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  • मेरी पसंदीदा अभिनेत्री मीना कुमारी महजबीं

    आर सी त्रिपाठी फिरते हैं हम अकेले बाहों में कोई ले ले आखिर कोई कहां तक तन्हाइयों से खेले.. दोस्तों प्रस्तुत है, दुखांत फिल्मों की मशहूर अदाकारा / शायरा / कवियित्री / पार्श्व गायिका / कास्ट्यूम डिजाइनर / शोकांत फिल्मों की महारानी / ट्रेजेडी क्वीन / भारतीय सिनेमा की सिंड्रेला / नाज / मीना कुमारी (महजबीं) से जुड़े खास यादों का कारवां.... सबसे पहले मैं आपको बताता चलूं कि मीना कुमारी का संबंध टैगोर परिवार से है। मीना कुमारी की नानी हेमसुन्दरी मुखर्जी पारसी रंगमंच से जुड़ी हुईं थी। बंगाल के प्रतिष्ठित टैगोर परिवार के पुत्र जदुनंदन टैगोर (1840-62) ने परिवार की इच्छा के खिलाफ हेमसुन्दरी से विवाह कर लिया। 1862 में दुर्भाग्य से जदुनंदन का देहांत होने के बाद हेमसुन्दरी को बंगाल छोड़कर मेरठ आना पड़ा। यहां अस्पताल में नर्स की नौकरी करते हुए उन्होंने एक उर्दू के पत्रकार प्यारेलाल शंकर मेरठी (जो कि ईसाई थे) से शादी करके ईसाई धर्म अपना लिया। हेमसुन्दरी की दो पुत्री हुईं जिनमें से एक प्रभावती, मीना कुमारी की माँ थीं। प्रभावती जो एक मशहूर नृत्यांगना और अदाकारा थी, करिअर को बनाने / रोजी रोटी की तलाश में मेरठ से मुंबई आ गईं। यहां उनकी मुलाकात पारसी रंगमंच के मंजे कलाकार अली बक्श से हुई। दोनों में प्रेम पनपा और दोनों ने शादी कर ली। मुस्लिम परिवार में शादी होने की वजह से हिंदू टैगोर परिवार की बेटी प्रभावती इकबाल बानो कहलाने लगीं। इकबाल बानों / अलीबक्श से तीन बेटियां हुई। खुर्शीद, महजबीं (मीना कुमारी) व मधु। बड़ी बहन खुर्शीद जूनियर और छोटी बहन मधु बेबी माधुरी के नाम से फिल्मों में काम करती थीं। उनके पिता अलीबक्श ने फिल्म "शाही लुटेरे" फिल्म में संगीत भी दिया। फिल्मी पृष्ठभूमि से जुड़े होने की वजह से महजबीं / मीना कुमारी भी फिल्मों की ओर रुख कीं। महजबीं पहली बार 1939 में फिल्म निर्देशक विजय भट्ट की फिल्म "लैदरफेस" में बेबी महज़बीं के रूप में नज़र आईं। 1940 की फिल्म "एक ही भूल" में विजय भट्ट ने इनका नाम बेबी महजबीं से बदल कर बेबी मीना कर दिया। 1946 में आई फिल्म बच्चों का खेल से बेबी मीना 13 वर्ष की आयु में मीना कुमारी बनीं। मार्च 1947 में लम्बे समय तक बीमार रहने के कारण उनकी माँ की मृत्यु हो गई। मीना कुमारी की प्रारंभिक फिल्में ज्यादातर पौराणिक कथाओं पर आधारित थीं जिनमें हनुमान पाताल विजय, वीर घटोत्कच व श्री गणेश महिमा प्रमुख हैं। 01 अगस्त 1933 को दादर मुंबई मीठावाला चाल / ब्रिटिश भारत / में जन्मी मीना कुमारी ने 1939 से 1972, 33 वर्षों तक 93 फिल्मों में यादगार भूमिकाएं निभाई। उन्हें 1954: बैजू बावरा, 1955: परिणीता, 1963: साहिब बीबी और ग़ुलाम, 1966: काजल फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री फिल्म फेयर अवार्ड व बंगाल फ़िल्म पत्रकार संगठन की ओर से 1958 में शारदा, 1963: आरती, 1965: दिल एक मंदिर, 1973: पाक़ीज़ा के लिए (मरणोपरांत) पुरस्कार के लिए नामित किया गया। 1954 में आई उनकी फिल्म बैजू बावरा ने मीना कुमारी को बेस्‍ट एक्‍ट्रेस का फिल्म फेयर अवॉर्ड दिलवाया। यह अवार्ड पाने वाली वह पहली नायिका थीं। 1962 में आई उनकी फिल्म साहब बीबी गुलाब जिसे विजेता फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार प्राप्त हुआ। उसे 13वें बर्लिन अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में नामांकित किया गया। जहाँ मीना कुमारी को प्रतिनिधि के तौर पर चुना गया। यह फ़िल्म 36वें अकादमी पुरस्कार के सर्वश्रेष्ठ विदेशीय भाषा वर्ग में भारत द्वारा भेजी गई थी। 1964 में भगवतीचरण वर्मा के उपन्यास पर आधारित चित्रलेखा में उन्होंने काम किया। यह उनकी पहली रंगीन फिल्म थी। इस फिल्म में उनके साथ सहकलाकार के रूप में प्रदीप कुमार व अशोक कुमार ने काम किया। फिल्म का यह गीत "संसार से भागे फिरते हो, भगवान को तुम क्या पाओगे" बड़ा ही मशहूर हुआ। 1972 में आई पाकीजा फिल्म ने विशेष बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन पुरस्कार जीता। मीना कुमारी के मरणोपरांत यह फिल्म, फिल्म फेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार के लिए नामित हुई। यह एक त़वायफ़ की मार्मिक कहानी है। फिल्म में संगीत गु़लाम मोहम्मद ने दिया था और उनकी मृत्यु के पश्चात फिल्म का पार्श्व संगीत नौशाद ने तैयार किया। फिल्म प्रमुख गीत · "चलो दिलदार चलो चाँद के पार चलो, हम हैं तैयार चलो ...." · "चलते चलते युंही कोई मिल गया था सरे राह चलते चलते ..." · "इन्ही लोगों ने ले लीना दुपट्टा मेरा ...." · "ठाढे़ रहियो ओ बाँके यार रे..." · "आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे, तीरे नज़र देखेंगे, ज़ख्मे जि़गर देखेंगे...." · "मौसम है आशका़ना, सहित सभी गाने लता मंगेशकर द्वारा गाये गये और बड़े मशहूर हुए, जिन्हें आज तक याद किया जाता है। फिल्म का निर्देशन क़माल अमरोही ने किया था जो मुख्य नायिका मीना कुमारी के पति भी थे। फिल्म लगभग 14 वर्षों में बन कर तैयार हुई। इसमें मीना कुमारी ने नरगिस साहिब जान का किरदार निभाया। फिल्म की कहानी यह है कि नरगिस (मीना कुमारी) जो कोठे पर पलती है। वो इस दुश्चक्र को तोड़ पाने में असमर्थ रहती है। नरगिस जवान होती है और एक खूबसूरत और लोकप्रिय नर्तकी / गायिका साहिबजान के रूप मे विख्यात होती है। नवाब सलीम अहमद खान (राज कुमार) साहिबजान की सुंदरता और मासूमियत पर मर मिटता है और उसे अपने साथ, भाग चलने के लिए राजी़ कर लेता है। लेकिन वो जहां भी जाते है लोग साहिबजान को पहचान लेते हैं। तब सलीम उसका नाम पाकीज़ा रख देता है और कानूनी तौर पर निका़ह करने के लिये एक मौलवी के पास जाता है। सलीम की बदनामी ना हो यह सोच कर साहिबजान शादी से मना कर देती है और कोठे पर लौट आती है। सलीम अंततः किसी और से शादी करने का निर्णय लेता है और साहिबजान को अपनी शादी पर नृत्य करने के लिए आमंत्रित करता है। साहिबजान जब मुजरे के लिये आती है तो कई राज़ उसका इंतजा़र कर रहे होते हैं। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफ़िस पर धूम मचा दी और उस दौर में 60 मिलियन INR कमाई की। इस फिल्म की कास्ट्यूम डिजाइन खुद मीना कुमारी ने की थी। पाकीजा के रिलीज होने के तीन हफ्ते बाद, मीना कुमारी गंभीर रूप से बीमार हो गईं। 28 मार्च, 1972 को उन्हें सेंट एलिजाबेथ के नर्सिग होम में भर्ती कराया गया। मीना ने 29 मार्च, 1972 को आखिरी बार कमाल अमरोही का नाम लिया, इसके बाद वह कोमा में चली गईं। 31 मार्च 1972, गुड फ्राइडे वाले दिन दोपहर 3 बजकर 25 मिनट पर महज़ 38 वर्ष की आयु में मीना कुमारी ने अंतिम सांस ली। पति कमाल अमरोही की इच्छानुसार उन्हें बम्बई के मडगांव स्थित रहमताबाद कब्रिस्तान में दफनाया गया। मीना कुमारी इस लेख को अपनी कब्र पर लिखवाना चाहती थीं: "वो अपनी ज़िन्दगी को एक अधूरे साज़, एक अधूरे गीत, एक टूटे दिल, परंतु बिना किसी अफसोस के साथ समाप्त कर गई" महज 39 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह गईं। जब मीना कुमारी की मौत हुई, उस वक्त उनके पास अस्पताल का बिल भरने के भी पैसे नहीं थे। मौत को गले लगाने से पहले मीना कुमारी अपनी गजल व नज़्म की ढाई सौ डायरियां गीतकार गुलजार के नाम वसीयत करके गयीं। यह सभी डायरियां गुलजार साहब के पास हैं। 'मेरे अंदर से जो जन्मा है, वह लिखती हूं जो मैं कहना चाहती हूं वह लिखती हूं।' मीना कुमारी ने अपनी वसीयत में अपनी कविताएं छपवाने का जिम्मा गुलजार को दिया था जिसे गुलज़ार ने ‘नाज’ उपनाम से छपवाया। सदा तन्हा रहने वाली मीना कुमारी ने अपनी रचित एक गजल के जरिए अपने दिल के हाल को कुछ इस तरह बयां किया... .. चांद तन्हा है आसमां तन्हा दिल मिला है कहां कहां तन्हा राह देखा करेगा सदियों तक छोड़ जायेगें ये जहां तन्हा.. मीना कुमारी पर जितना लिखा जाए कम है। उन पर मशहूर लेखकों / पत्रकारों द्वारा अनेक बायोपिक लिखे जा चुके हैं। मीना कुमारी पर पहली जीवनी अक्टूबर 1972 में विनोद मेहता द्वारा उनकी मृत्यु के बाद लिखी गई थी। कुमारी की आधिकारिक जीवनी, इसे मीना कुमारी - द क्लासिक बायोग्राफी शीर्षक दिया गया था। यह जीवनी मई 2013 में फिर से प्रकाशित हुई थी। मोहन दीप द्वारा लिखा गया निंदनीय सिम्पली सकेन्डलॉस लेख 1998 में प्रकाशित एक अनौपचारिक जीवनी थी। यह मुंबई के हिंदी दैनिक दोपहर का सामना में एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित किया गया था। मीना कुमारी की एक और जीवनी, आखरी अधाई दिन को मधुप शर्मा ने हिंदी में लिखा था। यह पुस्तक 2006 में प्रकाशित हुई थी। मीना कुमारी हमेशा बड़े पैमाने पर फिल्म निर्माताओं के बीच रुचि का विषय रही हैं। 2004 में, उनकी फिल्म साहिब बीबी और गुलाम का एक आधुनिक रूपांतर प्रीतीश नंदी कम्युनिकेशंस द्वारा किया जाना था, जिसमें ऐश्वर्या राय और बाद में प्रियंका चोपड़ा को उनकी छोटी बहू की भूमिका को चित्रित करना था। हालांकि, फिल्म को निर्देशक ऋतुपॉर्नो घोष द्वारा बाद में इसे एक धारावाहिक के रूप में बनाया गया, जिसमें अभिनेत्री रवीना टंडन ने इस भूमिका को निभाया। 2015 में, यह बताया गया कि तिग्मांशु धूलिया को हिंदी सिनेमा की ट्रेजेडी क्वीन पर एक फिल्म बनानी थी, जो विनोद मेहता की किताब "मीना कुमारी - द क्लासिक बायोग्राफी" का स्क्रीन रूपांतरण होना था। अभिनेत्री कंगना रनौत को कुमारी को चित्रित करने के लिए संपर्क किया गया था, लेकिन प्रामाणिक तथ्यों की कमी और मीना कुमारी के सौतेले बेटे ताजदार अमरोही के कड़े विरोध के बाद फिल्म को फिर से रोक दिया गया था। 2017 में, निर्देशक करण राजदान ने भी उन पर एक आधिकारिक बायोपिक निर्देशित करने का फैसला किया। इसके लिए, उन्होंने माधुरी दीक्षित और विद्या बालन से फ़िल्मी पर्दे पर मीना कुमारी की भूमिका निभाने के लिए संपर्क किया, लेकिन कई कारणों के कारण, दोनों ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। बाद में उन्होंने अभिनेत्री सन्नी लियोन की ओर रुख किया, जिन्होंने इस किरदार में बहुत दिलचस्पी दिखाई। ऋचा चड्ढा, जया प्रदा और जान्हवी कपूर सहित कई अन्य अभिनेत्रियों ने भी शानदार आइकन की भूमिका निभाने की इच्छा व्यक्त की। 2018 में, निर्माता और पूर्व बाल कलाकार कुट्टी पद्मिनी ने गायक मोहम्मद रफ़ी और अभिनेता-निर्देशक जे पी चंद्रबाबू के साथ एक वेब श्रृंखला के रूप में मीना कुमारी पर एक बायोपिक बनाने की घोषणा की। पद्मिनी ने मीना कुमारी के साथ फिल्म दिल एक मंदिर में काम किया है और इस बायोपिक के साथ दिवंगत अभिनेत्री को सम्मानित करना चाहती थी। कहा जाता है कि दरिद्रता से ग्रस्त उनके पिता अली बक़्श उन्हें पैदा होते ही अनाथाश्रम में छोड़ आए थे चूँकि वे उनके डाक्टर श्रीमान गड्रे को उनकी फ़ीस देने में असमर्थ थे। हालांकि अपने नवजात शिशु से दूर जाते-जाते पिता का दिल भर आया और तुरंत अनाथाश्रम की ओर चल पड़े। पास पहुंचे तो देखा कि नन्ही मीना के पूरे शरीर पर चीटियाँ काट रहीं थीं। अनाथाश्रम का दरवाज़ा बंद था, शायद अंदर सब सो गए थे। यह सब देख उस लाचार पिता की हिम्मत टूट गई, आँखों से आँसु बह निकले। झट से अपनी नन्हीं-सी जान को साफ़ किया और अपने दिल से लगा लिया। अली बक़्श अपनी चंद दिनों की बेटी को घर ले आए। समय के साथ-साथ शरीर के वो घाव तो ठीक हो गए किंतु मन में लगे बदकिस्मती के घावों ने अंतिम सांस तक मीना का साथ नहीं छोड़ा। उन्हीं के शब्दों में..... पूछते हो तो सुनो, कैसे बसर होती है रात ख़ैरात की, सदक़े की सहर होती है साँस भरने को तो जीना नहीं कहते या रब दिल ही दुखता है, न अब आस्तीं तर होती है जैसे जागी हुई आँखों में, चुभें काँच के ख़्वाब रात इस तरह, दीवानों की बसर होती है ग़म ही दुश्मन है मेरा, ग़म ही को दिल ढूँढता है एक लम्हे की जुदाई भी अगर होती है एक मर्कज़ की तलाश, एक भटकती ख़ुशबू कभी मंज़िल, कभी तम्हीदे-सफ़र होती है दिल से अनमोल नगीने को छुपायें तो कहाँ बारिशे-संग यहाँ आठ पहर होती है काम आते हैं न आ सकते हैं बे-जाँ अल्फ़ाज़ तर्जमा दर्द की ख़ामोश नज़र होती है. इन्हीं शब्दों के साथ मेरी प्रिय अभिनेत्री महज़बीं को नम आंखों से श्रद्धांजलि.... *************

