top of page

Search Results

976 results found with an empty search

  • वो घर.......

    सविता सिंह मीरा वो घर....... वो मेरा पुराना घर थे बेपरवाह नहीं था डर सालों बाद जब पड़े कदम तैर गए वह सारे मंजर आने लगी हंसी की आवाजें ढूंढ रही थी कुछ मेरी निगाहें सब कुछ तो मिला मगर फीकी पड़ गई अब मुस्कुराहटें। देख दिवारें भी रो पड़ी बंद हो गई वह भी घड़ी किसी आशा से तकती थी जो इंतजार में मिली खड़ी। सजता था चुल्हा उसी ओर मां जगाती उठ हो गई भोर चारों तरफ फैला वीराना नहीं अब कोई भी शोर। अब तो है सबके अलग कमरे कौन उठाए किसी के नखरे पहले रहते थे सब एकत्रित आज लगता सब बिखरे बिखरे। अबकी मनाए वहीं त्योहार सजाएं सारे अंगना घर द्वार नींव ना बिखरे कभी भी इनका हम पर बड़ा उपकार। ******

  • मेरे ख्वाबों की गलियों में

    मधु मधुलिका मेरे ख्वाबों की गलियों में तेरी सूरत रहती है। ह्रदय के मन मंदिर में बसी तेरी मूरत रहती है। बनाया प्रेमग्रंथ पन्नो पर लिख नाम तुम्हारा, छलकती मेरे हर गीतों में तेरी चाहत रहती है। बाँध लिया तुमको पागल मन की लहरों ने, सुलगती साँसे मन की तरसती आंखें रहती है। उदास सुबह घोर अँधेरी लगे रात चाँदनी, बिन तेरे इस जीवन में तन्हाई रहती है। मृगतृष्णा सी भटक रही मैं तेरी तलाश में, साया बन तेरे साथ रहूँ ये हसरत रहती है। अंतर्मन में पाकर खुशबू खिला मन का गुलाब, आ जाओ अब मिलने उदास तबीयत रहती है। अकेले में अकेले संग तेरे करती हूँ मैं संवाद, यादों में तेरे पलकें आँसूओं से भीगी रहती हैं। ********

  • अक्स

    अंशिता दुबे मेरी अस्थियों को विसर्जित मत करना गंगा मैली हो जाएगी मेरे समर्पण के स्वरूप को मिटा नहीं पायेगी मेरी संवेदनाओं को मिला नहीं पायेगी उस घाट पर शायद तुम नहीं मिलोगे मेरा भटकता वज़ूद अकेला क्या करेगा रहने देना मेरी अस्थियां थोड़ा और इंतजार कर लुंगी मैं लावारिस सी क्योंकि मेरा प्रेम तो पराकाष्ठा पार कर चुका होगा आत्मा की शुद्धता में समाहित होगा देख लेना मेरी अस्थियों में इक तुम्हारा अक्स मिलेगा ! *********

