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  • नमक का दारोगा

    जब नमक का नया विभाग बना और ईश्वरप्रदत्त वस्तु के व्यवहार करने का निषेध हो गया तो लोग चोरी-छिपे इसका व्यापार करने लगे। अनेक प्रकार के छल-प्रपंचों का सूत्रपात हुआ, कोई घूस से काम निकालता था, कोई चालाकी से। अधिकारियों के पौ-बारह थे। पटवारीगिरी का सर्वसम्मानित पद छोड-छोडकर लोग इस विभाग की बरकंदाजी करते थे। इसके दारोगा पद के लिए तो वकीलों का भी जी ललचाता था। यह वह समय था जब ऍंगरेजी शिक्षा और ईसाई मत को लोग एक ही वस्तु समझते थे। फारसी का प्राबल्य था। प्रेम की कथाएँ और शृंगार रस के काव्य पढकर फारसीदाँ लोग सर्वोच्च पदों पर नियुक्त हो जाया करते थे। मुंशी वंशीधर भी जुलेखा की विरह-कथा समाप्त करके सीरी और फरहाद के प्रेम-वृत्तांत को नल और नील की लडाई और अमेरिका के आविष्कार से अधिक महत्व की बातें समझते हुए रोजगार की खोज में निकले। उनके पिता एक अनुभवी पुरुष थे। समझाने लगे, 'बेटा! घर की दुर्दशा देख रहे हो। ॠण के बोझ से दबे हुए हैं। लडकियाँ हैं, वे घास-फूस की तरह बढती चली जाती हैं। मैं कगारे पर का वृक्ष हो रहा हूँ, न मालूम कब गिर पडूँ! अब तुम्हीं घर के मालिक-मुख्तार हो। 'नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर का मजार है। निगाह चढावे और चादर पर रखनी चाहिए। ऐसा काम ढूँढना जहाँ कुछ ऊपरी आय हो। मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चाँद है, जो एक दिन दिखाई देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है। ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है। वेतन मनुष्य देता है, इसी से उसमें वृध्दि नहीं होती। ऊपरी आमदनी ईश्वर देता है, इसी से उसकी बरकत होती हैं, तुम स्वयं विद्वान हो, तुम्हें क्या समझाऊँ। 'इस विषय में विवेक की बडी आवश्यकता है। मनुष्य को देखो, उसकी आवश्यकता को देखो और अवसर को देखो, उसके उपरांत जो उचित समझो, करो। गरजवाले आदमी के साथ कठोरता करने में लाभ ही लाभ है। लेकिन बेगरज को दाँव पर पाना जरा कठिन है। इन बातों को निगाह में बाँध लो यह मेरी जन्म भर की कमाई है। इस उपदेश के बाद पिताजी ने आशीर्वाद दिया। वंशीधर आज्ञाकारी पुत्र थे। ये बातें ध्यान से सुनीं और तब घर से चल खडे हुए। इस विस्तृत संसार में उनके लिए धैर्य अपना मित्र, बुध्दि अपनी पथप्रदर्शक और आत्मावलम्बन ही अपना सहायक था। लेकिन अच्छे शकुन से चले थे, जाते ही जाते नमक विभाग के दारोगा पद पर प्रतिष्ठित हो गए। वेतन अच्छा और ऊपरी आय का तो ठिकाना ही न था। वृध्द मुंशीजी को सुख-संवाद मिला तो फूले न समाए। महाजन कुछ नरम पडे, कलवार की आशालता लहलहाई। पडोसियों के हृदय में शूल उठने लगे। जाडे के दिन थे और रात का समय। नमक के सिपाही, चौकीदार नशे में मस्त थे। मुंशी वंशीधर को यहाँ आए अभी छह महीनों से अधिक न हुए थे, लेकिन इस थोडे समय में ही उन्होंने अपनी कार्यकुशलता और उत्तम आचार से अफसरों को मोहित कर लिया था। अफसर लोग उन पर बहुत विश्वास करने लगे। नमक के दफ्तर से एक मील पूर्व की ओर जमुना बहती थी, उस पर नावों का एक पुल बना हुआ था। दारोगाजी किवाड बंद किए मीठी नींद सो रहे थे। अचानक ऑंख खुली तो नदी के प्रवाह की जगह गाडियों की गडगडाहट तथा मल्लाहों का कोलाहल सुनाई दिया। उठ बैठे। इतनी रात गए गाडियाँ क्यों नदी के पार जाती हैं? अवश्य कुछ न कुछ गोलमाल है। तर्क ने भ्रम को पुष्ट किया। वरदी पहनी, तमंचा जेब में रखा और बात की बात में घोडा बढाए हुए पुल पर आ पहुँचे। गाडियों की एक लम्बी कतार पुल के पार जाती देखी। डाँटकर पूछा, 'किसकी गाडियाँ हैं। थोडी देर तक सन्नाटा रहा। आदमियों में कुछ कानाफूसी हुई तब आगे वाले ने कहा-'पंडित अलोपीदीन की। 'कौन पंडित अलोपीदीन? 'दातागंज के। मुंशी वंशीधर चौंके। पंडित अलोपीदीन इस इलाके के सबसे प्रतिष्ठित जमींदार थे। लाखों रुपए का लेन-देन करते थे, इधर छोटे से बडे कौन ऐसे थे जो उनके ॠणी न हों। व्यापार भी बडा लम्बा-चौडा था। बडे चलते-पुरजे आदमी थे। ऍंगरेज अफसर उनके इलाके में शिकार खेलने आते और उनके मेहमान होते। बारहों मास सदाव्रत चलता था। मुंशी ने पूछा, 'गाडियाँ कहाँ जाएँगी? उत्तर मिला, 'कानपुर । लेकिन इस प्रश्न पर कि इनमें क्या है, सन्नाटा छा गया। दारोगा साहब का संदेह और भी बढा। कुछ देर तक उत्तर की बाट देखकर वह जोर से बोले, 'क्या तुम सब गूँगे हो गए हो? हम पूछते हैं इनमें क्या लदा है? जब इस बार भी कोई उत्तर न मिला तो उन्होंने घोडे को एक गाडी से मिलाकर बोरे को टटोला। भ्रम दूर हो गया। यह नमक के डेले थे। पंडित अलोपीदीन अपने सजीले रथ पर सवार, कुछ सोते, कुछ जागते चले आते थे। अचानक कई गाडीवानों ने घबराए हुए आकर जगाया और बोले-'महाराज! दारोगा ने गाडियाँ रोक दी हैं और घाट पर खडे आपको बुलाते हैं। पंडित अलोपीदीन का लक्ष्मीजी पर अखंड विश्वास था। वह कहा करते थे कि संसार का तो कहना ही क्या, स्वर्ग में भी लक्ष्मी का ही राज्य है। उनका यह कहना यथार्थ ही था। न्याय और नीति सब लक्ष्मी के ही खिलौने हैं, इन्हें वह जैसे चाहती हैं नचाती हैं। लेटे ही लेटे गर्व से बोले, चलो हम आते हैं। यह कहकर पंडितजी ने बडी निश्ंचितता से पान के बीडे लगाकर खाए। फिर लिहाफ ओढे हुए दारोगा के पास आकर बोले, 'बाबूजी आशीर्वाद! कहिए, हमसे ऐसा कौन सा अपराध हुआ कि गाडियाँ रोक दी गईं। हम ब्राह्मणों पर तो आपकी कृपा-दृष्टि रहनी चाहिए। वंशीधर रुखाई से बोले, 'सरकारी हुक्म। पं. अलोपीदीन ने हँसकर कहा, 'हम सरकारी हुक्म को नहीं जानते और न सरकार को। हमारे सरकार तो आप ही हैं। हमारा और आपका तो घर का मामला है, हम कभी आपसे बाहर हो सकते हैं? आपने व्यर्थ का कष्ट उठाया। यह हो नहीं सकता कि इधर से जाएँ और इस घाट के देवता को भेंट न चढावें। मैं तो आपकी सेवा में स्वयं ही आ रहा था। वंशीधर पर ऐश्वर्य की मोहिनी वंशी का कुछ प्रभाव न पडा। ईमानदारी की नई उमंग थी। कडककर बोले, 'हम उन नमकहरामों में नहीं है जो कौडियों पर अपना ईमान बेचते फिरते हैं। आप इस समय हिरासत में हैं। आपको कायदे के अनुसार चालान होगा। बस, मुझे अधिक बातों की फुर्सत नहीं है। जमादार बदलूसिंह! तुम इन्हें हिरासत में ले चलो, मैं हुक्म देता हूँ। पं. अलोपीदीन स्तम्भित हो गए। गाडीवानों में हलचल मच गई। पंडितजी के जीवन में कदाचित यह पहला ही अवसर था कि पंडितजी को ऐसी कठोर बातें सुननी पडीं। बदलूसिंह आगे बढा, किन्तु रोब के मारे यह साहस न हुआ कि उनका हाथ पकड सके। पंडितजी ने धर्म को धन का ऐसा निरादर करते कभी न देखा था। विचार किया कि यह अभी उद्दंड लडका है। माया-मोह के जाल में अभी नहीं पडा। अल्हड है, झिझकता है। बहुत दीनभाव से बोले, 'बाबू साहब, ऐसा न कीजिए, हम मिट जाएँगे। इज्जत धूल में मिल जाएगी। हमारा अपमान करने से आपके हाथ क्या आएगा। हम किसी तरह आपसे बाहर थोडे ही हैं। वंशीधर ने कठोर स्वर में कहा, 'हम ऐसी बातें नहीं सुनना चाहते। अलोपीदीन ने जिस सहारे को चट्टान समझ रखा था, वह पैरों के नीचे खिसकता हुआ मालूम हुआ। स्वाभिमान और धन-ऐश्वर्य की कडी चोट लगी। किन्तु अभी तक धन की सांख्यिक शक्ति का पूरा भरोसा था। अपने मुख्तार से बोले, 'लालाजी, एक हजार के नोट बाबू साहब की भेंट करो, आप इस समय भूखे सिंह हो रहे हैं। वंशीधर ने गरम होकर कहा, 'एक हजार नहीं, एक लाख भी मुझे सच्चे मार्ग से नहीं हटा सकते। धर्म की इस बुध्दिहीन दृढता और देव-दुर्लभ त्याग पर मन बहुत झुँझलाया। अब दोनों शक्तियों में संग्राम होने लगा। धन ने उछल-उछलकर आक्रमण करने शुरू किए। एक से पाँच, पाँच से दस, दस से पंद्रह और पंद्रह से बीस हजार तक नौबत पहुँची, किन्तु धर्म अलौकिक वीरता के साथ बहुसंख्यक सेना के सम्मुख अकेला पर्वत की भाँति अटल, अविचलित खडा था। अलोपीदीन निराश होकर बोले, 'अब इससे अधिक मेरा साहस नहीं। आगे आपको अधिकार है। वंशीधर ने अपने जमादार को ललकारा। बदलूसिंह मन में दारोगाजी को गालियाँ देता हुआ पंडित अलोपीदीन की ओर बढा। पंडितजी घबडाकर दो-तीन कदम पीछे हट गए। अत्यंत दीनता से बोले, 'बाबू साहब, ईश्वर के लिए मुझ पर दया कीजिए, मैं पच्चीस हजार पर निपटारा करने का तैयार हूँ। 'असम्भव बात है। 'तीस हजार पर? 'किसी तरह भी सम्भव नहीं। 'क्या चालीस हजार पर भी नहीं। 'चालीस हजार नहीं, चालीस लाख पर भी असम्भव है। 