  • गुल्लो पान वाली

    (वक्त क्या न कराए) डॉ. जहान सिंह जहान गुल्लो, गुल्लो अरी गुल्लो कहां गई। छोटी बेगम झल्लाकर बोली नाशपिटी कहां मर गई, तभी हवेली के ‘मरदान-खाने’ से आवाज आई! जी छोटी बेगम साहिबा, गुल्लो इधर है, मैं अभी हाजिर हुई। बेगैरत औरत वहां क्या कर रही है, बेगम चिल्लाई। बेगम साहिबा मैं बडे नवाब साहब के बाजुओं को तेल पिला रही हूं। छोटी बेगम तुनक कर बोली लाहौलविला, बड़ी बदतमीज हो गई हो, कहती हुई आंगन में पड़ी आराम कुर्सी पर पसर गई। मिर्जा साहब की हवेली शान-बान और मेहमानदारी के लिए दूर-दूर तक जानी जाती थी। गुलबानो खूबसूरती तीखे नाक-नक्स, रंगीन मिजाज की खाई-पी तमीजदार लड़की थी। नबावों के बीच पली-बड़ी और छोटी बेगम के मुंह लगी थी। वैसे तो गुलबानो हवेली में ‘पान-सामा’ थी, लेकिन जरूरत पड़ने पर हर काम करने का हुनर रखती थी। उसको जनान खाने जाने और मरदान खाने में बे-रोक टोक आने-जाने की इजाजत थी। मिर्जा साहब पान के बेहद शौकीन थे। पचासों किस्म के पान, उनके मसाले, सोने के वर्क, केसर, जाफरान, अफीम की पुट, विदेशी सुपारी, अफ्रीकी कत्था, अरब की खुशबूयें, तम्बाकू और कई तरह के रस, छालें, हकीमों की बनाई जोशीली दवायें पेश करने को सैकड़ों रक्काबियाँ, पान दान एक पूरा पान-नाम हुआ करता था। गुल्लो बाई ही मिर्जा नवाब और उनके मेहमानों को पान पेश करती थी और इस हुनर में माहिर हो चुकी थी। कैसे पल्लू डालना, कितना गिराना, आंखों में काजल, चाल में धीमापन, बिना देखे पीछे वापस जाने की अदा बखूबी आती थी। हर शाम का यही सिलसिला था और हर एक की एक ही हसरत होती थी कि वह गुल्लो बाई के हाथ का पान खाये। ईस्ट इंडिया कंपनी का हिंदुस्तान आना और फिर अंग्रेजी हुकूमत की कारगुजारियों, नवाबों तालुकेदारों, जमीदारों, राजाओं के लिए परेशानी का सबब बन गई थी। धीरे-धीरे एक-एक करके मिर्जा साहब की शान-शौकत, धन-दौलत और उनका इकबाल गिरने लगा, घर से बेघर होने लगे। उनकी जायदादें हड़प ली गई और फिर वजीफाओं पर दिन गुजरने लगे। मिर्जा साहब की भी माली हालत खस्ता हो चली थी और फिर एक दिन ऐसा आया कि मिर्जा साहब अपनी बची-खुची पूंजी और बेगमों को लेकर विलायत चले गये। गुल्लो बाई पर तो जैसे पहाड़ टूट पड़ा हो, अपने शौहर, तीन बच्चे और एक बक्सा लेकर उसने हवेली छोड़ दी। दो रातें उसने रफीक तांगे वाले के यहां गुजारी। कोई काम न मिला तो भूख प्यास ने गुल्लो बाई के कदम गलत रास्ते की तरफ मुड़ गए, फिर उनका वहां से वापस लौटना नामुमकिन हो गया। गुल्लो बाई की खूबसूरती, अदाओं की चर्चा उसे एक नामचीन रक्कासा की कोठी तक ले गई। जाहिरा बेगम ने गुल्लो बाई को अपने पास बुला लिया, उसे औरतों का पुराना तजुर्बा था। गुल्लो को सर पर छत और पेट में रोटी का सहारा मिल गया। एक शाम वह जाहिरा बेगम के पास बैठी थी, जाहिरा कुछ परेशान इधर-उधर खिड़की से झांक रही थी। गुल्लो ने बड़ी अदब और तमीज से कहा कि बेगम साहिबा गुस्ताखी माफ हो आप परेशान सी देख रही हैं। हां गुल्लो वो मेरा पान-साज नहीं आया और शाम की महफिल सजने वाली है। छोटा मुंह बड़ी बात बेगम साहिबा क्या मैं पान पेश कर सकती हूं। गुल्लो तू करेगी, अगर कोई गुस्ताखी हो गई। तौबा-तौबा हाय अल्लाह तो क्या होगा। बेगम साहिबा पहले आप मेरा बनाया हुआ पान नोस फरमायें, पसंद ना आए तो इस लड़की का सर और आपकी जूती। जा पान लगाकर ला, अल्लाह का करम गुल्लो को मुंह मांगी मुराद मिल गई। वो रात और गुल्लो किस्मत का रास्ता। जाहिरा बेगम की शाम की महफिल जितनी मौज-मस्ती के लिए, उतनी ही गुल्लो बाई के पान के लिए मशहूर हो चुकी थी। गुल्लो, जाहिरा बेगम की खासदार बन चुकी थी और सब जरूरी काम भी संभाले लगी थी। एक अंग्रेज तहसीलदार को गुल्लो से इश्क हो गया और उसने चौक में एक दुकान उसके नाम कर दी। अब गुल्लो बाई खिलाड़ी बन चुकी थी, उसमें हुनर था कि हुस्न की दौलत किस पर कब और कितनी लुटानी है। गुल्लो बाई का नाम और पान ही शहर के रईसों की पहली पसंद बन चुका था। चौक पर उसकी दुकान ही गुल्लो तक पहुंचाने का सीधा रास्ता बन चुकी थी। गुल्लो के पान में ग्राहकों को मर्दाना जोश में इजाफा होने का एहसास होने लगा। अलग-अलग पान की अलग-अलग कीमत। अंग्रेजी हुकूमत में 10-10 रुपये तक पान बेचा। गुल्लो अब उमर दार होती जा रही थी। गुल्लो के कम और पान के आशिक ज्यादा हो गए थे। गुल्लो अब फिकरमंद रहने लगी थी। मेरे जाने के बाद मेरे पान का कारोबार कौन संभालेगा। बड़े लड़के मियां सादाब को इस कारोबार में कोई खास रुचि नहीं थी। वह पान भी नहीं खाता था। गुल्लो ने एक दो बार सादाब को कोठी की लड़कियों के साथ बतियाते देखा था। मियां सादाब की कद काठी तो बड़ी थी, लेकिन उसमें जो उत्साह होना चाहिए वह नहीं था। गुल्लो बाई थोड़ी फिकर करने लगी थी। काश! सादाब पान खा लेता! मियां सादाब का निकाह हुआ और आज पहली रात थी। नेग की रस्म खत्म हुई। सादाब पहले मिलन के लिए खास-तौर से तैयार कमरे में जाने से पहले अम्मी को सलाम करने आया। गुल्लो बाई ने मुबारकबाद देते हुए एक पान का डिब्बा पेश किया। सादाब बोला मम्मी जान मैं पान कहां खाता हूं। गुल्लो बाई ने सर पर हाथ फेरते हुए बड़े खुलूस और एहतराम के साथ कहा बेटा पान खा लेना। यही पान बता देगा कि मेरे पान का कारोबार आगे कौन करेगा। सादाब की पहली रात बेहद कामयाब रही। सुबह मम्मीजान को आदाब पेश करते हुए सादाब बोला आपका पान और पान की दुकान तब तक जिंदा रहेगी जब तक मैं, गुल्लो ने सादाब को गले लगा लिया और रोने लगी। मियां सादाब ने सलाम करते हुए कहा मैं शागिर्द और आप उस्ताद। गुल्लो बाई का पान, कामयाब शादी का नाम बन गया। दुकान पर नई तख़्ती लग गई – “गुल्लो बाई का पान शाम की शान”। *******

