Search Results
921 results found with an empty search
- बिछुड़न
सोनी शुक्ला मिलना और बिछुड़ना दोनों जीवन की मजबूरी है। उतने ही हम पास रहेंगे, जितनी हममें दूरी है।। शाखों से फूलों की बिछुड़न फूलों से पंखुड़ियों की। आँखों से आँसू की बिछुड़न होंठों से बाँसुरियों की।। तट से नव लहरों की बिछुड़न पनघट से गागरियों की। सागर से बादल की बिछुड़न बादल से बीजुरियों की।। जंगल जंगल भटकेगा ही जिस मृग पर कस्तूरी है। उतने ही हम पास रहेंगे, जितनी हममें दूरी है।। सुबह हुए तो मिले रात-दिन माना रोज बिछुड़ते हैं। धरती पर आते हैं पंछी चाहे ऊँचा उड़ते हैं।। सीधे सादे रस्ते भी तो कहीं कहीं पर मुड़ते हैं। अगर हृदय में प्यार रहे तो टूट टूटकर जुड़ते हैं।। हमने देखा है बिछुड़ों को मिलना बहुत जरूरी है। उतने ही हम पास रहेंगे, जितनी हममें दूरी है।। *****
- बन्दर और लकड़ी का खूंटा
पंचतंत्र की कहानी एक समय शहर से कुछ ही दूरी पर एक मंदिर का निर्माण किया जा रहा था। मंदिर में लकड़ी का काम बहुत था इसलिए लकड़ी चीरने वाले बहुत से मज़दूर काम पर लगे हुए थे। यहां-वहां लकड़ी के लठ्टे पडे हुए थे और लठ्टे व शहतीर चीरने का काम चल रहा था। सारे मज़दूरों को दोपहर का भोजन करने के लिए शहर जाना पड़ता था, इसलिए दोपहर के समय एक घंटे तक वहां कोई नहीं होता था। एक दिन खाने का समय हुआ तो सारे मज़दूर काम छोड़कर चल दिए। एक लठ्टा आधा चिरा रह गया था। आधे चिरे लठ्टे में मज़दूर लकड़ी का कीला फंसाकर चले गए। ऐसा करने से दोबारा आरी घुसाने में आसानी रहती है। तभी वहां बंदरों का एक दल उछलता-कूदता आया। उनमें एक शरारती बंदर भी था, जो बिना मतलब चीजों से छेड़छाड़ करता रहता था। पंगे लेना उसकी आदत थी। बंदरों के सरदार ने सबको वहां पड़ी चीजों से छेड़छाड़ न करने का आदेश दिया। सारे बंदर पेड़ों की ओर चल दिए, पर वह शैतान बंदर सबकी नजर बचाकर पीछे रह गया और लगा अड़ंगेबाजी करने। उसकी नजर अधचिरे लठ्टे पर पड़ी। बस, वह उसी पर पिल पड़ा और बीच में अड़ाए गए कीले को देखने लगा। फिर उसने पास पड़ी आरी को देखा। उसे उठाकर लकड़ी पर रगड़ने लगा। उससे किर्रर्र-किर्रर्र की आवाज़ निकलने लगी तो उसने गुस्से से आरी पटक दी। उन बंदरो की भाषा में किर्रर्र-किर्रर्र का अर्थ ‘निखट्टू’ था। वह दोबारा लठ्टे के बीच फंसे कीले को देखने लगा। उसके दिमाग में कौतुहल होने लगा कि इस कीले को लठ्टे के बीच में से निकाल दिया जाए तो क्या होगा? अब वह कीले को पकड़कर उसे बाहर निकालने के लिए ज़ोर आजमाईश करने लगा। लठ्टे के बीच फंसाया गया कीला तो दो पाटों के बीच बहुत मज़बूती से जकड़ा गया होता हैं, क्योंकि लठ्टे के दो पाट बहुत मज़बूत स्प्रिंग वाले क्लिप की तरह उसे दबाए रहते हैं। बंदर अपनी शक्ति पर खुश हो गया। वह और ज़ोर से खौं-खौं