिन है, उन्नीस नंबर में रहती है।” अगर मेरा ह्रदयपिंड लोहे का बायलर होता, तो उसी क्षण भक-से फट जाता, मैंनेू पूछा, ”विधवा-विवाह से उसे कोई एतराज नहीं है?” नवीन ने हँसकर कहा, ”फिलहाल तो कोई एतराज नहीं है।” मैंने पूछा, ”सिर्फ कवितायें पढ़कर ही वह मुग्ध हो गई?” नवीन ने कहा, ”क्यों मेरी वे कवितायें कुछ बुरी तो थी नहीं?” मैंने मन-ही-मन कहा, ‘धिक्कार है!’ धिक्कार किसे? उन्हें, या मुझे या विधाता को, लेकिन धिक्कार है! ******

  • मोहताज

    आरती शुक्ला "पम्मी कोचिंग चली गई क्या? रमेश जी ने घर में कदम रखते ही सवाल किया। हां, गई अपने भाई के साथ। मटर के दाने निकालती बड़ी बहन ने भाई को अनमने ढंग से जवाब दिया। "चलो ठीक है” जूते उतारते हुए रमेश जी ने राहत की सांस ली। "आप आ गए”, भीतर के कमरे से बाहर आई पत्नी ने आश्चर्य से पूछा। "हां, दुकान स्टाफ पर छोड़ उसे कोचिंग पहुंचाने के लिए ही मैं भाग कर आया। "अच्छा अब आ गए हैं, तो नाश्ता कर के ही जाईएगा। "हां, ठीक है, दे देना।” "अरे दीदी, थोडा हाथ तेज भी चला लिया करो।” रमेश जी के सामने ही उनकी पत्नी अपनी बड़ी ननद को नसीहत दे रसोई में जाते वक्त मुंह बनाते हुए बोली। "रमेश, पम्मी एक दिन कोचिंग नही जाएगी तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा। जो तू ऐसे भागा चला आया।” बड़ी बहन ने भाई की फिक्र जताई। "दीदी, तुम समझती नहीं हो। "छोटे, एक बात पूछूं। "हम्म, मटर के कुछ दाने मुंह में डालते हुए रमेश जी ने हुंकारी भरी। "तुझे अपनी बेटी से नौकरी करवानी है क्या?” "नहीं दीदी, बस कोशिश कर उसे इतनी शिक्षा दिला देनी है कि भविष्य में कभी कोई विपत्ति आने पर उसे दो वक्त की रोटी और तन ढकने के कपड़ों के लिए किसी का "मोहताज" न रहना पड़े। बड़ी बहन छोटे भाई के सामने निरुत्तर थी। अपने छोटे भाई पर आश्रित विधवा बहन ने भाई की आंखों में तैरते दर्द को देख लिया था। और शायद भाभी के ताने और भाई के घर की शांति बनाए रखने के लिए गूंगा-बहरा होना याद हो आया था। ******