  • खूनी झील

    अनजान एक बार की बात है एक जंगल में एक झील थी। जो खुनी झील के नाम से प्रसिद्ध थी। शाम के बाद कोई भी उस झील में पानी पीने के लिए जाता तो वापस नहीं आता था। एक दिन चुन्नू हिरण उस जंगल में रहने के लिए आया। उसकी मुलाकात जंगल में जग्गू बन्दर से हुई। जग्गू बन्दर ने चुन्नू हिरण को जंगल के बारे में सब बताया लेकिन उस झील के बारे में बताना भूल गया। जग्गू बन्दर ने दूसरे दिन चुन्नू हिरण को जंगल के सभी जानवरों से मिलाया। जंगल में चुन्नू हिरण का सबसे अच्छा दोस्त एक चीकू खरगोश बन गया। चुन्नू हिरण को जब ही प्यास लगती थी तो वह उस झील में पानी पीने जाता था। वह शाम को भी उसमें पानी पीने जाता था। एक शाम को वह उस झील में पानी पीने गया तो उसने उसमें बड़ी तेज़ी से अपनी और आता हुआ एक मगरमच्छ देख लिया। जिसे देखकर वह बड़ी तेज़ी से जंगल की तरफ भागने लगा। रास्ते में उसको जग्गू बन्दर मिल गया। जग्गू ने चुन्नू हिरण से इतनी तेज़ भागने का कारण पूछा। चुन्नू हिरण ने उसको सारी बात बताई। जग्गू बन्दर ने कहा कि मैं तुमको बताना भूल गया था कि वह एक खुनी झील है। जिसमें जो भी शाम के बाद जाता है वह वापिस नहीं आता। लेकिन उस झील में मगरमच्छ क्या कर रहा है। उसे तो हमनें कभी नहीं देखा। इसका मतलब वह मगरमच्छ ही सभी जानवरों को खाता है जो भी शाम के बाद उस झील में पानी पीने जाता है। अगले दिन जग्गू बन्दर जंगल के सभी जानवरों को ले जाकर उस झील में गया। मगरमच्छ सभी जानवरों को आता देखकर छुप गया। लेकिन मगरमच्छ की पीठ अभी भी पानी से ऊपर दिखाई दे रही थी। सभी जानवरों ने कहा कि यह पानी के बाहर जो चीज़ दिखाई दे रही है वह मगरमच्छ है। यह सुनकर मगरमच्छ कुछ नहीं बोला। चीकू खरगोश ने दिमाग लगाया और बोला नहीं यह तो पत्थर है। लेकिन हम तभी मानेंगे जब यह खुद बताएंगा। यह सुनकर मगरमच्छ बोला कि मैं एक पत्थर हूँ। इससे सभी जानवरों को पता लग गया कि यह एक मगरमच्छ है। चीकू खरगोश ने मगरमच्छ को कहा कि तुम इतना भी नहीं जानते कि पत्थर बोला नहीं करते। इसके बाद सभी जानवरों ने मिलकर उस मगरमच्छ को उस झील से भगा दिया और खुशी-खुशी रहने लगे। सीख: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि यदि हम किसी भी मुसीबत का सामना बिना घबराये मिलकर करते हैं तो उससे छुटकारा पा सकते हैं। ******

  • मौन

    सविता सिंह मीरा मौन, समझे कौन उफ्फ ये शोर शराबा शब्द सारे हो गए गौण। तभी किसी ने दी आवाज कौन है जो आया आज इतने कोलाहल में भी समझ गया वह सारे राज़। देखा मुड़ के नहीं कोई पास किस से मुझको,कैसा आस अंतस ने दिया फिर दस्तक तू खुद है खुद के लिए खास। शब्द सारे हो गए मुखर क्यूँ ताकू अब इधर उधर पा लिया जब खुद को हमने ये मिलन है सबसे सुंदर। ******

  • लबों की मुस्कुराहट

    सम्पदा ठाकुर कभी लबों की मुस्कुराहट है कभी गम की रवानी है कभी है यह खुशी तो कभी आंखो का पानी है कभी है गम की बहती दरीया कभी मौजों की रवानी है कभी लगती हकीकत सी कभी लगती कहानी है कभी है जानी पहचानी सी कभी यह दर्द अंजानी है कभी लगती पहेली सी कोई गुत्थी सुलझानी है ज़िन्दगी और कुछ भी नहीं तेरी मेरी कहानी है। *****

  • आम लडकी

    विनीता गौतम मैं आम लडकियों जैसी नहीं हूँ, नहीं हूँ मैं गुड गर्ल पढी लिखी हूँ उडना चाहती हूँ अपने सपनों को पूरा करना चाहती हूँ, इसलिए अपने हक के लिए लड भी सकती हूँ, क्योंकि मैं आम लडकी जैसी नही हूँ। जुल्म नहीं सहूगी, खामोश भी नहीं रहूगी, तर्क वितर्क भी करूंगी, क्यूंकि मैं आम लडकियों जैसी नहीं हूँ। कोई भी राह चलता छेड जाये, पीछे से कोई सीटी मारे या कोई जुमला कस जाये, ऐसे मनचलों को बेइज्जत भी करूगी, क्योंकि मैं आम......... । अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीना है , जो मन में आये वो करना है नहीं बनना है गुड गर्ल क्योंकि मैं आम लडकियों के जैसे नही हूँ। *******

  • मुक्तिमार्ग की खोज में

    कौशल पाण्डेय जब उस दिन डाक में रमण संदेश नाम की वह छोटी सी पत्रिका मिली तो यह समझते देर न लगी कि निश्चित ही इसे मेरे हिन्दी के अध्यापक रहे रमण सहाय जी ने ही भेजी होगी। वे मेरे गांव के निकट के माध्यमिक स्कूल में मुझे हिन्दी पढ़ाया करते थे। कविताएं लिखते थे। स्कूल के कार्यक्रमों में जब वे अपनी कविताएं सुनाते तो हम बच्चों को वह दुनिया के सबसे बड़े कवि लगते। वे अक्सर कहा करते थे कि रिटायर् होने के बाद एक पत्रिका अवश्य निकालेंगे जिससे इस क्षेत्र के लिखने वालों को देश-दुनिया में नाम दिला सकें। पत्रिका में कुछ कविताएं तो स्वयं रमण जी की थीं और कुछ कस्बे के उभरते कवियों की। साथ ही तीन-चार पन्नों में वैवाहिक विज्ञापन। मैंने रमण जी को पत्रिका मिलने की सूचना देने के लिए फोन किया तो बहुत खुश हुए। बोले कि पत्रिका निकाल तो दी पर कोई मदद नहीं कर रहा है। उनका संकेत आर्थिक मदद की ओर था। फिर बोले कि तुम्हारी कविता अमुक पत्रिका में छपी देखी तो सोचा संपर्क करें। तुम तो बड़े लेखक लगते हो। एक कविता मुझे भी भेजो पता तो चले कि लिखते भी हो। और तब गुरु दक्षिणा का भी अधिकार बनता है। मैंने उन्हें सहयोग राशि का एक चेक और एक कविता लिफ़ाफ़े में रखकर भेज दी। दो-तीन महीने के बाद पत्रिका फिर मिली। मेरी कविता भी छपी थी पर किसी और के नाम से। मैंने फोन करके पूछा तो उनका जवाब बड़ा ही मासूमियत भरा था। हाँ, मैंने भी देखा है। दरअसल मेरा बारह वर्ष का नाती बहुत दिनों से लगा था कि बाबा एक कविता मेरे नाम से भी छाप दो। स्कूल में दोस्तों को दिखानी है। मुझे समय नहीं मिल पा रहा था और वह ठहरा बालक। अपना धैर्य खो बैठा। मेरी टेबल पर रखे प्रूफ के पन्नों में तुम्हारी जगह अपना नाम लिख दिया। तुम एक कविता और भेज दो। इस बार तुम्हारे फ़ोटो के साथ छापेंगे। मैं इंतजार करूंगा। मैं फोन हाथ मे लिए निरुत्तर होकर अपनी मुक्ति के मार्ग की खोज में लग गया। **********

