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- वो प्यार नहीं कर पाएंगे
आँचल सक्सैना सच कहते हैं यार, नहीं कर पाएंगे उनसे आंखें चार, नहीं कर पाएंगे चेहरा देखे वो केवल, दिल ना देखे हम इतना श्रृंगार, नहीं कर पाएंगे मेरे दिल पर, तेरा जितना कब्ज़ा है बाकी दावेदार, नहीं कर पाएंगे शहद बनाते हैं जो, रस को पी-पीकर फूलों से तकरार, नहीं कर पाएंगे इतना ग़ुस्सा, इतनी उलझन, बेचैनी ऐसे तो वो प्यार नहीं कर पाएंगे इस जीवन में जो कुछ करना है, आँचल हम, सबके अनुसार नहीं कर पाएंगे। ******
- पराई नहीं होती बेटी
डॉ. कृष्ण कांत श्रीवास्तव एक बार एक पिता ने अपनी बेटी की सगाई करवाई। लड़का बड़े अच्छे घर से था, इसलिए माता-पिता दोनों बहुत खुश थे। लड़के के साथ लड़के के पूरे परिवार का स्वभाव भी बड़ा अच्छा था। पिता को अपनी बेटी की शादी अच्छे घर में पक्का होने पर राहत भी महसूस हो रहा थी। शादी से एक सप्ताह पहले लड़के वालों ने लड़की के पिता को अपने घर खाने पर बुलाया....! उस लड़की के पिता की तबीयत ठीक नहीं थी फिर भी वे ना न कह सके। लड़के वालों ने बड़े ही आदर सत्कार से उनका स्वागत किया। फ़िर लडकी के पिता के लिए चाय आई। लेकिन शुगर की वजह से लडकी के पिता को चीनी वाली चाय से दूर रहने के लिए कहा गया था। पिता अपनी लड़की के होने वाली ससुराल में थे, इसलिए उन्होंने बिलकुल चुप रह कर चाय अपने हाथ में ले ली। चाय कि पहली चुस्की लेते ही वो चौक से गये। चाय में चीनी बिल्कुल ही नहीं थी और इलायची भी डली हुई थी। वो सोच मे पड़ गये कि ये लोग भी हमारी जैसी ही चाय पीते हैं शायद। जब दोपहर में उन्होंने खाना खाया, वो भी बिल्कुल उनके घर जैसा। उसके बाद दोपहर में आराम करने के लिए दो तकिये, पतली चादर मौजूद थे। उठते ही उन्हें निम्बू पानी का शर्बत दिया गया। वहाँ से विदा लेते समय उनसे रहा नहीं गया तो वे हैरानी वश पूछ बैठे.....श्रीमान जी, मुझे क्या खाना है, क्या पीना है, मेरी सेहत के लिए क्या अच्छा है या डॉक्टरों ने मेरे लिए क्या वर्जित किया है, ये परफेक्टली आपको कैसे पता है? पिता की पूरी बात सुनने के बाद बेटी की सास ने धीरे से कहा कि कल रात को ही आपकी बेटी का फ़ोन आ गया था औऱ उसने बेहद विनम्रता से कहा था कि मेरे पापा स्वभाव से बड़े सरल हैं, बोलेंगे कुछ नहीं लेकिन प्लीज अगर हो सके तो आप उनका ध्यान रखियेगा। पूरी बात सुनकर पिता की आंखों में पानी भर आया। लड़की के पिता जब अपने घर पहुँचे तो घर के ड्राइंग रूम में लगी अपनी स्वर्गवासी माँ के फोटो से हार निकाल दिया। जब पत्नी ने उनसे पूछा कि ये क्या कर रहे हो तो लडकी के पिता बोले-मेरा आजीवन ध्यान रखने वाली मेरी माँ इस घर से कहीं नहीं गयी है, बल्कि वो तो मेरी बेटी के रुप में इस घर में ही रहती है। और फिर पिता की आंखों से आंसू छलक गये ओर वो फफक कर रो पड़े। साथ में माँ भी रोने लगी। दुनिया में सब कहते हैं ना कि बेटी है, एक दिन इस घर को छोड़कर चली जायेगी लेकिन बेटियां कभी भी अपने माँ-बाप के घर से नहीं जाती, बल्कि वो हमेशा उनके दिल में रहती हैं। *******
- चरित्रहीन
