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  • बूढ़ी मां का बक्सा

    डॉ. जहान सिंह ‘जहान’ बैलगाड़ी पर चलते-चलते मेरी कमर दुखने लगी है। बच्चों से मैंने सुना है कि अब आदमी आसमान में सैर करने लगा है। मेरे पास चंद तांबे के सिक्के, सिंदूर की पोटली, काजल की एक टूटी डिब्बी, नानी के लिए हुए कुछ चांदी के गहने। अपनी मां की दी हुई गुड़िया, कुछ बचपन के टूटी लकड़ी के खिलौने। एक पुराना एल्बम, शादी का एक जोड़ा जिसे संजोए सिर्फ करवा चौथ पर पहना, टूटा आईना, ऊन का गोला और सिलाई। बिटटी का स्वेटर तो शायद देना भूल गई। मां इन चीजों की रसीद ना दिखा पाई। कस्टम अधिकारी ने जहाज पर चढ़ने से रोक दिया। मैं थक कर फिर बैलगाड़ी में अपने सफर पर न जाने कितने दूर। मैं हवाई यात्रा करना चाहता हूं। ******

  • उद्धार

    प्रेमचंद हिंदू समाज की वैवाहिक प्रथा इतनी दुषित, इतनी चिंताजनक, इतनी भयंकर हो गयी है कि कुछ समझ में नहीं आता, उसका सुधार क्योंकर हो। बिरलें ही ऐसे माता−पिता होंगे जिनके सात पुत्रों के बाद एक भी कन्या उत्पन्न हो जाय तो वह सहर्ष उसका स्वागत करें। कन्या का जन्म होते ही उसके विवाह की चिंता सिर पर सवार हो जाती है और आदमी उसी में डुबकियां खाने लगता है। अवस्था इतनी निराशमय और भयानक हो गई है कि ऐसे माता−पिताओं की कमी नहीं है जो कन्या की मृत्यु पर ह्रदय से प्रसन्न होते है, मानों सिर से बाधा टली। इसका कारण केवल यही है कि देहज की दर, दिन दूनी रात चौगुनी, पावस−काल के जल−गुजरे कि एक या दो हजारों तक नौबत पहुंच गई है। अभी बहुत दिन नहीं गुजरे कि एक या दो हजार रुपये दहेज केवल बड़े घरों की बात थी, छोटी−छोटी शादियों पांच सौ से एक हजार तक तय हो जाती थीं; अब मामुली−मामुली विवाह भी तीन−चार हजार के नीचे तय नहीं होते। खर्च का तो यह हाल है और शिक्षित समाज की निर्धनता और दरिद्रता दिन बढ़ती जाती है। इसका अन्त क्या होगा ईश्वर ही जाने। बेटे एक दर्जन भी हों तो माता−पिता का चिंता नहीं होती। वह अपने ऊपर उनके विवाह−भार का अनिवार्य नहीं समझता, यह उसके लिए ‘कम्पलसरी’ विषय नहीं, ‘आप्शनल’ विषय है। होगा तों कर देगें; नही कह देंगे−−बेटा, खाओं कमाओं, कमाई हो तो विवाह कर लेना। बेटों की कुचरित्रता कलंक की बात नहीं समझी जाती; लेकिन कन्या का विवाह तो करना ही पड़ेगा, उससे भागकर कहां जायेगें ? अगर विवाह में विलम्ब हुआ और कन्या के पांव कहीं ऊंचे नीचे पड़ गये तो फिर कुटुम्ब की नाक कट गयी; वह पतित हो गया, टाट बाहर कर दिया गया। अगर वह इस दुर्घटना को सफलता के साथ गुप्त रख सका तब तो कोई बात नहीं; उसकों कलंकित करने का किसी का साहस नहीं; लेकिन अभाग्यवश यदि वह इसे छिपा न सका, भंडाफोड़ हो गया तो फिर माता−पिता के लिए, भाई−बंधुओं के लिए संसार में मुंह दिखाने को नहीं रहता। कोई अपमान इससे दुस्सह, कोई विपत्ति इससे भीषण नहीं। किसी भी व्याधि की इससे भयंकर कल्पना नहीं की जा सकती। लुत्फ तो यह है कि जो लोग बेटियों के विवाह की कठिनाइयों को भोगा चुके होते है वहीं अपने बेटों के विवाह के अवसर पर बिलकुल भुल जाते है कि हमें कितनी ठोकरें खानी पड़ी थीं, जरा भी सहानुभूति नही प्रकट करतें, बल्कि कन्या के विवाह में जो तावान उठाया था उसे चक्र−वृद्धि ब्याज के साथ बेटे के विवाह में वसूल करने पर कटिबद्ध हो जाते हैं। कितने ही माता−पिता इसी चिंता में ग्रहण कर लेता है, कोई बूढ़े के गले कन्या का मढ़ कर अपना गला छुड़ाता है, पात्र−कुपात्र के विचार करने का मौका कहां, ठेलमठेल है। मुंशी गुलजारीलाल ऐसे ही हतभागे पिताओं में थे। यों उनकी स्थिति बूरी न थी। दो−ढ़ाई सौ रुपये महीने वकालत से पीट लेते थे, पर खानदानी आदमी थे, उदार ह्रदय, बहुत किफायत करने पर भी माकूल बचत न हो सकती थी। सम्बन्धियों का आदर−सत्कार न करें तो नहीं बनता, मित्रों की खातिरदारी न करें तो नही बनता। फिर ईश्वर के दिये हुए दो पुत्र थे, उनका पालन−पोषण, शिक्षण का भार था, क्या करते ! पहली कन्या का विवाह टेढ़ी खीर हो रहा था। यह आवश्यक था कि विवाह अच्छे घराने में हो, अन्यथा लोग हंसेगे और अच्छे घराने के लिए कम−से−कम पांच हजार का तखमीना था। उधर पुत्री सयानी होती जाती थी। वह अनाज जो लड़के खाते थे, वह भी खाती थी; लेकिन लड़कों को देखो तो जैसे सूखों का रोग लगा हो और लड़की शुक्ल पक्ष का चांद हो रही थी। बहुत दौड़−धूप करने पर बचारे को एक लड़का मिला। बाप आबकारी के विभाग में ४०० रु० का नौकर था, लड़का सुशिक्षित। स्त्री से आकार बोले, लड़का तो मिला और घरबार−एक भी काटने योग्य नहीं; पर कठिनाई यही है कि लड़का कहता है, मैं अपना विवाह न करुंगा। बाप ने समझाया, मैने कितना समझाया, औरों ने समझाया, पर वह टस से मस नहीं होता। कहता है, मै कभी विवाह न करुंगा। समझ में नहीं आता, विवाह से क्यों इतनी घृणा करता है। कोई कारण नहीं बतलाता, बस यही कहता है, मेरी इच्छा। मां बाप का एकलौता लड़का है। उनकी परम इच्छा है कि इसका विवाह हो जाय, पर करें क्या? यों उन्होने फलदान तो रख लिया है पर मुझसे कह दिया है कि लड़का स्वभाव का हठीला है, अगर न मानेगा तो फलदान आपको लौटा दिया जायेगा। स्त्री ने कहा−−तुमने लड़के को एकांत में बुलावकर पूछा नहीं? गुलजारीलाल−−बुलाया था। बैठा रोता रहा, फिर उठकर चला गया। तुमसे क्या कहूं, उसके पैरों पर गिर पड़ा; लेकिन बिना कुछ कहे उठाकर चला गया। स्त्री−−देखो, इस लड़की के पीछे क्या−क्या झेलना पड़ता है? गुलजारीलाल−−कुछ नहीं, आजकल के लौंडे सैलानी होते हैं। अंगरेजी पुस्तकों में पढ़ते है कि विलायत में कितने ही लोग अविवाहित रहना ही पसंद करते है। बस यही सनक सवार हो जाती है कि निर्द्वद्व रहने में ही जीवन की सुख और शांति है। जितनी मुसीबतें है वह सब विवाह ही में है। मैं भी कालेज में था तब सोचा करता था कि अकेला रहूंगा और मजे से सैर−सपाटा करुंगा। स्त्री−−है तो वास्तव में बात यही। विवाह ही तो सारी मुसीबतों की जड़ है। तुमने विवाह न किया होता तो क्यों ये चिंताएं होतीं ? मैं भी क्वांरी रहती तो चैन करती। इसके एक महीना बाद मुंशी गुलजारीलाल के पास वर ने यह पत्र लिखा−− ‘पूज्यवर, सादर प्रणाम। मैं आज बहुत असमंजस में पड़कर यह पत्र लिखने का साहस कर रहा हूं। इस धृष्टता को क्षमा कीजिएगा। आपके जाने के बाद से मेरे पिताजी और माताजी दोनों मुझ पर विवाह करने के लिए नाना प्रकार से दबाव डाल रहे है। माताजी रोती है, पिताजी नाराज होते हैं। वह समझते है कि मैं अपनी जिद के कारण विवाह से भागता हूं। कदाचिता उन्हे यह भी सन्देह हो रहा है कि मेरा चरित्र भ्रष्ट हो गया है। मैं वास्तविक कारण बताते हुए डारता हूं कि इन लोगों को दु:ख होगा और आश्चर्य नहीं कि शोक में उनके प्राणों पर ही बन जाय। इसलिए अब तक मैने जो बात गुप्त रखी थी, वह आज विवश होकर आपसे प्रकट करता हूं और आपसे साग्रह निवेदन करता हूं कि आप इसे गोपनीय समझिएगा और किसी दशा में भी उन लोगों के कानों में इसकी भनक न पड़ने दीजिएगा। जो होना है वह तो होगा है, पहले ही से क्यों उन्हे शोक में डुबाऊं। मुझे ५−६ महीनों से यह अनुभव हो रहा है कि मैं क्षय रोग से ग्रसित हूं। उसके सभी लक्षण प्रकट होते जाते है। डाक्टरों की भी यही राय है। यहां सबसे अनुभवी जो दो डाक्टर हैं, उन दोनों ही से मैने अपनी आरोग्य−परीक्षा करायी और दोनो ही ने स्पष्ट कहा कि तुम्हे सिल है। अगर माता−पिता से यह कह दूं तो वह रो−रो कर मर जायेगें। जब यह निश्चय है कि मैं संसार में थोड़े ही दिनों का मेहमान हूं तो मेरे लिए विवाह की कल्पना करना भी पाप है। संभव है कि मैं विशेष प्रयत्न करके साल दो साल जीवित रहूं, पर वह दशा और भी भयंकर होगी, क्योकि अगर कोई संतान हुई तो वह भी मेरे संस्कार से अकाल मृत्यु पायेगी और कदाचित् स्त्री को भी इसी रोग−राक्षस का भक्ष्य बनना पड़े। मेरे अविवाहित रहने से जो बीतेगी, मुझ पर बीतेगी। विवाहित हो जाने से मेरे साथ और कई जीवों का नाश हो जायगा। इसलिए आपसे मेरी प्रार्थना है कि मुझे इस बन्धन में डालने के लिए आग्रह न कीजिए, अन्यथा आपको पछताना पड़ेगा। सेवक ‘हजारीलाल।’ पत्र पढ़कर गुलजारीलाल ने स्त्री की ओर देखा और बोले−−इस पत्र के विषय में तुम्हारा क्या विचार हैं। स्त्री−−मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि उसने बहाना रचा है। गुलजारीलाल−−बस−बस, ठीक यही मेरा भी विचार है। उसने समझा है कि बीमारी का बहाना कर दूंगा तो आप ही हट जायेंगे। असल में बीमारी कुछ नहीं। मैने तो देखा ही था, चेहरा चमक रहा था। बीमार का मुंह छिपा नहीं रहता। स्त्री−−राम नाम ले के विवाह करो, कोई किसी का भाग्य थोड़े ही पढ़े बैठा है। गुलजारीलाल−−यही तो मै सोच रहा हूं। स्त्री−−न हो किसी डाक्टर से लड़के को दिखाओं । कहीं सचमुच यह बीमारी हो तो बेचारी अम्बा कहीं की न रहे। गुलजारीलाल−तुम भी पागल हो क्या? सब हीले−हवाले हैं। इन छोकरों के दिल का हाल मैं खुब जानता हूं। सोचता होगा अभी सैर−सपाटे कर रहा हूं, विवाह हो जायगा तो यह गुलछर्रे कैसे उड़ेगे! स्त्री−−तो शुभ मुहूर्त देखकर लग्न भिजवाने की तैयारी करो। हजारीलाल बड़े धर्म−सन्देह में था। उसके पैरों में जबरदस्ती विवाह की बेड़ी डाली जा रही थी और वह कुछ न कर सकता था। उसने ससुर का अपना कच्चा चिट्ठा कह सुनाया; मगर किसी ने उसकी बालों पर विश्वास न किया। मां−बाप से अपनी बीमारी का हाल कहने का उसे साहस न होता था। न जाने उनके दिल पर क्या गुजरे, न जाने क्या कर बैठें? कभी सोचता किसी डाक्टर की शहदत लेकर ससूर के पास भेज दूं, मगर फिर ध्यान आता, यदि उन लोगों को उस पर भी विश्वास न आया, तो? आजकल डाक्टरी से सनद ले लेना कौन−सा मुश्किल काम है। सोचेंगे, किसी डाक्टर को कुछ दे दिलाकर लिखा लिया होगा। शादी के लिए तो इतना आग्रह हो रहा था, उधर डाक्टरों ने स्पष्ट कह दिया था कि अगर तुमने शादी की तो तुम्हारा जीवन−सुत्र और भी निर्बल हो जाएगा। महीनों की जगह दिनों में वारा−न्यारा हो जाने की सम्भावाना है। लग्न आ चुकी थी। विवाह की तैयारियां हो रही थीं, मेहमान आते−जाते थे और हजारीलाल घर से भागा−भागा फिरता था। कहां चला जाऊं? विवाह की कल्पना ही से उसके प्राण सूख जाते थे। आह ! उस अबला की क्या गति होगी ? जब उसे यह बात मालूम होगी तो वह मुझे अपने मन में क्या कहेगी? कौन इस पाप का प्रायश्चित करेगा ? नहीं, उस अबला पर घोर अत्याचार न करुंगा, उसे वैधव्य की आग में न जलाऊंगा। मेरी जिन्दगी ही क्या, आज न मरा कल मरुंगा, कल नहीं तो परसों, तो क्यों न आज ही मर जाऊं। आज ही जीवन का और उसके साथ सारी चिंताओं को, सारी विपत्तियों का अन्त कर दूं। पिता जी रोयेंगे, अम्मां प्राण त्याग देंगी; लेकिन एक बालिका का जीवन तो सफल हो जाएगा, मेरे बाद कोई अभागा अनाथ तो न रोयेगा। क्यों न चलकर पिताजी से कह दूं? वह एक−दो दिन दु:खी रहेंगे, अम्मां जी दो−एक रोज शोक से निराहार रह जायेगीं, कोई चिंता नहीं। अगर माता−पिता के इतने कष्ट से एक युवती की प्राण−रक्षा हो जाए तो क्या छोटी बात है? यह सोचकर वह धीरे से उठा और आकर पिता के सामने खड़ा हो गया। रात के दस बज गये थे। बाबू दरबारीलाल चारपाई पर लेटे हुए हुक्का पी रहे थे। आज उन्हे सारा दिन दौड़ते गुजरा था। शामियाना तय किया; बाजे वालों को बयाना दिया; आतिशबाजी, फुलवारी आदि का प्रबन्ध किया। घंटो ब्राहमणों के साथ सिर मारते रहे, इस वक्त जरा कमर सीधी कर रहें थे कि सहसा हजारीलाल को सामने देखकर चौंक पड़ें। उसका उतरा हुआ चेहरा सजल आंखे और कुंठित मुख देखा तो कुछ चिंतित होकर बोले−−क्यों लालू, तबीयत तो अच्छी है न? कुछ उदास मालूम होते हो। हजारीलाल−−मै आपसे कुछ कहना चाहता हूं; पर भय होता है कि कहीं आप अप्रसन्न न हों। दरबारीलाल−−समझ गया, वही पुरानी बात है न ? उसके सिवा कोई दूसरी बात हो शौक से कहो। हजारीलाल−−खेद है कि मैं उसी विषय में कुछ कहना चाहता हूं। दरबारीलाल−−यही कहना चाहता हो न मुझे इस बन्धन में न डालिए, मैं इसके अयोग्य हूं, मै यह भार सह नहीं सकता, बेड़ी मेरी गर्दन को तोड़ देगी, आदि या और कोई नई बात ? हजारीलाल−−जी नहीं नई बात है। मैं आपकी आज्ञा पालन करने के लिए सब प्रकार तैयार हूं; पर एक ऐसी बात है, जिसे मैने अब तक छिपाया था, उसे भी प्रकट कर देना चाहता हूं। इसके बाद आप जो कुछ निश्चय करेंगे उसे मैं शिरोधार्य करुंगा। हजारीलाल ने बड़े विनीत शब्दों में अपना आशय कहा, डाक्टरों की राय भी बयान की और अन्त में बोलें−−ऐसी दशा में मुझे पूरी आशा है कि आप मुझे विवाह करने के लिए बाध्य न करेंगें। दरबारीलाल ने पुत्र के मुख की और गौर से देखा, कहे जर्दी का नाम न था, इस कथन पर विश्वास न आया; पर अपना अविश्वास छिपाने और अपना हार्दिक शोक प्रकट करने के लिए वह कई मिनट तक गहरी चिंता में मग्न रहे। इसके बाद पीड़ित कंठ से बोले−−बेटा, इस इशा में तो विवाह करना और भी आवश्यक है। ईश्वर न करें कि हम वह बुरा दिन देखने के लिए जीते रहे, पर विवाह हो जाने से तुम्हारी कोई निशानी तो रह जाएगी। ईश्वर ने कोई संतान दे दी तो वही हमारे बुढ़ापे की लाठी होगी, उसी का मुंह देखरेख कर दिल को समझायेंगे, जीवन का कुछ आधार तो रहेगा। फिर आगे क्या होगा, यह कौन कह सकता है ? डाक्टर किसी की कर्म−रेखा तो नहीं पढ़ते, ईश्वर की लीला अपरम्पार है, डाक्टर उसे नहीं समझ सकते । तुम निश्चिंत होकर बैठों, हम जो कुछ करते है, करने दो। भगवान चाहेंगे तो सब कल्याण ही होगा। हजारीलाल ने इसका कोई उत्तर नहीं दिया। आंखे डबडबा आयीं, कंठावरोध के कारण मुंह तक न खोल सका। चुपके से आकर अपने कमरे मे लेट रहा। तीन दिन और गुजर गये, पर हजारीलाल कुछ निश्चय न कर सका। विवाह की तैयारियों में रखे जा चुके थे। मंत्रेयी की पूजा हो चूकी थी और द्वार पर बाजों का शोर मचा हुआ था। मुहल्ले के लड़के जमा होकर बाजा सुनते थे और उल्लास से इधर−उधर दौड़ते थे। संध्या हो गयी थी। बरात आज रात की गाड़ी से जाने वाली थी। बरातियों ने अपने वस्त्राभूष्ण पहनने शुरु किये। कोई नाई से बाल बनवाता था और चाहता था कि खत ऐसा साफ हो जाय मानों वहां बाल कभी थे ही नहीं, बुढ़े अपने पके बाल को उखड़वा कर जवान बनने की चेष्टा कर रहे थे। तेल, साबुन, उबटन की लूट मची हुई थी और हजारीलाल बगीचे मे एक वृक्ष के नीचे उदास बैठा हुआ सोच रहा था, क्या करुं? अन्तिम निश्चय की घड़ी सिर पर खड़ी थी। अब एक क्षण भी विल्म्ब करने का मौका न था। अपनी वेदना किससे कहें, कोई सुनने वाला न था। उसने सोचा हमारे माता−पिता कितने अदुरदर्शी है, अपनी उमंग में इन्हे इतना भी नही सूझता कि वधु पर क्या गुजरेगी। वधू के माता−पिता कितने अदूरर्शी है, अपनी उमंग मे भी इतने अन्धे हो रहे है कि देखकर भी नहीं देखते, जान कर नहीं जानते। क्या यह विवाह है? कदापि नहीं। यह तो लड़की का कुएं में डालना है, भाड़ मे झोंकना है, कुंद छुरे से रेतना है। कोई यातना इतनी दुस्सह, कर अपनी पुत्री का वैधव्य् के अग्नि−कुंड में डाल देते है। यह माता−पिता है? कदापि नहीं। यह लड़की के शत्रु है, कसाई है, बधिक हैं, हत्यारे है। क्या इनके लिए कोई दण्ड नहीं ? जो जान−बूझ कर अपनी प्रिय संतान के खुन से अपने हाथ रंगते है, उसके लिए कोई दण्ड नहीं? समाज भी उन्हे दण्ड नहीं देता, कोई कुछ नहीं कहता। हाय ! यह सोचकर हजारीलाल उठा और एक ओर चुपचाप चल दिया। उसके मुख पर तेज छाया हुआ था। उसने आत्म−बलिदान से इस कष्ट का निवारण करने का दृढ़ संकल्प कर लिया था। उसे मृत्यु का लेश−मात्र भी भय न था। वह उस दशा का पहुंच गया था जब सारी आशाएं मृत्यु पर ही अवलम्बित हो जाती है। उस दिन से फिर किसी ने हजारीलाल की सूरत नहीं देखी। मालूम नहीं जमीन खा गई या आसमान। नादियों मे जाल डाले गए, कुओं में बांस पड़ गए, पुलिस में हुलिया गया, समाचार−पत्रों मे विज्ञप्ति निकाली गई, पर कहीं पता न चला । कई हफ्तो के बाद, छावनी रेलवे से एक मील पश्चिम की ओर सड़क पर कुछ हड्डियां मिलीं। लोगो को अनुमान हुआ कि हजारीलाल ने गाड़ी के नीचे दबकर जान दी, पर निश्चित रुप से कुछ न मालुम हुआ। भादों का महीना था और तीज का दिन था। घरों में सफाई हो रही थी। सौभाग्यवती रमणियां सोलहो श्रृंगार किए गंगा−स्नान करने जा रही थीं। अम्बा स्नान करके लौट आयी थी और तुलसी के कच्चे चबूतरे के सामने खड़ी वंदना कर रही थी। पतिगृह में उसे यह पहली ही तीज थी, बड़ी उमंगो से व्रत रखा था। सहसा उसके पति ने अन्दर आ कर उसे सहास नेत्रों से देखा और बोला−−मुंशी दरबारी लाल तुम्हारे कौन होते है, यह उनके यहां से तुम्हारे लिए तीज पठौनी आयी है। अभी डाकिया दे गया है। यह कहकर उसने एक पार्सल चारपाई पर रख दिया। दरबारीलाल का नाम सुनते ही अम्बा की आंखे सजल हो गयीं। वह लपकी हुयी आयी और पार्सल स्मृतियां जीवित हो गयीं, ह्रदय में हजारीलाल के प्रति श्रद्धा का एक उद्−गार−सा उठ पड़ा। आह! यह उसी देवात्मा के आत्मबलिदान का पुनीत फल है कि मुझे यह दिन देखना नसीब हुआ। ईश्वर उन्हे सद्−गति दें। वह आदमी नहीं, देवता थे, जिसने अपने कल्याण के निमित्त अपने प्राण तक समर्पण कर दिए। पति ने पूछा−−दरबारी लाल तुम्हारी चचा हैं। अम्बा−−हां। पति−−इस पत्र में हजारीलाल का नाम लिखा है, यह कौन है? अम्बा−−यह मुंशी दरबारी लाल के बेटे हैं। पति−−तुम्हारे चचरे भाई ? अम्बा−−नहीं, मेरे परम दयालु उद्धारक, जीवनदाता, मुझे अथाह जल में डुबने से बचाने वाले, मुझे सौभाग्य का वरदान देने वाले। पति ने इस भाव कहा मानो कोई भूली हुई बात याद आ गई हो−−आह! मैं समझ गया। वास्तव में वह मनुष्य नहीं देवता थे। *******

