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- मेरी ताकत
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव एक छोटे कसबे में रहने वाले दस वर्षीय बालक को जूडो सीखने का बहुत शौक था। परंतु बचपन में हुई एक दुर्घटना में बायाँ हाथ कट जाने के कारण उसके माता-पिता उसे जूडो सीखने की आज्ञा नहीं देते थे। अब वो बड़ा हो रहा था और उसकी जिद्द भी बढ़ती जा रही थी। अंततः माता-पिता को झुकना ही पड़ा और वो बालक को नजदीकी शहर के एक मशहूर मार्शल आर्ट्स गुरु के यहाँ दाखिला दिलाने ले गए। गुरु ने जब बालक को देखा तो उन्हें अचरज हुआ कि बिना बाएँ हाथ का यह बालक भला जूडो क्यों सीखना चाहता है? उन्होंने पूछा, “तुम्हारा तो बायाँ हाथ ही नहीं है तो भला तुम दूसरे बालकों का मुकाबला कैसे करोगे।” “ये बताना तो आपका काम है” बालक ने कहा। मैं तो बस इतना जानता हूँ कि मुझे सभी को हराना है और एक दिन खुद मास्टर बनना है। गुरु उसकी सीखने की दृढ इच्छा शक्ति से काफी प्रभावित हुए और बोले, “ठीक है मैं तुम्हें सिखाऊंगा लेकिन एक शर्त है, तुम मेरे प्रत्येक निर्देश का पालन करोगे और उसमें दृढ विश्वास रखोगे।” बालक ने सहमती में गुरु के समक्ष अपना सर झुका दिया। गुरु ने एक साथ लगभग पचास छात्रों को जूडो सिखना शुरू किया। बालक भी अन्य बालकों की तरह सीख रहा था। पर कुछ दिनों बाद उसने ध्यान दिया कि गुरु जी अन्य बालकों को अलग-अलग दांव-पेंच सिखा रहे हैं, लेकिन वह अभी भी उसी एक किक का अभ्यास कर रहा है जो उसने शुरू में सीखी थी। उससे रहा नहीं गया और उसने गुरु से पूछा, “गुरु जी आप अन्य बालकों को नए-नए दांवपेच सिखा रहे हैं, पर मैं अभी भी बस वही एक किक मारने का अभ्यास कर रहा हूँ। क्या मुझे और चीजें नहीं सीखनी चाहियें?” गुरु जी बोले, “तुम्हें बस इसी एक किक पर महारथ हांसिल करने की आवश्यकता है।” और वो आगे बढ़ गए। बालक को विस्मय हुआ पर उसे अपने गुरु में पूर्ण विश्वास था और वह फिर अभ्यास में जुट गया। समय बीतता गया और देखते-देखते दो साल गुजर गए, पर बालक उसी एक किक का अभ्यास कर रहा था। एक बार फिर बालक को चिंता होने लगी और उसने गुरु से कहा, “क्या अभी भी मैं बस यही करता रहूँगा और बाकी सभी नयी तकनीकों में पारंगत होते रहेंगे।” गुरु जी बोले, “तुम्हें मुझ में यकीन है तो अभ्यास जारी रखो।” बालक ने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए बिना कोई प्रश्न पूछे अगले 6 साल तक उसी एक किक का अभ्यास जारी रखा। सभी को जूडो सीखते आठ साल हो चुके थे कि तभी एक दिन गुरु जी ने सभी शिष्यों को बुलाया और बोले “मुझे आपको जो ज्ञान देना था वो मैं दे चुका हूँ और अब गुरुकुल की परंपरा के अनुसार सबसे अच्छे शिष्य का चुनाव एक प्रतिस्पर्धा के माध्यम से किया जायेगा और इसमें विजयी होने वाले शिष्य को “सर्वोत्तम” की उपाधि से सम्मानित किया जाएगा।” प्रतिस्पर्धा आरम्भ हुई। गुरु जी ने बालक को उसके पहले मैच में हिस्सा लेने के लिए आवाज़ दी। बालक ने लड़ना शुरू किया और खुद को आश्चर्य चकित करते हुए उसने अपने पहले दो मैच बड़ी आसानी से जीत लिए। तीसरा मैच थोडा कठिन था, लेकिन कुछ संघर्ष के बाद विरोधी ने कुछ क्षणों के लिए अपना ध्यान