संजय सक्सेना एक बार एक बुजुर्ग को उनके बातो से प्रभावित हो एक औरत ने उन्हें अपने घर खाने का निमंत्रण दिया। बुजुर्ग निमंत्रण स्वीकार कर उस औरत के घर भोजन के लिए चल पड़े। रास्ते में जब लोगों ने उस औरत के साथ बुजुर्ग को देखा तो, एक आदमी उनके पास आया और बोला कि आप इस औरत के साथ कैसे? बुजुर्ग ने बताया कि वह इस औरत के निमंत्रण पर उसके घर भोजन के लिए जा रहे हैं, यह जानने के बाद उस व्यक्ति ने कहा कि आप इस औरत के घर न जाऐं आप की अत्यंत बदनामी होगी, क्योंकि यह औरत चरित्रहीन है। इसके बावजूद बुजुर्ग न रुके, कुछ ही देर में यह बात जंगल में आग की तरह फैल गई। आनन फानन में गांव का मुखिया दौडता हुआ आ गया और बुजुर्ग से उस औरत के यहां न जाने का अनुरोध करने लगा। विवाद होता देख बुजुर्ग ने सबको शांत रहने को कहा, फिर मुस्कराते हुए मुखिया का एक हाथ अपने हाथ में कस कर पकड़ लिया और बोले क्या अब तुम ताली बजा सकते हो? मुखिया बोला एक हाथ से भला कैसे ताली बजेगी। इस पर बुजुर्ग मुस्कुराते हुए बोले जैसे एक हाथ से ताली नहीं बज सकती तो अकेली औरत कैसे चरित्रहीन हो सकती है जब तक कि एक पुरुष उसे चरित्रहीन बनने पर बाध्य न करे। चरित्रहीन पुरुष ही एक औरत को चरित्रहीन बनाने में जिम्मेदार है। यह कैसी विडम्बना है कि इस कथित "पुरुष प्रधान समाज के अभिमान में ये पुरुष अपनी झूठी शान के लिए औरत को केवल अपने उपभोग की वस्तु भर समझता है और भूल जाता है कि जिस औरत को वह चरित्रहीन कह रहा है, उसका जिम्मेदार वह स्वयं है। *******
- मोबाइल और बच्चे
डॉ राम शरण सेठ मोबाइल आ गया है। बचपन छीनता जा रहा है।। परिवार में संवेदनाओ से। नाता दूर हो गया है।। रिश्तों की समझदारी। कुछ न कुछ कम हो गई है।। मानसिक और शारीरिक हीनता। दिन पर दिन बढ़ती जा रही है।। सजीव से बात ना करके। निर्जीव से बात करने की चलन बढ़ गई है।। आंखों की रोशनी बचपन। में कम हो रही है।। जो वृद्धावस्था के रोग थे। वह बचपन में लग रहे हैं।। बात-बात पर चिढ़ना और गुस्साना। यह लगातार बढ़ता जा रहा है।। क्योंकि दोनों के बीच में। कहीं न कहीं मोबाइल आ गया है।। यह दोनों कहीं न कहीं। एक दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं।। जिसकी शुरुआत बचपन। में ही हो गई है।। हम सभी को संभालना होगा। और बच्चो को समझाना होगा।। मोबाइल और बच्चों के संबंध में। सामंजस्य सरल तरीके से बनाना होगा।। ******
- अंतिम सीख
रमा शंकर मिश्र सीबा वर्षो से ज्ञानेश के घर में नौकरानी का काम करती थी। उसको सबसे ज़्यादा लगाव ज्ञानेश के दादाजी से था। दादाजी के तो "हाथ पैर" ही जैसे सीबा थी। घर के काम निपटाकर जो समय बचता वह दादाजी के साथ ही बीतता। कभी-कभी देर रात तक बातें करते-करते सीबा वहीं सो जाती। सीबा के कारण ज्ञानेश के म़म्मी-पापा दादाजी की ओर से निश्चिन्त रहते। ज्ञानेश की दोनों दीदीयां भी सीबा को अपने आगे-पीछे दौडातीं रहती। सीबा दीदी-दीदी कहकर उनको खुश रखती, उसके चेहरे पर जरा भी झल्लाहट नहीं दिखाई देती। सीबा उम्र में उनसे दो-चार साल छोटी थी, रूप-सौन्दर्य में तो सीबा के क्या कहना? वह ज्ञानेश के दादा-दादी की पुरानी नौकरानी की बेटी थी जिसकी सड़क हादसे में मौत हो चुकी थी। दादा-दादी ने सीबा को अपने पास ही रख लिया। जब तक वह