  • पिया के देश जाना है

    डॉ. ममता परिहार पिया के देश जाना है सुभग श्रृंगार तन मंडित, सजा है वेणु अलकों में। छिपी एक स्वप्न की दुनिया, सिसकती भीगी पलकों में। हथेली नाम प्रियतम का, अलक्तक संग सजे नूपुर। निखरती माँग मणिराजी, बजे संगीत मध्यम सुर। विदा ले जन्म-दाता से, यह आँगन छोड़ जाना है। पिया के देश जाना है। पिया के देश जाना है। माँ आँचल नेह का निर्झर, छिपा है क्षीरनिधि पावन। किया पयपान अमृत सा, हुआ पोषित यह तन जीवन। सजाया रूप परियों सा, सँवारी मन की कोमलता। दी शिक्षा मान, गौरव की , सिखाई कुल की पावनता। परिष्कृत कर दिया जीवन, हुआ निजता का अवबोधन। बताया धर्म-संस्कृति भी, सिखाया ईश आराधन। हुई अभिसिक्त जिस आँचल, वो आँचल छोड़ जाना है। पिया के देश जाना है। पिया के देश जाना है। पकड़ उँगली चलाया है, रहे बनकर सदा संबल। पिता प्रतिबिंब हर क्षण का, किया है पुष्ट आत्मबल। दिया संसार का परिचय, व सम्बंधों की गरिमा का। हो उन्नत भाल पौरुष से, हो यश स्त्रीत्व महिमा का। नयन है प्रेम से पूरित, मगर कर्तव्य आभासित। दिखे हैं कर्मयोगी से, करें जीवन को परिभाषित। मिली जहाँ ज्ञान की दीक्षा, वो साधन छोड़ जाना है। पिया के देश जाना है। पिया के देश जाना है। मिला जो माँ से बाबा से, वो निधियाँ ले के आई हूँ। सफल सम्मानमय जीवन की, विधियाँ साथ लायी हूँ। न तोलो उस तुला से, अर्थ से बस अर्थ ही तोले। जो शिक्षा, ज्ञान, गौरव, मान, को बस व्यर्थ ही बोले। करो मत मान मर्दन है पिता की आत्म का टुकड़ा। न घायल तन करो, बरसों सँवारा माँ ने यह मुखड़ा। सहेजो घर की लक्ष्मी को, वही है मूल धन घर का। मिटा दो मन की निर्ममता, न समिधा अब करो तन का। भटकते किसलिए दर-दर, यहीं सब छोड़ जाना है। पिया के देश जाना है। पिया के देश जाना है। *******

  • हादसे

    रीनू तेरे शहर में हादसे होते रहे, बेफिक्र हम तो चैन से सोते रहे l इंतजार में कटती रही ये जिन्दगी, यूं आह भर भर रात दिन रोते रहे l उसकी नजर सीधी पड़े तो गुल खिले, गर वो खफा फिर भार ही ढोते रहे। अपनी खुशी कायम रहे बस इसलिये, कांटें किसी की राह में बोते रहें। बढ़ने लगे शिकवे गिले यूं बेसबब, बैचैन से हम होश ही खोते रहे l हमको समझ आयी नहीं तेरी अदा, रीनू भला क्यो ये सितम होते रहे l *******

  • मन मेरा

    अलका बहेटी दर्द अपना सागर ने ऐसे छलकाया, सीने के तूफान को सतह पर उठाया। चोट खाता है जो मोहब्बत में गहरी, वो ही तो काबिल शायर हो पाया। नींद रात भर करवटें बदलती रही, और इल्जाम सूनी यादों पर लगाया। पीले पड़े पत्तों को तो झड़ना ही था, महीनों के कटघरे में पतझड़ आया। पेड़ टुकुर टुकुर तकता रहा घरौंदा, उड़ा जो पंछी फिर लौट नहीं पाया। रिश्ते नाते तो बस सांसों से निभते, मरे बदन को तो अपनों ने जलाया। आसमान की बोली लगा रही ज़मीन, हवाई पंखों ने क्या खूब उसे उड़ाया। मौसम की राहों से आंखों में उतरे, बूंदों को*मन मेरा* कुछ ऐसा भाया। *********

  • कारवाँ गुज़र गया

    गोपाल दास नीरज स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे। कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे। नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई पात-पात झर गए कि शाख़-शाख़ जल गई चाह तो निकल सकी न पर उमर निकल गई गीत अश्क बन गए छंद हो दफन गए साथ के सभी दिऐ धुआँ पहन पहन गए और हम झुके-झुके मोड़ पर रुके-रुके उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे। कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे। क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा क्या जमाल था कि देख आइना मचल उठा इस तरफ़ जमीन और आसमाँ उधर उठा थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा एक दिन मगर यहाँ ऐसी कुछ हवा चली लुट गई कली-कली कि घुट गई गली-गली और हम लुटे-लुटे वक्त से पिटे-पिटे साँस की शराब का खुमार देखते रहे। कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे। हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ हो सका न कुछ मगर शाम बन गई सहर वह उठी लहर कि ढह गये किले बिखर-बिखर और हम डरे-डरे नीर नैन में भरे ओढ़कर कफ़न पड़े मज़ार देखते रहे। कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे। माँग भर चली कि एक जब नई-नई किरन ढोलकें धुमुक उठीं ठुमक उठे चरन-चरन शोर मच गया कि लो चली दुल्हन चली दुल्हन गाँव सब उमड़ पड़ा बहक उठे नयन-नयन पर तभी ज़हर भरी गाज़ एक वह गिरी पुँछ गया सिंदूर तार-तार हुई चूनरी और हम अजान से दूर के मकान से पालकी लिये हुए कहार देखते रहे। कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे। ********

