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  • मेरे हमनशीं

    संपदा ठाकुर गुज़रे लम्हें याद करे या तुझ को याद करे, ऐ ज़िंदगी तूही बता दे कैसे तुझे शाद करे। तू नसीब बनकर मेरा सर पर चमकता रहे, तु मेरा ज़हां फिर क्यु ना घर आबाद करे। मुक़द्दर से मिला तू ये ज़िस्म ए जाँ वार दू, तेरी बांहो से जुदा कैसे उम्र ए बर्बाद करे। कितने दर्द ए ऊरूग़ो ज़वाल से ग़ुज़री जाँ, कैसे ख़ुशी वास्ते अज़िय्यत ए तादाद करे। ऐ मेरे हमनशीं हमकदम तुझसे मेरा वज़ूद, ये आरज़ू बाहों में श्वासों को आज़ाद करे। खुदाया मेरी अना उनके सरपरस्त रखना, ता उम्र तुझसे वास्ता ये दुआ उम्रे बाद करे। मेरे दस्त ए नक़्श ए हयात को बनाऐ रख ‘संपदा’ क्या-क्या खोया-पाया हिसाब करे। ******

  • शिकवा

    प्रीती शुक्ला कहा उसने के इश्क है तुमसे... मगर दिल से कहा नहीं। कह रहा था बस दूर से... पास आया तो कुछ कहा नहीं। कहा था उस से कि कहो... राहे सफर में साथ कब तलक, कहा तो ज़िंदगी भर है मगर... मैं ही हूँ ज़िंदगी, ये कहा नहीं। इस दिले दागदार में.... इतनी जगह कहाँ के पालूं इन्हें, मेरी ये हसरतें करेगा पूरी... उसने भी कभी कहा नहीं। तेरे जैसा कोई और नहीं... हो सकता लिख के भेजा है,, मगर उसने आने के लिए.... खत में कुछ भी कहा नहीं। दरबदर होने से पहले सम्हाले जाते... तो बचा लेते वो हमें, सारी दुनिया को किये इशारे.... मगर मुझसे कुछ कहा नही। किसी ने पूछा तो पता प्रीत का.... उसकी गलियों का ही दिया, ले जाएगा मांग सिंदूरी कर..... ये अबतक उसने कहा नहीं। ****

  • वरदान

    नताशा हर्ष गुरनानी पति देव से लड़ाई हो गई जो आज तक कभी नहीं हुई। मेरे लिए लाल साड़ी लाए थे जो मुझे बिल्कुल भी पसंद नही आई। पहली बार लड़ाई हुई एक नया अनुभव हुआ पर साथ में रोना भी बहुत आया और मन दुखी हुआ सो अलग। रोते-रोते मंदिर में बैठ गई और भगवान से कहा कि भगवान कुछ तो चमत्कार कर दो। अरे ये क्या भगवान सामने प्रगट हो गए और बोले क्या चाहिए बोलो। अब तो मैं डर गई कि भगवान जी मेरे सामने है या मैं उनके पास पहुंच गई। खुद को चुखोटी काटी, अरे नही नहीं मैं तो अभी जिंदा हूं। बोलो तुम्हें क्या वरदान चाहिए। भगवान जी मुझे कोई अनोखा फिल्मी वरदान चाहिए। फिल्मी वरदान, ठीक है दिया, आज के बाद तुम जब-जब लाल साड़ी पहनोगी तब-तब तुम अदृश्य हो जाओगी बिलकुल मिस्टर इंडिया के अनिल कपूर की तरह। भगवान जी उसे तो लाल कांच से देख पाते थे और आप मुझे लाल साड़ी पहना कर गुम कर रहे है। यही तो ट्विस्ट है यहां, अगर तुमने लाल साड़ी पहनी तब ही तुम अदृश्य हो पाओगी वर्ना नही। भगवान जी सुबह पति देव से लड़ाई लाल साड़ी को लेके ही हुई थी। इसलिए तो तुम्हें लाल साड़ी का वरदान दिया है। अब जाओ बाजार और लाओ ढेर सारी लाल साड़ी उन्हे पहनों और अदृश्य होकर जो मन करे वो करो। और भगवान जी गायब। हे भगवान ये कैसा वरदान दे दिया लाल साड़ी ही तो नहीं पहननी थी। अब एक साड़ी रखी है उसे पहनकर बाहर निकली मोहल्ले में किसी ने देखा नही वाह-वाह मैं सही में अदृश्य हो गई। साड़ी की दुकान पर गई वहां जितनी लाल साड़ी थी सब उठा ली और लेके जाने लगी दुकान वाले को लाल साड़ी इधर से उधर घूमते दिख रही थी पर मैं नहीं वाह-वाह ये तो मजा आ गया। घर में लाल साड़ियों का ढेर लग गया। शाम को जब पतिदेव के सामने लाल साड़ी पहन कर आई ताकि वो मुझे देख खुश हो जाए पर ये क्या मैं तो इनको दिख ही नही रही। ये सारे घर में मुझे ढूंढ रहे है और मै इनके सामने इतनी सज धज के खड़ी हूं फिर भी नही दिख रही इनको। हे भगवान ये तो लोचा हो गया। भगवान जी ये नही चलेगा ऐसा ट्विस्ट हटाइए कुछ ऐसा करिए कि अपने पति को लाल साड़ी में दिख जाऊँ। भगवान जी वापस आए और बोले तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता मैँ अपना वरदान वापस लेके जा रहा हूं। अरे अरे सुनिए तो तब तक पतिदेव आ गए और बोले कहा चली गई थी और किसे बुला रही थी मैं तो तुम्हे कब से ढूंढ रहा था। फिर उनकी नजरें जो मुझ पर गई और मुझ पर ही ठहर गई। *******