करता कीला सरकाने लगा। इस धींगामुश्ती के बीच बंदर की पूंछ दो पाटों के बीच आ गई थी, जिसका उसे पता ही नहीं लगा। उसने उत्साहित होकर एक जोरदार झटका मारा और जैसे ही कीला बाहर खिंचा, लठ्टे के दो चिरे भाग फटाक से क्लिप की तरह जुड़ गए और बीच में फंस गई बंदर की पूंछ। बंदर चिल्ला उठा। तभी मज़दूर वहां लौटे। उन्हें देखते ही बंदर ने भागने के लिए ज़ोर लगाया तो उसकी पूंछ टूट गई। वह चीखता हुआ टूटी पूंछ लेकर भागा। कहानी सुनाकर कर टक बोला, “इसीलिए कहता हूँ कि जिस काम से कोई अर्थ न सिद्ध होता हो, उसे नहीं करना चाहिए। व्यर्थ का काम करने से जान भी जा सकती है। ******
- सियार और ढोल
पंचतंत्र की कहानी एक बार एक जंगल के निकट दो राजाओं के बीच घोर युद्ध हुआ। एक जीता दूसरा हारा। सेनाएं अपने नगरों को लौट गईं। बस, सेना का एक ढोल पीछे रह गया। उस ढोल को बजा-बजाकर सेना के साथ गए भाट व चारण रात को वीरता की कहानियां सुनाते थे। युद्ध के बाद एक दिन आंधी आई। आंधी के जोर में वह ढोल लुढ़कता-पुढ़कता एक सूखे पेड़ के पास जाकर टिक गया। उस पेड़ की सूखी टहनियां ढोल से इस तरह से सट गई थीं कि तेज हवा चलते ही ढोल पर टकरा जाती थीं और ढमाढम-ढमाढम की गुंजायमान आवाज होती। एक सियार उस क्षेत्र में घूमता था। उसने ढोल की आवाज सुनी। वह बड़ा भयभीत हुआ। ऐसी अजीब आवाज बोलते पहले उसने किसी जानवर को नहीं सुना था। वह सोचने लगा कि यह कैसा जानवर है, जो ऐसी जोरदार बोली बोलता है 'ढमाढम'। सियार छिपकर ढोल को देखता रहता, यह जानने के लिए कि यह जीव उड़ने वाला है या चार टांगों पर दौड़ने वाला। एक दिन सियार झाड़ी के पीछे छुपकर ढोल पर नजर रखे था। तभी पेड़ से नीचे उतरती हुई एक गिलहरी कूदकर ढोल पर उतरी। हलकी-सी ढम की आवाज भी हुई। गिलहरी ढोल पर बैठी दाना कुतरती रही। सियार बड़बड़ाया, 'ओह! तो यह कोई हिंसक जीव नहीं है। मुझे भी डरना नहीं चाहिए।' सियार फूंक-फूंककर कदम रखता ढोल के निकट गया। उसे सूंघा। ढोल का उसे न कहीं सिर नजर आया और न पैर। तभी हवा के झोंके से टहनियां ढोल से टकराईं। ढम की आवाज हुई और सियार उछलकर पीछे जा गिरा। 'अब समझ आया', सियार उठने की कोशिश करता हुआ बोला, 'यह तो बाहर का खोल है। जीव इस खोल के अंदर है। आवाज बता रही है कि जो कोई जीव इस खोल के भीतर रहता है, वह मोटा-ताजा होना चाहिए। चर्बी से भरा शरीर। तभी ये ढम-ढम की जोरदार बोली बोलता है।' अपनी मांद में घुसते ही सियार बोला, 'ओ सियारी! दावत खाने के लिए तैयार हो जा। एक मोटे-ताजे शिकार का पता लगाकर आया हूं।' सियारी पूछने लगी, 'तुम उसे मारकर क्यों नहीं लाए?' सियार ने उसे झिड़की दी, 'क्योंकि मैं तेरी तरह मूर्ख नहीं हूं। वह एक खोल के भीतर छिपा बैठा है। खोल ऐसा है कि उसमें दो तरफ सूखी चमड़ी के दरवाजे हैं। मैं एक तरफ से