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  • कम्बल

    किसी क्लब का अध्यक्ष होना भी अपने आप में सरदर्द हो जाता है। रोज कोई न कोई कार्यक्रम लगा ही रहता है, अतुल पाँच महीनों से लगातार दौड़ ही रहे थे। कभी वृद्धाश्रम, कभी विकलांगों का कैंप तो कभी ब्लड डोनेशन। देखते-देखते दिसंबर का महीना भी आ गया। ''और अतुल बाबू इस महीने क्या करने का सोचा है।" ''सोच रहा हूँ गरीबों में कंबल बांट दूँ, हम लोग यहाँ मोजा, जूता, जैकेट से लैस होकर भी ठंड से ठिठुरते रहते हैं। कई गरीबों के तन पर तो मैंने एक कपड़ा तक नहीं देखा। मन द्रवित हो जाता है, मुझसे तो देखा भी नहीं जाता।" ''कहीं से कंबलों का जुगाड़ हो गया क्या" श्रीवास्तव जी ने चुटकी लेते हुए कहा, आखिर वो भी तो भूतपूर्व अध्यक्ष थे। अपने कार्यकाल में कई बार ऐसे ही उनका मन द्रवित हो जाता था। श्रीवास्तव जी की बात सुनकर अतुल एक बार के लिए सकपका सा गया जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो। नजरें चुराते हुए उसने श्रीवास्तव जी से कहा, ''अगले इतवार को चलते हैं, क्लब की तरफ से दो सौ कंबल बाँटेंगे। सोच रहा शहर से दूर किसी गाँव में बाँटा जाये।" ''सही कह रहे हो अतुल सारे क्लब को इससे आसान समाज सेवा कुछ नजर ही नहीं आती, जो देखो वही क्लब कंबल बांटने में जुट जाता है। अरे जिसका पेट पहले से भरा हो उसका पेट फिर दोबारा क्यों भरना। यह साले भिखारी दो-दो, चार-चार कंबल बटोर कर बैठ जाते हैं और फिर औने-पौने दाम में बाजार में बेच देते हैं। ''सही कह रहे हैं श्रीवास्तव जी इसीलिए शहर से दूर गाँव में बाँटने को सोच रहा हूँ, शायद असली जरूरतमंद वहीं मिल जायें। आप चलेंगे न" ''नेक काम में पूछना क्या?" श्रीवास्तव जी ने अतुल से कहा, इतवार की सुबह सुषमा जल्दी-जल्दी हाथ चला रही थी। क्लब के सदस्य कंबल बाँटने के लिए आने वाले थे। सुबह का नाश्ता तो करके ही जाएंगे। अतुल तेजी से हाथ बटा रहे थे और कमल के द्वारा दान किये गए कंबलों को तेजी से अपनी गाड़ी में रख रहे थे। ''सुगंधा इसमें से दो-चार कम्बल निकाल लो, कामवालियों को दे देना। वह भी खुश हो जायेंगी। पिछली बार बर्तन धोने वाली को सिलाई मशीन दिलवा दी तो खाना बनाने वाली कितना नाराज हो गई थी कि उसको नहीं मिली। अरे भाई अब अपनी जेब से आदमी किस-किस को दे, इस बार सबको खुश कर दो।" सुगंधा ने चार कम्बल घर के भीतरी हिस्से में रख दिए, कहीं बाथरूम जाने के बहाने क्लब के किसी सदस्य की उन पर नजर न पड़ जाए। तभी दरवाजे पर कूड़ा उठाने वाले विजय ने घंटी बजाई। अतुल ने बहती गंगा में हाथ धोने की सोची, कौन सा अपनी जेब से पैसा देना है। लगे हाथ इसको भी कंबल दे ही देता हूँ। यह भी तो जरूरतमंद है ही, खुश हो जाएगा और जीवन भर सलाम भी ठोकता रहेगा। ''यह लो कंबल और तुम्हारे किसी साथी को जरूरत हो तो बताना, मुझसे आकर ले जाए। हम गरीबों की सहायता के लिए हमेशा खड़े रहते हैं।" विजय ने उल्टे ही हाथ उस कंबल को वापस कर दिया, ''भैया! आपने कह दिया यही बहुत है, मेरी तो सरकारी नौकरी है, काम भर का कमा लेता हूँ। मुझसे ज्यादा गरीब लोग इस दुनिया में पड़े हैं, उन्हें मुझसे ज्यादा जरूरत है। आप उन्हें दे दीजिए।" अतुल चुपचाप विजय का चेहरा देख रहा था शर्मिंदगी से उसका चेहरा काला पड़ चुका था और विजय के चेहरे पर आत्मविष्वास की चमक थी। अतुल सोच रहा था आखिर गरीब कौन है..... **********