  • कल की कल सोचेंगे

    अनजान सेठ जमनालाल बजाज ने संकल्प लिया था कि वे आजीवन स्वदेशी वस्तुओं का ही उपयोग करेंगे। उनकी प्रतिज्ञा यह भी थी कि वे प्रतिदिन किसी-न-किसी संत महात्मा या विद्वान् का सत्संग करेंगे। एक दिन वे एक संत का सत्संग करने पहुँचे। बातचीत के दौरान उन्होंने कहा, ‘महाराज, आप जैसे संतों के आशीर्वाद से मैंने अपने जीवन में आय के इतने साधन अर्जित कर लिए हैं कि मेरी सात पीढ़ियों को कमाने की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। आठवीं पीढ़ी की कभी-कभी मुझे चिंता होती है कि उसके भाग्य में पता नहीं क्या होगा?” संतजी ने कहा, ‘सेठजी, आठवीं पीढ़ी की चिंता आप न करें। कल सवेरे आप यहाँ आ जाएँ। आपकी सभी चिंताओं का समाधान हो जाएगा।’ सेठ जमनालाल बजाज सुबह-सुबह उनकी कुटिया पर जा पहुँचे। संत ने कहा, ‘सेठजी, गाँव के मंदिर के पास झाडू बनाने वाला एक गरीब परिवार झोंपड़पट्टी में रहता है। पहले आप उसे एक दिन के भोजन के लिए दाल-आटा दे आओ। उसके बाद मैं आपको वह युक्ति बताऊँगा।’ सेठ जमनालाल आटा-दाल लेकर उस झोंपड़ी पर पहुँचे। दरवाजे पर आवाज देते ही एक वृद्धा निकलकर बाहर आई। सेठजी ने उसे लाया हुआ खाद्यान्न थमाया, तो वह बोली, ‘बेटा, इसे वापस ले जा। आज का दाना पानी तो आ गया है।‘ जमनालालजी ने कहा, ‘तो कल के लिए इसे रख लो।’ वृद्धा बोली, ‘जब ईश्वर ने आज का इंतजाम कर दिया है, तो कल का भी वह अवश्य करेगा। आप इसे किसी जरूरतमंद को दे देना।’ वृद्धा के शब्द सुनकर सेठ जमनालाल बजाज पानी-पानी हो गए। उन्होंने विरक्ति और त्याग की मूर्ति उस वृद्धा के चरण छूकर आशीर्वाद माँगा और वापस हो गए। इस घटना के बाद वे स्वयं कहा करते थे, ‘कर्म करते रहो, ईश्वर की कृपा से आवश्यकताओं की पूर्ति स्वतः होती रहेगी।’ ********

  • यह दर्द कहां मैं छुपाऊं

    पिंकी सिंघल चाहूं जो रोना खुलकर मैं, तो कभी रो न पाऊं तुम ही बताओ, मैं हृदय में उठता दर्द कहां छुपाऊं बेहिसाब दर्द दिया माना तूने, यूं बहुत दूर मुझसे जाकर मैं सोचूं भी जो तुझसे दूर होना, तो कभी हो न पाऊं तुम हो गए हो शामिल, मेरे वजूद में कुछ इस तरह से कि चाहूं भी तुम्हें गर भुलाना, तो भुला न पाऊं मेरे जीने का सहारा बन गई हैं, सब स्मृतियां तुम्हारी तुम्हारी यादों को तुम ही बताओ, अब मैं कैसे बिसराऊं कोई समझे न कभी पीर यहां, किसी भी बेगाने की तुम्हारे सिवा बताओ, उम्मीद अब मैं किससे लगाऊं हो तुम ही इबादत मेरी, हैं ये सांसें भी तुमसे होकर जुदा तुमसे जीना अब, बड़ा मुश्किल मैं पाऊं लाफ़ानी है मेरा इश्क़ यह तुमसे, इतना जान लो तुम तुम्हारे सिवा बात यह बताओ और मैं किसको बताऊं है संतप्त रूह माना बहुत, तुमसे अज़ीज़ पर कुछ नहीं तुम्हें भूलने से पहले मेरी जान, जान से मैं जाऊं *******