'बदलूसिंह, इस आदमी को हिरासत में ले लो। अब मैं एक शब्द भी नहीं सुनना चाहता। धर्म ने धन को पैरों तले कुचल डाला। अलोपीदीन ने एक हृष्ट-पुष्ट मनुष्य को हथकडियाँ लिए हुए अपनी तरफ आते देखा। चारों ओर निराश और कातर दृष्टि से देखने लगे। इसके बाद मूर्छित होकर गिर पडे। दुनिया सोती थी पर दुनिया की जीभ जागती थी। सवेरे देखिए तो बालक-वृध्द सबके मुहँ से यही बात सुनाई देती थी। जिसे देखिए वही पंडितजी के इस व्यवहार पर टीका-टिप्पणी कर रहा था, निंदा की बौछारें हो रही थीं, मानो संसार से अब पापी का पाप कट गया। पानी को दूध के नाम से बेचने वाला ग्वाला, कल्पित रोजनामचे भरने वाले अधिकारी वर्ग, रेल में बिना टिकट सफर करने वाले बाबू लोग, जाली दस्तावेज बनाने वाले सेठ और साकार यह सब के सब देवताओं की भाँति गर्दनें चला रहे थे। जब दूसरे दिन पंडित अलोपीदीन अभियुक्त होकर कांस्टेबलों के साथ, हाथों में हथकडियाँ, हृदय में ग्लानि और क्षोभ भरे, लज्जा से गर्दन झुकाए अदालत की तरफ चले तो सारे शहर में हलचल मच गई। मेलों में कदाचित ऑंखें इतनी व्यग्र न होती होंगी। भीड के मारे छत और दीवार में कोई भेद न रहा। किंतु अदालत में पहुँचने की देर थी। पं. अलोपीदीन इस अगाध वन के सिंह थे। अधिकारी वर्ग उनके भक्त, अमले उनके सेवक, वकील-मुख्तार उनके आज्ञा पालक और अरदली, चपरासी तथा चौकीदार तो उनके बिना मोल के गुलाम थे। उन्हें देखते ही लोग चारों तरफ से दौडे। सभी लोग विस्मित हो रहे थे। इसलिए नहीं कि अलोपीदीन ने यह कर्म किया, बल्कि इसलिए कि वह कानून के पंजे में कैसे आए? ऐसा मनुष्य जिसके पास असाध्य साधन करने वाला धन और अनन्य वाचालता हो, वह क्यों कानून के पंजे में आए? प्रत्येक मनुष्य उनसे सहानुभूति प्रकट करता था। बडी तत्परता से इस आक्रमण को रोकने के निमित्त वकीलों की एक सेना तैयार की गई। न्याय के मैदान में धर्म और धन में यध्द ठन गया। वंशीधर चुपचाप खडे थे। उनके पास सत्य के सिवा न कोई बल था, न स्पष्ट भाषण के अतिरिक्त कोई शस्त्र। गवाह थे, किंतु लोभ से डाँवाडोल। यहाँ तक कि मुंशीजी को न्याय भी अपनी ओर कुछ खिंचा हुआ दीख पडता था। वह न्याय का दरबार था, परंतु उसके कर्मचारियों पर पक्षपात का नशा छाया हुआ था। किंतु पक्षपात और न्याय का क्या मेल? जहाँ पक्षपात हो, वहाँ न्याय की कल्पना नहीं की जा सकती। मुकदमा शीघ्र ही समाप्त हो गया। डिप्टी मजिस्ट्रेट ने अपनी तजवीज में लिखा, पं. अलोपीदीन के विरुध्द दिए गए प्रमाण निर्मूल और भ्रमात्मक हैं। वह एक बडे भारी आदमी हैं। यह बात कल्पना के बाहर है कि उन्होंने थोडे लाभ के लिए ऐसा दुस्साहस किया हो। यद्यपि नमक के दरोगा मुंशी वंशीधर का अधिक दोष नहीं है, लेकिन यह बडे खेद की बात है कि उसकी उद्दंडता और विचारहीनता के कारण एक भलेमानुस को कष्ट झेलना पडा। हम प्रसन्न हैं कि वह अपने काम में सजग और सचेत रहता है, किंतु नमक के मुकदमे की बढी हुई नमक से हलाली ने उसके विवेक और बुध्दि को भ्रष्ट कर दिया। भविष्य में उसे होशियार रहना चाहिए। वकीलों ने यह फैसला सुना और उछल पडे। पं. अलोपीदीन मुस्कुराते हुए बाहर निकले। स्वजन बाँधवों ने रुपए की लूट की। उदारता का सागर उमड पडा। उसकी लहरों ने अदालत की नींव तक हिला दी। जब वंशीधर बाहर निकले तो चारों ओर उनके ऊपर व्यंग्यबाणों की वर्षा होने लगी। चपरासियों ने झुक-झुककर सलाम किए। किंतु इस समय एक कटु वाक्य, एक-एक संकेत उनकी गर्वाग्नि को प्रज्ज्वलित कर रहा था। कदाचित इस मुकदमे में सफल होकर वह इस तरह अकडते हुए न चलते। आज उन्हें संसार का एक खेदजनक विचित्र अनुभव हुआ। न्याय और विद्वत्ता, लंबी-चौडी उपाधियाँ, बडी-बडी दाढियाँ, ढीले चोगे एक भी सच्चे आदर का पात्र नहीं है। वंशीधर ने धन से बैर मोल लिया था, उसका मूल्य चुकाना अनिवार्य था। कठिनता से एक सप्ताह बीता होगा कि मुअत्तली का परवाना आ पहुँचा। कार्य-परायणता का दंड मिला। बेचारे भग्न हृदय, शोक और खेद से व्यथित घर को चले। बूढे मुंशीजी तो पहले ही से कुडबुडा रहे थे कि चलते-चलते इस लडके को समझाया था, लेकिन इसने एक न सुनी। सब मनमानी करता है। हम तो कलवार और कसाई के तगादे सहें, बुढापे में भगत बनकर बैठें और वहाँ बस वही सूखी तनख्वाह! हमने भी तो नौकरी की है और कोई ओहदेदार नहीं थे। लेकिन काम किया, दिल खोलकर किया और आप ईमानदार बनने चले हैं। घर में चाहे ऍंधेरा हो, मस्जिद में अवश्य दिया जलाएँगे। खेद ऐसी समझ पर! पढना-लिखना सब अकारथ गया। इसके थोडे ही दिनों बाद, जब मुंशी वंशीधर इस दुरावस्था में घर पहुँचे और बूढे पिताजी ने समाचार सुना तो सिर पीट लिया। बोले- 'जी चाहता है कि तुम्हारा और अपना सिर फोड लूँ। बहुत देर तक पछता-पछताकर हाथ मलते रहे। क्रोध में कुछ कठोर बातें भी कहीं और यदि वंशीधर वहाँ से टल न जाता तो अवश्य ही यह क्रोध विकट रूप धारण करता। वृध्द माता को भी दु:ख हुआ। जगन्नाथ और रामेश्वर यात्रा की कामनाएँ मिट्टी में मिल गईं। पत्नी ने कई दिनों तक सीधे मुँह बात तक नहीं की। इसी प्रकार एक सप्ताह बीत गया। सांध्य का समय था। बूढे मुंशीजी बैठे-बैठे राम नाम की माला जप रहे थे। इसी समय उनके द्वार पर सजा हुआ रथ आकर रुका। हरे और गुलाबी परदे, पछहिए बैलों की जोडी, उनकी गर्दन में नीले धागे, सींग पीतल से जडे हुए। कई नौकर लाठियाँ कंधों पर रखे साथ थे। मुंशीजी अगवानी को दौडे देखा तो पंडित अलोपीदीन हैं। झुककर दंडवत् की और लल्लो-चप्पो की बातें करने लगे- 'हमारा भाग्य उदय हुआ, जो आपके चरण इस द्वार पर आए। आप हमारे पूज्य देवता हैं, आपको कौन सा मुँह दिखावें, मुँह में तो कालिख लगी हुई है। किंतु क्या करें, लडका अभागा कपूत है, नहीं तो आपसे क्या मुँह छिपाना पडता? ईश्वर निस्संतान चाहे रक्खे पर ऐसी संतान न दे। अलोपीदीन ने कहा- 'नहीं भाई साहब, ऐसा न कहिए। मुंशीजी ने चकित होकर कहा- 'ऐसी संतान को और क्या कँ? अलोपीदीन ने वात्सल्यपूर्ण स्वर में कहा- 'कुलतिलक और पुरुखों की कीर्ति उज्ज्वल करने वाले संसार में ऐसे कितने धर्मपरायण मनुष्य हैं जो धर्म पर अपना सब कुछ अर्पण कर सकें! पं. अलोपीदीन ने वंशीधर से कहा- 'दरोगाजी, इसे खुशामद न समझिए, खुशामद करने के लिए मुझे इतना कष्ट उठाने की जरूरत न थी। उस रात को आपने अपने अधिकार-बल से अपनी हिरासत में लिया था, किंतु आज मैं स्वेच्छा से आपकी हिरासत में आया हूँ। मैंने हजारों रईस और अमीर देखे, हजारों उच्च पदाधिकारियों से काम पडा किंतु परास्त किया तो आपने। मैंने सबको अपना और अपने धन का गुलाम बनाकर छोड दिया। मुझे आज्ञा दीजिए कि आपसे कुछ विनय करूँ। वंशीधर ने अलोपीदीन को आते देखा तो उठकर सत्कार किया, किंतु स्वाभिमान सहित। समझ गए कि यह महाशय मुझे लज्जित करने और जलाने आए हैं। क्षमा-प्रार्थना की चेष्टा नहीं की, वरन् उन्हें अपने पिता की यह ठकुरसुहाती की बात असह्य सी प्रतीत हुई। पर पंडितजी की बातें सुनी तो मन की मैल मिट गई। पंडितजी की ओर उडती हुई दृष्टि से देखा। सद्भाव झलक रहा था। गर्व ने अब लज्जा के सामने सिर झुका दिया। शर्माते हुए बोले- 'यह आपकी उदारता है जो ऐसा कहते हैं। मुझसे जो कुछ अविनय हुई है, उसे क्षमा कीजिए। मैं धर्म की बेडी में जकडा हुआ था, नहीं तो वैसे मैं आपका दास हूँ। जो आज्ञा होगी वह मेरे सिर-माथे पर। अलोपीदीन ने विनीत भाव से कहा- 'नदी तट पर आपने मेरी प्रार्थना नहीं स्वीकार की थी, किंतु आज स्वीकार करनी पडेगी। वंशीधर बोले- 'मैं किस योग्य हूँ, किंतु जो कुछ सेवा मुझसे हो सकती है, उसमें त्रुटि न होगी। अलोपीदीन ने एक स्टाम्प लगा हुआ पत्र निकाला और उसे वंशीधर के सामने रखकर बोले- 'इस पद को स्वीकार कीजिए और अपने हस्ताक्षर कर दीजिए। मैं ब्राह्मण हूँ, जब तक यह सवाल पूरा न कीजिएगा, द्वार से न हटूँगा। मुंशी वंशीधर ने उस कागज को पढा तो कृतज्ञता से ऑंखों में ऑंसू भर आए। पं. अलोपीदीन ने उनको अपनी सारी जायदाद का स्थायी मैनेजर नियत किया था। छह हजार वाषक वेतन के अतिरिक्त रोजाना खर्च अलग, सवारी के लिए घोडा, रहने को बँगला, नौकर-चाकर मुफ्त। कम्पित स्वर में बोले- 'पंडितजी मुझमें इतनी सामर्थ्य नहीं है कि आपकी उदारता की प्रशंसा कर सकूँ! किंतु ऐसे उच्च पद के योग्य नहीं हूँ। अलोपीदीन हँसकर बोले- 'मुझे इस समय एक अयोग्य मनुष्य की ही जरूरत है। वंशीधर ने गंभीर भाव से कहा- 'यों मैं आपका दास हूँ। आप जैसे कीर्तिवान, सज्जन पुरुष की सेवा करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। किंतु मुझमें न विद्या है, न बुध्दि, न वह स्वभाव जो इन त्रुटियों की पूर्ति कर देता है। ऐसे महान कार्य के लिए एक बडे मर्मज्ञ अनुभवी मनुष्य की जरूरत है। अलोपीदीन ने कलमदान से कलम निकाली और उसे वंशीधर के हाथ में देकर बोले- 'न मुझे विद्वत्ता की चाह है, न अनुभव की, न मर्मज्ञता की, न कार्यकुशलता की। इन गुणों के महत्व को खूब पा चुका हूँ। अब सौभाग्य और सुअवसर ने मुझे वह मोती दे दिया जिसके सामने योग्यता और विद्वत्ता की चमक फीकी पड जाती है। यह कलम लीजिए, अधिक सोच-विचार न कीजिए, दस्तखत कर दीजिए। परमात्मा से यही प्रार्थना है कि वह आपको सदैव वही नदी के किनारे वाला, बेमुरौवत, उद्दंड, कठोर परंतु धर्मनिष्ठ दारोगा बनाए रखे। वंशीधर की ऑंखें डबडबा आईं। हृदय के संकुचित पात्र में इतना एहसान न समा सका। एक बार फिर पंडितजी की ओर भक्ति और श्रध्दा की दृष्टि से देखा और काँपते हुए हाथ से मैनेजरी के कागज पर हस्ताक्षर कर दिए। अलोपीदीन ने प्रफुल्लित होकर उन्हें गले लगा लिया। ********