  • स्त्री और पुरुष

    प्रेमचंद विपिन बाबू के लिए स्त्री ही संसार की सुन्दर वस्तु थी। वह कवि थे और उनकी कविता के लिए स्त्रियों के रुप और यौवन की प्रशसा ही सबसे चिंताकर्षक विषय था। उनकी दृष्टि में स्त्री जगत में व्याप्त कोमलता, माधुर्य और अलंकारों की सजीव प्रतिमा थी। जबान पर स्त्री का नाम आते ही उनकी आंखे जगमगा उठती थीं, कान खड़ें हो जाते थे, मानो किसी रसिक ने गाने की आवाज सुन ली हो। जब से होश संभाला, तभी से उन्होंने उस सुंदरी की कल्पना करनी शुरु की जो उसके हृदय की रानी होगी; उसमें ऊषा की प्रफुल्लता होगी, पुष्प की कोमलता, कुंदन की चमक, बसंत की छवि, कोयल की ध्वनि—वह कवि वर्णित सभी उपमाओं से विभूषित होगी। वह उस कल्पित मूत्रि के उपासक थे, कविताओं में उसका गुण गाते, वह दिन भी समीप आ गया था, जब उनकी आशाएं हरे-हरे पत्तों से लहरायेंगी, उनकी मुरादें पूरी हो होगी। कालेज की अंतिम परीक्षा समाप्त हो गयी थी और विवाह के संदेशे आने लगे थे। विवाह तय हो गया। बिपिन बाबू ने कन्या को देखने का बहुत आग्रह किया, लेकिन जब उनके मांमू ने विश्वास दिलाया कि लड़की बहुत ही रुपवती है, मैंने अपनी आंखों से देखा है, तब वह राजी हो गये। धूमधाम से बारात निकली और विवाह का मुहूर्त आया। वधू आभूषणों से सजी हुई मंडप में आयी तो विपिन को उसके हाथ-पांव नजर आये। कितनी सुंदर उंगलिया थीं, मानों दीप-शिखाएं हो, अंगो की शोभा कितनी मनोहारिणी थी। विपिन फूले न समाये। दूसरे दिन वधू विदा हुई तो वह उसके दर्शनों के लिए इतने अधीर हुए कि ज्यों ही रास्ते में कहारों ने पालकी रखकर मुंह-हाथ धोना शुरु किया, आप चुपके से वधू के पास जा पहुंचे। वह घूंघट हटाये, पालकी से सिर निकाले बाहर झांक रही थी। विपिन की निगाह उस पर पड़ गयी। यह वह परम सुंदर रमणी न थी जिसकी उन्होने कल्पना की थी, जिसकी वह बरसों से कल्पना कर रहे थे---यह एक चौड़े मुंह, चिपटी नाक, और फुले हुए गालों वाली कुरुपा स्त्री थी। रंग गोरा था, पर उसमें लाली के बदले सफदी थी; और फिर रंग कैसा ही सुंदर हो, रुप की कमी नहीं पूरी कर सकता। विपिन का सारा उत्साह ठंडा पड़ गया---हां! इसे मेरे ही गले पड़ना था। क्या इसके लिए समस्त संसार में और कोई न मिलता था? उन्हें अपने मांमू पर क्रोध आया जिसने वधू की तारीफों के पुल बांध दिये थे। अगर इस वक्त वह मिल जाते तो विपिन उनकी ऐसी खबर लेता कि वह भी याद करते। जब कहारों ने फिर पालकियां उठायीं तो विपिन मन में सोचने लगा, इस स्त्री के साथ कैसे मैं बोलूगा, कैसे इसके साथ जीवन काटंगा। इसकी ओर तो ताकने ही से घृणा होती है। ऐसी कुरुपा स्त्रियां भी संसार में हैं, इसका मुझे अब तक पता न था। क्या मुंह ईश्वर ने बनाया है, क्या आंखे है! मैं और सारे ऐबों की ओर से आंखे बंद कर लेता, लेकिन वह चौड़ा-सा मुंह! भगवान्! क्या तुम्हें मुझी पर यह वज्रपात करना था। विपिन हो अपना जीवन नरक-सा जान पड़ता था। वह अपने मांमू से लड़ा। ससुर को लंबा खर्रा लिखकर फटकारा, मां-बाप से हुज्जत की और जब इससे शांति न हुई तो कहीं भाग जाने की बात सोचने लगा। आशा पर उसे दया अवश्य आती थी। वह अपने का समझाता कि इसमें उस बेचारी का क्या दोष है, उसने जबरदस्ती तो मुझसे विवाह किया नहीं। लेकिन यह दया और यह विचार उस घृणा को न जीत सकता था जो आशा को देखते ही उसके रोम-रोम में व्याप्त हो जाती थी। आशा अपने अच्छे-से-अच्छे कपड़े पहनती; तरह-तरह से बाल संवारती, घंटो आइने के सामने खड़ी होकर अपना श्रृंगार करती, लेकन विपिन को यह शुतुरगमज-से मालूम होते। वह दिल से चाहती थी कि उन्हें प्रसन्न करुं, उनकी सेवा करने के लिए अवसर खोजा करती थी; लेकिन विपिन उससे भागा-भागा फिरता था। अगर कभी भेंट हो जाती तो कुछ ऐसी जली-कटी बातें करने लगता कि आशा रोती हुई वहां से चली जाती। सबसे बुरी बात यह थी कि उसका चरित्र भ्रष्ट होने लगा। वह यह भूल जाने की चेष्टा करने लगा कि मेरा विवाह हो गया है। कई-कई दिनों क आशा को उसके दर्शन भी