  • मिठाई के लिए

    तपेश भौमिक सौम्य प्रायः मिठाई दुकान के सामने शो-केस में सजी मिठाइयों में से एक विशेष मिठाई को कुछ देर तक निहारता, फिर जो भी चीजें उसे खरीदने के लिए भेजा जाता वह उन चीजों को लेकर उसकी याद दिल में संजोए लौट जाता। उस विशेष मिठाई का स्वाद उसे एक बार मिल चुका था इसलिए उस पर उसकी दीवानगी अपनी हद से आगे बढ़ गई थी। शो-केस में सजी प्रत्येक मिठाई पर कीमतों के ‘टैग’ होते थे, इसलिए अलग से उनकी कीमत पूछने की जरूरत ही नहीं पड़ी। केवल उसे लेने के लिए अपनी जेब की औकात होनी चाहिए थी। ‘जेब को औकात नहीं तो जीभ को सौगात नहीं।’ यही मन ही मन सोचता हुआ लौट जाता। उस मिठाई की कीमत महज़ तीन रुपये ही थी जबकि कुल जमा पूंजी तीन रुपए जेब में कभी हुए ही नहीं। सौम्य के साथ यही विडम्बना थी। अगर कभी हुई भी तो किसी जरूरी खर्चे की नौबत आ गयी। फिर वही ‘ढाक के तीन पात’ वाली बात आ जाती। उस विशेष मिठाई का सपना अधूरा रह जाता। मन को यह कह कर सांत्वना देता कि ‘जब कमाऊँगा तब खाऊँगा। लेकिन कमाने के दिन कब आएंगे?’ यह सवाल भी परीक्षा के प्रश्नपत्रों में छपे सवालों से कहीं अधिक पेचीदा था। कई बार चवन्नी-अठन्नी के सिक्कों को उछाल-उछाल कर पैसे जोड़े भी गए पर न जाने कैसे वे सिक्के किसी दूसरी उछाल के लिए तैयार होकर बिदक गए। सवाल तीन रुपए का था और जवाब तीन का न आता था। यह तीन का तड़का ही बेमानी-सी थी, उसके लिए। अगर अन्य मिठाइयों की भांति उसकी कीमत दो रुपए होती तो वह जरूर एक दिन खरीद लेता और राह चलते मुंह के हवाले कर देता। दो रुपए तक जोड़ पाना सौम्य के लिए कोई ज्यादा भारी काम नहीं रहा, कई बार उसने जोड़े, पर तीन की पहेली कभी न सुलझी। वह एक अजीब व्ययामोह की स्थिति से गुज़र रहा था। वह अपने मन को यह कह कर ढाढ़स बंधाता कि “आज तीन के लिए तरस हो रही है तो क्या? कल छह से छक कर खाएँगे।” कभी उस विशेष मिठाई का शो-केस में न होने से सोचता कि क्या उसकी खपत कम हो गई है? खुद ही जवाब देता, ‘मेरी बला से। इस दुकान में नहीं मिलेगी तो दूसरी दुकान में ढूंढ लूँगा। ‘मन ही मन उसका नाम जपता हुआ वह आगे बढ़ जाता। सौम्य दर्जा-दर-दर्जा अच्छे अंकों से पास होता गया। कुछ खाने-पीने के बारे में कभी अपने माँ-बाप के सामने उसने जिद्द किया हो, उसे पता नहीं। अपने परिवार की गिरते माली हालात से वह वाकिफ़ था। एक अरसा बीत गया था कि वह कभी किसी झिझक के कारण उस मिठाई को खरीद नहीं पाया था। अब तो वह दसवीं भी अच्छे अंकों से पास हो गया था। पढ़ाई में उसने ऐसी डुबकी लगाई थी कि मिठाई की बात ही वह भूल चुका था। अब तो उन दिनों की गई बातों को सोचकर उसे हँसी आने लगी थी। उसे झिझक होने लगी कि भला उस विशेष मिठाई के लिए उस दुकान तक वह जाएगा। नहीं, यह तो बड़ी हास्यस्पद बात होगी। एक दिन दुकानदार उसकी दृष्टि को ताड़ गया था कि उसे कुछ लेना-देना नहीं है, यों ही घूर रहा है। उसने एकबार सौम्य से यह भी पूछा था कि कुछ और लेना है क्या? कुछ लेना हो तो जल्दी ले लो, दूसरे ग्राहक भी तो हैं। ले लो, नहीं तो चलते बनो। उन दिनों वह अपने माँ-बाप के साथ किराए के मकान में रहता था। व्यापार में भारी नुकसान के कारण बाप ने मकान बेच कर महाजन का ऋण चुकता कर दिया था, जिसके कारण उसका परिवार किराए के सस्ते मकान में रहने लगा था। उस आँगन में और कई किराएदार रहा करते थे, जिन्हें घर पर किसी अतिथि के आने पर सौम्य को ही मिठाई दुकान भेज कर मिठाई मंगवाना सुविधाजनक लगता था। वह दौड़ कर मांग के अनुसार मिठाई, समोसे आदि ला देता तो उसके एवज में उसे कभी एक जलेबी तो कभी एक समोसा मिल जाया करता थी। कक्षा नौ तक आते-आते उसका पढ़ाकू व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा बन गया था कि लोग उसे मिठाई दुकान भेजने में या तो हिचकिचाने लगे थे नहीं तो उन्हें उसकी माँ ने ही मना कर दिया था। इंसान का व्यक्तित्व उसके कामों से ऊँचा उठता जाता है। ऐसे व्यक्ति को कोई कुछ कहने से पहले दो बार सोचता है या उससे कुछ कहते नहीं बनता। सौम्य के परीक्षा फल ही ऐसे आते थे जिनसे उसके परिवार के प्रति सबका एक आदर भाव बनता जा रहा था, नहीं तो एक अच्छे खाते-पीते परिवार का अचानक समाज के हाशिये पर आ जाने से लोग उनका तमाशा ही देखते हैं और उनकी मज़ाक बनाने से पीछे नहीं हटते। एक मात्र सौम्य का परीक्षा फल ही था जिसके बदौलत उनकी साख अब भी समाज में कायम थी। आज वह आई॰टी इंजीनियर है और प्रथम तनख़ाह के पैसे भी जेब में है। अब वह इस उधेड़बुन में पड़ गया कि पहले वह मिठाई दुकान जाएगा या माँ के सामने सारे पैसे रख देगा? पैसे उसके परिवार के लिए ज़रूरत थी न कि गुलछर्रे उड़ाने के लिए। उसके दिमाग में यह भावना भी आई कि अगर वह उस दुकान के सामने जाएगा और उस विशेष मिठाई को डब्बा भर कर खरीदेगा तो हो सकता है कि दुकानदार उसे ताड़ जाए। ऐसी हालात में कुछ सवाल ऐसे भी उसके मन में आ-जा रहे थे। जिसे सुलझाने में वह लगभग नाकाम साबित हो रहा था। अब तक बहुत साहस जूटा कर उसने लगभग अपने आप को उस मिठाई दुकान तक धक्के मारता हुआ ले गया था। वह चिर-परिचित मिठाई ट्रे में सजी दिख गई। शो-केस के अंदर भरपूर सुंदरता के साथ वह अपने को फ़ोकस करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही थी; मानो कह रही हो कि ‘आज इतने दिनों बाद मेरी सुध ली है तुमने मेरे भाई? मैं तो कब से बाट जोह रही हूँ।’ मिठाई अब तीन रुपए की न होकर पाँच रुपए की हो गई थी, लेकिन इस बढ़ोत्तरी से उसका कोई लेना-देना न था। पाँच क्या दस का हो जाए, वह ट्रे में सजी सारी मिठाइयों को खरीदने की औकात रखता हैं आज। वह पहले तो उस विशेष मिठाई का नाम ही भूल चुका था। क्या वह ‘शो केस’ के सीसे पर उंगुली दिखा कर कहेगा कि अमुक मिठाई पचास या सौ रुपए के, डिब्बे में पैक कर दें। पहले तो वह हकला गया, फिर अपने को तटस्थ करता हुआ एकबार पीछे मुड़ कर देखा, शायद कोई कुछ कह रहा हो। एक गरीब बच्चा हाथ पसारे पैसा या मिठाई कुछ मांग रहा हो। माँ ने तो कहा था कि पहली तंख्वाह के पैसे से पहले ठाकुरजी के मंदिर में भेंट चढ़ाएगी। सौम्य को इस बात से चिढ़ थी कि उसके कमाए पैसे का पहला आस्वादन मंदिर का पुरोहित क्यों करेगा? उसे चढ़ावे इत्यादि से काफी चिढ़ है, फिर माँ कहती है तो उनका मन रखने के लिए वह मान लेगा। नहीं तो पहले वह अपनी मर्जी के अनुसार जितना मन होगा पहले खा लेगा, फिर कोई दूसरी बात होगी। सौम्य ने अपने दिमाग पर बल डाला पर उस विशेष मिठाई का नाम याद न कर पाया। इतने बड़े-बड़े गणनांक वह याद रखता है और आज इस साधारण मिठाई के नाम को वह यदि स्मरण नहीं कर पा रहा हो तो यह भी उसकी बदकिस्मती है। वह उंगली दिखा कर कुछ कहता कि उससे पहले ही दुकानदार ने उसे आश्वस्त करते हुए सवाल किया। ”आपको ‘मंडा-मिठाई’ कितने दूँ?” इतना सुनते ही उसे मानो बिजली का शॉक-सा लग गया हो। उसके दिमाग में तुरत यह नाम क्रौंध गया। कहीं दुकानदार उसकी उस दृष्टि को स्मरण न करा रहा हों। उसने कुछ अन्यमनस्क-सा कह दिया, “जी हाँ’ बीस दे दीजिए।” तभी दो-चार और घुमक्कड़ बच्चे वहाँ आ गए तो दुकानदार ने डांट कर भगाने की कोशिश की। सौम्य ने उन्हें मना कर दिया। उसने डिब्बे को खोल कर उन सारे बच्चों को मिठाई बाँट दी और खाली हाथ यह सोचने लगा कि अब माँ को सारे पैसे दे देगा। उसे इसकी कोई परवाह नहीं कि माँ के हाथ रुपए सौंपने से पहले उन बच्चों को उसने कुछ पैसों के मिठाई भी खिला दी थी। उन मिठाई खाते बच्चों के चेहरो को देख कर उसे उस मिठाई का पूरा स्वाद मिल चुका था। उसके मन से उस विशेष मिठाई को खाने की मनसा जाती रही। वह दुकानदर को पैसे देकर उल्टे पाव लौटने को पीछे मुड़ा कि दुकानदार ने सवाल किया, “आपको मिठाई लेनी थी न?” “हाँ, लेनी थी, शाम को माँ के साथ आकर ले लूँगा, अभी याद नहीं आ रही कि कौन-सी किस्म कितनी लूँ।” उसने अनमने भाव से जवाब दिया और उन बच्चों के मिठाई खाते चेहरों को मन में आँकता हुआ लौट चला। वह अपने आप को दुनिया का सबसे बड़ा खुशकिस्मत मान कर चलता हुआ कब घर की देहरी पर पहुँच चुका था, उसे पता ही न चला। ************