  • शब्दों का महत्त्व

    डॉ. कृष्ण कांत श्रीवास्तव हमारे जीवन में शब्दों का इतना महत्त्व क्यों है? ये शब्द ही है जो हमें अपने भविष्य को संवारने में सहयोग करते हैं। शब्दों में ही जीवन का सार छिपा हुआ हैं। सौहार्दपूर्ण आचरण और दूसरों के प्रति सम्मान रखने की भावना से ही व्यक्तित्व में आकर्षण आ सकता है। हमारे शब्दों से ही हमारा व्यक्तित्व, आचरण और व्यवहार जुड़े हुए हैं। शब्दों को चालाकियों से मुक्त करने की आवश्यकता है। हम सब इन शब्दों के आधार पर ही कमाते है, और जीवन में सफलता मिलेगी या नहीं यह सब हमारे शब्द, व्यवहार और कार्य करने की शैली पर निर्भर करता है। एक खुशमिजाज और सादगीपूर्ण जीवन बिताने के लिए हमें अपने बोलने और सोचने के तरीकों में सुधार करने की आवश्यकता होगी। ये बोल ही है जो हमें आसमान की ऊंचाइयों तक भी पहुंचा सकते हैं और जमीन पर औंधे मुंह भी गिरा सकते हैं। अपने जीवन में हर व्यक्ति अच्छा प्रयास करता है लेकिन सही दिशा में किया गया प्रयास हमेशा अच्छा परिणाम देता है। सही दिशा का चिंतन करने के लिए अच्छी समझ और कुशल होना बहुत जरूरी है। एक अच्छी समझ अच्छे शब्दों के निरंतर प्रयोग और व्यवहार की कुशलता से ही विकसित की जा सकती हैं। सफल होने के लिए प्रेरित करने वाले लोगों के साथ ज्यादा से ज्यादा जुड़े और उनकी बातों को, शब्दों को अपने जीवन में प्रयोग करने का प्रयास करें। कई बार हम अपने शब्दों में बदलाव करना चाहते हैं परन्तु नई आदतों को विकसित करने में असफल हो जाते हैं। शब्दों का इस्तेमाल बड़े ही सावधानी से करने की आवश्यकता है। इसीलिए कहा गया है कि सोच समझ कर बोलना ही हितकारी है। हमें अपने आंकलन में इन चीजों को प्राथमिकता देनी होगी। तभी हम अपने आप को बेहतर ढंग से विकसित कर सकते हैं। हम हमेशा नकारात्मक शब्दों को ज्यादा महत्व देते हैं। ये काम मुझसे नहीं होगा, मेरी तो इतनी बुद्धि ही नहीं है, मैं तो बहुत परेशान हूं, मेरे पास रुपए रुकते ही नहीं है इत्यादि। इन शब्दों को हम बड़े ही कुशलता से प्रयोग करते हैं बिना इनके नुकसान को समझे। जिस प्रकार मंत्रों का उच्चारण निरंतर करते रहने से ही मिलता है ठीक वैसे ही जब हम अपने जीवन में अच्छे और बुरे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं तो इनका सीधा असर हमारे व्यक्तित्व पर पड़ता है। अगर हम किसी से अपशब्द कहे तो क्या वो हमें एक भद्र पुरुष समझेगा? नहीं। किसी को अपशब्द बोल कर हम अपनी असभ्यता और अशिक्षित होने का प्रमाण देते हैं। क्या इस विषय में चिंतन करने की आवश्यकता नहीं है? क्या हमें अपने बारे में सोचने और समझने की जरूरत नहीं है। मैं समझता हूं कि इसकी बहुत अधिक आवश्यकता है। आपसी बातचीत में सदैव अच्छे शब्दों का चयन हमारे व्यक्तित्व और स्वभाव को बेहतर बनाने के लिए बहुत आवश्यक है। अच्छी आदतें को विकसित करना थोड़ा मुश्किल होता है लेकिन परिणामस्वरूप हमें जो पहचान मिलती है वो बेमिसाल होती हैं। बुरी आदतों को अपनाने की आवश्यकता नहीं पड़ती वो तो अच्छी आदतों के