हाथ डाल उसे पकड़ने की कोशिश करता तो वह दूसरे दरवाजे से न भाग जाता?' चांद निकलने पर दोनों ढोल की ओर गए। जब वे निकट पहुंच ही रहे थे कि फिर हवा से टहनियां ढोल पर टकराईं और ढम-ढम की आवाज निकली। सियार सियारी के कान में बोला, 'सुनी उसकी आवाज? जरा सोच जिसकी आवाज ऐसी गहरी है, वह खुद कितना मोटा ताजा होगा।' दोनों ढोल को सीधा कर उसके दोनों ओर बैठे और लगे दांतों से ढोल के दोनों चमड़ी वाले भाग के किनारे फाड़ने। जैसे ही चमड़ियां कटने लगी, सियार बोला, 'होशियार रहना। एक साथ हाथ अंदर डाल शिकार को दबोचना है।' दोनों ने 'हूं' की आवाज के साथ हाथ ढोल के भीतर डाले और अंदर टटोलने लगे। अंदर कुछ नहीं था। एक-दूसरे के हाथ ही पकड़ में आए। दोनों चिल्लाए, 'हैं ! यहां तो कुछ नहीं है।' और वे माथा पीटकर रह गए। सीख : बड़ी-बड़ी शेखी मारने वाले लोग भी ढोल की तरह ही अंदर से खोखले होते हैं। ******
- पिता की दौलत
श्रद्धा पटेल जीवन की सीख देने वाली कहानी गांव में अकेले रहते बूढ़े पिता की मृत्यु हुई, तो विभिन्न शहरों में बसे दोनों भाई पिता के अंतिम संस्कार के लिए गांव पहुंचे। सब कार्य सम्पन्न हुए। कुछ लोग चले गए थे और कुछ अभी बैठे थे कि बड़े भाई की पत्नी बाहर आई और उसने अपने पति के कान में कुछ कहा। बड़े भाई ने अपने छोटे भाई को भीतर आने का इशारा किया और खड़े होकर वहां बैठे लोगों से हाथ जोड़ कर कहा, ”अभी पांच मिनट में आते है।” दोनों की स्त्रियां ससुरजी के कमरे में थी। भीतर आते ही बड़े भाई ने उनसे फुसफुसाकर कर पूछा, “बक्सा छुपा दिया था ना।” “हां, बक्सा हमारे पास है। चलिए जल्दी से देख लेते हैं नहीं तो कोई आसपास का हक़ जताने आ जाएगा और कहेगा कि तुम्हारे पीछे हमने तुम्हारे बाबूजी पर इतना ख़र्च किया वगैरह वगैरह। क्यों देवरजी…” बड़े की पत्नी ने हंसते हुए कहा। “हां सही कहा भाभी।” कहकर छोटे ने भी सहमति जताई। बड़ी बहू ने जल्दी से दरवाज़ा बंद किया और छोटी ने तेज़ी से बाबूजी की चारपाई के नीचे से एक बहुत पुराना बक्सा निकाला। दोनों भाई तुरंत तेज़ी से नीचे झुके और बक्से को खोलने लगे। “अरे, पहले चाबी तो पकड़ो, ऐसे थोड़े ना खुलेगा। मैंने आते ही ताला लगाकर चाबी छुपा ली थी।” बड़ी बहू ने अपने पल्लू के एक छोर पर बंधी हुई चाबी निकाली और अपने पति को पकड़ा दी। बक्सा खुलते ही वहां मौजूद चारों बक्से पर झुक गए। उन्हें विश्वास था कि इसमें मां के गहने, अन्य बहुमूल्य वस्तुएं होंगी। परंतु बक्से में तो बड़े और छोटे की पुरानी तस्वीरें, छोटे-छोटे कुछ बर्तन, उन्हीं दोनों के छोटे-छोटे कपड़े सहेजकर रखे हुए थे। