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  • तर्पण

    महेश कुमार केशरी विवेक की मौत ठंड लगने की वजह से हो गयी थी। दाह -संस्कार से घर लौटकर आते हुए भी तन्मय ने एक बार वही सवाल अपने दादा गोपी बाबू के सामने दोहराया था। जिसे बार - बार गोपी बाबू टाल जाना चाह रहा थें। वो कैसे जबाब देते? अभी तो वे, अपने इकलौते बेटे की मौत के सदमे से उबर भी नहीं पाये थें। अपने बेटे की लाश को कँधा देना हर बाप के लिये दुनिया का सबसे मुश्किल काम होता है। गोपी बाबू के कँठ भींगने लगते हैं। जब कोई विवेक की बात करता है। करीब सप्ताह भर पहले भी घर की सफाई के वक्त उसने वही सवाल दुहराया था - "दादा, आप घर की सफाई क्यों करवा रहें हैं? उस दिन भी आप लोगों ने पापा के मरने के बाद पूरे घर को धुलवाया था। पंडित जी से पूछा , तो उन्होंने कहा कि मरने के बाद मरे हुए आदमी के कारण घर अपवित्र हो जाता है। इसलिये हम घर की साफ- सफाई करते हैं। उसे धोते हैं।" पूरे घर में चारों तरफ पेंट की गंध फैली हुई थी। तन्मय के कार चलाते हुए हाथ अचानक से तब रूक गये। जब उसने गोपी बाबू को अपना सिर मुँड़वाते हुए देखा। हैरत से ताकते हुए उसने अपने दादा गोपी बाबू से पूछा - "दादा आप सिर क्यों मुँड़वा रहें हैं?" गोपी बाबू पीढ़े पर अधबैठे और झुके हुए ही बोले - "बेटा, ऐसे ही।" "ऐसे ही कोई काम नहीं होता बताईये ना?" तन्मय जिद करते हुए बोला। इस बार गोपी बाबू बेबस हो गये। फिर वे बोले - "बेटा जब हमारा कोई अपना गुजर जाता है। तो उसको हम अपनी सबसे प्यारी चीज अर्पित कर देते हैं। ये हमारा उस व्यक्ति के प्रति हमारी निष्ठा का सूचक होता है। हमारे यहाँ के संस्कार में इसे तर्पण कहते हैं। इस मामले में हमारे बाल हमारी सबसे प्यारी चीजों में से एक होते हैं। इसलिये हम अपने बाल मुँडवाकर अपने पूर्वजों से उऋण होते हैं।उनको सम्मान देते हैं। उनसे ये वादा भी करतें हैं , कि उसके मरने के बाद उसके बचे हुए कामों को हम पूरा करेंगें। बालों का मुँडन उस मृतक व्यक्ति के प्रति हमारा शोक भी होता है।" तन्मय ने गोपी बाबू से फिर पूछा - "कैसा शोक दादा? एक तरफ हम छुआ- छूत और बीमारियों के डर से अपना बाल मुँडवा लेते हैं और, शोक का नाम देते हैं। ये हमारा आडंबर नहीं है तो क्या है? पापा के मरने के बाद हम अपने घर को धुलवा रहे हैं। उस पर पुताई करवा रहें हैं। जैसे, पापा मरने के बाद हमारे लिये अछूत हो गयें हों। जीते जी उन्होंने इस घर के लियेऔर हमारे लिये कितना कुछ किया। मैनें एक बार कहा। और वो मेरे लिये लैपटॉप ले आये। मम्मी के लिये स्कूटी खरीदी। ये घर बनाया। सारी ज़िंदगी मेहनत करते रहे। और मरने के बाद हमारे लिये अछूत हो गये। कितने मतलबी हैं, हम लोग! जहाँ उन्हे लिटाया गया उस जगह को पानी से धोया गया। घर के ऊपर चूना, वर्निश पेंट - पुचारा हो रहा है। आपके - हमारे बालों का तर्पण हो रहा है। छि: कितनी खराब है ये दुनिया!" तन्मय के चेहरे पर हिकारत के भाव उभर आये थें। गोपी बाबू का कँठ अपने पोते की बातें सुनकर रूँधने लगा था। वो सच ही तो कह रहा था। ***********

  • बेकरार दिल

    प्रेम नारायण बहुत गंवाया मैंने तेरी बेखुदी से कभी शोहरत मिली तो कभी बदनामी मिली सिर्फ तेरी नाकामी से हमने न कभी चाहा था तेरी दुनियां से जुदा होना मगर क्या करूं आप तो खफा थे मेरी नादानी से हाल अब बद से बदतर हुआ जा रहा है तुझसे दिल लगाने से नुकसान ही हुआ मेरी नादानी से गैरों से धोखा खाए तो हम संभल गए मगर दोस्ती कर दुश्मनी क्यूं ये न समझ सके अपनी खामी से चाहें तो ठुकरा दें मर्ज़ी है आपकी मगर कब तक ज़ुल्म जमा होगा अब हम न करेंगे शिकवा तुम्हीं से बगावत का इल्म हममें नहीं क्या पता था वो दौर भी आएगा जब सामना होगा इक दूजे की नाकामी से *******

  • बरखा ऋतु

    प्रदीप श्रीवास्तव बरसे बरखा सुहानी रे.... आई ऋतुओं की रानी रे..... सावन के महीने में, झूलों की कहानी रे...... बरसे बरखा............ जब नील गगंन में , काले काले मेघा छाये रे । मोती बनकर ये बूँदे , निर्झर धरती पे बरसाये । मिलकर गाये गीत सुहाने रे ।। बरसे बरखा........... निर्मल जल गिरता पानी, मोती चॉदी सा चमके पानी । मस्त अल्हड़ चले पवन पुरवाई , पेड़ो शाख़ो पे जवानी छाई । सब दिलों पे मस्ती छाई रे ।। बरसे बरखा.............. ताल पोखर कुंआ तलैया रे , खेतों में होवन लगी बुआई रे । खेतों मेडों पे बैठी नवतरुणाई , गीत सुहावन गाये रे । मोर मोरनी संग नाचे रे ।। बरसे बरखा............... *********

