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  • तृप्त हो जाती

    अशोक कुमार बाजपेई बचपन में मां कहती थी मघा के बरसे मां के परसे धरती तृप्त हो जाती है और पुत्र की भूख भी। तब मां माघ नक्षत्र भादव मास में बेटों को बिठाकर खीर पूरी खिलाती थी बेटों को सरपोट सरपोट खाते देख मां बलि बलि जाती थी तृप्त हो जाती थी। तब कई दिन लगातार पानी बरसने से ताल तलैया खेत सब भर जाते थे नदी बलखाती उफनाती थी तब धरती की प्यास बुझ जाती थी। अब मघा में, न धरती तृप्त होती है ना भूख क्योंकि मघा नक्षत्र में अब दिखती है धूप, और आज की मम्मी ये जानती या नहीं जानती? मघा के बरसे अम्मा के परसे का मतलब क्या होता।। ********

  • परिणीता

    Chapter- 01 शरत चंद्र चट्टोपाध्याय लक्ष्मण की छाती पर जब शक्ति-बाण लगा होगा, तो ज़रूर उनका चेहरा भयंकर दर्द से सिकुड़ गया होगा, लेकिन गुरुचरण का चेहरा शायद उससे भी ज्यादा विकृत और टूटा-फूटा नज़र आया, जब सुबह अंतःपुर से यह खबर आई कि घर की गृहिणी ने अभी-अभी बिना किसी बाधा-विघ्न के, राजी-खुशी पाँचवीं कन्या-रत्न को जन्म दिया है। गुरुचरण साठ रुपये तनख्वाह का बैंक क्लर्क था। इसलिए उसका तन-बदन जैसे ठेके के गाड़ी के घोड़े की तरह सूखा-सूखा, शीर्ण था, उसके चेहरे-मोहरे और आँखों में भी, उस जानवर की तरह ही निष्काम, निर्विकार-निर्लिप्त भाव ! इसके बावजूद आज यह भयंकर शुभ-संवाद सुनकर उनके हाथ का हुक्का हाथ में ही रह गया। वे अपनी जीर्ण, पैतृक तकिया से टिककर बैठ गए। उनमें इतना ज़ोर भी न रहा कि वे लंबी-सी उसाँस भी ले सकें। यह शुभ संवाद लेकर आई थी, उनकी तीसरी बेटी, दस वर्षीया, अन्नाकाली ! ‘‘चलो, बापू, चलो न देखने।’’ बेटी का मुखड़ा निहारते हुए, गुरुचरण ने कहा, ‘‘बिटिया, ज़रा एक गिलास पानी तो लाना, प्यास लगी है।’’ बेटी पानी लेने चली गई। उसके जाते ही, गुरुचरण को सबसे पहले प्रसूतिखाने के सैकड़ों खर्च का ख़याल आने लगा। उसके बाद, उनकी आँखों के आगे स्टेशन की वह भीड़ तैर गई। स्टेशन पर गाड़ी पहुँचते ही ट्रेन का दरवाजा खुला पाते ही, जैसे तीसरे दर्जे के मुसाफिर, अपना पोटला-पोटली संभाले पागलों की तरह लोगों को कुचलते-पीसते उछल-कूदकर बाहर आते रहते हैं, उसी तरह मार-मार का शोर मचाते हुए उनके दिमाग में चिंता-परेशानियों का रेला लहराने लगा। उन्हें याद आया, पिछले साल अपनी दूसरी बेटी की शादी के वक्त बहुबाज़ार स्थित यह दो-मंज़िला, शरीफ़-आशियाना भी बंधक रखा जा चुका है और उसका छः महीने का ब्याज चुकाना अभी तक बाकी है। दुर्गा पूजा में अब सिर्फ महीने भर की देर है। मँझली बेटी के यहाँ उपहार वगैरह भी भेजना होगा। दफ्तर में कल रात आठ बजे तक डेबिट-क्रेडिट का हिसाब नहीं मिल पाया। आज दोपहर बारह बजे अंदर सारा हिसाब विलायत भेजना ही होगा। कल बड़े साहब ने हुक्म जारी किया है कि मैले-कुचैले कपड़े पहनकर कोई दफ्तर में नहीं घुस सकेगा। जुर्माना लगेगा, जबकि पिछले हफ्ते से धोबी का अता-पता नहीं है। घर के सारे कपड़े-लत्ते समेटकर, शायद वह नौ-दो-ग्यारह हो गया है। गुरुचरण से अब टिककर बैठा भी नहीं गया। हाथ का हुक्का ऊँचा उठाकर, वे अधलेटे हो आये। वे मन-ही-मन बुदबुदा उठे, ‘हे भगवान ! इस कलकत्ता शहर में हर रोज कितने ही लोग गाड़ी-घोड़े तले कुचले जाकर अकाल मौत के शिकार हो जाते हैं, वे लोग तुम्हारे चरणों में क्या मुझसे भी ज्यादा अपराधी हैं ? हे दयामय, मुझ पर दया करो, कोई भारी-भरकम मोटर ही मेरी छाती पर से गुज़र जाये।’ अन्नाकाली पानी ले आई, ‘‘लो, बापी, उठो। मैं पानी ले आई।’’ गुरुचरण उठ बैठे और गिलास का सारा पानी, एक ही साँस में पी गये। ‘ ‘आ-ह ! ले, बिटिया, गिलास लेती जा।’’ उन्होंने कहा। उसके जाते ही गुरुचरण दुबारा लेट गये। ललिता कमरे में दाखिल हुई, ‘‘मामा चाय लाई हूँ, चलो उठो।’’ चाय का नाम सुनकर गुरुचरण दुबारा उठ बैठे। ललिता का चेहरा निहारते हुए उनकी आधी परेशानी हवा हो गई। ‘‘रात भर जगी रही न, बिटिया? आ, थोड़ी देर मेरे पास बैठ।’’ ललिता सकुचाई-सी मुस्कान बिखेरते हुए उनके करीब चली आई, ‘‘रात को मैं ज्यादा देर नहीं जागी, मामा!’’ इस जीर्ण-शीर्ण, चिंता-फ़िक्रग्रस्त, अकाल बूढ़े मामा के मन की गहराइयों में टीसती हुई व्यक्त पीड़ा का इस घर में उससे बढ़कर और किसी को अहसास नहीं था। गुरुचरण ने कहा, ‘‘कोई बात नहीं, आ, मेरे पास आ।’’ ललिता उनके करीब आ बैठी। गुरुचरण उसके सिर पर हाथ फेरने लगे। अचानक उन्होंने कहा, ‘‘अपनी इस बिट्टी को किसी राजा के घर दे पाऊं, तो समझूंगा, काम जैसा काम किया।’’ ललिता सिर झुकाए-झुकाए, प्याली में चाय उड़ेलने लगी। गुरुचरण ने अपनी बात जारी रखी, ‘‘अपने इस दुखियारे मामा के यहाँ तुझे दिन-रात जी-तोड़ मेहनत करना पड़ती है न बिट्टू ?’’ ललिता ने सिर हिलाकर कहा, ‘‘रात-दिन मेहनत की क्या बात है मामा ? सभी लोग काम करते हैं, मैं भी करती हूँ।’’ उसकी इस बात पर गुरुचरण हँस पड़े। चाय पीते-पीते उन्होंने पूछा, ‘‘हाँ, तो, ललिता, आज खाने-वाने का क्या होगा, बिट्टी?’’ ललिता ने सिर उठाकर जवाब दिया, ‘‘क्यों, मामा ? मैं पकाऊंगी न !’’ गुरुचरण ने अचकचाकर कहा, ‘‘तू… तू पकायेगी, बिटिया ? तुझे पकाना आता है ?’’ ‘‘आता है, मामा ! मामी से मैंने सब सीख लिया है।’’ गुरुचरण ने चाय की प्याली रख दी और उसे गले लगाते हुए पूछा, ‘‘सच्ची ?’’ ‘‘सच्ची ! मामी बता देती है, मैं पकाती हूँ ! कितने ही दिनों तो मैंने ही पकाया है-’’ यह कहते हुए, ललिता ने सिर झुका लिया। उसके झुके हुए सिर पर हाथ रखकर गुरुचरण ने उसे खामोश आशीर्वाद दिया। उनकी एक गंभीर चिंता दूर हो गई। यह घर गली के नुक्कड़ पर ही स्थित था। चाय पीते-पीते उनकी निगाह अचानक खिड़की के बाहर जा पड़ी। गुरुचरण ने चीखकर आवाज लगाई, ‘‘शेखर! ओ शेखर, सुन ! ज़रा सुन जा !’’ एक लंबा-चौड़ा, बलिष्ठ, सुदर्शन नौजवान कमरे में दाखिल हुआ। ‘‘आओ बैठो! आज सवेरे अपनी काकी की करतूत शायद सुनी होगी ?’’ शेखर के होठों पर मंद-मंद मुस्कान झलक उठी, ‘‘करतूत क्या ? लड़की हुई है, बस यही बात है न ?’’ एक लंबी उसाँस फेंककर गुरुचरण ने कहा, ‘‘तुमने तो कह दिया-‘बस, यही बात !’ लेकिन यह किस हद तक ‘बस, यही बात’ है, सिर्फ मैं ही जानता हूँ, रे !’’ ‘‘ऐसा न कहें, काका, काकी सुनेंगी, तो बहुत दुःखी होंगी। इसके अलावा, भगवान ने जिसे भेजा है, उसे ही लाड़-दुलार से अपना लें।’’ शेखर ने तसल्ली दी। पलभर को खामोश रहने के बाद, गुरुचरण ने कहा, ‘‘लाड़-दुलार करना चाहिए, यह तो मैं भी जानता हूँ। लेकिन बेटा, भगवान भी तो इंसाफ़ नहीं करते। मैं ठहरा गरीब मानस, मेरे घर में इतनी भरमार क्यों ? यह घर तक तुम्हारे बाप के पास रेहन पड़ा है। ख़ैर पड़ा रहे, मुझे इसका दुःख नहीं है, शेखर, लेकिन हाथों-हाथ ही देख लो न बेटा, यह मेरी ललिता है, बिन-माँ-बाप की सोने की गुड़िया, यह सिर्फ राजा के घर ही सजेगी। इसे मैं अपने जीते-जी कैसे जिस-तिस के हाथ में सौंप दूं, बताओ ? राजा के मुकुट में वह जो कोहिनूर जगमगाता है, वैसा कई-कई कोहिनूर जमा करके मेरी इस बेटी को तौला जाये, तो भी इसका मोल नहीं हो सकता। लेकिन, यह कौन समझेगा ? पैसों के अभाव में ऐसी रतन को मुझे बहा देना होगा। तुम ही बताओ बेटा, उस वक्त छाती में कैसा तीर चुभेगा ? तेरह साल की हो गई, लेकिन मेरे हाथ में तेरह पैसे भी नहीं हैं कि इसका कोई रिश्ता तक तय नहीं कर पा रहा हूँ।’’ गुरुचरण की आँखों में आँसू छलक आये। शेखर खामोश रहा। गुरुचरण ने अगला वाक्य जोड़ा, ‘‘सुनो शेखरनाथ! अपने यार-दोस्तों में ही तलाश कर न, बेटा, अगर इस लड़की की कोई गति कर सके। सुना है, आजकल बहुतेरे लड़के रुपये-पैसे की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखते, सिर्फ लड़की देखते हैं और पसंद कर लेते हैं। ऐसा कोई लड़का संयोग से मिल जाये शेखर, तो मैं कहता हूँ, मेरे आशीर्वाद से तुम राजा होगे। और क्या कहूँ, बेटा ? इस मुहल्ले में तुम लोगों के ही आसरे-भरोसे हूँ ! तुम्हारे बाबूजी मुझे अपने छोटे भाई की तरह ही देखते हैं।’’ शेखर ने सिर हिलाकर कहा, ‘‘ठीक है, देखूंगा।’’ ‘‘देखो, बेटा, भूलना नहीं। ललिता ने तो आठ साल की उम्र से तुमसे ही पढ़ना-लिखना सीखा है, इंसान बन रही है, तुम भी तो देख रहे हो, वह कितनी बुद्धिमती है; कितनी शांत-शिष्ट है ! बुंदकी भर लड़की, आज से वही हमारे यहाँ पकायेगी-परोसेगी, देगी-सहेजेगी। अब से सब कुछ उसके जिम्मे !’’ उस पल ललिता ने एक बार नज़रें उठाकर झट से झुका लीं। उसके होंठ के दोंनों कोर ईषत् फैलकर रह गये। गुरुचरण ने फिर एक लंबी उसाँस छोड़कर कहा, ‘‘इसके बाप ने ही क्या कम रोजगार किया ? लेकिन, सारा कुछ इस ढंग से दान कर गया कि इस लड़की के लिए कुछ नहीं रख गया।’’ शेखर खामोश रहा। गुरुचरण खुद ही दुबारा बोल उठे, ‘‘वैसे कुछ भी रखकर नहीं गया, यह भी कैसे कहूं? उसने जितने सारे लोगों का जितना-जितना दुःख मिटाया, उसका सारा पुण्य मेरी इस बेटी को सौंप गया, वर्ना इतनी नन्ही-सी बच्ची, ऐसी अन्नपूर्णा हो सकती है भला? तुम ही बताओ शेखर, यह सच है या नहीं?’’ शेखर हँस पड़ा। उसने कोई जवाब नहीं दिया। वह जाने के लिए उठने ही वाला था। ‘‘इतनी सुबह-सुबह कहाँ जा रहे थे?’’ उन्होंने पूछा। ‘‘बैरिस्टर के यहाँ! एक केस के सिलसिले में…’’ इतना कहकर, वह उठ खड़ा हुआ। गुरुचरण ने उसे फिर याद दिलाया, ‘‘मेरी बात ज़रा याद रखना, बेटा ! वह ज़रा साँवली ज़रूर है….लेकिन ऐसी सूरत-शक्ल ऐसी हँसी, इतनी दया-माया दुनिया भर में खोजते फिरने पर भी किसी को न मिलेगी !’’ शेखर ने सहमति में सिर हिलाया और मंद-मंद मुस्कराते हुए बाहर निकल गया। उस लड़के की उम्र पच्चीस- छब्बीस! एम.ए. पास करने के बाद अब तक अध्यापन में लगा रहा, पिछले वर्ष एटॉर्नी बन गया। उसके पिता नवीन-राय का गुड़ का कारोबार था। लखपति बन जाने के बाद इधर कुछेक सालों से कारोबार छोड़कर घर बैठे तिजारती का धंधा शुरू कर दिया है। बड़ा बेटा वकील ! यह शेखरनाथ, उनका छोटा बेटा है। मुहल्ले की छोर पर उनका विशाल तिमंज़िला मकान शान से सिर उठाए खड़ा़ है। उसी मकान की खुली छत से सटी हुई गुरुचरण की छत है। इसलिए दोनों परिवारों में बेहद आत्मीयता जुड़ गई थी। घर की औरतें इसी राह आना-जाना करती थीं।

