Search Results
978 results found with an empty search
- एक था राजा
डॉ कृष्ण कांत श्रीवास्तव बहुत समय पहले की बात है। किसी राज्य में एक राजा राज करता था। राजा की तीन खूबसूरत रानियां थी। राजा अपनी पहली पत्नी के व्यवहार और बातचीत से अत्याधिक प्रभावित था और उसे बहुत प्यार करता था। राजकाज के सभी कार्यों में राजा अपनी इस पत्नी को साथ रखता था। राजा की दूसरी पत्नी तीनों में सबसे अधिक सुंदर और युद्ध विद्या में निपुण थी, इसलिए राजा अपने दूसरे नंबर की पत्नी को भी बहुत अधिक महत्व देता था। विपरीत परिस्थितियों में राजा की दूसरी पत्नी राजा के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उनकी मदद करती थी। इसलिए राजा अपनी दूसरी पत्नी के साथ मित्रवत व्यवहार करता था और जब भी कोई परेशानी होती तो वह अपनी दूसरी पत्नी से सुझाव लेता था। राजा की तीसरी पत्नी असाधारण सुंदर तो थी परंतु बातचीत और युद्ध विद्या में उतनी निपुण नहीं थी। वह धार्मिक प्रवृत्ति की थी और अपने पति की लंबी उम्र के लिए सभी धार्मिक अनुष्ठान इत्यादि अवश्य करती थी। राजा अपनी तीसरी पत्नी से प्यार नहीं करता था, लेकिन उसकी तीसरी पत्नी उसको बहुत प्यार करती थी। राजा अपने राजकाज के कामो में बहुत ही व्यस्त रहता था। धीरे-धीरे राजा का स्वास्थ्य खराब रहने लगा। राजा को एक ऐसे असाध्य रोग ने घेर लिया जिसके कारण उसके बचने की बहुत ही कम उम्मीद रह गयी। अनेकों वैद्य राजा के उपचार में लग गए परंतु रोग था जो ठीक होने का नाम ही नहीं ले रहा था। राजा को आभास हो गया कि अब उसका अंत समय निकट है। राजा को मौत का भय सताने लगा। भय के कारण राजा अकेले नहीं मरना चाहता था। उसने अपनी पहली पत्नी को बुलाया और बोला, “मेरा अंत समय निकट है, कृपा कर आप हमारे साथ ऊपर भगवान के घर ऊपर चलो।” यह सुनकर वह बोली, “मैं आपके साथ नहीं जा सकती। मैं तो अभी और जीना चाहती हूं।” पहली पत्नी की बात सुनकर राजा बहुत निराश हुआ। उसके बाद राजा ने अपनी दूसरी पत्नी को याद किया। जब उसने सुना कि उसके पति उसको अपने साथ ले जाना चाहते हैं तो वह उनसे जाकर बोली, “मैं तो अभी जवान हूं मेरी उम्र ही क्या है? मैं आप के साथ नहीं जाउंगी। मैं आपके मरने के बाद दूसरी शादी कर लूंगी।” यह सुनकर राजा बहुत ही दुखी हुआ। अपनी दोनों पत्नियों की बात सुनने के बाद राजा ने अपनी तीसरी पत्नी को बुलाया ही नहीं। परंतु उसकी तीसरी पत्नी खुद चलकर आ गयी और बोली, “महाराज, मैं आपके साथ भगवान के घर चलने को तैयार हूं। जब आप ही ना होंगे तो हमारा इस संसार में रहने का क्या फायदा।” उसकी बात सुनकर राजा बहुत खुश हुआ। फिर दूसरे ही पल निराश होकर बोला, “मैंने पूरी जिन्दगी तुमको प्यार नहीं किया और आज तुम बिना शर्त मेरे साथ ऊपर भगवान के घर तक चलने के लिए तैयार हो गई। निश्चित तौर पर मुझसे अपने जीवन में बहुत बड़ी भूल हो गई, जो मैं तुमको पहचान नहीं सका। मैं इस भूल के लिए अपने को कभी माफ नहीं कर पाऊंगा।” मुझे मालूम है कि ईश्वर के घर सभी को अकेले ही जाना होता है। मैं तो केवल आप सभी लोगों की परीक्षा ले रहा था। आप मेरी इस परीक्षा में उत्तीर्ण हो गई, इसलिए मैं अपना राजपाट और सभी धन संपत्ति आपके हवाले करके जाता हूं। ऐसा कहकर राजा ने अपने प्राण त्याग दिए। यह कहानी हमें बताती है कि जीवन में प्यार उससे करो जो आपको प्यार करता हो, उससे नहीं जिसे आप पसंद करते हो। ********
- आखरी नाव
डॉ. जहान सिंह ‘जहान’ असम के घने जंगलों में खासी पहाड़ियों के बीच ब्रह्मपुत्र की उपनदी गरगई के किनारे पर बसी एक छोटी ढोंग बस्ती। गोल छप्पर नुमा झोपड़ी कुछ टूटे पत्थर और लकड़ी के बने आकार जिन्हें मकान कह सकते हैं। नंगे खेलते बच्चे, भोंकते कुत्ते, कीचड़ की सौगात में लिपटी गाय, भैंस, बकरियां, तीखे लाल, नीले, काले, पीले रंगों के कपड़े। शाल, चादर से यौवन ढकने की कोशिश करती युवतियां नई दुनिया से बहुत दूर दैनिक कार्यों में उल्झी। छोटे-छोटे पानी के गड्ढे, उन में हलचल करती मछलियां, इधर-उधर भागते मुर्गे, मुर्गियां। पान, सुपारी, मक्का, धान ही उनकी पूजी, जिसे बड़ी सफाई से टूटी झल्लियों या मिट्टी के बर्तनों में संजोकर कोने में रखती स्त्रियां। कपड़ों के टुकड़ों को कमर में बांधे हुक्का पीते, पान सुपारी खाते, अलसाये मर्द या तो मछली पकड़ने में या कंकड़ों के टुकड़ों से कोई शतरंज का जैसा खेल खेलने में ही लगे रहते। अमावस्या या पूर्णिमा को हाट-बाजार कर लेना बस। बाकी जीवन जीने का संघर्ष महिलाओं पर निर्भर रहता है। लगातार यही सामान्य जिंदगी जिसमें केवल रोटी, कपड़ा और मकान की जद्दोजहद ही शामिल रहती है। लेकिन यही सोया हुआ गांव कार्तिक मास में एक नगर के संसाधनों से सुसज्जित हो जाता है। यहां एक विशाल मेला दुर्गा पूजा के साथ लगना शुरू होता है। और पूरे एक मास तक चलता है। इसी बस्ती से कुछ दूर एक दुर्गम रास्ते पर ऊंची पहाड़ी है। जहां ‘काल मठ’ स्थापित है। जो दूर-दूर तक अपनी तांत्रिक विद्या के लिए जाना जाता है। इस पर फहराता लाल पताका, शंख घड़ियाल की ध्वनि स्वतः लोगों का ध्यान आकर्षित करती है। रोशनी का साधन उस पर जलती हुई मशाल जो वहां आने वालों को बहुत दूर से सम्मोहित करती है। और लोग खिचे चले आते हैं। ऐसा विश्वास कि वहां जाने वालों की हर मनोकामना पूरी होती है। खासतौर पर यदि मठाधीश तांत्रिक ‘स्वामी काल भैरव आनंद’ स्वयं आशीर्वाद देदें। मेले में आने जाने वाले मर्द, स्त्रियां सब कोशिश करते हैं कि उनके दर्शन हो जाए। कुछ आस्था विश्वास पर कुछ जिज्ञासा बस और विदेशी पर्यटक शोध कार्य की भावना पहुंच से पहुंचते रहते हैं। गोवहारी का मेट्रो जीवन, तेज दौड़ती जिंदगी। इंजीनियर सुबोध बरुआ ने अपनी इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त कर एक प्रसिद्ध बहुराष्ट्रीय कंपनी में सीनियर पद पर इस नगर में नौकरी कर ली। उनकी योग्य पत्नी डॉ. देवो मालती गोगोई बही के महिला कॉलेज में समाजशास्त्र की शिक्षिका है। छात्र-छात्राओं, विभाग एवं अपनी कॉलोनी में प्रसिद्ध एवं प्रिय है। इन दोनों के प्यार, पति-पत्नी के रिश्ते और अच्छे इंसान का लोग उदाहरण देते हैं। अगर कोई कमी थी तो शादी के बाद इतने वर्षों में मां-बाप ना बनने की। दोनों को आपस में कोई मलाल नहीं था। क्योंकि शिक्षित एवं समझदार हैं। लेकिन समाज की नजरें कभी-कभी विचलित कर देती थीं। हर वर्ष इंजीनियर सुबोध दो माह के लिए अमेरिका रहते थे। इन गर्मियों के अवकाश में डॉ. देवो मालती अपनी ससुराल में आ जाती है। जो टोंग बस्ती से चालीस मील की दूरी पर है। ससुराल में सब कुछ ठीक होते हुए भी सास का ताना, पिछड़े इलाके होने से हर औरत मर्द की कुछ ना कुछ इस प्रकार की छींटाकशी ‘बांझ स्त्री’ का संबोधन, तीज त्यौहार की पूजा में शामिल ना होने देना। बच्चों के जन्म पर किसी को प्यार से आशीर्वाद ना देने देना। बरगद पूजा में शामिल ना करना। कुंवारी लड़कियों को देर रात तक साथ में खेलने ना देना। इन छोटी-छोटी लेकिन तीखी बातों ने डॉ. मालती के जीवन में इतनी कड़वाहट भर दी कि सब कुछ होते हुए जीवन आधारहीन निरुद्देश प्रतीत होने लगा। पढ़ी-लिखी होने के नाते, सब सहज तरीके से सहन करती। डॉ. मालती अंदर से बिखर चुकी थी। मेले की चर्चा कई बार सुनी ‘काल मठ’ के स्वामी की शक्तियों के बारे में गांव की औरतों की आए दिन बातचीत से डॉक्टर मालती को अनायास ‘काल मठ’ ने सम्मोहित करना प्रारंभ कर दिया। और इंजीनियर सुबोध के आने पर ‘काल मठ’ जाने का मन बना लिया। उसने सुबोध से कहा कि मैं यहां दो महीने से बोर हो रही हूं। चलो पास में ही मेला लगा है, घूम आए। मेरा मन भी बहल जाएगा। अमेरिका से आए सुबोध को मेले में जाने का प्रस्ताव अटपटा सा जरूर लगा। फिर भी मालती की खुशी के लिए हां कर दी। मठ तक पहुंचने के लिए नदी पार करनी पड़ती है। इस कार्य के लिए एक ही मोटर बोट चलती है। जो यात्रियों को इस पार से उस पार पहुंचाती है। मेले का शोर, चाट, मिठाई, फलों की दुकान, कपड़े, इत्र, मिट्टी के खिलौनों से लेकर लोकगीत, नाटक, नृत्य-मंडली, जादू, सर्कस, नट के कर्तव्य, मौत का कुआं, एक मिनट में फोटो, पर्यटन, टॉकीज में चलचित्र, एक बिल्कुल नया अनुभव सुबोध और मालती को। मालती ने सुबोध से निवेदन किया कि उस मठ में एक बहुत सिद्ध तांत्रिक रहते हैं, चलो दर्शन करें। मैं एक समाजशास्त्री हूं और आप तकनीकी वैज्ञानिक। जिज्ञासा के