  • बंधन

    सम्पदा ठाकुर मैं बांध नहीं रही तुम्हें किसी बंधन में ना करवा रही तुमसे कोई करार बेफिक्र रहो तुम हो आजाद पर मुझे मत रोको यार जिस बंधन में बंध चुकी हूं मैं नहीं हो सकती उससे आजाद मैं नहीं कहती तुमसे तुम हर पल करो मुझसे बात पर जब मेरा दिल करे तब सुना दिया करो अपनी आवाज बस एक झलक दिखला दिया करो जब करना चाहे दिल तेरा दीदार मुझे पता है मेरी खुशी के लिए मेरा दिल रखने के लिए कर लेते हो मुझसे बात मगर कहीं ना कहीं मेरे दिल में है एक आस खुद पर और मुझे मेरे रब पर हमको है पूरा विश्वास एक ना एक दिन तुम भी इस बंधन को मानोगे यार तुम भी करोगे हमसे प्यार जिस तरह मैं हर पल महसूस करती हूं तुमको तुमको भी होगा मेरा एहसास बस उस पल का है इंतजार। *******

  • सीखना सतत प्रक्रिया है।

    पिंकी सिंघल कहा जाता है कि जब सीखने की प्रक्रिया बंद हो जाती है उसी पल से हमारा विकास होना भी अवरुद्ध होने लगता है हमारे आगे बढ़ने के अवसर उसी क्षण समाप्त हो जाते हैं। ऐसे में एक सीमा तक हमने जितना कुछ सीखा, जाना उसी के सहारे हमें आगे का जीवन जीना होता है। जिस पल हमारे मन में यह बात घर कर जाती है कि अब हम सब कुछ सीख चुके हैं और आगे कुछ सीखने की हमें कोई आवश्यकता नहीं रह गई है, तो समझ लीजिए उससे अधिक दुर्भाग्य की बात हमारे लिए दूसरी कोई हो ही नहीं सकती। सीखने सिखाने की प्रक्रिया जीवन पर्यंत चलती रहती है हम हर पल हर क्षण कुछ नया सीखते हैं। अपने जीवन में मिलने वाले हर शख्स से हमें कुछ ना कुछ सीखने को मिलता है। सीखने का कोई अंत होता ही नहीं है। जैसे ही हमें यह महसूस होने लगता है कि अब हमें जीवन का काफी अनुभव हो गया है और दुनियादारी की समझ हमारे भीतर आ गई है उसी क्षण हमें कुछ ऐसा नया ज्ञान, नया अनुभव, नई सीख मिलती है जिसके बाद हममें फिर से कुछ नया सीखने की उत्सुकता जागृत होने लगती है और हम सीखने की उसी दिशा में खींचे चले जाते हैं। जब तक हम उस नए ज्ञान को ग्रहण नहीं कर लेते और नवीन चीजों को सीख समझ नहीं लेते, तब तक हमें सब्र नहीं आता और हम बेचैन रहते हैं। वस्तुत: यही बेचैनी ही तो हमें नित नया सीखने के लिए प्रेरित करती है। ज्ञान पिपासु होने की प्रवृत्ति प्रति क्षण प्रबल होती जाती है जिसके शांत होने पर ही हमें सुकून का अहसास होता है। अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर सीखना है क्या और कैसे बेहतर तरीके से सीखा जा सकता है? मेरे हिसाब से जीवन में सब कुछ औपचारिक तरीके से ही नहीं सीखा जाता अपितु अप्रत्यक्ष एवम अनौपचारिक माध्यमों से भी व्यक्ति काफी कुछ सीख जाता है। कभी-कभी हम दूसरों को कुछ करते देख स्वत: ही कुछ नया सीख जाते हैं। यह भी आवश्यक नहीं है कि कुछ नया सिखाने वाला हमसे उम्र में बड़ा ही हो। हम सभी अपने दैनिक जीवन में इस प्रकार का अनुभव करती हैं कि कभी-कभी हम छोटे छोटे बच्चों से भी बड़ी-बड़ी, गहरी और नवीन बातें सीख जाते हैं। बच्चों द्वारा कभी-कभी हमें ऐसी सीख दे दी जाती है जिसे देख हम खुद अचंभित रह जाते हैं। इसलिए सीखने सिखाने का आयु से कोई खास संबंध नहीं होता। दूसरी बात, केवल दूसरों की आकांक्षाओं और आशाओं पर खरा उतरने के लिए ही ना सीखे सिखाएं अपितु अपनी क्षमताओं, कैपेसिटी और पेसे के हिसाब से ही सीखें और आगे बढ़ने का प्रयास करें। अपनी उत्सुकता को कभी ठंडा ना पड़ने दें क्योंकि उत्सुकताओं में आया हुआ उबाल ही हमें एक बेहतर इंसान बनने में मदद करता है। तीसरी बात, सीखने सिखाने की कोई निश्चित उम्र नहीं होती यदि कोई कहे कि एक निश्चित आयु तक ही व्यक्ति कुछ सीख सकता है तो यह सर्वथा गलत माना जाएगा। जैसा कि मैंने ऊपर भी कहा कि यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो तमाम उम्र चलती रहती है। जाने अनजाने में भी हम दूसरे लोगों से बहुत कुछ सीख जाते हैं जिसे अंग्रेजी में इनडायरेक्ट लर्निंग का नाम दिया जाता है। किताबी ज्ञान कभी भी उस ज्ञान का होड़ नहीं कर सकता जो ज्ञान व्यक्ति खुद कुछ सही गलत करके और अपने आसपास के वातावरण और अनुभवों से प्राप्त करते हैं। सीखने से तात्पर्य केवल किसी चीज को समझना ही नहीं है अपितु उस समझ और ज्ञान को अपने दैनिक जीवन में प्रयोग में लाना भी होता है। असली मायनों में सीख तभी कारगर मानी जाती है जब उस सीख से प्राप्त समझ और ज्ञान को हम अपने जीवन में अपनाते हैं और अपने जीवन को पहले से अधिक बेहतर बनाने का यथासंभव प्रयास करते हैं। सीखने सिखाने की प्रक्रिया तो जीव जंतुओं में भी देखी गई है। एक छोटी सी चींटी भी दूसरी चीटियों को पंक्ति बद्ध हो कर चलता देखती है तो स्वत: ही पंक्ति में चलना प्रारंभ कर देती है। उस चींटी को ऐसा करने के लिए किसी ने नहीं बोला अपितु यह ज्ञान यह सीख उसे दूसरों को देखकर मिला, जिसे उसने अपने जीवन में अपनाया। कहने का तात्पर्य यह है कि जीवन में प्राप्त ज्ञान और नई चीजों को सीखने का वास्तविक लाभ हमें तभी प्राप्त हो सकता है जब हम उसे अपने दैनिक जीवन में प्रयोग में लाएं अपने ज्ञान से दूसरों को भी लाभान्वित करें और मिलजुलकर एक सभ्य और पहले से कहीं अधिक विकसित समाज का नव निर्माण करने में अपना योगदान दें। *************