  • सास और बहु

    आनंदी त्रिपाठी 'बहू कहां मर गई? अंदर से आवाज- जिंदा हूं माँ जी। तो फिर मेरी चाय क्यों अभी तक नहीं आई, कब से पूजा करके बैठी हूं। ला रही हूं माँ जी, बहू चाय के साथ, भजिया भी ले आयी, सास ने कहा तेल का खिलाकर क्या मरोगी? बहू ने कहा- ठीक हैं माँ जी वापस ले जाती हूं। सास ने कहा- रहने दे अब बना दिया हैं तो खा लेती हूं। सास ने भजिया उठाई और कहा- कितनी गंदी भजिया बनाई हैं तुमने। बहू- माँ जी मुझे कपड़े धोने हैं मैं जाती हूं। बहू दरवाजे के पास छिपकर खड़ी हो गयी। सास भजिया पर टूट पड़ी और पूरी भजिया खत्म कर दी। बहू मुस्कुराई और काम पर लग गई। दोपहर के खाने का वक्त हुआ। सास ने फिर आवाज लगाई- कुछ खाने को मिलेगा। बहू ने आवाज नहीं दी। सास फिर चिल्लाई- भूखे मारोगी क्या, बहू आयी सामने खिचड़ी रख दी। सास गुस्से से- ये क्या है, मुझे इसे नहीं खाना इसे। ले जाओ। बहू ने कहा- आपको डॉक्टर ने दिन में खिचड़ी खाने को कहा है, खाना तो पड़ेगा ही। सास मुंह बनाते हुए, हाँ तू मेरी माँ बन जा, बहू फिर मुस्कुराई और चली गई। आज इनके घर पूजा थी, बहू सुबह 4 बजे से उठ गयी। पहले स्नान किया, फिर फूल लाई। माला बनाई। रसोई साफ की। पकवान और भोज बनाया। सुबह के 10 बज गए। अब सास भी उठ चुकी थी। बहू अब पंडित जी के साथ भगवान के वस्त्र तैयार कर रही थी। आज ऑफिस की छुट्टी भी थी, उनके पति भी घर पर थे। पूजा शुरू हुई, सास चिल्लाती बहू ये नहीं है, वो नही है। बहू दौड़ी-दौड़ी आती और सब करती। अब दोपहर के 3 बज गये थे, आरती की तैयारी चल रही थी, पंडित जी ने सबको आरती के लिए बुलाया और सबके हाथों में थाली दी, जैसे ही बहू ने थाली पकड़ी, थाली हाथों से गिर पड़ी। शायद भोज बनाते हुए बहू के हाथों मे तेल लगा था, जिसे वो पोंछना भूल गयी थी। सारे लोग तरह-तरह की बातें करने लगे। कैसी बहू है, कुछ नहीं आता। एक काम भी ठीक से नहीं कर सकती। ना जाने कैसी बहू उठा लाए। एक आरती की थाली भी संभाल नहीं सकी। उसके पति भी गुस्सा हो गए पर सास चुप रही। कुछ नहीं कहा। बस यही बोल के छोड़ दिया सीख रही है, सब सीख जाएगी धीरे-धीरे। अब सबको खाना परोसा जाने लगा, बहू दौड़-दौड़ के खाना देती, फिर पानी लाती। करीब 70-80 लोग हो गये थे, इधर दो नौकर और बहू अकेली फिर भी वहाँ सारा काम, बहुत ही अच्छे तरीके से करती। अब उसकी सास और कुछ आसपड़ोस के लोग खाने पर बैठे, बहू ने खाना परोसना शुरू किया, सब को खाना दे दिया गया। जैसे ही पहला निवाला सास ने खाया- तुमने नमक ठीक नहीं डाला क्या। एक काम ठीक से नहीं करती। पता नहीं मेरे बाद कैसे ये घर संभालेगी। आस-पड़ोस वालों को तो जानते ही हो ना साहब। वो बस बहाना ढूंढते हैं नुक्स निकालने का। फिर वो सब शुरू हो गये, ऐसा खाना है, ऐसी बहू है, ये वो वगैरहा-वगैरहा। दिन का खाना हो चुका था, अब बहू बर्तन साफ करने नौकरों के साथ लग गई। रात में जगराता का कार्यक्रम रखा गया था। बहू ने भी एक दो गीत गाने के लिए स्टेज पर चढ़ी। सास जोर से चिल्लाई - मेरी नाक मत कटा देना, गाना नहीं आता तो मत गा, वापस आ जा। बहू मुस्कुराई और गाने लगी। सबने उसके गाने की तारीफ की, पर सास मुंह फूलाते हुए बोली, इससे अच्छा तो मैं गाती थी जवानी में, तुझे तो कुछ भी नहीं आता। बहू मुस्कुराई और चली गई। अब रात का खाना खिलाया जा रहा था। उसके पति के ऑफिस के दोस्त साइड में ही ड्रिंक करने लगे। उसका पति चिल्लाता थोड़ा बर्फ लाओ, तो सास चिल्लाती यहाँ दाल नहीं है, फिर चिल्लाता कोल्ड ड्रिंग नहीं है, पापड़ ले आओ। इधर-उधर आखिरी में