छोटी थी तब तक उसे पढ़ाया, आठवीं कक्षा पास करने के बाद उसे घर के काम में लगा दिया। दादी के देहांत के बाद दादाजी, सीबा को सिर्फ अपनी जिम्मेदारी मानने लगे। बड़ी दीदी की शादी पर ज्ञानेश घर आया। तब उसने देखा - सीबा के बिना तो घर में किसी का काम ही नहीं चल रहा है। शायद सभी उस पर विश्वास करते हैं; परंतु कम पढ़ी-लिखी होने के कारण कई समस्याओ को सीबा अपनी सूझ-बूझ से सुलझाने का असफल प्रयास करती। उसकी "प्रयास प्रवृत्ति" को ध्यान में रखते हुए ज्ञानेश ने अपने मम्मी-पापा व दादा से कहा कि छोटी दीदी की शादी के बाद, बाजार से सामान लाना, घरेलू हिसाब-किताब रखना, बीमारी में आप लोगों को अस्पताल लेकर जाना, दवाईयों को देख-पढ़कर लाना, छोटे-मोटे bill pay करना जैसे आदि कार्यो को करने में आप लोगों को मुश्किल आएगी? इसलिए सीबा को दसवीं का प्राइवेट फार्म भरवा देते हैं। सीबा भी पढ-लिख जाएगी, हमारा भी काम आसान हो जाएगा। सबको यह बात खूब पसंद आई। पढ़ाई-लिखाई की बात सुनकर पहले तो सीबा कुछ हड़बड़ाई। बाद में ज्ञानेश के निर्देशानुसार पढ़ाई में रम गयी। इन पांच-छ सालों के अंदर ही छोटी दीदी की भी शादी हो गई। ज्ञानेश भी पढ़ाई पूरी करके जाब पर लगा गया। सीबा ने तो अकेले घर का सारा काम करने के बाद B.A. top class करके सबको हैरान ही कर दिया। इसी बीच ज्ञानेश की छोटी दीदी के ससुराल पक्ष के एक रिश्तेदार की ओर से सीबा के लिए रिश्ता आया। मम्मी-पापा तो जैसे इस रिश्ते का इंतजार कर रहे थे। अब वे हर हाल में सीबा को निपटा देना चाह रहे थे। पर ज्ञानेश ने एतराज करते हुए कहा- सीबा ये रिश्ता तुम्हें पसंद है, तो वहां तुम्हारी शादी होगी वरना नहीं। सीबा बोली- आप लोगों ने मेरे माता-पिता, भाई-बहन बनकर मुझे शिक्षा जैसे अनमोल रत्न को पाने का मौक़ा दिया। आपसे बड़ा हितैषी कौन हो सकता है मेरा? आप मेरे लिए जैसा घर-वर ढूंढेंगे वह मुझे सहर्ष स्वीकार होगा। ज्ञानेश फिर बोला- सीबा तुम ये ना सोचो कि हमने तुम्हें पढ़ने आदि का मौका दिया, इसलिए हमारे सभी निर्णय तुम्हें स्वीकार होंगे। तुम ये सोचो कि आने वाले जीवन में हम प्रत्यक्ष रूप से तुम्हारे साथ नहीं होंगे। तब तुम्हें हर परिस्थिति को अपने अनुकूल बनाना पढेगा। अब सीबा को समझ आया कि ज्ञानेश को उसके भविष्य की कितनी चिंता है। दादाजी ने ज्ञानेश से कहा- तुम नई पीढ़ी के हो। वर सहित उसके घर वालों को बुला लो, सीबा की सहमति होगी तो बात आगे बढ़ेगी, वरना नहीं। सीबा की संतुष्टि और सहमति के बाद ज्ञानेश ने उसकी शादी भी अपनी बहिनों के ही समान धूमधाम से की। सीबा विदाई के समय दादाजी के गले लगकर बहुत देर तक रोती रही। दादाजी ने उसे समझाकर कहा- सीबा! समझाने लायक बातें मैंने पहले ही तुम्हें समझा दी है मुझे संतोष है कि तुम अच्छे घर-परिवार में जा रही हो। एक बात फिर कहता हूं- जैसे तुम यहां रहती थी, ससुराल में भी वैसे ही रहना। यह मेरी अंतिम सीख है। ********
- मेरी कलम से…