  • इंतजार वक्त का …

    डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव कल मैं दुकान से जल्दी घर चला आया। आम तौर पर रात में 10 बजे के बाद आता हूं, कल 8 बजे ही चला आया। सोचा था घर जाकर थोड़ी देर पत्नी से बातें करूंगा, फिर कहूंगा कि कहीं बाहर खाना खाने चलते हैं। बहुत साल पहले, , हम ऐसा करते थे। घर आया तो पत्नी टीवी देख रही थी। मुझे लगा कि जब तक वो ये वाला सीरियल देख रही है, मैं कम्यूटर पर कुछ मेल चेक कर लूं। मैं मेल चेक करने लगा, कुछ देर बाद पत्नी चाय लेकर आई, तो मैं चाय पीता हुआ दुकान के काम करने लगा। अब मन में था कि पत्नी के साथ बैठ कर बातें करूंगा, फिर खाना खाने बाहर जाऊंगा, पर कब 8 से 11 बज गए, पता ही नहीं चला। पत्नी ने वहीं टेबल पर खाना लगा दिया, मैं चुपचाप खाना खाने लगा। खाना खाते हुए मैंने कहा कि खा कर हम लोग नीचे टहलने चलेंगे, गप करेंगे। पत्नी खुश हो गई। हम खाना खाते रहे, इस बीच मेरी पसंद का सीरियल आने लगा और मैं खाते-खाते सीरियल में डूब गया। सीरियल देखते हुए सोफा पर ही मैं सो गया था। जब नींद खुली तब आधी रात हो चुकी थी। बहुत अफसोस हुआ। मन में सोच कर घर आया था कि जल्दी आने का फायदा उठाते हुए आज कुछ समय पत्नी के साथ बिताऊंगा। पर यहां तो शाम क्या आधी रात भी निकल गई। ऐसा ही होता है, ज़िंदगी में। हम सोचते कुछ हैं, होता कुछ है। हम सोचते हैं कि एक दिन हम जी लेंगे, पर हम कभी नहीं जीते। हम सोचते हैं कि एक दिन ये कर लेंगे, पर नहीं कर पाते। आधी रात को सोफे से उठा, हाथ मुंह धो कर बिस्तर पर आया तो पत्नी सारा दिन के काम से थकी हुई सो गई थी। मैं चुपचाप बेडरूम में कुर्सी पर बैठ कर कुछ सोच रहा था। पच्चीस साल पहले इस लड़की से मैं पहली बार मिला था। पीले रंग के शूट में मुझे मिली थी। फिर मैने इससे शादी की थी। मैंने वादा किया था कि सुख में, दुख में ज़िंदगी के हर मोड़ पर मैं तुम्हारे साथ रहूंगा। पर ये कैसा साथ? मैं सुबह जागता हूं अपने काम में व्यस्त हो जाता हूं। वो सुबह जागती है मेरे लिए चाय बनाती है। चाय पीकर मैं कम्यूटर पर संसार से जुड़ जाता हूं, वो नाश्ते की तैयारी करती है। फिर हम दोनों दुकान के काम में लग जाते हैं, मैं दुकान के लिए तैयार होता हूं, वो साथ में मेरे लंच का इंतज़ाम करती है। फिर हम दोनों भविष्य के काम में लग जाते हैं। मैं एकबार दुकान चला गया, तो इसी बात में अपनी शान समझता हूं कि मेरे बिना मेरा दुकान का काम नहीं चलता, वो अपना काम करके डिनर की तैयारी करती है। देर रात मैं घर आता हूं और खाना खाते हुए ही निढाल हो जाता हूं। एक पूरा दिन खर्च हो जाता है, जीने की तैयारी में। वो पंजाबी शूट वाली लड़की मुझ से कभी शिकायत नहीं करती। क्यों नहीं करती मैं नहीं जानता। पर मुझे खुद से शिकायत है। आदमी जिससे सबसे ज्यादा प्यार करता है, सबसे कम उसी की परवाह करता है। क्यों? कई दफा लगता है कि हम खुद के लिए अब काम नहीं करते। हम किसी अज्ञात भय से लड़ने के लिए काम करते हैं। हम जीने के पीछे ज़िंदगी बर्बाद करते हैं। कल से मैं सोच रहा हूं, वो कौन सा दिन होगा जब हम जीना शुरू करेंगे। क्या हम गाड़ी, टीवी, फोन, कम्यूटर, कपड़े खरीदने के लिए जी रहे हैं? मैं तो सोच ही रहा हूं, आप भी सोचिए कि ज़िंदगी बहुत छोटी होती है। उसे यूं जाया मत कीजिए। अपने प्यार को पहचानिए। उसके साथ समय बिताइए। जो अपने माँ बाप भाई बहन सागे संबंधी सब को छोड़ आप से रिश्ता जोड़ आपके सुख-दुख में शामिल होने का वादा किया उसके सुख-दुख को पूछिए तो सही। एक दिन अफसोस करने से बेहतर है, सच को आज ही समझ लेना कि ज़िंदगी मुट्ठी में रेत की तरह होती है। कब मुट्ठी से वो निकल जाएगी, पता भी नहीं चलेगा। *****