  • खुदगर्ज़

    विनीता तिवारी चुरा हर चीज़ ग़ैरों की वो अक्सर बात करते हैं। कि ये तेरा मेरा इंसान को बर्बाद करते हैं। मुहब्बत ज़िंदगी में ग़र मिले सच्ची तो बेह्तर है। वरना लोग बस मतलब से आँखें चार करते हैं। उठा के लाश काँधों पर वो अपनी जी रहा कब से कहाँ हैं वो, जो जीने का ये ढंग निर्यात करते हैं। कराते मंदिर-ओ-मस्जिद को लेकर आपसी झगड़े ख़ुदा और राम को ये लोग ही बदनाम करते हैं। बड़े झाँसे, बड़े वादे वही कर पाते हैं सबसे जो कुछ करके दिखाने में नहीं विश्वास करते हैं। न जाने कौनसी शालीन दुनिया में रहे हो तुम यहाँ तो हर कदम पर लोग बस कुहराम करते हैं। *****

  • इश्क

    सुमन मोहिनी ये इश्क एक दरिया है, इसमें जो डूब गया, फिर वो तर नही पाया है। इश्क एक आग भी है, इसमें जो झुलस गया, फिर वो बच नहीं पाया है। है इश्क एक इबादत भी, सजदे में सर इसके जिसने झुकाया है, समझो उसने फिर जन्नत को पाया है। इश्क है एक सुखद एहसास, जिसने इश्क़ किया है, वही समझ इसे पाया है। इश्क एक प्रेरणा है, कितने ही लोगों को तराश कर, हीरा इसने बनाया है। इश्क एक लगाव है, एक दूसरे से इसने कितने ही, प्रेमियों को मिलाया है। इश्क एक बवंडर भी है, तबाह इसने, कितनी ही जिंदगियों को किया है। इश्क एक वरदान भी है, कितनी ही जिंदगियों को, जीवन दान इसने दिया है। इश्क एक अभिशाप भी है, इसने बर्बाद भी कितनी ही, जिंदगियों को किया है। इश्क है एक मृगमरीचिका , जाने कितनों को इसने, राह भटकाया है। चाहे जैसा भी है ये इश्क़, हर रंग रूप में भाया है, इश्क ने गर रुलाया है, तो इश्क़ ने ही हंसाया है, गर इश्क सताता है, तो मनाता भी है। जीवन जीने का आधार ही, सिर्फ और सिर्फ इश्क को पाया है। ***

  • आज ही क्यों नहीं?