उसके पति की शराब गिर पड़ी उसके एक दोस्त पर और बोलत टूट गई। पति गुस्से में दो झापड़ अपनी पत्नी को लगाते हुए कहता है- जाहिल कहीं की। देखकर नहीं कर सकती। तुझे इतना भी काम नहीं आता। सारे लोग देखने लगे। उसकी पत्नी रोते हुए कमरे की तरफ दौड़ी, फिर उसके दोस्तों ने कहा- क्या यार पूरा मूड खराब कर दिया, यहाँ नहीं बुलाया होता, हम कहीं और पार्टी कर लेते। कैसी अनपढ़-गंवार बीवी ला रखी है तूने। उसे तो मेहमानों की इज्जत और काम करना तक नहीं आता, तुमने तो हमारी बेईजती कर दी। अब आस पड़ोस की औरतों को और बहाना मिल गया था। वो कहने लगीं, देखो क्या कर दिया तुम्हारी बहू ने। कोई काम कीं नही है। मैं तो कहती हूं अपने बेटे की दूसरी शादी करा दो, छुटकारा पाओ इस गंवार से। सास उठी और अपने बेटे के पास जाकर उसे थप्पड़ मारा और कहा- अरे नालायक, तुमने मेरी बहू को मारा, तेरी हिम्मत कैसे हुई। तेरी टाँग तोड़ दूंगी, उसके बेटे के दोस्त कुछ कहने ही वाले थे कि उसकी माँ ने घूरते हुए- कहा चुप बिल्कुल चुप। यहाँ दारू पीने आये हो, जबकि पता है आज पूजा है और तुम्हें पार्टी करनी है, कैसे संस्कार दिये हैं तुम्हारे, माता-पिता ने। और किसने मेरी बहू को जाहिल बोला, जरा इधर आओ। चप्पल से मारूंगी अगर मेरी बहू को किसी ने शब्द भी कहा तो। अरे पापी, तूने उस लड़की को बस इसलिए मारा कि तेरी शराब टूट गयी, पापी वो बच्ची सुबह चार बजे से उठी है। घर का सारा काम कर रही है। ना सुबह से नाश्ता किया ना दिन का खाना खाया। फिर भी हंसते हुए सबकी बातें सुनते हुए, ताने सुनते हुए घर के काम में लगी रही। तेरे यार दोस्तों को वो अच्छी नहीं लगी। जूते से मारूंगी तेरे दोस्तों को जो कभी उन्होंने ऐसा कहा। उसके यार दोस्त चुपके से खिसक लिए। अब सास, बहू के कमरे में गयी, और बहू का हाथ पकड़कर बाहर लाई। सबके सामने कहने लगी, किसने कहा था अपनी बहू को घर से निकाल के दूसरी बहू ले आना। जरा सामने आओ। कोई सामने नहीं आया। फिर सास ने कहा, तुम जानते भी क्या हो इस लड़की के बारें में। ये मेरी "माँ" भी है, बेटी भी। माँ इसलिए मुझे गलत काम करने पर डाँटती हैं और बेटी इसलिए, कभी-कभी मेरी दिल की भावनाएं समझ जाती हैं। मेरी दिन-रात सेवा करती है। मेरे हजार ताने सुनती है पर एक शब्द भी गलत नहीं कहती। ना सामने ना पीठ पीछे, और तुम कहते हो, दूसरी बहू ले आऊं। याद है ना छुटकी की दादी, अपनी बहू की करतूत, सास ने गुस्से से पड़ोस की महिला को कहा, अभी पिछले हफ्ते ही तुम्हें मियां-बीवी भूखे छोड़ घूमने चले गये थे। मेरी इसी बहू ने 7 दिनों तक तुम्हारे घर पर खाना-पानी यहाँ तक कि तुम्हारे पैर दबाने जाती थी और तुम इसे जाहिल बोलती हो। जाहिल तो तुम सब हो जो कोयले और हीरे में फर्क नही जानते। अगर आइंदा मेरी बहू के बारे में किसी ने एक लफ्ज भी बोला तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा क्योंकि ये मेरी बहू नहीं, मेरी बेटी है। बहू सिसकियाँ लेते हुये फिर कमरें में चली गई। सास ने एक प्लेट उठायी और भोजन परोसा और बहू के कमरे में खुद ले गयी, सास को भोजन लाते देखा तो बहू ने कहा- अरे माँ जी आप क्या कर रही हों, मैं खुद ले लेती। सास ने प्यार से ताना मारते हुये कहा, डर मत इसमें जहर नही हैं, मार नहीं डालूंगी तुझे। तुझे नई सास चाहिए होगी, पर मुझे अभी भी तू ही मेरे घर की बहू चाहिए बहू ने अपनी सास को रोते हुए गले से लगा लिया। सास भी रो दी पहली बार और कहा- चल खाना खा ले। फिर उसके आंसू पोंछते हुए बोली, अरे तु मेरी बहु नही मेरी बेटी है। *******