उस पर से हटा दिया, बालक को तो मानो इसी मौके का इंतज़ार था, उसने अपनी अचूक किक विरोधी के ऊपर जमा दी और मैच अपने नाम कर लिया। इस बार विरोधी कहीं अधिक ताकतवर, अनुभवी और विशाल था। देखकर ऐसा लगता था कि बालक उसके सामने एक मिनट भी टिक नहीं पायेगा। मैच शुरू हुआ, विरोधी बालक पर भारी पड़ रहा था, रेफरी ने मैच रोक कर विरोधी को विजेता घोषित करने का प्रस्ताव रखा, लेकिन तभी गुरु जी ने उसे रोकते हुए कहा, “नहीं, मैच पूरा चलेगा।” मैच फिर से शुरू हुआ। विरोधी अति आत्मविश्वास से भरा हुआ था और अब बालक को कम आंक रहा था। इसी दंभ में उसने एक भारी गलती कर दी, उसने अपना गार्ड छोड़ दिया। बालक ने इसका फायदा उठाते हुए आठ साल तक जिस किक की प्रैक्टिस की थी उसे पूरी ताकत और सटीकता के साथ विरोधी के ऊपर जड़ दिया और उसे ज़मीन पर धराशाई कर दिया। उस किक में इतनी शक्ति थी कि विरोधी वहीं मूर्छित हो गया और बालक को विजेता घोषित कर दिया गया। मैच जीतने के बाद बालक ने गुरु से पूछा, “भला मैंने यह प्रतियोगिता सिर्फ एक मूव सीख कर कैसे जीत ली?” “तुम दो वजहों से जीते,” गुरु जी ने उत्तर दिया। “पहला, तुम ने जूडो की एक सबसे कठिन किक पर अपनी इतनी दक्षता हासिल कर ली कि शायद ही इस दुनिया में कोई और यह किक इतनी निपुणता से मार पाए, और दूसरा कि इस किक से बचने का एक ही उपाय है, और वह है विरोधी के बाएँ हाथ को पकड़कर उसे ज़मीन पर पटकना।” बालक समझ चुका था कि आज उसकी सबसे बड़ी कमजोरी ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बन चुकी थी। सार - जिसके अन्दर अपने सपनें को साकार करने की दृढ इच्छा होती है भगवान उसकी मदद के लिए कोई न कोई गुरु भेज देता है, ऐसा गुरु जो उसकी सबसे बड़ी कमजोरी को ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बना कर उसके सपनें को साकार कर सकता है। ******
- दंड का अधिकारी
मुकेश ‘नादान’ नरेंद्र की प्रारंभिक शिक्षा घर पर रहते हुए ही एक निजी अध्यापक के दूबारा शुरू हुई। कुछ समय बाद उनका दाखिला मेट्रोपोलिटन इंस्टीट्यूट' में करवा दिया गया। इस स्कूल में आकर भी नरेंद्र की चंचलता में कोई कमी न आई। वह पहले की तरह ही उद्डं, निर्भीक और चंचल बना रहा। एक दिन एक अध्यापक कक्षा में पढ़ा रहे थे और नरेंद्र अपने कुछ साथियों के साथ गप्पें लड़ा रहा था। यह देखकर अध्यापक को क्रोध आ गया। उन्होंने नरेंद्र की टोली में से एक-एक छात्र को खड़ा करके उसी विषय का प्रश्न पूछा, जो वे पढ़ा रहे थे। सभी छात्रों का ध्यान तो नरेंद्र की बातों की ओर था, फिर भला वे अध्यापक के प्रश्न का उत्तर कैसे दे पाते। सबसे बाद में अध्यापक ने नरेंद्र को खड़ा करके उससे भी वही प्रश्न पूछा। नरेंद्र ने बिना किसी हिचकिचाहट के अध्यापक के प्रश्न का सही-सही उत्तर दे दिया। अध्यापक नरेंद्र का सही उत्तर पाकर बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे बैठने का आदेश दिया। अध्यापक द्वारा बैठने के लिए कहने पर भी नरेंद्र नीचे न बैठा तो अध्यापक बोले, “नरेंद्र, तुम्हारा उत्तर बिलकुल ठीक है। मैंने तुम्हें बैठने के लिए कहा है, खड़ा होकर दंड पाने के लिए नहीं।” “सर, मेरा उत्तर ठीक है, यह तो मैं भी जानता हूँ, किंतु