top of page

ग़म गुसार

उषा श्रीवास्तव


किए हैं दफ़्न कई राज़ अब बताऊं क्या
कफ़न ये ओढ़ने से पहले मुस्कुराऊं क्या।
खटक रही हूं नज़र में अगर ज़ियादा मैं
तेरे गुनाह भी इक बार मैं गिनाऊं क्या।
चमक रहा है नगीने सा‌ जो अंगूठी में
उसी के दिल की वसीयत पे हक़ जताऊं क्या।
मैं ग़म गुसार बनूँ है कहाँ मेरी किस्मत
सुकूं मिले तो ग़ज़ल गीत मैं सुनाऊं क्या।
उसे तलब है कि सजदे करूं सियासत में
मैं गर्दिशों में झुकूं सर कलम कराऊं क्या।

******

Recent Posts

See All

Comments


bottom of page