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव एक बार की बात है कि एक शिष्य अपने गुरु का बहुत आदर-सम्मान किया करता था। गुरु भी अपने इस शिष्य से बहुत स्नेह करते थे। लेकिन वह शिष्य अपने अध्ययन के प्रति आलसी और स्वभाव से दीर्घसूत्री था। सदा स्वाध्याय से दूर भागने की कोशिश करता तथा आज के काम को कल के लिए छोड़ दिया करता था। अब गुरूजी कुछ चिंतित रहने लगे कि कहीं उनका यह शिष्य जीवन-संग्राम में पराजित न हो जाये। आलस्य में व्यक्ति को अकर्मण्य बनाने की पूरी सामर्थ्य होती है। ऐसा व्यक्ति बिना परिश्रम के ही फलोपभोग की कामना करता है। वह शीघ्र निर्णय नहीं ले सकता और यदि ले भी लेता है, तो उसे कार्यान्वित नहीं कर पाता। यहाँ तक कि अपने पारिवारिक दायित्वों के प्रति भी सजग नहीं रहता है और न भाग्य द्वारा प्रदत्त सुअवसरों का लाभ उठाने की कला में ही प्रवीण हो पता है। उन्होंने मन ही मन अपने शिष्य के कल्याण के लिए एक योजना बना ली। एक दिन एक काले पत्थर का एक टुकड़ा उसके हाथ में देते हुए गुरु जी ने कहा –‘मैं तुम्हें यह जादुई पत्थर का टुकड़ा, मात्र दो दिनों के लिए दे कर, नजदीक के एक दूसरे गाँव जा रहा हूँ। तुम जिस भी लोहे की वस्तु को इससे स्पर्श करोगे, वह स्वर्ण में परिवर्तित हो जायेगी। पर याद रहे कि दूसरे दिन ठीक सूर्यास्त के पश्चात मैं इसे तुमसे वापस ले लूँगा।’ शिष्य इस सुअवसर को पाकर बड़ा प्रसन्न हुआ लेकिन आलसी होने के कारण उसने अपना पहला दिन यह कल्पना करते-करते बिता दिया कि जब उसके पास बहुत सारा स्वर्ण होगा तब वह कितना प्रसन्न, सुखी, समृद्ध और संतुष्ट रहेगा, इतने नौकर-चाकर होंगे कि उसे पानी पीने के लिए भी नहीं उठाना पड़ेगा। फिर दूसरे दिन जब वह प्रातःकाल जागा, उसे अच्छी तरह से स्मरण था कि आज स्वर्ण पाने का दूसरा और अंतिम दिन है। उसने मन में पक्का विचार किया कि आज वह गुरूजी द्वारा दिए गये काले पत्थर का लाभ ज़रूर उठाएगा। उसने निश्चय किया कि वो बाज़ार से लोहे के बड़े-बड़े सामान खरीद कर लायेगा और उन्हें स्वर्ण में परिवर्तित कर देगा। दिन बीतता गया, पर वह इसी सोच में बैठा रहा कि अभी तो बहुत समय है, कभी भी बाज़ार जाकर सामान ले आएगा। उसने सोचा कि अब तो दोपहर का भोजन करने के पश्चात ही सामान लेने निकलूंगा। पर भोजन करने के बाद उसे विश्राम करने की आदत थी, और उसने बजाये उठ के मेहनत करने के थोड़ी देर आराम करना उचित समझा। पर आलस्य से परिपूर्ण उसका शरीर नीद की गहराइयों में खो गया, और जब वो उठा तो सूर्यास्त होने को था। अब वह जल्दी-जल्दी बाज़ार की तरफ भागने लगा, पर रास्ते में ही उसे गुरूजी मिल गए उनको देखते ही वह उनके चरणों पर गिरकर, उस जादुई पत्थर को एक दिन और अपने पास रखने के लिए याचना करने लगा लेकिन गुरूजी नहीं माने और उस शिष्य का धनी होने का सपना चूर-चूर हो गया। इस घटना की वजह से शिष्य को एक बहुत बड़ी सीख मिल गयी। उसे अपने आलस्य पर पछतावा होने लगा, वह समझ गया कि आलस्य उसके जीवन के लिए एक अभिशाप है और उसने प्रण किया कि अब वो कभी भी काम से जी नहीं चुराएगा और एक कर्मठ, सजग और सक्रिय व्यक्ति बन कर दिखायेगा। सार - यदि हम सफल, सुखी, भाग्यशाली, धनी अथवा महान बनना चाहते हैं तो आलस्य और दीर्घसूत्रता को त्यागकर, अपने अंदर विवेक, कष्टसाध्य श्रम, और सतत् जागरूकता जैसे गुणों को विकसित करना होगा। ******

  • मेरी कोई जायदाद नहीं

    अनजान तन्हा बैठा था एक दिन मैं अपने मकान में, चिड़िया बना रही थी घोंसला रोशनदान में। पल भर में आती पल भर में जाती थी वो। छोटे-छोटे तिनके चोंच में भर लाती थी वो। बना रही थी वो अपना घर एक न्यारा, कोई तिनका था, ईंट उसकी कोई गारा। कड़ी मेहनत से घर जब उसका बन गया, आए खुशी के आँसू और सीना तन गया। कुछ दिन बाद मौसम बदला और हवा के झोंके आने लगे, नन्हें से प्यारे-प्यारे दो बच्चे घोंसले में चहचहाने लगे। पाल पोसकर कर रही थी चिड़िया बड़ा उन्हें, पंख निकल रहे थे, दोनों के पैरों पर करती थी खड़ा उन्हें। इच्छुक है हर इंसान कोई जमीन आसमान के लिए, कोशिश थी जारी उन दोनों की एक ऊंची उड़ान के लिए। देखता था मैं हर रोज उन्हें जज्बात मेरे उनसे कुछ जुड़ गए, पंख निकलने पर दोनों बच्चे मां को छोड़ अकेला उड़ गए। चिड़िया से पूछा मैंने तेरे बच्चे तुझे अकेला क्यों छोड़ गए, तूं तो थी मां उनकी फिर ये रिश्ता क्यों तोड़ गए। इंसान के बच्चे अपने मां बाप का घर नहीं छोड़ते, जब तक मिले न हिस्सा अपना, रिश्ता नहीं तोड़ते । चिड़िया बोली परिन्दे और इंसान के बच्चे में यही तो फर्क है, आज के इंसान का बच्चा मोह माया के दरिया में गर्क है। इंसान का बच्चा पैदा होते ही हर शह पर अपना हक जमाता है, न मिलने पर वो मां बाप को कोर्ट कचहरी तक ले जाता है। मैंने बच्चों को जन्म दिया पर करता कोई मुझे याद नहीं, मेरे बच्चे क्यों रहेंगे साथ मेरे, क्योंकि मेरी कोई जायदाद नहीं! *******

  • पढ़ने का अलग ढंग

    मुकेश ‘नादान’ यह कथा उस समय की है जब नरेंद्रनाथ विद्यालय के लिए पाठशाला में भरती हुए थे। पाठशाला जाने के पहले दत्त-वंश के कुल पुरोहित ने आकर रामखड़ी (लाल रंग की खिल्ली) का चित्र बनाकर नरेंद्र को सिखाया-यह “क' है, यह “ख' है। नरेंद्र ने भी कहा, यह 'क' है, यह “ख' है। इसके बाद धोती पहनकर सरकंडे की कलम लेकर वे पाठशाला गए। किंतु विद्यालय तो एक अपूर्व स्थान होता है। वहाँ अनचाहे, अनजाने, विभिन्‍न सामाजिक स्तरों के कितने ही लड़के इकट्ठे होते हैं। उनकी बातचीत, बोल-चाल भी सब नए ढंग के होते हैं। इसके फलस्वरूप दो-चार दिनों के भीतर ही शब्दकोश से बाहर के कई शब्दों को नरेंद्र ने सीख लिया। जब उनके माता-पिता को इसका पता चला तो उन्होंने नरेंद्र को उस विद्यालय में रखना उचित नहीं समझा। उन्होंने घर पर ही अपने पूजाघर में एक छोटी सी पाठशाला खोलकर वहाँ गुरुजी के हाथों अपने पुत्र को समर्पित कर दिया। बाहर की पाठशाला में नए संगियों को पाकर नरेंद्र को जो आनंद प्राप्त हुआ था, उसकी कमी भी यहाँ बहुत कुछ पूरी हो गई; क्योंकि इस नई पाठशाला में कई आत्मीय लड़के भी आ गए थे। नरेंद्र ने तब छठे वर्ष में प्रवेश किया था। इस तरह विद्यालय की शिक्षा शुरू होने पर भी माँ के निकट नरेंद्र जो ज्ञान प्राप्त कर रहे थे, वह बंद नहीं हुआ और पुस्तकीय विद्या के हिसाब से बँगला वर्ण परिचय सरकार की अँगरेजी फर्स्ट बुक को उन्होंने माँ से ही पढ़ लिया था। नरेंद्रनाथ के पढ़ने का एक अपना ही ढंग था। अध्यापक महोदय बगल में बैठकर नित्य पाठ पढ़ा जाते और नरेंद्र आँखें मूँदकर सोए-सोए उसे सुनते। इतने से ही उनको दैनिक पाठ याद हो जाता। श्रीरामकृष्ण के भक्त भी रामचंद्र दत्त के पिता नूसिंह दत्त उन दिनों अपने पुत्र के साथ नरेंद्र के घर पर ही रहते थे। रात में नरेंद्र नुसिंह दत्त के साथ ही सोया करते। वृद्ध दत्त महोदय को थोड़ा संस्कृत का ज्ञान था। उनकी धारणा थी कि कठिन विषयों को बचपन से सिखाने से लड़के उन्हें आसानी से याद रख सकते हैं। इस धारणा के कारण वे रात में नरेंद्र को अपने समीप रहने के सुयोग से पुरखों की नामावली, देवी-देवताओं के नाम और मुग्धबोध व्याकरण के सूत्रों को मौखिक रूप से उन्हें सिखाया करते थे। अपनी माता, आत्मीय जन और गुरु महोदय की कृपा से इस प्रकार बैँगला भाषा और संस्कृत में नरेंद्र ने अल्प आयु में ही पर्याप्त ज्ञान प्राप्त कर लिया। सन्‌ 1871 में, जब वे आठ वर्ष के थे, विद्यासागर महाशय के मेट्रोपोलिटन इंस्टीट्यूशन की तत्कालीन नौवीं कक्षा में उनका नामांकन करवा दिया गया। विद्यालय उन दिनों सुकिया-स्ट्रीट में था। वहाँ इन दिनों लाहा का घर हो गया है। विद्यालय के सभी शिक्षकगण उनकी बुद्धिमत्ता से उनकी ओर आकृष्ट हुए। किंतु एक कठिन समस्या उत्पन्न हो गई। अँगरेजी भाषा सीखने के प्रति उन्होंने तीव्र अनिच्छा प्रकट की। सभी लोगों ने बहुत समझाया, “आजकल अँगरेजी शिक्षा पाना आवश्यक है। नहीं सीखने से काम नहीं चलता।” तथापि नरेंद्र की प्रतिज्ञा नहीं 'टली। वृद्ध नृसिंह दत्त महाशय ने भी समझाया, किंतु सफल नहीं हुए। इस तरह कुछ समय बीत जाने पर नरेंद्र ने न जाने क्या सोचकर दत्त महाशय की बात मान ली। इस नई इच्छा के साथ-साथ वे इस प्रकार नए उत्साह से यह भाषा सीखने लगे कि सभी देखकर अवाव्क्त हो गए। इतिहास और संस्कृत भाषा भी उन्होंने सीखी थी, किंतु अंकगणित के प्रति वे विरु थे। प्रवेशिका श्रेणी में अध्ययन काल में यद्यपि उन्हें कड़ा परिश्रम करना पड़ता था तथापि वे केवल किताबी कीड़ा नहीं बनना चाहते थे। वे रटंत विद्या में विश्वास नहीं करते थे। निश्चय ही इसके चलते परीक्षाफल में उन्हें हानि भी 'उठानी पड़ी थी। उनके मनोनुकूल विषयों को अधिक समय मिलता। लेकिन अन्य विषयों में उस प्रकार अधिकार नहीं हो पाता था। उन्हें साहित्य पसंद था। इतिहास में उनकी विशेष रुचि थी। इसीलिए मार्शमैन, एलफिंस्टन आदि विद्वानों की भारत के इतिहास की पुस्तकें उन्होंने पढ़ डालीं। अँगरेजी और बँगला साहित्य की कई अच्छी-अच्छी पुस्तकों का उन्होंने अध्ययन किया था। किंतु गणित की ओर वे भली-भाँति ध्यान नहीं देते थे। एक बार उन्होंने कहा था, “प्रवेशिका परीक्षा के मात्र दो-तीन दिन पहले देखा कि रेखागणित को तो कुछ पढ़ा ही नहीं। तब सारी रात जागकर पढ़ने लगे और चौबीस घंटों में रेखागणित की चार पुस्तकों को 'पढ़कर अधिकृत कर लिया।” इन्ही दिनों उन्होंने पुस्तक पढ़ने की एक नई रीति की खोज की। बाद में उन्होंने बताया था, “ऐसा अभ्यास हो गया था कि किसी लेखक की पुस्तक को पंक्तिबद्ध नहीं पढ़ने पर भी मैं उसे समझ लेता था। हर अनुच्छेद (पैराग्राफ) की प्रथम और अंतिम पंक्तियाँ पढ़कर ही उसका भाव ग्रहण कर लेता। यह शक्ति जब और बढ़ गई, तब अनुच्छेद (पैराग्राफ) पढ़ने की भी जरूरत नहीं पड़ती थी। हर पृष्ठ की प्रथम और अंतिम पंक्तियाँ पढ़कर ही समझ लेता। फिर जहाँ किसी विषय को समझाने के लिए लेखकों ने चार-पाँच या इससे अधिक पृष्ठ लगाकर विवेचन करना शुरू किया होता, वहाँ आरंभ की कुछ बातों को पढ़कर ही मैं उसे समझ लेता था।” *******