फिर भी मैं दंड पाने का अधिकारी हूँ।” नरेंद्र ने गंभीरता से कहा। “क्यों? ” नरेंद्र की बात सुनकर अध्यापक ने हैरानी से पूछा। “क्योंकि सर, गप्पें तो मैं ही सुना रहा था। शेष सब तो सुन ही रहे थे।” नरेंद्र की बात सुनकर अध्यापक को बड़ा आश्चर्य हुआ। वे उसकी निर्भीकता और सत्यवादिता से बड़े प्रसन्न हुए। उसके पास आकर पीठ थपथपाते हुए बोले, “नरेंद्र, तुम्हारे बारे में मैं आज भविष्यवाणी करता हूँ कि तुम एक दिन निश्चय ही भारत के महान् व्यक्ति बनोगे।" अध्यापक की भविष्यवाणी का नरेंद्र पर यह प्रभाव पड़ा कि इसके बाद नरेंद्र ने स्कूल में शरारत करना छोड़ दिया। अब उन्हें अपने उत्तरदायित्व का बोध हो गया था। वे इस बात के लिए गंभीर हो गए थे कि उसकी उद्डंताओं के कारण कोई यह न कह दे कि यही वह उद्डीं छात्र है, जिसके महान् होने की अध्यापक ने भविष्यवाणी की है। ******
- लौट जाते हैं, अब
सविता पाटील चल, लौट जाते हैं अब चलते-चलते दूर तक निकल आए हैं अब! पलटकर देखूं तो, नज़र में कोई नहीं है, या तो मैं नहीं हूं किसी की… या कोई मेरी हद में नहीं है! किसी की आवाज़ भी… मुझ तक पहुंचती नहीं, और मेरी पुकार पलटती है मुझ पर! चल, लौट जाते हैं अब! *****
- बैल की पूँछ
डॉ. कृष्ण कांत श्रीवास्तव एक बार एक नौजवान आदमी एक किसान की बेटी से शादी की इच्छा लेकर उसके पास गया। किसान ने उसकी ओर देखा और कहा, “युवक, खेत में जाओ। मैं एक-एक करके तीन बैल छोड़ने वाला हूँ। अगर तुम तीनों बैलों में से किसी भी एक बैल की पूँछ पकड़ लो तो मैं अपनी बेटी की शादी ख़ुशी-ख़ुशी तुमसे कर दूंगा।” नौजवान खेत में बैल की पूँछ पकड़ने की तीव्र इच्छा लेकर खड़ा हो गया। उसके बाद किसान ने अपने घर का दरवाजा खोला और एक बहुत ही बड़ा और खतरनाक बैल उस घर से निकला। नौजवान ने ऐसा बैल पहले कभी नहीं देखा था। बैल से डर कर नौजवान ने निर्णय लिया कि वह अगले बैल का इंतज़ार करेगा और वह एक तरफ हो गया जिससे बैल उसके पास से होकर निकल जाए। घर का दरवाजा फिर खुला। आश्चर्यजनक रूप से इस बार पहले से भी बड़ा और भयंकर बैल निकला। नौजवान ने सोचा कि इससे तो पहला वाला बैल ही ठीक था। बेकार में मैंने एक अच्छा अवसर गवां दिया। फिर उसने एक ओर होकर बैल को निकल जाने दिया। उसके बाद तीसरी औऱ आख़री बार दरवाजा खुला। नौजवान के चेहरे पर मुस्कान आ गई। इस बार उसमें से एक छोटा और मरियल सा बैल निकला। जैसे ही बैल नौजवान के पास नज़दीक आने लगा, नौजवान ने उसकी पूँछ पकड़ने के लिए मुद्रा बना ली ताकि उसकी पूँछ सही समय पर पकड़ ले। पर उस बैल की पूँछ थी ही नहीं.........!! नौजवान निराश हो गया और वह किसान को दिया गया अपना वचन भी हार गया। जिन्दगी अवसरों से भरी हुई है। कुछ सरल हैं तो कुछ कठिन, पर अगर हमनें एक बार अच्छा अवसर गवां दिया तो फिर शायद वह अवसर जीवन में दुबारा नहीं मिलेगा। अतः हमेशा प्रथम अवसर को ही अंतिम अवसर मानकर उसे हासिल करने का प्रयास करना समझदारी है। ******
- सच्चा आईना
अंजलि मोल भाव इश्क में क्या करते हो जानां नाज़ुक सा दिल मेरा कोई बाजार नहीं है। मरमर से बदन पे, फिसले हैं निगाहें दिल ए बर्बाद का अब कोई खरीदार नहीं है। ख्वाब सा चमका था कभी नीम स्याह आंखों में अब है खिज्र का आलम, गुल ऐ बहार नहीं है बिकते हैं नकली चेहरे मुँहमाँगी कीमतों पर अब सच्चे आईनों के तलबगार नहीं हैं। ******