अनुरूप एक अच्छा अनुभव होगा। सुबोध तुरंत जवाब दिया, “I don't believe in such things if you want to go you can, I will enjoy here.” मालती का अंतर्द्वंद जिज्ञासा और कुछ प्राप्त करने की उत्कंठा ने बरबस चलने को मजबूर कर दिया। मालती बोली, “You'll Wait here till I Returns.” सुबोध ने बड़ी नम्रता से Yes बोला। मालती चल दी, रास्ता दुर्गम घुमावदार सीढ़ियां और घना जंगल ज्यादातर यात्री वापस लौट रहे थे। शाम होने को थी, कुछ बरसात की संभावना बन रही थी। जो इस क्षेत्र में सामान्य बात है। मालती थकी हारी ऊपर पहुंची। अंधेरा होने लगा था, लेकिन अंदर एक अनोखी इच्छाशक्ति प्रेरणा सूत्र का कार्य कर रही थी। अंधेरा होने लगा था। काल मठ द्वार पर अजीब सा सन्नाटा। मालती बिना रुके अंदर चली गई और तांत्रिक स्वामी काल भैरव आनंद के कक्ष में प्रवेश कर गई। अद्भुत आकर्षण लाल तमतमाता हुआ चेहरा, सुदृढ़ शरीर, बलिष्ठ भुजाएं, रुद्राक्ष के माला से लिपटी गर्दन, चौड़ी छाती, चारों तरफ जलती आग, बंद आंखें, ललाट पर सूर्य की किरणें जैसा प्रकाश बिखेरता तिलक। एक अजीब सी वातावरण में सम्मोहक खुशबू। मालती के अंदर मां बनने की इच्छा का ज्वालामुखी फूट पड़ा। उसने अनचाहे अनजाने में अपने वत्र उतार दिए और नग्न अवस्था में पुकार कर बोली। “काल भैरव स्वामी” देख मेरी तरफ मैं भी नारी हूं। मुझसे मेरी नारी होने का अधिकार कोई नहीं छीन सकता। बिना “मां” का स्वरूप लिए नारी अधिकार हीन होती है। स्वामी तांत्रिक आंख खुलते हैं। आंखों से अचानक तेज रोशनी निकलती है और आकाश में भयानक बिजली कड़कती है। मालती भय से तांत्रिक की बाहों में समा जाती है। मालती के शरीर में अनगिनत ज्वालामुखी फूटने का एहसास होता है। बाहर बहुत तेज बारिश होने लगती है। मालती अर्थ चेतना अवस्था से जब वापस आती है, तो घबरा कर अपने को ठीक करती है। शरीर में अजीब सा दर्द, लेकिन अंदर पूर्ण तृप्ति, संतोष एवं सुख की चरम सीमा की अनुभूति। बहुत देर होने से सुबोध भी ‘मठ’ के पास पहुंच गया। बाहर से सुबोध की आवाज आती है, “यदि पूजा-पाठ हो गया हो तो चलो।” तब तक हूटर की आवाज जोर-जोर से सुनाई देती है। यह जाने वाली आखरी नाव है। आज 23 अक्टूबर है। यदि नाव मिली तो कल अमेरिका जाने वाली फ्लाइट छूट जाएगी। तेज कदमों से सुबोध और मालती नाव की तरफ चल पड़े। बरसात हो रही थी। रुक-रुक कर बिजली भी कड़क रही थी। आज ना जाने क्यों मालती को सुबोध का हाथ पकड़ना अच्छा लग रहा था। अंदर की क्षणिक उत्पन्न हुई आत्मग्लानि, मालती ने अपने चेहरे पर हाथ फेरते हुए दरिया में त्याग दी। मैं एक स्त्री हूं। मुझे पूर्ण जीने का अधिकार है। यह प्राकृतिक का सत्य है। जिसे झूठलाया नहीं जा सकता। रात में सुबोध की अमेरिकी यात्रा की कहानी सुनते और प्यार करते-करते कब दोनों सो गए पता ही नहीं चला। समय आगे बढ़ा और मालती मां बनी। एक सुंदर सी कन्या को जन्म दिया। खबर से सुबोध के घर में खुशी छा गई। वहीं गर्मी का अवकाश, गांव का मेला, मालती का मठ में पहुंचना, स्वामी के दर्शन की लालसा में। लेकिन पुजारी ने बताया कि पिछले 23 अक्टूबर को स्वामी जी ब्रह्मलीन हो गए हैं। और उनके सिंहासन पर ‘मालती’ के फूल रखे हैं, आप दर्शन कर ले। मालती की आंखें नम थी। सुबोध कुछ समझ पाता उससे पहले मालती ने पूछा, “क्या जीवन स्थानांतरित किया जा सकता है?, नहीं मालूम।” आखरी नाव का हूटर जाने का संकेत दे रहा था। ********
- व्यक्तित्व और प्रकृति
डॉ कृष्ण कांत श्रीवास्तव कभी-कभी चीजों को स्वाभाविक रूप से होने देना ही बुद्धिमानी कहलाता हैं। इस सुंदर जीवन के लिए ईश्वर का धन्यवाद। इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रकृति हमेशा से ही सबको आकर्षित करती रही है। प्रकृति अपनी निरंतरता, अडिगता, अखंडता के कारण ही ताकतवर और सर्वशक्तिमान है। हम सब इसका ही हिस्सा हैं। स्वभाविक तौर पर ये सब मौलिक गुण हमारे अंदर मौजूद हैं। लेकिन भाग दौड़ भरी जिंदगी में हमने कृत्रिमता को ही सब कुछ मान लिया है और अपने आप को विकसित करने की बजाय पतन की ओर धकेलते जा रहे हैं। जिंदगी को बेहतर तरीके से जीने का साधारण सा नुस्खा है कि हर चीज में समझदारी दिखाने से खुद को बचाने का प्रयास करना। प्रकृति ही समझदार है। कभी-कभी चीजों को स्वाभाविक रूप से होने देना ही बुद्धिमानी कहलाता हैं। कृत्रिमता का परिणाम तो हम ही जान चुके हैं। हमें छोटी-छोटी बातों से ऊपर उठकर अपने अंदर प्राकृतिक गुणों को विकसित करने की आवश्यकता हैं। जीवन में दौड़ने की अपेक्षा सहजता से और झुक कर चलना ज्यादा बेहतर साबित होता हैं। कहावत भी है कि अकड़ कर चलना तो मुर्दों की पहचान होती है, झुकता वहीं है जिसमें जान होती हैं। अतः कोशिश यही होनी चाहिए कि खुद को स्वाभाविकता की ओर बढ़ाते चले। सफलता, कामयाबी, धन दौलत ये सब तो अपने आप मिलने लगते हैं जब हम छोटी-छोटी बातों से ऊपर उठकर अपने अंदर प्राकृतिक गुणों को और ज्यादा विकसित करने लगते हैं। हमें अपने सीमित समय में ही अपने आप को बेहतर बनाना होगा क्योंकि समय को दोबारा हासिल नहीं किया जा सकता। परिवर्तन स्थाई हैं। इस बात को समझना होगा। केवल तभी हम अपने आप को और ज्यादा कुशल बना सकते हैं। स्मार्ट बनने की अपेक्षा स्मार्ट वर्क करने की ज्यादा जरूरत है। जीवन की इस सुन्दरता को बढ़ाने की कोशिश ही हमारी वास्तविक सफलता होगी। प्रकृति को कुछ देने के बाद ही हासिल करने की संभावना ज्यादा रहती हैं। हम अपने जीवन की खुबसूरती को और भी बेहतर बना सकते हैं। जिस प्रकार प्रकृति की प्रत्येक वस्तु बहुत सुंदर होती है ठीक वैसे ही हमारा जीवन भी बहुत सुंदर होता है।हर इंसान के जीवन की अलग खूबसूरती होती हैं। लेकिन लगातार विपरीत परिस्थितियों के चलते हम इसकी खूबसूरती को भूल बैठे हैं। जीवन की इस सुन्दरता को बढ़ाने की कोशिश ही हमारी वास्तविक सफलता होगी। दौलत कमाना और जीवन को खुशहाल और समृद्ध बनाना दोनों एक दूसरे से भिन्न हैं। जरूरी नहीं कि दौलत कमाने के बाद खुशी मिलें परन्तु खुश रहकर धन कमाना सामान्य की अपेक्षा ज्यादा आसान होता हैं। इंसान जन्म के समय स्वाभाविक रूप से खुश होता है। उसे कोई चिंता, दुःख, निराशा परेशान नहीं करती। हमें कम से कम अपने शरीर का ध्यान रखने की अनिवार्य रूप से आवश्यकता है। जिंदगी हमसे सिर्फ इतना चाहती है कि हम सब अपने मूल रूप को कभी भी न भूलें। वास्तव में दौलत की चाह में हमारे बुनियादी गुण लगातार कम होते जा रहे हैं। हम सब कुछ भूलें बैठे हैं। हमें कम से कम अपने शरीर का ध्यान रखने की अनिवार्य रूप से आवश्यकता है ताकि हम सुख समृद्धि का उपभोग कर सकें लेकिन हमारी इस चाहत ने हमें बुरी तरह से भटका दिया है। अच्छी बातें अब हमें अजनबी सी प्रतीत होती है। नैतिक मूल्य एक विषय बन कर के रह गए हैं। महत्वकांक्षी लोगों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता। हमें सोचना होगा, समझना होगा कि आखिर कहां जा रहे है हम? कम होती कृतज्ञता का आखिर क्या कारण है? आज़ हमारे पास कामयाबी हासिल करने के लिए लगभग सभी साधन मौजूद हैं लेकिन सफलता चुनिंदा लोगों को ही मिल रही है। जीवन में कुछ कर गुजरने वाले लोग दूसरों की परवाह नहीं करते। आत्मनिर्भरता महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक हैं। हालांकि, हम आत्मनिर्भर है परंतु छोटी सी परेशानी आने पर दूसरों से अपेक्षा करते हैं कि वो लोग आएं और हमारी सहायता करें। आत्मनिर्भर व्यक्ति सामान्य की तुलना में आत्मविश्वास से भरपूर होता है। जीवन में कुछ कर गुजरने वाले लोग दूसरों की परवाह नहीं करते। उनको अपनी प्रशंसा और आलोचना से कोई सरोकार नहीं होता। प्रकृति भी हमसे यही उम्मीद रखती है कि हम आत्मविश्वास से लबरेज जीवंतता से भरपूर जीवन को जीएं। बिगड़ती दिनचर्या और बुरी आदतों के वश में होकर हम खुद के साथ बहुत अन्याय कर रहे हैं। और मज़े की बात ये है कि हमें इस का पता तब चलता है जब बहुत देर हो चुकी होती हैं। हमें इंतजार नहीं करना हमें खुशी-खुशी कार्य करते रहना है। यही आधारभूत आदतों में से एक हैं। दुनिया के महानतम लोगों ने जीवन की छोटी-छोटी बातों को बड़ा महत्व दिया। निरंतर प्रयास ही सबसे महत्वपूर्ण कदम होता हैं। हम अक्सर छोटी-छोटी बातों को अनदेखा कर देते हैं जबकि इन बातों का हमारे जीवन में बड़ा महत्व होता हैं। दुनिया के महानतम लोगों ने जीवन की छोटी-छोटी