  • वर्किंग वूमेन

    उषा भारद्वाज अस्पताल के पलंग पर वह थी। पास में उसके बेटा लेटा था, जिसका 2 दिन पहले ही जन्म हुआ था। प्राइवेट रूम खाली न होने के कारण सेमी प्राइवेट लेना पड़ा। जिसमें तीन बेड थे। एक खाली था दो भरे थे। जिसमें एक पर नेहा थी और दूसरे पर एक महिला थी जिसका नाम रीता था। उसकी बेटी थी। दोनों के घरवाले उस समय वहां नही थे, तो दोनों बात करने लगी। रीता ने नेहा से पूछा-"आप वर्किंग हो?" वह मुस्कुराते हुए बोली- “हां" फिर रीता ने पूछा – “कहां?” नेहा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया – “अपने घर में।” रीता ने कहा - "अच्छा ऑनलाइन कर रही हो। नेहा ने कहा- “नहीं। ऑफलाइन।” रीता ने उसको ध्यान से देखते हुए पूछा – “कैसे? किस पोस्ट पर हो?” नेहा की मुस्कान गहरी हो गयी फिर वो बोली - बहुत सारी पोस्ट एक साथ हैंडिल करती हूं। रीता कुछ समझ नहीं पा रही थी बल्कि जिज्ञासु हो रही थी कि कैसे, क्या जैसे अनेक प्रश्नों के लिए, फिर धीरे से बोली – “कौन-कौन सी और कैसे?” नेहा की आंखो में चमक आ गयी वो मुस्कुराते हुए बोली – “मेरा आफिस घर है। मैं मैनेजर हूं। सारी व्यवस्थाएं मैं देखती हूं। मैं ही एच आर हूं। जो घर में दूसरे काम करने वाले इमप्लाई को सेट करती हूं। मैं ही इंचार्ज हूं। जो दिन भर घर में क्या सही क्या खराब, क्या बनाना चाहिए, क्या कहां से कहां रखना चाहिए। यह सब भी देखती करती हूं। और कभी-कभी मैं ही वही एंप्लाई भी बन जाती हूं। खाना भी बनाती हूं, घर की सफाई भी करती हूं। कामवाली नहीं आई तो झाड़ू-पोछा और बर्तन भी साफ करती हूं। वॉशिंग मशीन खराब हो गई तो कपड़े भी धुलती हूं। माली नहीं आया तो पौधों को पानी भी देती हूं। घर में होने वाले हर प्रोग्राम के लिए इवेंट तैयार करना, मेहमानों की आवभगत से लेकर उनकी विदाई तक की तोहफे की व्यवस्था करना। सभी रिश्तों की देखभाल करना, यहां तक अगर बच्चे ने दीवार खराब कर दी तो बाजार से पेंट लाकर कमरे की दीवारों को पेंट भी कर देना।” रीता उसका मुंह आंखे फैलाकर देख रही थी। फिर अचानक जैसे ध्यान भंग हुआ हो अपने पेट को संभालते हुए हंसने लगी। फिर बोली- "नेहा तुम्हारी जॉब तो बहुत खतरनाक है।" नेहा थोड़ी देर रुकी, पानी पिया और फिर बोली – “और सुनो रीता, यह सारा वर्क विदाउट सैलेरी होता है। कोई लीव नहीं। मायके जाने के लिए लीव मिलती है लेकिन वहां भी काम लेकर जाती हूं। दोनों बच्चे साथ जाते हैं। वहां पर कॉल पर अपडेट देती और अपडेट लेती रहती हूं। अब तुम ही बताओ मैं वर्किंग हुई ना?” अभी नेहा इतना ही बोल पाई थी कि तभी अचानक तीसरी आवाज वहां पर दोनों को सुनाई पड़ी, जो दरवाजे से अंदर दाखिल हुई, डा. प्रीती सिंह की थी। जिन्होनें नेहा की सारी बातें सुन ली थीं। वो अंदर आ ही रहीं थीं कि किसी काम से वहीं रुकना पड़ा। उतनी देर में अंदर होने वाली बातें उन्हें सुनाई पड़ी। तो उनको पूरी बात सुनने का मन हुआ और फिर वो वहीं रुकी रहीं। अब नेहा का प्रश्न सुनकर अंदर दाखिल होते हुए बोलीं - "जी हां, बिल्कुल नेहा, आप ग्रेट वर्किंग वूमेन हैं। और आप जैसी बहुत हैं।" डॉक्टर की बात सुनकर नेहा मुस्कुराई और फिर असंतुष्ट भाव से व्यथित स्वरों में बोली - "कहां डॉक्टर, इसके बाद भी यही सुनने को मिलता है। तुम तो घर पर रहती हो तुमको क्या पता कि बाहर क्या होता है।" नेहा की इस बात ने कुछ पल के लिए वहां एक सन्नाटा फैला दिया। *******

  • अपना घर

    पुष्पा कुमारी "पुष्प" "सुमन! जल्दी से खाना बना दो बहुत जोरों की भूख लगी है।" अभी-अभी दफ्तर से घर लौटी सुमन को देखते ही हॉल में लगे सोफे पर लेटे उसके पति रंजीत ने लगभग दो वर्ष की बिटिया के साथ कार्टून चैनल देखते हुए मनुहार किया। दफ्तर का बैग वहीं टेबल पर रख अपने कमरे में जाकर झटपट कपड़े बदल वॉशरूम की ओर जाती सुमन को अपने कमरे के बिस्तर पर बैठी उसकी सासू मां ने वहीं से टोका - "वॉशरूम में दो-चार कपड़े पड़े होंगे उन्हें धो लेना।" "जी माँजी!" सुमन वॉशरूम में पहुँच फ्रेश होने से पहले बाल्टी भर भिंगोकर रखें कपड़े धो हाथ पोंछ वॉशरूम से बाहर आ, सीधा रसोई में पहुंची। रसोई की सिंक जूठे बर्तनों से भरा पड़ा था। असल में लाख मिन्नतों के बावजूद सासू माँ अपने बेटे के बेरोजगारी का हवाला दे कोई घरेलू सहायिका रखने को तैयार नहीं थी। खैर सारे जूठे बर्तन धोने के बाद सुमन ने चूल्हे पर चाय के लिए पानी रखा ही था कि सासू माँ रसोई में आ पहुंची - "बहू! महँगाई में आटा क्यों गीला करती हो? चाय रहने दो!" सुमन ने चूल्हे की आँच बुझा दी। लेकिन रसोई में कुछ मदद करने की जगह सासू माँ यह कहते हुए रसोई से वापस जाने को मुड़ गई कि - "तरी वाली सब्जी बना लो और फुलके बना कर जल्दी से खाना परोस दो।" अपनी बच्ची की अच्छी परवरिश के मोह में मौन रहकर घर बाहर दोनों संभालती सुमन खुद को पल-पल कटते उस पेड़ की तरह महसूस करने लगी जिसकी लकड़ी की कीमत लोग उसकी छाँव से कहीं ज्यादा लगाते हैं। रसोई में रोटियां बेलती सुमन ने आज अपने घरवालों से इस विषय में बात करने की ठान ली। लेकिन बात शुरू करें तो कैसे! यह सोचते हुए सुमन को एक तरकीब सूझी। एक सहकारी बैंक में क्लर्क सुमन ने अपनी सास और पति को खाना परोसने के बाद अपनी बच्ची छुटकी को गोद में उठा अपने पति की ओर देखा -"आज हेड ऑफिस से ट्रांसफर लेटर आया है! मेरा तबादला सतारा हो गया है।" "सातारा! यहां से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर!" उसके पति के हाथ का कौर हाथ में और मुंह का निवाला मुंह में ही रह गया। "हाँ! लेकिन घबराने की कोई बात नहीं है मेरी दीदी वहीं रहती है। मैं वहां उनके साथ ही रह लूंगी।" सुमन ने अपने पति को निश्चिंत करना चाहा। "लेकिन छुटकी तुम्हारे बिना कैसे रहेगी?" उसके पति ने चिंता जताई। "मैं छुटकी को अपने साथ लेती जाऊंगी। वहां मेरी दीदी इसका पूरा ख्याल रखेगी।" "लेकिन बहू! तुम्हारे बिना इस घर को कौन संभालेगा?" सुमन की सास भोजन की थाली एक ओर रखकर चिंतित हो उठी। "माँ जी! मुझे प्रमोशन भी तो मिल रहा है। यहां घर के काम के लिए एक सहायक रख लीजिएगा।" "लेकिन कब तक बहू?" "यही कोई दो-तीन साल तक! फिर मेरा वहां से ट्रांसफर हो जाएगा।" "लेकिन तीन साल के बाद ट्रांसफर यहीं होगा यह जरूरी तो नहीं!" सुमन की सास की चिंता जस की तस बनी रही। "हाँ! यह बात तो है माँ जी, लेकिन हमारे घर में पैसों की जरूरत है।" एक गिलास पानी भी खुद को उठाकर न पीने वाले सुमन के पति को तो सुमन की बात सुनकर मानो जैसे काठ मार गया था। लेकिन सुमन की सास ने बहू से मनुहार किया - "बहू! कुछ दिनों में रंजीत को भी कहीं ना कहीं नौकरी मिल ही जाएगी, तुम ट्रांसफर मत लो।" "लेकिन माँजी! मुझसे घर-बाहर दोनों का मिलाकर इतना काम नहीं हो पाता। मैं थक जाती हूँ।" सुमन असल मुद्दे पर आई लेकिन सास ने आगे बढ़कर उसका हाथ थाम लिया - "मैं हूँ ना बहू! घर के हर काम में मैं तुम्हारी मदद कर दिया करूंगी।" "नहीं माँ जी! आप से नहीं हो पाएगा।" "कैसी बातें कर रही हो बहू? तुम्हारे आने से पहले मैं ही तो पूरा घर संभालती थी।" सुमन की सास ने अपने बेटे की ओर देखा और सुमन के पति ने भी अपनी माँ की हाँ में हाँ मिलाया -"माँ सही कह रही है सुमन और मैं भी तो फिलहाल घर पर ही रहता हूँ, मैं भी मदद कर दिया करूंगा।" सास और पति की बातें सुन और उनकी ज़िद देखकर सुमन ने राहत की सांस ली। "फिर तो ठीक है! मैं अपना ट्रांसफर रुकवाने के लिए कल ही आवेदन दे दूंगी।" अपनी सूझबूझ की बदौलत सुमन को असल मायने में अब घर अपना घर लगने लगा। *****