न होते। वह उसके कहकहे की आवाजे बाहर से आती हुई सुनती, झरोखे से देखती कि वह दोस्तों के गले में हाथ डालें सैर करने जा रहे है और तड़प कर रहे जाती। एक दिन खाना खाते समय उसने कहा—अब तो आपके दर्शन ही नहीं होतें। मेरे कारण घर छोड़ दीजिएगा क्या ? विपिन ने मुंह फेर कर कहा—घर ही पर तो रहता हूं। आजकल जरा नौकरी की तलाश है इसलिए दौड़-धूप ज्यादा करनी पड़ती है। आशा—किसी डाक्टर से मेरी सूरत क्यों नहीं बनवा देते ? सुनती हूं, आजकल सूरत बनाने वाले डाक्टर पैदा हुए है। विपिन— क्यों नाहक चिढ़ती हो, यहां तुम्हे किसने बुलाया था ? आशा— आखिर इस मर्ज की दवा कौन करेंगा ? विपिन— इस मर्ज की दवा नहीं है। जो काम ईश्चर से ने करते बना उसे आदमी क्या बना सकता है? आशा – यह तो तुम्ही सोचो कि ईश्वर की भुल के लिए मुझे दंड दे रहे हो। संसार में कौन ऐसा आदमी है जिसे अच्छी सूरत बुरी लगती हो, किन तुमने किसी मर्द को केवल रुपहीन होने के कारण क्वांरा रहते देखा है, रुपहीन लड़कियां भी मां-बाप के घर नहीं बैठी रहतीं। किसी-न-किसी तरह उनका निर्वाह हो ही जाता है; उसका पति उप पर प्राण ने देता हो, लेकिन दूध की मक्खी नहीं समझता। विपिन ने झुंझला कर कहा—क्यों नाहक सिर खाती हो, मै तुमसे बहस तो नहीं कर रहा हूं। दिल पर जब्र नहीं किया जा सकता और न दलीलों का उस पर कोई असर पड़ सकता है। मैं तुम्हे कुछ कहता तो नहीं हूं, फिर तुम क्यों मुझसे हुज्जत करती हो ? आशा यह झिड़की सुन कर चली गयी। उसे मालूम हो गया कि इन्होने मेरी ओर से सदा के लिए ह्रदय कठोर कर लिया है। विपिन तो रोज सैर-सपाटे करते, कभी-कभी रात को गायब रहते। इधर आशा चिंता और नैराश्य से घुलते-घुलते बीमार पड़ गयी। लेकिन विपिन भूल कर भी उसे देखने न आता, सेवा करना तो दूर रहा। इतना ही नहीं, वह दिल में मानता था कि वह मर जाती तो गला छुटता, अबकी खुब देखभाल कर अपनी पसंद का विवाह करता। अब वह और भी खुल खेला। पहले आशा से कुछ दबता था, कम-से-कम उसे यह धड़का लगा रहता था कि कोई मेरी चाल-ढ़ाल पर निगाह रखने वाला भी है। अब वह धड़का छुट गया। कुवासनाओं में ऐसा लिप्त हो गया कि मरदाने कमरे में ही जमघटे होने लगे। लेकिन विषय-भोग में धन ही का सर्वनाश होता, इससे कहीं अधिक बुद्धि और बल का सर्वनाश होता है। विपिन का चेहरा पीला लगा, देह भी क्षीण होने लगी, पसलियों की हड्डियां निकल आयीं आंखों के इर्द-गिर्द गढ़े पड़ गये। अब वह पहले से कहीं ज्यादा शोक करता, नित्य तेल लगता, बाल बनवाता, कपड़े बदलता, किन्तु मुख पर कांति न थी, रंग-रोगन से क्या हो सकता ? एक दिन आशा बरामदे में चारपाई पर लेटी हुई थी। इधर हफ्तों से उसने विपिन को न देखा था। उन्हे देखने की इच्छा हुई। उसे भय था कि वह सन आयेंगे, फिर भी वह मन को न रोक सकी। विपिन को बुला भेजा। विपिन को भी उस पर कुछ दया आ गयी आ गयी। आकार सामने खड़े हो गये। आशा ने उनके मुंह की ओर देखा तो चौक पड़ी। वह इतने दुर्बल हो गये थे कि पहचनाना मुशिकल था। बोली—तुम भी बीमार हो क्या? तुम तो मुझसे भी ज्यादा घुल गये हो। विपिन—उंह, जिंदगी में रखा ही क्या है जिसके लिए जीने की फिक्र करुं ! आशा—जीने की फिक्र न करने से कोई इतना दुबला नहीं हो जाता। तुम अपनी कोई दवा क्यों नहीं करते? यह कह कर उसने विपिन का दाहिन हाथ पकड़ कर अपनी चारपाई पर बैठा लिया। विपिन ने भी हाथ छुड़ाने की चेष्टा न की। उनके स्वाभाव में इस समय एक विचित्र नम्रता थी, जो आशा ने कभी ने देखी थी। बातों से भी निराशा टपकती थी। अक्खड़पन या क्रोध की गंध भी न थी। आशा का ऐसा मालुम हुआ कि उनकी आंखो में आंसू भरे हुए है। विपिन चारपाई पर बैठते हुए बोले—मेरी दवा अब मौत करेगी। मै तुम्हें जलाने के लिए नहीं कहता। ईश्वर जानता है, मैं तुम्हे चोट नहीं पहुंचाना चाहता। मै अब ज्यादा दिनों तक न जिऊंगा। मुझे किसी भयंकर रोग के लक्षण दिखाई दे रहे है। डाक्टर नें भी वही कहा है। मुझे इसका खेद है कि मेरे हाथों तुम्हे कष्ट पहुंचा पर क्षमा करना। कभी-कभी बैठे-बैठे मेरा दिल डूब दिल डूब जाता है, मूर्छा-सी आ जाती है। यह कहतें-कहते एकाएक वह कांप उठे। सारी देह में सनसनी सी दौड़ गयी। मूर्छित हो कर चारपाई पर गिर पड़े और हाथ-पैर पटकने लगे। मुंह से फिचकुर निकलने लगा। सारी देह पसीने से तर हो गयी। आशा का सारा रोग हवा हो गया। वह महीनों से बिस्तर न छोड़ सकी थी। पर इस समय उसके शिथिल अंगो में विचित्र स्फुर्ति दौड़ गयी। उसने तेजी से उठ कर विपिन को अच्छी तरह लेटा दिया और उनके मुख पर पानी के छींटे देने लगी। महरी भी दौड़ी आयी और पंखा झलने लगी। पर भी विपिन ने आंखें न खोलीं। संध्या होते-होते उनका मुंह टेढ़ा हो गया और बायां अंग शुन्य पड़ गया। हिलाना तो दूर रहा, मूंह से बात निकालना भी मुश्किल हो गया। यह मूर्छा न थी, फालिज था। फालिज के भयंकर रोग में रोगी की सेवा करना आसान काम नहीं है। उस पर आशा महीनों से बीमार थी। लेकिन उस रोग के सामने वह पना रोग भूल गई। 15 दिनों तक विपिन की हालत बहुत नाजुक रही। आशा दिन-के-दिन और रात-की-रात उनके पास बैठी रहती। उनके लिए पथ्य बनाना, उन्हें गोद में सम्भाल कर दवा पिलाना, उनके जरा-जरा से इशारों को समझाना उसी जैसी धैयशाली स्त्री का काम था। अपना सिर दर्द से फटा करता, ज्वर से देह तपा करती, पर इसकी उसे जरा भी परवा न थी। १५ दिनों बाद विपिन की हालत कुछ सम्भली। उनका दाहिना पैर तो लुंज पड़ गया था, पर तोतली भाषा में कुछ बोलने लगे थे। सबसे बुरी गत उनके सुन्दर मुख की हुई थी। वह इतना टेढ़ा हो गया था जैसे कोई रबर के खिलौने को खींच कर बढ़ा दें। बैटरी की मदद से जरा देर के लिए बैठे या खड़े तो हो जाते थे¬; लेकिन चलने−फिरने की ताकत न थी। एक दिनों लेटे−लेटे उन्हे क्या ख्याल आया। आईना उठा कर अपना मुंह देखने लगे। ऐसा कुरुप आदमी उन्होने कभी न देखा था। आहिस्ता से बोले−−आशा, ईश्वर ने मुझे गरुर की सजा दे दी। वास्तव में मुझे यह उसी बुराई का बदला मिला है, जो मैने तुम्हारे साथ की। अब तुम अगर मेरा मुंह देखकर घृणा से मुंह फेर लो तो मुझेसे उस दुर्व्यवहार का बदला लो, जो मैने, तुम्हारे साथ किए है। आशा ने पति की ओर कोमल भाव से देखकर कहा−−मै तो आपको अब भी उसी निगाह से देखती हुं। मुझे तो आप में कोई अन्तर नहीं दिखाई देता। विपिन−−वाह, बन्दर का−सा मुंह हो गया है, तुम कहती हो कि कोई अन्तर ही नहीं। मैं तो अब कभी बाहर न निकलूंगा। ईश्वर ने मुझे सचमुच दंड दिया। बहुत यत्न किए गए पर विपिन का मुंह सीधा न हुआ। मुख्य का बायां भाग इतना टेढ़ा हो गया था कि चेहरा देखकर डर मालूम होता था। हां, पैरों में इतनी शक्ति आ गई कि अब वह चलने−फिरने लगे। आशा ने पति की बीमारी में देवी की मनौती की थी। आज उसी की पुजा का उत्सव था। मुहल्ले की स्त्रियां बनाव−सिंगार किये जमा थीं। गाना−बजाना हो रहा था। एक सेहली ने पुछा−क्यों आशा, अब तो तुम्हें उनका मुंह जरा भी अच्छा न लगता होगा। आशा ने गम्भीर होकर कहा−मुझे तो पहले से कहीं मुंह जरा भी अच्छा न लगता होगा। ‘चलों, बातें बनाती हो।’ ‘नही बहन, सच कहती हुं; रुप के बदले मुझे उनकी आत्मा मिल गई जो रुप से कहीं बढ़कर है।’ विपिन कमरे में बैठे हुए थे। कई मित्र जमा थे। ताश हो रहा था। कमरे में एक खिड़की थी जो आंगन में खुलती थी। इस वक्त वह बन्दव थी। एक मित्र ने उसे चुपके से खोल दिया। एक मित्र ने उसे चुपके दिया और शीशे से झांक कर विपिन से कहा−− आज तो तुम्हारे यहां पारियों का अच्छा जमघट है। विपिन−बन्दा कर दो। ‘अजी जरा देखो तो: कैसी−कैसी सूरतें है! तुम्हे इन सबों में कौन सबसे अच्छी मालूम होती है ? विपिन ने उड़ती हुई नजरों से देखकर कहा−−मुझे तो वहीं सबसे अच्छी मालूम होती है जो थाल में फुल रख रही है। ‘वाह री आपकी निगाह! क्या सूरत के साथ तुम्हारी निगाह भी बिगड़ गई? मुझे तो वह सबसे बदसुरत मालूम होती है।’ ‘इसलिए कि तुम उसकी सूरत देखते हो और मै उसकी आत्मा देखता हूं।’ ‘अच्छा, यही मिसेज विपिन हैं?’ ‘जी हां, यह वही देवी है। *******