बातों को बड़ा महत्व दिया। हम छोटी बातों को कम ध्यान देते है क्योंकि हम बड़ा हासिल करना चाहते हैं। बिना इसके जाने कि बड़ा बनने के लिए छोटी-छोटी चीज़ों का ध्यान रखना अनिवार्य शर्त है। ऐसी परिस्थिति में हमें समझदारी से काम करने की कोशिश करनी होगी और साथ ही किसी भी प्रकार की गलतफहमियां का शिकार होने से बचना होगा। कई बार तो ऐसा लगता है जैसे हमारे बिना दुनिया ही थम जाएगी। इस तरह की जीवनशैली से खुद को दूर रखने की आवश्यकता है। इस खूबसूरत जीवन के लिए ईश्वर को धन्यवाद देना आवश्यक हैं। विपरीत परिस्थितियों में धैर्य और संतुलन बनाए रखना ही सबसे महत्वपूर्ण है। सुख में धैर्य, साहस और आत्मविश्वास रखना अपेक्षाकृत आसान होता हैं परन्तु दुःख, निराशा और असफलताओं की अवस्था में खुद को प्रेरित करना, उत्साह बनाए रखना बेहद कठिन परंतु आवश्यक हो जाता हैं। अक्सर हम असफल लोगों को देखकर जीते हैं कि उन्होंने भी प्रयास किया था, दिन रात मेहनत करने के बाद भी उनको कामयाबी नहीं मिली इत्यादि। इसकी अपेक्षा हमें सफल लोगों के विषय में ज्यादा से ज्यादा सोचने, समझने और पढ़ने की जरूरत है। जीवन में संतोष रखना जरूरी है लेकिन खुद के विकास को कभी भी कम न होने दें। जिसने सीखना छोड़ दिया उसका जीवन बिना पतवार की नाव जैसा हो जाता है। अपने रिमोट को अपने हाथों में ही रखना हितकारी होगा। **********
- लक्ष्मण रेखा
"मंगलम भगवान विष्णु, मंगलम गरूडध्वज, मंगलम पुण्डरीकाक्ष, मंगलाय तनो हरि!!" हॉल में पंडित जी के पवित्र वेद मंत्रों की ध्वनि गूँज रही थी । अंबर और अवनि पावन अग्नि के समक्ष परिणय सूत्र में बँधने के लिए की जाने वाली अनेक रस्मों से थके थके से नजर आ रहे थे। अँबर तो मन ही मन कब से सोच रहा था कि पंडित फेरे डालने के विधि विधान सम्पूर्ण करें तो जल्दी से विदाई बेला आये। तब जरा सी देर लेटकर अपनी कमर सीधी करने का मौका मिल जाए। तभी पंडित जी की आवाज़ गूँजी-- "जजमान अब दूल्हे की बहिन या बुआ यहाँ आकर दूल्हे के पटके को दुल्हन की चुनरी से बाँध दीजिए। अब दूल्हा दुल्हन सप्तपदी फेरों के लिए तैयार हैं। और हाँ, हमारे जजमान जी, आप जरा बिटिया रानी के शगुन नेग का लिफाफा भी तैयार रखिए।" पंडित जी के हल्के-फुल्के हँसोड स्वभाव अंदाज से परिचित, हाल में मौजूद सभी रिश्तेदार हँसी की फुहारें छोड़ रहे थे। पंडित के कहने पर दीदी ने अवनि के साथ अँबर का गठबंधन कर दिया। गहरे रंग के जामुनी जोड़े में सजी संवरी अवनि का रूप सौन्दर्य देखते ही बनता था, बसरा मोती और कुंदन के जड़ाऊ चमकते गहनों में उसका अप्रतिम सौंदर्य की रूप माधुरी पान से अँबर के चकोर नैना तृषित से थे । बेहद मँहगें दुल्हन के साज सिंगार में फालतू दिखावटीपन की बनावट नहीं थी। अवनि की शालीनता और सौम्यता उसके व्यवहार से लक्षित हो रही थी। दुल्हन की बेशकीमती सजी पोशाक और आभूषण में उसका गोरा कुंदन सा बदन अप्सराओं सा निखर उठा। अबंर ने भी दुल्हन के रंग से मैच करते हल्के जामनी रंग की शेरवानी पहनी थी। साथ में सफेद लकदक मोतियों की माला जो दूर से जामुनी रंग वाली किरणों से झिलमिल कर रही थी।अँबर के सौन्दर्य को द्विगुणित कर रही थी। साथ में झकाझक सफेद अलीगढ़ी पायजामा था। सुरूचिपूर्ण खूबसूरती से सजा धजा अँबर दूल्हे के वेष में बहुत ही मनमोहक लग रहा था। पंडित जी के कहने पर अब वे दोनों धीरे धीरे चलते हुए अग्नि के चारों ओर फेरे लगा रहे थे। पंडित जी ने अपनी आदत के अनुसार अवनि और अँबर को हँसी खुशी सात फेरों का महत्व बताते जा रहे थे। उन दोनों से सुख दुख में साथ निभाने की रस्में कसमें भी पूरी कराते हुए पंडित जी अवनि से बोले कि-- " आज से आप दोनों एक दूसरे के साथ वचनबद्ध होकर मंगल परिणय सूत्र में बँध गए हैं। बिटिया रानी चार फेरे में तुम्हारे कदम पहले बढ़ेंगे और अँबर तुम्हारा अनुसरण करेगा।" "ससुराल में परिजनों की सेवा सुश्रुषा एवं पति की मान मर्यादा का ध्यान रखते हुए तुम्हें जीवन में हम-कदम बनकर अँबर का सुख दुख की मुश्किल घड़ी में साथ निभाना होगा ।" "और अँबर तीन फेरे में तुम्हारे कदम पहले आगे बढ़ेंगे जिसमें जीवन सुचारू रूप से चलाने के लिए अवनि बिटिया तुम्हारा अनुसरण करेगी। और इसके लिए तुम्हें अवनि बिटिया के भरण पोषण के साथ उसके सुख दुख का पूरा ध्यान रखना होगा। जीवन चर्या की नौकरी व्यवसाय आदि कार्य को अपनाते हुए अपने जीवन के स्वर्णिम पल अवनि की झोली में खुशी खुशी डालने होंगे।" "आज पावन अग्नि को साक्षी मानकर आप दोनों वैवाहिक बँधन में बँध गए हैं। आज से आप दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। रिश्तों को पावन मजबूत बनाने के लिए आप दोनों को जिन्दगी में,एक दूसरे से कोई भी दुराव छिपाव नहीं रखना चाहिए।" बात ही बात में पंडित जी ने दूल्हे दुल्हन को सात फेरों के वचन आदि समझाकर शादी की रस्में पूरी करा दी। नियम से सारी रस्में निभाने के बाद जल्दी ही विदाई बेला भी आ पहुँची। आज उनकी लाडली बिटिया मायके का घर आँगन छोड़कर आज ससुराल की देहरी पर जा रही है। मन को लाख समझाने के बाद भी अवनि के पापा और मम्मी का जी हल्कान हुआ जा रहा था। बाबुल का नैहर छोड़ते हुए अवनि की आँखों से आँसुओं की गंगा यमुना बह रहीं थीं। सबसे गले मिलकर अवनि अँबर के साथ गाड़ी में बैठ गई और करीब एक घंटे बाद गाड़ी जाकर अँबर के घर के बाहर खड़ी हो गई। अँबर की मम्मी ने बहुरानी की आरती उतारी। चावल से भरे कलश को दाँयें पैर से आगे लुढ़का कर घर की लक्ष्मी अवनि का गृह प्रवेश हो गया। शादी के अवसर पर घर आये हुए रिश्तेदारों की गहमागहमी में दस पन्द्रह दिन कैसे बीत गए अवनि को पता ही नहीं चला। इन दिनों किसी खास रिश्तेदार परिचित के घर से खाने का बुलावा आया रहता जहाँ ये दोनों खुशियाँ बिखेरते हुए जाते और खा पीकर हँसी खुशी वापस आते थे। लेकिन इन पन्द्रह दिनों में अवनि ने महसूस किया कि हँसता मुस्कुराता अँबर उसके साथ मजाक मस्ती करने के मूड में रहता था। किन्तु जैसे ही अवनि अधिक करीब आने की कोशिश करती वो चिहुँक कर पीछे हट जाता । घबराहट और पसीने से लथपथ बिना कुछ कहे मुँह फेरकर सो जाता। अवनि का सारा मूड़ खराब हो जाता। शुरू में अवनि ने सोचा था कि शायद विवाह के समय में अधिक काम काज का जोर पड़ने से अँबर उसकी परवाह नहीं कर पाते हैं। उन्हें थकावट के कारण जल्दी नींद आ जाती है। लेकिन अब तो दो महीने बीत गए थे और इन पति-पत्नी के बीच में आपसी दूरियाँ जस की तस बनी हुई थी। खिले हुए गुलाब के फूल सी अवनि का चेहरा अब धीरे धीरे मुरझाने लगा। अँबर का मूड़ अधिकतर उखड़ा हुआ रहता। ऐसे हालात में हँसती मुस्कुराती अवनि का सौन्दर्य रस मुरझाने लगा । कुछ समय पश्चात अँबर की दीदी जब कुछ दिन के लिए घर पर रहने आई तो अवनि और उसकी दीदी में खुलकर सारी बातें खुलकर हुई। दोनों के बीच में परस्पर सहज सम्बन्ध स्थापित करने के लिए अवनि की ननद ने एक आइडिया प्लान किया । और उन दोनों को पाँच दिन के टूर पर बाहर घूमने भेज दिया। ना ना नुकुर,नुकुर करते हुए बहन की जिद और अवनि की खुशी के लिए अँबर को घूमने आना पड़ा। यहाँ इन दोनों को अब पूरे दिन साथ रहना था।अब दोनों के बीच कामकाज का भी कोई बहाना नहीं था। आखिर अँबर भी कब तक सच्चाई से आँखें चुरा सकता था। एक दिन संध्या समय होटल के हाल में दोनों डायनिंग हाल में बैठे थे। मद्धम नीली पीली लाल रोशनी के बीच होटल के मंच पर स्थानीय मशहूर सिंगर अपना जादूभरा गीत संगीत का कार्यक्रम पेश कर रहे थे। "जब कोई बात बिगड़ जाए, जब कोई मुश्किल पड़ जाये, तुम देना साथ मेरा हमनवां।" ये दोनों एक दूसरे की आंखों में आंखें डालकर लाइट वाली रेड वाइन सिप कर रहे थे। आज दोनों ने पहली बार मदिरा का स्वाद चखा था। हल्का हल्का सुरूर छाने पर वे दोनों अपने रूम में लौट आए। आज अवनि अँबर के मन की उलझी डोर को सुलझाने की कोशिश कर रही थी। इसलिए अँबर को बातों में उलझाकर कालिज समय की बातें कहने सुनने लगी। किसी प्रकार से अँबर के मन के भीतर छिपा दर्द, अनजान भय बाहर निकल आए। यही सोचकर, खान-पान, नयी मूवी,नये पुराने हिंदी फिल्मी गानें,पहनावे की पसंद नापसंद, से लेकर वे दोनों अपने कालिज समय की बातें शेयर करने लगे। अचानक लड़खड़ाती आवाज में अँबर के मुँह से निकला कि-- " अ..व...नि...