  • अज्ञानी

    अमरेन्द्र मूर्ख भला कब कहता है, मैं हूँ एक अज्ञानी। उल्टा-सीधा करता है, यही है उसकी निशानी। केवल ग्रंथों को पढ़ने से, नहीं बनता कोई ज्ञानी। उलझे को सुलझाता है, वही है पक्का ज्ञानी। जो हालात को समझ न पाए, वह भी है एक अज्ञानी। कोई मरता वह हँसता रहता, उसे कौन कहेगा ज्ञानी? लिखने-बोलने से पहले, जो विचार करे वो ज्ञानी। जो विज्ञान को झुठलाता, नहीं उससे बड़ा कोई अज्ञानी। करनी सबका बतलाता है, कौन है कितना ज्ञानी। मूर्ख भला कब कहता है, मैं हूँ एक अज्ञानी। ****

  • देशहित

    रमाकांत शुक्ल एक नाव बीच नदी में डूब गई। शिकायत राजा तक आई। राजा के दरबार में पेशी हुई। राजा ने नाविक से पूछा – नाव कैसे डूबी? राजा : क्या नाव में छेद था? नाविक – नहीं महाराज, नाव बिल्कुल दुरुस्त थी! राजा – क्या तुमने सवारी अधिक बिठाई? नाविक – नहीं महाराज, सवारी नाव की क्षमतानुसार ही थी और न जाने कितनी बार मैंने उससे अधिक सवारी बिठाकर भी नाव पार लगाई है। राजा – आँधी, तूफान जैसी कोई प्राकृतिक आपदा तो नहीं थी न? नाविक – मौसम सुहाना तथा नदी भी बिल्कुल शान्त थी महाराज। राजा – कहीं मदिरा पान तो नहीं किया था तुमने? नाविक – नहीं महाराज, आप चाहें तो इन लोगों से पूछ कर संतुष्ट हो सकते हैं। यह लोग भी मेरे साथ तैरकर जीवित लौटे हैं। महाराज – फिर, क्या चूक हुई? कैसे हुई इतनी बड़ी दुर्घटना? नाविक – महाराज, नाव हौले-हौले, बिना हिलकोरे लिये नदी में चल रही थी। तभी नाव में बैठे एक आदमी ने नाव के भीतर ही थूक दिया। मैंने पतवार रोक के उसका विरोध किया और पूछा कि भाई "तुमने नाव के भीतर क्यों थूका?" उसने उपहास में कहा – "क्या मेरे नाव में थूकने से ये नाव डूब जायेगी?" मैंने कहा – "नाव तो नहीं डूबेगी लेकिन तुम्हारे इस निकृष्ट कार्य से हमें घिन आ रही है, बताओ, जो नाव तुमको अपने सीने पर बिठाकर इस पार से उस पार ले जा रही है तुम उसी में क्यों थूक रहे हो? राजा – फिर? नाविक – महाराज मेरी इतनी बात पर वो तुनक गया, बोला, पैसा देते हैं नदी पार करने के। कोई एहसान नहीं कर रहे तुम और तुम्हारी नाव। राजा (विस्मय के साथ) – पैसा देने का क्या मतलब, नाव में थूकेगा क्या? अच्छा, फिर क्या हुआ? नाविक – महाराज वो मुझसे झगड़ा करने लगा। राजा – नाव में बैठे और लोग क्या कर रहे थे? क्या उन लोगों ने उसका विरोध नहीं किया? नाविक – हाँ, नाव के बहुत से लोग मेरे साथ उसका विरोध करने लगे। राजा – तब तो उसका मनोबल टूटा होगा, उसको अपनी गलती का एहसास हुआ होगा? नाविक – ऐसा नहीं था महाराज, नाव में कुछ लोग ऐसे भी थे जो उसके साथ उसके पक्ष में खड़े हो गये। नाव के भीतर ही दो खेमे बँट गये, बीच मझधार में ही यात्री आपस में उलझ पड़े। राजा – चलती नाव में ही मारपीट, तुमने उन्हें समझाया तथा रोका नहीं? नाविक – रोका महाराज, हाथ जोड़कर विनती भी की। मैंने कहा – नाव इस वक्त अपने नाजुक दौर में है। इस वक्त नाव में तनिक भी हलचल हम सबकी जान का खतरा बन जायेगी। लेकिन वो नहीं माने, सब एक दूसरे पर टूट पड़े तथा नाव ने बीच गहरी धारा में ही संतुलन खो दिया महाराज...औऱ अंततः नाव डूब गई। इस दौर में भी कुछ लोग देश की नाव में थूक रहे हैं। अनुरोध है कि धैर्य बनाये रखें ताकि नाव के संतुलन खोने से बाकी लोग न मारे जाएं। याद रखें... देशहित सर्वोपरी है। ******