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई ये सब भी भला सहेजकर रखता है। चारों के चेहरे निराशा से भर गए। तभी छोटे भाई की नज़र बक्से के कोने में कपड़ों के बीच रखी एक कपड़े की थैली पर गई। उसने तुरंत आगे बढ़कर उस थैली को बाहर निकाला। ये देखकर सबकी नज़रों में अचानक चमक आ गई। सभी ने लालची नज़रों से उस थैली को टटोला। छोटे भाई ने उस थैली को वहीं ज़मीन पर पलट दिया। उसमें कुछ रुपए थे और साथ में एक काग़ज़ जिस पर कुछ लिखा हुआ था। छोटे भाई ने रुपए गिने, तो लगभग बीस हज़ार रुपए थे। "बस… और… कुछ नहीं है।" “अरे, इस काग़ज़ को पढ़ो, ज़रुर किसी बैंक अकाउंट या लॉकर का विवरण होगा।” बड़ी बहू ने कहा, तो बड़े बेटे ने तुरंत छोटे के हाथों से उस काग़ज़ को छीनकर पढ़ा। उस पर लिखा हुआ था- 'क्या ढूंढ़ रहे हो?।। संपत्ति…? हां… ये ही है मेरी और तुम्हारी मां की संपत्ति। तुम दोनों के बचपन की वो यादें, जिसमें तुम शामिल थे। वो ख़ुशबू, वो प्यार, वो अनमोल पल, आज भी इन कपड़ों में, इन तस्वीरों में इन छोटे-छोटे बर्तनों में मौजूद हैं। यही है हमारी अनमोल दौलत… तुम तो हमें यहां अकेले छोड़ कर चले गए थे अपना भविष्य संवारने। मगर हम यहां तुम्हारी यादों के सहारे ही जिए… तुम्हारी मां तुम्हें देखने को तरस गई और शायद मैं भी… अब तक तुमसे कोई पैसा नहीं लिया। अपनी पेंशन से ही सारा घर चलाया, पर तुम लोगों को हमेशा ‘इस बक्से में अनमोल दौलत है’ जान-बूझकर सुनाता रहा। मगर बच्चों ध्यान देना अपने बच्चों को कभी अपने से दूर मत करना, वरना जैसे तुमने अपने भविष्य का हवाला देकर हमें अपने से दूर किया वैसे ही… दुनिया का सबसे बड़ा दुख जानते हो क्या होता है?… अपनों के होते हुए भी किसी अपने का पास नहीं होना। जीवन में उस समय कोई दौलत-गहने, संपति काम नहीं आते। बच्चों मरने के बाद भी मैं तुम पर बोझ नहीं बनना चाहता, इसलिए ये पैसे मेरे अंतिम संस्कार का ख़र्च है।' पूरा काग़ज़ पढ़ते ही बड़े बेटे के साथ-साथ छोटा बेटा भी फूट-फूटकर रो पड़ा!।। ******
- कफ़न
प्रेमचंद जीवन मूल्य पर आधारित कहानी झोंपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए थे और अंदर बेटे की जवान बीवी बुधिया प्रसव-वेदना में पछाड़ खा रही थी। रह-रहकर उसके मुँह से ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज़ निकलती थी, कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। जाड़ों की रात थी, प्रकृति सन्नाटे में डूबी हुई, सारा गाँव अंधकार में लय हो गया था। घीसू ने कहा - “मालूम होता है, बचेगी नहीं। सारा दिन दौड़ते हो गया, जा देख तो आ।” माधव चिढ़कर बोला - ”मरना ही है तो जल्दी मर क्यों नहीं जाती? देखकर क्या करूँ?” “तू बड़ा बेदर्द है बे! साल-भर जिसके साथ सुख-चैन से रहा, उसी के साथ इतनी बेवफ़ाई!” “तो मुझसे तो उसका तड़पना और हाथ-पाँव पटकना नहीं देखा जाता।” चमारों का कुनबा था और सारे गाँव में बदनाम। घीसू एक दिन काम करता तो तीन दिन आराम करता। माधव इतना