  • OH! MOTHER EARTH!

    Dr. Jahan Singh Jahan You are the most beautiful daughter of universe! As pure as prayer’s sonnet & verse!! Every life blooms in your cradle! Poor in hut & king in castle!! May it be weaver nest Ropeway of spider web Army of penguins Pyramid of termites Cunning monkey or gentle donkey! Polar bear or spring dear!! Wild ostrich or domestic dove! They are your babies of love!! They love you, never hurt you! OH! You are pretty mother! In green clad of forest! Deep blue oceans are your eyes! Valley of flowers in your neck! With crown of Himalayas Rivers are veins & atmosphere in lungs. Life to carry Make us eat, drink & be marry!! OH! Mother looking so cool! Sun, Moon & Stars join your school!! Alas! Mother your thankless child is human! A wisest fool, A wickedest tool! Making you sick, full of tears! Snatching smile and raining fears!! I know mother you pardon all wrongs! Still you sing sweet songs!! OH! Wisest fool it’s your turn! Care your mother and bring smile! She has to walk miles & miles!! OH! Mother earth you are beautiful! BEAUTIFUL & BEAUTIFUL!! *****

  • खामोशी दे दी..

    नीलम गुप्ता जो लोग मेरे बोलने से बहुत परेशान थे मैने उनको तोहफ़े में ख़ामोशी दे दी किसी बात पर अपनी राय नहीं देती मैने चुप्पी अब अधरों पे धर ली हां, बहुत टोकते थे कहते थे तुम कितना बोलती हो हर जगह ही अपना मुंह खोलती हो हर बात पे खिखिलाती रहती हो कभी चुप क्यों नहीं रह पाती हो मैने भी ख़ामोशी से दोस्ती कर ली हर बात को मानने की हामी भर ली किसी बात पर विरोध जताती नहीं अपनी राय किसी को बताती नहीं उनको अब नई शिकायत हो गई घर में इतनी उदासी क्यों है जी क्या किसी की मौत हो गई मैने भी ख़ामोशी से कह दिया हां, मौत ही तो हो गई मुस्कुराहट की खिलखिलाहट की बेरोक, टोक बोलने की.... अपनी तरह कहने, सुनने की एक इंसान से उसके तरह होने की ये मौत नहीं तो फ़िर और क्या है... *******

  • बंधन तोड़ो सुख से जियो

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव एक बार एक व्यक्ति कुछ हालातों से मजबूर अपनी ही धुन में खोया-खोया कहीं चला जा रहा था। दिमाग में हजारों सवाल, तभी उसकी नजर एक विशाल हाथी पर पड़ी, जिसे महावत ने एक पतली रस्सी से बांध रखा था। सारे सवाल किनारे हो गए और अब उसके मन में यह बात चल रही थी कि इतना बड़ा हाथी जो मोटी चेन को भी तोड़ सकता है, उसके लिए ऐसी क्या मुश्किल है जो वह इतनी पतली सी रस्सी के सहारे भी बंधा हुआ खड़ा है। वह रस्सी को तोड़ने का कोई प्रयास नहीं कर रहा है। उत्सुकतावश वह व्यक्ति महावत के पास गया। उस व्यक्ति ने पूछा, यह हाथी अपनी जगह से इधर उधर क्यों नहीं भागता और रस्सी क्यों नहीं तोड़ता है? महावत ने जवाब दिया, जब यह हाथी छोटा था तब भी हम इसी रस्सी से इसे बांधते थे। जब यह छोटा था, तो बार-बार इस रस्सी को तोड़ने की कोशिश करता था पर कभी तोड़ ही नहीं पाया। कारण, तब उसमें इतनी शक्ति नहीं थी। मगर, बार-बार रस्सी तोड़ने की नाकाम कोशिश करने के कारण हाथी को यह विश्वास हो गया कि रस्सी को तोड़ना असंभव है। आज बड़ा हो जाने और काफी शक्तिशाली हो जाने के बाद भी उसके मन में यह बात जम गई है कि वह रस्सी को नहीं तोड़ पाएगा। यही सोचकर वह रस्सी को तोड़ने की अब कोशिश भी नहीं करता है। यह सुनकर वह व्यक्ति दंग रह गया। उस व्यक्ति के दिमाग में जो हजारों सवाल चल रहे थे, उनका जवाब अब उसे मिल चुका था। पुरानी नाकामियों ने उसके भी मन में असफल होने का डर बिठा दिया था। मगर, हाथी की कहानी ने उसके दिमाग के जाले साफ कर दिए थे। उस हाथी की तरह हममें से भी कई लोग ऐसे हैं, जो अपने जिंदगी में कई नाकामियों के बाद हार मानकर बैठ जाते हैं। कोशिश करना छोड़ देते हैं। मगर, सफलता उन्हें ही मिलती है, जो बार-बार प्रयास करते रहते हैं। सार - असफलता जीवन का एक हिस्सा है, और निरंतर प्रयास करने से ही सफलता मिलती है। यदि आप भी ऐसे किसी बंधन में बंधें हैं जो आपको अपने सपने सच करने से रोक रहा है तो उसे तोड़ डालिए। ******

  • नमन मां शारदे

    मुक्ता शर्मा होंठों पे तबस्सुम है आंखों में शरारे हैं। छू लेना न ग़लती से हम यार अंगारे हैं। अपने ही लहू से तो शादाब हुआ गुलशन। अहसास-ए-निदामत में डूबी ये बहारें हैं। इक बार मुस्कुरा कर कितनी ही दफा रोए। इस तरह जिंदगी के अहसान उतारे हैं। अपनी तो सभी चीजों से हमको मुहब्बत है। कैसे ये भला दे दें ये दर्द ‌हमारे हैं। बेहिस हैं जो दुनिया में कोई बात नहीं उनकी। मरना है उन्हीं का जो अहसास के मारे हैं। मकबूल हुए हैं गर कोई राज़ नहीं इसमें। कागज़ पे फकत दिल के जज़्बात उतारे हैं। तुम साथ हो तो कैसा मझधार का डर हमदम। कश्ती से नहीं अपनी अब दूर किनारे हैं। फरियाद अगर लेकर जाएं तो कहां जाएं। अंधों की निज़ामत में गूंगों की पुकारें हैं। *******