  • कद

    सुरेश बाबू मिश्रा कमलनाथ ऑफिस जाने के लिए तैयार हो गए। उन्होंने अपना बैग उठाया और अपनी पत्नी विनीता के कमरे की ओर गए। अपने ममेरे भाई शैलेन्द्र और अपनी पत्नी की हंसी की आवाज को सुनकर उनके कदम ठिठक गए। तभी शैलेन्द्र की आवाज सुनाई पड़ी, “भाभी! भइया की यह हालत मुझसे देखी नहीं जाती। हमें उन्हें सारी बातें साफ-साफ बता देनी चाहिए।“ “मुझे सब कुछ अपने आप पता चला जाएगा, तुम्हें बताने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी बच्चू।” कमलनाथ मन ही मन बुदबुदाए। उनके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कराहट तैर गई। “विनीता मेरा मोबाइल नहीं मिल रहा है। देखना कहीं तुम्हारे कमरे में तो नहीं हैं? यह कहते हुए कमलनाथ कमरे में पहुंच गए। विनीता और शैलेन्द्र दोनों बैड पर बैठे हुए थे और आपस में हंस-हंस कर बातें कर रहे थे। विनीता ने मोबाइल ढूंढ़कर कमलनाथ को पकड़ा दिया। कमलनाथ आफिस के लिए चल दिये। वे बड़े तनाव में थे। शैलेन्द्र उनका ममेरा भाई था। पिछले पांच-छः दिनों से वह उनके यहां ठहरा हुआ था। कमलनाथ की शादी के पाँच-छः वर्ष हो गए थे। शादी के बाद शैलेन्द्र पहली बार उनके घर आया था। शैलेन्द्र ने विनीता को शादी में ही देखा था मगर विगत पाँच-छः दिनों में दोनों इतने घुल-मिल गए थे कि मानो कि एक-दूसरे को वर्षों से जानते हों। दोनों हर समय साथ-साथ रहते और एक पल के लिए भी एक-दूसरे से अलग नहीं होते। घन्टों बैड पर बैठकर बातें करते, हंसते, खिलखिलाते, टी.वी. पर साथ-साथ पिक्चर और सीरियल देखते। कमलनाथ के मन में दोनों की यह नजदीकी कांटे की तरह चुभती। दोनों के बीच देवर-भाभी का रिश्ता था। इसलिए वे किसी से कुछ कह भी नहीं सकते थे। दोनों के बीच क्या खिचड़ी पक रही है यह जानने के लिए आज उन्होंने अपना मोबाइल रिकार्डिंग पर लगाकर विनीता के बैड पर रख दिया था। कमलनाथ मोबाइल में रिकार्ड दोनों के बीच हुई बातचीत सुनने के लिए बड़े बेताब थे। उन्होंने घड़ी पर नजर डाली अभी आफिस खुलने में बीस मिनट बाकी थे। एक जगह सड़क पर भीड़-भाड़ कम देखकर मोटरसाइकिल खड़ी की और मोबाइल ऑन कर रिकार्डिंग सुनने लगे। वे जैसे-जैसे मोबाइल में दर्ज बातें सुन रहे वैसे-वैसे उनके चेहरे का रंग बदलता जा रहा था। विनीता की आवाज थी- “दाम्पत्य जीवन में शान्ति बनाए रखने के लिए पत्नी अपने सीने पर पत्थर की शिला रख लेती है मगर पति अपने सीने पर छोटा सा कंकड़ भी बर्दाश्त नहीं कर पाता है। शादी के बाद वह अपनी लेडीज सहकर्मियों के साथ अक्सर पिक्चर या सैर सपाटे को जाते थे। इन्होंने कभी नहीं सोचा कि ऐसे में मेरे दिल पर क्या गुजरती होगी। उन्हें यह अहसास कराने के लिए तुम्हारी मदद से हम दोनों के बीच नजदीकी दिखाने का नाटक किया तो जनाब कितने बेचैन हो उठे हैं। इन्हें न अपने भाई पर विश्वास है और न अपनी पत्नी पर। इन्हें लग रहा है कि मेरे और तुम्हारे बीच कोई चक्कर चल रहा है।“ कमलनाथ को अपने ऊपर बड़ी ग्लानि हो रही थी। उन्हें अपनी तुलना में विनीता का कद आज बहुत बड़ा लग रहा था। ************