अभाव में स्वयं ही हमारे साथ आ जाती हैं। जिस तरह एक-एक ईंट से महल बन जाता है उसी तरह हमारे द्वारा बोले गए एक-एक शब्द से हमारे जीवन में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। जैसे सोने की अशुद्धता को हटाने के लिए उसे एक निश्चित डिग्री तक तपाया जाता है। वैसे ही हमें भी अपने शब्दों, अपने व्यवहार और अपने आचरण की पवित्रता बनाए रखने की आवश्यकता है। इन विशेषताओं को अपनाने में मेहनत तो करनी होगी क्योंकि बड़ा बदलाव लाने में समय और मेहनत दोनों की आवश्यकता होती है। शब्दों का संबंध प्रगाढ़ प्रेम से है, साथ ही शब्दों की तुलना तीर से भी की गई है। शब्दों को बदलने का मौका नहीं मिलता जीवन में इस बात को समझना बहुत जरूरी है। हमें खुद को प्रेरित करना होगा, स्वयं को ट्रेनिंग देने की आवश्यकता है। सब कुछ संभव है बस बिना घबराएं, बिना रूके कोशिश करनी होगी। कोशिश करना ही हमारे हाथ में है। आमतौर पर हम छोटी सफलता हासिल होने पर संतुष्ट हो जाते हैं और फिर अपने आप को स्थाई रूप दे देते हैं। ये संतुलन बनाना होगा, हमें संतोष रखते हुए भी आगे बढ़ने का लगातार प्रयास करना होगा। पूर्णता हासिल करना हमारा लक्ष्य नहीं होना चाहिए क्योंकि पूर्णता की लालसा में हम छोटे बदलावों से भी हाथ धो बैठते हैं। शब्दों का इतना प्रगाढ़ महत्व है हमारे जीवन में कि कुछ ग़लत शब्दों के प्रयोग से हमारा प्रगाढ़ मित्र भी तुरंत दुश्मन बन सकता है। दोबारा मित्र बनाने में समय लगता है। परिस्थितियां चाहें कितनी भी अच्छी या बुरी क्यों न हो कोशिश यही करनी चाहिए कि शब्दों का संतुलन बना कर रखा जाए। या फिर मौन रहकर भी अद्भुत परिणाम हासिल किए जा सकते। सफल होने के लिए शब्दों की सटीकता के साथ-साथ खुद को अच्छे विचारों और भावनाओं से भरपूर करते रहना होगा। दुनिया की परवाह किए बगैर स्वयं को बेहतर ढंग से विकसित करने का प्रयास करते रहना होगा। सीखने के लिए कभी भी आलस्य न करें। क्योंकि हमेशा सीखते रहने से हमारे व्यक्तित्व और जीवन में निखार आता रहता है। अच्छी आदतों और बातों को जितना जल्दी हो सके उतना सीख लेना आवश्यक है। अपने व्यवहार में परिवर्तन करके हम वो सब हासिल कर सकते है जिनकी सामान्य व्यक्ति कल्पना करता है। अपनी क्षमताओं को बेहतर बनाना ही हम सब का प्रयास होना चाहिए। सब एक दूसरे को पीछे धकेलने में लगे हुए हैं। अगर हम दूसरों की सफलताओं पर खुश होना सीख गए तो हमारे सफल होने की आधे से ज्यादा प्रतिशत संभावना बढ़ जाती है। अपनी शब्दावली का नियमित आंकलन एक बेहतर परिणाम दे सकता हैं। हमारे शब्द ही है जिनको लोग वर्षों तक याद रखते हैं। हालांकि, हमारी कोशिश यही होती है कि बेहतर ढंग से खुद को प्रस्तुत करें, अच्छा व्यवहार करें। लेकिन पूरी जानकारी के अभाव में और शब्दों को चालाकियों से प्रयोग करने के कारण हम व्यवहार कुशलता में पिछड़ते जा रहें हैं। पछतावा करने से बेहतर होगा कुछ रचनात्मक कार्य किए जाएं। शब्दों का बेहतर प्रयोग पर ही हमारी सफलता और खुशियां निर्भर करती है। *******