  • नानी का घर

    मुकेश ‘नादान’ नरेंद्र का शरीर इतना हृष्ट-पुष्ट था कि वे सोलह वर्ष की आयु में बीस वर्ष के लगते थे। इसका कारण था नियमित रूप से व्यायाम करना। वे कुश्ती का भी अभ्यास करते थे। शिमला मोहल्ला में कार्नवालिस स्ट्रीट के निकट एक अखाड़ा था, जिनकी स्थापना हिंदू मेले के प्रवर्तक नवगोपाल मित्र ने की थी। वहीं नरेंद्र अपने मित्रों के साथ व्यायाम करते थे। सर्वप्रथम मुक्केबाजी में उन्होंने चाँदी की तिली पुरस्कार के रूप में जीती थी। उस दौर में वे क्रिकेट के भी अच्छे खिलाड़ी थे। इसके अतिरिक्त उन्हें घुड़सवारी का भी शौक था। उनके इस शौक को पूरा करने के लिए विश्वनाथजी ने उन्हें एक घोड़ा खरीदकर दिया था। नरेंद्र की संगीत में विशेष रुचि थी। उनके संगीत शिक्षक उस्ताद बनी और उस्ताद कांसी घोषाल थे। पखावज और तबला बजाना उन्होंने अपने इन्हीं उस्तादों से सीखा। उनमें एक अच्छे वक्ता के गुण भी मौजूद थे। जब मेट्रोपोलिटन इंस्टीट्यूट के एक शिक्षक अवकाश ग्रहण करने वाले थे, तब स्कूल के वार्षिक पुरस्कार वितरण समारोह वाले दिन ही नरेंद्र ने उनके अभिनंदन समारोह का आयोजन किया। उनके सहपाठियों में से किसी में इतना साहस न हुआ कि कोई सभा को संबोधित करता। उस समय नरेंद्र ने आधे घंटे तक अपने शिक्षक के गुणों की व्याख्या की और उनके विछोह से उत्पन्न दुख का भी वर्णन किया। उनकी मधुर व तर्कसंगत वाणी ने सभी को अपने आकर्षण में बाँध लिया था। मैट्रिक पास करने के बाद नरेंद्र ने जनरल असेंबली कॉलेज में प्रवेश लिया और एफ.ए. की पढ़ाई करने लगे। उस समय उनकी आयु अठारह वर्ष थी। उनकी तीत्र बुद्धि तथा आकर्षक व्यक्तित्व ने अन्य छात्रों को ही नहीं, बल्कि अध्यापकों को भी आकर्षित किया। जल्द ही वहाँ उनके कई मित्र बन गए। कॉलेज में उनके विषय में उनके एक मित्र प्रियनाथ सिंह ने अपने संस्मरण में लिखा था- “नरेंद्र छेदो तालाब के निकट जनरल असेंबली कॉलेज में पढ़ते हैं। उन्होंने एफ.ए. वहीं से पास किया। उनमें असंख्य गुण हैं, जिसके कारण कई छात्र उनसे अत्यंत प्रभावित हैं। उनका गाना सुनकर वे आनंदमय हो उठते हैं, इसलिए अवकाश पाते ही नरेंद्र के घर जा पहुँचते हैं। जब नरेंद्र तर्कयुक्ति या गाना-बजाना आरंभ करते, तो समय कैसे बीत जाता है, साथी समझ ही नहीं पाते। इन दिनों नरेंद्र अपनी नानी के घर में रहकर अध्ययन करते हैं। नानी का घर उनके घर की निकटवर्ती गली में है। वह अपने पिता के घर केवल दो बार भोजन करने जाते हैं।” नानी का घर बहुत छोटा था। नरेंद्र ने उसका नाम तंग रखा था। वे अपने मित्रों से कहते थे, “चलो तंग में चलें।” उन्हें एकांतवास बहुत पसंद था। नरेंद्र में गंभीर चिंतन-शक्ति और तीक्ष्ण बुद्धि थी, जिसके बल पर वह सभी विषय बहुत थोड़े समय में सीख लेते थे। उनके लिए पाठ्य” पुस्तकें परीक्षा पास करने का साधन मात्र थीं। वह इतिहास, साहित्य और दर्शन की अधिकांश पुस्तकें पढ़ चुके थे, जिनसे उन्होंने अपने हृदय में ज्ञान का अपार भंडार संगृहीत कर लिया था। *******