ममता सिन्हा मैं उतरन उतराई थी! पीड़ित मन सकुचाई थी!! लड़की आने से नाखुश, कुपित हमारी माई थी!! पढ़ मत ज्यादा कहती थी! डाँट डपटती रहती थी!! लड़के ही बस तारेंगे, उनके लिये पराई थी!! कुपित........... तू पढ़ने जो जायेगी! पढ़ के क्या तू पायेगी!! दूजे घर ही जाना है, हर पल यही सुनाई थी!! कुपित............ पढ़ने में मैं थी अव्वल! कठिन सवालों का थी हल!! था स्नेह बेटों के लिये, मेरे लिये दुहाई थी, कुपित........... माँ की बहुएं थी इक आस! पोता पाने का विश्वास!! मैं बस सबकी थी चाकर, बन बैठी इक दाई थी!! कुपित........... सपनों का घातक विध्वंस! बचा न मुझमें मेरा अंश!! पहुंच गई दूजे घर को, गूंज उठी शहनाई थी!! कुपित............ चाहा था होऊंगी सफल! खण्डित सपने मिला न फल!! तन को 'तज' "मीना" चाहे, वहाँ भी न सुनवाई थी!! कुपित.......... ******
- फैसला
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव "क्या बताऊँ मम्मी, आजकल तो, बासी कढ़ी में भी उबाल आया हुआ है। जबसे पापा जी रिटायर हुए हैं, दोनों लोग फिल्मी हीरो हीरोइन की तरह दिन भर अपने बगीचे में ही झूले पर विराजमान रहते हैं। न अपने बालों की सफेदी का लिहाज है, न बहू बेटे का। इस उम्र में दोनों मेरी और नवीन की बराबरी कर रहे हैं। ठीक है मां मैं आपसे बाद में बात करती हूं शायद सासुमा आ रही हैं। सासु मां ने बहू की बातें कमरे के बाहर सुन ली थी, पर नज़रअंदाज़ करते हुए खामोशी से चाय सोनम को दे दी। सासू मां बहू सोनम को चाय देने के पश्चात पति देव अशोक जी के लिए चाय ले जाने लगी, ऐसा देखकर बहू सोनम के चेहरे पर व्यंगात्मक मुस्कान तैर गयी। पर सासू मां, समझदारी दिखाते हुए बहू की इस नाजायज हरकत को नज़र अंदाज़ करते हुए सिर झुकाए वहाँ से निकल गईं। पति के रिटायर होने के बाद कुछ दिन से उनकी यही दिनचर्या हो गयी थी। आजकल सासु मां प्रभा जी अपने पति देव अशोक जी को उनकी इच्छानुसार अच्छे से तैयार होकर अपने घर के सबसे खूबसूरत हिस्से में अपने पति देव के साथ झूले में बैठ कर उनको कंपनी देती थी। प्रभाजी ने सारी उम्र तो उनकी बच्चों के लिए लगा दी थी। कोठीनुमा घर अशोक और प्रभा का जीवन भर का सपना था, जो उन्होंने बड़ी मेहनत से साकार किया था। ऐसे मनमोहक वातावरण में वहां पर लगा झूला मन को असीम शांति प्रदान करता। पहले वह और अशोक इस मनमोहक जगह में कम समय के लिए ही बैठ पाते थे। प्रभा अनमनी होतीं तो अशोक बड़े ज़िंदादिल शब्दों में कहते, "पार्टनर रिटायरमेंट के बाद दोनों इसी झूले पर साथ बैठेंगे और खाना भी साथ में ही खायेंगे। आपकी हर शिकायत हम दूर कर देँगे। फ़िलहाल हमें बच्चों के लिये जीना है। बच्चों के कैरियर पर बहुत कुछ बलिदान करना पड़ा, खैर अब बेटा अच्छी नौकरी में था और बेटी भी अपने घर की हो चुकी थी। रिटायरमेंट के बाद घर में थोड़ी रौनक रहने लगी थी, अशोक जी को भी घर में रहना अच्छा लग रहा था। पहले तो बड़े पद पर थे तो कभी उनके कदम घर में टिकते ही नहीँ थे। लेकिन उनकी बहू सोनम अपने पति नवीन को उसके माता-पिता के लिये ताने देने का कोई मौका न छोड़ती। उसने उस कोने के बागीचे से छुटकारा पाने के लिये नवीन को एक रास्ता सुझाते हुए कहा, "क्योँ न हम बड़ी कार खरीद लें...