  • इस नदी की धार में...

    दुष्यंत कुमार इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है, नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है। एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों, इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है। एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी, आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है। एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी, यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है। निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी, पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है। दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर, और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है। ********

  • दुर्घटना

    महेश कुमार केशरी गाड़ी स्टेशन पर रूकी, और मैं हडबड़ाते हुए स्टेशन के बाहर निकलकर अपने गंतव्य की ओर जाने के लिये मुड़ा। तभी स्टेशन के बाहर किसी आटो वाले का एक्सीडेंट हो गया था। भीड़ में से कोई उसे अस्पताल तक ले जाने के लिये तैयार नहीं था। लोग पुलिस केस के डर से उस युवक को हाथ नहीं लगा रहे थें। भीड़ को चीरता हुआ जब मैं वहाँ पहुँचा तो वो युवक वहाँ पड़ा कराह रहा था। बाहर से घुटने छिले हुए दिख रहे थें। दु:ख की पीड़ा उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी। आनन-फानन में मैनें एक आटो वाले को रुकवाया। और उस युवक को जिसको काफी गंभीर चोट आई थी, उठाकर लोगों की मदद से शाँति-निकेतन अस्पताल की तरफ भागा। इस घटना में मुझे एक चीज बड़ी अजीब लग रही थी, पता नहीं क्यों मुझे लग रहा था कि मैं इस युवक को जानता हूँ। इस युवक को कहीं देखा है। लेकिन, कहाँ देखा है। ये याद नहीं आ रहा था। चूँकि उसकी हालत अभी काफी गंभीर थी। इसलिये उससे कुछ पूछना सरासर मुझे बेवकूफी ही लग रहा था। अस्पताल पहुँचकर सबसे पहले मैनें उसे अस्पताल में भर्ती करवाया। दो- दिनों तक उस युवक को होश नहीं आया था। दो दिनों तक लगातार मैं शाँति - निकेतन अस्पताल में ही रहा। तीसरे दिन उसको होश आया। जब उसको होश आया तो मैनें पूछा - "कैसा लग रहा है तुम्हें? क्या तुम अब ठीक हो?" युवक कुछ बोला नहीं। केवल मन- ही - मन मुस्कुरा रहा था। "मैं पिछले दो- दिनों से तुमसे एक बात पूछना चाह रहा था। क्या हम इससे पहले भी कभी मिले हैं?" उसने "हाँ" में सिर हिलाया। फिर बोला - "आप कोई दस-एक साल पहले मुझसे मिले थें। उस समय मैं दसवीं में पढ़ता था। उस समय आपको ट्रेन पकड़नी थी। मेरे बोर्ड़ के एक्जाम चल रहें थें। लेकिन, मेरे पास फार्म भरने तक के पैसे भी नहीं थें। ये बात मैनें ऐसे ही आपको आटो में बताई थी। तब ये जानकर आप आटो से उतरते वक्त पाँच सौ रूपये का एक नोट मुझे देते गये थें । मैं मना करता रहा। लेकिन, आप नहीं माने थें। जल्दीबाजी में आप पैसे पकड़ाकर चले गये थें। आपने उस वक्त मेरा नाम भी पूछा था। मैं वही सुनील हूँ।" अचानक मुझे भी दस साल पहले की वो घटना याद आ गई। अरे, तुम तो बहुत बड़े हो गये हो। घर में सब कैसे हैं? अब तो तुम्हारी मूछें भी निकल आयी हैं। सुनील कोई प्रतिक्रिया ना देकर सीधे मेरे पैरों पर गिर पड़ा। उसकी आँखों में आँसू थें। वो कह रहा था। आप जरूर कोई फरिश्ते हैं। जब भी आते हैं। मेरी मदद करने के लिये ही आते हैं। आप ना होते तो मैं मर ही गया होता। मैनें उसे गले लगाते हुए कहा। मैं सिर्फ एक इंसान हूँ। फरिश्ता-वरिश्ता कुछ भी नहीं हूँ। आखिर, आदमी ही आदमी के काम आता है। पैसे होने पर हर इंसान को एक - दूसरे की मदद करनी चाहिये। **************