  • किसके साथ

    गोपेंद्र कुमार सिन्हा गौतम सोनेलाल शाह द्वारा ग्रामीणों को पूरे सावन देवधर जाने के लिए मुफ्त में बस उपलब्ध करवाने पर भगेडन पांडे ने बधाई देते हुए कहा शाह जी आप बड़े नेकदिल इंसान हैं जरा गांव की नाली साफ करवा देते तो ग्रामवासियों को नाली से उठ रही बदबू और उससे बीमारी फैलने के डर से मुक्ति मिलती। आप तो जानते ही हैं पिछले वर्ष बीमारी फैलने से ग्रामवासियों में किस तरह दहशत व्याप्त हो गई थी। वह तो शुक्र मनाइए डॉ. आर एस यादव का जिन्होंने अपनी जान पर खेलकर ग्रामवासियों की जान बचाई थी। फिर भी मंगल राजवंशी की जोरू का निधन हो गया था। जिसपर सोनेलाल शाह ने कहा 'गांव की सारी समस्याओं का जिम्मा क्या मेरे ऊपर है यह काम मेरा नहीं सरकार है, जाकर उनसे फरियाद कीजिए।' भगेड़न पांडे निराश हताश डॉ. आर एस यादव के पास पहुंचे और उनसे आग्रह किया कि इस वर्ष भी गांव में महामारी न फैल जाए इसके लिए गांव की नालियों में दवा का छिड़काव करवा दिया जाए। डॉक्टर ने उनकी बात सुनते ही अपने कंपाउंडर को निर्देश दिया कि कल हर हाल में गांव के प्रत्येक नालियों में दवा का छिड़काव सुनिश्चित किया जाए'। लेकिन डॉ यादव ने उन्हें सचेत करते हुए कहा दवा का छिड़काव तो हो जाएगा लेकिन यह अस्थाई व्यवस्था है, स्थाई निराकरण के लिए हर हाल में नाली की नियमित सफाई करवानी होगी। डॉक्टर से आश्वासन मिलने के बाद भगेड़न पांडे गांव में लौटे और सीधे गांव के 'फूले टोला' में जाकर लोगों से कहा, जहां के लोग ही पिछले साल ज्यादा प्रभावित हुए थे, 'अगर इस वर्ष भी गांव की नाली साफ नहीं हुई तो फिर से 'महामारी' फैल सकती है।' 'पुरुषोत्तम राज' जो उस टोले का सबसे पढ़ा लिखा नौजवान था उसने भगड़ेन पांडे की बात सुनते ही उन्हें आश्वस्त किया कि हम आपके साथ हैं। हमें हर हाल में गांव की नाली की सफाई करनी होगी। आप इसके लिए कल एक आम सभा बी पी मंडल लाइब्रेरी में बुलाईये। हम लोग वहीं विचार करेंगे, किस तरह से इस समस्या का समाधान होगा। उसी दिन संध्या को समूचे गांव में डुगडुगी पीटवा दी गई कि गांव में नाली सफाई के मुद्दे पर आगामी रविवार को 'बी पी मंडल लाइब्रेरी' में दोपहर 1:00 बजे से एक आम सभा आयोजित की गई है। सभा में शहर के मशहूर डॉक्टर 'आर एस यादव' भी पधार रहे हैं जिन्होंने पिछले वर्ष गांव के कई लोगों की जान बचाई थी। रविवार को सुबह से ही लाइब्रेरी के आसपास लोग इकट्ठा होने लगे और लाइब्रेरी परिसर की साफ-सफाई भी कर दी गई। क्योंकि बरसात के शुरुआत में हुई बारिश से लाइब्रेरी परिसर के कुछ हिस्से में घास फूंस उग आए थे। 