नवीन"। "आईडिया तो अच्छा है पर रखेंगे कहाँ एक कार रखने की ही तो जगह है घर में", नवीन थोड़ा चिंतित स्वर में बोला। "जगह तो है न, वो गार्डन तुम्हारा, जहाँ आजकल दोनों लव बर्ड्स बैठते हैं।" सोनम व्यागतमक स्वर में बोली। "थोड़ा तमीज़ से बात करो,"नवीन क्रोध से बोला। लेकिन फिर भी सोनम ने अपने पति को पापा जी से बात करने का मन बना लिया। अगले दिन नवीन कुछ कार की तस्वीरों के साथ शाम को अपने पिता के पास गया और बोला, "पापा! मैं और सोनम एक बड़ी गाड़ी खरीदना चाहते हैं।" "पर बेटा एक बड़ी गाड़ी तो घर में पहले ही है, फिर उस नई गाड़ी की रखेंगे भी कहाँ?" अशोक जी ने प्रश्न किया। "ये जो बगीचा है, यहीँ गैराज बनवा लेंगे। वैसे भी सोनम से तो इसकी देखभाल होने से रही और मम्मी कब तक देखभाल करेंगी? इन पेड़ों को कटवाना ही ठीक रहेगा। वैसे भी ये सब जड़े मज़बूत कर घर की दीवारें कमज़ोर कर रहें है।" यह सुनकर प्रभा तो वहीँ कुर्सी पर सीना पकड़ कर बैठ गईं, अशोक जी ने क्रोध को काबू में करते हुए कहा, मुझे तुम्हारी माँ से भी बात करके थोड़ा सोचने का मौका दो। क्या पापा, मम्मी से क्या पूछना, वैसे भी इस जगह का इस्तेमाल भी क्या है नवीन थोड़ा चिड़चिड़ा कर बोला। "आप दोनों दिन भर इस जगह बगैर कुछ सोचे समझे, चार लोगों का लिहाज किये बग़ैर साथ में बैठे रहते हैं। अब आप दोनों कोई बच्चे तो नहीं हो। लेकिन आप दोनों ने दिन भर झूले पर साथ बैठे रहने का रिवाज बना लिया है और ये भी नहीँ सोचते कि चार लोग क्या कहेंगे। इस उम्र में मम्मी के साथ बैठने की बजाय आप अपनी उम्र के लोगों में उठा बैठी करेंगे तो वो ज़्यादा अच्छा लगेगा न कि ये सब।" और वह दनदनाते हुए अंदर चला गया। अंदर सोनम की बड़बड़ाहट भी ज़ारी थी। अशोक जी कड़वी सच्चाई का एहसास कर रहे थे। पर आज की बात से तो उनके साथ प्रभा जी भी सन्न रह गईं, अपने बेटे के मुँह से ऐसी बातें सुनकर दोनों को दिल भर आया था और टूट भी चुका था। रिटायरमेंट को अभी कुछ ही समय हुआ जो थोड़ा सकून से गुजरा था। पहले की ज़िन्दगी तो भागमभाग में ही निकल गयी थी, बच्चों के लिए सुख साधन जुटाने में। अशोक जी आज पूरी रात ऊहापोह में लगे रहे, कुछ सोचते रहे, कुछ समझते रहे और कुछ योजना बनाते रहे। लेकिन सुबह जब वे उठे तब बड़े शांत और प्रसन्न थे। वे रसोई में गये और खुद चाय बनाई। कमरे में आकर पहला कप प्रभा को उठा कर पकड़ाया और दूसरा खुद पीने लगे। आपने क्या सोचा? प्रभा ने रोआंसे लहज़े में पूछा। मैं सब ठीक कर दूँगा बस तुम धीरज रखो, अशोक बोले। पर हद से ज़्यादा निराश प्रभा उस दिन पौधों में पानी देने भी न निकलीं, और न ही किसी से कोई बात की। दिन भर सब सामान्य रहा, लेकिन शाम को अपने घर के बाहर To Let का बोर्ड टँगा देख नवीन ने भौंचक्के स्वर में अशोक से प्रश्न किया, "पापा माना कि घर बड़ा है पर ये To Let का बोर्ड किसलिए"? "अगले महीने मेरे स्टाफ के मिस्टर गुप्ता रिटायर हो रहें है, तो वो इसी घर में रहेँगे।", उन्होंने शान्ति पूर्ण तरीके से उत्तर दिया। हैरान नवीन बोला, "पर कहाँ?" "तुम्हारे पोर्शन में", अशोक जी ने सामान्य स्वर में उत्तर दिया। नवीन का स्वर अब हकलाने लगा था, "और हम लोग" "तुम्हे इस लायक बना दिया है दो तीन महीने में कोई फ्लैट देख लेना या कम्पनी के फ्लैट में रह लेना, अपनी उम्र के लोगों के साथ। "अशोक एक-एक शब्द चबाते हुए बोल रहे थे। हम दोनों भी