  • जाने-अनजाने

    रतन चंद 'रत्नेश' स्टॉपेज पर खड़ा मैं लोकल बस की प्रतीक्षा कर रहा था। इस बस से फिलहाल मुझे अंतरराज्यीय बस-अड्डे तक जाना था। वहाँ जाकर ही निर्णय लेना था कि अब कहाँ पहुँचना है? कहीं दूर नहीं, बस वहाँ से पंद्रह-बीस किलोमीटर दूर कहीं राह में किसी गाँव से लगते स्टॉपेज पर उतर जाना था। फिर हरे-भरे खेतों के बीच से गाँव की ओर जाती राह पर टहलते हुए उधर की ओर निकल जाना था। उसके बाद दो-चार घंटे यों ही गाँव या खेतों के आसपास गुजारकर वापस लौट आना था। शहर की भागमभाग और एकरस जीवन से इस तरह पीछा छुड़ाकर 'रिलैक्स' होने की यह मेरी बहुत पुरानी आदत है। युवावस्था में तो महीने में दो-तीन चक्कर इस तरह लग जाते थे। कैमरा साथ हुआ करता था और ग्राम्य-जीवन की कई तस्वीरों को उसमें कैद कर लिया करता था। अब उम्र ढलने के साथ-साथ यह दौरा कई महीनों के अंतराल पर जा पहुँचा है। घर से दूर कहीं जाने की इच्छा ही नहीं होती अब। वैसे कैमरा अब भी साथ होता है और अब वह डिजिटल भी है। पहले वाला साढ़े तीन सौ का कैमरा अब भी संभाले हुए हूँ हालांकि उसे इस्तेमाल में लाने की अब जरूरत भी नहीं रह गई है। फोटो खींचने में भी बहुत चूजी हो गया हूँ जबकि डिजिटल कैमरे में खर्चे का सवाल तंग नहीं करता। विगत कुछ दिनों से एक अनजानी सी उदासी जब तब घेर रही थी। कभी देर रात परेशान करती तो अपना मनपसंद किताब पढ़ते। सोचा, उसी पुराने कारगर फार्मूले को अपनाऊँ। बस आई तो खचाखच भरी हुई थी। नौ-दस बजे के दरमियान ऐसा होना स्वाभाविक है। पिछले द्वार से किसी तरह जगह बनाते हुए मैं भी बस के अंदर दाखिल हुआ और पीछे जाकर एक डंडे का सहारा लेकर खड़ा हो गया। कंडक्टर अपनी आदतन आवाज में जोर से बोले जा रहा था 'बगैर टिकट कोई न रहे... अपना-अपना टिकट ले लो।' कंडक्टर के इर्द-गिर्द थोड़ी सी जगह बनी तो मैं भी दस रुपए थामे उसकी ओर बढ़ा। कंडक्टरों के एक से रहने वाले चेहरे के साथ जैसे ही उसने मेरे नोट की ओर हाथ बढ़ाया कि मुझसे आँखें मिलते ही वह अपनी सीट से खड़ा हो गया 'आइए सर।' अब उसके चेहरे पर मुस्कुराहट थी जो उसने अब तक शायद कहीं छुपाकर रखी थी। आसपास खडे लोगों के चेहरे मेरे चेहरे पर प्रश्न बनाने लगे। मुझे सीट की नितांत आवश्यकता थी। उम्र जो ऐसी ठहरी। अत: उसके सीट छोड़ने पर मैं कंडक्टर-सीट पर जा बैठा। वह पास ही मेरे बगल में खड़ा था। मैंने फिर से दस रुपए का नोट उसकी ओर बढ़ाया। उसने उसी तरह मुस्कुराते हुए कहा, 'क्यों शर्मिंदा करते हैं सर?' असल में उस समय शर्मिंदा मैं हो रहा था। अब तक गौर से उसके चेहरे के हर भाव की सूक्ष्मता से पड़ताल करता रहा था परंतु मुझे उसमें कहीं भी अपना परिचित नज़र नहीं आ रहा था। किराये के पैसे न लेने पर मैं शर्मिंदगी के साथ-साथ परेशानी का भी अनुभव कर रहा था, इसलिए मैंने स्पष्ट शब्दों में उससे कह दिया, 'लगता है मुझे पहचानने में आपसे गलती हो रही है।' वह हँस पड़ा, 'गलती मुझसे नहीं, आपसे हो रही है सर।' उसके ऐसा कहने पर मुझे अपनी साठ की उम्र छूने का दोष दिखने लगा। फिर भी अपने विश्वास को दृढ़ बनाये रखते हुए मन-ही-मन कहा, ऐसा तो पहले कभी हुआ नहीं। मैं उसे लगातार पहचानने की कोशिश कर रहा था। अपने से बड़ों को अंकल या सर कहना आम बात है। फिर भी मैं उस कंडक्टर में उन्हें तलाशने लगा जिन्हें बचपन में ट्यूशन पढ़ाया हो। उन दिनों नौकरी के साथ-साथ अतिरिक्त आय के लिए मैं बच्चों की ट्यूशनें लिया करता था, परंतु वे भी अधिक नहीं थे। मुश्किल से बीस एक छात्र-छात्राओं को अंग्रेजी और मैथ पढ़ाया हूँगा। अधिकतर बच्चे मुझसे इन दो विषयों की ही ट्यूशनें लिया करते थे परंतु मैंने इन छात्रों की संख्या इतनी नहीं बढ़ने दी कि परिवार की जिम्मेदारियों से विमुख हो जाता। बहरहाल उन सबको एक-एक कर जल्दी से याद किया परंतु कोई भी चेहरा इससे मेल नहीं खाया। फिर मैंने अपने दिमाग पर अधिक जोर भी नहीं डाला, न ही अन्य दूसरे चेहरों में उसे तलाशने की जद्दोज़हद की। अंतत: यह अपना परिचय देगा ही जब उसने मुझे पहचान लिया है। बस में भीड़ धीरे-धीरे घटती गई और अब सीटें भी खाली होने लगी थीं। मैंने उसकी सीट छोड़ दी और पास ही दूसरी सीट पर बैठ गया। 