  • गुरु-शिष्य का प्रेम

    मुकेश ‘नादान’ एक दिन श्रीरामकृष्ण व्याकुल भाव से मंदिर के प्रंगण में घूम रहे थे और माँ काली से विनती कर रहे थे, “माँ! मैं उसे देखे बिना नहीं रह सकता।” वास्तव में वे नरेंद्र से बहुत प्रेम करते थे। जब भी नरेंद्र उनसे मिलने जाते थे, श्रीरामकृष्ण उनसे पहले भजन सुनते और फिर उन्हें खूब खिलाते-पिलाते। जब काफी दिनों तक नरेंद्र उनसे मिलने नहीं आते थे, तब वे स्वयं शहर जाकर उनसे भेंट करते थे। उन्होंने सुरेंद्रनाथ के घर नरेंद्र से हुई प्रथम भेंट में ही यह परख लिया था कि नरेंद्र एक सत्यनिष्ठ और दृढ़चरित्र युवक है। उसमें लोकनायक बनने की सभी योग्यताएँ हैं। रामकृष्ण किसी को अपना शिष्य बनाने से पूर्व उसे जाँच-परख लेते थे। उनकी अभिलाषा थी कि नरेंद्र युग-कार्य करे। नरेंद्र दृढ़ संस्कारवाला असाधारण युवक था। उनके बाहरी आचरण से रामकृष्ण के शिष्य उन्हें उदडी, हठी, दंभी तथा अनाचारी समझते थे। एक दिन की बात है-केशबचंद्र सेन, विजयकृष्ण गोस्वामी आदि ब्रह्मसमाज के कुछ प्रसिद्ध नेता रामकृष्ण के पास बैठे थे। नरेंद्र भी वहाँ पर मौजूद थे। कुछ देर बातचीत करने के बाद ब्रह्मसमाज के नेतागण चले गए। तब रामकृष्ण ने अपने शिष्यों से कहा, “मैंने भाव में देखा, केशव ने जिस एक शक्ति के बल पर प्रतिष्ठा प्राप्त की है, नरेंद्र में वैसी अठारह शक्तियाँ हैं। कृष्णा और विजय के मन में ज्ञानद्वीप जल रहे हैं। नरेंद्र में ज्ञान-सूर्य प्रकाशमान है।" अपनी प्रशंसा सुनकर भी नरेंद्र खुश नहीं हुए और प्रतिवाद करते हुए बोले, “यह आप क्या कह रहे हैं! कहाँ विश्वविख्यात केशव सेन और कहाँ स्कूल का एक नगण्य लड़का नरेंद्र! लोग सुनेंगे तो आपको पागल कहेंगे।” इस पर रामकृष्ण ने हँसते हुए शांत स्वर में कहा, “मैं क्या कर सकता हूँ। माँ ने दिखा दिया, इसलिए कहता हूँ।" “कैसे मानूँ माँ ने कहा है? मुझे तो लगता है कि आपके मस्तिष्क का खयाल है। पाश्चात्य विज्ञान तथा दर्शन ने इस बात को प्रमाणित कर दिया है कि कान, नाक, आँख आदि इंद्रियाँ कई बार हमें भृमित कर देती हैं। कदम-कदम पर हमें धोखा देती हैं। आपको मुझसे प्रेम है। इसी कारण प्रत्येक में आप मुझे बड़ा देखना चाहते हैं, इसलिए आपको ऐसे दर्शन होते हैं।" नरेंद्र प्रत्येक बात को तर्क की कसौटी पर परखकर ही विश्वास करते थे। नरेंद्र की कट बातों से भी रामकृष्ण कभी स्पष्ट नहीं होते थे, बल्कि इसके विपरीत नरेंद्र के प्रति उनका प्रेम गहराता जा रहा था। 'रामकृष्ण अद्वैत सिद्धांत, अर्थात्‌ ब्रह्म की एकता-सूचक शिक्षा देते थे। नरेंद्र उस पर कभी ध्यान नहीं देते थे, बल्कि कई बार उनका मजाक उड़ाते हुए कहते थे, “क्या यह संभव है? कटोरा, लोटा इत्यादि ईश्वर हैं, जो भी दिखाई देता है, वह ईश्वर है।” नरेंद्र की ऐसी आलोचनाएँ रामकृष्ण के शिष्यों से सहन नहीं होती थीं, लेकिन नरेंद्र की तीब्र आलोचना तथा उसके आवेगमय तर्क श्री रामकृष्ण को आनंदित कर देते थे। हालाँकि गुरु-शिष्यों के मध्य वैचारिक मतभेद था, फिर भी दोनों में दिनोदिन घनिष्ठता बढ़ती ही जा रही थी। *****