अपनी उम्र के लोगों में उठे बैठेंगे। तुम्हारी माँ की सारी उम्र सबका लिहाज़ करने में निकल गयी। कभी बुजुर्ग तो कभी बच्चे। अब लिहाज़ की सीख तुम सबसे लेना बाकी रह गया थी। "पापा मेरा वो मतलब नहीँ था।", नवीन सिर झुकाकर बोला। नही बेटा तुम्हारी पीढ़ी ने हमें भी प्रैक्टिकल बनने का सबक दे दिया, जब हम तुम दोनों को साथ देखकर खुश हो सकते हैं तो तुम लोगों को हम लोगों से दिक्कत क्योँ है?" इस मकान को घर तुम्हारी माँ ने बनाया, ये पेड़ और इनके फूल तुम्हारे लिए माँगी गयी न जाने कितनी मनौतियों के साक्षी हैं, तो यह अनोखा कोना छीनने का अधिकार में किसी को भी नहीं दूँगा। पापा आप तो सीरियस हो गये, नवीन के स्वर अब नम्र हो चले थे। न बेटा... तुम्हारी मां ने जाने कितने कष्ट सहकर, कितने त्याग कर के मेरा साथ दिया आज इसी के सहयोग से मेरे सिर पर कोई कर्ज़ नहीँ है। इसलिये सिर्फ ये कोना ही नहीं पूरा घर तुम्हारी माँ का ऋणी है। घर तुम दोनों से पहले उसका है, क्योंकि जीभ पहले आती है, न कि दाँत। जब मंदिर में ईश्वर जोड़े में अच्छा लगता है तो मां बाप साथ में बुरे क्योँ लगते हैं? ज़िन्दगी हमें भी तो एक ही बार मिली है। इसलिए हम इसे अपने हिसाब से एंजॉय करना चाहते हैं। *******
- चाँदनी रात में…
दीपशिखा चाँदनी रात में शबनमी साथ में प्यार की वादियों ने कहानी लिखी, फूल हर सू खिले दिल से दिल थे मिले, एक राजा की क़िस्मत में रानी लिखी...... भीगा भीगा हुआ मौसमों का बदन, महकी महकी हवाओं की पायल बजी, किसने जादू भरी छेड़ दी बाँसुरी, मन की राधा ने तन मन की सुध बुध तजी। पनघटों के अधर पर किसी मेघ ने प्यास सदियों की कोई पुरानी लिखी... नील पंकज सरोवर में कुसुमित हुए, भोर किरणों की ले आ गई गागरी। रात की वो ख़ुमारी जो रग रग में थी, पी रही है अभी तक कोई बावरी। ओस की बूंद पर प्रीत के रंग से आप बीती सुवासित सुहानी लिखी... साथ पी के जिये पल जो तीरथ किये, जन्मों जन्मों की होती सफल साधना। रस भरे भाव की माधुरी से मदिर, नैन की ज्योति से झर रही कामना। सिंधु की बांह में चंचला चाह ने बहती नदिया की कल कल रवानी लिखी। ******
- इज्जत
सुमन ग़म्भीर मेरी आदत थी कि जब भी मैं किसी के घर काम करने जाती तो सबसे पहले अपना दुपट्टा उतारकर टाँग देती, फिर काम शुरू करती। पिछले एक हफ्ते से नया घर पकड़ा है। घर में कुल जमा चार सदस्य हैं। आँटी, अंकल और उनके दो बेटे। वह देर से बुलाती हैं और ज़्यादा काम भी नही होता इसीलिए सब जगह से काम निपटाकर आख़िरी में उनके यहाँ जाती और फुर्सत पाकर थोड़ी देर आँटी से बात भी कर लेती हूँ तो थकान दूर हो जाती है। रोज की तरह आज मैं बड़ी तन्मयता से पोंछा लगा रही थी। पास ही कुर्सी पर बैठी आँटी से बतियाती भी जा रही थी अचानक उन्होंने पूछा "सुधा, तू हर जगह ऐसे ही काम करती है, बगैर दुपट्टे के?" "हाँजी आँटी जी, मुझसे दुपट्टा लेकर काम बिल्कुल नही होता" हाथ चलाते हुए मैंने जवाब दिया। "बुरा ना मानना! तू मेरी बेटी समान है इसीलिए कह रही हूँ।" पल भर के लिए आँटी चुप हो गईं फिर बोलीं "ज़रा अभी अपने कुर्ते के गले की ओर देखना" मैंने अपने गले की तरफ देखा तो मैं खुद ही खिसिया गई। कुर्ते का गला बड़ा