तुम जानती हो ना कि मैं... नपुंसक... हूँ...।" "ऐसा मुझे मेरे साथ पढ़ने वाली लड़की नीरा ने कहा था।" "वो मुझसे प्यार करने का दम भरती थी । मैं भी उसपर खुलकर पैसे खर्च करता था। एक दिन मैंने उसे अपने सबसे अच्छे मित्र से मिलवाया तो उसने नीरा को धोखेबाज कहकर मुझे उससे सावधान रहने के लिए कहा था।" उस दिन उस दोस्त की कही गई बात मुझे बहुत बुरी लगी थी। किंतु अपने दोस्त की बात का झूठ सच जानने के लिए एक दिन मैं नीरा को होटल ताज में लेकर गया। तब सच में नीरा ने लाज शर्म की सारी दीवारें तोड़कर खुद को मेरे सामने पेश कर दिया।" "उसी दिन से प्यार को खेल समझने वाली नीरा का घिनौना सच देखकर मुझे प्यार के नाम से नफरत सी हो गई। तब वहाँ होटल के कमरे में मौका मिलने पर भी मैंने नीरा को छुआ तक नहीं।" " सामने व्यंजन भरी थाली सजी रखी हो, और भूखा इंसान खाने से इंकार कर दें तो इसमें बनाने वाले व्यक्ति को अपना बहुत अपमान लगता है। नीरा को भी बहुत बुरा लगा था। इसी बात को मुद्दा बनाकर उसने अपनी इस बेइज्जती का बदला मुझे खूब खरी खोटी सुनाकर निकाला। घर परिवार से दूर, होस्टल में रहने वाली आजाद ख्याल नीरा ने उस समय मुझे बहुत कुछ उल्टा सीधा बोला। रोज कपड़ों की तरह अपने बाय फ्रेंड बदलने वाली नीरा के व्यंग बाण, कटु आक्षेप से मेरा कलेजा बुरी तरह से छलनी हो गया।" इसलिए मैंने कालिज में अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ दी। और पिताजी के पास वापस अपने घर आकर मैंने पिताजी के व्यवसाय को सँभाल लिया। मम्मी की जिद के कारण यहाँ आने के कुछ दिन बाद ही मेरा तुमसे विवाह हो गया। अपनी बात कहते-कहते अँबर नशे की झोंक में अवनि के काँधें पर झूल गया। अब समझदार पढ़ी लिखी अवनि, अँबर के अपने से दूरी बना कर रहने और बेरूख़ी भरे व्यवहार का कारण समझ चुकी थी। सारी बातें सुनकर बहुत प्यार से अँबर के बालों को सहलाते हुए अवनि बोली कि-- "अँबर आप सोचो,यदि एक लड़की धोखेबाज थी, तो उसके जैसे ही संसार की सारी लड़कियाँ तो धोखेबाज नहीं हो जाती?" "और ना ही उसके ताना मारने से आप नपुंसक साबित हो जाते हैं।" "बल्कि यह बात तो आपके हृदय की संवेदनशील मनोवृत्ति को प्रकट करती है कि मौका मिलने पर भी आपने किसी लड़की के रूप सौन्दर्य जाल का गलत फायदा नहीं उठाया।" "वरन आपने रिश्तों की पावन मर्यादा का पालन किया। वो लड़की नीरा दोस्ती और प्यार के रिश्तों में सूक्ष्म लक्ष्मण रेखा की वर्जना समझने के काबिल ही नहीं थी।" इन सब बातों के लिए स्वयं को दोषी ठहराना बंद करो। और बेकार की बातों का बोझ दिमाग से उतार कर फेंक दो। और अब आराम से सोने की कोशिश करो। धीरे-धीरे अँबर का माथा सहलाते हुए प्यार मनुहार भरे अंदाज में कहकर अवनि ने कमरे की बत्ती बुझा दी । सारी बातों के सुलझे सिरे जोड़ कर अवनि एक निर्णय पर पहुँच गयी । और उसने शहर लौटकर सबसे पहले मनोवैज्ञानिक काउंसलर की मदद से अँबर के मन का वहम दूर करने का मन बना लिया। ****************
- घमंडी राजा
डॉ कृष्ण कांत श्रीवास्तव बहुत समय पहले की बात है। किसी राज्य में एक राजा राज करता था। वह बहुत ही घमंडी था। लोगों को कुछ भी नहीं समझता था। लोगों पर अत्याचार करता था और परेशान करता था। वह जबरदस्ती कर वसूलता था। एक दिन उस राजा ने सभी से कर वसूलने के लिए अपने सेनापति को भेजा। जब सेनापति अपने साथ कुछ सिपाहियों को लेकर कर वसूलने के लिए जा रहे थे। तो रास्ते में उन्हें एक आदमी मिला। सेनापति ने उस आदमी से कहा कि तुमने बहुत समय से अपना कर नहीं दिया है। सेनापति की बात सुनकर आदमी ने कहा कि मेरे पास अभी कर चुकाने लायक धन नहीं है। सेनापति उसे पकड़ कर अपने साथ ले गए और उसे राजा के सामने उपस्थित किया। सेनापति ने राजा से कहा कि यह व्यक्ति राज्य का निवासी है और कर देने से मना कर रहा है। इस पर क्रोधित होकर राजा ने कहा कि इसे अगले दिन बुलाना। मैं इसे सजा सुनाऊंगा। आदमी बहुत गिड़गिड़ाया और कहने लगा महाराज मुझे माफ कर दीजिए। मेरे पास इतना धन नहीं है। मैं आप का कर चुकाने में असमर्थ हूं। मैं तो अपने और अपने परिवार का पेट पालने भर का भी धन नहीं कमा पाता हूं। मैं राज्य का कर कैसे चुका पाऊंगा। तभी राज्य में एक साधु महाराज पधारे। उन्होंने देखा कि राजा अपने ही राज्य की जनता पर अत्याचार कर रहे हैं। साधु ने राजा से कहा कि आप ऐसा क्यों कर रहे हैं। साधु महाराज की बात सुनकर, राजा ने कहा कि अगर तुम भी ज्यादा सवाल जवाब करोगे तो मैं तुम्हें भी सजा सुना दूंगा। क्योंकि मैं इस देश का राजा हूं और मुझे अपनी प्रजा से कर वसूल करने का अधिकार है। मैं अत्यंत शक्तिशाली हूं और मैंने अपनी शक्ति के बल पर कई राज्य के राजाओं को पराजित कर उनके राज्य को अपने राज्य में मिला है। यह व्यक्ति हमारे राज्य में रहता है और हमारे राज्य की समस्त सुविधाओं का उपयोग करता है। इसलिए इसे कर तो देना ही होगा। इस पर साधू ने कहा कि अगर तुम सब कुछ जीत चुके हो तो मेरे एक सवाल का उतर दो। अगर तुमने सही-सही उत्तर दिया तो मैं समझ लूंगा कि तुम चक्रवर्ती सम्राट हो और तुम्हें अपने राज्य की जनता से कर वसूलने का अधिकार है। साधु ने राजा से कहा कि महाराज आप हमारे साथ चलें। मैं आपको एक ऐसे स्थान पर ले चलूंगा। जहां बहुत अधिक सोने, चांदी और हीरे जवाहरात एकत्रित हैं। आप अपनी आवश्यकता अनुसार जितना चाहे उतना सोना चांदी वहां से ला सकते हैं। राजा बहुत लालची था। वह उस स्थान पर जाने के लिए तैयार हो गया। राजा का लालच देखकर साधु ने एक शर्त रखी। कहा महाराज वहां पर आपको अकेले ही जाना होगा। आप अपने साथ अपने सैनिकों को नहीं ले जा सकते। राजा ने साधु की शर्त स्वीकार कर ली और साधु के साथ जंगल की ओर चल दिया। चलते-चलते शाम हो गई। राजा और साधु सघन जंगल के बीच पहुंच गए। अत्याधिक थकान के कारण राजा को भूख और प्यास लगने लगी। यहां घने जंगल में भूख और प्यास मिटाने की कोई सुविधा नहीं थी। घने जंगल के बीच राजा अपने राज्य को जाने का रास्ता भी भटक गया। राजा ने साधु से कहा, “मैं बहुत थक गया हूं और मुझे अत्यधिक भूख और प्यास सता रही है, मुझे पानी पिलवा दीजिए।” साधु ने राजा से कहा कि महाराज, अभी तो हम लोगों ने आधी दूरी भी तय नहीं की है। राजा बोले महाराज इस वक्त मुझे धन नहीं भोजन चाहिए। यदि मुझे भोजन ना मिला तो मैं यहीं पर अपना दम तोड़ दूंगा। महात्मा बोले ठीक है महाराज मैं आपके भोजन की व्यवस्था करता हूं। कुछ समय के बाद साधु राजा के सामने एक व्यक्ति को लेकर उपस्थित हुआ। उसके पास थोड़ा सा भोजन और पानी था। साधु ने उस व्यक्ति से कहा, “हे महानुभाव, यह सज्जन आपके राजा हैं और इस समय भूख और प्यास से व्याकुल हैं। आप अपने हिस्से का खाना और पानी राजा को दे दीजिए, महान कृपा होगी। व्यक्ति बोला कि यदि राजा अपनी सारी धन-संपत्ति मुझे देने का वादा करें तो मैं इस वक्त अपना भोजन और पानी इन्हें दे दूंगा। मरता क्या न करता राजा भूख और प्यास से बहुत अधिक व्याकुल था। राजा ने उसकी बात तुरंत मान ली और भोजन पानी ले लिया। दूसरे दिन महल में आकर साधु ने राजा को समझाया। साधु ने कहा, “देखो राजन जिस प्रकार कल तुम अपनी भूख और प्यास के बदले पूरा राज्य देने के लिए तैयार हो गए थे, उसी प्रकार आपके राज्य की गरीब जनता भी अपने बच्चों के खाना पानी के लिए जी तोड़ मेहनत करती है। ऐसे में यदि वह राज्य का कर ना दे पाए तो उसे दंडित नहीं करना चाहिए। राजा को बात समझ में आ गई। उसने साधु का अत्यधिक आदर सत्कार कर विदा किया। और अपने घमंड को त्याग कर राज्य की जनता के सुख के लिए कार्य करना प्रारंभ कर दिया। कहते हैं कि फलों से लदा पेड़ लचक जाता है। उसी प्रकार धन से संपन्न व्यक्ति को जरूरतमंद लोगों की अवश्य मदद करनी चाहिए। ***********
- मेरी कहानी
अनामिका सोचा न था जो लिखूंगी कभी वो मेरी ही कहानी होगी। याद आयेगी वो रह-रहकर जो-जो यादें पुरानी होंगी। रुक-रुक करके वो टीसेंगी बन आँख में पानी होंगी। काग़ज़ पर तो न उतरी होगी पर सब याद जुब़ानी होंगी। आत्मा मर चुकी होगी शायद तन में हरकतें बाक़ी होंगी। अभी जिंदा हूँ ये बताने को मुझे धड़कनें सुनानी होंगी। महलों में तो रही हूँ मगर गलतफ़हमी मिटानी होगी। किसी ख़्वाब ने कहा था कि एक दिन तुम रानी होगी। सोचा न था जो लिखूंगी कभी वो मेरी ही कहानी होगी। अगर कुछ बातें बतानी होंगी तो कुछ बातें छुपानी होंगी। *******
- वहम
