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मोहताज

आरती शुक्ला

"पम्मी कोचिंग चली गई क्या? रमेश जी ने घर में कदम रखते ही सवाल किया। हां, गई अपने भाई के साथ। मटर के दाने निकालती बड़ी बहन ने भाई को अनमने ढंग से जवाब दिया। "चलो ठीक है” जूते उतारते हुए रमेश जी ने राहत की सांस ली।
"आप आ गए”, भीतर के कमरे से बाहर आई पत्नी ने आश्चर्य से पूछा।
"हां, दुकान स्टाफ पर छोड़ उसे कोचिंग पहुंचाने के लिए ही मैं भाग कर आया।
"अच्छा अब आ गए हैं, तो नाश्ता कर के ही जाईएगा।
"हां, ठीक है, दे देना।”
"अरे दीदी, थोडा हाथ तेज भी चला लिया करो।” रमेश जी के सामने ही उनकी पत्नी अपनी बड़ी ननद को नसीहत दे रसोई में जाते वक्त मुंह बनाते हुए बोली।
"रमेश, पम्मी एक दिन कोचिंग नही जाएगी तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा। जो तू ऐसे भागा चला आया।” बड़ी बहन ने भाई की फिक्र जताई।
"दीदी, तुम समझती नहीं हो।
"छोटे, एक बात पूछूं।
"हम्म, मटर के कुछ दाने मुंह में डालते हुए रमेश जी ने हुंकारी भरी।
"तुझे अपनी बेटी से नौकरी करवानी है क्या?”
"नहीं दीदी, बस कोशिश कर उसे इतनी शिक्षा दिला देनी है कि भविष्य में कभी कोई विपत्ति आने पर उसे दो वक्त की रोटी और तन ढकने के कपड़ों के लिए किसी का "मोहताज" न रहना पड़े। बड़ी बहन छोटे भाई के सामने निरुत्तर थी।
अपने छोटे भाई पर आश्रित विधवा बहन ने भाई की आंखों में तैरते दर्द को देख लिया था। और शायद भाभी के ताने और भाई के घर की शांति बनाए रखने के लिए गूंगा-बहरा होना याद हो आया था।

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