कामचोर था कि आध घंटे काम करता तो घंटे भर चिलम पीता। इसलिए उन्हें कहीं मज़दूरी नहीं मिलती थी। घर में मुठ्ठी-भर भी अनाज मौजूद हो, तो उनके लिए काम करने की क़सम थी। जब दो-चार फ़ाक़े हो जाते तो घीसू पेड़ पर चढ़कर लकड़ियाँ तोड़ लाता और माधव बाज़ार से बेच लाता और जब तक वह पैसे रहते, दोनों इधर-उधर मारे-मारे फिरते। गाँव में काम की कमी न थी। किसानों का गाँव था, मेहनती आदमी के लिए पचास काम थे। मगर इन दोनों को उसी वक़्त बुलाते, जब दो आदमियों से एक का काम पाकर भी संतोष कर लेने के सिवा और कोई चारा न होता। अगर दोनो साधु होते, तो उन्हें संतोष और धैर्य के लिए, संयम और नियम की बिलकुल ज़रूरत न होती। यह तो इनकी प्रकृति थी। विचित्र जीवन था इनका! घर में मिट्टी के दो-चार बर्तन के सिवा कोई संपत्ति नहीं। फटे चीथड़ों से अपनी नग्नता को ढाँके हुए जिए जाते थे। संसार की चिंताओं से मुक्त! क़र्ज़ से लदे हुए। गालियाँ भी खाते, मार भी खाते, मगर कोई ग़म नहीं। दीन इतने कि वसूली की बिलकुल आशा न रहने पर भी लोग इन्हें कुछ-न-कुछ क़र्ज़ दे देते थे। मटर, आलू की फ़सल में दूसरों के खेतों से मटर या आलू उखाड़ लाते और भून-भानकर खा लेते या दस-पाँच ऊख उखाड़ लाते और रात को चूसते। घीसू ने इसी आकाश-वृत्ति से साठ साल की उम्र काट दी और माधव भी सपूत बेटे की तरह बाप ही के पद-चिह्नों पर चल रहा था, बल्कि उसका नाम और भी उजागर कर रहा था। इस वक़्त भी दोनों अलाव के सामने बैठकर आलू भून रहे थे, जो कि किसी खेत से खोद लाए थे। घीसू की स्त्री का तो बहुत दिन हुए, देहांत हो गया था। माधव का ब्याह पिछले साल हुआ था। जब से यह औरत आई थी, उसने इस ख़ानदान में व्यवस्था की नींव डाली थी और इन दोनों बे-ग़ैरतों का दोज़ख़ भरती रहती थी। जब से वह आई, यह दोनों और भी आलसी और आरामतलब हो गए थे। बल्कि कुछ अकड़ने भी लगे थे। कोई कार्य करने को बुलाता, तो निर्ब्याज भाव से दुगुनी मज़दूरी माँगते। वही औरत आज प्रसव-वेदना से मर रही थी और यह दोनों इसी इंतज़ार में थे कि वह मर जाए, तो आराम से सोएँ। घीसू ने आलू निकालकर छीलते हुए कहा—“जाकर देख तो, क्या दशा है उसकी? चुड़ैल का फिसाद होगा, और क्या? यहाँ तो ओझा भी एक रुपया माँगता है!” माधव को भय था, कि वह कोठरी में गया, तो घीसू आलुओं का बड़ा भाग साफ़ कर देगा। बोला- “मुझे वहाँ जाते डर लगता है।” “डर किस बात का है, मैं तो यहाँ हूँ ही।” “तो तुम्हीं जाकर देखो न?” “मेरी औरत जब मरी थी, तो मैं तीन दिन तक उसके पास से हिला तक नहीं था! और फिर मुझसे लजाएगी कि नहीं? जिसका कभी मुँह नहीं देखा, आज उसका उघड़ा हुआ बदन देखूँ! उसे तन की सुध भी तो न होगी? मुझे देख लेगी तो खुलकर हाथ-पाँव भी न पटक सकेगी!” “मैं सोचता हूँ कोई बाल-बच्चा हो गया तो क्या होगा? सोंठ, गुड़, तेल, कुछ भी तो नहीं है घर में!” “सब कुछ आ जाएगा। भगवान दें तो! जो लोग अभी एक पैसा नहीं दे रहे हैं, वे ही कल बुलाकर रुपए देंगे। मेरे नौ लड़के हुए, घर में कभी कुछ न था, मगर भगवान ने किसी-न-किसी तरह बेड़ा पार ही लगाया।” जिस समाज में रात-दिन मेहनत करने वालों की हालत उनकी हालत से कुछ बहुत अच्छी न थी, और किसानों के मुक़ाबले में वे लोग, जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठाना जानते थे, कहीं ज़्यादा संपन्न थे, वहाँ इस तरह की मनोवृत्ति का पैदा हो जाना कोई अचरज की बात न थी। हम तो कहेंगे, घीसू किसानों से कहीं ज़्यादा विचारवान था और किसानों के विचार-शून्य समूह में शामिल होने के बदले बैठकबाज़ों की कुत्सित मंडली में जा मिला था। हाँ, उसमें यह शक्ति न थी, कि बैठकबाज़ों के नियम और नीति का पालन करता। इसलिए जहाँ उसकी मंडली के और लोग गाँव के सरगना और मुखिया बने हुए थे, उस पर सारा गाँव उँगली उठाता था। फिर भी उसे यह तसकीन तो थी ही कि अगर वह फटेहाल है तो कम-से-कम उसे किसानों की-सी जी-तोड़ मेहनत तो नहीं करनी पड़ती, और उसकी सरलता और निरीहता से दूसरे लोग बेजा फ़ायदा तो नहीं उठाते! दोनों आलू निकाल-निकालकर जलते-जलते खाने लगे। कल से कुछ नहीं खाया था। इतना सब्र न था कि ठंडा हो जाने दें। कई बार दोनों की ज़बानें जल गईं। छिल जाने पर आलू का बाहरी हिस्सा ज़बान, हलक और तालू को जला देता था और उस अंगारे को मुँह में रखने से ज़्यादा ख़ैरियत इसी में थी कि वह अंदर पहुँच जाए। वहाँ उसे ठंडा करने के लिए काफ़ी सामान थे। इसलिए दोनों जल्द-जल्द निगल जाते। हालाँकि इस कोशिश में उनकी आँखों से आँसू निकल आते। घीसू को उस वक़्त ठाकुर की बरात याद आई, जिसमें बीस साल पहले वह गया था। उस दावत में उसे जो तृप्ति मिली थी, वह उसके जीवन में एक याद रखने लायक़ बात थी, और आज भी उसकी याद ताज़ा थी, बोला—“वह भोज नहीं भूलता। तब से फिर उस तरह का खाना और भरपेट नहीं मिला। लड़की वालों ने सबको भर पेट पूरियाँ खिलाई थीं, सबको! छोटे-बड़े सबने पूरियाँ खाईं और असली घी की! चटनी, रायता, तीन तरह के सूखे साग, एक रसेदार तरकारी, दही, चटनी, मिठाई, अब क्या बताऊँ कि उस भोज में क्या स्वाद मिला। कोई रोक-टोक नहीं थी, जो चीज़ चाहो, माँगो, जितना चाहो खाओ। लोगों ने ऐसा खाया, ऐसा खाया, कि किसी से पानी न पिया गया। मगर परोसने वाले हैं कि पत्तल में गर्म-गर्म, गोल-गोल सुवासित कचौरियाँ डाल देते हैं। मना करते हैं कि नहीं चाहिए, पत्तल पर हाथ रोके हुए हैं, मगर वह हैं कि दिए जाते हैं। और जब सबने मुँह धो लिया, तो पान-इलायची भी मिली। मगर मुझे पान लेने की कहाँ सुध थी? खड़ा हुआ न जाता था। चटपट जाकर अपने कंबल पर लेट गया। ऐसा दिल-दरियाव था वह ठाकुर!” माधव ने इन पदार्थों का मन-ही-मन मज़ा लेते हुए