  • खुशी का रिमोट

    आधुनिक जीवन की स्पर्धा में हम भागते जा रहे हैं। इस भाग दौड़ में हम अपने उद्देश्य को भूल गए। हमारे जीवन का उद्देश्य ख़ुशी है। कहते हैं, ख़ुशी से बड़ी खुराक नहीं चिंता जैसा मर्ज नहीं। जीवन में प्रगति करना आवश्यक है, जिसके लिए हमें कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। लेकिन जीवन में दो बातें हमें ख़ुशी से दूर ले जाती हैं। एक इच्छा दूसरी ईर्ष्या। इच्छाओं का अंत नहीं है। एक के बाद एक पैदा होती रहती हैं। हम उनको पूरा करने में ही सारा जीवन बिता देते हैं और ख़ुशी का वास्तविक आनंद नहीं उठा पाते। ये इच्छाएं भौतिक वस्तुओं की ओर आकर्षित करती हैं। जो कि हमारे आराम के साधन हैं। भौतिक साधनों से आराम तो मिल सकता है परन्तु ख़ुशी नहीं होती। हम अपने आप को प्रसन्नचित अनुभव नहीं कर सकते। कहते हैं "इच्छा मात्रम अविद्या"। कभी सोचते गाड़ी ले लूँ, तब ख़ुशी मिले खूब धन एकत्र कर लूँ तब मिले, अच्छा घर हो तब मिले, नौकरी में प्रमोशन हो या बिज़नेस अच्छा चले तब ख़ुशी मिले। लेकिन यह सब इच्छाएं हैं जो एक पूरी होने के बाद दूसरी जन्म लेती हैं और पूरी न होने पर दुःख व अशांति पैदा करती हैं। अब इससे अधिक महत्त्वपूर्ण है ईर्ष्या। आज हम अपने से ज्यादा दूसरों को देखते हैं। हमारी खुशियां भी दूसरों पर निर्भर हैं। कुछ सामान्य उदहारण - मानो आप कोई महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं और अचानक आपके घर क़ी बिजली चली जाती है, तो आप परेशान हो जाते दुःखी हो जाते। आप सबसे पहले देखते हैं, बगल वाले घर की गयी कि नहीं। अगर उनके घर क़ी भी गयी तो आप संतुष्ट हो गए। आपका दुःख दूर हो गया शिकायत भी नहीं करेंगे। इसी प्रकार आप नयी गाड़ी खरीद कर लाये, अच्छी गाड़ी, ऊँचा मॉडल आप खुश हैं। एक दो दिन बाद आप उसी गाड़ी से घूम रहे हैं और पास से उसी कंपनी के ऊँचे मॉडल क़ी गाड़ी आपके पास से निकल गई। अब आप क़ी ख़ुशी गयी, सोचने लगे मैं ये वाली ले लेता। इसी प्रकार आप जानते हैं कि आपका बेटा पढ़ाई में कमजोर है, फिर भी परीक्षा के बाद रिजल्ट लेकर वो आप के पास आता है और अपने परीक्षा के अंक बताता है, उसके अंक आपके अपेक्षा से कहीं अधिक होते हैं तो आप बहुत खुश होते हैं। कुछ देर बाद आप और बच्चों के अंको के बारे में अथवा उच्चतम अंक पूछते हैं तो वो आपके बच्चे के अंक से बहुत ज्यादा होते अब आपकी ख़ुशी गायब। विचार करें आपकी ख़ुशी किसमे थी। आपके बच्चे के अच्छे अंको में या दूसरों के बच्चों के कम अंको में। इसी प्रकार यदि आपका बेटा पढाई में बहुत तेज है आप जानते है वो बहुत अच्छे अंको से पास होगा या टॉप करेगा परन्तु परिणाम आने पर उसके अंक अच्छे नहीं होते तो आप दुःखी हो जाते हैं। फिर आप और बच्चों के अंक पूछते हैं जिस पर वो अपने अंक ही उच्चतम बताता है तो आप फिर बहुत खुश हो जाते हैं। यह उदाहरण इस बात को सत्यार्थ करता है कि आपको अपने बच्चे की पढाई या अंको से ख़ुश या दुःखी नहीं हैं, वरन दूसरों के बच्चों की तुलना में आपकी ख़ुशी निर्भर करती है। इस प्रकार परचिन्तन भी आपके अन्दर नाकारात्मक ऊर्जा पैदा करता है। अपने से ज्यादा औरों पर ध्यान देते हुए अंदर-अंदर दुखी होना यह ईर्ष्या है। अगर पड़ोस में सम्पन्नता आये तो आप तुरंत कहेंगे कहीं से दो नंबर का पैसा आ गया होगा। अगर दूसरे के बच्चे ने प्रतियोगी परीक्षा उत्तीर्ण कर अच्छी नौकरी प्राप्त कर ली तो आप कहेंगे जुगाड़ लग गया या पैसा खिलाया होगा। यही नकारात्मकता आपको दुखी करती है। प्रत्येक व्यक्ति हर कार्य एवं निर्णय सोच समझ कर लेता है और अपने अनुसार सर्वश्रेष्ठ निर्णय ही लेता है। परन्तु जब वह निर्णय हमारे विचारों के अनुकूल नहीं होता तो हम बिना सोचे समझे उसे गलत सिद्ध करने का प्रयास प्रारंभ कर देते हैं। किसी भी बात, मामले या प्रकरण पर लिए गए निर्णय से ज्यादा महत्पूर्ण है कि वो निर्णय किस समय और किन परिस्थितियों में लिया गया। सर्वदा दूसरों की उपलब्धियों पर नकारात्मक विचार रखना बुद्धिमानी नहीं होती। परचिन्तन हमारी ख़ुशी में बहुत घातक होता है। हम सदैव दूसरे में बुराई देखते हैं। हर व्यक्ति में अच्छाई बुराई दोनों होती हैं, निर्भर इस पर करता हैं कि हम उसकी अच्छाइयों को देखते हैं या बुराइयों को। अगर अच्छाइयां देखेंगे तो अच्छाई दिखेगी बुराई देखेंगे तो सदैव बुराई दिखेगी। इसी प्रकार बुराई देखते-देखते हमारी आदत ही सब में बुराई देखने की हो जाएगी फिर वही बुराई देखना हमारे संस्कार बन जायेंगे। तब ख़ुशी कैसे हासिल होगी। हम जब दूसरों को देखते हैं,उनकी गतिविधियों,कार्यों इत्यादि पर विचार करते तो एकदम न्यायधीश के तरह तुरंत निर्णय दे देते हैं। वो गलत हैं। वहीं जब हमको कोई हमारी कमियां दिखता हैं तो हम वकील बन उस पर जिरह करने लगते हैं। तो हमारी जीवन की खुशियां दूसरों के प्रति ईर्ष्या व व्यर्थ चिंतन में व्यतीत होने लगती है। वास्तव में आज हमने अपनी ख़ुशी का रिमोट दूसरों के हाथों में दे रखा हैं। जब रिमोट ही दूसरे के पास हैं तो उसके ही संचालित करने पर हम खुश और दुखी होंगे। यदि हम अपनी इन नकारात्मक सोच को बदलना चाहते हैं। तो हमें प्रत्येक व्यक्ति के कार्यों को सकारात्मक दृष्टिकोण से देखना चाहिए। हमारी सकारात्मक सोच हमें सदैव संतुष्ट और प्रसन्नचित रहने में हमारी मदद करेगी। तब हमारी ख़ुशी का रिमोट हमारे हांथों में होगा न कि दूसरों के हांथों में। ********