- पनिहारिन की सीख
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव एक साधु किसी नदी के पनघट पर गया और पानी पीकर पत्थर पर सिर रखकर सो गया। पनघट पर पनिहारिन आती-जाती रहती हैं। तो एक ने कहा - "आहा! साधु हो गया, फिर भी तकिए का मोह नहीं गया। पत्थर का ही सही, लेकिन रखा तो है।" पनिहारिन की बात साधु ने सुन ली। उसने तुरंत पत्थर फेंक दिया। दूसरी बोली-- "साधु हुआ, लेकिन खीज नहीं गई। अभी रोष नहीं गया, तकिया फेंक दिया।" तब साधु सोचने लगा, अब वह क्या करें? तब तीसरी बोली- "बाबा! यह तो पनघट है, यहां तो हमारी जैसी पनिहारिनें आती ही रहेंगी, बोलती ही रहेंगी, उनके कहने पर तुम बार-बार परिवर्तन करोगे तो साधना कब करोगे?" लेकिन चौथी ने बहुत ही सुन्दर और एक बड़ी अद्भुत बात कह दी - "क्षमा करना, लेकिन हमको लगता है, तुमने सब कुछ छोड़ा लेकिन अपना चित्त नहीं छोड़ा है, अभी तक वहीं का वहीं बने हुए है। दुनिया पाखण्डी कहे तो कहे, तुम जैसे भी हो, हरिनाम लेते रहो।" सच तो यही है, दुनिया का तो काम ही है कहना। आंखे बंद करोगे तो कहेंगे कि "ध्यान का नाटक कर रहा है।" चारो ओर देखोगे तो कहेंगे कि "निगाह का ठिकाना नहीं। निगाह घूमती ही रहती है।" और परेशान होकर आंख फोड़ लोगे तो यही दुनिया कहेगी कि "किया हुआ भोगना ही पड़ता है।" ईश्वर को राजी करना आसान है, लेकिन संसार को राजी करना असंभव है। दुनिया क्या कहेगी, उस पर ध्यान दोगे तो आप अपने लक्ष्य पर ध्यान नहीं लगा पाओगे दुनिया का तो काम हैं व्यंग्य करना, इसलिए अच्छे कर्म करते रहिए, भगवान का नाम लेते रहिए। क्या कहेगी दुनिया ये सोच के अपना आप खराब न करिए। *****
- बरगद का पेड़
अनजान मैं उस हरकारे के बच्चों को भी उसी समय से देख रहा था जिस समय से मैं उस बरगद के पेड़ को देखा करता था पेड़ के आसपास और भी लत्तरें थींl पेड़ की फुनगियों के बीच से कई कोंपलें फूटीं और पेड़ की कोपलों ने धीरे-धीरे बड़ा होना शुरू कियाl हरकारे के चार बच्चे थेंl हरकारे के बच्चे जमींदारों के यहाँ काम करते थें मैं देख रहा था पेड़ को और उसके साथ खिले कोंपलों को बढ़तेl हरकारे के बच्चों और पेंड़ को मैनें इंच-इंच बढ़ते देखा .. इस बीच पेड़ के आसपास का समय भी बीतता रहाl कोंपलें भी धीरे-धीरे लत्तरों में बदलीं फिर लतरें तना बन गईं..! और, पेड़ के आस-पास खड़े हो गये वो पेंड़ के रक्षार्थ..! साथ-साथ जन्मी और भी कोंपलें पहले लत्तर बनीं फिर तना और फिर हरकारे के बच्चों की तरह वो भी फैल गईं अनंत दिशाओं में ..! लत्तरों ने बारिश झेला, धूप भी लत्तरें, ठिठुरती रहीं ठंड में तब भी साथ-साथ थींl सुख-दु:ख साथ-साथ महसूसा! लत्तरों ने वसंत देखा पतझड़ भी! बड़े होने के बाद हरकारे के बच्चों ने कभी नहीं पूछा अपने सगे भाइयों से उनका हाल ! भाईयों ने फिर कभी आँगन में साथ बैठकर घूप या गर्मी पर बात नहीं की .. समय बीतता रहा ऋतुएँ, बदलती रहीं लेकिन, हरकारे के लड़के दु:ख भी अकेले पी गये ..