था इस वजह से मेरे शरीर का बहुत कुछ हिस्सा दिख रहा था। यहाँ तक कि थोड़ी सी शमीज़ भी। "देखा? औरत होकर बार-बार मेरी निगाह पड़ जाती है; तो गलती से ही सही, अगर आते जाते मर्दों की नज़र पड़ जायें तो तुम लोग ही कहोगी कि फलाँ घर के आदमी बहुत ख़राब हैं, कामवालियों को देखते रहते हैं। लेकिन जब सामने कुछ दिख रहा हो, तो किसी की भी नज़र पड़ ही जाती है। अब कोई आँख बंद करके तो नही चल सकता न? इसीलिये खुद ही कायदे से रहना चाहिए। चल मैं तुझे बताती हूँ कैसे करना है, देख ऐसे" आँटी ने बड़े प्रेम से अपनी साड़ी के पल्लू से ढककर बताया। वो मुझे समझा रही थीं और मैं उन्हें एकटक देखे जा रही थी। ऐसा लग रहा था कि जैसे मेरी माई बोल रही हैं। जो बहुत पहले इस दुनिया से चली गई थी, तब शायद मैं आठ-नौ वर्ष की थी। "ऐसे क्या देख रही है तू?" आँटी ने कहा तो मेरा गला भर आया "सही कह रही हैं आप! लेकिन आज तक किसी ने मुझसे कुछ नही कहा, न ही कुछ बताया; शायद इसीलिये इस ओर कभी मेरा ध्यान ही नही गया।" कहते हुए मैंने दुपट्टा सामने से ढककर कमर में कसकर बाँध लिया। *******
- मेरे नैना
मीनाक्षी पाठक नैना मेरे मुझे छलने लगे बेवजह ही बरसने लगे जख्म हैं गहरा पर बाहर पहरा रिश्तों के धागे कतरने लगे हैं जुबान पर ठहरा दर्द है बहरा और होंठ मेरे मुझ पर हंसने लगे हैं देता नही कोई साथ मेरा पैर भी आगे पीछे चलने लगे हैं है तेज बहुत इस दिल की धड़कन जैसे तन से प्राण निकलने लगे हैं नैना मेरे मुझे छलने लगे है...... ******
- रिश्ता
लक्ष्मी रोज की तरह रात में अपना लेपटॉप लिए बिरजू बिस्तर के एक ओर बैठकर अपने आफिस के काम में व्यस्त था। बिस्तर के दूसरी ओर उसकी पत्नी सुधा आराम से सो रही थी कि तभी एक नोटिफिकेशन बजी। बिरजू ने जैसे ही नोटिफिकेशन खोला तो उसे विश्वास नहीं हो रहा था। क्या ये सच है? उस खूबसूरत लड़की ने उसकी फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर ली, जिससे वह पिछले कई दिनों से दोस्ती करना चाहता था। इतनी खूबसूरत कि उसकी पहली बार डीपी देखते ही उसपर उसका दिल आ गया था और मुंह से बस यही निकला। उफ्फ बला की खूबसूरत है, काश.....ये ....ये मेरी पत्नी होती तो ....साले मेरे दोस्त ... मेरे आफिस वाले और रिश्तेदार जलभुन जाते .... मगर हाय री किस्मत .... मां बाबूजी के कहे से ये सीधी सादी गांव की लड़की मेरे पल्ले बांध दी गई। खैर ... पत्नी ना सही दोस्त ही सही कम से कम प्रोफाइल देखकर तो लोग कहेंगे वाह कितनी ब्यूटीफुल फ्रेंड्स है बिरजू की। अभी वह मन ही मन मुस्कुरा रहा था कि अचानक उसे शाम की बात याद आई जब वह सोफे पर बैठा हुआ था और सुधा सब्जी लेने बाजार गई हुई थी और जब वह लौटी थी तो उसने बताया कि आज जब वह सब्जियां लेकर वापस रिक्शा से घर लौट रही थी तो एक बाइक वाला लड़का उसके पीछे पीछे चल दिया वो लगातार उसे देखकर छेड़छाड़ करने की हरकत कर रहा था। फिर .... बिरजू ने अपना ध्यान टीवी से हटाकर गुस्से से पूछा, “फिर क्या ... मैंने रिक्शेवाले से बताया तो उसने भी पीछे देखा और कहा ये तो आवारागर्दी करते रहते हैं। आप इन्हें इग्नोर किया कीजिए। मैंने भी उसकी और देखना बंद कर दिया। मगर वो लगातार पीछा कर रहा