  • होली का मज़ाक

    यशपाल “बीबी जी, आप आवेंगी कि हम चाय बना दें!” किलसिया ने ऊपर की मंज़िल की रसोई से पुकारा। “नहीं, तू पानी तैयार कर- तीनों सेट मेज़ पर लगा दे, मैं आ रही हूँ। बाज़ आए तेरी बनाई चाय से। सुबह तीन-तीन बार पानी डाला, तो भी इनकी काली और ज़हर की तरह कड़वी. . .। तुम्हारे हाथ डिब्बा लग जाए, तो पत्ती तीन दिन नहीं चलती। सात रुपए में डिब्बा आ रहा है। मरी चाय को भी आग लग गई है।” मालकिन ने किलसिया को उत्तर दिया। आलस्य अभी टूटा नहीं था। ज़रा और लेट लेने के लिए बोलती गईं, “बेटा मंटू, तू ज़रा चली जा ऊपर। तीनों पॉट बनवा दे। बेटा, ज़रा देखकर पत्ती डालना, मैं अभी आ रही हूँ।” “अम्मा जी, ज़रा तुम आ जाओ! हमारी समझ में नहीं आता। बर्तन सब लगा दिए हैं।” सत्रह वर्ष की मंटू ने ऊपर से उत्तर दिया। ठीक ही कह रही है लड़की, मालकिन ने सोचा। घर मेहमानों से भरा था, जैसे शादी-ब्याह के समय का जमाव हो। चीफ़ इंजीनियर खोसला साहब के रिटायर होने में चार महीने ही शेष थे। तीन वर्ष की एक्सटेंशन भी समाप्त हो रही थी। पिछले वर्ष बड़े लड़के और लड़की के ब्याह कर दिए थे। रिटायर होकर तो पेंशन पर ही निर्वाह करना था। जो काम अब हज़ार में हो जाता, रिटायर होने पर उस पर तीन हज़ार लगते। रिटायर होकर इतनी बड़ी, तेरह कमरे की हवेली भी नहीं रख सकते थे। पहली होली पर लड़की जमाई के साथ आई थी। बड़ा लड़का आनंद सात दिन की छुट्टी लेकर आया था, इसलिए बहू को भी बुला लिया था। आनंद की छोटी साली भी बहन के साथ लखनऊ की सैर के लिए आ गई थी। इंजीनियर साहब के छोटे भाई गोंडा जिले में किसी शुगर मिल में इंजीनियर थे। मई में उनकी लड़की का ब्याह था। वे पत्नी, साली और लड़की के साथ दहेज ख़रीदने के लिए लखनऊ आए हुए थे। खूब जमाव था। मालकिन ऊपर पहुँची। प्लेटों में अंदाज़ से नमकीन और मिठाई रखी। जमाई ज्ञान बाबू के लिए बिस्कुट और संतरे रखे। साहब इस समय कुछ नहीं खाते थे। उनके लिए थोड़ी किशमिश रखी। किलसिया और सित्तो के हाथ नीचे भेजने के लिए ट्रे में चाय लगाने लगीं। “अम्मा जी, यह क्या?” मंटू माँ के बायें हाथ की ओर संकेत कर झल्ला उठी, “फिर वही डंडे जैसी खाली कलाइयाँ! कड़ा फिर उतार दिया! तुम्हें तो सोना घिस जाने की चिंता खाए जाती है।” “नहीं मंटू. . .” माँ ने समझाना चाहा। “तुम ज़रा ख़याल नहीं करतीं,” मंटू बोलती गई, “इतने लोग घर में आए हुए हैं। त्योहार का दिन है। यही तो समय होता है कि कुछ पहनने का और तुम उतार कर रख देती हो।” मंटू झुँझला ही रही थी कि उसकी चाची, मालकिन की देवरानी लीला नाश्ते में सहायता देने के लिए ऊपर आ गई। उसने भी मंटू का साथ दिया, “हाँ भाभी जी, त्योहार का दिन है, घर में बहू आई है, जमाई आया है, ऐसे समय भी कुछ नहीं पहना! कलाई नंगी रहे, तो असगुन लगता है। सुबह तो चूड़ियाँ भी थीं, कड़ा भी था।” मालकिन ने नाश्ता बाँटने से हाथ रोककर मंटू से कहा, “जा नन्हीं, दौड़कर जा, बीचवाले गुसलखाने में देख! सिर धोने लगी थी, तो बालों में उलझ रहा था, वहीं उतार कर रख दिया था। जहाँ मंजन-वंजन पड़ा रहता है, वहीं रखा था। लाकर पहना दे!” “मंटू जी ने धड़धड़ाती हुई नीचे गई। गुसलखाने में देखकर उसने वहीं से पुकारा, “अम्मा जी, यहाँ कुछ नहीं है।” मालकिन ने मंटू की बात सुनी, तो चेहरे पर चिंता झलक आई। देवरानी से बोलीं, “लीला, मेरे बाद तुम नहाई थी न। तुमने नहीं देखा! आलमारी में रख दिया था।” और फिर वहीं बैठे-बैठे मंटू को उत्तर दिया, “अच्छा बेटी, ज़रा अपने कमरे में तो देख ले! ड्रेसिंग टेबल की दराज़ में देख लेना, कपड़े वहीं पहने थे!” लीला की बहन कैलाश भी आ गई थी। उसने भी पूछ लिया, “क्या है, क्या नहीं मिल रहा?” लीला को भाभी की बात अच्छी नहीं लगी। चेहरा गंभीर हो गया। उसने तुरंत अपनी बहन को संबोधन किया, “काशो, हम दोनों तो नीचे के गुसलखाने में नहाने गई थीं. . .।” मालकिन ने देवरानी के बुरा मान जाने की आशंका में तुरंत बात बदली, “मैं तो कह रही हूँ कि तू वहाँ नहाई होती तो उठाकर सँभाल लिया होता।” भाभी की बात से लीला को संतोष नहीं हुआ। उसने फिर कैलाश को याद दिलाया, “काशो, मैं बीच के गुसलखाने में जा रही थी, तो किलसिया ने नहीं कहा था कि बहू का साबुन-तौलिया और उसके लिए गरम पानी रख दिया है। आपके बाद तो कुसुम ही नहाई थी। सँभाल कर रखा होगा तो उसी के पास होगा।” बीच की मंज़िल से फिर मंटू की पुकार सुनाई दी, “अम्मा जी, यहाँ भी नहीं है, मैंने सब देख लिया है।” मालकिन ने कैलाश से कहा, “काशो बहन, तू जा नीचे, मंटू से कह कि ज़रा कुसुम से पूछ ले। उसने सँभाल लिया होगा। मुझे तो यही याद है कि गुसलखाने की आलमारी में रखा था।” कैलाश नीचे जा रही थी, तो लीला ने मालकिन को सुझाया, “भाभी जी, आपके बाद. . .।” किलसिया कमरे में आ गई थी। बोली, “गोल कमरे में चाय दे दी है। बड़े साहब, जमाई बाबू और बड़े भैया तीनों वहीं पी रहें हैं। पकौड़ी लौटा दी है, कोई नहीं खाएगा। बहू जी, उनकी बहन और बड़ी बिटिया भी चाय नीचे मँगा रही हैं।” “सित्तो क्या कर रही है?” मालकिन ने किलसिया से पूछा। “नीचे के गुसलखाने में कपड़े धो रही है।” किलसिया बहू, उनकी बहन और बड़ी बिटिया के लिए चाय लेकर चली तो बोली, “आपके बाद कुसुम से पहले किलसिया भी तो गुसलखाने में गई थी। उसी ने तो आपके कपड़े उठाकर कुसुम के लिए साबुन-तौलिया रखा था।” लीला ने स्वर दबा कर कहा। “भाभी जी, मैंने आपसे कहा नहीं, पर किलसिया की आदत अच्छी नहीं है। पहले भी देखा, इस बार भी दो बार पैसे उठ चुके हैं। परसों मैंने मेज़ की दराज