  • एक कहानी, अपनी भी

    डॉ. कृष्ण कांत श्रीवास्तव आज कल्पना की शादी पक्की हो जाती है। लड़का भी सरकारी बैंक में अच्छे पद पर है। भावनाओं के सागर में हिचकोले लेती कल्पना अपने ब्वॉयफ्रेंड शेखर से मिलती है और पूछती है – अच्छा, यदि आज किसी दूसरे लड़के से मेरी शादी हो जाए तो तुम क्या करोगे? शेखर तो जैसे इस प्रश्न के उत्तर के लिए पहले से ही तैयार था। उसने बिना देर किए बहुत छोटा सा जवाब दिया – मैं, तुम्हें भूल जाऊंगा। ये सुनकर कल्पना गुस्से में दूसरी तरफ घूम कर बैठ गई। उसको शायद शेखर से इतने सीधे और सपाट उत्तर की आशा न थी। फिर भी बात को आगे बढ़ाते हुए कल्पना ने शेखर से कहा, “क्या यह सब इतना आसान है?” तुम सच कहती हो, मेरे लिए तो यह सब इतना आसान नहीं है। परंतु लड़कियों का क्या कहना। वह तो पल में अपनी पिछली जिंदगी को भुला देती हैं। आखिरकार, तुम भी तो लड़की हो और तुम भी इसी प्रकार मुझे बुला दोगी। तो बेहतर तो यही होगा कि जितनी जल्दी तुम मुझे भूल जाओ, मैं भी उतनी जल्दी तुम्हें भुला सकूं। इतने आत्मविश्वास के साथ तुम यह कैसे कह सकते हो कि मैं तुम्हें पल भर में भुला दूंगी? कल्पना ने भीगी आंखों से शेखर की ओर देखते हुए पूछा? शेखर ने बोलना शुरू किया - "सोचो शादी का पहला दिन है। तुम अपने घर में हो। घर में शादी की जोर-शोर से तैयारियां हो रही हैं। तुम शरीर में किलो भर सोने के जेवरात और महंगे कपड़े पहन कर घूम रही होगी। तुम्हारे दोस्त, रिश्तेदार तुम्हारे आसपास घूम रहे होंगे। फोटोग्राफर विभिन्न कोणों से तुम्हारे चित्र ले रहे होंगे और तुम हर चित्र में मुस्कुराकर देख रही होगी। तुम्हारे दोस्त और तुम्हारे रिश्तेदार तुम्हारी खिलखिलाहट पर अपनी सहमति दे रहे होंगे। तब क्या तुम मुझे याद कर रही होगी। नहीं, ऐसे उत्सव के माहौल में और लोगों की भीड़ में तुम मुझे चाह कर भी याद नहीं कर सकती। "और मैं तुम्हारी शादी की खबर सुनकर दोस्तों के साथ कुछ उटपटांग पीकर किसी कोने में पड़ा रहूंगा और फिर जब मुझे होश आएगा तब मैं तुम्हें धोखेबाज, बेवफा बोलकर गाली दूंगा!" "फिर जब तुम्हारी याद आएगी तो अपने किसी दोस्त के कंधे पे सर रख के रो लूंगा।" बारात आएगी, शादी की रस्में होंगी, तुम्हारी विदाई भी होगी परंतु उस वक्त भी तुमको हमारी याद नहीं आएगी। शादी के बाद तुम्हारा व्यस्त समय शुरू हो जाएगा। फिर तुम अपने पति और हजार तरह की रस्मों को निभाने में व्यस्त रहोगी। हमारी याद तुम्हें कभी नहीं आएगी ऐसा तो मैं नहीं कहूंगा। कभी-कभी तुम्हें मेरी याद आएगी, जब तुम अपने पति का हाथ पकड़ोगी, उसके साथ बाइक पर बैठोगी। "और उस समय भी, मैं आवारा की तरह इधर-उधर घूमता रहूंगा। जैसे जिंदगी का कोई मकसद ही नहीं और अपने दोस्तों को समझाऊंगा कि "कभी प्यार मत करना कुछ नहीं मिलता। जिंदगी खत्म हो जाती है, इस प्यार के चक्कर में।” कुछ वक्त बाद तुम अपने पति के साथ हनीमून पर जाओगी। नई-नई जगहों पर घूमोगी, विभिन्न प्रकार के व्यंजनों का स्वाद चखो होगी, महंगी कार और हवाई जहाज का सफर करोगी, अजनबियों के शहर में अपने पति के हाथों में हाथ डालकर कभी आइसक्रीम तो कभी पॉपकॉर्न का मजा लोगी, क्या तब तुम्हें हमारी याद आएगी? लौट कर आओगी तो नया घर होगा, नए लोग होंगे, नए रिश्ते होंगे, सब कुछ नया होगा और वहां सब तुम्हें हाथों-हाथ ले रहे होंगे। तब क्या तुम्हें इतना समय मिल पाएगा कि तुम मुझे याद कर सको? सब खुश होगे और तुम्हारे दिन भी खुशी से बीत रहे होंगे। परंतु एक दिन जब तुम अकेली होगी और घर पर कोई नहीं होगा तब तुम्हें अचानक मेरी याद आएगी और तुम सोचोगी. "पता नहीं किस हाल में होगा, क्या कर रहा होगा, जब मैं मिलूंगी तो उसको कैसे अपनी मजबूरियों के बारे में बताऊंगी और फिर मेरी खुशी की दुआ मांगते हुए वापस अपने परिवार में व्यस्त हो जाओगी। इधर मैं मजनू बना सड़कों पर इधर से उधर चक्कर काट रहा होऊंगा। किसी काम में मन नहीं लगा रहा होगा। घर में और दोस्तों के साथ भी बात-बात पर झगड़ा कर लेता होऊंगा। मैं अब-तक अपने मम्मी-पापा, भाई या फिर दोस्तों से डांट सुन-सुन कर लगभग सुधर ही गया होऊंगा। पग-पग पर ठोकर खाने के बाद, जिंदगी को नए ढर्रे पर लाने के लिए, मम्मी-पापा भाई-बहन और सभी नाते रिश्तेदारों की खुशी के लिए, जीवन को नए सिरे से बुनने का प्रयास आरंभ कर दूंगा। जिंदगी को चलाने के लिए कुछ तो करना ही होगा। नौकरी करके और एक अच्छी सी लड़की से शादी करके तुम्हारे दिए दर्द के प्रतिशोध को तो तुम्हें दिखाना ही होगा। सबको यही बोलूंगा कि भुला दिया है मैंने तुम्हें। लेकिन इस सब के बावजूद, आधी रात को, तारों की चादर तले जब नींद नहीं आएगी तब मैं तुम्हारे मैसेजेस को निकाल कर पढूंगा और सोचूंगा शायद मेरे प्यार में ही कमी थी, जो तुम्हें न पा सका। फिर अपनी तकलीफ को कम करने की कोशिश करूंगा। समय का चक्र घूमेगा, बड़ी तेजी से घूमेगा। अब तुम कोई प्रेमिका या नई दुल्हन नहीं रहोगी। अब तुम मां बन चुकी होगी। पुराने आशिक की याद और पति के प्यार को छोड़कर तुम अपने बच्चे के लिए सोचोगी अब तुम अपने बच्चे के साथ व्यस्त रहोगी। मतलब अब तक मैं तुम्हारी जिंदगी से पूरी तरीके से हमेशा के लिए निकल चुका होऊंगा। इधर मुझे भी एक अच्छा काम मिल गया होगा। शादी की बात चल रही होगी और लड़की भी पसंद हो गई होगी। अब मेरा भी व्यस्त समय शुरू हो गया होगा। अब मैं तुम्हें सचमुच भूल गया होऊंगा। अब अगर मैं जीवन के किसी मोड़ पर किसी जोड़ी को देखूंगा तो उन्हें देखकर मुझे तुम्हारी याद तो अवश्य आएगी। परंतु अब तकलीफ नहीं होगी ….. एक ही सांस में इतनी लंबी दास्तां सुनाने के बाद शेखर ने देखा कि कल्पना की आंख में आंसू छलक रहे हैं। कल्पना भरी आंखों से शेखर की तरफ देखती है। दोनों बिल्कुल चुप हैं पर आंखे बरस रही हैं। थोड़ी देर बाद कल्पना -"तो क्या सब कुछ यहीं खत्म हो जाएगा?” शेखर -"नहीं.! किसी बात पर, जब तुम अपने पति से रूठ जाओगी लेकिन तुम्हारे पति आराम से सो रहे होंगे। उस रात तुम्हारी आंखों में नींद नहीं होगी और इधर मैं भी अपनी पत्नी से किसी बात पर खफा होकर तुम्हारी तरह जागूंगा। पूरी दुनिया सो रही होगी, सिर्फ हम दोनों के अलावा। फिर हम अपने अतीत को याद करके खूब रोएंगे। एक दूसरे को बहुत महसूस करेंगे। लेकिन इस बात का भगवान के अलावा और किसी को पता नहीं चलेगा। ***********