'मैंने तुम्हें बिल्कुल नहीं पहचाना।' मैंने उससे कहा। मेरे प्रश्न का उत्तर देने के वजाय उसने कहा, 'आप तो बिल्कुल वैसे ही हैं सर। शायद मैं बदल गया हूँ।' वाकई मेरा कद, वजन, डीलडौल हमेशा एक-सा रहा है। इस उम्र में भी सिर के बाल अधिकतर काले हैं। सिर्फ कलम सफेद हुए हैं या फिर मूंछें। मैंने हँसकर उससे कहा, 'तुम बदल गए या मैं सठिया गया हूँ, क्या पता?... पर अब तो बता दो, कौन हो तुम? इतना आदर-मान दे रहे हो, किराये के पैसे भी नहीं ले रहे?' इससे पहले कि वह मेरे प्रश्नों का उत्तर देकर मुझे आश्वस्त करता, अगला स्टॉपेज आ गया जहाँ सात-आठ सवारियाँ बस पर सवार हुईं। वह उनका टिकट काटने में व्यस्त हो गया। मेरे मन में उथल-पुथल बढ़ती जा रही थी। मैं उसे टिकट काटते ध्यान से देखता रहा पर सचमुच पहचानने में असफल रहा। उस समय मेरे सामने कई ऐसे उम्रदराज आकर खड़े हो गए जिन्होंने कुछेक वर्षों बाद मुझे पहचानने से इनकार कर दिया था। बाद में जब उन्हें अपना परिचय दिया तो वे बड़े गर्मजोशी से मिले। टिकट काट लेने के बाद वह मेरे मुखातिब हुआ। 'आप अब भी ज़ीरकपुर में ही रह रहे हैं? ' मैं मुस्कुरा उठा और लगा, जैसे सिर से एक भारी बोझ उतर गया हो। मेरे लिए सबसे खुशी की बात यह थी कि मेरी याददास्त अब भी सलामत थी जिस पर अब तक मुझे शक होने लगा था। मैंने उससे कहा, 'देखा, मैंने पहले ही कहा था कि तुमसे भूल हो रही है। मैं कभी ज़ीरकपुर में नहीं रहा हूँ।' ऐसा सुनने के बावजूद उसके चेहरे के हावभाव में मेरे प्रति तनिक भी बदलाव नहीं आया। वह पहले की तरह ही मुस्कुराता रहा। शायद उसने मुकम्मल तौर पर मान लिया था कि मैं सठिया गया हूँ। वह अपनी पहचान को बरकरार रखना चाहता था। मैं भी हार मानने वाला नहीं था। कहा, 'क्यों भूल हो गई न? होता है कभी-कभी ऐसा। कहते हैं कि इस दुनिया में एक ही शक्ल के सात व्यक्ति होते हैं। उनमें से ही आपका कोई ऐसा है जिसकी शक्ल मुझसे मिलती हो। तुमने उसे मुझमें पहचान लिया। यह लो...अब तो किराये के यह दस रुपए पकड़ो। कहीं चेकिंग हुई तो मैं खामख्वाह रगड़ा जाऊँगा।' मैंने वही नोट फिर से उसके आगे बढ़ाया परंतु उसने लेने से इनकार कर दिया और पूछा, 'आजकल आप कहाँ रह रहे हैं?' मैंने अपने आवास वाले इलाके के बारे में उसे बताया तो उसने कहा, 'एक दिन आऊँगा जरूर आपके घर। आंटीजी कैसी हैं?' मैंने कहा, 'वे तो ठीक हैं परंतु तुम अब भी गलत हो।' मेरे कहे पर वह जोर से हँसा। सवारियों के साथ-साथ बस ड्राइवर भी मिरर में हमारी ओर देखने लगा। थोड़ी ही देर में अंतरराज्यीय बस-अड्डा आ गया। कंडक्टर बस से उतरकर द्वार के पास खड़ा हो गया और मेरे उतरने की प्रतीक्षा करने लगा। मैं जब उतरा तो वह अनुरोध करने लगा, 'सर आइए, थोड़ी-थोड़ी चाय पीते हैं।' पर न जाने क्यों अब मैं उससे जल्दी से पीछा छुड़ा लेना चाहता था। कहा, 'अभी जल्दी में हूँ। चाय नहीं पीऊँगा। तुम मेरे घर तो आ ही रहे हो किसी दिन, उसी दिन इकट्ठे चाय पीएंगे।' वह मुझसे विदा लेकर बस-अड्डे की भीड़ में कहीं खो गया। मैं वहाँ खड़ा-खड़ा सोचता रहा... परंतु उसने मेरे घर का पूरा पता तो लिया ही नहीं।' ******************