  • एक शिष्य का सफरनामा

    वर्ष 2013-14 में मेरी फेशबुक पर एक मित्रता निवेदन आया, मेंने देखा नाम था सपना सोनी।मित्रता निवेदन स्वीकार ने के बाद निरंतर साहित्य संबंधित चर्चाएँ होती रहीं।उस वक्त वह अपनी मानसिक रोग से पीड़ित बेटी के दुख से बेहद आहत थीं, उनका दिल करता था कि बेटी के साथ दिल खोल कर उससे बात करे उस पर अपना ममत्व लुटाए, पर ला इलाज बीमारी के चलते वह चाह कर भी अपनी बेटी के साथ अपनी भावनाओं को साझा नहीं कर पातीं थीं। सपना सोनी को अपनी बेटी से जो कुछ कहने की इच्छा होती थी, उन भावनाओं को वह कविता के रूप में अपनी डायरी में सजोती जा रहीं थीं।उनमें से कुछ दिल को छूले ने बाली रचनाओं में से किसी एक रचना को कभी कभार अपनी फेशबुक की टाइमलाइन पर भी पोस्ट करती रहतीं थीं।यह बात अलग है कि अब वह बिटिया रानी इस दुनिया में नहीं रही। वार्तालाप के दौरान एक दिन उन्होंने कविता परिमार्जन हेतु आग्रह किया जिसे मेंने सहर्ष स्वीकारते हुए अपनी क्षमतानुसार उनकी रचनाओं को परिमार्जित करता रहा। इसी दौरान मेरे परम मित्र दिल्ली के मसहूर शायर आदरणीय मंगल नसीम जी उनके समपर्क में आए और उन्होंने सपना सोनी को एक बेटी की तरह ग़जल की विधवत शिक्षादी।साथ ही सपना सोनी की शुरीली आवाज में कविता पाठ करते देख उनको मंचों पर कविता पाठ करने के अवसर मुहैया कराए। उसके बाद सपना सोनी हर रोज कविता के नए नए सोपान लिखती गईं और मंचों से ले कर तमाम टी.वी चैनलों पर कविता पाठ करती नजर आईं।उन्होंने तमाम अवसरों पर मुझ से गुरुशिष्या के कर्तव्यों के निर्वहन हेतु रूबरू मुलाकात करने के प्रयास किये, किन्तु ऐसा कोई अवसर नहीं मिला कि रूबरू मिल सकें । संयोग से एक बार मसहूर कवि/लेखक आदरणीय साहित्य मनीषी ज्ञान पीठ पुरस्कार से सम्मानित श्रद्धेय प्रो. नामवर सिंहजी द्वारा स्थापित नारायणी साहित्य अकादमी के तत्वावधान में आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलन हेतु मैं अहमदाबाद से दिल्ली की यात्रा पर था। संयोग से उस दिन 27- जुलाई 2018 गुरु पूर्णिमा थी। मैं जिस रेलगाड़ी में था वह सुबह करीब 9:00 बजे राजस्थान के दौसा स्टेशन पर पहुंची। राजस्थान की चर्चित और सुप्रसिद्ध कवियत्री सपना सोनी जी अपने जीवन साथी मनोज कुमार सोनी के साथ सुबह से मेरी रेलगाड़ी के पहुचने की प्रतीक्षा करती दौसा स्टेशन पर मिलीं। उन्होंने शाल, नारियल, वस्त्र और स्वरचित पुस्तक "मनकाझरना" देकर फूल हार से अकिंचन को गुरु की उपाधि से सम्मानित किया जोकि, मेरे साहित्य लेखन के लिए सबसे बड़ी उपाधि थी। यसस्वीभव: का आशीर्वाद देकर मैं पुनः अपनी रेलगाड़ी में जा बैठा। चूँकि उस स्टेशन पर उस रेलगाड़ी के रुकने का कुल समय 5 मिनट ही था। आज वही सपना सोनी तमाम टी.वी. चैनलों पर कविता पाठ करते हुए मसहूर कवि / लेखक और सोनी सब पर प्रख्यात टी.वी. धारावाहिक तारक मेहता का उलटा चसमा में तारक मेहता के अभिनय में नजर आने बाले आदरणीय शैलेन्द्र लोढाजी द्वारा संचालित शेमारू टी. वी. चैनल पर धारावाहिक वाह भाई वाह कार्यक्रम तक के सफरना मे की कुछ यादें आप सबके साथ साझा करते हुए गौरव महसूस कर रहा हूँ। साथ ही कामना करता हूँ कि सपना सोनी साहित्य के हर रोज नए आयामों को छुएँ। इसी शुभाषीश के साथ आप सब को मेरा सादर नमन। ********

  • दो रुपए

    कस्बे के किनारे तंग गलियों की एक बस्ती। छोटे-छोटे कमरे के मकान, कोठरी, नंगी ईटों पर डगमगाती टीन की चादरें, कच्ची मिट्टी की दीवारें, फूंस के छप्पर का घूंघट ओढ़े आंधी तूफान, बरसात, धूप, लालची नजरों से अपने अस्तित्व को बचाने की कोशिश में बहुत थकी सी पर खड़ी है। सूर्यास्त के बाद अंधेरे में डूब जाती यह बस्ती। बस मिट्टी के तेल की ठिवरी, लालटेन, बरसात में कड़कती बिजली से ही दिखाई देती है। कई पीढ़ी की यही जीवन शैली। कोठरी के दरवाजे पर एक फटा मैला पर्दा, बैठने उठने को एक चरमराई चारपाई, पानी का घड़ा उस पर एक गिलास। गृहस्ती के नाम पर एक लोहे का संदूक, पीछे खुली जगह में मिट्टी का चूल्हा, पिचके काले पड़ चुके अल्मुनियम के चंद बर्तन। ईटों पर सजी घर की परचून, दाल, चावल, आटा, मसाले के टेढ़े मेढ़े डिब्बे। एक दो जोड़ी खूंटी पर टंगी धोती, ब्लाउज, पेटीकोट, अंगोछा। सजने सवरने के लिए आले में रखी लालता, सुरमेदानी, बिंदी, नाखूनी, दांत की मिस्सी, गुलाबी रंग, कुछ नकली गहने बुंदे, झुमकी, चेन, कमरबंद, पायल। एक और चीज जो जरूरी वह आइना हर घर में होता है। बस्ती में एक कुआं जो उन सब का एक क्लब है। हर सुबह, शाम, दोपहर मिलजुल कर सुख-दुख, हंसी मजाक की साझेदारी, आपस में गम हल्का करने का एक ही स्थान। रात के अंधेरे में एक ही आवाज तैरती और गूंजती है। मसलती कलियों का क्रंदन, युवती की सिसकियां प्रोडा की फुसफुसाहट, गाली गलौज, दूध पीते बच्चों का रोना और मर्द की बेशर्म, बहसी क्रूरतम हंसी के ठहाके, चौखट पर वृद्धा की खांसी की ठन ठन। दिन की उदासी शाम होते ही चहल-पहल में बदल जाती है। लाला गिरधारी लाल दुकान बंद कर नए कुर्ता धोती में इत्र की फुलौरी लगाए पान चबाते गली में घुसते हैं। लाइन से कमरों के दरवाजों का पर्दा हटता है और एक मंडी सज जाती है। लालाजी पूरी गली पर एक नजर डालते हैं और फिर एक दरवाजे पर ठहर जाते हैं। पूछते हैं क्या भाव है? पेट की आग होठों पर एक नकली हंसी में बदल जाती है और शर्माती हुई एक आवाज बोली बस दो रुपए। लालाजी बोले मेरे दादाजी तो अठन्नी दे देते थे। साहब महंगाई कितनी बढ़ गई है। और वह हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींच लेती है। टूटे दरवाजे की सांकल बंद हो जाती है। चौखट पर बैठी बूढ़ी काकी की खांसी और तेज हो जाती है। मनुष्य की सभ्यता का सबसे पुराना व्यापार। देह मंडी। एक अंधेरा संसार खरीद-फरोख्त बस दो रुपए। *******