  • आत्ममंथन

    शैलेन्द्र शर्मा सोचना एकांत में, जब कभी फुर्सत मिले भावनाएँ, रंग क्यों पल-पल बदलतीं हैं। क्यों हवा पुरवा तुम्हें अब पूर्ववत् लगती नहीं और पछुआ के कसीदे में जुबां थकती नहीं झाँक कर देखो जरा अन्त:करण से खुले मन वासनाएं, रंग क्यों पल-पल बदलतीं हैं। कभी कोई दूर लेकिन लगे कितना पास है और कोई पास फिर भी दूर का एहसास है जाँचना फिर जाँचना होकर सहज मन से कभी कामनाएँ, रंग क्यों पल-पल बदलतीं हैं। जो रहे गुणगान करते क्यों छिटक कर दूर हैं गो अभी सावन घटाएँ पास हैं, भरपूर हैं जब कभी अवसर मिले खुद को परखना देखना धारणाएँ, रंग क्यों पल-पल बदलतीं हैं। ********

  • मोची का लालच

    डॉ. कृष्ण कांत श्रीवास्तव किसी गाँव में एक धनी सेठ रहता था। उसके बंगले के पास एक जूते सिलने वाले गरीब मोची की छोटी सी दुकान थी। उस मोची की एक खास आदत थी कि वो जब भी जूते सिलता तो भगवान के भजन गुनगुनाता रहता था। लेकिन सेठ ने कभी उसके भजनों की तरफ ध्यान नहीं दिया। एक दिन सेठ व्यापार के सिलसिले में विदेश गया और घर लौटते वक्त उसकी तबियत बहुत ख़राब हो गयी। लेकिन पैसे की कोई कमी तो थी नहीं सो देश विदेशों से डॉक्टर, वैद्य, हकीमों को बुलाया गया। लेकिन कोई भी सेठ की बीमारी का इलाज नहीं कर सका। अब सेठ की तबियत दिन प्रतिदिन ख़राब होती जा रही थी। वह अब चल फिर भी नहीं पाता था। एक दिन वह घर में अपने बिस्तर पर लेटा था। अचानक उसके कान में मोची के भजन गाने की आवाज सुनाई दी, आज मोची के भजन सेठ को कुछ अच्छे लग रहे थे, कुछ ही देर में सेठ इतना मंत्रमुग्ध हो गया कि उसे ऐसा लगा जैसे वो साक्षात परमात्मा से मिलन कर रहा हो। मोची के भजन सेठ को उसकी बीमारी से दूर लेते जा रहे थे। कुछ देर के लिए सेठ भूल गया कि वह बीमार है उसे अपार आनंद की प्राप्ति हुई। कुछ दिन तक यही सिलसिला चलता रहा। अब धीरे-धीरे सेठ के स्वास्थ्य में सुधार आने लगा। एक दिन उसने मोची को बुलाया और कहा - मेरी बीमारी का इलाज बड़े-बड़े डॉक्टर नहीं कर पाये लेकिन तुम्हारे भजन ने मेरा स्वास्थ्य सुधार दिया। ये लो 1000 रुपये इनाम, मोची खुश होते हुए पैसे लेकर चला गया। लेकिन उस रात मोची को बिल्कुल नींद नहीं आई वो सारी रात यही सोचता रहा कि इतने सारे पैसों को कहाँ छुपा कर रखूं और इनसे क्या-क्या खरीद लूं? इसी सोच की वजह से मोची इतना परेशान हुआ कि अगले दिन काम पर भी नहीं जा पाया। अब भजन गाना तो जैसे वो भूल ही गया था, क्योंकि मन में पैसे की खुशी थी। अब तो उसने काम पर जाना ही बंद कर दिया और धीरे-धीरे उसकी दुकानदारी भी चौपट होने लगी। इधर सेठ की बीमारी फिर से बढ़ती जा रही थी। एक दिन मोची सेठ के बंगले में आया और बोला सेठ जी आप अपने ये पैसे वापस रख लीजिये, इस धन की वजह से मेरा धंधा चौपट हो गया, मैं भजन गाना ही भूल गया। इस धन ने तो मेरा परमात्मा से नाता ही तुड़वा दिया। मोची पैसे वापस करके फिर से अपने काम में लग गया। सार - आप खूब पैसा कमाइए, साथ ही साथ दूसरों के हित को भी ध्यान में रखिए और भगवान का स्मरण करिये। इसी में जीवन का सच्चा आनंद है। ******