में एक रुपया तेरह आना रख दिए थे, चार आने चले गए। ‘इनके’ कोट की जेब में रुपए-रुपए के सत्ताइस नोट थे, एक रुपया उड़ गया। कमरे किलसिया ही साफ़ करती है। मैंने सोचा, इतनी-सी बात के लिए मैं क्या कहूँ?” मालकिन ने समझाया, “तू भी क्या कहती है लीला! आठ आने, रुपए की बात मैं मानती हूँ, मरी उठा लेती होगी पर पाँच तोले का कड़ा उठा ले, ऐसी हिम्मत कहाँ? मरी बेचने जाएगी तो पकड़ी नहीं जाएगी?” मंटू और कैलाश ने आकर बताया, “कुसुम भाभी कहती हैं कि उन्होंने तो कड़ा देखा नहीं।” सित्तो ने कपड़े धोकर सामने की छत पर लगे तारों पर फैला दिए थे। उसने वहीं से मालकिन को पुकारा, “बीबी जी, सब काम हो गया, अब हम जाएँ!” किलसिया फिर ऊपर आ गई थी। वह भी बोली, “हमें भी छुट्टी दीजिए, त्योहार का दिन है, ज़रा घर की भी सुध लें।” “जाना बाद में,” मालकिन बोलीं, “देखो, हमने सिर धोया था तो कड़ा उतार की गुसलखाने की अलमारी में रख दिया था। पहले ढूंढ़ कर लाओ, तब कोई घर जाएगा।” किलसिया ने तुरंत विरोध किया, “हम क्या जाने, हमें तो जिसने जो कपड़ा दिया गुसलखाने में रख दिया। रंग से ख़राब कपड़े उठा कर धोबी वाली पिटारी में डाल दिए। हमने छुआ हो तो हमारे हाथ टूटें।” सित्तो ने दुहाई दी, “हाय बीबी जी, हम तो बीच के गुसलखाने में गई ही नहीं। हम तो सुबह से महाराज के साथ बर्तन-भांडे में लगी रहीं और तब से नीचे कपड़े धो रही थीं।” “ख़ामख़्वाह क्यों बकती हो!” मालकिन ने दोनों को डाँट दिया, “मैं किसी को कुछ कह रही हूँ? कड़ा गुस्लख़ाने में रखा था, पाँच तोले का है, कोई मज़ाक तो है नहीं! किसकी हिम्मत है जो पचा लेगा!” घर भर में चिंता फैल गई। सब ओर खुसुर-फुसुर होने लगी। बात मर्दों में भी पहुँच गई। जमाई ज्ञान बाबू ने पुकारा, “क्यों मंटा बहन जी, क्या बात है? माँ जी, मंटा ने छिपा लिया है। कहती है पाँच चाकलेट दोगी तो ढूंढ देगी।” मंटा ने विरोध किया, “हाय जीजा जी, कितना झूठ! मैंने कब कहा? मैं तो खुद सब जगह ढूँढ़ती फिर रही हूँ।” बड़ा लड़का आनंद भी बोल उठा, “अम्मा जी, याद भी है कि कड़ा पहना था। कहीं स्टील वाली अलमारी में ही तो नहीं पड़ा है। तुम घर भर ढूँढ़वा रही हो। तुम भूल भी तो जाती हो। चाभियाँ रखती हो ड्रेसिंग टेबल की दराज में छिपाकर और ढूँढ़ती हो रसोई में।” मालकिन ने जीना उतरते हुए बेटे को उत्तर दिया, “तुम भी क्या कह रहे हो? कल शाम लीला के साथ दाल धो रही तो बायें हाथ से घड़ी खोल कर रख दी थी। मंटू ने शोर मचाया, खाली कलाई अच्छी नहीं लगती। वही घड़ी नीचे रखकर कड़ा ले आई थी।” बड़ी लड़की ने माँ का समर्थन किया, “क्या कह रहे हो भैया, सुबह भी कड़ा अम्मा जी के हाथ में था। हमने खुद देखा है।” कैलाश ने भी वीणा का समर्थन किया, “सुबह मिश्रानी जी के यहाँ गई थीं, तब भी कड़ा हाथ में था। मिश्रानी जी ने नहीं कहा था कि बहुत दिनों बाद पहना है!” सित्तो ने दोनों गुसलखाने अच्छी तरह देखे। फिर महाराज के साथ रसोई में सब जगह देख रही थी। किलसिया सब कमरों में जा-जाकर ढूंढ़ रही थी। न देखने लायक जगह में भी देख रही थी और बड़बड़ाती जा रही थी, “बीबी जी चीज़-बस्त खुद रख कर भूल जाती हैं और हम पर बिगड़ा करती हैं।” बात घर में फैल गई थी। बड़े साहब और छोटे साहब ने भी सुन लिया था। दोनों ही इस विषय में जिज्ञासा कर चुके थे। छोटे साहब भाभी से अंग्रेज़ी में पूछ रहे थे, “आपके नहाने के बाद नौकरों में से कोई घर के बाहर गया था या नहीं?” सभी सहमे हुए थे। स्त्रियाँ, लड़कियाँ सब आँगन में इकट्ठी हो गई थीं। दबे-दबे स्वर में नौकरों के चोरी लगने के उदाहरण बता रही थीं। अब मालकिन भी घबरा गईं थीं। देवरानी ने उनके समीप आकर फिर कहा, “देखा नहीं भाभी, किलसिया क़समें तो बहुत खा रही थी पर चेहरा उतर गया है।” “यहाँ आकर तो देखिए!” किलसिया ने बड़े साहब के कमरे से चिक उठाकर पुकारा। “क्यों, क्या है?” मंटा और वीणा ने एक साथ पूछ लिया। “हम कह रहे हैं, यहाँ तो आइए!” किलसिया ने कुछ झुँझलाहट दिखाई। वीणा और मंटा उधर चली गईं। दोनों बहनें कमरे से बाहर निकलीं तो मुँह छिपाए दोहरी हुई जा रही थीं। हँसी रोकने के लिए दोनों ने मुँह पर आँचल दबा लिए थे। किलसिया कमरे से निकली तो भवें चढ़ाकर ऊँचे स्वर में बोल उठीं, “रात साहब के तकिये के नीचे छोड़ आईं। घर भर में ढुँढ़ाई करा रही हैं।” “पापा के तकिये के नीचे।” मंटा ने हँसी से बल खाते हुए कह ही दिया। लीला, कुसुम, कैलाश, नीता सबके चेहरे लाज से लाल हो गए। सब मुँह छिपा कर फिस-फिस करती इधर से उधर भाग गईं। मालकिन का चेहरा खिसियाहट से गंभीर हो गया। अवाक निश्चल रह गईं। वीणा से ज्ञान बाबू ने अर्थपूर्ण ढंग से खाँस कर कहा, “कड़ा मिलने की तो डबल मिठाई मिलनी चाहिए।” छोटे बाबू से भी रहा नहीं गया, बोल उठे, “भाभी, क्या है?” गोल कमरे से बड़े साहब की भी पुकार सुनाई दी, “मिल गया, मंटू कहाँ से मिला है?” मंटू मुँह में आँचल ठूँसे थी, कैसे उत्तर देती? छोटे साहब फिर बोले, “भाभी, भैया क्या पूछ रहे हैं?” मालकिन खिसियाहट से बफरी हुई थीं, क्या बोलतीं? लीला ने हँसी दबाकर भाभी के काम न में कहा, “देखा चालाक को, कहाँ जाकर रख दिया। तभी ढूँढ़ती फिर रही थी।” ज़ेवर चोरी की बात पड़ोसी मिश्रा जी के यहाँ भी पहुँच गई थी। मिश्राइन जी ने आकर पूछ लिया, “मंटू की माँ, क्या बात है, क्या हुआ?” “कुछ नहीं, कुछ नहीं।” मालकिन को बोलना पड़ा, “ख़ामख़्वाह शोर मचा दिया।” कुसुम से रहा नहीं गया। अपने कमरे से झाँक कर बोली, “ताई जी, किलसिया ने अम्मा जी के साथ होली का मज़ाक किया है।” ********