सविता सिंह मीरा अब खुद में ही रम गयी बता तो दूं सारी बातें जता तो दूं सारी जज्बाते यशोधरा उर्मिला की भांति जागी हूं कितनी ही रातें। ध्येय था सिद्धार्थ लक्ष्मण का मेरा भी भाव समर्पण का उनका तो लक्ष्य हुआ पूरा पर आया ना पल अपने मिलन का। किसी और के होकर आए तुम मैं तुम में हो गई थी गुम अनुराग था मेरा मीरा सा इसलिए खुद को लिया है चुन। अब मैं खुद में ही रम गयी कभी मचली कभी थम गयी अब भाते मुझको यह दर्पण रही सही सारी वहम गयी। मैं अब खुद में ही रम गयी। *******
- आखिरी प्रणाम
सुरेश बाबू मिश्रा रमनदीप उस झाड़ी की तलाश कर रहा था जहां उसने बैग में अपना लैपटाप छुपा कर रखा था। रमनदीप को अच्छी तरह याद है कि उसने उस झाड़ी के पास बी का चिन्ह बनाया था। बी का मतलब भारत। वह उस चिन्ह को ढूढ़ रहा था। काफी देर तक तलाश करने के बाद आखिर उसे वह झाड़ी मिल ही गई। झाड़ी में छिपाए गए बैग में अपने लैपटाप को सुरक्षित देखकर उसके चेहरे पर एक अनोखी चमक आ गई थी। उत्सुकतावश उसने लैपटाप आन करके देखा। उसके द्वारा इकट्ठी की गई सारी गोपनीय सूचनाएं एवं डाटाज पूरी तरह से सुरक्षित थे। यह देखकर उसकी सारी थकान उड़न छू हो गई थी और उसका पूरा शरीर एक अनोखे रोमांच से भर गया था। उसने अपना लैपटाप जिस बैग में रखा था उसे उठाकर पीठ टांग लिया। रमनदीप कुछ देर सुस्ताने के लिए वहीं जमीन पर बैठ गया। बीते दिनों की घटनाएं चलचित्र की भांति उसकी आँखों के सामने घूमने लगीं। रमनदीप सिंह भारतीय सेना की इंटेलीजेंस कोर का जांबाज जासूस था। उसे एक गोपनीय मिशन पर पाकिस्तान भेजा गया था। वह कई दिनों से भेष बदलकर पाकिस्तान में रह रहा था और बड़े गोपनीय तरीके से अपने मिशन पर काम कर रहा था। उसे पाकिस्तान आए दो सप्ताह से अधिक हो गए थे। उसे पाकिस्तान में चल रहे आतंकवादी शिविर के बारे में सूचनाएं एकत्र करने के लिए भेजा गया था। वह अपने मिशन में काफी हद तक कामयाब रहा। आतंकवादी कैम्पों की काफी सूचनाएं एकत्र कर उसने अपने लैपटॉप में अपलोड कर ली थीं। वह एक सूफी फकीर की वेशभूषा में घूमा करता था, इसलिए किसी को उस पर कोई सन्देह नहीं हुआ था। परन्तु कल एक आतंकवादी शिविर का फोटो लेते हुए पाकिस्तानी पुलिस के एक जवान ने उसे देख लिया। उसे रमनदीप पर शक हो गया। तब से पाकिस्तानी पुलिस उसका पीछा कर रही थी। किसी तरह से वह पुलिस के जवानों को चकमा देकर पी.ओ.के. के इस पहाड़ी इलाके में आकर छुप गया था। यह तो अच्छा हुआ कि उसने कुछ दिन पहले अपना लैपटाप वाला बैग यहीं पहाड़ी पर एक झाड़ी में छुपाकर रख दिया था जो आज उसे सही सलामत मिल गया। पाकिस्तानी पुलिस अब भी उसे ढूंढ़ रही थी, इसलिए खतरा अभी टला नहीं था। रमनदीप पंजाब प्रान्त के होशियारपुर जिले के एक गांव का रहने वाला था। उसके पिता सेना के रिटायर्ड कर्नल थे। उन्होंने 1965 और 1971 के युद्ध में भाग लिया था और असाधारण शौर्य का प्रदर्शन किया था। रमनदीप ने देशभक्ति का ककहरा उन्हीं से सीखा था। उसकी माँ रमनदीप से बेहद प्रेम करती थी क्योंकि वह उनका इकलौता बेटा था। उसके पिता के पास काफी खेती भी थी और उनके परिवार की गिनती सम्पन्न परिवारों में होती थी। रमनदीप के तीन बहिनें थीं दो बड़ी और एक उससे छोटी। रमनदीप को ध्यान आया कि आज से लगभग एक महीने बाद उसकी छोटी बहिन रजवन्त कौर की शादी है। शादी में घर जाने के लिए उसने छुट्टी की एप्लीकेशन अपने आफीसर को इस मिशन पर आने से काफी पहले ही दे दी थी। तीन साल पहले रमनदीप की शादी हो चुकी थी। उसकी पत्नी सुरजीत कौर बेहद सुन्दर और शालीन थी। अपनी शादी के बाद इन तीन सालों में वह कुल मिलाकर बमुश्किल एक महीने ही घर पर अपनी पत्नी के साथ बिता पाया था, मगर सुरजीत कौर ने कभी कोई शिकायत नहीं की। उसने घर के कामकाज को बहुत अच्छी तरह से संभाल रखा था और वह सबका बहुत ख्याल रखती। रमनदीप सोचने लगा कि सेना के जासूस का काम कितना कठिन और चुनौतीपूर्ण है। उसे हर समय प्राण हथेली पर रखकर काम करना पड़ता है। दुश्मन की कब उस पर नजर पड़ जाए कुछ पता नहीं। उसका हर मिशन खतरों से भरा होता है। विडम्बना तो देखो उसके घर वालों या देश के लोगों को उसके जोखिमपूर्ण कार्यों की कोई जानकारी नहीं हो पाती है। मिशन अत्यन्त गोपनीय होने के कारण उसके कामों और उपलब्धियों के बारे में मीडिया में भी न तो कुछ छपता है और न चैनलों पर कुछ दिखाया जाता है। एक जासूस तो यही सोचकर हर समय खुश रहता है कि उसका पूरा जीवन भारत माता की सेवा में समर्पित है। रमनदीप ने सोचा कि इस मिशन को पूरा करने के बाद वह अपनी छोटी बहिन की शादी में गांव जाएगा और कम से कम एक माह गांव में ही अपनी पत्नी और परिवार के साथ बिताएगा। वह इन्हीं ख्यालों में खोया हुआ था कि उसे एक फर्लांग दूर की झाड़ियों में कुछ हलचल सी दिखाई दी। वह चैकन्ना हो गया। उसने अपने मोबाइल में उस स्थान की लोकेशन देखी। भारतीय सीमा यहां से केवल बीस किलोमीटर दूर रह गई थी। उसने सूफी फकीर की वेशभूषा उतार दी और बैग में से निकालकर इण्डियन मिलिट्री इंटेलीजेन्स कोर की डेस पहन ली। उसने अपने बैग को ठीक तरह से पीठ पर टांगा और वहां से निकलने के बारे में सोचने लगा। जिधर झाड़ियों में हलचल दिखाई दी थी उसके विपरीत दिशा में वह कोहनियों के बल रेंगता हुआ आगे बढ़ने लगा। उसने ऐसा करने में बहुत कठिनाई हो रही थी मगर वह खड़े होने का खतरा मोल लेना नहीं चाहता था उसके लिए वह लैपटाप और उसमें एकत्र डाटा सुरक्षित अपने हेड क्र्वाटर पहुंचाना था। वह करीब एक घन्टे तक इसी प्रकार रेंगता रहा। अब वह उस स्थान से लगभग एक किलोमीटर दूर निकल आया था। उसकी श्वांस फूल रही थी इसलिए वह कुछ देर तक वहीं बैठा रहा फिर उसने खड़े होकर चारों तरफ देखा। चारों तरफ दूर-दूर तक सन्नाटा था। वह धीरे-धीरे भारतीय सीमा की ओर बढ़ने लगा। वह पूरी तरह से सतर्क था और सावधानी पूर्वक आगे की ओर बढ़ रहा था। अभी वह तीन-चार किलोमीटर ही दूर पहुंचा होगा कि उसे तीन-चार पाकिस्तानी सैनिक टहलते हुए दिखाई दिए। शायद वहां कहीं आस-पास पाकिस्तानी चेक पोस्ट रही होगी। किसी तरह से उन सैनिकों की नजर से छुपता-छिपाता रमनदीप वहां से निकलने में सफल रहा। अब वह तेज कदमों से चलने लगा था। वह किसी तरह पाकिस्तानी सीमा को पार कर भारत की सीमा में प्रवेश कर जाना चाहता था। उसका मिशन पूरा हो चुका था और अब उसे अपने हेड क्वार्टर पहुंचकर यह लैपटॉप अधिकारियों को सौंपना था। शाम का धुंधलका छाने लगा था। रमनदीप ने मोबाइल में एक बार फिर लोकेशन देखी। भारतीय सीमा अब केवल चार-पांच किमी दूर रह गयी थी। रमनदीप तेजी से भारतीय सीमा की ओर बढ़ने लगा, तभी उसे चार-पांच पाकिस्तानी सैनिक बिल्कुल सामने से आते दिखाई दिये। उनकी नजर शायद रमनदीप पर पड़ चुकी थी वे सीधे उसी की ओर आ रहे थे। अब बचने का कोई रास्ता नहीं था। रमनदीप ने कुछ क्षण सोचा फिर उसने बैग से एक छोटा हैण्ड ग्रेनेड निकाल कर उन सैनिकों को टारगेट बनाकर उनकी ओर फेंका। बहुत तेज धमाका हुआ और क्षण भर में ही पाकिस्तानी सैनिक जमीन पर गिरकर छटपटाने लगे। रमनदीप पूरी ताकत से भारतीय सेना की ओर भागा। वह काफी दूर तक दौड़ता चला गया। अब उसे भारतीय सीमा साफ दिखाई देने लगी इसलिए उसका मन उत्साह से भर गया तभी अचानक पाकिस्तानी सीमावर्ती पोस्ट से रमनदीप को टारगेट करके फायरिंग शुरू हो गई। रमनदीप भारतीय सेना का एक प्रशिक्षित कमांडो था। वह मार्शल आर्ट में काफी दक्ष था। गोलियों की बौछार में से बचकर कैसे निकलना है इस कला को वह बखूबी जानता था। इसलिए शत्रु की गोलियों से बचता हुआ वह लगातार भारतीय सीमा की ओर बढ़ रहा था। आखिरकार वह भारतीय सीमा पर पहुंचने में सफल हो गया था। काफी सावधानी बरतने के बावजूद शत्रु पक्ष की कई गोलियों ले उसके शरीर को छलनी कर दिया जिनमें से लगातार रक्त बह रहा था। असहनीय पीड़ा के बावजूद वह भारतीय सीमा में घुसने के लिए पहाड़ियों पर घुटने एवं कुहनियों के बल रेंगकर आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा था। पाकिस्तानी पोस्ट से अब फायरिंग बन्द हो गई थी। उधर भारतीय सीमा में स्थित सेना की द्रास सेक्टर पोस्ट के जांबाज सैनिक सीमा पर गश्त कर रहे थे। रात का अंधेरा चारों ओर फैल गया था। हड्डियों तक को तपा देने वाली सर्द हवाएं चल रही थीं मगर इससे सैनिकों के जोश में कोई कमी नहीं आई थी। वे पूरी मुस्तैदी के साथ अपनी ड्यूटी को अंजाम दे रहे थे। अचानक उनकी नजर रमनदीप पर पड़ी जो घुटनों और कोहनी के बल रेंगकर भारतीय सीमा में घुसने का प्रयास कर रहा