  • पड़ोसन

    रवीन्द्रनाथ ठाकुर मेरी पड़ोसिन बाल-विधवा है। मानो वह जाड़ों की ओस, भीगी पतझड़ी हरसिंगार हो। सुहागरात की फूलों की सेज के लिए नहीं, वह केवल देवपूजा के लिए समर्पित थी। मैं उसकी पूजा मन-ही-मन किया करता था। उसके प्रति मेरा मनोभाव कैसा था, उसे मैं पूजा के अतिरिक्त किसी अन्य सुबोध शब्दों में प्रकट नहीं करना चाहता, दूसरों के सामने कभी नहीं, अपने प्रति भी नहीं। नवीन माधव मेरा बहुत ही घनिष्ठ एवं प्रिय मित्र है। उसे भी इस बारे में कुछ नहीं मालूम। इस प्रकार मैंने अपने अन्तरतम में जिस आवेश को छुपाकर साफ-सुथरा बना रखा था, उसके लिए भीतर-ही-भीतर गर्व का अनुभव भी करता था। परन्तु पहाड़ी नदी की तरह मन का वेग अपने जन्म शिखर से बंधा नहीं रहना चाहता। किसी भी रास्ते को अपनाकर वह बाहर निकलने की कोशिश करता है। इसमें अगर वह सफल नहीं हो पाता, तो भीतर-ही-भीतर कसक उत्पन्न करता है। इसलिए मैं यह सोच रहा था कि कविता में मैं अपने भाव प्रकट करूंगा, लेकिन कुंठा की मारी लेखनी ने किसी तरह भी आगे बढ़ना ना चाहा। बड़े आश्चर्य का विषय तो यह है कि ठीक इसी समय हमारे मित्र नवीन माधव को अचानक बड़े ही प्रबल वेग से कविता लिखने का शौक बढ़ने लगा, मानो अचानक भूचाल आ गया हो। उस बेचारे पर ऐसी दैवी विपत्ति पहले कभी न आई थी, इस कारण वह इस नई-नवेली हलचल के लिए बिल्कुल तैयार न था। उसके पास छंद, तुक आदि की पूंजी नहीं थी, फिर भी उसका दिल छोटा न हुआ, यह देखकर मैं दंग रह गया। कविता मानो बुढ़ापे की नई दुल्हन की तरह उस पर हावी हो गई। नवीन माधव को छंद तुक आदि की सहायता और संशोधन के लिए मेरी शरण लेनी पड़ी। कविता के बिषय नये नहीं थे, लेकिन पुराने भी नहीं थे। यानी उन्हें बिल्कुल नवीन भी कहा जा सकता है और काफी पुरातन भी। प्रेम की कवितायें थी, प्रियतमा के उद्देश्य में। मैंने उसे एक धक्का लगाते हुए पूछा, ”आखिर है कौन, बताओ भी।” नवीन ने हँसकर कहा, ”अब भी उनका पता नहीं लगा पाया हूँ।” नये लेखक को सहयोग देने में मुझे बड़ा संतोष मिला। नवीन की काल्पनिक प्रियतमा के प्रति मैंने अपने रूके आवेग का प्रयोग किया। बिना बच्चे की मुर्गी जिस तरह बत्तख का अंडा पा जाने पर भी उसे छाती के नीचे रखकर सेने लगती है, मैं अभागा भी उसी तरह नवीन माधव के भावों को अपने ह्रदय का सारा ताप देकर सेने लगा। अनाड़ी की रचनाओ का मैं ऐसे जोश-खरोश से संशोधन करने लगा कि वे करीब-करीब पंद्रह आने मेरी ही रचनायें बन गईं। नवीन आश्चर्य से कहता, “ठीक यही बात तो मैं कहना चाहता था, पर कह नहीं पाता था, लेकिन तुममें यह सब भाव कहाँ से आ जाते हैं?” मैं भी कवि की तरह जवाब देता, “कल्पना से। इसका कारण यह है कि सत्य नीरव होता है और कल्पना वाचाल। सत्य घटनायें भाव स्त्रोत को पत्थर की तरह दबाये रखती हैं, कल्पना ही उसका मार्ग मुक्त करती है।” नवीन गंभीर चेहरा लिए कुछ देर सोचता, फिर कहता, ”देख रहा हूँ बात कुछ ऐसी ही है। ठीक कहते हो।” थोड़ी देर सोचने के बाद फिर कहा, ”ठीक ही कहते हो। सही बात है।” पहले ही बता चुका हूँ कि मेरे प्रेम में एक प्रकार का कातर संकोच है, इसीलिए मैं अपनी बात कुछ भी लिख नहीं सका। नवीन को पर्दे की तरह बीच में रखने के बाद ही मेरी लेखनी अपना मुँह खोल सकी। रचनायें मानो रस से पूर्ण हो ताप से फटने लगी। नवीन बोला, ”यह तो तुम्हारी ही रचना है। इसे तुम्हारे ही नाम से प्रकाशित करें।” मैंने कहा, ”भाई तुमने भी खूब कहा। मूल रचना तो तुम्हारी ही है, मैंने तो उसमें सिर्फ थोड़ा-सा रद्दोबदल कर दिया है।” धीरे-धीरे नवीन भी ऐसा ही समझने लगा। ज्योतिर्विद जिस प्रकार नक्षत्र के उदय की प्रतीक्षा में आकाश की ओर निहारा करता है, मैं भी उसी तरह कभी-कभी अपने बगल के मकान की खिड़की की ओर देखा करता था, इस बात को अस्वीकार नहीं कर सकता। कभी-कभी भक्त का वह बेचैनी से देखना सार्थक भी हो जाता। उस कर्मयोग में डूबी ब्रह्मचारिणी की सौम्य मुखश्री से शान्त शीतल ज्योति झिलमिलाकर क्षण भर में मेरे मन की सारी बेचैनी दूर कर देती थी। किन्तु उस दिन सहसा मैंने यह क्या देखा! मेरे चन्द्रलोक में क्या अब भी ज्वालामुखी जाग रहा है, वहाँ की सुनसान समाधि में डूबी पहाड़ी गुफा सा सारा अग्निदाह क्या अभी तरह पूरी तरह बुझा नहीं है? उस दिन वैशाख के तिपहर को पूर्वोतर दिशा में बादल घिर रहे थे। उस घिरी हुई आंधी के बादलों-भरी तेज चमक में मेरी पड़ोसन खिड़की के पास अकेली खड़ी थी। उस दिन उसकी शून्य डूबी घनी काली आँखों में मैंने दूर तक फैली हुई एक कसक देखी। तो है, मेरे उस चन्द्रलोक में अब भी ताप है। अब भी वहाँ गर्म सांसो की हवा बहती है। वह देवताओं के लिए नहीं, मनुष्य के लिए ही है। उस दिन उस आंधी के प्रकाश में उसकी दोनो आँखों की तेज छटपटाहट उतावले पक्षी की तरह उड़ी चली जा रही थी, स्वर्ग की ओर नहीं, मानव-ह्रदय के घोसले की ओर। उत्सुक आकांक्षा से चमकती उस दृष्टि को देखने के बाद मेरे लिए अपने बेचैन मन को काबू करना मुश्किल हो गया। तब केवल दूसरे की कच्ची अनगढ़ कविताओं के संसोधन से मन नहीं भरा, मेरे अंदर भी किसी प्रकार का काम करने की चंचलता पैदा हो गई। तब मैंने यह निश्चय कर लिया कि बंगाल में भी विधवा-विवाह प्रचलित करने के लिए मैं अपनी सारी चेष्टा का प्रयोग करूंगा। केवल व्याखायान और लेख लिखकर नहीं, आर्थिक सहायता देने के लिए भी मैं आगे बढ़ा। नवीन मेरे साथ बहस करने लगा। उसने कहा, ”चिर वैधव्य में एक पवित्र शांति है, एकादशी की धुंधली चांदनी से प्रकाशित समाधि, भूमि की तरह उसमें एक महान सौंदर्य है। क्या वह विवाह की संभावना मात्र से नष्ट नहीं हो जाएगा?” ऐसे कवित्व की बातें सुनते ही मुझे गुस्सा आ जाता है। अकाल में खाने के अभाव में जो व्यक्ति घुल-घुलकर मर रहा हो, उसके पास हट्टा-कट्टा कोई व्यक्ति आकर यदि भोजन की भौतिकता के प्रति घृणा प्रकट करते हुए फूल की सुगंध और पक्षियों के गीत से मरते हुए का पेट भरना चाहे, तो वह कैसा लगता है? मैंने गुस्से में आकर कहा, “सुनो नवीन, कलाकार कहते हैं कि खंडहर का भी एक सौंदर्य होता है, लेकिन किसी घर को सिर्फ चित्र के रूप में देखने से ही काम नहीं चलता चूंकि उस घर में रहना पड़ता है। कलाकार कुछ भी कहता रहे, उस घर की मरम्मत जरूरी है। वैधव्य के बारे में, दूर बैठकर तुम चाहे कितनी कवितायें लिखना चाहो, किन्तु यह तुम्हें याद रखना चाहिए कि उसमें आकांक्षाओं से भरा एक मानव-ह्रदय अपनी विचित्र वेदना के साथ वास करता है।” मेरा ख़याल था कि नवीन को मैं किसी भी तरह अपने दल में नहीं खींच सकूंगा, इसीलिए मैं उस दिन ज्यादा गर्मी से बातें कर रहा था, लेकिन सहसा मैंने देखा कि मेरे भाषण के अंत में उसने एक गहरी सांस ली और मेरी सारी बातें मान लीं। मुझे और भी बहुत-सी अच्छी-अच्छी बातें करनी थीं, पर उसने उसका मौका ही नहीं दिया। लगभग हफ्ते भर के बाद नवीन ने आकर कहा, “तुम अगर मदद करो, तो मैं खुद विधवा-विवाह करने को तैयार हूँ।” मेरी समझ में एक बात आ गई कि उसकी प्रियतमा काल्पनिक नहीं है। कुछ अरसे से वह एक विधवा नारी को दूर से प्यार करता रहा है, पर किसी से उसने यह प्रकट नहीं किया। जिस मासिक पत्र में नवीन की, उर्फ मेरी कवितायें प्रकाशित होती थीं, वे पत्रिकायें ठीक जगह पर पहुँच जाया करती थीं। वे कवितायें व्यर्थ नहीं गईं। बिना मेल-मुलाकात के ही ह्रदय आकर्षित करने का यह उपाय मेरे मित्र ने ढूंढ़ निकाला था। लेकिन नवीन का कहना है कि उसने कोई षडयंत्र कर ऐसी तरकीब निकाली हो, सो बात नहीं। यहाँ तक कि उसका खयाल था कि वह विधवा पढ़ना भी नहीं जानती थी। मासिक पत्रिका बिना मूल्य विधवा के भाई के मांग पर भिजवा देता था। वह केवल मन को तसल्ली-भर देने का पागलपन था। उसे ऐसा लगता था कि देवता के लिए पुष्पांजलि चढ़ाई जा रही है। वे जानें या न जानें, स्वीकार करें या न स्वीकार करें। कई बहानों के जरिये विधवा के भाई से नवीन ने मित्रता कर ली थी। नवीन का कहना है कि इसमें भी उसका कोई उद्देश्य न था। जिससे प्रेम किया जाए, उसके निकट-संबंधियों का संग भी मधुर लगता है। अंत में भाई सख्त बीमार पड़ा, तो इस सिलसिले में बहिन के साथ उसकी भेंट कैसे हुई, वह एक लंबी कथा है। कवि के साथ कविता में वर्णित विषय का प्रत्यक्ष परिचय हो जाने के बाद कविता के संबंध में दोनों में बड़ी चर्चा हो चुकी थी और यह चर्चा छपी कविताओं में ही सीमित थी, ऐसा नहीं कहा जा सकता। हाल में मुझसे बहस में हारकर नवीन ने उस विधवा से मिलकर विवाह का प्रस्ताव किया। पहले-पहल उसे किसी प्रकार स्वीकृति न मिली। तब नवीन ने मेरी सारी युक्तियों का प्रयोग कर और उनके साथ अपनी आँखों के दो-चार बूंद आँसू मिलाकर उसे संपूर्ण रूप से हरा दिया। अब सब कुछ तय है, केवल विधवा के अभिभावक यानी उसके फूफा कुछ रूपया चाहते हैं। मैंने कहा, ”अभी लो।” नवीन बोला, ”इसके अलावा एक बात और है। शादी के बाद पिता जी पांच-छ: महीने तक ज़रूर खर्चा देना बंदकर देंगे और तब तक दोनों का खर्च निभाने के लिए तुम्हें इंतज़ाम करना होगा।” मैंने मुँह से कुछ न कहकर एक चेक काट दिया और कहा, ”अब उसका नाम बताओ। मेरे साथ जब तुम्हारी कोई प्रतियोगिता नहीं, तो परिचय देने में तुम्हें किस बात का डर है? मैं तूम्हें छूकर सौगंध खाता हूँ कि उनके नाम कोई कविता नहीं लिखूंगा और अगर लिखूं भी, तो उनके भाई के पास न भेजकर तुम्हारे पास भेज दिया करूंगा।” नवीन ने कहा, ”अरे इसके लिए मुझे कोई डर नहीं। विधवा-विवाह की लाज से वह गड़ी जा रही है, इसलिए उसने तुम लोगों से इस बारे में कोई चर्चा करने को बार-बार मना कर दिया है, पर अब छिपाना बेकार है। वह तुम्हारी ही पड़ोसिन है, उन्नीस नंबर में रहती है।” अगर मेरा ह्रदयपिंड लोहे का बायलर होता, तो उसी क्षण भक-से फट जाता, मैंने पूछा, ”विधवा-विवाह से उसे कोई एतराज नहीं है?” नवीन ने हँसकर कहा, ”फिलहाल तो कोई एतराज नहीं है।” मैंने पूछा, ”सिर्फ कवितायें पढ़कर ही वह मुग्ध हो गई?” नवीन ने कहा, ”क्यों मेरी वे कवितायें कुछ बुरी तो थी नहीं?” मैंने मन-ही-मन कहा, ‘धिक्कार है!’ धिक्कार किसे? उन्हें, या मुझे या विधाता को, लेकिन धिक्कार है। ******