  • गधा रहा गधा ही

    अनजान एक जंगल में एक शेर रहता था। गीदड़ उसका सेवक था। जोड़ी अच्छी थी। शेरों के समाज में तो उस शेर की कोई इज्जत नहीं थी, क्योंकि वह जवानी में सभी दूसरे शेरों से युद्ध हार चुका था, इसलिए वह अलग-थलग रहता था। उसे गीदड़ जैसे चमचे की सख्त जरूरत थी जो चौबीस घंटे उसकी चमचागिरी करता रहे। गीदड़ को बस खाने का जुगाड़ चाहिए था। पेट भर जाने पर गीदड़ उस शेर की वीरता के ऐसे गुण गाता कि शेर का सीना फुलकर दुगना चौड़ा हो जाता। एक दिन शेर ने एक बिगड़ैल जंगली सांड का शिकार करने का साहस कर डाला। सांड बहुत शक्तिशाली था। उसने लात मारकर शेर को दूर फेंक दिया, जब वह उठने को हुआ तो सांड ने फां-फां करते हुए शेर को सींगों से एक पेड़ के साथ रगड़ दिया। किसी तरह शेर जान बचाकर भागा। शेर सींगों की मार से काफी जख्मी हो गया था। कई दिन बीते, परंतु शेर के जख्म ठीक होने का नाम नहीं ले रहे थे। ऐसी हालत में वह शिकार नहीं कर सकता था। स्वयं शिकार करना गीदड़ के बस की बात नहीं थी। दोनों के भूखो मरने की नौबत आ गई। शेर को यह भी भय था कि खाने का जुगाड़ समाप्त होने के कारण गीदड़ उसका साथ न छोड़ जाए। शेर ने एक दिन उसे सुझाया, 'देख, जख्मों के कारण मैं दौड़ नहीं सकता। शिकार कैसे करूं? तु जाकर किसी बेवकूफ-से जानवर को बातों में फंसाकर यहां ला। मैं उस झाड़ी में छिपा रहूंगा। गीदड़ को भी शेर की बात जंच गई। वह किसी मूर्ख जानवर की तलाश में घूमता-घूमता एक कस्बे के बाहर नदी-घाट पर पहुंचा। वहां उसे एक मरियल-सा गधा घास पर मुंह मारता नजर आया। वह शक्ल से ही बेवकूफ लग रहा था। गीदड़ गधे के निकट जाकर बोला 'पांय लागूं चाचा। बहुत कमजोर हो आए हो, क्या बात है?' गधे ने अपना दुखड़ा रोया, 'क्या बताऊं भाई, जिस धोबी का मैं गधा हूं, वह बहुत क्रूर है। दिनभर ढुलाई करवाता है और चारा कुछ देता नहीं।' गीदड़ ने उसे न्‍यौता दिया- 'चाचा, मेरे साथ जंगल चलो, वहां बहुत हरी-हरी घास है। खूब चरना तुम्हारी सेहत बन जाएगी।' गधे ने कान फड़फड़ाए- 'राम-राम। मैं जंगल में कैसे रहूंगा? जंगली जानवर मुझे खा जाएंगे।' 'चाचा, तुम्हें शायद पता नहीं कि जंगल में एक बगुला भगतजी का सत्संग हुआ था। उसके बाद सारे जानवर शाकाहारी बन गए हैं। गीदड़ बोला- अब कोई किसी को नहीं खाता और कान के पास मुंह ले जाकर दाना फेंका, 'चाचू, पास के कस्बे से बेचारी गधी भी अपने धोबी मालिक के अत्याचारों से तंग आकर जंगल में आ गई थी। वहां हरी-हरी घास खाकर वह खूब लहरा गई है, तुम उसके साथ घर बसा लेना।' गधे के दिमाग पर हरी-हरी घास और घर बसाने के सुनहरे सपने छाने लगे। वह गीदड़ के साथ जंगल की ओर चल दिया। जंगल में गीदड़ गधे को उसी झाड़ी के पास ले गया, जिसमें शेर छिपा बैठा था। इससे पहले कि शेर पंजा मारता, गधे को झाड़ी में शेर की नीली बत्तियों की तरह चमकती आंखें नजर आ गईं। वह डरकर उछला, गधा भागा और भागता ही गया। शेर बुझे स्वर में गीदड़ से बोला- 'भाई, इस बार मैं तैयार नहीं था। तुम उसे दोबारा लाओ इस बार गलती नहीं होगी।' गीदड़ दोबारा उस गधे की तलाश में कस्बे में पहुंचा। उसे देखते ही बोला- 'चाचा, तुमने तो मेरी नाक कटवा दी। तुम अपनी दुल्हन से डरकर भाग गए?' 'उस झाड़ी में मुझे दो चमकती आंखें दिखाई दी थीं, जैसी शेर की होती हैं। मैं भागता नहीं तो क्या करता?' गधे ने शिकायत की। गीदड़ नाटक करते हुए माथा पीटकर बोला- 'चाचा ओ चाचा! तुम भी पूरे मूर्ख हो। उस झाड़ी में तुम्हारी दुल्हन थी। जाने कितने जन्मों से वह तुम्हारी राह देख रही थी। तुम्हें देखकर उसकी आंखें चमक उठीं तो तुमने उसे शेर समझ लिया?' गधा बहुत लज्जित हुआ-क्योंकि गीदड़ की चालभरी बातें ही ऐसी थीं। गधा फिर उसके साथ चल पड़ा। जंगल में झाड़ी के पास पहुंचते ही शेर ने नुकीले पंजों से उसे मार गिराया। इस प्रकार शेर व गीदड़ का भोजन जुटा। शिक्षा : दूसरों की चिकनी-चुपड़ी बातों में आने की मूर्खता कभी नहीं करनी चाहिए। ******