  • दो बैलों की कथा

    जानवरों में गधा सबसे ज्यादा बुध्दिहीन समझा जाता है। हम जब किसी आदमी को पल्ले दर्जे का बेवकूफ कहना चाहते हैं, तो उसे गधा कहते हैं। गधा सचमुच बेवकूफ है, या उसके सीधेपन, उसकी निरापद सहिष्णुता ने उसे यह पदवी दे दी है, इसका निश्चय नहीं किया जा सकता। गायें सींग मारती हैं, ब्यायी हुई गाय तो अनायास ही सिंहनी का रूप धारण कर लेती है। कुत्ता भी बहुत गरीब जानवर है, लेकिन कभी-कभी उसे भी क्रोध आ ही जाता है। किन्तु गधे को कभी क्रोध करते नहीं सुना, न देखा। जितना चाहे गरीब को मारो, चाहे जैसी खराब, सडी हुई घास सामने डाल दो, उसके चेहरे पर कभी असंतोष की छाया भी न दिखाई देगी। वैशाख में चाहे एकाध बार कुलेल कर लेता हो, पर हमने तो उसे कभी खुश होते नहीं देखा। उसके चेहरे पर एक स्थायी विषाद स्थायी रूप से छाया रहता है। सुख-दु:ख, हानि-लाभ, किसी भी दशा में उसे बदलते नहीं देखा। ॠषियों-मुनियों के जितने गुण हैं, वे सभी उसमें पराकाष्ठा को पहुँच गए हैं, पर आदमी उसे बेवकूफ कहता है। सद्गुणों का इतना अनादर कहीं न देखा। कादचित सीधापन संसार के लिए उपयुक्त नहीं है। देखिए न, भारतवासियों की अफ्रीका में क्यों दुर्दशा हो रही है? क्यों अमेरिका में उन्हें घुसने नहीं दिया जाता? बेचारे शराब नहीं पीते, चार पैसे कुसमय के लिए बचाकर रखते हैं, जी तोडकर काम करते हैं, किसी से लडाई-झगडा नहीं करते, चार बातें सुनकर गम खा जाते हैं, फिर भी बदनाम हैं। कहा जाता है, वे जीवन के आदर्श को नीचा करते हैं। अगर वे भी ईंट का जवाब पत्थर से देना सीख जाते, तो शायद सभ्य कहलाने लगते। जापान की मिसाल समाने है। एक ही विजय ने उसे संसार की सभ्य जातियों में गण्य बना दिया। लेकिन गधे का एक छोटा भाई और भी है, जो उससे कम ही गधा है, और वह है 'बैल। जिस अर्थ में हम गधा का प्रयोग करते हैं, कुछ उसी से मिलते-जुलते अर्थ में 'बछिया के ताऊ का भी प्रयोग करते हैं। कुछ लोग बैल को शायद बेवकूफों में सर्वश्रेष्ठ कहेंगे, मगर हमारा विचार ऐसा नहीं है। बैल कभी-कभी मारता भी है, कभी-कभी अडियल बैल भी देखने में आता है। और भी कई रीतियों से अपना असंतोष प्रकट कर देता है, अतएव उसका स्थान गधे से नीचा है। झूरी काछी के दोनों बैलों के नाम थे हीरा और मोती। दोनों पछाई जाति के थे- देखने में सुन्दर, काम में चौकस, डील में ऊँचे। बहुत दिनों से साथ रहते-रहते दोनों में भाईचारा हो गया था। दोनों आमने-सामने या आसपास बैठे हुए एक-दूसरे से मूक भाषा में विचार-विनिमय करते थे। एक दूसरे के मन की बात कैसे समझ जाता था, हम नहीं कह सकते। अवश्य ही उनमें कोई ऐसी गुप्त शक्ति थी, जिससे जीवों में श्रेष्ठता का दावा करने वाला मनुष्य वंचित है। दोनों एक-दूसरे को चाटकर और सूँघकर अपना प्रेम प्रकट करते, कभी-कभी दोनों सींग भी मिला लिया करते थे- विग्रह के नाते से नहीं, केवल विनोद के भाव से, आत्मीयता के भाव से, जैसे दोस्तों में घनिष्ठता होते ही धौल-धप्पा होने लगता है। इसके बिना दोस्ती कुछ फुसफुसी, कुछ हल्की-सी रहती है, जिस पर ज्यादा विश्वास नहीं किया जा सकता। जिस वक्त ये दोनों बैल हल या गाडी में जोत दिए जाते और गर्दन हिला-हिलाकर चलते उस वक्त हर एक की यही चेष्टा होती थी कि ज्याद-से-ज्यादा बोझ मेरी ही गर्दन पर रहे। दिनभर के बाद दोपहर या संध्या को दोनों खुलते, तो एक-दूसरे को चाट-चूटकर अपनी थकान मिटा लेते। नाँद में खली-भूसा पड जाने के बाद दोनों साथ उठते, साथ नाँद में मुँह डालते और साथ ही बैठते थे। एक मुँह हटा लेता तो दूसरा भी हटा लेता था। संयोग की बात है, झूरी ने एक बार गोईं को ससुराल भेज दिया। बैलों को क्या मालूम वे क्यों भेजे जा रहे हैं। समझे, मालिक ने हमे बेच दिया। अपना यों बेचा जाना उन्हें अच्छा लगा या बुरा, कौन जाने पर झूरी के साले गया को घर तक गोईं ले जाने में दाँतों पसीना आ गया। पीछे से हाँकता तो दोनों दाएँ-बाएँ भागते, पगहिया पकडकर आगे से खींचता तो दोनों पीछे को जोर लगाते। मारता तो दोनों सींग नीचे करके हुँकरते। अगर ईश्वर ने उन्हें वाणी दी होती, तो झूरी से पूछते- तुम हम गरीबों को क्यों निकाल रहे हो? हमने तो तुम्हारी सेवा करने में कोई कसर नहीं उठा रखी। अगर इतनी मेहनत से काम न चलता था, और काम ले लेते, हमें तो तुम्हारी चाकरी में मर जाना कबूल था। हमने कभी दाने-चारे की शिकायत नहीं की। तुमने जो कुछ खिलाया वह सिर झुकाकर खा लिया, फिर तुमने हमें इस जालिम के हाथों क्यों बेच दिया? संध्या समय दोनों बैल अपने नए स्थान पर पहुँचे। दिनभर के भूखे थे, लेकिन जब नाँद में लगाए गए, तो एक ने भी उसमें मुँह न डाला। दिल भारी हो रहा था। जिसे उन्होंने अपना घर समझ रखा था, वह आज उनसे छूट गया था। यह नया घर, नया गाँव, नए आदमी, उन्हें बेगानों से लगते थे। दोनों ने अपनी मूक भाषा में सलाह की, एक-दूसरे को कनखियों से देखा और लेट गए। जब गाँव में सोता पड गया, तो दोनों ने जोर मारकर पगहे तुडा डाले और घर की तरफ चले। पगहे बहुत मजबूत थे। अनुमान न हो सकता था कि कोई बैल उन्हें तोड सकेगा: पर इन दोनों में इस समय दूनी शक्ति आ गई थी। एक-एक झटके में रस्सियाँ टूट गईं। झूरी प्रात: सोकर उठा, तो देखा कि दोनों बैल चरनी पर खडे हैं। दोनों ही गर्दनों में आधा-आधा गराँव लटक रहा है। घुटने तक पाँव कीचड से भरे हैं और दोनों की ऑंखों में विद्रोहमय स्नेह झलक रहा है। झूरी बैलों को देखकर स्नेह से गद्गद् हो गया। दौडकर उन्हें गले लगा लिया। प्रेमालिंगन और चुम्बन का वह दृश्य बडा ही मनोहर था। घर और गाँव के लडके जमा हो गए और तालियाँ बजा-बजाकर उनका स्वागत करने लगे। गाँव के इतिहास में यह घटना अभूतपूर्व न होने पर भी महत्वपूर्ण थी। बाल-सभा ने निश्चय किया, दोनों पशु-वीरों को अभिनंदन-पत्र देना चाहिए। कोई अपने घर से रोटियाँ लाया, कोई गुड, कोई चोकर, कोई भूसी। एक बालक ने कहा- ऐसे बैल किसी के पास न होंगे। दूसरे ने समर्थन किया- इतनी दूर से दोनों अकेले चले आए। तीसरा बोला- बैल नहीं हैं वे, उस जनम के आदमी हैं। इसका प्रतिवाद करने का किसी को साहस न हुआ। झूरी की स्त्री ने बैलों को द्वार पर देखा, तो जल उठी। बोली- कैसे नमक-हराम बैल हैं कि एक दिन वहाँ काम न किया, भाग खडे हुए। झूरी अपने बैलों पर यह आक्षेप न सुन सका- नमकहराम क्यों हैं? चारा-दाना न दिया होगा, तो क्या करते? स्त्री ने रोब के साथ कहा- बस, तुम्हीं तो बैलों को खिलाना जानते हो, और तो सभी पानी पिला-पिलाकर रखते हैं। झूरी ने चिढाया- चारा मिलता तो क्यों भागते? स्त्री चिढी- भागे इसलिए कि वे लोग तुम जैसे बुध्दुओं की तरह बैलों को सहलाते नहीं। खिलाते हैं, तो रगडकर जोतते भी हैं। ये दोनों ठहरे कामचोर, भाग निकले। अब देखूँ? कहाँ से खली और चोकर मिलता है, सूखे भूसे के सिवा कुछ न दूँगी, खाएँ चाहे मरें। वही हुआ। मजूर को बडी ताकीद कर दी गई कि बैलों को खाली सूखा भूसा दिया जाए। बैलों ने नाँद में मुँह डाला तो फीका-फीका। न कोई चिकनाहट, न कोई रस। क्या खाएँ? आशा भरी ऑंखों से द्वार की ओर ताकने लगे। झूरी ने मजूर से कहा- थोडी-सी खली क्यों नहीं डाल देता बे? 'मालिकन मुझे मार ही डालेंगी। 'चुराकर डाल आ। 'ना दादा, पीछे से तुम भी उन्हीं की-सी कहोगे। दूसरे दिन झूरी का साला फिर आया और बैलों को ले चला। अबकी उसने दोनों को गाडी में जोता। दो-चार बार मोती ने गाडी को सडक की खाई में गिराना चाहा, पर हीरा ने संभाल लिया। वह ज्यादा सहनशील था। संध्या समय घर पहुँचकर उसने दोनों को मोटी रस्सियों से बाँधा और कल की शरारत का मजा चखाया। फिर वही सूखा भूसा डाल दिया। अपने दोनों बैलों को खली, चूनी सब कुछ दी। दोनों बैलों का ऐसा अपमान कभी न हुआ था। झूरी इन्हें फूल की छडी से भी न छूता था। उसकी टिटकार पर दोनों उडने लगते थे। यहाँ मार पडी। आहत-सम्मान की व्यथा तो थी ही, उस पर मिला सूखा भूसा! नाँद की तरफ ऑंखें तक न उठाईं। दूसरे दिन गया ने बैलों को हल में जोता, पर इन दोनों ने जैसे पाँव न उठाने की कसम खा ली थी। वह मारते-मारते थक गया, पर दोनों ने पाँव न उठाया। एक बार जब उस निर्दयी ने हीरा की नाक पर खूब डण्डे जमाए, तो मोती का गुस्सा काबू के बाहर हो गया। हल लेकर भागा। हल, रस्सी, जुआ, जोत, सब टूट-टाट कर बराबर हो गया। गले में बडी-बडी रस्सियाँ न होती तो दोनों पकडाई में न आते। हीरा ने मूक भाषा में कहा- भागना व्यर्थ है। मोती ने उत्तर दिया- तुम्हारी तो इसने जान ही ले ली थी। 'अबकी बडी मार पडेगी। 'पडने दो, बैल का जन्म लिया है तो मार से कहाँ तक बचेंगे। 'गया दो आदमियों के साथ दौडा आ रहा है। दोनों के हाथों में लाठियाँ हैं। मोती बोला- कहो तो दिखा दूँ कुछ मजा मैं भी। लाठी लेकर आ रहा है। हीरा ने समझाया- नहीं भाई! खडे हो जाओ। 'मुझे मारेगा, तो मैं भी एक-दो को गिरा दूँगा। 'नहीं। हमारी जाति का यह धर्म नहीं है। मोती दिल में ऐंठकर रह गया। गया आ पहुँचा और दोनों को पकडकर ले चला। कुशल हुई कि उसने इस वक्त मारपीट न की, नहीं तो मोती भी पलट पडता। उसके तेवर देखकर गया और उसके सहायक समझ गए कि इस वक्त टाल जाना ही मसलहत है। आज दोनों के सामने फिर वही सूखा भूसा लाया गया। दोनों चुपचाप खडे रहे। घर के लोग भोजन करने लगे। उस वक्त छोटी-सी लडकी दो रोटियाँ लिए निकली, और दोनों के मुँह में देकर चली गई। उस एक रोटी से इनकी भूख तो क्या शांत होती, पर दोनों के हृदय को मानो भोजन मिल गया। यहाँ भी किसी सज्जन का बास है। लडकी भैरो की थी। उसकी माँ मर चुकी थी। सौतेली माँ मारती रहती थी, इसलिए इन बैलों से उसे एक प्रकार की आत्मीयता हो गई थी। दोनों दिनभर जोते जाते, डण्डे खाते, अडते। शाम को थान पर बाँध दिए जाते और रात को वही बालिका उन्हें दो रोटियाँ खिला जाती। प्रेम के इस प्रसाद की यह बरकत थी कि दो-दो गाल सूखा भूसा खाकर भी दोनों दुर्बल न होते थे, मगर दोनों की ऑंखों में, रोम-रोम में विद्रोह भरा हुआ था। एक दिन मोती ने मूक भाषा में कहा- अब तो नहीं सहा जाता हीरा! 'क्या करना चाहते हो? 'एकाध को सीगों पर उठाकर फेंक दूँगा। 'लेकिन जानते हो, वह प्यारी लडकी, जो हमें रोटियाँ खिलाती है, उसी की लडकी है, जो इस घर का मालिक है। यह बेचारी अनाथ न हो जाएगी? 'तो मालकिन को न फेंक दूँ। वही तो उस लडकी को मारती है। 'लेकिन औरत जात पर सींग चलाना मना है, यह भूले जाते हो। 'तुम तो किसी तरह निकलने ही नहीं देते। बताओ, तुडाकर भाग चलें। 'हाँ, यह मैं स्वीकार करता, लेकिन इतनी मोटी रस्सी टूटेगी कैसे? 'इसका उपाय है। पहले रस्सी को थोडा-सा चबा लो। फिर एक झटके में जाती है। रात को जब बालिका रोटियाँ खिलाकर चली गई, दोनों रस्सियाँ चबाने लगे, पर मोटी रस्सी मुँह में न आती थी। बेचारे बार-बार जोर लगाकर रह जाते थे। सहसा घर का द्वार खुला और वही बालिका निकली। दोनों सिर झुकाकर उसका हाथ चाटने लगे। दोनों की पूँछें खडी हो गईं। उसने उनके माथे सहलाए और बोली- खोले देती हूँ। चुपके से भाग जाओ, नहीं तो यहाँ लोग मार डालेंगे। आज घर में सलाह हो रही है कि इनकी नाकों में नाथ डाल दी जाएँ। उसने गराँव खोल दिया, पर दोनों चुपचाप खडे रहे। मोती ने अपनी भाषा में पूछा- अब चलते क्यों नहीं? हीरा ने कहा- चलें तो लेकिन कल इस अनाथ पर आफत आएगी। सब इसी पर संदेह करेंगे। सहसा बालिका चिल्लाई- दोनों फूफा वाले बैल भागे जा रहे हैं। ओ दादा! दोनों बैल भागे जा रहे हैं, जल्दी दौडो। गया हडबडाकर भीतर से निकला और बैलों को पकडने चला। वे दोनों भागे। गया ने पीछा किया। और भी तेज हुए। गया ने शोर मचाया। फिर गाँव के कुछ आदमियों को भी साथ लेने के लिए लौटा। दोनों मित्रों को भागने का मौका मिल गया। सीधे दौडते चले गए। यहाँ तक कि मार्ग का ज्ञान न रहा। जिस परिचित मार्ग से आए थे, उसका यहाँ पता न था। नए-नए गाँव मिलने लगे। तब दोनों एक खेत के किनारे खडे होकर सोचने लगे, अब क्या करना चाहिए? हीरा ने कहा- मालूम होता है, राह भूल गए। 'तुम भी बेतहाशा भागे। वहीं उसे मार गिराना था। 'उसे मार गिराते, तो दुनिया क्या कहती? वह अपना धर्म छोड दे, लेकिन हम अपना धर्म क्यों छोडें? ********