  • श्रद्धा

    उपेंद्र प्रसाद एक गाँव में एक महात्मा आये। उन्होंने एक अनुष्ठान किया ईश्वर प्राप्ति के लिए। इसके लिए उन्होंने स्वयं को लोहे की जंजीर से बांध कर एक कुऐं में उल्टे लटक गए, कि ईश्वर अब मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर दर्शन देंगे। बहुत दिन ऐसे ही लटके रहे भूखे प्यासे। लोगों का ताँता लग गया दर्शनों के लिए। उसी में एक गाँव का लड़का भी था, बहुत सरल। उसने सोचा यदि कुएँ में उल्टे लटकने से ही ईश्वर मिलता है तो मैं भी कोशिश करता हूँ। उसने पास पड़ी एक रस्सी उठाई पैर से बाँधी और कुऐं में कूद गया। रस्सी तुरंत टूट गयी, लेकिन गिरने से पहले ही ईश्वर ने प्रकट हो उसे अपनी बाँहों में भर लिया, दर्शन भी दिये और उद्धार भी कर दिया। महात्मा जी को जब पता लगा की लड़के को ईश्वर के दर्शन इतनी जल्दी हो गए, और वह अभी लटके ही पड़े हैं, तो उन्होंने ईश्वर से शिकायत की, कि मेरी श्रद्धा में कहाँ कसर रह गयी थी भला। आकाशवाणी हुई कि तेरी श्रद्धा तो लोहे की जंजीर में थी, मुझ में कहाँ थी। तुझे डर था इसलिए लोहे की जंजीर से बाँधा स्वयं को, उस लड़के की मुझ पर श्रद्धा थी इसलिए गली हुई रस्सी पर भी झूल गया। जहाँ श्रद्धा होगी वहाँ ही तो मैं आऊँगा। ******