  • मेरी पसंदीदा अभिनेत्री मीना कुमारी महजबीं

    आर सी त्रिपाठी फिरते हैं हम अकेले बाहों में कोई ले ले आखिर कोई कहां तक तन्हाइयों से खेले.. दोस्तों प्रस्तुत है, दुखांत फिल्मों की मशहूर अदाकारा / शायरा / कवियित्री / पार्श्व गायिका / कास्ट्यूम डिजाइनर / शोकांत फिल्मों की महारानी / ट्रेजेडी क्वीन / भारतीय सिनेमा की सिंड्रेला / नाज / मीना कुमारी (महजबीं) से जुड़े खास यादों का कारवां.... सबसे पहले मैं आपको बताता चलूं कि मीना कुमारी का संबंध टैगोर परिवार से है। मीना कुमारी की नानी हेमसुन्दरी मुखर्जी पारसी रंगमंच से जुड़ी हुईं थी। बंगाल के प्रतिष्ठित टैगोर परिवार के पुत्र जदुनंदन टैगोर (1840-62) ने परिवार की इच्छा के खिलाफ हेमसुन्दरी से विवाह कर लिया। 1862 में दुर्भाग्य से जदुनंदन का देहांत होने के बाद हेमसुन्दरी को बंगाल छोड़कर मेरठ आना पड़ा। यहां अस्पताल में नर्स की नौकरी करते हुए उन्होंने एक उर्दू के पत्रकार प्यारेलाल शंकर मेरठी (जो कि ईसाई थे) से शादी करके ईसाई धर्म अपना लिया। हेमसुन्दरी की दो पुत्री हुईं जिनमें से एक प्रभावती, मीना कुमारी की माँ थीं। प्रभावती जो एक मशहूर नृत्यांगना और अदाकारा थी, करिअर को बनाने / रोजी रोटी की तलाश में मेरठ से मुंबई आ गईं। यहां उनकी मुलाकात पारसी रंगमंच के मंजे कलाकार अली बक्श से हुई। दोनों में प्रेम पनपा और दोनों ने शादी कर ली। मुस्लिम परिवार में शादी होने की वजह से हिंदू टैगोर परिवार की बेटी प्रभावती इकबाल बानो कहलाने लगीं। इकबाल बानों / अलीबक्श से तीन बेटियां हुई। खुर्शीद, महजबीं (मीना कुमारी) व मधु। बड़ी बहन खुर्शीद जूनियर और छोटी बहन मधु बेबी माधुरी के नाम से फिल्मों में काम करती थीं। उनके पिता अलीबक्श ने फिल्म "शाही लुटेरे" फिल्म में संगीत भी दिया। फिल्मी पृष्ठभूमि से जुड़े होने की वजह से महजबीं / मीना कुमारी भी फिल्मों की ओर रुख कीं। महजबीं पहली बार 1939 में फिल्म निर्देशक विजय भट्ट की फिल्म "लैदरफेस" में बेबी महज़बीं के रूप में नज़र आईं। 1940 की फिल्म "एक ही भूल" में विजय भट्ट ने इनका नाम बेबी महजबीं से बदल कर बेबी मीना कर दिया। 1946 में आई फिल्म बच्चों का खेल से बेबी मीना 13 वर्ष की आयु में मीना कुमारी बनीं। मार्च 1947 में लम्बे समय तक बीमार रहने के कारण उनकी माँ की मृत्यु हो गई। मीना कुमारी की प्रारंभिक फिल्में ज्यादातर पौराणिक कथाओं पर आधारित थीं जिनमें हनुमान पाताल विजय, वीर घटोत्कच व श्री गणेश महिमा प्रमुख हैं। 01 अगस्त 1933 को दादर मुंबई मीठावाला चाल / ब्रिटिश भारत / में जन्मी मीना कुमारी ने 1939 से 1972, 33 वर्षों तक 93 फिल्मों में यादगार भूमिकाएं निभाई। उन्हें 1954: बैजू बावरा, 1955: परिणीता, 1963: साहिब बीबी और ग़ुलाम, 1966: काजल फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री फिल्म फेयर अवार्ड व बंगाल फ़िल्म पत्रकार संगठन की ओर से 1958 में शारदा, 1963: आरती, 1965: दिल एक मंदिर, 1973: पाक़ीज़ा के लिए (मरणोपरांत) पुरस्कार के लिए नामित किया गया। 1954 में आई उनकी फिल्म बैजू बावरा ने मीना कुमारी को बेस्‍ट एक्‍ट्रेस का फिल्म फेयर अवॉर्ड दिलवाया। यह अवार्ड पाने वाली वह पहली नायिका थीं। 1962 में आई उनकी फिल्म साहब बीबी गुलाब जिसे विजेता फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार प्राप्त हुआ। उसे 13वें बर्लिन अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में नामांकित किया गया। जहाँ मीना कुमारी को प्रतिनिधि के तौर पर चुना गया। यह फ़िल्म 36वें अकादमी पुरस्कार के सर्वश्रेष्ठ विदेशीय भाषा वर्ग में भारत द्वारा भेजी गई थी। 1964 में भगवतीचरण वर्मा के उपन्यास पर आधारित चित्रलेखा में उन्होंने काम किया। यह उनकी पहली रंगीन फिल्म थी। इस फिल्म में उनके साथ सहकलाकार के रूप में प्रदीप कुमार व अशोक कुमार ने काम किया। फिल्म का यह गीत "संसार से भागे फिरते हो, भगवान को तुम क्या पाओगे" बड़ा ही मशहूर हुआ। 1972 में आई पाकीजा फिल्म ने विशेष बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन पुरस्कार जीता। मीना कुमारी के मरणोपरांत यह फिल्म, फिल्म फेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार के लिए नामित हुई। यह एक त़वायफ़ की मार्मिक कहानी है। फिल्म में संगीत गु़लाम मोहम्मद ने दिया था और उनकी मृत्यु के पश्चात फिल्म का पार्श्व संगीत नौशाद ने तैयार किया। फिल्म प्रमुख गीत · "चलो दिलदार चलो चाँद के पार चलो, हम हैं तैयार चलो ...." · "चलते चलते युंही कोई मिल गया था सरे राह चलते चलते ..." · "इन्ही लोगों ने ले लीना दुपट्टा मेरा ...." · "ठाढे़ रहियो ओ बाँके यार रे..." · "आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे, तीरे नज़र देखेंगे, ज़ख्मे जि़गर देखेंगे...." · "मौसम है आशका़ना, सहित सभी गाने लता मंगेशकर द्वारा गाये गये और बड़े मशहूर हुए, जिन्हें आज तक याद किया जाता है। फिल्म का निर्देशन क़माल अमरोही ने किया था जो मुख्य नायिका मीना कुमारी के पति भी थे। फिल्म लगभग 14 वर्षों में बन कर तैयार हुई। इसमें मीना कुमारी ने नरगिस साहिब जान का किरदार निभाया। फिल्म की कहानी यह है कि नरगिस (मीना कुमारी) जो कोठे पर पलती है। वो इस दुश्चक्र को तोड़ पाने में असमर्थ रहती है। नरगिस जवान होती है और एक खूबसूरत और लोकप्रिय नर्तकी / गायिका साहिबजान के रूप मे विख्यात होती है। नवाब सलीम अहमद खान (राज कुमार) साहिबजान की सुंदरता और मासूमियत पर मर मिटता है और उसे अपने साथ, भाग चलने के लिए राजी़ कर लेता है। लेकिन वो जहां भी जाते है लोग साहिबजान को पहचान लेते हैं। तब सलीम उसका नाम पाकीज़ा रख देता है और कानूनी तौर पर निका़ह करने के लिये एक मौलवी के पास जाता है। सलीम की बदनामी ना हो यह सोच कर साहिबजान शादी से मना कर देती है और कोठे पर लौट आती है। सलीम अंततः किसी और से शादी करने का निर्णय लेता है और साहिबजान को अपनी शादी पर नृत्य करने के लिए आमंत्रित करता है। साहिबजान जब मुजरे के लिये आती है तो कई राज़ उसका इंतजा़र कर रहे होते हैं। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफ़िस पर धूम मचा दी और उस दौर में 60 मिलियन INR कमाई की। इस फिल्म की कास्ट्यूम डिजाइन खुद मीना कुमारी ने की थी। पाकीजा के रिलीज होने के तीन हफ्ते बाद, मीना कुमारी गंभीर रूप से बीमार हो गईं। 28 मार्च, 1972 को उन्हें सेंट एलिजाबेथ के नर्सिग होम में भर्ती कराया गया। मीना ने 29 मार्च, 1972 को आखिरी बार कमाल अमरोही का नाम लिया, इसके बाद वह कोमा में चली गईं। 31 मार्च 1972, गुड फ्राइडे वाले दिन दोपहर 3 बजकर 25 मिनट पर महज़ 38 वर्ष की आयु में मीना कुमारी ने अंतिम सांस ली। पति कमाल अमरोही की इच्छानुसार उन्हें बम्बई के मडगांव स्थित रहमताबाद कब्रिस्तान में दफनाया गया। मीना कुमारी इस लेख को अपनी कब्र पर लिखवाना चाहती थीं: "वो अपनी ज़िन्दगी को एक अधूरे साज़, एक अधूरे गीत, एक टूटे दिल, परंतु बिना किसी अफसोस के साथ समाप्त कर गई" महज 39 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह गईं। जब मीना कुमारी की मौत हुई, उस वक्त उनके पास अस्पताल का बिल भरने के भी पैसे नहीं थे। मौत को गले लगाने से पहले मीना कुमारी अपनी गजल व नज़्म की ढाई सौ डायरियां गीतकार गुलजार के नाम वसीयत करके गयीं। यह सभी डायरियां गुलजार साहब के पास हैं। 'मेरे अंदर से जो जन्मा है, वह लिखती हूं जो मैं कहना चाहती हूं वह लिखती हूं।' मीना कुमारी ने अपनी वसीयत में अपनी कविताएं छपवाने का जिम्मा गुलजार को दिया था जिसे गुलज़ार ने ‘नाज’ उपनाम से छपवाया। सदा तन्हा रहने वाली मीना कुमारी ने अपनी रचित एक गजल के जरिए अपने दिल के हाल को कुछ इस तरह बयां किया... .. चांद तन्हा है आसमां तन्हा दिल मिला है कहां कहां तन्हा राह देखा करेगा सदियों तक छोड़ जायेगें ये जहां तन्हा.. मीना कुमारी पर जितना लिखा जाए कम है। उन पर मशहूर लेखकों / पत्रकारों द्वारा अनेक बायोपिक लिखे जा चुके हैं। मीना कुमारी पर पहली जीवनी अक्टूबर 1972 में विनोद मेहता द्वारा उनकी मृत्यु के बाद लिखी गई थी। कुमारी की आधिकारिक जीवनी, इसे मीना कुमारी - द क्लासिक बायोग्राफी शीर्षक दिया गया था। यह जीवनी मई 2013 में फिर से प्रकाशित हुई थी। मोहन दीप द्वारा लिखा गया निंदनीय सिम्पली सकेन्डलॉस लेख 1998 में प्रकाशित एक अनौपचारिक जीवनी थी। यह मुंबई के हिंदी दैनिक दोपहर का सामना में एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित किया गया था। मीना कुमारी की एक और जीवनी, आखरी अधाई दिन को मधुप शर्मा ने हिंदी में लिखा था। यह पुस्तक 2006 में प्रकाशित हुई थी। मीना कुमारी हमेशा बड़े पैमाने पर फिल्म निर्माताओं के बीच रुचि का विषय रही हैं। 2004 में, उनकी फिल्म साहिब बीबी और गुलाम का एक आधुनिक रूपांतर प्रीतीश नंदी कम्युनिकेशंस द्वारा किया जाना था, जिसमें ऐश्वर्या राय और बाद में प्रियंका चोपड़ा को उनकी छोटी बहू की भूमिका को चित्रित करना था। हालांकि, फिल्म को निर्देशक ऋतुपॉर्नो घोष द्वारा बाद में इसे एक धारावाहिक के रूप में बनाया गया, जिसमें अभिनेत्री रवीना टंडन ने इस भूमिका को निभाया। 2015 में, यह बताया गया कि तिग्मांशु धूलिया को हिंदी सिनेमा की ट्रेजेडी क्वीन पर एक फिल्म बनानी थी, जो विनोद मेहता की किताब "मीना कुमारी - द क्लासिक बायोग्राफी" का स्क्रीन रूपांतरण होना था। अभिनेत्री कंगना रनौत को कुमारी को चित्रित करने के लिए संपर्क किया गया था, लेकिन प्रामाणिक तथ्यों की कमी और मीना कुमारी के सौतेले बेटे ताजदार अमरोही के कड़े विरोध के बाद फिल्म को फिर से रोक दिया गया था। 2017 में, निर्देशक करण राजदान ने भी उन पर एक आधिकारिक बायोपिक निर्देशित करने का फैसला किया। इसके लिए, उन्होंने माधुरी दीक्षित और विद्या बालन से फ़िल्मी पर्दे पर मीना कुमारी की भूमिका निभाने के लिए संपर्क किया, लेकिन कई कारणों के कारण, दोनों ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। बाद में उन्होंने अभिनेत्री सन्नी लियोन की ओर रुख किया, जिन्होंने इस किरदार में बहुत दिलचस्पी दिखाई। ऋचा चड्ढा, जया प्रदा और जान्हवी कपूर सहित कई अन्य अभिनेत्रियों ने भी शानदार आइकन की भूमिका निभाने की इच्छा व्यक्त की। 2018 में, निर्माता और पूर्व बाल कलाकार कुट्टी पद्मिनी ने गायक मोहम्मद रफ़ी और अभिनेता-निर्देशक जे पी चंद्रबाबू के साथ एक वेब श्रृंखला के रूप में मीना कुमारी पर एक बायोपिक बनाने की घोषणा की। पद्मिनी ने मीना कुमारी के साथ फिल्म दिल एक मंदिर में काम किया है और इस बायोपिक के साथ दिवंगत अभिनेत्री को सम्मानित करना चाहती थी। कहा जाता है कि दरिद्रता से ग्रस्त उनके पिता अली बक़्श उन्हें पैदा होते ही अनाथाश्रम में छोड़ आए थे चूँकि वे उनके डाक्टर श्रीमान गड्रे को उनकी फ़ीस देने में असमर्थ थे। हालांकि अपने नवजात शिशु से दूर जाते-जाते पिता का दिल भर आया और तुरंत अनाथाश्रम की ओर चल पड़े। पास पहुंचे तो देखा कि नन्ही मीना के पूरे शरीर पर चीटियाँ काट रहीं थीं। अनाथाश्रम का दरवाज़ा बंद था, शायद अंदर सब सो गए थे। यह सब देख उस लाचार पिता की हिम्मत टूट गई, आँखों से आँसु बह निकले। झट से अपनी नन्हीं-सी जान को साफ़ किया और अपने दिल से लगा लिया। अली बक़्श अपनी चंद दिनों की बेटी को घर ले आए। समय के साथ-साथ शरीर के वो घाव तो ठीक हो गए किंतु मन में लगे बदकिस्मती के घावों ने अंतिम सांस तक मीना का साथ नहीं छोड़ा। उन्हीं के शब्दों में..... पूछते हो तो सुनो, कैसे बसर होती है रात ख़ैरात की, सदक़े की सहर होती है साँस भरने को तो जीना नहीं कहते या रब दिल ही दुखता है, न अब आस्तीं तर होती है जैसे जागी हुई आँखों में, चुभें काँच के ख़्वाब रात इस तरह, दीवानों की बसर होती है ग़म ही दुश्मन है मेरा, ग़म ही को दिल ढूँढता है एक लम्हे की जुदाई भी अगर होती है एक मर्कज़ की तलाश, एक भटकती ख़ुशबू कभी मंज़िल, कभी तम्हीदे-सफ़र होती है दिल से अनमोल नगीने को छुपायें तो कहाँ बारिशे-संग यहाँ आठ पहर होती है काम आते हैं न आ सकते हैं बे-जाँ अल्फ़ाज़ तर्जमा दर्द की ख़ामोश नज़र होती है. इन्हीं शब्दों के साथ मेरी प्रिय अभिनेत्री महज़बीं को नम आंखों से श्रद्धांजलि.... *************