  • लस्सी का कुल्हड़

    एक दूकान पर लस्सी का ऑर्डर देकर हम सब दोस्त- आराम से बैठकर एक दूसरे की खिंचाई और हंसी-मजाक में लगे ही थे कि, लगभग 70-75 साल की बुजुर्ग स्त्री पैसे मांगते हुए हमारे सामने हाथ फैलाकर खड़ी हो गई। उनकी कमर झुकी हुई थी, चेहरे की झुर्रियों में भूख तैर रही थी। नेत्र भीतर को धंसे हुए किन्तु सजल थे। उनको देखकर मन में न जाने क्या आया कि मैंने जेब में सिक्के निकालने के लिए डाला हुआ हाथ वापस खींचते हुए उनसे पूछ लिया: दादी लस्सी पियोगी? मेरी इस बात पर दादी कम अचंभित हुईं और मेरे मित्र अधिक क्योंकि अगर मैं उनको पैसे देता तो बस 5 या 10 रुपए ही देता लेकिन लस्सी तो 40 रुपए की एक है। इसलिए लस्सी पिलाने से मेरे गरीब हो जाने की और उस बूढ़ी दादी के द्वारा मुझे ठग कर अमीर हो जाने की संभावना बहुत अधिक बढ़ गई थी। दादी ने सकुचाते हुए हामी भरी और अपने पास जो मांग कर जमा किए हुए 6-7 रुपए थे, वो अपने कांपते हाथों से मेरी ओर बढ़ाए। मुझे कुछ समझ नहीं आया तो मैने उनसे पूछा, ये किस लिए? इनको मिलाकर मेरी लस्सी के पैसे चुका देना बाबूजी। भावुक तो मैं उनको देखकर ही हो गया था। रही बची कसर उनकी इस बात ने पूरी कर दी। एकाएक मेरी आंखें छलछला आईं और भरभराए हुए गले से मैने दुकान वाले से एक लस्सी बढ़ाने को कहा। उन्होने अपने पैसे वापस मुट्ठी मे बंद कर लिए और पास ही जमीन पर बैठ गई। अब मुझे अपनी लाचारी का अनुभव हुआ क्योंकि मैं वहां पर मौजूद दुकानदार, अपने दोस्तों और कई अन्य ग्राहकों की वजह से उनको कुर्सी पर बैठने के लिए नहीं कह सका। डर था कि कहीं कोई टोक ना दे। कहीं किसी को एक भीख मांगने वाली बूढ़ी महिला के उनके बराबर में बिठाए जाने पर आपत्ति न हो जाये। लेकिन वो कुर्सी जिस पर मैं बैठा था, मुझे काट रही थी। लस्सी कुल्लड़ों में भरकर हम सब मित्रों और बूढ़ी दादी के हाथों मे आते ही मैं अपना कुल्लड़ पकड़कर दादी के पास ही जमीन पर बैठ गया क्योंकि ऐसा करने के लिए तो मैं स्वतंत्र था। इससे किसी को आपत्ति नहीं हो सकती थी। हां, मेरे दोस्तों ने मुझे एक पल को घूरा, लेकिन वो कुछ कहते उससे पहले ही दुकान के मालिक ने आगे बढ़कर दादी को उठाकर कुर्सी पर बैठा दिया और मेरी ओर मुस्कुराते हुए हाथ जोड़कर कहा: ऊपर बैठ जाइए साहब! मेरे यहां ग्राहक तो बहुत आते हैं, किन्तु इंसान तो कभी-कभार ही आता है। दुकानदार के आग्रह करने पर मैं और बूढ़ी दादी दोनों कुर्सी पर बैठ गए हालांकि दादी थोड़ी घबराई हुई थी मगर मेरे मन में एक असीम संतोष था।