था। तब मैंने उस रिक्शेवाले से एक अंजान गली के दरवाजे पर मुझे उतारने को कहा और वहां चुपचाप एक ओट में खड़ी हो गई रिक्शा वाला भी समझ गया था और वो मुझे उतारकर वहां से किराया लेकर चला गया। फिर बस वो लड़का, मेरा घर उस गली में है, जानकार वहां से रफूचक्कर हो गया और मैं कुछ ही देर में वहां से दूसरी ओर निकल आई। वहां से दूसरी रिक्शा लेकर घर चली आई। मेरे रास्ता बदलने से समस्या तुरंत बड़ी होने से पहले ही सुलझ गई। आगे से अपना मोबाइल फोन अपने साथ रखा करो और तुरंत पुलिस विभाग को सूचित किया करो। जी ... कहकर वह अंदर चली गई थी। एक बार फिर से नोटिफिकेशन बजी। बिरजू ने देखा तो दूसरी ओर से हाय का इमोजी सेंड हुआ फिर उससे पूछा गया कि आप मैरिड हो या अनमैरिड। आपकी प्रोफाइल देखकर में काफी इंप्रेस हूं। बिरजू ये पढ़कर और भी खुश हो रहा था वाह .. ये तो मुझसे पहले से ही इंप्रेस है। तभी अचानक दूसरी ओर दिनभर की थकावट से चूर उसकी नजर अपनी पत्नी सुधा पर पहुंच गई। उसे ऐसे निश्चित देखकर वह सोच रहा था कि वह इतनी सुरक्षित कैसे महसूस करती है कि वह मेरे साथ अपने बरसों बिताए घर को छोड़कर बिल्कुल नए घर में इतनी आराम से सो सकती है। वह अपने माता-पिता के घर से बहुत दूर है। जहां उसने 24 घंटे अपने परिवार से घिरे रहते हुए बिताए हैं। जब वह परेशान या उदास होती थी तो उसकी मां वहां होती थी। ताकि वह अपनी गोद में रो सके। उसकी बहन या भाई चुटकुले सुनाते होगे और उसे हंसाते होंगे। उसके पिता घर आते होंगे और उसे वह सब कुछ देते थे जो उसे पसंद था। और फिर भी ...ये सब छोड़कर उसने मुझपर अपने पति पर इतना भरोसा किया। ये सारे विचार बिरजू के मन में आए तो उसने तुरंत लेपटॉप उठाया और दूसरी और आ रहे मैसेज और उस नये फ्रेंड को ब्लॉक कर दिया। लेपटॉप एक ओर रखकर वह अपनी पत्नी की ओर मुड़ा और उसके बगल में सो गया और मन ही मन बुदबुदाने लगा मैं एक आदमी हूं कोई बच्चा नहीं। मैंने उसके प्रति वफादार रहने की शपथ ली है और ऐसा ही होगा। मैं हमेशा के लिए एक आदमी बनने के लिए लड़ूंगा। जो अपनी पत्नी को धोखा नहीं देता और एक परिवार को नहीं तोड़ता। बल्कि हमेशा साथ रहता है और अंत तक साथ ही रहेगा। शायद इसी प्यार और विश्वास के भरोसे में रिश्ता जन्म-जन्म का होता है और मुस्कुरा कर आंख बंद करके लेट गया। *******
- खोजता हूँ
मदन मोहन शर्मा 'सजल' हूँ अकेला इस जहां में, मंजिलें नाकाम हैं। हर कदम पर प्रीत धोखा, भावना का दाम है।। प्यार का बंधन सुहाना, सोचता हूँ मैं प्रिये। ईश का वरदान है यह, सोचता हूँ मैं प्रिये।। प्रेम सच्चा हो सभी में, नफरतों का नाश हो। नेह सागर लें हिलोरे, काश! यह सब काश हो।। रक्त-रंजित इस धरा पर, खोजता इंसान हूँ। जाति बंधन से परे हो, मानता इंसान हूँ।। खोजते हैं सब स्वयं को, या किसी भगवान को? चेतना से शून्य हैं सब, पालते हैवान को।। देह माटी की बनी है, जानते हैं सब यहाँ। द्वेषता की ज्वाल में क्यों, सेकतें हैं कर यहाँ।। “मैं” अहम भीषण गरल है, त्याग सबने “हम” दिया। जानकर अनजान बनते, भोर को तम कह दिया।। लोक हितकारी जतन को, ढूँढ़ता हूँ मैं प्रिये। खो गई इंसानियत को, खोजता हूँ मैं प्रिये।। *******