  • गुल्लो पान वाली

    (वक्त क्या न कराए) डॉ. जहान सिंह जहान गुल्लो, गुल्लो अरी गुल्लो कहां गई। छोटी बेगम झल्लाकर बोली नाशपिटी कहां मर गई, तभी हवेली के ‘मरदान-खाने’ से आवाज आई! जी छोटी बेगम साहिबा, गुल्लो इधर है, मैं अभी हाजिर हुई। बेगैरत औरत वहां क्या कर रही है, बेगम चिल्लाई। बेगम साहिबा मैं बडे नवाब साहब के बाजुओं को तेल पिला रही हूं। छोटी बेगम तुनक कर बोली लाहौलविला, बड़ी बदतमीज हो गई हो, कहती हुई आंगन में पड़ी आराम कुर्सी पर पसर गई। मिर्जा साहब की हवेली शान-बान और मेहमानदारी के लिए दूर-दूर तक जानी जाती थी। गुलबानो खूबसूरती तीखे नाक-नक्स, रंगीन मिजाज की खाई-पी तमीजदार लड़की थी। नबावों के बीच पली-बड़ी और छोटी बेगम के मुंह लगी थी। वैसे तो गुलबानो हवेली में ‘पान-सामा’ थी, लेकिन जरूरत पड़ने पर हर काम करने का हुनर रखती थी। उसको जनान खाने जाने और मरदान खाने में बे-रोक टोक आने-जाने की इजाजत थी। मिर्जा साहब पान के बेहद शौकीन थे। पचासों किस्म के पान, उनके मसाले, सोने के वर्क, केसर, जाफरान, अफीम की पुट, विदेशी सुपारी, अफ्रीकी कत्था, अरब की खुशबूयें, तम्बाकू और कई तरह के रस, छालें, हकीमों की बनाई जोशीली दवायें पेश करने को सैकड़ों रक्काबियाँ, पान दान एक पूरा पान-नाम हुआ करता था। गुल्लो बाई ही मिर्जा नवाब और उनके मेहमानों को पान पेश करती थी और इस हुनर में माहिर हो चुकी थी। कैसे पल्लू डालना, कितना गिराना, आंखों में काजल, चाल में धीमापन, बिना देखे पीछे वापस जाने की अदा बखूबी आती थी। हर शाम का यही सिलसिला था और हर एक की एक ही हसरत होती थी कि वह गुल्लो बाई के हाथ का पान खाये। ईस्ट इंडिया कंपनी का हिंदुस्तान आना और फिर अंग्रेजी हुकूमत की कारगुजारियों, नवाबों तालुकेदारों, जमीदारों, राजाओं के लिए परेशानी का सबब बन गई थी। धीरे-धीरे एक-एक करके मिर्जा साहब की शान-शौकत, धन-दौलत और उनका इकबाल गिरने लगा, घर से बेघर होने लगे। उनकी जायदादें हड़प ली गई और फिर वजीफाओं पर दिन गुजरने लगे। मिर्जा साहब की भी माली हालत खस्ता हो चली थी और फिर एक दिन ऐसा आया कि मिर्जा साहब अपनी बची-खुची पूंजी और बेगमों को लेकर विलायत चले गये। गुल्लो बाई पर तो जैसे पहाड़ टूट पड़ा हो, अपने शौहर, तीन बच्चे और एक बक्सा लेकर उसने हवेली छोड़ दी। दो रातें उसने रफीक तांगे वाले के यहां गुजारी। कोई काम न मिला तो भूख प्यास ने गुल्लो बाई के कदम गलत रास्ते की तरफ मुड़ गए, फिर उनका वहां से वापस लौटना नामुमकिन हो गया। गुल्लो बाई की खूबसूरती, अदाओं की चर्चा उसे एक नामचीन रक्कासा की कोठी तक ले गई। जाहिरा बेगम ने गुल्लो बाई को अपने पास बुला लिया, उसे औरतों का पुराना तजुर्बा था। गुल्लो को सर पर छत और पेट में रोटी का सहारा मिल गया। एक शाम वह जाहिरा बेगम के पास बैठी थी, जाहिरा कुछ परेशान इधर-उधर खिड़की से झांक रही थी। गुल्लो ने बड़ी अदब और तमीज से कहा कि बेगम साहिबा गुस्ताखी माफ हो आप परेशान सी देख रही हैं। हां गुल्लो वो मेरा पान-साज नहीं आया और शाम की महफिल सजने वाली है। छोटा मुंह बड़ी बात बेगम साहिबा क्या मैं पान पेश कर सकती हूं। गुल्लो तू करेगी, अगर कोई गुस्ताखी हो गई। तौबा-तौबा हाय अल्लाह तो क्या होगा। बेगम साहिबा पहले आप मेरा बनाया हुआ पान नोस फरमायें, पसंद ना आए तो इस लड़की का सर और आपकी जूती। जा पान लगाकर ला, अल्लाह का करम गुल्लो को मुंह मांगी मुराद मिल गई। वो रात और गुल्लो किस्मत का रास्ता। जाहिरा बेगम की शाम की महफिल जितनी मौज-मस्ती के लिए, उतनी ही गुल्लो बाई के पान के लिए मशहूर हो चुकी थी। गुल्लो, जाहिरा बेगम की खासदार बन चुकी थी और सब जरूरी काम भी संभाले लगी थी। एक अंग्रेज तहसीलदार को गुल्लो से इश्क हो गया और उसने चौक में एक दुकान उसके नाम कर दी। अब गुल्लो बाई खिलाड़ी बन चुकी थी, उसमें हुनर था कि हुस्न की दौलत किस पर कब और कितनी लुटानी है। गुल्लो बाई का नाम और पान ही शहर के रईसों की पहली पसंद बन चुका था। चौक पर उसकी दुकान ही गुल्लो तक पहुंचाने का सीधा रास्ता बन चुकी थी। गुल्लो के पान में ग्राहकों को मर्दाना जोश में इजाफा होने का एहसास होने लगा। अलग-अलग पान की अलग-अलग कीमत। अंग्रेजी हुकूमत में 10-10 रुपये तक पान बेचा। गुल्लो अब उमर दार होती जा रही थी। गुल्लो के कम और पान के आशिक ज्यादा हो गए थे। गुल्लो अब फिकरमंद रहने लगी थी। मेरे जाने के बाद मेरे पान का कारोबार कौन संभालेगा। बड़े लड़के मियां सादाब को इस कारोबार में कोई खास रुचि नहीं थी। वह पान भी नहीं खाता था। गुल्लो ने एक दो बार सादाब को कोठी की लड़कियों के साथ बतियाते देखा था। मियां सादाब की कद काठी तो बड़ी थी, लेकिन उसमें जो उत्साह होना चाहिए वह नहीं था। गुल्लो बाई थोड़ी फिकर करने लगी थी। काश! सादाब पान खा लेता! मियां सादाब का निकाह हुआ और आज पहली रात थी। नेग की रस्म खत्म हुई। सादाब पहले मिलन के लिए खास-तौर से तैयार कमरे में जाने से पहले अम्मी को सलाम करने आया। गुल्लो बाई ने मुबारकबाद देते हुए एक पान का डिब्बा पेश किया। सादाब बोला मम्मी जान मैं पान कहां खाता हूं। गुल्लो बाई ने सर पर हाथ फेरते हुए बड़े खुलूस और एहतराम के साथ कहा बेटा पान खा लेना। यही पान बता देगा कि मेरे पान का कारोबार आगे कौन करेगा। सादाब की पहली रात बेहद कामयाब रही। सुबह मम्मीजान को आदाब पेश करते हुए सादाब बोला आपका पान और पान की दुकान तब तक जिंदा रहेगी जब तक मैं, गुल्लो ने सादाब को गले लगा लिया और रोने लगी। मियां सादाब ने सलाम करते हुए कहा मैं शागिर्द और आप उस्ताद। गुल्लो बाई का पान, कामयाब शादी का नाम बन गया। दुकान पर नई तख़्ती लग गई – “गुल्लो बाई का पान शाम की शान”। *******