  • स्वाध्याय,जीवन की अनिवार्यता है।

    हमारे शास्त्रों में गुरु की महिमा का प्रसंग वर्णन बड़े विस्तार से किया गया है। परंतु हम उसी संत को गुरु की श्रेणी में रख सकते हैं जो मनुष्य में सत्य मार्ग पर चलने की सच्ची प्रेरणा उत्पन्न कर सकता हो। जो, शिष्य के ज्ञान के अंधकार को हरकर, ज्ञान की दिव्य ज्योति प्रदान कर सकता हो और भगवत प्राप्ति के पावन पथ पर अग्रसर होने की सामर्थ उत्पन्न कर सकता हो। परंतु भौतिक युग में ऐसे गुरुओं का मिलना न केवल कठिन अपितु असंभव प्रतीत होता है। गुरुओं के रूप में समाज में उपस्थित वंचक गुरुओं द्वारा भोली भाली जनता को ठगे जाने की संभावनाएं बहुत प्रबल हो जाती है। अतः निरापद मार्ग का अनुसरण कर वंचक गुरुओं के मायाजाल से बचा जा सकता है। यहां निरापद मार्ग का सीधा अभिप्राय यह है कि हमें परमपिता परमेश्वर को ही अपने गुरु के रुप में वरण कर लेना चाहिए। हमारे महापुरुषों ने कहा है, “कृष्णं वंदे जगतगुरुम्” अर्थात भगवान श्री कृष्ण की वंदना जगत गुरु के रुप में की जाती है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी हनुमान चालीसा में हनुमान जी महाराज को ही गुरु रूप में वर्णित किया है। जै जै जै हनुमान गोसाईं । कृपा करेहु गुरुदेव की नाई।। इसी प्रकार संतों ने भगवान शिव को प्रथम गुरु के रुप में स्वीकार्य किया है। संतों का अनुसरण करते हुए, हम आपको भी जिस देव में श्रद्धा टिकती हो उसे ही मानसिक रूप से गुरु के रुप में वरण कर लेना चाहिए। इसके साथ ही वेदों, उपनिषदों व महापुरुषों की पुस्तकों के स्रोतों से ज्ञानार्जन की प्रक्रिया अपनानी चाहिए। पुस्तकों के माध्यम से संत महात्माओं के साथ किया गया सत्संग चिरस्थाई होता है। ऐसे सत्संग से प्राप्त संत महात्माओं की जीवन की कल्याणकारी बातों को हमें अपने जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए। यह सत्संग हमारे चरित्र को कहीं अधिक प्रभावी ढंग से संत महात्माओं के रूप में स्थापित करने में सफल हो सकता है। सत्संग की तो बड़ी महिमा है परंतु सत्संग में सन्निकटता की आवश्यकता नहीं है। यथासंभव दूरी बना कर भी सत्संग का सुख प्राप्त किया जा सकता है। ऐसा कर वंचक गुरुओं के दृष्टि दोष से बचकर कल्याणकारी दृष्टिकोण को सफलतापूर्वक आत्मसात किया जा सकता है। स्वाध्याय वह विधि है, जिसके द्वारा ज्ञान प्राप्ति एवं जीवन की विसंगतियों व समस्याओं को दूर करने की क्षमता उत्पन्न हो जाती है। दिनचर्या में एक निश्चित समय स्वाध्याय को अवश्य दिया जाना चाहिए। जिससे मनुष्य को सत्य साहित्य के अध्ययन का लाभ मिलेगा। ज्ञान के अभाव में मनुष्य की स्थिति एक दृष्टिहीन व्यक्ति के जैसी हो जाती है। वह व्यक्ति संसार में रहकर भी समस्त ज्ञान भंडार से दूर हो जाता है। संसार के सारे दुख अज्ञान और आशक्ति से ही पैदा होते हैं। अज्ञानी व्यक्ति पाप प्रलोभनों में पड़कर व्यसन के गर्त में गिर जाता है। व्यक्ति के शारीरिक व मानसिक दुखों को ज्ञान के द्वारा ही नष्ट किया जा सकता है। अर्थात भौतिक जीवन की सफलता एवं आध्यात्मिक जीवन की पूर्णता के लिए ज्ञान के सोपान का प्राप्त होना परम आवश्यक है। अनेकों लोग किसी को धारा-प्रवाह बोलते एवं भाषण देते देखकर मंत्रमुग्ध जैसे हो जाते हैं और वक्ता के ज्ञान एवं प्रतिभा की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगते हैं। कभी-कभी यह भी मान लेते हैं कि इस व्यक्ति पर माता सरस्वती की प्रत्यक्ष कृपा है। उसके ज्ञान के पट खुल गए हैं, तभी तो ज्ञान का अविरल स्रोत इनके मुख से शब्दों के रूप में अविरल बहता चला जा रहा है। श्रोताओं का इस प्रकार आश्चर्य चकित हो जाना अस्वाभाविक भी नहीं है। सफल वक्ता अथवा समर्थ लेखक जिस विषय को ले लेते हैं, उस पर घण्टों बोलते या लिखते चले जाते हैं, और यह प्रमाणित कर देते हैं कि उनका अमुक विषय पर ज्ञान अपरिमित है। यह कोई मंत्र सिद्धि का परिणाम नहीं है। यह सारा चमत्कार उनके उस स्वाध्याय का सुफल होता है, जिसे वे किसी दिन भी, किसी अवस्था में नहीं छोड़ते। उनके जीवन का कदाचित ही कोई ऐसा अभागा दिन जाता होगा, जिसमें वे मनोयोगपूर्वक घण्टों