दु:ख भी नहीं बाँटा किसी से ..! सालों से कभी साथ बैठकर किसी समस्या का सामाधान वो खोज नहीं पायेl फिर, साथ बैठकर कभी नहीं देख पाये भोर होने के बाद ओस में नहाई हुई फसल! या सुबह की कोई उजास .. पता नहीं कितने साल बीत गयेl जब गाँव में काम मिलना बँद हो गया फिर, वो कहीं कमाने चले गये दिल्ली या पँजाब .. बूढ़ा हरकारा जब मरा तो दाह संस्कार भी गाँव के लोगों ने किया! हरकारे के लड़कों ने फिर कभी पलटकर नहीं देखा गाँव! हरकारे की मौत से दु:खी होकर बूढ़ा होता मकान भी एक दिन ढह कर गिर गयाl लेकिन, तब भी हरकारे के लड़के नहीं लौटे .. ! लेकिन, बूढ़े पेंड़ की हिफाजत में आज भी खड़े थें युवा पेंड़..! पेंड़ अब अपनी दहलीज की झिलंगी खाट पर पड़ा रहताl बूढ़ा, पेंड चिलम भरकर पीता .. और, शेखी बघारता गाँव में कि उसकी डयोढ़ी ..बहुत मजबूत हैं ..! और कि, वो युवा पेंड़ों की हिफाजत में है ..! तब से आदमी भी पेंड़ होना चाहता है! *********
- ऊँचे घर की बहू
कमलेश कुमार निधि हमेशा अपनी क्लास में फर्स्ट आती जिसे देखकर उसके माता-पिता खुशी से फूले नहीं समाते। उसके पिता तो पूरे मुहल्ले में मिठाई बँटवाते। उनका सपना उसे ऊँचे पद पर देखना था और निधि उनकी चाहतों पर खरी उतरी भी। लेकिन विनय के घरवालों को उसका जॉब करना पसंद नहीं था। अतः उन्होंने यह कहकर कि उनके घर की बहुएं नौकरी नहीं करतीं उसके पंख काट दिये। वह विरोध करना चाहती थी पर उसे तो पता ही नहीं चला कि कब उसके पिता ने विनय के पिता को यह वचन दे दिया कि निधि नौकरी नहीं करेगी। इस शर्त के साथ विवाह संपन्न हो गया और उस वेदी में उसके उन्मुक्त आकाश में पंख पसार कर उड़ने के सपने भी खाक हो गये। उसके ससुराल वाले हमेशा उसे जली- कटी सुनाते रहते। सास तो रात-दिन यही कहती तुम्हारे बस का कुछ नहीं है, तुमसे कोई काम ढंग से होता ही नहीं। न जाने क्या करती रहीं मायके में.. अरे.. कोई लच्छन तो सीखा होता। अब वह कैसे बताये कि उसकी योग्यता को तो उनके पति के वचन निगल गये और पिता ने अपनी बेटी को ऊँचे घर की बहू बनाने के सपने की भेंट चढ़ा दिया, पर हर चीज़ की लिमिट होती है। वह यह सुन-सुन कर थक गई तो अपने आपको उनके सामने प्रूव करने की चाह मन में उपजने लगी और उसने एक स्कूल में संपर्क किया जहाँ उसके सर्टिफिकेट देखकर ही तुरंत ही उसको जॉब मिल गई। जब निधि ने घर आकर यह बताया तो सभी उसका मजाक बनाने लगे.. शक्ल देखी है अपनी.. पढ़ाने के लिए बहुत योग्यता की जरूरत होती है, खेल नहीं है टीचर बनना। अरे जाने दो न मांजी.. चार दिन बाद ही स्कूल वाले घर का रास्ता दिखा देंगे तब अपनी औकात अपने आप समझ में आ जायेगी। निधि पढ़ाने लगी और पढ़ाने का तरीका बहुत अच्छा था वह दिनोंदिन बच्चों की पहली पसंद बनती जा रही थी। जिसे देखो वही निधि मैम के गुण गाता। उसकी यह प्रसिद्धि उसके घरवालों के कानों तक भी पहुँचने लगी थी। आज उसे "बेस्ट टीचर" का अवार्ड मिलने जा रहा था। जिसके लिए स्कूल की तरफ से उसके पूरे परिवार को आमंत्रित किया गया था। जब उसकी सास ने यह देखा तो उनकी छाती पर सांप लोटने लगे। उन्होंने क्या समझा था, उसे और उनकी इसी जलन ने उसे कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया। *********
- सूरज का सातवां घोड़ा