था। किसी आने वाले खतरे को भांपकर सेना के जवान सतर्क हो गए थे। उन्होंने अपनी राइफलें लोड कर लीं और पूरी सावधानी से उस दिशा की ओर बढ़ने लगे जिधर से वह आदमी हमारे देश की सीमा में घुसने का प्रयास कर रहा था। सैनिकों ने उसे चारों ओर से घेर लिया। मगर वे यह देखकर हैरान रह गए कि उसके पूरे शरीर में गोलियों के घाव थे और उनसे खून वह रहा था। उसकी पीठ पर एक बैग टंगा हुआ था। वह अब भी आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा था। अपने चारों ओर भारतीय सेना के जवानों को देखकर रमनदीप के चेहरे पर खुशी की एक अनोखी चमक आ गई थी। उसके शरीर से बहुत अधिक खून वह चुका था और उसकी श्वांस रुक-रुक कर चल रही थी। उसने भारत की मिट्टी को हाथ में लेकर अपने माथे से लगाया। फिर उसने सिर झुकाकर धरती को चूमा और भारत माता की जय के उद्घोष के साथ अपने जीवन की अन्तिम श्वांस ली। भारतीय सेना के जवान उसे ऐसा करते देख हैरान से खड़े थे। उन्होंने उसकी तलाशी ली। उसकी जेब से उसका आईडेन्टिटी कार्ड मिला जिससे पता चला कि वह इण्डियन मिलिट्री इन्टेलीजेन्स कोर का जासूस रमनदीप सिंह था। जिसे एक गोपनीय मिशन पर पाकिस्तान भेजा गया था। उसके बाएं हाथ की मुट्ठी में एक मुड़ा-तुड़ कागज का टुकड़ा था। एक जवान ने उसकी मुट्ठी खोलकर वह कागज का टुकड़ा निकाला। उसमें लिखा था-मैंने अपना मिशन सफलतापूर्वक पूरा किया। मेरे बैग में जो लैपटाप है उसमें पाकिस्तान में चल रहे आतंकवादी टेनिंग कैम्पों के फोटो हैं। प्लीज इसे हेडक्वार्टर पहुंचा देना। लौटते समय पाकिस्तानी सैनिकों ने अंधाधुंध फायरिंग कर मुझे बुरी तरह घायल कर दिया। मगर मुझे इस बात की बेहद खुशी है कि मैंने भारत माता की गोद में अपने जीवन की अन्तिम श्वास ली। भारत माता को उसके पुत्र का आखिरी प्रणाम। तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहे ना रहें। जय हिन्द। भारत माता की जय। रमनदीप का पत्र पढ़कर सेना के जवानों की आँखों की कोरें गीली हो गईं थीं। उन्होंने सैल्यूट देकर भारत माता के इस सच्चे सपूत को अपनी श्रद्धांजलि दी। *********
- कफ़न
प्रेमचंद झोंपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए थे और अंदर बेटे की जवान बीबी बुधिया प्रसव-वेदना में पछाड़ खा रही थी। रह-रहकर उसके मुँह से ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज़ निकलती थी, कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। जाड़ों की रात थी, प्रकृति सन्नाटे में डूबी हुई, सारा गाँव अंधकार में लय हो गया था। घीसू ने कहा—“मालूम होता है, बचेगी नहीं। सारा दिन दौड़ते हो गया, जा देख तो आ।” माधव चिढ़कर बोला—“मरना ही है तो जल्दी मर क्यों नहीं जाती? देखकर क्या करूँ?” “तू बड़ा बेदर्द है बे! साल-भर जिसके साथ सुख-चैन से रहा, उसी के साथ इतनी बेवफ़ाई!” “तो मुझसे तो उसका तड़पना और हाथ-पाँव पटकना नहीं देखा जाता।” चमारों का कुनबा था और सारे गाँव में बदनाम। घीसू एक दिन काम करता तो तीन दिन आराम करता। माधव इतना कामचोर था कि आध घंटे काम करता तो घंटे भर चिलम पीता। इसलिए उन्हें कहीं मज़दूरी नहीं मिलती थी। घर में मुठ्ठी-भर भी अनाज मौजूद हो, तो उनके लिए काम करने की क़सम थी। जब दो-चार फ़ाक़े हो जाते तो घीसू पेड़ पर चढ़कर लकड़ियाँ तोड़ लाता और माधव बाज़ार से बेच लाता और जब तक वह पैसे रहते, दोनों इधर-उधर मारे-मारे फिरते। गाँव में काम की कमी न थी। किसानों का गाँव था, मेहनती आदमी के लिए पचास काम थे। मगर इन दोनों को उसी वक़्त बुलाते, जब दो आदमियों से एक का काम पाकर भी संतोष कर लेने के सिवा और कोई चारा न होता। अगर दोनों साधु होते, तो उन्हें संतोष और धैर्य के लिए, संयम और नियम की बिलकुल ज़रूरत न होती। यह तो इनकी प्रकृति थी। विचित्र जीवन था इनका! घर में मिट्टी के दो-चार बर्तन के सिवा कोई संपत्ति नहीं। फटे चीथड़ों से अपनी नग्नता को ढाँके हुए जिए जाते थे। संसार की चिंताओं से मुक्त! कर्ज़ से लदे हुए। गालियाँ भी खाते, मार भी खाते, मगर कोई ग़म नहीं। दीन इतने कि वसूली की बिलकुल आशा न रहने पर भी लोग इन्हें कुछ-न-कुछ कर्ज़ दे देते थे। मटर, आलू की फ़सल में दूसरों के खेतों से मटर या आलू उखाड़ लाते और भून-भानकर खा लेते या दस-पाँच ऊख उखाड़ लाते और रात को चूसते। घीसू ने इसी आकाश-वृत्ति से साठ साल की उम्र काट दी और माधव भी सपूत बेटे की तरह बाप ही के पद-चिह्नों पर चल रहा था, बल्कि उसका नाम और भी उजागर कर रहा था। इस वक़्त भी दोनों अलाव के सामने बैठकर आलू भून रहे थे, जो कि किसी खेत से खोद लाए थे। घीसू की स्त्री का तो बहुत दिन हुए, देहांत हो गया था। माधव का ब्याह पिछले साल हुआ था। जब से यह औरत आई थी, उसने इस ख़ानदान में व्यवस्था की नींव डाली थी और इन दोनों बे-ग़ैरतों का दोज़ख़ भरती रहती थी। जब से वह आई, यह दोनों और भी आलसी और आरामतलब हो गए थे। बल्कि कुछ अकड़ने भी लगे थे। कोई कार्य करने को बुलाता, तो निर्ब्याज भाव से दुगुनी मज़दूरी माँगते। वही औरत आज प्रसव-वेदना से मर रही थी और यह दोनों इसी इंतज़ार में थे कि वह मर जाए, तो आराम से सोएँ। घीसू ने आलू निकालकर छीलते हुए कहा—“जाकर देख तो, क्या दशा है उसकी? चुड़ैल का फिसाद होगा, और क्या? यहाँ तो ओझा भी एक रुपया माँगता है!” माधव को भय था, कि वह कोठरी में गया, तो घीसू आलुओं का बड़ा भाग साफ़ कर देगा। बोला-“मुझे वहाँ जाते डर लगता है।” “डर किस बात का है, मैं तो यहाँ हूँ ही।” “तो तुम्हीं जाकर देखो न?” “मेरी औरत जब मरी थी, तो मैं तीन दिन तक उसके पास से हिला तक नहीं था! और फिर मुझसे लजाएगी कि नहीं? जिसका कभी मुँह नहीं देखा, आज उसका उघड़ा हुआ बदन देखूँ! उसे तन की सुध भी तो न होगी? मुझे देख लेगी तो खुलकर हाथ-पाँव भी न पटक सकेगी!” “मैं सोचता हूँ कोई बाल-बच्चा हो गया तो क्या होगा? सोंठ, गुड़, तेल, कुछ भी तो नहीं है घर में!” “सब कुछ आ जाएगा। भगवान दें तो! जो लोग अभी एक पैसा नहीं दे रहे हैं, वे ही कल बुलाकर रुपए देंगे। मेरे नौ लड़के हुए, घर में कभी कुछ न था, मगर भगवान ने किसी-न-किसी तरह बेड़ा पार ही लगाया।” जिस समाज में रात-दिन मेहनत करने वालों की हालत उनकी हालत से कुछ बहुत अच्छी न थी, और किसानों के मुक़ाबले में वे लोग, जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठाना जानते थे, कहीं ज़ियादा संपन्न थे, वहाँ इस तरह की मनोवृत्ति का पैदा हो जाना कोई अचरज की बात न थी। हम तो कहेंगे, घीसू किसानों से कहीं ज़ियादा विचारवान था और किसानों के विचार-शून्य समूह में शामिल होने के बदले बैठकबाज़ों की कुत्सित मंडली में जा मिला था। हाँ, उसमें यह शक्ति न थी, कि बैठकबाज़ों के नियम और नीति का पालन करता। इसलिए जहाँ उसकी मंडली के और लोग गाँव के सरगना और मुखिया बने हुए थे, उस पर सारा गाँव उँगली उठाता था। फिर भी उसे यह तसकीन तो थी ही कि अगर वह फटेहाल है तो कम-से-कम उसे किसानों की-सी जी-तोड़ मेहनत तो नहीं करनी पड़ती, और उसकी सरलता और निरीहता से दूसरे लोग बेजा फ़ायदा तो नहीं उठाते! दोनों आलू निकाल-निकालकर जलते-जलते खाने लगे। कल से कुछ नहीं खाया था। इतना सब्र न था कि ठंडा हो जाने दें। कई बार दोनों की ज़बानें जल गईं। छिल जाने पर आलू का बाहरी हिस्सा ज़बान, हलक और तालू को जला देता था और उस अंगारे को मुँह में रखने से ज़ियादा ख़ैरियत इसी में थी कि वह अंदर पहुँच जाए। वहाँ उसे ठंडा करने के लिए काफ़ी सामान थे। इसलिए दोनों जल्द-जल्द निगल जाते। हालाँकि इस कोशिश में उनकी आँखों से आँसू निकल आते। घीसू को उस वक़्त ठाकुर की बरात याद आई, जिसमें बीस साल पहले वह गया था। उस दावत में उसे जो तृप्ति मिली थी, वह उसके जीवन में एक याद रखने लायक़ बात थी, और आज भी उसकी याद ताज़ी थी, बोला-“वह भोज नहीं भूलता। तब से फिर उस तरह का खाना और भरपेट नहीं मिला। लड़की वालों ने सबको भर पेट पूरियाँ खिलाई थीं, सबको! छोटे-बड़े सबने पूरियाँ खाईं और असली घी की! चटनी, रायता, तीन तरह के सूखे साग, एक रसेदार तरकारी, दही, चटनी, मिठाई, अब क्या बताऊँ कि उस भोज में क्या स्वाद मिला। कोई रोक-टोक नहीं थी, जो चीज़ चाहो, माँगो, जितना चाहो खाओ। लोगों ने ऐसा खाया, ऐसा खाया, कि किसी से पानी न पिया गया। मगर परोसने वाले हैं कि पत्तल में गर्म-गर्म, गोल-गोल सुवासित कचौरियाँ डाल देते हैं। मना करते हैं कि नहीं चाहिए, पत्तल पर हाथ रोके हुए हैं, मगर वह हैं कि दिए जाते हैं। और जब सबने मुँह धो लिया, तो पान-इलायची भी मिली। मगर मुझे पान लेने की कहाँ सुध थी? खड़ा हुआ न जाता था। चटपट जाकर अपने कंबल पर लेट गया। ऐसा दिल-दरियाव था वह ठाकुर! माधव ने इन पदार्थों का मन-ही-मन मज़ा लेते हुए कहा—“अब हमें कोई ऐसा भोज नहीं खिलाता।” “अब कोई क्या खिलाएगा? वह ज़माना दूसरा था। अब तो सबको किफ़ायत सूझती है। शादी-ब्याह में मत ख़र्च करो, क्रिया-कर्म में मत ख़र्च करो। पूछो, ग़रीबों का माल बटोर-बटोरकर कहाँ रखोगे? बटोरने में तो कमी नहीं है। हाँ, ख़र्च में किफ़ायत सूझती है!” “तुमने एक बीस पूरियाँ खाई होंगी?” “बीस से ज़ियादा खाई थीं!” “मैं पचास खा जाता!” “पचास से कम मैंने न खाई होंगी। अच्छा पका था। तू तो मेरा आधा भी नहीं है।”