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खोजता हूँ

  • Jul 13, 2023
  • 1 min read

मदन मोहन शर्मा 'सजल'


हूँ अकेला इस जहां में, मंजिलें नाकाम हैं।
हर कदम पर प्रीत धोखा, भावना का दाम है।।
प्यार का बंधन सुहाना, सोचता हूँ मैं प्रिये।
ईश का वरदान है यह, सोचता हूँ मैं प्रिये।।

प्रेम सच्चा हो सभी में, नफरतों का नाश हो।
नेह सागर लें हिलोरे, काश! यह सब काश हो।।
रक्त-रंजित इस धरा पर, खोजता इंसान हूँ।
जाति बंधन से परे हो, मानता इंसान हूँ।।

खोजते हैं सब स्वयं को, या किसी भगवान को?
चेतना से शून्य हैं सब, पालते हैवान को।।
देह माटी की बनी है, जानते हैं सब यहाँ।
द्वेषता की ज्वाल में क्यों, सेकतें हैं कर यहाँ।।

“मैं” अहम भीषण गरल है, त्याग सबने “हम” दिया।
जानकर अनजान बनते, भोर को तम कह दिया।।
लोक हितकारी जतन को, ढूँढ़ता हूँ मैं प्रिये।
खो गई इंसानियत को, खोजता हूँ मैं प्रिये।।

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