स्वाध्याय न करते हों। स्वाध्याय उनके जीवन का एक अंग और प्रतिदिन की अनिवार्य आवश्यकता बन जाता है। जिस दिन वे अपनी इस आवश्यकता की पूर्ति नहीं कर पाते, उस दिन वे अपने तन-मन और आत्मा में एक भूख, एक रिक्तता का कष्ट अनुभव किया करते हैं। यदि हम सिख पंथ के पथ प्रदर्शक गुरु नानक देव महाराज की बात करें तो हम पाते हैं कि उन्होंने अपने आप को परमात्मा के समक्ष पूर्ण समर्पित कर रखा था। उन्हीं के शब्दों में नानकु एकु कहै अरदासि। जीउ पिंड सभु तेरै पासि।। जब ऐसे महान व्यक्तित्व तक परमपिता परमेश्वर के शरण में रहकर मानवता की रक्षा के लिए प्रयासरत रह सकते हैं। तो सामान्य व्यक्ति द्वारा ईश्वर को अपना आध्यात्मिक गुरु स्वीकार्य करने में क्या कठिनाई हो सकती है। महाभारत में भीष्म पितामह ने भी स्वाध्याय को ही मनुष्य का सर्वोच्च धर्म माना है। पशु व मानव योनि के वैज्ञानिक वर्गीकरण के अनुसार ज्ञान ही ऐसा गुण है, जो मनुष्य को पशु योनि से अलग खड़ा कर देता है। यह ज्ञान ही है जिसके अभाव में मनुष्य पशुवत् व्यवहार करना प्रारंभ कर देता है। जिस प्रकार स्थूल शरीर के पोषण के लिए पौष्टिक भोजन की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार मानसिक विकास व प्रगति के लिए ज्ञान की आवश्यकता होती है। अज्ञानता व्यक्ति के मानसिक विकास को विकृत कर देता है। अंततः मानसिक विकृति, व्यक्ति के चारित्रिक व आध्यात्मिक प्रगति को बाधित कर देती है। व्यक्ति एक संकीर्ण परिवेश में विचरण करने के लिए बाध्य हो जाता है। धार्मिक अथवा आध्यात्मिक क्षेत्र में कोई व्यक्ति नित्य पूजा अर्चना करता है, आसन लगाता है, जाप व कीर्तन में मग्न रहता है, व्रत-उपवास व दान-दक्षिणा देता है, किन्तु शास्त्रों अथवा सद्ग्रन्थों का अध्ययन और विचारों का चिन्तन-मनन नहीं करता है। वह सोच लेता है कि जब मैं इतना जाप तप करता हूँ तो इसके बाद अध्ययन की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। आत्म-ज्ञान अथवा परमात्म अनुभूति करा देने के लिए इतना ही पर्याप्त है तो निश्चय ही वह भ्रम में है। केवल स्वाध्याय ही वह विधि है जो व्यक्ति को जीवन का वास्तविक दर्शन कराती है। व्यक्ति को अहंकार से बचाती है। जीवन का लक्ष्य प्राप्त करती है। लोक व्यवहार सिखाती है और मस्तिष्क की उर्वरा शक्ति को बढ़ाती है। इसलिए तल्लीनता पूर्वक स्वाध्याय करना चाहिए। हल्के स्तर की पुस्तकों को पढ़ने से बचना चाहिए। ऐसी पुस्तकें व्यक्ति के मस्तिष्क की ग्रहण क्षमता को कमजोर कर देती है। चारित्रिक उज्ज्वलता, स्वाध्याय का एक साधारण और मनोवैज्ञानिक फल है। सद्ग्रन्थों के निरन्तर अध्ययन एवं मनन से संस्कारों की स्थापना होती हैं, जिससे व्यक्ति का चित्त अपने आप दुष्कृत्यों से विमुख हो जाता है। स्वाध्यायी व्यक्ति पर कुसंग का भी प्रभाव नहीं पड़ने पाता, इसका एक वैज्ञानिक कारण है। स्वाध्याय, व्यक्ति के हृदय को सकारात्मकता के विद्युत चुंबकीय तरंगों से ओतप्रोत कर उसके चारों ओर एक ऐसा अभेद्य आवरण उत्पन्न कर देता है जिसे आसुरी शक्तियां भेद नहीं पाती है, और स्वाध्यायी व्यक्ति विकृत सोच के व्यक्तियों के संपर्क में आने से बच जाता है। जिसकी स्वाध्याय में रुचि है और जो उसको जीवन का एक ध्येय मानता है, वह आवश्यकताओं से निवृत्त होकर अपना सारा समय स्वाध्याय में लगाता है। उसके पास कोई फालतू समय ही नहीं रहता, जिससे वह दूषित वातावरण से अवांछनीय तत्व ग्रहण कर लाये। स्वाध्याय जीवन विकास के लिये एक अनिवार्य आवश्यकता है, जिसे हर व्यक्ति को पूरी करना चाहिये। अनेक लोग परिस्थितिवश अथवा प्रारम्भिक प्रमादवश पढ़-लिख नहीं पाते और जब आगे चल कर उन्हें शिक्षा और स्वाध्याय के महत्व का ज्ञान होता है, तब हाथ मल-मल कर पछताते रहते है। स्वाध्याय से जहाँ संचित ज्ञान सुरक्षित रहता है, वहीं उस कोष में नवीन वृद्धि भी होती रहती है। स्वाध्याय से विरत हो होकर जीने वाला व्यक्ति अपने ज्ञान रूपी पूंजी को सदा के लिए खो बैठता है। अंत में परमपिता परमेश्वर से यही प्रार्थना है कि वह हमें भावी जीवन में स्वाध्याय द्वारा अपनी योग्यता बढ़ाने में मदद करें। **********