  • मन बच्चा

    वीना उदय मन फिर-फिर बच्चा हो जाता है। जब 80 साल की बुजुर्ग पिता को अपनी चिंता करता पाता है। बूढ़ी सशक्त हड्डियां सारी ताकत समेट जब पूरे आत्मविश्वास से कहती हैं। मैं हूं ना, मैं हूं ना। बेटा किसी बात की चिंता ना करना मैं हर पल तुम्हारे साथ हूं ना। दुनिया की हर खुशियां मुझ पर लुटाने को आतुर पिता और मेरी नजर उतार हर बला को दूर भगाने की कोशिश में जुटी मां जब पूछती है बेटा खाना खाया तो भूख ना होने पर भी मां के हाथों की गरमागरम रोटियों का लालच भूख जगा जाता है। तुम्हारा ध्यान करने की उम्र में जब तुम दोनों मेरे ख्याल रखते हो तो मन फिर-फिर बच्चा हो जाता है। तुम्हारा साया हर पल मेरे सिर पर यूं ही बना रहे और मेरा मन यूं ही बच्चा बन कर जिए। ******

  • दु:ख का अधिकार

    यशपाल मनुष्यों की पोशाकें उन्हें विभिन्न श्रेणियों में बाँट देती हैं। प्रायः पोशाक ही समाज में मनुष्य का अधिकार और उसका दर्जा निश्चित करती है। वह हमारे लिए अनेक बंद दरवाजे खोल देती है, परंतु कभी ऐसी भी परिस्थिति आ जाती है कि हम जरा नीचे झुककर समाज की निचली श्रेणियों की अनुभूति को समझना चाहते हैं। उस समय यह पोशाक ही बंधन और अड़चन बन जाती है। जैसे वायु की लहरें कटी हुई पतंग को सहसा भूमि पर नहीं गिर जाने देतीं, उसी तरह खास परिस्थितियों में हमारी पोशाक हमें झुक सकने से रोके रहती है। बाज़ार में, फुटपाथ पर कुछ ख़रबूज़े डलिया में और कुछ जमीन पर बिक्री के लिए रखे जान पड़ते थे। ख़रबूज़ों के समीप एक अधेड़ उम्र की औरत बैठी रो रही थी। ख़रबूज़े बिक्री के लिए थे, परंतु उन्हें खरीदने के लिए कोई कैसे आगे बढ़ता? ख़रबूज़ों को बेचनेवाली तो कपड़े से मुँह छिपाए सिर को घुटनों पर रखे फफक-फफककर रो रही थी। पड़ोस की दुकानों के तख़्तों पर बैठे या बाज़ार में खड़े लोग घृणा से उसी स्त्री के संबंध में बात कर रहे थे। उस स्त्री का रोना देखकर मन में एक व्यथा-सी उठी, पर उसके रोने का कारण जानने का उपाय क्या था? फुटपाथ पर उसके समीप बैठ सकने में मेरी पोशाक ही व्यवधान बन खड़ी हो गई। एक आदमी ने घृणा से एक तरफ़ थूकते हुए कहा, ‘क्या जमाना है! जवान लड़के को मरे पूरा दिन नहीं बीता और यह बेहया दुकान लगा के बैठी है।’ दूसरे साहब अपनी दाढ़ी खुजाते हुए कह रहे थे, ‘अरे जैसी नीयत होती है अल्ला भी वैसी ही बरकत देता है।’ सामने के फुटपाथ पर खड़े एक आदमी ने दियासलाई की तीली से कान खुजाते हुए कहा, ‘अरे, इन लोगों का क्या है? ये कमीने लोग रोटी के टुकड़े पर जान देते हैं। इनके लिए बेटा-बेटी, ख़सम-लुगाई, धर्म-ईमान सब रोटी का टुकड़ा है।’ परचून की दुकान पर बैठे लाला जी ने कहा, ‘अरे भाई, उनके लिए मरे-जिए का कोई मतलब न हो, पर दूसरे के धर्म-ईमान का तो खयाल करना चाहिए! जवान बेटे के मरने पर तेरह दिन का सूतक होता है और वह यहाँ सड़क पर बाज़ार में आकर ख़रबूज़े बेचने बैठ गई है। हजार आदमी आते-जाते हैं। कोई क्या जानता है कि इसके घर में सूतक है। कोई इसके ख़रबूज़े खा ले तो उसका ईमान- धर्म कैसे रहेगा? क्या अँधेर है!’ पास-पड़ोस की दुकानों से पूछने पर पता लगा-उसका तेईस बरस का जवान लड़का था। घर में उसकी बहू और पोता-पोती हैं। लड़का शहर के पास डेढ़ बीघा भर जमीन में कछियारी करके परिवार का निर्वाह करता था। ख़रबूज़ों की डलिया बाज़ार में पहुँचाकर कभी लड़का स्वयं सौदे के पास बैठ जाता, कभी माँ बैठ जाती। लड़का परसों सुबह मुँह-अँधेरे बेलों में से पके ख़रबूज़े चुन रहा था। गीली मेड़ की तरावट में विश्राम करते हुए एक साँप पर लड़के का पैर पड़ गया। साँप ने लड़के को डस लिया। लड़के की बुढ़िया माँ बावली होकर ओझा को बुला लाई। झाड़ना-फूँकना हुआ। नागदेव की पूजा हुई। पूजा के लिए दान-दक्षिणा चाहिए। घर में जो कुछ आटा और अनाज था, दान-दक्षिणा में उठ गया। माँ, बहू और बच्चे ‘भगवाना’ से लिपट-लिपटकर रोए, पर भगवाना जो एक दफ़े चुप हुआ तो फिर न बोला। सर्प के विष से उसका सब बदन काला पड़ गया था। ज़िंदा आदमी नंगा भी रह सकता है, परंतु मुर्दे को नंगा कैसे विदा किया जाए? उसके लिए तो बजाज की दुकान से नया कपड़ा लाना ही होगा, चाहे उसके लिए माँ के हाथों के छन्नी-ककना ही क्यों न बिक जाएं । भगवाना परलोक चला गया। घर में जो कुछ चूनी-भूसी थी सो उसे विदा करने में चली गई। बाप नहीं रहा तो क्या, लड़के सुबह उठते ही भूख से बिलबिलाने लगे। दादी ने उन्हें खाने के लिए ख़रबूज़े दे दिए लेकिन बहू को क्या देती? बहू का बदन बुख़ार से तवे की तरह तप रहा था। अब बेटे के बिना बुढ़िया को दुअन्नी-चवन्नी भी कौन उधार देता। बुढ़िया रोते-रोते और आँखें पोंछते-पोंछते भगवाना के बटोरे हुए ख़रबूज़े डलिया में समेटकर बाज़ार की ओर चली-और चारा भी क्या था? बुढ़िया ख़रबूज़े बेचने का साहस करके आई थी, परंतु सिर पर चादर लपेटे, सिर को घुटनों पर टिकाए हुए फफक-फफककर रो रही थी। कल जिसका बेटा चल बसा, आज वह बाज़ार में सौदा बेचने चली है, हाय रे पत्थर-दिल! उस पुत्र-वियोगिनी के दुःख का अंदाजा लगाने के लिए पिछले साल अपने पड़ोस में पुत्र की मृत्यु से दुःखी माता की बात सोचने लगा। वह संभ्रांत महिला पुत्र की मृत्यु के बाद अढ़ाई मास तक पलंग से उठ न सकी थी। उन्हें पंद्रह-पंद्रह मिनट बाद पुत्र-वियोग से मूर्छा आ जाती थी और मूर्छा न आने की अवस्था में आँखों से आँसू न रुक सकते थे। दो-दो डॉक्टर हरदम सिरहाने बैठे रहते थे। हरदम सिर पर बर्फ़ रखी जाती थी। शहर भर के लोगों के मन उस पुत्र-शोक से द्रवित हो उठे थे। जब मन को सूझ का रास्ता नहीं मिलता तो बेचैनी से कदम तेज हो जाते हैं। उसी हालत में नाक ऊपर उठाए, राह चलतों से ठोकरें खाता मैं चला जा रहा था। सोच रहा था- शोक करने, गम मनाने के लिए भी सहूलियत चाहिए और दुःखी होने का भी एक अधिकार होता है। *******

  • ग़म गुसार

    उषा श्रीवास्तव किए हैं दफ़्न कई राज़ अब बताऊं क्या कफ़न ये ओढ़ने से पहले मुस्कुराऊं क्या। खटक रही हूं नज़र में अगर ज़ियादा मैं तेरे गुनाह भी इक बार मैं गिनाऊं क्या। चमक रहा है नगीने सा‌ जो अंगूठी में उसी के दिल की वसीयत पे हक़ जताऊं क्या। मैं ग़म गुसार बनूँ है कहाँ मेरी किस्मत सुकूं मिले तो ग़ज़ल गीत मैं सुनाऊं क्या। उसे तलब है कि सजदे करूं सियासत में मैं गर्दिशों में झुकूं सर कलम कराऊं क्या। ******