  • छुट्टी वाला रविवार कब आएगा

    वर्तमान युग की भागदौड़ वाली जिंदगी को जितना चाहे आसान बनाने की कोशिश कर ली जाए, परंतु फिर भी अपने हिस्से का वक्त यहां कोई इंसान निकाल ही नहीं पाता। जिस भी शख्स से बात करो, बस यही सुनने को मिलता है कि "यार, समय ही नहीं होता, पूरा दिन कुछ ना कुछ चलता ही रहता है। कहने का मतलब यह है कि आज के आधुनिक युग में प्रत्येक व्यक्ति की जिंदगी आपाधापी वाली और बहुत ही फास्ट हो गई है। किसी के पास किसी के लिए वक्त ही नहीं है। किसी और की तो बात छोड़ो यहां लोगों के पास आज खुद के लिए भी वक्त निकाल पाना लगभग असंभव सा होता जा रहा है। लोग जिंदगी तो जी रहे हैं परंतु मन से नहीं। अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए लोग आगे ही आगे बढ़ने की अंधाधुन दौड़ में इस कदर पागल होते जा रहे हैं कि उन्हें यह एहसास ही नहीं होता कि इस भागदौड़ और आगे बढ़ने की चाह में वे कितना कुछ खोते जा रहे हैं। यह सभी को पता होता है कि बीता समय कभी लौट कर वापस नहीं आता, फिर भी ना जाने क्यों हर इंसान समय को पीछे छोड़ने की जहदोजहद में लगा रहता है। कम समय में अधिक हासिल करने का जुनून आज हर इंसान के सिर पर सवार है। कम समय में अधिक पाने की लालसा ने ही आज हर व्यक्ति के जीवन की उमंगों और खुशियों पर जैसे ताला ही लगा दिया है। आज इंसान अपनी जरूरतों से अधिक कमा रहा है परंतु इतना होने के पश्चात भी वह सुखी नहीं है। कारण? कारण सिर्फ यही है कि इंसान किसी स्तर पर जाकर संतोष का अनुभव ही नहीं करता। वह दिन दुगुनी और रात चौगुनी उन्नति करने के स्थान पर दिन आठ गुणी और रात सौलह गुणी उन्नति करने के ख्वाब सजाता है। वैसे तो आपाधापी भरी दिनचर्या के महिला और पुरुष दोनों ही बराबर के शिकार देखे जाते हैं, परंतु आज मेरे इस लेख का मुख्य केंद्र महिलाएं हैं। बात यदि रविवार की छुट्टी की की जाए तो अधिकतर महिलाओं के हिस्से में रविवार कभी आता ही नहीं है, जिसे वे छुट्टी मानकर इंजॉय कर सकें। विशेष रूप से कामकाजी महिलाएं तो रविवार शब्द, जिसका उन्हें पूरे सप्ताह बेसब्री से इंतजार रहता है, का अर्थ ही भूल गई हैं, क्योंकि पूरे सप्ताह भागम भाग करने के पश्चात जब सप्ताह के अंत में रविवार आता है तो उनके पास जिम्मेदारियों और कामों की एक बड़ी मोटी गठरी पहले से ही बंध कर तैयार होती है जिसे वह शायद ही 1 दिन जिसे लोगों ने रविवार का नाम दिया है, को पूरा कर पाती है। इन कामों में; घर के बिखरे सामान को संभाल कर रखना, बच्चों के स्कूल कॉलेजों का पेंडिंग काम निपटवाना, घरवालों के लिए उनकी पसंद की अलग अलग डिशेज बनाना, रिश्तेदारों का आना जाना, बाजार जाकर पूरे सप्ताह के लिए राशन पानी और अन्य जरूरतों का सामान जुटाना आदि आदि। तो आखिर क्या करें एक नारी? जिसके हिस्से में पूरे साल में कोई ऐसा दिन नहीं आता जिसे वह अपने तरीके से इस्तेमाल कर खुद को हल्का और अच्छा महसूस करवा सके। इसका प्रत्यक्ष संबंध उसके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य से है। वह चाहते हुए भी अपने मन की नहीं कर पाती और हर वक्त अपने स्थान पर अपनों के ही हिसाब से जिंदगी जीना शुरु कर देती है। इसका परिणाम यह होता है कि वह स्वयं को जैसे भूल ही जाती है और इस वजह से उसका मानसिक विकास अवरुद्ध होने लगता है, वह समय से पहले स्वयं को वृद्ध मानने लगती है, उसके मन से उमंग और उत्साह का ह्रास होने लगता है, वह कम काम करने के बाद भी बहुत अधिक थकने लग जाती है। सारा समय भाग भागकर जिम्मेदारियों को निभाते निभाते फिर एक स्थिति ऐसी भी आती है, जब वह अंदर से चाहने लगती है कि काश!!! इस थका देने वाली दिनचर्या को छोड़कर कहीं दूर शांत अकेले एक टापू पर अपना बसेरा बना पाना संभव होता। यह स्थिति महिलाओं के लिए किसी भी प्रताड़ना और सजा से कम नहीं हो सकती। कोई भी महिला या पुरुष इस प्रकार की नकारात्मक स्थिति का शिकार ना होने पाए, इसलिए परिवार के सभी लोगों को मिलजुलकर परिवार की जिम्मेदारियों का बीड़ा उठाना होगा और महिलाओं के हिस्से का समय उन्हें हर हाल में देना ही होगा। माना कि पुरुष और स्त्री दोनों ही मिलजुलकर गृहस्थी को चलाते हैं, वे एक दूसरे के पूरक भी कहे जाते हैं, परंतु, हकीकत कुछ और ही होती है। अधिकतर घरों में आज भी घर बाहर की अधिकतर जिम्मेदारियों को निभाने का जिम्मा महिलाओं का ही होता है। एक दूसरे की परवाह करते हुए पुरुषों और महिलाओं को घर की जिम्मेदारियों में एक दूसरे का हाथ बंटाना चाहिए और एक दूसरे के स्वास्थ्य और खुशियों को सर्वोपरि रखते हुए ही परिवार रूपी संस्था का विकास करना चाहिए। स्मरण रहे, एक खुशहाल परिवार सच्चे मायनों में तभी खुशहाल कहला सकता है जब उस घर की नींव अर्थात उस घर की महिलाएं स्वस्थ हों, प्रसन्न हों। महिलाएं चाहे कामकाजी हों अथवा गृहणियां, दोनों को ही सप्ताह में 1 दिन उनकी मनमर्जी के मुताबिक बिताने की छूट दी जानी चाहिए ताकि उस 1 दिन में वे स्वयं के लिए जिएं और अपने जीवन से जोश उमंग और उत्साह को कभी खत्म ना होने दें। **********

  • जीवन एक संघर्ष

    एक बार एक किसान परमात्मा से बड़ा नाराज हो गया। कभी बाढ़ आ जाये, कभी सूखा पड़ जाए, कभी धूप बहुत तेज हो जाए तो कभी ओले पड़ जाये। हर बार कुछ ना कुछ कारण से उसकी फसल थोड़ी ख़राब हो जाये। एक दिन बड़ा तंग आ कर उसने परमात्मा से कहा, देखिये प्रभु, आप परमात्मा हैं, लेकिन लगता है आपको खेती बाड़ी की ज्यादा जानकारी नहीं है, एक प्रार्थना है कि एक साल मुझे मौका दीजिये, जैसा मैं चाहू वैसा मौसम हो, फिर आप देखना मैं कैसे अन्न के भण्डार भर दूंगा। परमात्मा मुस्कुराये और कहा ठीक है, जैसा तुम कहोगे वैसा ही मौसम दूंगा, मैं दखल नहीं करूँगा। किसान ने गेहूं की फ़सल बोई, जब धूप चाही, तब धूप मिली, जब पानी तब पानी। तेज धूप, ओले, बाढ़, आंधी तो उसने आने ही नहीं दी, समय के साथ फसल बढ़ी और किसान की ख़ुशी भी, क्योंकि ऐसी फसल तो आज तक नहीं हुई थी। किसान ने मन ही मन सोचा अब पता चलेगा परमात्मा को, कि फ़सल कैसे करते हैं, बेकार ही इतने बरस हम किसानो को परेशान करते रहे। फ़सल काटने का समय भी आया, किसान बड़े गर्व से फ़सल काटने गया, लेकिन जैसे ही फसल काटने लगा एकदम से छाती पर हाथ रख कर बैठ गया। गेहूं की एक भी बाली के अन्दर गेहूं नहीं था, सारी बालियाँ अन्दर से खाली थी, बड़ा दुखी होकर उसने परमात्मा से कहा, प्रभु ये क्या हुआ? तब परमात्मा बोले, “ये तो होना ही था, तुमने पौधों को संघर्ष का ज़रा सा भी मौका नहीं दिया। ना तेज धूप में उनको तपने दिया, ना आंधी ओलों से जूझने दिया, उनको किसी प्रकार की चुनौती का अहसास जरा भी नहीं होने दिया, इसीलिए सब पौधे खोखले रह गए, जब आंधी आती है, तेज बारिश होती है ओले गिरते हैं तब पौधा अपने बल से ही खड़ा रहता है, वो अपना अस्तित्व बचाने का संघर्ष करता है और इस संघर्ष से जो बल पैदा होता है वो ही उसे शक्ति देता है, उर्जा देता है, उसकी जीवटता को उभारता है। सोने को भी कुंदन बनने के लिए आग में तपने, हथौड़ी से पिटने, गलने जैसी चुनोतियो से गुजरना पड़ता है तभी उसकी स्वर्णिम आभा उभरती है, उसे अनमोल बनाती है।”उसी तरह जिंदगी में भी अगर संघर्ष ना हो, चुनौती ना हो तो आदमी खोखला ही रह जाता है, उसके अन्दर कोई गुण नहीं आ पाता। ये चुनौतियाँ ही हैं जो आदमी रूपी तलवार को धार देती हैं, उसे सशक्त और प्रखर बनाती हैं, अगर प्रतिभाशाली बनना है तो चुनौतियाँ तो स्वीकार करनी ही पड़ेंगी, अन्यथा हम खोखले ही रह जायेंगे। अगर जिंदगी में प्रखर बनना है, प्रतिभाशाली बनना है, तो संघर्ष और चुनौतियों का सामना तो करना ही पड़ेगा। *********

  • अतिथि सत्कार

    एक जंगल के निकट एक महात्मा रहते थे। वे बड़े अतिथि भक्त थे। नित्यप्रति जो भी पथिक उनकी कुटिया के सामने से गुजरता था, उसे रोककर भोजन दिया करते थे और आदरपूर्वक उसकी सेवा किया करते थे। एक दिन किसी पथिक की प्रतीक्षा करते-करते उन्हें शाम हो गई, पर कोई राही न निकला। उस दिन नियम टूट जाने की आशंका में, वे बड़े व्याकुल हो रहे थे कि उन्होंने देखा, एक सौ साल का बूढ़ा, थका-हारा चला आ रहा है। महात्मा जी ने उसे रोककर हाथ-पैर धुलाए और भोजन परोसा। बूढ़ा बिना भगवान का भोग लगाए और बिना धन्यवाद दिए, तत्काल भोजन पर जुट गया। यह सब देख महात्मा को आश्चर्य हुआ और बूढ़े से इस बात की शंका की। बूढ़े ने कहा- "मैं न तो किसी ईश्वर को मानता हूँ, न किसी देवता को।" महात्मा जी उत्सुकतापूर्ण बात सुनकर बड़े क्रुद्ध हुए और उसके सामने से भोजन का थाल खींच लिया तथा बिना यह सोचे कि रात में वह इस जंगल में कहाँ जाएगा, कुटी से बाहर कर दिया। बूढ़ा अपनी लकड़ी टेकता हुआ एक ओर चला गया। रात में महात्मा जी को स्वप्न हुआ, भगवान कह रहे थे- "साधु उस बूढ़े के साथ किए तुम्हारे व्यवहार ने अतिथि सत्कार का सारा पुण्य क्षीण कर दिया।" महात्मा ने कहा- "प्रभु! उसे तो मैंने इसलिए निकाला कि उसने आपका अपमान किया था।" प्रभु बोले- "ठीक है, वह मेरा नित्य अपमान करता है तो भी मैंने उसे सौ साल तक सहा, किंतु तुम एक दिन भी न सह सके।" भगवान अंतर्धान हो गए और महात्मा जी की भी आँखें खुल गई। ********