  • जादुई सांप की कहानी

    एक गांव में एक ब्राह्मण रहता था। वह आसपास के गांव में भिक्षा मांगकर अपना और अपने परिवार का पेट पाला करता था। एक बार ब्राह्मण को लगने लगा की उसे बहुत कम भिक्षा मिल रही है जिससे उसके परिवार का गुजारा बहुत मुश्किल से हो रहा है। इसलिए उसने सोचा मुझे राजा से मदद लेनी चाहिए। ब्राह्मण राजदरवार जाने के लिए घर से निकल पड़ा। जब वह जंगल में से गुजर रहा था तो उसे एक पेड़ के पास एक सांप दिखाई दिया। सांप ब्राह्मण को प्रणाम करके बोला, “हे ब्राह्मण महाराज, आज सुबह सुबह कहाँ जाने के लिए निकल पड़े?” ब्राह्मण ने अपनी समस्या सांप को बताई, “मैं राजा से सहायता लेने के लिए जा रहा हूँ।” सांप ने कहा, “मुझे पता है आप क्या समस्या लेकर जा रहे हो। तुम्हारे घर में इस समय बहुत गरीबी छाई हुई है इसलिए राजा से मदद लेने जा रहे हो।” ब्राह्मण ने कहा, “सांप आप तो सब जानते हो!” सांप ने कहाँ, “हाँ ब्राह्मण, मैं जादुई सांप हूँ और भविष्यवाणी कर सकता हूँ कि आगे क्या होने वाला है?” ब्राह्मण ने कहा, “कैसी भविष्यवाणी?” सांप ने कहा, “हे ब्राह्मण महाराज मैं तुम्हे एक भविष्यवाणी सुनाता हूँ तुम वह राजा को बता सकते हो। लेकिन मेरी यह शर्त है कि राजा से मिलने वाले धन से आधा तुम मुझे दोगे।” ब्राह्मण ने शर्त मानली। सांप ने कहा, “राजा से कहना की इस साल अकाल पड़ेगा इसलिए प्रजा को बचाने के लिए जो भी उपाय करना हो कर लेना।” ब्राह्मण ने सांप को धन्यवाद दिया और राजदरवार के लिए रवाना हो गया। अगले ही दिन वह राजदरवार में पहुँच गया। ब्राह्मण ने सिपाही से कहा, “राजा से कहो कि एक ब्राह्मण आया है जो भविष्यवाणी करता है।” राजा ने ब्राह्मण को राजदरवार में बुलाकर पूछा, “बताओ तुम भविष्य के बारे में क्या जानते हो?” ब्राह्मण ने सांप द्वारा की गई भविष्यवाणी राजा को सुनाई। राजा ने भविष्यवाणी सुनी और कुछ धन देकर ब्राह्मण को विदा किया। वापस लौटते हुए ब्राह्मण ने सोचा,”यदि सांप को आधा धन दिया तो मेरा धन जल्दी समाप्त हो जायेगा।” इसलिए ब्राह्मण रास्ता बदलकर अपने गांव चला गया। भविष्यवाणी के अनुसार बहुत बड़ा अकाल पड़ा। लेकिन राजा ने पहले से ही जानकारी होने के कारन बहुत से इंतजाम कर लिए थे इसलिए राजा को कोई समस्या नहीं हुई। एक साल बीत गया। ब्राह्मण का धन धीरे-धीरे खत्म हो गया और ब्राह्मण फिरसे राजा से मदद मांगने के लिए चल दिया। रास्ते में उसे फिर वही सांप मिला। अभिनन्दन करने के बाद सांप ने ब्राह्मण से कहा, “आधा धन देने के शर्त पर मैं तुम्हे एक भविष्यवाणी सुनाऊँगा। तुम मेरी भविष्यवाणी राजा को बता सकते हो। राजा से कहना इस साल भयंकर युद्ध होगा इसलिए जो भी तैयारी करनी है कर लो।” आधा धन देने का वादा कर सांप से विदा लेकर ब्राह्मण राजदरवार पहुँचा। राजा ने बहुत सम्मान के साथ ब्राह्मण का स्वागत किया और एक और भविष्यवाणी करने के लिए कहा।” ब्राह्मण ने राजा से कहा, “महाराज इस साल एक बहुत भयंकर युद्ध होने वाला है। आपको जो भी तैयारी करनी है अभी से करलो।” इस बार राजा ने ब्राह्मण को पहले से भी अधिक धन देकर विदा किया। अब रास्ते में फिर ब्राह्मण ने सोचा यदि सांप मिला तो आधा धन मांगेगा। इतने सारे धन का आधामैं उसे क्यों दू? क्यों न सांप को लाठी से मार दिया जाए। हाथ में लाठी लिए ब्राह्मण जब सांप के पास पहुँचा तो सांप खतरा देखकर बिल में जाने लगा। ब्राह्मण ने सांप के पीछे से लाठी से वार किया जिससे सांप की पूंछ कट गई। लेकिन सांप जीवित बच गया। सांप के भविष्यवाणी के अनुसार इस साल राजा के पड़ोसी राज्य से भयंकर युद्ध हुआ। लेकिन पहले से ही बहुत अच्छी तैयारी होने के कारन राजा युद्ध जीत गए। दो साल में ब्राह्मण का धन धीरे-धीरे फिरसे खत्म हो गया और उसके सामने फिरसे घर का संकट शुरू हो गया। उसने एक बार फिरसे राजा से मदद मांगने की सोची। एक दिन सुबह सुबह राजदरवार जाने के लिए नगर की और प्रस्थान किया। जंगल में पहुँचा तो ब्राह्मण सांप के आगे से नजर छुपाकर निकलने लगा। तभी सांप ने कहा, “हे ब्राह्मण महाराज, इस बार मिलकर नहीं जाओगे?” ब्राह्मण कुछ न बोल सका और नजरे नीची करके खड़ा रहा।” सांप ने कहा, “राजा से कहना इस बार राज्य में धर्म की स्थापना होगी, सब अच्छे काम होंगे, राजा और प्रजा सब सुख से होंगे। ध्यान रखना जो भी धन मिले उसका आधा मुझे देकर जाना।” ब्राह्मण ने आधा धन देने का वचन दिया और राजदरवार की और रवाना हो गया। राजदरवार पहुँचने पर ब्राह्मण का विशेष स्वागत किया गया। राजा ने पिछले दो भविष्यवाणी के लिए ब्राह्मण को बहुत बहुत धन्यवाद दिया और आने वाले समय के बारे में भी पूछा। तो ब्राह्मण ने कहा, “महाराज, इस बार राज्य में धर्म की स्थापना होगी। राजा तथा प्रजा सुख और चैन की जिंदगी बिताएंगे। सब लोक अच्छा सोचेंगे और अच्छे काम करेंगे।” राजा ने ब्राह्मण को बहुत सारा धन देकर विदा किया। गांव वापस लौटते हुए ब्राह्मण ने सोचा, “जब राजा ने थोड़ा धन दिया तो वह एक साल में समाप्त हो गया। जब ज्यादा धन दिया तो वह दो साल में समाप्त हो गया। सांप से गद्दारी की वह अलग। इस बार मैं सांप का सारा हिसाब कर दूंगा।” सांप के पास पहुँचकर ब्राह्मण ने सारा धन सांप के पास रख दिया और सांप से तीनो बार का धन लेने के लिए कहा। सांप ने कहा, “ब्राह्मण महाराज, जब अकाल पड़ा तो तुम रास्ता बदलकर निकल गए, जब युद्ध हुआ तो तुमने मेरी पूंछ काट दी जिससे मेरा बहुत मजाक उड़ाया गया। अब जब राज्य में धर्म की स्थापना हो गई है, मैंने भविष्यवाणी की थी की लोग अच्छे काम करेंगे तुम भी धर्म के रास्ते पर आ गए हो। हम जंगली जानबरों को धन की क्या जरुरत? यह सारा धन तुम ले जाओ। ख़ुशी से जीवन बिताओ और किसी के साथ कभी भी धोखा मत करो।” सांप को धन्यवाद देकर ब्राह्मण अपने गांव आ गया। और उसने निर्णय लिया की अब कभी भी किसी को धोखा नहीं देगा। लालच इंसान को भटका देता है तो कभी भी लालच और धोखाधड़ी न करें। *************

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