  • अच्छा लगा

    डॉ. भरत सरन यह देखकर की जयपुर के एक कॉफी हाउस पर एक उम्र दराज व्यक्ति अपने हाथ में एक किताब लेकर कुछ पढ़ रहे थेl देख कर काफी अच्छा लगा, उनसे हमने आशीर्वाद लिया। मुस्कुराते हुए अपना नाम विजय सिंह तेवटिया बताया और कहा मैं अक्सर ट्रेन में और जब फ्री होता हूं, तो किताबें जरूर पढ़ता हूंl मुझे सुकुन और खुशी मिलती हैl काश आज की युवा और विद्यार्थी इन्हीं की तरह मोबाइल के साथ कोई किताब अपने हाथ में रखे उसको पढ़े। उनमें लिखी हुई बातों को जेहन में रखकर जीवन निर्माण में जरूरत पड़ने पर काम में लेंl यह अनुपम उदाहरण है कि जब पूरी दुनिया मोबाइल में खोई हुई रहती है, उस वक्त एक खास पीढ़ी के लोग किताबों के पन्नों में अपना सुकून और खुशियों को ढूंढ रहे होते हैंl बड़े आनंद से, बड़े तसल्ली से एक टेबल पर किताब को पढ़ रहे थेl एक दौर था जब अधिकतर गुरुजनों और विद्यार्थियों के हाथों में किताबें हुआ करती थीl मोबाइल युग में सब कुछ बदल दियाl बहुत अच्छी बात है कि हम आधुनिकता में टेक्नोलॉजी के साथ जुड़ रहे हैंl पर जो किताबों का आनंद था, वह मोबाइल में कहाँ? उम्मीद के साथ कि कोई एक व्यक्ति इसको फैशन के रूप में ही सही, किताब के प्रति दोस्ती का भाव जरूर पैदा करेगाl ******

  • गहरी रात

    जसलीन रात हुई गहरी सी काली दूर हुई निसदिन लाली परिंदों ने पंख फड़फड़ाए नभ में भी तारे दिखलाये जुगनू निशा से बतियाते छिपते तो कभी चमचमाते शशि नभ से गुपचुप झाँकता स्वर्णिम धरा का मुख ताकता तेज हवा दल संग सरसराई मनमोहक सी सुगन्ध आई रातरानी, मोगरा महका पलाश अंगारों सा दहका लालटेन का मद्धम उजियारा अंबर में इक अनोखा सितारा झींगुर, कीटों की तेज ध्वनि धान, सरसो से सजी अवनि काले नभ चपला चमचमाये सुमुख पर दन्तावली दिखाए गगन अपलक निहारता जाए मौन धरा का मन हर्षाये। *****