  • बेपनाह मुहब्बत

    शिव सागर मौर्य धूल मैं तेरी गलियों की, कदमों से तेरे लिपट जाऊं। छूटे ना साथ कभी तेरा, मैं तेरे लिए ही मिट जाऊं।। हर पल राह निहार रही, आने की आहट सुन करके। सब कुछ तो अर्पण कर दूँ, प्यार को तेरे गुन करके।। वर्षो बीत चुके अब तक, केवल इंतजार करते करते। कितनी बार मैं छली गयी, बस नाम तेरा रटते रटते।। दिन बदले मौसम भी बदला, कभी न बदली तेरी यादें। गलियों में रह कर हमने, बिता दिया कितनी रातें।। एक नजर इधर भी देखो, तुझपर ही मर मिट जाऊं। धूल मैं तेरी गलियों की, कदमों से तेरे लिपट जाऊं।। *****

  • जैसा करोगे वैसा भरोगे

    रश्मि प्रकाश अपने पैंसठवे जन्मदिन पर सुभद्रा जी उस शहर के एक वृद्धाश्रम में जाकर कुछ कपड़े और मिठाई बाँटना चाहती थी। उन्होंने जब अपने बेटे से कहा तो वो बोला, “माँ नई जगह पर आप ये सब करने को कह रही हो मैं तो खुद यहाँ दो महीने पहले आया हूँ पता कर बताता हूँ फिर आप चली जाइएगा।” दूसरे दिन सुभद्रा जी को लेकर बेटा एक वृद्धाश्रम पहुँचा। वहाँ पर सबके हाथों मे सामान देकर अच्छे से बात करते हुए अचानक वो एक महिला को देख कर रूक गई। बिखरे बाल, कपड़ों का भी कोई होश नहीं, जाने किन ख़्यालों में वो गुम थी। उसकी सूरत थोड़ी जानी पहचानी लगी तो वो वहाँ के एक स्टाफ़ से उस महिला के बारे में पूछने लगी। “अरे वो गायत्री आंटी बड़े रईस ख़ानदान की है। पर बेटा बहू कोई इन्हें ना पूछता, यहाँ छोड़ गए हैं कभी देखने तक ना आते। बस चुपचाप रहती है, कुछ बात करो तो एक ही बात बोलती जैसा करोगे वैसा भरोगे।” नाम सुनते सुभद्रा जी भाग कर उसके गले लगते बोली, “सखी तू यहाँ कैसे, तेरा बड़ा बंगला, रुआब सब किधर गया।” ये आवाज़ गायत्री जी कभी भूल ही नहीं सकती थी। उनके बचपन की सखी की जो थी। गले लग रोते हुए बोली, “जैसा करोगे वैसाभरोगे…. सच है मैं अपनी अमीरी में बड़े लोगों पर ज़ुल्म ढाएँ, किसी को ना समझी, जो मन में आता खरी खोटी सुना दिया करती। नौकरचाकर चुपचाप सुनते, बच्चे भी सुन कर सहमें रहते, पति कहते ये आदत अच्छी नहीं पर मैं कब किसी की सुनी थी। अपने बच्चों को ना संस्कार दे पाई ना समय। हमेशा बात बात पर खरी खोटी सुनाती रही। बहू आई तो उसे नीचा दिखाने में लगी रही और पति के देहांत के बाद जब मैं बीमार लाचार हो गई। बेटे बहू ने मुझे खरी खोटी सुनाना शुरू कर दिया। जिन्हें मैंने कभी समय नहीं दिया वो मुझे कहाँ समय देते। सेवा तो दूर की बात थी। मुझे यहाँ ला छोड़ा। अब पैसे का घमंड वो करते हैं, मैं यहाँ बैठ कर उपर जाने के दिन काट रही हूँ।” लाचार सी गायत्री जी ने कहा। सुभद्रा जी कुछ कह नहीं पाई सही ही तो कह रही थी, जैसा करोगे वैसा भरोगे। *******

  • कर्ज वाली लक्ष्मी

    रमाकांत शुक्ल एक 15 साल के बेटे ने अपने पापा से कहा, पापा दीदी के होने वाले ससुर और सास कल आ रहे है अभी जीजाजी ने फोन पर बताया। दीदी मतलब उसकी बड़ी बहन की सगाई कुछ दिन पहले एक अच्छे घर में तय हुई थी। दीनदयाल जी पहले से ही उदास बैठे थे धीरे से बोले... हां बेटा.. उनका कल ही फोन आया था कि वो एक दो दिन में दहेज की बात करने आ रहे हैं.. बोले... दहेज के बारे में आप से ज़रूरी बात करनी है। बड़ी मुश्किल से यह अच्छा लड़का मिला था। कल को उनकी दहेज की मांग इतनी ज़्यादा हो कि मैं पूरी नही कर पाया तो?" कहते कहते उनकी आँखें भर आयीं। घर के प्रत्येक सदस्य के मन व चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिखाई दे रही थी। लड़की भी उदास हो गयी। खैर..अगले दिन समधी समधिन आए। उनकी खूब आवभगत की गयी। कुछ देर बैठने के बाद लड़के के पिता ने लड़की के पिता से कहा" दीनदयाल जी अब काम की बात हो जाए। दीनदयाल जी की धड़कन बढ़ गयी.. बोले.. हां हां.. समधी जी.. जो आप हुकुम करें। लड़के के पिताजी ने धीरे से अपनी कुर्सी दीनदयाल जी ओर खिसकाई और धीरे से उनके कान में बोले. दीनदयाल जी मुझे दहेज के बारे बात करनी है। दीनदयाल जी हाथ जोड़ते हुये आँखों में पानी लिए हुए बोले बताईए समधी जी....जो आप को उचित लगे.. मैं पूरी कोशिश करूंगा। समधी जी ने धीरे से दीनदयाल जी का हाथ अपने हाथों से दबाते हुये बस इतना ही कहा, आप कन्यादान में कुछ भी देगें या ना भी देंगे, थोड़ा देंगे या ज़्यादा देंगे, मुझे सब स्वीकार है, पर कर्ज लेकर आप एक रुपया भी दहेज मत देना, वो मुझे स्वीकार नहीं। क्योकि जो बेटी अपने बाप को कर्ज में डुबो दे वैसी "कर्ज वाली लक्ष्मी" मुझे स्वीकार नही। मुझे बिना कर्ज वाली बहू ही चाहिए। जो मेरे यहाँ आकर मेरी सम्पति को दो गुना कर देगी। दीनदयाल जी हैरान हो गए। उनसे गले मिलकर बोले, समधी जी बिल्कुल ऐसा ही होगा। शिक्षा - कर्ज वाली लक्ष्मी ना कोई विदा करें न ही कोई स्वीकार करें। ******

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