आलू खाकर दोनों ने पानी पिया और वहीं अलाव के सामने अपनी धोतियाँ ओढ़कर पाँव पेट में डाले सो रहे। जैसे दो बड़े-बड़े अजगर गेंडुलिया मारे पड़े हों। और बुधिया अभी तक कराह रही थी। (2) सवेरे माधव ने कोठरी में जाकर देखा, तो उसकी स्त्री ठंडी हो गई थी। उसके मुँह पर मक्खियाँ भिनक रही थीं। पथराई हुई आँखें ऊपर टँगी हुई थीं। सारी देह धूल से लथपथ हो रही थी। उसके पेट में बच्चा मर गया था। माधव भागा हुआ घीसू के पास आया। फिर दोनों ज़ोर-ज़ोर से हाय-हाय करने और छाती पीटने लगे। पड़ोस वालों ने यह रोना-धोना सुना, तो दौड़े हुए आए और पुरानी मर्यादा के अनुसार इन अभागों को समझाने लगे। मगर ज़ियादा रोने-पीटने का अवसर न था। कफ़न की और लकड़ी की फ़िक्र करनी थी। घर में तो पैसा इस तरह ग़ायब था, जैसे चील के घोंसले में माँस? बाप-बेटे रोते हुए गाँव के ज़मींदार के पास गए। वह इन दोनों की सूरत से नफ़रत करते थे। कई बार इन्हें अपने हाथों से पीट चुके थे। चोरी करने के लिए, वादे पर काम पर न आने के लिए। पूछा—“क्या है बे घिसुआ, रोता क्यों है? अब तो तू कहीं दिखलाई भी नहीं देता! मालूम होता है, इस गाँव में रहना नहीं चाहता।” घीसू ने ज़मीन पर सिर रखकर आँखों में आँसू भरे हुए कहा—“सरकार! बड़ी विपत्ति में हूँ। माधव की घरवाली रात को गुज़र गई। रात-भर तड़पती रही सरकार! हम दोनों उसके सिरहाने बैठे रहे। दवा-दारू जो कुछ हो सका, सब कुछ किया, मुदा वह हमें दग़ा दे गई। अब कोई एक रोटी देने वाला भी न रहा मालिक! तबाह हो गए। घर उजड़ गया। आपका ग़ुलाम हूँ, अब आपके सिवा कौन उसकी मिट्टी पार लगाएगा। हमारे हाथ में तो जो कुछ था, वह सब तो दवा-दारू में उठ गया। सरकार ही की दया होगी, तो उसकी मिट्टी उठेगी। आपके सिवा किसके द्वार पर जाऊँ।” ज़मींदार साहब दयालु थे। मगर घीसू पर दया करना काले कंबल पर रंग चढ़ाना था। जी में तो आया, कह दें, चल, दूर हो यहाँ से। यूँ तो बुलाने से भी नहीं आता, आज जब ग़रज़ पड़ी तो आकर ख़ुशामद कर रहा है। हरामख़ोर कहीं का, बदमाश! लेकिन यह क्रोध या दंड देने का अवसर न था। जी में कुढ़ते हुए दो रुपए निकालकर फेंक दिए। मगर सांत्वना का एक शब्द भी मुँह से न निकला। उसकी तरफ़ ताका तक नहीं। जैसे सिर का बोझ उतारा हो। जब ज़मींदार साहब ने दो रुपए दिए, तो गाँव के बनिए-महाजनों को इनकार का साहस कैसे होता? घीसू ज़मींदार के नाम का ढिंढोरा भी पीटना ख़ूब जानता था। किसी ने दो आने दिए, किसी ने चारे आने। एक घंटे में घीसू के पास पाँच रुपए की अच्छी रक़म जमा हो गई। कहीं से अनाज मिल गया, कहीं से लकड़ी। और दोपहर को घीसू और माधव बाज़ार से कफ़न लाने चले। इधर लोग बाँस-वाँस काटने लगे। गाँव की नर्म दिल स्त्रियाँ आ-आकर लाश देखती थीं और उसकी बेकसी पर दो बूँद आँसू गिराकर चली जाती थीं। (3) बाज़ार में पहुँचकर घीसू बोला-“लकड़ी तो उसे जलाने-भर को मिल गई है, क्यों माधव!” माधव बोला—“हाँ, लकड़ी तो बहुत है, अब कफ़न चाहिए।” “तो चलो, कोई हलक़ा-सा कफ़न ले लें।” “हाँ, और क्या! लाश उठते-उठते रात हो जाएगी। रात को कफ़न कौन देखता है?” “कैसा बुरा रिवाज है कि जिसे जीते जी तन ढाँकने को चीथड़ा भी न मिले, उसे मरने पर नया कफ़न चाहिए।” “कफ़न लाश के साथ जल ही तो जाता है।” “और क्या रखा रहता है? यही पाँच रुपए पहले मिलते, तो कुछ दवा-दारू कर लेते।” दोनों एक-दूसरे के मन की बात ताड़ रहे थे। बाज़ार में इधर-उधर घूमते रहे। कभी इस बाज़ार की दूकान पर गए, कभी उसकी दूकान पर! तरह-तरह के कपड़े, रेशमी और सूती देखे, मगर कुछ जँचा नहीं। यहाँ तक कि शाम हो गई। तब दोनों न जाने किस दैवी प्रेरणा से एक मधुशाला के सामने जा पहुँचे। और जैसे किसी पूर्व निश्चित व्यवस्था से अंदर चले गए। वहाँ ज़रा देर तक दोनों असमंजस में खड़े रहे। फिर घीसू ने गद्दी के सामने जाकर कहा—“साहूजी, एक बोतल हमें भी देना।” उसके बाद कुछ चिखौना आया, तली हुई मछली आईं और दोनों बरामदे में बैठकर शांतिपूर्वक पीने लगे। कई कुज्जियाँ ताबड़तोड़ पीने के बाद दोनों सरूर में आ गए। घीसू बोला—“कफ़न लगाने से क्या मिलता? आख़िर जल ही तो जाता। कुछ बहू के साथ तो न जाता।” माधव आसमान की तरफ़ देखकर बोला, मानों देवताओं को अपनी निष्पापता का साक्षी बना रहा हो-“दुनिया का दस्तूर है, नहीं लोग बामनों को हज़ारों रुपए क्यों दे देते हैं? कौन देखता है, परलोक में मिलता है या नहीं!” “बड़े आदमियों के पास धन है, फ़ूँके। हमारे पास फूँकने को क्या है?” “लेकिन लोगों को जवाब क्या दोगे? लोग पूछेंगे नहीं, कफ़न कहाँ है?” घीसू हँसा-“अबे, कह देंगे कि रुपए कमर से खिसक गए। बहुत ढूँढ़ा, मिले नहीं। लोगों को विश्वास न आएगा, लेकिन फिर वही रुपए देंगे।” माधव भी हँसा, इस अनपेक्षित सौभाग्य पर बोला—“बड़ी अच्छी थी बेचारी! मरी तो ख़ूब खिला-पिलाकर!” आधी बोतल से ज़ियादा उड़ गई। घीसू ने दो सेर पूरियाँ मँगाई। चटनी, अचार, कलेजियाँ। शराबख़ाने के सामने ही दूकान थी। माधव लपककर दो पत्तलों में सारे सामान ले आया। पूरा डेढ़ रुपया ख़र्च हो गया। सिर्फ़ थोड़े से पैसे बच रहे। दोनों इस वक़्त इस शान में बैठे पूरियाँ खा रहे थे जैसे जंगल में कोई शेर अपना शिकार उड़ा रहा हो। न जवाबदेही का ख़ौफ़ था, न बदनामी की फ़िक्र। इन सब भावनाओं को उन्होंने बहुत पहले ही जीत लिया था। घीसू दार्शनिक भाव से बोला—“हमारी आत्मा प्रसन्न हो रही है तो क्या उसे पुन्न न होगा?” माधव ने श्रद्धा से सिर झुकाकर तसदीक़ की— ज़रूर से ज़रूर होगा। भगवान, तुम अंतर्यामी हो। उसे बैकुंठ ले जाना। हम दोनों हृदय से आशीर्वाद दे रहे हैं। आज जो भोजन मिला वह कभी उम्र-भर न मिला था।” एक क्षण के बाद माधव के मन में एक शंका जागी। बोला—“क्यों दादा, हम लोग भी एक-न-एक दिन वहाँ जाएँगे ही?” घीसू ने इस भोले-भाले सवाल का कुछ उत्तर न दिया। वह परलोक की बातें सोचकर इस आनंद में बाधा न डालना चाहता था। “जो वहाँ हम लोगों से पूछे कि तुमने हमें कफ़न क्यों नहीं दिया तो क्या कहोगे?” “कहेंगे तुम्हारा सिर!” “पूछेगी तो ज़रूर!” “तू कैसे जानता है कि उसे कफ़न न मिलेगा? तू मुझे ऐसा गधा समझता है? साठ साल क्या दुनिया में घास खोदता रहा हूँ? उसको कफ़न मिलेगा और बहुत अच्छा मिलेगा!” माधव को विश्वास न आया। बोला—“कौन देगा? रुपए तो तुमने चट कर दिए। वह तो मुझसे पूछेगी। उसकी माँग में तो सेंदुर मैंने डाला था।” “कौन देगा, बताते क्यों नहीं?” “वही लोग देंगे, जिन्होंने अबकी दिया। हाँ, अबकी रुपए हमारे हाथ न आएँगे।” ज्यों-ज्यों अँधेरा बढ़ता था और सितारों की चमक तेज़ होती थी, मधुशाला की रौनक भी बढ़ती जाती थी। कोई गाता था, कोई डींग मारता था, कोई अपने संगी के गले लिपटा जाता था। कोई अपने दोस्त के मुँह में कुल्हड़ लगाए देता था। वहाँ के वातावरण में सुरूर था, हवा में नशा। कितने तो यहाँ आकर एक चुल्लू में मस्त हो जाते थे। शराब से ज़ियादा यहाँ की हवा उन पर नशा करती थी। जीवन की बाधाएँ यहाँ खींच लाती थीं और कुछ देर के लिए यह भूल जाते थे कि वे जीते हैं या मरते हैं। या न जीते हैं, न मरते हैं। और यह दोनों बाप-बेटे अब भी मज़े ले-लेकर चुसकियाँ ले रहे थे। सबकी निगाहें इनकी ओर जमी हुई थीं। दोनों कितने भाग्य के बली हैं! पूरी बोतल बीच में है। भरपेट खाकर माधव ने बची हुई पूरियों का पत्तल उठाकर एक भिखारी को दे दिया, जो खड़ा इनकी ओर भूखी आँखों से देख रहा था। और देने के गौरव, आनंद और उल्लास का अपने जीवन में पहली बार अनुभव किया। घीसू ने कहा—“ले जा, ख़ूब खा और आशीर्वाद दे! जिसकी कमाई है, वह तो मर गई। मगर तेरा आशीर्वाद उसे ज़रूर