  • बाऊजी की थाली

    शिखा जैन बाऊजी के लिये खाने की थाली लगाना आसान काम नहीं था। उनकी थाली लगाने का मतलब था, थाली को विभिन्न पकवानों से इस तरह सजाना मानो ये खाने के लिए नहीं बल्कि किसी प्रदर्शनी में दिखाने के लिए रखी जानी हो। सब्ज़ी, रोटी, दाल सब चीज़ व्यवस्थित तरीके से रखी जाती। घर में एक ही किनारे वाली थाली थी और वो थाली बाऊजी की थी। खाने की हर सामग्री की अपनी एक जगह थी, बाऊजी की थाली में। मजाल है कोई चीज़ इधर से उधर रख दी जाये। दो रोटी, उसके एक तरफ दाल, फिर कोई भी सब्ज़ी, थोड़े से चावल और उसके साथ कोई भी मीठी चीज़। मीठे के बिना बाऊजी का खाना पूरा नहीं होता था। पहले घर में कुछ ना कुछ मीठा बना ही रहता था और यदि न हो तो शक्कर, घी बूरा मलाई कुछ भी हो लेकिन मीठा बाऊजी की थाली की सबसे अहम चीज थी और दूसरी अहम चीज़ थी पापड़। पापड़ का स्थान रोटी के ठीक बगल में होता था जो कि लंबे समय तक नहीं बदला। बस घर के बने पापड़ की जगह बाजार के पापड़ ने ले ली थी। अचार का बाऊजी को शौक नहीं था। हाँ, कभी कभार धनिया पुदीने की चटनी जरूर ले लिया करते थे। दही बाबूजी को पसंद नहीं थी लेकिन रायता तो उनकी जान थी फिर चाहे वह बूंदी का हो या घीया का और रायता थाली में पापड़ के ठीक साथ विराजमान रहता था। मणि को तो शुरु-शुरु में बहुत दिक्कतें आई। काफी समय तक तो नई बहू को यह जिम्मेदारी दी ही नही गई लेकिन फिर जब-जब सासू माँ बीमार रहती थी या घर पर नहीं होती थी, तो बाऊजी को खाना खिलाने की जिम्मेदारी मणि पर आ जाती। खाना बनाने में तो मणि ने महारथ हासिल कर रखी थी लेकिन बाऊजी के लिए खाने की थाली लगाने में उसके पसीने छूटने लगते। कभी कुछ भूल जाती तो कभी कुछ और कभी-कभी तो हड़बड़ाहट में कुछ न कुछ गिरा ही देती। एक बार तो थाली लगाकर जैसे तैसे बाऊजी के सामने रखी। बाऊजी कुछ सेकंड थाली को देखते रहे फिर समझ गए कि आज उनकी धर्मपत्नी घर पर नहीं है। फिर चुपचाप खाना खाकर चले गए। "माँ जी, यह कैसी आदत डाल रखी है आपने बाऊजी को। इतना समय खाना बनाने में नहीं लगता है जितना समय उनकी थाली लगाने में लगता है" उस दिन झल्ला सी गई थी मणि। "मैं क्यूँ आदत डालूंगी मैं तो खुद इतने साल से इनकी इस आदत को झेल रही हूँ।" सासू माँ ने मुस्कुराकर जवाब दिया। "तो बाऊजी हमेशा से ऐसे थे?" "हाँ, बचपन से ही। सात भाई बहनों में सबसे छोटे थे। माँ के लाडले थे। खाना सही से नहीं खाते थे तो मेरी सास थाली में अलग-अलग तरह के पकवान रखकर लाती थी कि कुछ तो खा ही लेंगे और फिर धीरे-धीरे तेरे बाऊजी को ऐसी ही आदत पड़ गई। उसके बाद मैं आई। पहले पहल मुझे भी बहुत परेशानी हुई। थाली में कुछ भी उल्टा-पुल्टा होता था तो तुम्हारे बाऊजी गुस्सा हो जाया करते थे। वैसे स्वभाव के बहुत नरम थे लेकिन शायद खुद ही अपनी इस आदत से मजबूर थे। अव्यवस्थित थाली उन्हें बर्दाश्त नहीं होती थी। शुरू-शुरू का डर मेरी भी आदत में ही बदल गया और बाद में तो कुछ सोचना ही नहीं पड़ता था। हाथों को हर चीज अपनी जगह पर रखने की आदत पड़ गई थी।" मणि भी अपनी सासू माँ की तरह धीरे-धीरे आदी हो गई। अपने पूरे जीवन काल में बाऊजी ने कभी किसी चीज की अधिक चाह नहीं की थी। संतोषी स्वभाव के थे लेकिन भोजन के मामले में समझौता नहीं करते थे। बहुत अधिक खुराक नहीं थी। थाली में प्रत्येक चीज़ थोड़ी-थोड़ी मात्रा में ही होती थी। मणि तो कई बार हँसकर बोल दिया करती थी कि बाऊजी को खाने में क्वांटिटी नहीं वैरायटी चाहिए। बचपन में बेटे के प्रति लाड दिखाती माँ से लेकर बुढ़ापे में अपनी जिम्मेदारी निभाती बहु तक के सफर ने थाली के अस्तित्व को बरकरार रखा। समय बीतता गया। अब मणि खुद सास बन चुकी थी। सासू माँ का देहांत हो गया था। बाऊजी भी काफी बूढ़े हो चले थे। ज्यादा खा-पी भी नहीं पाते थे। समय के साथ थाली की वस्तुएं व आकार दोनों ही घटते गए। अपने अंतिम दिनों में अक्सर बाऊजी भाव विह्वल होकर मणि के सिर पर हाथ रख कर बोल पड़ते कि अब मेरी आत्मा तृप्त हो चुकी है। बाऊजी का स्वर्गवास हुए पाँच साल हो गए थे। आज भी श्राद्ध पक्ष की अमावस्या पर उनके लिए थाली लगाई जाती जिसमें पहले की तरह सभी चीजें व्यवस्थित तरीके से होती हैं। बाऊजी की आत्मा का तो पता नहीं लेकिन मणि का मन जरूर तृप्त हो जाया करता है। ******