  • साइबर प्रेम और अपराध

    बारहवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद प्रगति ने अपने घर से दूर महानगर दिल्ली में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने की इच्छा ज़ाहिर की। वह अपने माँ-बाप की अकेली सन्तान थी। बाहर के माहौल खुद पुत्री प्रेम के वसुभूत होकर उसके माता-पिता उसे इजाज़त नहीं दे रहे थे। अंततः बेटी की ज़िद के आगे मान गए लेकिन कमरे लेने के बजाय हॉस्टल दिलाने का निश्चय किया। प्रगति अपने पिता के साथ दिल्ली आयी और फिर बड़ी कोचिंग संस्था में दाखिला लिया और तैयारी शुरू कर दी। पढ़ने में वह होनहार थी और स्वभाव से बहुत सरल थी। उसकी बोली बहुत मृदु थी जैसे किसी कोयल की सुरीली आवाज कानों में पड़ रही हो। प्रगति रोज़ कोचिंग जाती और पूरे मन से वहां पढ़ती और फिर अपने कमरे में वापस आने पर भी पढ़ती। प्रगति एक छोटे से कस्बे से पहली बार महानगर में आई थी और यहां की आदतों, हरकतों से अपरिचित थी। यहां तो लड़कियों के पुरुष मित्र होते थे जिनके साथ सब कोचिंग छोड़ कर घूमने और फिल्में देखने जाते थे। प्रगति को ये सब लत तो नहीं लगी थी लेकिन यहां जबसे आयी थी तो सोशल नेटवर्किंग साइट का जरूर चस्का लग गया था। वह अलग-अलग तस्वीरें लेती जिन्हें वहां बहुत पसंद किया जाता और तारीफें मिलती। एक दिन रात में प्रगति उसी साइट पर व्यस्त थी तभी उसे एक सन्देश किसी लड़के का प्राप्त हुआ। प्रगति ने भी जवाब दिया। फिर उस लड़के ने प्रगति से साधरणतया बात शुरू की। प्रगति भी सभी संदेशों के जवाब दे रही थी। जैसे क्या करती, कहाँ रहती, पसन्द, नापसंद इत्यादि। इसी तरह रोज़ रात में प्रगति उससे बातें करती रहती और अब दोनों में अच्छी दोस्ती भी हो गयी थी। लड़का भी प्रगति की काफी तारीफें करता और अपने साथ सहजरूप से रखता जिससे प्रगति को यह बात बहुत अच्छी लगती वह बिना किसी डर और संकोच कर उससे बात करती थी। धीरे-धीरे दोनों की दोस्ती बढ़ती गयी। इसी बीच प्रगति की पढ़ाई भी बाधित हुई और कई टेस्ट में उसके नंबर कम आये। लेकिन प्रगति को खास असर नहीं पड़ा और वह इन साइट का ज्यादा प्रयोग करने लगी और उस लड़के से बातें भी ज्यादा होने लगी। कुछ महीनों बाद लड़के ने प्रगति को अपनी महिला मित्र या गर्ल फ्रेंड बनने का प्रस्ताव दिया जिसपर प्रगति ने कहा वो सोच कर बताएगी। चूंकि इतने दिनों में वह उससे बातें करके काफ़ी सहज और घुल मिल गयी थी और उसे पसन्द करती थी तब उसने हां कर दी। दोनों में अब बाते फोन पर भी होने लगी और इधर प्रगति की पढ़ाई और ज्यादा बिगड़ने लगी। हालांकि इसी बीच प्रगति दो बार घर भी गयी जिससे भी प्रभाव पड़ा। घर पर भी उसकी माता ने उसको डाँट लगाई की आज कल वह फ़ोन पर ज्यादा रहती और लोगों के बीच कम। उन्होंने कहा भी कि वहां शहर में किसी का रोक-टोक नहीं तब पढ़ाई करती या फ़ोन चलाती लेकिन तब प्रगति ने उनको समझा कर मामला शांत कर लिया। इधर प्रगति और उस साइट वाले लड़के के बीच बातों का सिलसिला भी बढ़ता गया। लड़का दूसरे शहर का था इसीलिए दोनों मिल नहीं पाए बाकी बाते सुचारू रूप से चलती रही। धीरे-धीरे प्रगति ज्यादा ही प्रेम में गिरती गयी और लड़के ने उससे निजी बातें और जवानी की कई अनकही चीज़े या अमूनन कहे तो प्रेम वार्ता करने लगे। एक दिन लड़के ने प्रगति से कहा, "मैं तुमसे अगर कुछ मांगू तो तुम गुस्सा तो नहीं करोगी?” प्रगति ने कहा," नहीं बिल्कुल नहीं। ऐसा क्या मांग रहे?" लड़के ने शरारत से भरा साइट में उपस्थित एक चित्र भेजा। जो चेहरे के शरारत भरे भाव को दर्शाता था। लड़के ने उससे उसकी निजी तस्वीरें यानी आपत्तिजनक तस्वीरें माँगी। प्रगति ने साफ़ मना कर दिया। फिर लड़के के द्वारा बहुत मनाने पर उसने वो तस्वीरे साझा कर दी। समय बीतता गया और प्रगति और उसका प्रेम अब कई मर्यादाओं को पार कर चुका था। वह बस मिले नहीं थे बाकी बातें सारी कर चुके कि जिन्हें दो प्रेमी करते होगें। आपस में आपत्तिजनक तस्वीरें, वीडियो कॉल आदि सामान्य हो गया। प्रगति को शायद नहीं अंदाज़ा भी नहीं था कि वह सही कर रही या गलत। वह किस लिए घर से इतना दूर आयी है। इसी बीच एक प्रतियोगी परीक्षा हुई जिसमें प्रगति ने बहुत कम अंक आये। उसको घर से भी यह हिदायत मिली अगर वह इस बार पास नहीं होती तो उसे वापस घर बुला कर शादी कर दी जायेगी। प्रगति अब पढ़ाई पर फिर से ध्यान लगाने लगी और उसने उस लड़के को समझाया कि बातें थोड़ी अब कम करेंगे और ये सब जो भी हो रहा है बंद करना है क्योंकि इससे उसका ध्यान बंट जाता है। वह लड़का लेकिन मान नही रहा था। प्रगति ने उसको साफ-साफ कह दिया कि अगर मेरी बातों को नहीं मानोगे तो हमारी बात हमेशा के लिए बंद हो जाएगी क्योंकि मुझे अपनी गलती का अहसास है। मैं रिश्ता नहीं तोड़ रही बस समय मांग रही। वह लड़का बिल्कुल तैयार नहीं था आखिर में प्रगति ने उससे रिश्ता तोड़ना उचित समझा। अभी इन सब बातों को मुश्किल से 10 दिन बीते थे कि उस लड़के का फिर फ़ोन आया। उसने प्रगति से फिर बात करने को कहा लेकिन प्रगति ने साफ मना कर दिया। फिर एक दिन उसने प्रगति को कुछ फ़ोटो और वीडियो भेजें जिसे देखकर प्रगति की आँखे फटी रह गयी। आखिर क्यों न हो? वह वही सारी तस्वीरें प्रगति की आपत्तिजनक और निजी थी। प्रगति ने कहा तुम तो सारी तस्वीरे मिटा दिया करते थे ये कैसे आ गई। उसने प्रगति से कहा, “मुझसे अगर तुमने रिश्ता तोड़ दिया तो मैं यह सारी वीडियो और फोटो सार्वजनिक कर दूँगा और तुम्हे बदनाम कर दूंगा।" प्रगति इतना सुनकर दंग रह गयी मानो पैर तले जमीन खिसक गई हो। उसने मिन्नतें करते हुए ऐसा न करने की बात कही लेकिन वह लड़का बिल्कुल तैयार नहीं था। धीरे धीरे प्रगति यही सोच कर डर और अवसाद में डूब गई और बीमार हो गयी जिससे बहुत कमज़ोर भी हो गई। उसके पिता उसको घर ले गए और डॉक्टर को दिखाया लेकिन कुछ फायदा न हुआ आख़िर मन की पीड़ा कोई क्या जान पाए? अब उसे सारी सीखें और अपनी गलती का अहसास हो रहा था लेकिन उसे समझ नहीं आ रहा था वह क्या करे? उधर वो लड़का हर रोज़ इसे धमकाता और वही तस्वीरें सार्वजनिक करने की बात कहता। कुछ दिन बाद प्रगति का स्वास्थ्य गिरता गया और उसके माता पिता के लाख पूछने पर भी उसने कुछ न बताया । एक दिन उसने हिम्मत करके सारी बातें अपनी माँ को बताई जिसे सुनकर वह भी चिंता में पड़ गयी लेकिन कहते हैं बच्चों पर तकलीफ़ हो तो अबला भी काली का रौद्र रूप धारण कर लेती। उन्होंने कहा ,"बेटी! तुम बिल्कुल चिंता न करो। मैं बताती हूं उस लड़के को।" अगले दिन सुबह वह प्रगति को लेकर महिला सुरक्षा कार्यालय गयीं औऱ फिर उनकी सलाह पर साइबर क्राइम के तहत उस लड़के पर लड़की को धमकाने, मानसिक रूप से परेशान करने, और कई धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज कराया। कुछ दिन बाद वह लड़का पकड़ा गया और उससे पुछ्ताछ हुई तब पता चला वह कई लड़कियों की इसी तरह धमका कर उनसे सम्बंध स्थापित करता और पैसे भी लूट लेता था। उन्हें इसी से डरा कर उनके साथ शारीरिक सम्बंध स्थापित करता था। उसे उसके गुनाहों की सजा मिली और प्रगति को इंसाफ। प्रगति ने हिम्मत दिखाई और हौसला भर कर सामना किया और मां बाप से बातें बताई। आज कल के इस डिजिटल युग मे ऐसे नक्कालों और दरिंदो से सावधान रहें। किसी के साथ ऐसे न करें। आपकी सुरक्षा आपके ही हाथों में है। सोशल साइट ओर ऐसे गिरोह और लोग है जो अपनी हवस का शिकार और पैसों की लूट पाट करते है। कृपया डिजिटल मोहब्बत के चक्कर में ऐसा काम न करें। *****************

  • नतीज़ा

    घर की इकलौती बहू होने के कारण सलोनी को घर के सभी सदस्य बहुत मानते थे और उसकी हर फरमाइश को पूरा भी करते थे। उसकी हर छोटी-बड़ी जरूरत को उसके कहने से पहले ही पूरा कर दिया जाता था। घर के हर फैसले में उसी की राय ली जाती थी और उसके हर फैसले का दिल से स्वागत भी किया जाता था। पढ़ी लिखी होने के साथ-साथ सलोनी रूपवती भी थी, इस बात का सलोनी को घमंड भी था। घर के सभी सदस्य उसके चारों तरफ घूमते रहते थे, सलोनी इस बात का नाजायज फायदा उठाने से कभी नहीं चूकती थी। परंतु, घर वालों को कभी यह एहसास ही नहीं हुआ कि सलोनी के मन में इस प्रकार के भाव भी हैं। वे तो केवल सलोनी के बारे में अच्छा ही सोचते थे। पुत्र शाश्वत के जन्म के पश्चात तो सलोनी के भाव और भी ऊंचे हो गए और अब वह घर में किसी को कुछ नहीं समझती थी, परंतु फिर भी ससुराल वाले उसे सिर माथे पर बिठाते और उसकी हर इच्छा पूरी करते थे। धीरे-धीरे शाश्वत बड़ा होने लगा और उसके भीतर भी मां के गुण दिखाई देने लगे। घर का इकलौता बच्चा और साथ ही साथ अकेला वारिस होने के कारण शाश्वत बहुत जिद्दी हो गया था। उसके दादा-दादी उसे अच्छा और एक बेहतरीन इंसान बनाने की हर संभव कोशिश करते थे और कभी-कभी जानबूझकर उसकी जिद पूरी नहीं करते थे क्योंकि वे चाहते थे कि शाश्वत जीवन की हकीकत का सामना करना सीखें और चुनौतियों से घबराए नहीं। परंतु, सलोनी को यह बात बहुत अखरती थी और वह सब से छुपकर शाश्वत की सभी गलत सही मांगे पूरी करती थी, जिसका परिणाम यह हुआ कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ शाश्वत कई गलत आदतों का शिकार हो गया। पुत्र की ममता में अंधी सलोनी उसकी उन आदतों से अनभिज्ञ थी। समय बीतने के साथ-साथ अब शाश्वत की संगत कुछ गलत लोगों के साथ हो गई और वह कुछ असामाजिक कार्यों में भी संलिप्त हो गया। उसके इन कामों की जानकारी घरवालों को उस वक्त मिली जब घर में पुलिस आई और शाश्वत के बारे में पूछताछ करने लगी। घर के सभी सदस्य अवाक रह गए। सलोनी के पैरों तले तो मानों जैसे जमीन ही खिसक गई। पुलिस ने बताया कि शाश्वत दूसरे शहर में चोरी करके भागा है, यह सुनकर सलोनी को चक्कर आ गया और वह गिर पड़ी। घर वालों ने उसे जैसे-तैसे संभाला। होश आने पर सलोनी ने शाश्वत से पूछा कि घर में सब कुछ होने के बावजूद आखिर उसे चोरी करने की आवश्यकता पड़ी ही क्यों। उसका जवाब सुनकर सलोनी स्तब्ध रह गई। शाश्वत ने जवाब दिया कि घर में सबसे पैसे मांग-मांग कर वह थक चुका था और वह अब जिंदगी को अपने दम पर जीना चाहता था। उसने घर वालों के सामने खुलासा किया कि वह रोज-रोज घर में किसी के सामने हाथ फैलाना सही नहीं समझता था इसलिए उसने कम समय में अधिक पाने की लालसा की वजह से अपने कुछ नामी गिरामी दोस्तों के साथ चोरी करना शुरू किया। अब तक सलोनी को समझ आ चुका था कि बच्चे की हर सही गलत ज़िद को पूरा करने का नतीजा इस हद तक खतरनाक भी हो सकता है। **********