12:00 बजे तक पूरी लाइब्रेरी ग्राम वासियों से अंट चुकी थी। निर्धारित समय से कुछ पहले ही डॉ यादव भी पहुंच गए। ग्रामवासियों ने उनका जोरदार स्वागत किया। जिसका नेतृत्व छेदी महतो, पुकार राम, वीरेंद्र भगत, सियामनी राजभर, कुलवंती पटेल, सोनी चौधरी, विमलेश्वरी यादव आदि ग्रामवासियों ने किया। जबकि सभा के लिए व्यवस्था भगेड़न पांडे, मनोहर कुमार, पुरूषोत्तम राज, जिया कुजूर एवं मोना यादव संभाल रहे थे। "डाक्टर यादव' ने सर्वप्रथम मंगल राजवंशी से मिलकर हाल-चाल जाना जिसकी जोरू पिछले वर्ष महामारी से काल कवलित हो गई थी। उधर बैठक की कार्रवाई शुरू हो गई। जिसकी अध्यक्षता गांव के सबसे वयोवृद्ध देव नारायण यादव को सौंपी गई। जो एक अवकाश प्राप्त कृषि परामर्शी एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं। साथ ही ग्रामवासियों के सुख-दुख में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते रहते हैं। एक-एक कर ग्रामवासियों ने अपने-अपने विचार व्यक्त किये। 'भगेड़न पांडे' ने सोनेलाल शाह और डाक्टर यादव' से हुई बात भी ग्रामवासियों के बीच रखी और उनसे कहा कि अब आप ही लोग अपना निर्णय दिजिए हमें किसके द्वारा तय किए गए रास्ते पर चलने की जरूरत है? ग्रामवासियों ने समवेत स्वर में कहा हमें 'डॉ यादव' द्वारा बताए गए रास्ते पर चलना चाहिए। जब हम बचेंगे तब तो कहीं की यात्रा करेंगे। हम सभी ग्रामीण कल सुबह से ही अपने-अपने घर के सामने नाली की सफाई करेंगे और उसे निकले कचरे को सड़क के किनारे गड्ढे में दबा देंगे जिसका उपयोग बाद में खेती के कार्यों में किया जाएगा। डॉ यादव ने अपने हाथ में माइक थामते हुए ग्रामवासियों को धन्यवाद दिया और उन्हें साफ सफाई के महत्व के बारे में समझाया। डॉक्टर यादव ने 'भगेड़न पांडे' के प्रयास को सराहा और ग्रामवासियों से कहा– ‘अगर गांव में एक भी जागरूक नागरिक होगा तो उस गांव का कोई इंसान क्या प्रकृति भी बाल बांका नहीं कर सकती।’ सभी लोगों ने एक सुर में जयकारा लगाते हुए कहा सबसे पहले 'साफ-सफाई' ताकि किसी को खरीदना नहीं पड़े 'दवाई'। जिएंगे तो 'यात्रा' गंदगी रही तो 'खतरा'। **********

  • मैं लिखती हूं…

    मीनाक्षी पाठक मन कही कह नही पाती तब कविताएं लिखती हूं दर्द दिल का जब सह नहीं पाती तब कविताएं लिखती हूं भीड़ मैं हूं खुद को जब तन्हा पाती तब कविताएं लिखती हूं खुशी और गम में जब तुमको नही पाती तब कविताएं लिखती हूं अंधेरी रातों में जब देख नही पाती तब कविताएं लिखती हूं जब सांसों की आवाज महसूस कर नही पाती तब कविताएं लिखती हूं जिंदगी का मर्म जब समझ नहीं पाती तब कविताएं लिखती हूं अपने ही शब्दो में जब खुद को ढूंढ नही पाती तब कविताएं लिखती हूं तुम्हे जब इन कविताओं में सुन नही पाती तब कविताएं लिखती हूं.... ******

bottom of page