धर्मवीर भारती इसके पहले कि मैं आपके सामने माणिक मुल्ला की अद्भुत निष्कर्षवादी प्रेम कहानियों के रूप में लिखा गया यह ‘सूरज का सातवां घोड़ा’नामक उपन्यास प्रस्तुत करूं, यह अच्छा होगा कि पहले आप जान लें कि माणिक मुल्ला कौन थे, यह हम लोगों को कहाँ मिले, कैसे उनकी प्रेम कहानी हम लोगों के सामने आई, प्रेम के विषय में उनकी धारणायें और अनुभव क्या थे तथा कहानी की टेक्निक के बारे में उनकी मौलिक उदभावनायें क्या थी। ‘थीं’का प्रयोग मैं इसलिए कर रहा हूँ कि मुझे यह नहीं मालूम कि आजकल कहाँ है? क्या कर रहे हैं? अब कभी उनसे मुलाकात होगी या नहीं और अगर सच में वे लापता हो गए हैं, तो कहीं उनके साथ उनकी अद्भुत कहानियाँ भी लापता हो ना जाये, इसलिए मैं आपके सामने पेश कर देता हूँ। एक जमाना था, जब वे हमारे मोहल्ले की मशहूर व्यक्ति थे। वहीँ पैदा हुए, वहीं बड़े हुए, वहीं शोहरत पाई और वहीं से लापता हो गये। हमारा मोहल्ला काफी बड़ा है, कई हिस्सों में बटा हुआ है और वे उस हिस्से के निवासी थे, जो सबसे ज्यादा रंगीन और रहस्यमय है और जिनकी नई और पुरानी पीढ़ी दोनों के बारे में अजब-गजब सी किवंदतियाँ मशहूर है। मुल्ला उनका उपनाम नहीं, जाति थी। कश्मीरी थे। कई पुश्तों से उनका परिवार यहाँ बसा हुआ था। वह अपने भाई और भाभी के साथ रहते थे। भाई और भाभी का तबादला हो गया था और वह पूरे घर में अकेले रहते थे। इतनी सांस्कृतिक स्वाधीनता तथा इतना कम्युनिस्ट एक साथ उनके घर में थी कि यद्यपि हम लोग उनके घर से बहुत दूर रहते थे लेकिन वही सब का अड्डा जमा रहता था। हम सब उन्हें गुरुवत मानते थे और उनका भी हम सबों पर निश्छल प्रेम था। वे नौकरी करते हैं या पढ़ते हैं, नौकरी करते हैं तो कहाँ, पढ़ते हैं तो कहाँ – यह भी हम लोग कभी नहीं जान पाये। उनके कमरे में किताबों का नामो-निशान भी नहीं था। हाँ कुछ अजब-गजब चीजें वहाँ थीं, जो अमूमन दूसरे लोगों के कमरे में नहीं पाई जाती। मसलन दीवार पर एक पुराने काले फ्रेम में एक फोटो जड़ा टंगा था। ‘खाओ बदन बनाओ’एक तख़्त में एक काली बेंट का बड़ा सुंदर चाकू रखा था। एक कोने में घोड़े की पुरानी नाल पड़ी थी और इसी तरह की कितनी ही अजीबोगरीब चीजें थीं, जिनका औचित्य हम लोग कभी नहीं समझ पाते थे। इनके साथ ही साथ हमें ज्यादा दिलचस्पी जिस बात में थी, वह यह थी कि जाड़ों में मूंगफलियाँ और गर्मियों में खरबूजे हमेशा मौजूद रहते थे और उनका स्वभाविक परिणाम था कि हम लोग भी हमेशा मौजूद रहते थे। अगर कभी फुर्सत हो, पूरा घर अपने अधिकार में हो, चार मित्र बैठे हो, तो निश्चित है कि घूम फिर कर वार्ता राजनीति पर आ टिकेगी और जब राजनीति में दिलचस्पी खत्म होने लगेगी, तो गोष्ठी की वार्ता प्रेम पर आ टिकेगी। कम से कम मध्यम वर्ग में तो इन दो विषयों के अलावा तीसरा विषय नहीं होता। माणिक मुल्ला का दखल जितना राजनीति में था उतना ही प्रेम में भी था। लेकिन जहाँ तक साहित्यिक वार्ता का प्रश्न था, वे प्रेम को तरजीह दिया करते थे। प्रेम के विषय में बात करते समय वे कभी-कभी कहावतों को अजब रूप में पेश किया करते थे और उनमें से ना जाने क्यों एक कहावत अभी तक मेरे दिमाग में चस्पा है। हालांकि उसका सही मतलब ना मैं तब समझा था ना अब। अक्सर प्रेम के विषय में अपने कड़वे मीठे अनुभवों से हम लोगों का ज्ञान वर्धन करने के बाद खरबूजा काटते हुए कहते थे – ‘प्यारे बंधुओ! कहावत में चाहे जो कुछ हो, प्रेम में खरबूजा चाहे चाकू पर गिरे या चाकू खरबूजे पर, नुकसान हमेशा चाकू का होता है। अतः जिसका व्यक्तित्व चाकू की तरह ना हो, उसे हर हालत में उस उलझन से बचना चाहिए।’ ऐसी कहावतें थीं, याद आने पर मैं लिखूंगा। लेकिन जहाँ तक कहानियों का प्रश्न था, उनकी निश्चित धारणा थी कि कहानियों की तमाम नस्लों में प्रेम कहानियाँ ही सबसे सफल साबित होती है। अतः कहानी में रोमांस का अंश जरूर होना चाहिए। लेकिन साथ ही हमें अपनी दृष्टि संकुचित नहीं कर लेनी चाहिए और कुछ ऐसा चमत्कार करना चाहिए कि वह समाज के लिए कल्याणकारी अवश्य हो। जब हम पूछते थे कि यह कैसे संभव है कि कहानियाँ प्रेम पर लिखी जाये, पर उनका प्रभाव कल्याणकारी हो। तब यह कहते थे कि यही तो चमत्कार है तुम्हारे माणिक मुल्ला, में जो अन्य किसी कहानीकार में है ही नहीं।
- मैं कहानी हूं।
डॉ. जहान सिंह “जहान” मैं कहानी हूं। और कहां नहीं हूं मैं? इसलिए कहानी हूं मैं। अनंत जगत की प्रथम नारी, प्रथम नर के प्रथम प्रेम से भाव प्रधान, शब्दविहीन उत्पन्न एक संस्कार हूं मैं। मेरा पहला रस श्रृंगार रस है। प्रेम के पालने में युगों-युगों तक निशचेतन स्वरूप, बंजारों सा जीवन, अनगिनत दिन-रातों का सफर, ध्वनि और संकेत ही मेरी जीवन वायु थी। मेरा पालना बदलता रहा, गोद बदलती रही। बचपन में भाषा से असमर्थ थी। हजारों हजार साल गूंगी रही। अपनी खुशी, दुख दर्द, ध्वनि और संकेतों द्वारा ही प्रसारित करती रही। मैं मां की लोरी, बाबा का पंचतंत्र, दादी की कथा, भाभी के गीत, शायर की गजल, कवि की कविता, नृत्यांगना की ठुमरी दादरा बनी। यह सब मेरे स्वरूप हैं। मेरे ही पहर हैं। मेरा परिवार बहुत बड़ा था। एक ही छत के नीचे रहते थे। शब्दों और व्याकरण के रण क्षेत्र ने मेरा परिवार बिखरा दिया। एक दूसरे से अलग हो गए। सबने अपने-अपने घर बसाये, नये शहर ढूंढे और बिछड़ गए। मैं बूढ़ी हो गई पर अपना घर न त्याग सकी। अकेली रह गई। लोगों ने भुलाने की बहुत कोशिश की, पर मेरा वजूद कोई मिटा ना सका। मैं भटकती रही और मुझे हजारों हजार साल कोई स्थाई जगह नहीं मिली। “जुबान से बोली गई कानों से सुनी गई कुछ याद रही कुछ भूल गई।” इंसान के सामने हजारों परेशानियां, प्रयास, खोज और विकास का खुला रास्ता, उत्साह, सफल-असफल प्रयोग। पर इस दौड़ में भी उसके साथ रही। फिर नया युग आया, पूर्ण भाषा विकसित हुई, कागज, रोशनाई, छापाखाना और फिर मिल गया मुझे मेरा घर। “किताब जो अब मेरा स्थाई पता है।” इस सब में श्रुति साधना का बड़ा योगदान है। मैं आभारी हूं। मुझे इस तरह जीवित रखा गया। रचयिता का मान, पाठक का सम्मान, समाज का ज्ञान, हर घर और पुस्तकालय की शान हूं मैं। मैं कहानी हूं। बच्चों का कौतूहल, युवा की शिक्षा, बुढ़ापे की साथी और जीने की आस मैं, उपवन का सौंदर्य, दरिया की रवानी, पहाड़ों का दृढ़ संकल्प, रेगिस्तान में कैक्टस का फूल, सागर की लहरों का संगीत, चांद की खूबसूरती, तारों की बारात, प्रभात की पहली किरण, पक्षियों का कलरव, हिरण की कुलाच, शेर की दहाड़, मां की कोख में क्रीडा करता बच्चा, पिता के हाथ में कुदाल, मेले की भीड़ में बेहाल, नारी की शर्म और नर का भ्रम हूं। लेखक जुबानी रोज गढी और सजोई जाती हूं। पल-पल भुलाई जाती हूं। दिन-रात सुनाई जाती हूं। संसार का रचयिता भी मेरी गोद में पला है। दुनिया के हर सिंगार में बसी हूं। जी हां मैं कहानी हूं। “कहने को अगर मैं ना हूं। तो यह ‘जहान’ बेजुबान हो जाए। कुछ पलों में ध्वनि और संकेतों का पाषाण युग हो जाए।” ******