  • मर्यादित रिश्ते

    कविता भड़ाना चीखने की तेज आवाज़ के साथ कई लोगों की निगाहें उसी ओर उठ गई, एक सुंदर सी महिला ने एक पुरुष को कालर से पकड़ा हुआ था और बेहद गुस्से में बोल रही थी। "आखिर दिखा ही दिया ना तुमने अपना असली रंग, अपनी बीवी के होते हुए भी अपने सगे भाई की बीवी के साथ इश्क़ लड़ाते हुए शर्म नही आ रही है ना तुम्हें।" तभी हाथों में पॉपकॉर्न लिए एक लड़की वहाँ आई और ये नजारा देख बौखला गई, पॉपकॉर्न वही फैंक उस महिला को हाथ से पकड़कर बोली, “दीदी ये क्या हरकत है, इस तरह मॉल में सबके सामने अपने पति पर हाथ उठाते हुए आपको जरा भी शर्म नही आ रही।” शर्म तो तुम्हें आनी चाहिए देवरानी जी, जो यहां अपने जेठ के साथ फिल्म देखने चली आई, रिश्तों को कलंकित तो तुम दोनों कर रहे हो और शर्म मैं करूँ, अभी आगे कुछ कहती की एक तेज थप्पड़ से वो महिला करहा उठी। सामने उसकी सास गुस्से से खड़ी थी साथ ही ससुर और देवर भी थे। तुम तो दो साल पहले इसी शक की आग में सुलगती हुई ससुराल से नाता तोड कर पीहर जा बसी और तुम्हारी गैर मौजूदगी में छोटी बहु सब संभाल रही है। तो उस पर भी तुम धब्बा लगाने से बाज नहीं आई। सोचा था समय के साथ तुम्हें एहसास हो जायेगा कि सब तुम्हारे सनकी दिमाग की ही उपज है। पर आज तुमने सारी सीमाएं लांघ दी हैं। आज तुम्हारे ससुर जी का जन्मदिन है, तो बस हम सभी यहां फिल्म देखने चले आए। पर तुमने बिना कुछ सोचे समझे अपने पति और देवरानी पर इतना घिनौना आरोप लगा दिया। तो आज से सब नाते खत्म और कल तुम्हारे पास तलाक के कागज़ भी पहुंच जायेंगे। सास ने फैसला सुनाया और सभी चले गए। तभी देवरानी वापस आई और बोली दीदी मेरे कोई भाई नहीं है और दो साल से आप अलग रहती हो। तो आपको नही पता कि जेठ जी मेरे राखी भाई हैं और हम दोनों का रिश्ता बहुत ही पवित्र और पाक है। आज इस रिश्ते को कलंकित करके आप हम सब की नजरों से बहुत नीचे गिर चुकी हैं और ऐसा कहकर चली गई। किसी की आंखों से पश्चाताप के आंसू थे पर अब उन्हें देखने वाला वहाँ कोई नही था। *****

  • बेइज्जती

    रमा कांत शुक्ल धनबाद के पुराने बाजार के पास मैं एक विवाह में गया हुआ था। मैं बाहर बैठा था। डीजे बज रहा था और अंदर पार्टी चल रहा थी। अचानक मुझे कॉलेज का एक दोस्त अमन मिल गया। वो भी शादी मे आया हुआ था। दोनों मिले बहुत सारी बातें हुई। फिर दोनों खाने के लिये अंदर गये। मेरे दोस्त अमन ने स्टाल पर लगे सारे भोजन को प्लेट में लेकर जैसे ही पहला कौर खाया, उसने बुरा सा मुंह बनाकर कहा... छी छी, थू थू, ये खाना है या गोबर। पता नहीं कैसे इसका स्वाद है। सब्जी जैसे जल गई है। नमक भी समझ में नहीं आ रहा है। कचौड़ी तो जैसे पत्थर, दांत से फूट ही नहीं रही है। यह भी कोई भोजन है। ऐसे भोजन तो मेरा कुत्ता भी ना खाए। इतना कह कर उसने भोजन समेत प्लेट डस्टबिन में फेंक दिया। मैं बगल में खड़ा खाते हुए सब कुछ सुन और देख रहा था। मैंने उससे पूछा, “आखिर हुआ क्या? क्यों भोजन फेंक दिए? क्या कोई भोजन का इस तरह अपमान करता है?” अमन ने उच्च स्वर में कहा, “जब स्वादिष्ट भोजन खिलाने की औकात नहीं थी, तो दावत क्यों दी। अब देखो भोजन इतना घटिया बना है कि देखते ही उल्टी आ जाए। यह भी कोई भोजन है। पता नहीं कैसे लोग खा रहे हैं। कभी अच्छा भोजन खाए हो तो खिलाये।” मैंने समझाते हुए कहा, “तुम जिस दिन बिटिया की शादी करोगी, उस दिन आटा चावल का भाव पता चलेगा। अरे इतना तो सोचना चाहिए था कि एक बाप जीवन भर कमाता है और कर्ज भी लेता है, बस इसी एक दिन सबको खिलाने के लिए। वह भोजन पर अकेले लाखों रुपए खर्च कर देता है। इतना खर्च होने के बावजूद भी तुम्हें यह भोजन बेस्वाद लग रहा है। यहां जितने लोग भी खा रहे हैं, किसी ने भी कुछ नहीं कहा और तुमने भोजन का अपमान कर दिया। साथ ही साथ एक पिता की भी बेइज्जती की। जिस दिन यह सब तुम्हें करना पड़ेगा, उस दिन तुम्हें पता चलेगा कि हजारों लोगों की भीड़ को भोजन कैसे कराया जाता है। यही भोजन यदि पैसे देकर किसी होटल में खाते होते, तो उंगली तक चाट लिए होते। और यहां नखरे कर रहे हो, क्योंकि यहां पैसे तो देने हैं नहीं। अमन मेरी बातों को गंभीरता से सिर झुका कर सुन रहा था। अगल-बगल के लोग भी मेरी बातों को गौर से सुन रहे थे। अमन केवल इतना ही बोला, “सॉरी पंडित जी।” फिर दूसरी प्लेट लेकर भोजन करने लगा। शायद अब उसे स्वाद आने लगा था। ******