कहा—“अब हमें कोई ऐसा भोज नहीं खिलाता।” “अब कोई क्या खिलाएगा? वह ज़माना दूसरा था। अब तो सबको किफ़ायत सूझती है। शादी-ब्याह में मत ख़र्च करो, क्रिया-कर्म में मत ख़र्च करो। पूछो, ग़रीबों का माल बटोर-बटोरकर कहाँ रखोगे? बटोरने में तो कमी नहीं है। हाँ, ख़र्च में किफ़ायत सूझती है!” “तुमने एक बीस पूरियाँ खाई होंगी?” “बीस से ज़ियादा खाई थीं!” “मैं पचास खा जाता!” “पचास से कम मैंने न खाई होंगी। अच्छा पका था। तू तो मेरा आधा भी नहीं है।” आलू खाकर दोनों ने पानी पिया और वहीं अलाव के सामने अपनी धोतियाँ ओढ़कर पाँव पेट में डाले सो रहे। जैसे दो बड़े-बड़े अजगर गेंडुलियाँ मारे पड़े हों। और बुधिया अभी तक कराह रही थी। सवेरे माधव ने कोठरी में जाकर देखा, तो उसकी स्त्री ठंडी हो गई थी। उसके मुँह पर मक्खियाँ भिनक रही थीं। पथराई हुई आँखें ऊपर टँगी हुई थीं। सारी देह धूल से लथपथ हो रही थी। उसके पेट में बच्चा मर गया था। माधव भागा हुआ घीसू के पास आया। फिर दोनों ज़ोर-ज़ोर से हाय-हाय करने और छाती पीटने लगे। पड़ोस वालों ने यह रोना-धोना सुना, तो दौड़े हुए आए और पुरानी मर्यादा के अनुसार इन अभागों को समझाने लगे। मगर ज़्यादा रोने-पीटने का अवसर न था। कफ़न की और लकड़ी की फ़िक्र करनी थी। घर में तो पैसा इस तरह ग़ायब था, जैसे चील के घोंसले में माँस? बाप-बेटे रोते हुए गाँव के ज़मींदार के पास गए। वह इन दोनों की सूरत से नफ़रत करते थे। कई बार इन्हें अपने हाथों से पीट चुके थे। चोरी करने के लिए, वादे पर काम पर न आने के लिए। पूछा—“क्या है बे घिसुआ, रोता क्यों है? अब तो तू कहीं दिखलाई भी नहीं देता! मालूम होता है, इस गाँव में रहना नहीं चाहता।” घीसू ने ज़मीन पर सिर रखकर आँखों में आँसू भरे हुए कहा—“सरकार! बड़ी विपत्ति में हूँ। माधव की घरवाली रात को गुज़र गई। रात-भर तड़पती रही सरकार! हम दोनों उसके सिरहाने बैठे रहे। दवा-दारू जो कुछ हो सका, सब कुछ किया, मुदा वह हमें दग़ा दे गई। अब कोई एक रोटी देने वाला भी न रहा मालिक! तबाह हो गए। घर उजड़ गया। आपका ग़ुलाम हूँ, अब आपके सिवा कौन उसकी मिट्टी पार लगाएगा। हमारे हाथ में तो जो कुछ था, वह सब तो दवा-दारू में उठ गया। सरकार ही की दया होगी, तो उसकी मिट्टी उठेगी। आपके सिवा किसके द्वार पर जाऊँ।” ज़मींदार साहब दयालु थे। मगर घीसू पर दया करना काले कंबल पर रंग चढ़ाना था। जी में तो आया, कह दें, चल, दूर हो यहाँ से। यूँ तो बुलाने से भी नहीं आता, आज जब ग़रज़ पड़ी तो आकर ख़ुशामद कर रहा है। हरामख़ोर कहीं का, बदमाश! लेकिन यह क्रोध या दंड देने का अवसर न था। जी में कुढ़ते हुए दो रुपए निकालकर फेंक दिए। मगर सांत्वना का एक शब्द भी मुँह से न निकला। उसकी तरफ़ ताका तक नहीं। जैसे सिर का बोझ उतारा हो। जब ज़मींदार साहब ने दो रुपए दिए, तो