  • आईना

    सम्पदा ठाकुर हमारा मन ही हमारा आईना है जिसको देख कर भी हम हमेशा अनदेखा कर देते हैं वह मुझे हर वक्त कुछ ना कुछ बताना चाहता है सही और गलत दिखाना चाहता है सच और झूठ अच्छा बुरा जो भी हो वह हमें बताना चाहता है पर हम मन की बातों को कहां सुनते है मन की बातों को अनसुना कर उसे तो बस नजर अंदाज करते जाते हैं और बस करते हैं अपनी मनमानी यह सोचते हुए हम जो कर रहे हैं बस यही सही है हमारे किए को कोई नहीं देख रहा पर हम यह भूल जाते हैं हमारा मन ही है जो हर पल हमारे साथ होता है अच्छे बुरे हर कर्मों को यह हर पल देख रहा होता है मन जिसके पास हमारे सारे किए धरे का हिसाब होता है क्योंकि यही तो ईश्वर का निवास होता है इसलिए मन की आवाज को कभी अनसुना ना करें मन की आवाज अवश्य सुने क्योंकि वह हर पल सही होता है और यही सच है। *****

  • NATURE AND ITS ELEMENTS

    -Avighna Gautam Earth! Our mother Earth, Full of beauty and admiring worth, We thankless humans have no time, to stand still and admire it sometime. The dancing maiden beauty of the woods, carries chastity in its heart with lots of goods. The bushy tail of the quirky fox, and the serene sound of the lake’s talks. And oh! how I carry , in my heart a joyful bit, from all the stress and work, I quit And watch the blossoming flowers, And see the bees preparing honey jars I always liked to go for a stroll And sit amongst the bushes on the green knoll Between the tremendously beautiful nature With the chirping birds, being a heavenly creature For my little galloping pony Is ready to swing again Through the forest and along the the river and through the lording mountains Down from the mountains to Reaching the tranquil river my little pony’s trembling foot gives my heart natural shivers. The shepherd boy running all over the realm, with his sheep and cattle followed by him. Deep into the night dark sky, glazing at shining moon and stars getting dim. Oh! How I love to sit around the river, with no motion around. Creeping against the sleeping meadow, and admiring the calm clouds. The forest being so wide and deep, with hiding squirrels and bees in sleep, the nature is a creation of heavenly goodness, with its aspects rambling about full of happiness. The earth, fire, water and wind, All are the kids of nature. They are the gods and the elements, coz, they are the reason of our fulfilment. Earth, the land constructed of soil, Inside it the hottest fire plate boils. Then wide in the environment we go, The wind and water where freely flow. Fire, a hot gas flowing, bright light flames showing. Sun is the brightest source of light, Due to it we see and enjoy flying kite The ice and the gases daughter, it is now the serene water. Flowing in the calmest lakes and the loudest seas, It is the source of rain called out by trees. Last but not the least is the air, Comprising of quadruple layers. we breathe into it And offer our prayers, The nature is so stunning, Oh my! The Sun , The Moon, The Fire, The sky though we have no time to stand and stare, yet these elements are so humble and full of care. **********

  • Donkey No, You are gentle

    Dr. Jahan Singh ‘JAHAN’ You are beautiful and dutiful ! You are gentle and faithful ! Your look is serene and temper is cool ! Still human fools call you fool ! Patent your name as abuse it ! Among themselves they also use it ! Hey Humans did no good to the nature ! You did no wrong to the nature ! You are gentle and faithful ! You serve them in Sand Mountain and dense forest ! In all weathers even without rest ! But for you this derogatory name ! To them it is big Shame Shame ! You are gentle that's your name ! You are beautiful, dutiful and faithful ! Donkey no, gentle is your name ! *********

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