  • वाणी, चरित्र का प्रतिबिंब है।

    व्यक्ति स्वच्छ, साफ वस्त्र धारण करता है, आकर्षक जूते-चप्पल पहनता है, आधुनिक व बड़ी गाड़ी का उपयोग करता है, विशाल, सुंदर भवन का निर्माण करता है। यह सब व्यक्ति अपने संगी-साथियों को आकर्षित करने और उनपर अपना प्रभाव छोड़ने के लिए ही करता है। ऐसे मोहक पहनावे से दूसरा व्यक्ति आकर्षित हो सकता है। इस आकर्षण को स्थाई बनाए रखने के लिए व्यक्ति के आंतरिक गुणों की सुंदरता का भी अत्यधिक महत्व हो जाता है। इन आंतरिक गुणों में प्रथम है, मधुर वाणी। बाहरी साज सज्जा होने के बाद यदि वाणी मधुर नहीं, तो व्यक्ति का आकर्षण चिरस्थाई न हो पाएगा। वाणी ही मनुष्य के चरित्र का वास्तविक प्रतिबिंब होती है। व्यक्ति के बोले गए शब्दों व उसके द्वारा किए गए कृत्यों का वास्तविक विश्लेषण व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व का दर्पण बन जाता है। व्यक्ति जब दूसरों के लिए अपशब्दों का प्रयोग करता है, तो इन शब्दों से वह स्वयं अपने उद्देश्य से भ्रमित होकर अपनी विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा को भी नुकसान पहुंचाता है। विशुद्ध सात्विक विचारों को प्रिय एवं मधुर शब्दों में व्यक्त कर मनुष्य दूसरों पर अत्यंत गहन प्रभाव छोड़ जाता है। कहा जाता है कि मधुर वाणी व प्रिय शब्दावली का प्रयोग कर व्यक्ति शत्रु को भी परास्त कर सकता है। यह गुण ही मनुष्य की इंद्रियों का दैवीय आभूषण है। अप्रिय व कटु वचनों का प्रयोग ही मनुष्य के कर्मों का निर्धारण भी करता है। मधुर वचनों के प्रयोग से मनुष्य सद्गति को प्राप्त कर सकता है। अतः मधुर वचनों के प्रयोग को एक साधना के तौर पर अपने जीवन में उतार लिया जाना चाहिए और यह निश्चित कर लेना चाहिए कि सदा सर्वदा मीठी बात ही बोलूंगा, कम बोलूंगा, और सब कुछ मधुरता की मिश्री से युक्त करके ही बोलूंगा। कड़वी बातों से जो भयंकर प्रभाव पड़ता है, वह सर्वविदित है। किसी से कटु, अप्रिय, अभद्र शब्द न बोलिए, अपनों से छोटों, नौकरों, बालको यहां तक कि जानवरों तक को अपशब्द द्वारा न पुकारिये। यदि अपशब्दों के प्रयोग से होने वाले प्रभाव की वैज्ञानिकता पर विचार किया जाए, तो हम पाते हैं कि मनुष्य द्वारा बोले गए अपशब्द, उस मनुष्य के आस-पास ही अपशब्दों का एक विद्युत चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न कर देते हैं। वह मनुष्य स्वयं उस विद्युत चुंबकीय क्षेत्र के केंद्र में स्थित होता है। अतः इन विद्युत चुंबकीय तरंगों के कुप्रभाव का सर्वाधिक असर बोले गए व्यक्ति के ऊपर ही पड़ता है। अपशब्दों के लगातार प्रयोग से विद्युत चुंबकीय तरंगों का घेरा घना होता चला जाता है। परिणाम स्वरुप उसका प्रभाव भी तीव्रतम हो जाता है। अंततः मनुष्य इन तरंगों के प्रभाव से अपने चरित्र व गरिमा की बलि देकर अशिष्ट और दुराचारी व्यक्ति के रूप में समाज में स्थापित हो जाता है। मधुर वचन सुनकर किसका ह्रदय प्रसन्न नहीं हो जाता। संसार की प्रत्येक वस्तु प्रेम से प्रभावित होती है। मनुष्य अपनी भावनाओं का अधिकांश प्रदर्शन वचनों द्वारा ही करता है। बालक की मीठी-मीठी बातें सुनकर बड़े-बड़े विद्वानों तक हृदय खिल उठता है। तभी कहा गया है कि मधुर वचन मीठी औषधि के समान लगते हैं। तो कड़वे वचन तीर के समान चुभते हैं। शिशु से लेकर वृद्ध तक संपूर्ण जगत मीठे वचनों को ही सर्वाधिक पसंद करते हैं। मधुर वचनों से मनुष्य तो क्या देवता भी प्रसन्न हो जाते हैं। मीठे का प्रभाव अत्यंत तीव्र व दूरगामी होता है। यही कारण है कि भोजन में मीठे की प्रबलता होती है। मधुर भाषण जैसी मिठास भला कहां प्राप्त की जा सकती है। स्वयं रहीम दास जी ने भी अपने मुख से कहा है कि कागा काको धन हरे, कोयल काको देय। मीठे वचन सुनाय कर, जग अपना कर लेय।। अर्थात न तो कौवे ने हमारी कोई संपत्ति हड़प ली है और न ही कोयल ने हमें कोई विशेष संपत्ति दे दी है। यह तो केवल उन दोनों की वाणी का प्रभाव है, कि कोयल को हम कितने ध्यान से सुनते हैं, जबकि कौवे को देखते ही दुत्कार देते हैं। रिचर्ड कार्लसन ने कहा, "जब हम किसी अन्य व्यक्ति की आलोचना करते हैं या उस व्यक्ति के लिए अपशब्दों का प्रयोग करते हैं, तो ऐसे शब्दों का कुप्रभाव, अमुक व्यक्ति के स्थान पर स्वयं के ऊपर ही अधिक पड़ता है।" जो कि वैज्ञानिकता के आधार पर भी उचित प्रतीत होता है। एक अन्य विचारक के अनुसार, “प्रिय भाषण में वशीकरण की महान शक्ति होती है। इससे पराए भी अपने हो जाते हैं। सर्वत्र मित्र ही मित्र दृष्टिगोचर होते हैं। मधुर भाषण एक दैवीय वरदान है। शास्त्रों में इसे सर्व शिरोमणि कहा जाता है।” माधुर्य रस से ओतप्रोत, सत्य, हितकर व प्रिय भाषण एक सिद्धि के रूप में कार्य करता है। यह आत्म-संयम, स्वार्थ-त्याग एवं प्रेम भावना से ही उत्पन्न हो सकता है। जिस व्यक्ति के मन, वचन व कर्मों में दूसरों के प्रति मधुर भाव है, उसे ही इस वशीकरण विद्या का पूर्ण ज्ञाता माना जा सकता है। ऐसे व्यक्ति के हाथ में जड़ से लेकर चेतन तक सभी को वश में कर लेने की सिद्धि प्राप्त हो जाती है। डेल कार्नेगी के अनुसार, “कोई भी मूर्ख आलोचना, निंदा और अपशब्दों का प्रयोग कर, शिकायत कर सकता है, लेकिन माधुर्य, प्रेम व आत्मसंयम से ओतप्रोत वाणी का प्रयोग एक सशक्त, आचरणवान व धर्मवीर मनुष्य ही कर सकता है।” जो व्यक्ति मधुर वचन नहीं बोलते वह अपनी वाणी का दुरुपयोग करते हैं। ऐसे व्यक्ति संसार में अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा को खो बैठते हैं। तथा अपने जीवन को कष्टकारी बना लेते हैं। कड़वे वचन से उनके बनते काम बिगड़ जाते हैं तथा वे प्रतिपल अपनी विरोधी शक्तियों को जन्म देते रहते हैं। उन्हें सांसारिक जीवन में सदा अकेलापन झेलना पड़ता है। तथा मुसीबत के समय लोग उन से मुंह फेर लेते हैं। मधुर वचन बोलने वाले व्यक्ति सबको सुख शांति देते हैं। सभी ऐसे लोगों का साथ पसंद करते हैं। इससे समाज में पारस्परिक सौहार्द की भावना का संचार करने में मदद मिलती है। सामाजिक मान प्रतिष्ठा और श्रद्धा का आधार स्तंभ वाणी ही है। अपनी वाणी का प्रयोग हम जिस प्रकार करते हैं हमें वैसा ही फल मिलता है। हम अपने वचनों से अपनी सफलता के द्वार खोल सकते हैं या असफलता को निमंत्रण दे सकते हैं। मधुर बोलिए और उसके मीठे फल आपको मिलेंगे। मधुर भाषण करने वाले की जिव्हा पर साक्षात सिद्धियां निवास करती है। यह दैवीय संपत्ति का लक्षण है। शास्त्रकारों का मत है कि “सत्य बोलो और मधुर बोलो। कटु सत्य कभी मत बोलो।“ यह भी परम सत्य है कि मधुर वाणी निंदा, छिद्रान्वेषण, परदोषदर्शन, आलोचना, खरी-खोटी, नीचता, ईर्ष्या इत्यादि से बहुत दूर रहती है। इसका प्रमुख उद्देश्य दूसरों के सद्गुणों, उच्च भावनाओं, सदविचारों को प्रकट करना है। मधुर वाणी से आयु में भी वृद्धि होती है। सभी प्राणियों का यह मानवोचित कर्तव्य है, कि दूसरे की भावनाओं का आदर करें। ऐसा करने से मनुष्य के मनुष्य से गहन गंभीर भाव परक व मधुर संबंध बनते हैं। कहां भी जाता है कि हम जैसे व्यवहार की आशा दूसरों से अपने लिए करते हैं, हमें स्वयं भी दूसरों से वैसा ही व्यवहार करना चाहिए। तभी कहा गया है ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय।। मनुष्य जितना ही प्रिय भाषण का उच्चारण एवं श्रवण करेगा, उतना ही शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करेगा। इसके विपरीत खोटे वचन, खोटे सिक्कों के समान कार्य करते हैं। वह आप जिसको भी देंगे, वह आपको सूद समेत लौटा देगा। अतः मीठी वाणी में ही आनंद और माधुर्य है। ********

  • टैरो कार्ड

    एक अधेड़ सम्भ्रांत घर की महिला थाने में सुबकते हुए कह रही थी, ‘‘सर जी उसने मुझे होटल में बुलाया, फिर धोखे से, मेरी इज्जत तार-तार कर दी। दरोगा-यह तो बहुत ही गलत हुआ, आप के साथ मैडम जी!..फिर मैडम की ओर गौर से देखते हुए, अरे! मेम लग रहा, मैंने आप को कहीं देखा है। उस महिला के साथ आए कुछ परिचितों में से एक बोला-कमाल करते हैं साहब जी! आप को पता नहीं? अरे! यह मैडम जी टैरो कार्ड से लोगों का भविष्य बताती हैं। अखबारों-पत्रिकाओं में इनके रेगुलर कालम छपते हैं। कई चैनलों से इनके प्रोग्राम आते हैं। दरोगा, मैडम जी की ओर हिकारत से देखते हुए-अरे! वाह ये तो बड़ी अच्छी बात है। फिर आप मैडम जी, उस होटल में करने क्या गईं थीं। मैडम बोले, उस पहले ही मैडम का चमचा ही बोल पड़ा-दरअसल उस आदमी ने मैडम से, अपने करोबार के, भविष्य के बारे में जानने के लिए बुलाया था। ‘‘उस नामुराद निगोड़े ने होटल के कमरे में मुझे अकेले बुलाया ...मैडम फिर से सिसकने लगीं..फिर उसने जबरदस्ती मेरे साथ..अब मैडम का रूदन उनकी व्यथा-कथा बयां कर रहा था।..मुझे उस कमीने ने कहीं का न छोड़ा। उँ उँ उँ.. ऽऽऽ.. दरोगा मैडम की शिकायत दर्ज करने लगा। तब तक वहाँ मीडिया कर्मी भी सूँघते-सूँघते आ गये। क्या हुआ? क्या हुआ? सवाल-दर-सवाल दरोगा पर दागने लगे? तब दरोगा झल्लाकर, मैडम की ओर उँगली उठाकर बोला-मेरे से क्या पूछते हो? इन मैडम जी से पूछो-जो सब का भविष्य टैरो कार्ड से बताती हैं। पूछो, एक धोखेबाज ने धोखे से इनके चरित्र का, भविष्य कैसे खराब कर दिया? अब वहाँ चख-चख थी। तमाम सुलगते सवाल, मैडम और उनके समर्थकों के कलेजे झुलसा रहे थे। मैडम की बैग में पड़े टैरो कार्ड अट्टहास करते हुए कह रहे थे- दूसरों का भविष्य टैरो कार्ड से बताने वालों के भविष्य खबर की आज खबरनवीस ले रहे हैं। *******