  • राही

    सुभद्रा कुमारी चौहान “तेरा नाम क्या है?” “राही” “तुझे किस अपराध में सज़ा हुई?” “चोरी की थी, सरकार।” “चोरी? क्या चुराया था?” “अनाज की गठरी।” “कितना अनाज था?” “होगा पाँच-छः सेर।” “और सज़ा कितने दिन की है?” “साल भर की।” “तो तूने चोरी क्यों की? मजदूरी करती, तब भी तो दिन भर में तीन-चार आने पैसे मिल जाते!” “हमें मजदूरी नहीं मिलती सरकार। हमारी जाति मांगरोरी है। हम केवल मांगते-खाते हैं।” “और भीख न मिले तो?” “तो फिर चोरी करते हैं। उस दिन घर में खाने को नहीं था। बच्चे भूख से तड़प रहे थे। बाजार में बहुत देर तक मांगा। बोझा ढोने के लिए टोकरा लेकर भी बैठी रही। पर कुछ न मिला। सामने किसी का बच्चा रो रहा था, उसे देखकर मुझे अपने भूखे बच्चों की याद आ गई। वहीं पर किसी की अनाज की गठरी रखी हुई थी। उसे लेकर भागी ही थी कि पुलिसवाले ने पकड़ लिया।” अनिता ने एक ठंडी साँस ली। बोली, “फिर तूने कहा नहीं कि बच्चे भूखे थे, इसलिए चोरी की। संभव है इस बात से मजिस्ट्रेट कम सज़ा देता।” “हम गरीबों की कोई नहीं सुनता, सरकार। बच्चे आये थे कचहरी में। मैंने सब-कुछ कहा, पर किसी ने नहीं सुना।” राही ने कहा। “अब तेरे बच्चे किसके पास हैं? उनका बाप है?” अनिता ने पूछा। राही की आँखों में आँसू आ गए। वह बोली, “उनका बाप मर गया, सरकार। जेल में उसे मारा था और वहीं अस्पताल में वह मर गया। अब बच्चों का कोई नहीं है।” “तो तेरे बच्चों का बाप भी जेल में ही मरा। वह क्यों जेल आया था?” अनिता ने प्रश्न किया। “उसे तो बिना कसूर के ही पकड़ लिया था, सरकार।” राही ने कहा, “ताड़ी पीने को गया था। दो-चार दोस्त भाई उसके साथ थे। मेरे घरवाले का एक वक्त पुलिसवाले से झगड़ा हो गया था, उसी का बदला उनसे लिया। 109 में उसका चालान करके साल भर की सज़ा दिला दी। वहीं वह मर गया।” अनीता ने एक दीर्घ निःश्वास के साथ कहा, “अच्छा जा, अपना काम कर।” राही चली गई। अनीता सत्याग्रह करके जेल आई थी। पहिले उसे ‘बी‘ क्लास दिया था। फिर उसके घरवालों ने लिखा-पढ़ी करके उसे ‘ए‘ क्लास दिलवा दिया। अनीता के सामने आज एक प्रश्न था। वह सोच रही थी कि देश की दरिद्रता और इन निरीह गरीबों के कष्टों को दूर करने का कोई उपाय नहीं है? हम सभी परमात्मा की संतान हैं। एक ही देश के निवासी। कम-से-कम हम सबको खाने-पहनने का समान अधिकार तो है ही? फिर यह क्या बात है कि कुछ लोग तो बहुत आराम से रहते हैं और कुछ लोग पेट के अन्न के लिए चोरी करते हैं? उसके बाद विचारक की अदूरदर्शिता के कारण या सरकारी वकील के चातुर्यपूर्ण जिरह के कारण छोटे-छोटे बच्चों की मातायें जेल भेज दी जाती हैं। उनके बच्चे भूखों मरने के लिए छोड़ दिये जाते हैं। एक ओर तो यह कैदी है, जो जेल आकर सचमुच जेल जीवन के कष्ट उठाती है, और दूसरी ओर हैं हम लोग, जो अपनी देशभक्ति और त्याग का ढिंढोरा पीटते हुए जेल आते हैं। हमें आमतौर से दूसरे कैदियों के मुकाबिले में अच्छा बर्ताव मिलता है। फिर भी हमें संतोष नहीं होता। हम जेल आकर ‘ए‘ और ‘बी‘ क्लास के लिए झगड़ते हैं। जेल आकर ही हम कौन-सा बड़ा त्याग कर देते हैं? जेल में हमें कौन-सा कष्ट रहता है? सिवा इसके कि हमारे माथे पर नेतृत्व की सील लग जाती है। हम बड़े अभिमान से कहते हैं, “यह हमारी चौथी जेल यात्रा है, यह हमारी पांचवीं जेल यात्रा है।” और अपनी जेल यात्रा के किस्से बार-बार सुना-सुनाकर आत्मगौरव अनुभव करते हैं; तात्पर्य यह कि हम जितने बार जेल जा चुके होते हैं, उतनी ही सीढ़ी हम देशभक्ति और त्याग से दूसरों से ऊपर उठ जाते हैं और इसके बल पर जेल से छूटने के बाद, कांग्रेस को राजकीय सत्ता मिलते ही, हम मिनिस्टर, स्थानीय संस्थाओं के मेम्बर और क्या-क्या हो जाते हैं। अनीता सोच रही थी, “कल तक जो खद्दर भी न पहनते थे, बात-बात पर कांग्रेस का मज़ाक उड़ाते थे, कांग्रेस के हाथों में थोड़ी शक्ति आते ही वे कांग्रेस भक्त बन गए। खद्दर पहनने लगे। यहाँ तक कि जेल में भी दिखाई पड़ने लगे। वास्तव में यह देशभक्ति है या सत्ताभक्ति!” अनीता के विचारों का तांता लगा हुआ था। वह दार्शनिक हो रही थी। उसे अनुभव हुआ, जैसे कोई भीतर-ही-भीतर उसे काट रहा हो। अनीता की विचारावली अनीता को ही खाये जा रही थी। उसे बार-बार यह लग रहा था कि उसकी देशभक्ति सच्ची देशभक्ति नहीं, वरन् मज़ाक है। उसे आत्मग्लानि हुई और साथ-ही-साथ आत्मानुभूति भी। अनीता की आत्मा बोल उठी, “वास्तव में सच्ची देशभक्ति तो इन गरीबों के कष्ट-निवारण में है। ये कोई दूसरे नहीं, हमारी ही भारतमाता की संतानें हैं। इन हज़ारों, लाखों भूखे-नंगे भाई-बहिनों की यदि हम कुछ भी सेवा कर सकें, थोड़ा भी कष्ट-निवारण कर सकें, तो सचमुच हमने अपने देश की कुछ सेवा की। हमारा वास्तविक देश तो देहातों में ही है। किसानों की दुर्दशा से हम सभी थोड़े-बहुत परिचित हैं, पर इन गरीबों के पास न घर है, न द्वार। अशिक्षा और अज्ञान का इतना गहरा पर्दा इनकी आँखों पर है कि होश संभालते ही माता पुत्री को और सास बहू को चोरी की शिक्षा देती है। और उनका यह विश्वास है कि चोरी करना और भीख मांगना ही उनका काम है। इससे अच्छा जीवन बिताने की वह कल्पना ही नहीं कर सकते। आज यहाँ डेरा डाल के रहे, तो कल दूसरी जगह चोरी की। बचे तो बचे, नहीं तो फिर साल दो साल के लिए जेल। क्या मानव जीवन का यही लक्ष्य है? लक्ष्य है भी अथवा नहीं? यदि नहीं है, तो विचारादर्श की उच्च सतह पर टिके हुए हमारे जन-नायकों और युग-पुरुषों की हमें क्या आवश्यकता? इतिहास, धर्म-दर्शन, ज्ञान-विज्ञान का कोई अर्थ नहीं होता? पर जीवन का लक्ष्य है, अवश्य है। संसार की मृग-मरीचिका में हम लक्ष्य को भूल जाते हैं। सतह के ऊपर तक पहुँच पाने वाली कुछेक महान आत्माओं को छोड़कर सारा जन-समुदाय संसार में अपने को खोया हुआ पाता है, कर्त्तव्याकर्त्तव्य का उसे ध्यान नहीं, सत्यासत्य की समझ नहीं, अन्यथा मानवीयता से बढ़कर कौन-सा मानव धर्म है? पतित मानवता को जीवन-दान देने की अपेक्षा भी कोई महत्तर पुण्य है? राही जैसी भोली-भाली, किंतु गुमराह आत्माओं के कल्याण की साधना जीवन की साधना होनी चाहिए। सत्याग्रही की यह प्रथम प्रतिज्ञा क्यों न हो? देशभक्ति का यही मापदंड क्यों न बने?” अनीता दिन भर इन्हीं विचारों में डूबी रही। शाम को भी वह इसी प्रकार कुछ सोचते-सोचते सो गई। रात में उसने सपना देखा कि जेल से छूटकर वह इन्हीं मांगरोरी लोगों के गाँव में पहुँच गई है। वहाँ उसने एक छोटा-सा आश्रम खोल दिया है। उसी आश्रम में एक तरफ़ छोटे-छोटे बच्चे पढ़ते हैं और स्त्रियाँ सूत काटती हैं। दूसरी तरफ़ मर्द कपड़ा बुनते हैं और रूई धुनकते हैं। शाम को रोज़ उन्हें धार्मिक पुस्तकें पढ़कर सुनाई जाती हैं और देश में कहाँ क्या हो रहा है, यह सरल भाषा में समझाया जाता है। वही भीख मांगने और चोरी करने वाले आदर्श ग्रामवासी हो चले हैं। रहने के लिए उन्होंने छोटे-छोटे घर बना लिए हैं। राही के अनाथ बच्चों को अनीता अपने साथ रखने लगी है। अनीता यही सुख-स्वप्न देख रही थी। रात में वह देर से सोई थी। सुबह सात बजे तक उसकी नींद न खुल पाई। अचानक स्त्री जेलर ने आकर उसे जगा दिया और बोली, “आप घर जाने के लिए तैयार हो जाइए। आपके पिता बीमार हैं। आप बिना शर्त छोड़ी जा रही हैं।” अनीता अपने स्वप्न को सच्चाई में परिवर्तित करने की एक मधुर कल्पना ले घर चली गई। ******

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