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बूढ़ी मां का बक्सा

डॉ. जहान सिंह ‘जहान’


बैलगाड़ी पर चलते-चलते मेरी कमर दुखने लगी है। बच्चों से मैंने सुना है कि अब आदमी आसमान में सैर करने लगा है। मेरे पास चंद तांबे के सिक्के, सिंदूर की पोटली, काजल की एक टूटी डिब्बी, नानी के लिए हुए कुछ चांदी के गहने। अपनी मां की दी हुई गुड़िया, कुछ बचपन के टूटी लकड़ी के खिलौने। एक पुराना एल्बम, शादी का एक जोड़ा जिसे संजोए सिर्फ करवा चौथ पर पहना, टूटा आईना, ऊन का गोला और सिलाई। बिटटी का स्वेटर तो शायद देना भूल गई। मां इन चीजों की रसीद ना दिखा पाई। कस्टम अधिकारी ने जहाज पर चढ़ने से रोक दिया। मैं थक कर फिर बैलगाड़ी में अपने सफर पर न जाने कितने दूर।
मैं हवाई यात्रा करना चाहता हूं।

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