  • भाजी वाली

    डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव एक भाजी वाली। रोज हमारे घर आती। बड़ी सी लाल बिंदी, करीने से बनाए बाल, और हाथ भर के चूडिय़ां। मम्मी के मुँह लगी थी बड़ी। रोज की तरह दोपहर में दरवाजे पर आयी। "काकी, सब्जियां लाई। क्या दूँ?" रोज की तरह मम्मी ने उसे अंदर से पूछा, "क्या लाई आज?" “मेंथी है, लौकी है, गंवार फल्ली है.., " मम्मी ने कहा, "रुक आयी" दरवाजे में आ कर मम्मी ने उसकी टोकरी को हाथ दिया और नीचे उतारा, "बोलो काकी, क्या दूँ आज?" "मेंथी कैसी?" "दस रुपये पाव, ताज़ी है काकी" "बस तू रोज ऐसे ही हमको बेवकूफ़ बनाती जा" मम्मी ने घुडकी भरी, "दस में एक किलो देती तो दे" "नई जमेंगा काकी" "जाने दे फिर" भाजी वाली ने टोकरी उठाई और जाने लगी। "काकी, बीस में एक किलो ले लो।" "नहीं, दस में एक किलो। देती है तो लुंगी" मम्मी ने उसे एक कड़क लुक दे दिया। भाजी वाली बाई निकल गई। मैंने मम्मी को समझाया, "दे देती उसको दस रुपये, क्या बिगड़ जाता तेरा?" "तू चुप कर, ऐसे चलाएगा गृहस्थी?" पांच मिनट बाद आवाज आयी…., "काकी" भाजी वाली बाई फिर से आ गई थी। मम्मी दरवाजे के पास ही रुकी थी। मम्मी को पता था वो वापिस आयेंगी। अब भाजी वाली बाई दस रुपये में एक किलो देने को तैयार हो गई थी। मम्मी ने उसकी टोकरी नीचे उतारने में मदद की। मम्मी ने ठीक से देख के एक किलो मेंथी ले ली। दस रुपये दिए। भाजी वाली बाई के टोकरी उठाते ही उसको चक्कर सा आ गया। मम्मी ने उसको सम्भाला, "कुछ खाया क्या नहीं? "नहीं काकी, सुबह जल्दी जाना प़डा मंडी में, बस अब घर जाऊँगी और खाना पका के खा लुंगी।" "ठहर, बैठ यहां पांच मिनट।" मम्मी अंदर गई। आते वक़्त मम्मी के हाथ में एक लोटा और थाली थी। दो रोटी, सब्ज़ी, और मिर्च का ठेसा। भाजी वाली बाई ने खाना खतम किया। पानी पिया और वहां से चली गई। मुझ से रहा नहीं गया, "मम्मी, दो रुपए बढ़ा के नहीं दिए और बाई को दो रोटी खिला दी, जितने बचाए उससे ज्यादा का खिला दिया। कमाल करती हो।" मम्मी हंसी और जो कहा वो दिल में घर कर गया। "व्यापार करते हुए दया नहीं और दया करते हुए व्यापार नहीं।" ******

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