पहुँचेगा। रोएँ-रोएँ से आशीर्वाद दो, बड़ी गाढ़ी कमाई के पैसे हैं!” माधव ने फिर आसमान की तरफ़ देखकर कहा- “वह बैकुंठ में जाएगी दादा, बैकुंठ की रानी बनेगी।” घीसू खड़ा हो गया और जैसे उल्लास की लहरों में तैरता हुआ बोला—“हाँ, बेटा बैकुंठ में जाएगी। किसी को सताया नहीं, किसी को दबाया नहीं। मरते-मरते हमारी ज़िंदगी की सबसे बड़ी लालसा पूरी कर गई। वह न बैकुंठ जाएगी तो क्या ये मोटे-मोटे लोग जाएँगे, जो ग़रीबों को दोनों हाथों से लूटते हैं, और अपने पाप को धोने के लिए गंगा में नहाते हैं और मंदिरों में जल चढ़ाते हैं? श्रद्धालुता का यह रंग तुरंत ही बदल गया। अस्थिरता नशे की ख़ासियत है। दु:ख और निराशा का दौरा हुआ। माधव बोला- “मगर दादा, बेचारी ने ज़िंदगी में बड़ा दुख भोगा। कितना दुख झेलकर मरी!” वह आँखों पर हाथ रखकर रोने लगा। चीखें मार-मारकर। घीसू ने समझाया—“क्यों रोता है बेटा, ख़ुश हो कि वह माया-जाल से मुक्त हो गई, जंजाल से छूट गई। बड़ी भाग्यवान थी, जो इतनी जल्द माया-मोह के बंधन तोड़ दिए। और दोनों खड़े होकर गाने लगे— “ठगिनी क्यों नैना झमकावे! ठगिनी!” पियक्कड़ों की आँखें इनकी ओर लगी हुई थीं और यह दोनों अपने दिल में मस्त गाए जाते थे। फिर दोनों नाचने लगे। उछले भी, कूदे भी। गिरे भी, मटके भी। भाव भी बताए, अभिनय भी किए। और आख़िर नशे में मदमस्त होकर वहीं गिर पड़े। ********
- क्रोध
डॉ कृष्ण कांत श्रीवास्तव एक संत भिक्षा में मिले अन्न से अपना जीवत चला रहे थे। वे रोज अलग-अलग गांवों में जाकर भिक्षा मांगते थे। एक दिन वे गांव के बड़े सेठ के यहां भिक्षा मांगने पहुंचे। सेठ ने संत को थोड़ा अनाज दिया और बोला कि गुरुजी मैं एक प्रश्न पूछना चाहता हूं। संत ने सेठ से अनाज लिया और कहा कि ठीक है पूछो। सेठ ने कहा कि मैं ये जानना चाहता हूं कि लोग लड़ाई-झगड़ा क्यों करते हैं? संत कुछ देर चुप रहे और फिर बोले कि ने मैं यहां भिक्षा लेने आया हूं, तुम्हारे मूर्खतापूर्ण सवालों के जवाब देने नहीं आया। ये बात सुनते ही सेठ एकदम क्रोधित हो गया। उसने खुद से नियंत्रण खो दिया और बोला कि तू कैसा संत है, मैंने दान दिया और तू मुझे ऐसा बोल रहा है। सेठ ने गुस्से में संत को खूब बातें सुनाई। संत चुपचाप सुन रहे थे। उन्होंने एक भी बार पलटकर जवाब नहीं दिया। कुछ देर बाद सेठ का गुस्सा शांत हो गया, तब संत ने उससे कहा कि भाई जैसे ही मैंने तुम्हें कुछ बुरी बातें बोलीं, तुम्हें गुस्सा आ गया। गुस्से में तुम मुझ पर चिल्लाने लगे। अगर इसी समय पर मैं भी क्रोधित हो जाता तो हमारे बीच बड़ा झगड़ा हो जाता। क्रोध ही हर झगड़े का मूल कारण है और शांति हर विवाद को खत्म कर सकती है। अगर हम क्रोध ही नहीं करेंगे तो कभी भी वाद-विवाद नहीं होगा। जीवन में सुख-शांति चाहते हैं तो क्रोध को नियंत्रित करना चाहिए। क्रोध को काबू करने के लिए रोज ध्यान करें। भगवान के मंत्रों का जाप करें। सीख - अगर कोई गुस्सा कर भी रहा है तो हमें उसका जवाब शांति से देना चाहिए। जैसे ही हमने शांति को छोड़ा और क्रोध किया तो छोटी सी बात भी बड़ा नुकसान कर सकती है। *************
- My Dad
Ahana Gupta When life is not smooth, Who makes us switch our mood? When all leave our hands, Who with us always stands? Whether time is good or bad, Who's always there is dad. He works all day even when tired, To give us all that we desired. His clothes and shoes are never old, He goes where our happiness is sold. In stormy times he is always bold, Our hand is what he always holds. He never has fears and always hides tears, Hot or cold for us he bears. He cares for us but never shows, Love is what he always owes. When we are sad, he always knows, When we were down, he always rose. Strong and brave from head to toes, A superman in front of whom the whole world bows. Daughter's first love and son's first hero, All we gave you was just like zero. Happiness is all that we can give, His love and care will always live. ******
- पानी की बूंद
डॉ कृष्ण कांत श्रीवास्तव दीपक फुटबॉल का बहुत अच्छा खिलाड़ी था, परंतु मन का कुछ चंचल था| उसका मन किसी एक काम में नहीं लगता था| वह कभी फुटबॉल खेलता तो कभी क्रिकेट में अपना कैरियर ढूंढता| दीपकअपने स्कूल में फुटबॉल के साथ-साथ क्रिकेट को भी बहुत समय देता था| दीपक ने सोचा कि मैं खेलों में ही अपना कैरियर बनाऊंगा| अतः उसने निश्चय किया कि वह अधिक से अधिक समय खेलों के अभ्यास करने में ही व्यतीत करेगा| दीपक की खेल में रुचि देखकर उनके पिता ने दीपक के लिए एक अच्छे फुटबॉल प्रशिक्षक की व्यवस्था कर दी| दीपक अपने प्रशिक्षक की देखरेख में फुटबॉल का प्रशिक्षण लेने लगा परंतु उसका चंचल मन समय-समय दूसरे खेलों के लिए भी मचलता रहता था| और दीपक प्रशिक्षक की अनुपस्थिति में अपने साथियों के साथ क्रिकेट खेलने के लिए चला जाया करता था| समय बीता दीपक के प्रशिक्षक ने दीपक से कहा, “बेटा, मैं तुम्हें फुटबॉल का अच्छा अभ्यास करवा रहा हूं| तुम्हें अपना मन क्रिकेट से हटाकर फुटबॉल में ही लगाना चाहिए| जिससे तुम फुटबॉल की सभी बारीकियों को ठीक से समझ जाओ| मैंने तुम्हें दोनों ही खेलों को खेलते हुए देखा है| एक प्रशिक्षक की नजर से मैं महसूस करता हूं कि तुम फुटबॉल की बारीकियों को जितनी अच्छी तरह पकड़ते हो, उतना अच्छा प्रदर्शन क्रिकेट में नहीं कर पाते| इसलिए यह मेरा सुझाव है कि तुम अपना अधिक से अधिक समय फुटबॉल को ही दो और इसी में अपनी प्रवीणता साबित करो|” प्रशिक्षक दीपक को समझाते हुए कहा कि मैं तुझे फुटबॉल की अच्छी प्रैक्टिस करवा रहा हूं| तुम मन लगाकर इसी कार्य को करते रहो| यदि तुम निरंतर प्रयास करते रहे तो निश्चित मानो एक दिन तुम फुटबॉल के अच्छे खिलाड़ी के रूप में उभरोगे| यदि इसके साथ-साथ अन्य खेलों में भी अपनी रुचि रखोगे तो तुम फुटबॉल में उतना अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाओगे, जितना दूसरे लोग करेंगे| परंतु दीपक ने अपने प्रशिक्षक की बात को हवा में उड़ा हवा में उड़ा दिया| समय बीता और राष्ट्रीय खेलों के चयन के लिए प्रतियोगिता का समय निकट आ गया| सभी प्रतियोगी अपने-अपने खेलों का कठिन परिश्रम करने लगे| दीपक भी कठिन परिश्रम कर रहा था परंतु समय मिलने पर वह क्रिकेट पर भी अपना ध्यान केंद्रित कर देता था| दीपक को अपने खेलों पर बहुत विश्वास था और समझ रहा था कि उसका चयन तो अवश्य ही हो जाएगा| प्रतियोगिताका समय निकट देखकर दीपक के सभी साथी अपने अपने खेलों के प्रशिक्षण में लग गए, दीपक भी अपनी तैयारी करने लगा परंतु उसका चंचल मन तो एक जगह स्थिर रहता ही नहीं था| वह कभी क्रिकेट का अभ्यास करता है तो कभी फुटबॉल का| दीपक के पिता भी बोले, “बेटा, केवल फुटबॉल का ही अभ्यास करो,अपने समय को जाया मत करो,कोई भी व्यक्ति दो भिन्न-भिन्न प्रतियोगिताओं में अपना सर्वश्रेष्ठ नहीं दे सकता| परंतुदीपक को लगता कि वह दोनों ही खेलों में सफलता प्राप्त कर सकता है| परीक्षण शुरू हुआ, सभी खिलाड़ियों ने अपनी अपनी रूचि के खेलों में अपना प्रदर्शन दिखाया| दीपक ने फुटबॉल के साथ-साथ क्रिकेट की भी परीक्षा| जब परिणाम का समय आया तो दिखा कि दीपक के लगभग सभी साथी अपने-अपने खेलों के लिए चयनित कर लिए गए, परंतु दीपक इस चयन प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया| दीपक ने तो दो प्रतियोगिताओं की परीक्षा दी थी| उसका प्रदर्शन भी बेहतर था,परंतु किसी भी खेल में उसकी प्रवीणता अपने दूसरे साथियों से कुछ कम ही थी| जिस कारण उसे ना तो फुटबॉल में और ना ही क्रिकेट में चयनित किया गया| यह सुनकर दीपक बहुत रोया और उसने निश्चय किया कि आज के बाद वह अपनी पूरी क्षमता केवल एक ही खेल में लगा देगा| कुछ समय बाद जब पुनः चयन की प्रक्रिया आरंभ हुई तो दीपक का प्रदर्शन सर्वश्रेष्ठ था| उसे ना केवल फुटबॉल के खेल के लिए चयनित किया गया बल्कि उसे उस खेल का कप्तान भी नियुक्त किया गया| इस कहानी से हमको यह शिक्षा मिलती है कि जीवन मे हम जो भी काम काम करें उस पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित करें और उसका निरंतर अभ्यास भी करें| कहते हैं कि पानी की बूंदेभी पत्थर पर निरंतर गिरकर अपना निशान छोड़ देती| ***********