  • व्यस्त रहो, मस्त रहो।

    डॉ. कृष्ण कांत श्रीवास्तव दरवाजा बंद करके वर्मा जी भी सोफे पर आकर धम्म से बैठ गए। शांता जी की आंखों से भी आंसू तो बह रहे थे। शांता जी ने एक नजर पूरे घर की ओर डाली, सारा घर अस्त-व्यस्त हो रहा था। रसोई में लड्डुओं का डब्बा जस का तस रखा था। रात भर जागकर शांता जी ने बड़े मन से देसी घी के लड्डू बनाए थे। शांता जी के बेटा, बहू दुबई में रहते थे। उनके दोनों जुड़वां पोते आठवीं क्लास में पढ़ते थे। जब से उन्होंने अपने घर आने की सूचना दी तो शांता जी की खुशी का कोई ठिकाना न था। बच्चे आखिर 4 साल बाद 20 दिन के लिए दिल्ली आ रहे थे। शांता जी की बेटी भी पूना में रहती थी। भाई-भाभी के आने की सूचना पाकर बेटी माधवी ने भी शनिवार इतवार को दिल्ली आकर भाई भाभी से मिलने का प्रोग्राम बनाया। माधवी की शादी पर 4 साल पहले ही बिट्टू घर आया था। वर्मा जी की घर से थोड़ी ही दूर पर किराने की दुकान थी। वह तो दुकान पर व्यस्त रहते थे लेकिन शांता जी बच्चों को बहुत मिस करती थी। बच्चों के आने पर शांता जी बहुत खुश हुई। 4 साल में बच्चे कितने बड़े हो गए थे। लेकिन वह अब उनसे बहुत ज्यादा बात नहीं कर रहे थे और सिर्फ अपने मोबाइलों में ही व्यस्त थे। बहुरानी भी दुबई से शांता जी के लिए एक सोने की चेन लाई थी। बच्चों को एक बार फिर घर में देखकर मानो घर फिर से सजीव हो उठा था। शांता जी ने बच्चों की पसंद का खाने का बहुत सारा सामान बना रखा था लेकिन किसी ने भी ज्यादा कुछ नहीं खाया। बहुरानी ने बताया कि उसके मायके में उसके चाचा की बेटी की शादी में उन्हें शामिल होना है इसलिए दूसरे ही दिन उन्होंने आगरा के लिए कैब बुला रखी थी। यह बात आने से पहले तो उन्होंने शांता जी को नहीं बताई थी। शांता जी के पास बहुत सी बातें थी जो कि वह बच्चों से करना चाहती थी लेकिन सब बच्चे अभी अपने कमरे में ही व्यस्त थे। कमरे से बाहर निकले तो बिट्टू ने पापा से गाड़ी की चाबी मांगी क्योंकि उन्होंने आगरा जाने के लिए मार्केट से शायद कुछ सामान लेना था। कमरे से बाहर निकले तो बिट्टू और बहु रानी दोनों ही मार्केट चले गए और रात देर तक ही आए। रघु और राघव अब भी मोबाइल के गेम में ही व्यस्त थे। शाम को अपने खाने के लिए उन्होंने डोमिनोज़ से पीज़ा मंगवा लिया था। बिट्टू भी बाहर से ही खाना खाकर आया था। रात को शांता जी ने सारा खाना वैसे ही फ्रिज में रख दिया‌। दूसरे दिन वे चारों आगरा के लिए रवाना हो गए थे। बहुरानी ने जाते हुए कहा कि वह अपने मायके मैं 1 सप्ताह रहेंगी। दूसरे दिन शनिवार को उनकी बेटी माधवी अपने पति के साथ पुणे से आई थी लेकिन बिट्टू ने तो अभी 6 दिन बाद आना था। बिट्टू की अनुपस्थिति में माधवी को भी अच्छा नहीं लग रहा था क्योंकि वह भी बिट्टू और भाभी से ही मिलने आई थी। उसका ख्याल था मां से तो वह कभी भी मिल सकती थी। पुणे से दिल्ली कोई ज्यादा दूर थोड़ी ना है हालांकि उसे दिल्ली आए हुए कितना समय हो गया था यह शांता जी ही समझ सकती है। माधवी के चेहरे से यह स्पष्ट हो रहा था कि उसका यहां आना व्यर्थ ही रहा। शांता जी माधवी से बोली "बिट्टू नहीं है तो क्या तू मुझसे मिलने नहीं आ सकती?" " मां हमारी नौकरी में बहुत व्यस्त शेड्यूल है।" कुछ समय बाद माधवी और दामाद जी भी कैब ले कर शायद किसी माल में घूमने के लिए चले गए। शांता जी ने बच्चों के खाने के लिए बहुत सा सामान बनाया हुआ था लेकिन कोई कुछ खाना ही नहीं चाहता था। शांता जी ने बेहद निराश होकर वर्मा जी से पूछा सब व्यस्त हैं तो क्या मैं खाली हूं? रात को बहुत देर तक माधुरी और शांता जी बात तो करते रहे लेकिन बच्चों से मिलने के लिए उन्होंने जैसे सपने सजाए थे वह सब चूर-चूर से हो रहे थे। अगले दिन रात को माथवी पुनः वापस अपने घर चली गई। कुछ दिन बाद जब बिट्टू आया तो शांता जी को महसूस हो रहा था जैसे कोई अनजाना परिवार घर में आ गया हो। वह लोग अपनी और बच्चों के लिए पानी की बोतलें भी अलग ही लाए थे। बच्चे मोबाइलों में व्यस्त थे। बिट्टू और बहुरानी भी काफी समय तक तो वह अपनी खरीदारी और दोस्तों से मिलने जुलने में ही व्यस्त रहे। बाकि के दिन भी पंख लगा कर यूं ही उड़ गए और बिट्टू के वापिस जाने का समय आ गया। शांता जी ने जब बिट्टू को उसकी पसंद के लड्डू बनाकर उसे अपने साथ दुबई में ले जाने का अनुरोध किया तो बिट्टू ने बताया कि पहले ही सामान बहुत ज्यादा हो गया है और अब वह लड्डू खाता भी नहीं है। शांता जी चुप थी। उनका सारा घर यूं ही फैला छोड़कर बच्चे जा चुके थे। वर्मा जी शांता जी को उदास देख कर बोले "हम दोनों को तो शुगर है, तुम घर में कीर्तन करवा लेना और सबको प्रसाद के रूप में यह लड्डू वितरण कर देना। शांता परेशान मत हो! बच्चे व्यस्त हैं और अपना परिवार सही से चला रहे हैं हम दोनों के लिए तो इतना ही बहुत है हमने अपनी जिम्मेदारियों को पूरा कर दिया।" "लेकिन वर्मा जी हम कोई पंछी तो नहीं जो बच्चे बड़े होते ही उड़ जाए" ,शांता जी बोली। "ऐसा कुछ नहीं है, तब अच्छा होता क्या जब हमारे बच्चे निकम्मे होकर हमारे साथ रहते होते?” तुम्हारी समस्या यह है कि तुम खाली ज्यादा हो। कल से तुम भी मेरे साथ दुकान पर आकर बैठ जाओ। मैं जल्दी ही दुकान में थोड़ी सी जगह बनाकर एक लेडीज कॉर्नर भी बना दूंगा। इस नकारात्मक सोच में कुछ नहीं रखा व्यस्त रहो और मस्त रहो। भविष्य की तैयारी करनी है तो जितना हो सके तुम औरों के काम आओ ताकि किसी समय और लोग भी तुम्हारे काम आ सके।" तभी एअरपोर्ट से बच्चों की वीडियो काल आई। सब बातें करने लगे। पाठकगण जिंदगी अपनी गति से चल रही है। जिंदगी के हर पल को जी कर खुद को व्यस्त और स्वस्थ रखना ही जरुरी है। ********

  • माई नेम इज स्मार्टफोन

    डॉ. जहान सिंह 'जहान' अब इसी का नाम है ज़िन्दगी। हर सुबह फोन पर दुआ-सलाम, बन्दगी। रात झूठ, छल, कपट मानसिक गन्दगी। पहले हम मोबाइल रखते थे। अब हम को मोबाइल रखता है।। हसांता वो, रुलाता वो जगाता वो, सुलाता वो। कुपोषित ज्ञान का दल दल है वो। दिन-रात की हल-चल है वो। घर बालों को बेघर कराता है वो। रिचार्ज हो या डिस्चार्ज हो तब घर बालों से संबाद करवाता है वो। अनपढ से लेकर पढे लिखो को किनारे लगाता है वो। गलती से नींद भी आजाये अगर तो एक खटक से जगाता है वो। बनके मालिक सबको अपने पीछे दौड़ता है वो। उंगली आपकी पर अपनी उंगलियों पर नचाता है वो। करदी जिन्दगी जिस के हवाले 'जहान' माई नेम इज स्मार्टफोन कहलाता है वो।। ******

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