  • खूनी झील

    अनजान एक बार की बात है एक जंगल में एक झील थी। जो खुनी झील के नाम से प्रसिद्ध थी। शाम के बाद कोई भी उस झील में पानी पीने के लिए जाता तो वापस नहीं आता था। एक दिन चुन्नू हिरण उस जंगल में रहने के लिए आया। उसकी मुलाकात जंगल में जग्गू बन्दर से हुई। जग्गू बन्दर ने चुन्नू हिरण को जंगल के बारे में सब बताया लेकिन उस झील के बारे में बताना भूल गया। जग्गू बन्दर ने दूसरे दिन चुन्नू हिरण को जंगल के सभी जानवरों से मिलाया। जंगल में चुन्नू हिरण का सबसे अच्छा दोस्त एक चीकू खरगोश बन गया। चुन्नू हिरण को जब ही प्यास लगती थी तो वह उस झील में पानी पीने जाता था। वह शाम को भी उसमें पानी पीने जाता था। एक शाम को वह उस झील में पानी पीने गया तो उसने उसमें बड़ी तेज़ी से अपनी और आता हुआ एक मगरमच्छ देख लिया। जिसे देखकर वह बड़ी तेज़ी से जंगल की तरफ भागने लगा। रास्ते में उसको जग्गू बन्दर मिल गया। जग्गू ने चुन्नू हिरण से इतनी तेज़ भागने का कारण पूछा। चुन्नू हिरण ने उसको सारी बात बताई। जग्गू बन्दर ने कहा कि मैं तुमको बताना भूल गया था कि वह एक खुनी झील है। जिसमें जो भी शाम के बाद जाता है वह वापिस नहीं आता। लेकिन उस झील में मगरमच्छ क्या कर रहा है। उसे तो हमनें कभी नहीं देखा। इसका मतलब वह मगरमच्छ ही सभी जानवरों को खाता है जो भी शाम के बाद उस झील में पानी पीने जाता है। अगले दिन जग्गू बन्दर जंगल के सभी जानवरों को ले जाकर उस झील में गया। मगरमच्छ सभी जानवरों को आता देखकर छुप गया। लेकिन मगरमच्छ की पीठ अभी भी पानी से ऊपर दिखाई दे रही थी। सभी जानवरों ने कहा कि यह पानी के बाहर जो चीज़ दिखाई दे रही है वह मगरमच्छ है। यह सुनकर मगरमच्छ कुछ नहीं बोला। चीकू खरगोश ने दिमाग लगाया और बोला नहीं यह तो पत्थर है। लेकिन हम तभी मानेंगे जब यह खुद बताएंगा। यह सुनकर मगरमच्छ बोला कि मैं एक पत्थर हूँ। इससे सभी जानवरों को पता लग गया कि यह एक मगरमच्छ है। चीकू खरगोश ने मगरमच्छ को कहा कि तुम इतना भी नहीं जानते कि पत्थर बोला नहीं करते। इसके बाद सभी जानवरों ने मिलकर उस मगरमच्छ को उस झील से भगा दिया और खुशी-खुशी रहने लगे। सीख: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि यदि हम किसी भी मुसीबत का सामना बिना घबराये मिलकर करते हैं तो उससे छुटकारा पा सकते हैं। ******

  • मौन

    सविता सिंह मीरा मौन, समझे कौन उफ्फ ये शोर शराबा शब्द सारे हो गए गौण। तभी किसी ने दी आवाज कौन है जो आया आज इतने कोलाहल में भी समझ गया वह सारे राज़। देखा मुड़ के नहीं कोई पास किस से मुझको,कैसा आस अंतस ने दिया फिर दस्तक तू खुद है खुद के लिए खास। शब्द सारे हो गए मुखर क्यूँ ताकू अब इधर उधर पा लिया जब खुद को हमने ये मिलन है सबसे सुंदर। ******

  • लबों की मुस्कुराहट

    सम्पदा ठाकुर कभी लबों की मुस्कुराहट है कभी गम की रवानी है कभी है यह खुशी तो कभी आंखो का पानी है कभी है गम की बहती दरीया कभी मौजों की रवानी है कभी लगती हकीकत सी कभी लगती कहानी है कभी है जानी पहचानी सी कभी यह दर्द अंजानी है कभी लगती पहेली सी कोई गुत्थी सुलझानी है ज़िन्दगी और कुछ भी नहीं तेरी मेरी कहानी है। *****

  • आम लडकी

    विनीता गौतम मैं आम लडकियों जैसी नहीं हूँ, नहीं हूँ मैं गुड गर्ल पढी लिखी हूँ उडना चाहती हूँ अपने सपनों को पूरा करना चाहती हूँ, इसलिए अपने हक के लिए लड भी सकती हूँ, क्योंकि मैं आम लडकी जैसी नही हूँ। जुल्म नहीं सहूगी, खामोश भी नहीं रहूगी, तर्क वितर्क भी करूंगी, क्यूंकि मैं आम लडकियों जैसी नहीं हूँ। कोई भी राह चलता छेड जाये, पीछे से कोई सीटी मारे या कोई जुमला कस जाये, ऐसे मनचलों को बेइज्जत भी करूगी, क्योंकि मैं आम......... । अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीना है , जो मन में आये वो करना है नहीं बनना है गुड गर्ल क्योंकि मैं आम लडकियों के जैसे नही हूँ। *******

  • मुक्तिमार्ग की खोज में

    कौशल पाण्डेय जब उस दिन डाक में रमण संदेश नाम की वह छोटी सी पत्रिका मिली तो यह समझते देर न लगी कि निश्चित ही इसे मेरे हिन्दी के अध्यापक रहे रमण सहाय जी ने ही भेजी होगी। वे मेरे गांव के निकट के माध्यमिक स्कूल में मुझे हिन्दी पढ़ाया करते थे। कविताएं लिखते थे। स्कूल के कार्यक्रमों में जब वे अपनी कविताएं सुनाते तो हम बच्चों को वह दुनिया के सबसे बड़े कवि लगते। वे अक्सर कहा करते थे कि रिटायर् होने के बाद एक पत्रिका अवश्य निकालेंगे जिससे इस क्षेत्र के लिखने वालों को देश-दुनिया में नाम दिला सकें। पत्रिका में कुछ कविताएं तो स्वयं रमण जी की थीं और कुछ कस्बे के उभरते कवियों की। साथ ही तीन-चार पन्नों में वैवाहिक विज्ञापन। मैंने रमण जी को पत्रिका मिलने की सूचना देने के लिए फोन किया तो बहुत खुश हुए। बोले कि पत्रिका निकाल तो दी पर कोई मदद नहीं कर रहा है। उनका संकेत आर्थिक मदद की ओर था। फिर बोले कि तुम्हारी कविता अमुक पत्रिका में छपी देखी तो सोचा संपर्क करें। तुम तो बड़े लेखक लगते हो। एक कविता मुझे भी भेजो पता तो चले कि लिखते भी हो। और तब गुरु दक्षिणा का भी अधिकार बनता है। मैंने उन्हें सहयोग राशि का एक चेक और एक कविता लिफ़ाफ़े में रखकर भेज दी। दो-तीन महीने के बाद पत्रिका फिर मिली। मेरी कविता भी छपी थी पर किसी और के नाम से। मैंने फोन करके पूछा तो उनका जवाब बड़ा ही मासूमियत भरा था। हाँ, मैंने भी देखा है। दरअसल मेरा बारह वर्ष का नाती बहुत दिनों से लगा था कि बाबा एक कविता मेरे नाम से भी छाप दो। स्कूल में दोस्तों को दिखानी है। मुझे समय नहीं मिल पा रहा था और वह ठहरा बालक। अपना धैर्य खो बैठा। मेरी टेबल पर रखे प्रूफ के पन्नों में तुम्हारी जगह अपना नाम लिख दिया। तुम एक कविता और भेज दो। इस बार तुम्हारे फ़ोटो के साथ छापेंगे। मैं इंतजार करूंगा। मैं फोन हाथ मे लिए निरुत्तर होकर अपनी मुक्ति के मार्ग की खोज में लग गया। **********

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