- अपनों की यादें
विजय शंकर प्रसाद. अंतरंग साँस से प्रेरित है जीवन, बेकाबू हालात से पस्त हो सहा। मौत के तुल्य है तलब ज़हर, कहीं तेरा आईना तक है तंहा। एकतरफा इश्क का खेल तो निराला, पानी-पानी हो व्यतीत बेपानी हर लम्हा। शबनम का हरी घास पर परीक्षा, सूरज की तपिश ने कुछ औरों कहा। यक्ष दिखा नहीं तो मत दो दीक्षा, धर्मराज और यमराज पर एतबार ढहा। रिश्तों की होने लगी आज़ समीक्षा, ख़्वाब हमेशा तो है न लहा। खौफ़ में कुत्तों द्वारा नाहक़ भीक्षा, हवा संग तू तो मैं भी बहा। गर्म चाय मतलब इर्द-गिर्द ही धुआँ, धूल से भिक्षुक गया है नहा। पनिहारिन हेतु नहीं कहीं सही कुआँ, मृगतृष्णा में दुविधा कि क्या हाँ? गिलहरी को याद सामर्थ्य की सीमा, बिल्ली से हटकर अलग है चूहा नन्हा। अपनों की यादें दिल तक अटूट है, उधारी या दान वरदान देशहित में कहाँ? पत्थर का शहर में चकाचौंध है रब, तभी तो छँटा नहीं तम आख़िर यहाँ। ******
- खुबसूरती का घमंड
अंजना ठाकुर रश्मि को अपनी सुन्दरता पर बहुत घमंड था। इस वजह से वो अपनी छोटी बहन नूपुर को कभी भी अपने साथ कही नही ले जाती। रश्मि और नूपुर में दो साल का अंतर था। जहां रश्मि बला की खूबसूरत थी वहीं नूपुर दिखने में साधारण। जब भी दोनों बहनें साथ कही जाती तो रश्मि को तारीफ मिलती और नूपुर को ताने, कि ये तो इस घर की लगती ही नही। नूपुर फिर भी अपनी बहन को बहुत प्यार करती। पर रश्मि को अपने घमंड में उसका प्यार भी नही दिखता। नूपुर पढ़ाई के साथ घर के काम में भी मां का हाथ बता देती। धीरे-धीरे नूपुर हर काम में होशियार हो गई और संस्कारी तो बचपन से ही थी। मां रश्मि को कई बार समझाती, बेटा इतना घमंड अच्छा नही। खूबसूरती के साथ संस्कार भी जरूरी हैं। कल को पराए घर जाओगी ऐसे कोई पसंद नही करेगा। रश्मि बोलती मां मेरे लिए तो लाइन लग जाएगी रिश्तों की तुम नूपुर की चिंता करो। एक दिन एक ऊंचे परिवार का रिश्ता आया। लड़का भी बहुत सुंदर था। रश्मि के पांव तो जमीन पर नही पड़ रहे थे। लड़के वाले आए। नूपुर ने बहुत तैयारी करी और सबको सर्व भी कर रही थी। सब उसके संस्कार देख बहुत प्रभावित थे। गलती से नूपुर के हाथ से चटनी रश्मि के उपर गिर गई। रश्मि गुस्से में भूल गई कि सब बैठे हैं। अपनी आदत के अनुसार नूपुर को जलील करने लगी। ये सब देख लड़के वालों ने अपना इरादा बदल नूपुर का हाथ मांग लिया। लड़के को भी नूपुर पसंद थी। रश्मि की मां बोली पर रिश्ता तो रश्मि के लिए था। लड़के वालों ने कहा हमें लड़की बहुत सुंदर भले न हो परन्तु संस्कारी चाहिए। मां इतना अच्छा रिश्ता हाथ से नही जाने देना चाहती थी, तो उन्होंने हां कर दी। रश्मि का घमंड टूट चुका था। उसे समझ आ गया खूबसूरती ही सब कुछ नही होती। ********