  • रूसेड़ी बीनणी

    जब कभी कुछ भी न चल रहा होता है, तब बहुत कुछ मौन होकर घटा करता है। हर घटनाओं का अंत दुखांत हो यह जरूरी नहीं। अचानक आँख खुली...! अरे! रात के ढाई बज गये। एकल स्लीपर सीट पर सोया-सोया गूलल मैप पर देखा जोधपुर आ गया क्या? कंडेक्टर ने आवाज दी......पावटा, राई का बाग, जोधपुर वाले आ जाओं। तुरंत नीचे उतर गया सीट से। और बस से नीचे आ गया। 13 दिन पहले आया था तो पता था रास्ते का। राई बाग बस स्टेण्ड पर आ गया। और वहाँ कुर्सियों पर घोड़े बेच कर तो क्या थे ही नहीं बेचने को, लेकिन सो गया। 5 बजे उठा। 30 रूपयें देकर सुलभ शौचालय में तरोताजा होकर आया। वापस घर लौटने की टिकट बनवाई। जेब में रूपये 40 बचे थे। तो एटीएम से रूपये निकाल कर टिकट बनवाई। थोड़ी देर बाद.....! जिसका इंतजार था बार-बार फोन चेक कर रहा था। वही हुआ...! कभी-कभी चिंताओं के घेरें में जकड़ा आदमी भी बहुत खुश होता है क्योंकि वहाँ कोई प्रतिशोध या विषाद नहीं होता इसलिए कुछ चिंताओं का परिणाम सुखदायी होता है। पहुँच गये क्या गुड़िया के पापा...! तबीयत तो ठीक है न आपकी, गले में आराम आया थोड़ा बहुत। आराम से जाकर वापस आ जाओं....! हाँ! पहुँच गया। रात ढाई बजे उतर गया था। तबीयत ठीक है। तुम कैसी हो! दवा ले रही हो न! भूल तो नहीं रहीं न लेना। ना ओ! खाना जल्दी खाना सीख लो। तेरी आदत है देर से खाना खाने की। हूँ खास्यूँ। पेट में बेबी लात मारसी तेर्र बी न भूख लाग सी जणा।फेर्र मन्न बोल्ल सी थारों बेबी मेर्र लात मार्र। (वो मैसेज टाईप कर रही थी......) मैं बार-बार उस मैसेज को पढ़ रहा था। जो सिर्फ मैसेज भर न था। सुबह उठते ही पूछना अपने पति से 'आप कैसे है?' गुड़िया के पापा!..... जाकर वापस आ जाओं! कितनी भावुक होगी जब उसने ऐसा कहा....! जाकर वापस आ जाओं.....! इंतज़ार करती बैचेन आँखें, हृदय में एक सूनापन पति के पास न होने पर! क्या समझ सकेगा पुरूष अपनी पत्नी के हृदय के मर्म को या शब्दों के छल में ही बेवकूफ बनाता रहेगा हमेशा। मेरी पत्नी सबसे अच्छी है, और नहीं तो कम से कम मुझसे तो अच्छी है इसमें कोई संशय है। (इतने में मैसेज आया) 'मैं थार सूँ कोनी बोलूँ, मैं रूसेड़ी हूँ।' क्या! कल की रूसी हुई है तू! हाँ! थार्र के फर्क पड़्ड़ है! क्यूँ रूसी तो,मन्न तो बेरो कोनी क्यूँ रूसी तू। बता न के बात होई,प्लीज! मेरी सयाणी प्यारी सी बावली है न। बता न! ओ गुड़िया की मम्मा! थार के फर्क पड़े है? मन्न मनाया भी कोनी....! क्या हुआ होगा! मैंने क्या कहा ऐसा! कुछ समझ में नहीं आ रहा। वो रूठी है पर क्यों! क्या हृदय की कोमलता पर मैंने कोई आघात किया या मेरे किसी व्यवहार से,बात से कोई चोट पड़ी दिल को। फ्लैशबैक में जाकर सोचता हूँ तो कुछ याद नहीं आ रहा। पत्नी कहाँ बेवजह रूठी होगी,कुछ तो है जिसका मुझे आभास ही नहीं, पर मूर्खों को कहाँ कुछ याद रहता है वो तो बकते रहते है बस। कोई बीज वाक्य कहाँ उनके पास होते है। ऐ गुड़िया की मम्मा! मान जा न। मेरी प्यारी पत्नी है न, सॉरी! बस! रहने दो। आपको पता नहीं तो सॉरी क्यों बोल रहे है। तू सच में नाराज है। हाँ! उसने प्यार का संदेश भेजा गुड़िया के पापा को। ओ! मतलब तुम मुझसे प्यार नहीं करती गुड़िया के पापा को प्यार करती हो। हाँ! गुड़िया के पापा को करती हूँ प्यार! आपसे नहीं। चोखो जणा रह तू रूसेड़ी! मैं कर ही स्यूँ प्यार! मैं कोनी रूस्यों तू रूसी है। वो खुश हो गई। चूमने वाला ईमोजी भेजी। हूँ! अब मन्न बेरो पड़गो तू रूसेड़ी कोनी,बस! मजा ले है मेरा! ना! सच में रूठी हूँ। ठीक है जणा मैं सर(उसके जीजाजी) ने फोन कर कह दे स्यूँ ' म्हाली बावली तो रूसगी' कुण मन्ना कर्यो थान्न। अभी करो! ना! न कर सकूँ जणा तू बोल्ल कह दो। कह दो कोई कोनी मन्ना करें। (मैंने मुँह फुलाया झूठमूठ। पर उसको नहीं पता) दीदी कन्न मेरा फोन नं. है। ना! मेरे पास तो है। मैं दीदी को फोन कर कह देस्यूँ, छोटी दीदी के मोबाइल नम्बर है पास। मैं कह दूँगा। फिर ले दीदी चिड़ायेगी रोज तुमको। हूँ! कह दो।(उसको पता है मेरे पास नम्बर नहीं है।) ओ रूसेड़ी बीनणी! मान भी जा। वरना मैं कहानी लिख दूँगा। 'रूसेणी बीनणी' छपवा भी दूँगा। लिख दो! छपा दो! मैं सेमिनार में शोधपत्र पढ़ते समय बोल दूँगा मेरी बावली रूसरी है। हूँ! कह दियों। मन्न कोई कोनी जाण्ण। ऊई! ये तो है। गुड़िया की मम्मा मान जा न। अब थे जाओं। सेमिनार अच्छे से अटेंड करना। मूड ऑफ मत करो। मैं ठीक हूँ। ओ रूसेड़ी बीनणी। रूसरी भी है और बोल्ल भी है। कितनी प्यारी हो रूप तुम। मेरी रूप मुझे बहुत प्रिय है। बस! बस! मसको मत लगाओं। ठीक है। गुड़िया के पापा मैं अब काम करूँगी। सेमिनार की अच्छे से तैयारी कर लो। नाश्ता तो कर लिया न। मैं सोचने लग गया। पत्नी का संसार पति के संसार से बिल्कुल विपरीत होता है। पत्नी रूठी हो फिर भी अपने पति, बच्चें, सास-ससुर घर भर की जिम्मेदारी निभाती है भले हीं आँखों की कोर में आँसुओं का सागर लहराता हो, उसका आँचल हमेशा से प्रेम से भीगा रहता है। पुरूष कितना निष्ठुर और कर्कश होता दो मीठे बोल भी नहीं बोल सकता। सुधरना पड़ेगा मुझे तो! पर सुधारूँ क्या समझ नहीं आ रहा। उदासी तो नहीं पर मन में अजनबीपन स्वयं के प्रति अवश्य उभर आया। उदास मेरी बावली होने नहीं देती।भले। उदासी झलकने से पहले ही प्रेम का लेप लगा देती है और मुझे पता भी नहीं चलता उनकी मन की दशा का। औढ़ लेती है प्रेम की चादर और छुपा लेती है वो मर्म जिनसे पुरूष का व्यक्तित्व तिरोहित हो जाता है किन्तु स्त्री देवी की पदवी तक पहुँच जाती है। मन में कितना कुछ चल पड़ा। पत्नी रूठी है फिर भी चिंता है उसे अपने जीवन को छोड़ सबकी। मैं उसे जब-जब बावली कहता हूँ वो खुशी से झूम उठती है। परिन्दें की भाँति आकाश में उड़ना चाहती है। मैं कहता हूँ तुम बहुत मीठी हो तो बोलती है मैं तो तीखी हूँ सब यही समझते है। मैं कहता हूँ मीठा मीठे का स्वाद कैसे जाने। तो बोलती है, थे ही हो मीठा मैं तो तीखी हूँ। तुम बहुत प्यारी हूँ रूप! जिन्होंने तुमको कुछ न समझा,मैंने उसको कुछ न समझा। वो खुश हो जाती है वो चाहती मेरा एकनिष्ठ अनन्य समर्पित प्रेम। वो जानती है सीधी-साधी प्रेम की भाषा,निश्छलता बच्चों सी, चहती है चिड़िया-सी सारे दिन। मेरे घर संसार जीवन को महकाया करती है। जब वो रूसेड़ी बीनणी होती है तब पता नहीं लगने देती वो रूसी हुई है वो जिस दिन ज्यादा प्रेम प्रकट करती तब पता लगता है वो रूसी हुई है। संसार भर के पुरूष स्त्री को अपने-अपने नजरियें से देखते है और उसी के अनुकूल उसे ढालते है, स्त्री के नजरियें से पुरूष का ढलना ही पुरूषार्थ का सबसे बड़ा धर्म है। *******

  • पर्यावरण प्रदूषण एक चिंतनीय विषय

    "अरे सुरभि क्या हुआ कल से तुम मुंह फुला कर क्यों बैठी हो, कुछ तो बताओ। देखो, इतने सुंदर चेहरे पर उदासी बिल्कुल नहीं फबती, तुम तो हंसती खिलखिलाती हुई ही अच्छी लगती हो। सुबह से शाम तक तुम्हारी बक-बक सुनकर ही दिल को चैन आता है या यूं कहो कि तुम्हारी आवाज जिस दिन ना सुनूं, उस दिन मेरा दिन ही अच्छा नहीं जाता", सोमेश ने सुरभि को प्रेमपूर्वक छेड़ते हुए कहा। सोमेश की इस बात के जवाब में सुरभि मुंह बनाने लगी। "जाओ सोमेश,ज्यादा बातें न बनाओ, मुझे तुमसे कोई बात नहीं करनी, एक तो इतना बड़ा कॉन्ट्रैक्ट तुमने यूं ही हाथों से जाने दिया, इतना बड़ा नुकसान हुआ है हमें, क्या तुम्हें इस बात का अंदाजा नहीं। वैसे तो दुनिया भर में एक सफल व्यापारी होने का तमगा लिए फिरते हो, पर इतना सुनहरा अवसर तुमने जानबूझकर गंवा दिया। जाओ मुझे तुमसे कोई बात ही नहीं करनी, कहते हुए सुरभि ने सोमेश का हाथ दूसरी तरफ झटक दिया। सोमेश ने सुरभि को प्यार से समझाया, "देखो सुरभि, तुम्हारी बात बिलकुल ठीक है। मैं मानता हूं कि यह कॉन्ट्रैक्ट ना लेने से हमारा बहुत बड़ा नुकसान हुआ है, परंतु क्या यह सच नहीं है कि हमारे इस नुकसान के सामने पर्यावरण को होने वाला नुकसान बहुत बड़ा होता जिसकी भरपाई हमारे साथ-साथ हमारी आगे आने वाली पीढ़ियों तक को भी करनी पड़ती। यदि मैं यह कॉन्ट्रैक्ट ले लेता तो एक बार फिर न जाने ना कितने ही पेड़ कटते और खेती योग्य भूमि को उद्योग में तब्दील करने के लिए एक बार फिर धरती माता का शोषण होता, एक बार फिर प्रकृति चीत्कार उठती। पर्यावरण और प्रकृति का वह करूणा भरा रूदन स्वर मैं नहीं सुन पाता और मेरे मन में सदा-सदा के लिए एक टीस और पश्चाताप रह जाता कि मैं अपने पर्यावरण को प्रदूषित होने से नहीं बचा पाया, अपितु मैंने तो जानबूझकर प्रकृति को प्रदूषित करने में अपना योगदान दिया है।" प्रकृति के प्रति सोमेश का अगाध प्रेम और चिंता देखकर सुरभि की आंखों में आंसू आ गए। अब उसे अपने पति पर अति गर्व महसूस हो रहा था। सोमेश की पीठ थपथपाते हुए सुरभि ने जो कहा वह नितांत सराहनीय है। सुरभि के शब्द थे, "उमेश, आज मुझे तुम पर बहुत ज्यादा गर्व महसूस हो रहा है। आज के आधुनिक युग में जहां पैसा कमाने की दौड़ में हर इंसान अंधा हो चला है और अपने इस अंधेपन में उसे यह भी नजर नहीं आता कि तरक्की और प्रगति हासिल करने की होड़ में वह अपने ही पर्यावरण को दूषित कर रहा है, अपनी ही प्रकृति की सुंदरता को खराब कर रहा है, वहां तुम हर संभव प्रयास कर रहे हो कि पर्यावरण और प्रकृति संरक्षित रहे इसे थोड़ा सा भी नुकसान ना पहुंचे।" "आज के समय में जहां लोग इंसानों तक के बारे में नहीं सोचते, वहां तुमने प्रकृति के बारे में सोचा और इतना अच्छा सोचा, यह देख कर आज मैं फूली नहीं समा रही हूं। अब मैं तुमसे बिल्कुल नाराज नहीं हूं, अपितु मैं स्वयं भी प्रण लेती हूं कि आज के बाद मैं प्रकृति के संरक्षण और पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने के लिए हर संभव प्रयास करूंगी। मैं न तो स्वयं ऐसा कोई कार्य करूंगी जिससे प्रदूषण फैले और न ही किसी अन्य को ही ऐसा कोई कार्य करने दूंगी।" ******

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