गाँव के बनिए-महाजनों को इनकार का साहस कैसे होता? घीसू ज़मींदार के नाम का ढिंढोरा भी पीटना ख़ूब जानता था। किसी ने दो आने दिए, किसी ने चारे आने। एक घंटे में घीसू के पास पाँच रुपए की अच्छी रक़म जमा हो गई। कहीं से अनाज मिल गया, कहीं से लकड़ी। और दोपहर को घीसू और माधव बाज़ार से कफ़न लाने चले। इधर लोग बाँस-वाँस काटने लगे। गाँव की नर्म दिल स्त्रियाँ आ-आकर लाश देखती थीं और उसकी बेकसी पर दो बूँद आँसू गिराकर चली जाती थीं। बाज़ार में पहुँचकर घीसू बोला—“लकड़ी तो उसे जलाने-भर को मिल गई है, क्यों माधव!” माधव बोला—“हाँ, लकड़ी तो बहुत है, अब कफ़न चाहिए।” “तो चलो, कोई हलक़ा-सा कफ़न ले लें।” “हाँ, और क्या! लाश उठते-उठते रात हो जाएगी। रात को कफ़न कौन देखता है?” “कैसा बुरा रिवाज़ है कि जिसे जीते जी तन ढाँकने को चीथड़ा भी न मिले, उसे मरने पर नया कफ़न चाहिए।” “कफ़न लाश के साथ जल ही तो जाता है।” “और क्या रखा रहता है? यही पाँच रुपए पहले मिलते, तो कुछ दवा-दारू कर लेते।” दोनों एक-दूसरे के मन की बात ताड़ रहे थे। बाज़ार में इधर-उधर घूमते रहे। कभी इस बाज़ार की दूकान पर गए, कभी उसकी दूकान पर! तरह-तरह के कपड़े, रेशमी और सूती देखे, मगर कुछ जँचा नहीं। यहाँ तक कि शाम हो गई। तब दोनों न जाने किस दैवी प्रेरणा से एक मधुशाला के सामने जा पहुँचे। और जैसे किसी पूर्व निश्चित व्यवस्था से अंदर चले गए। वहाँ ज़रा देर तक दोनों असमंजस में खड़े रहे। फिर घीसू ने गद्दी के सामने जाकर कहा—“साहूजी, एक बोतल हमें भी देना।” इसके बाद कुछ चिखौना आया, तली हुई मछली आईं और दोनों बरामदे में बैठकर शांतिपूर्वक पीने लगे। कई कुज्जियाँ ताबड़तोड़ पीने के बाद दोनों सरूर में आ गए। घीसू बोला—“कफ़न लगाने से क्या मिलता? आख़िर जल ही तो जाता। कुछ बहू के साथ तो न जाता।” माधव आसमान की तरफ़ देखकर बोला, मानों देवताओं को अपनी निष्पापता का साक्षी बना रहा हो—“दुनिया का दस्तूर है, नहीं लोग बामनों को हज़ारों रुपए क्यों दे देते हैं? कौन देखता है, परलोक में मिलता है या नहीं!” “बड़े आदमियों के पास धन है, फूँके। हमारे पास फूँकने को क्या है?” “लेकिन लोगों को जवाब क्या दोगे? लोग पूछेंगे नहीं, कफ़न कहाँ है?” घीसू हँसा—“अबे, कह देंगे कि रुपए कमर से खिसक गए। बहुत ढूँढ़ा, मिले नहीं। लोगों को विश्वास न आएगा, लेकिन फिर वही रुपए देंगे।” माधव भी हँसा, इस अनपेक्षित सौभाग्य पर बोला—“बड़ी अच्छी थी बेचारी! मरी तो ख़ूब खिला-पिलाकर!” आधी बोतल से ज़्यादा उड़ गई। घीसू ने दो सेर पूरियाँ मँगाई। चटनी, अचार, कलेजियाँ। शराबख़ाने के सामने ही दूकान थी। माधव लपककर दो पत्तलों में सारे सामान ले आया। पूरा डेढ़ रुपया ख़र्च हो गया। सिर्फ़ थोड़े से पैसे बच रहे। दोनों इस वक़्त इस शान में बैठे पूरियाँ खा रहे थे जैसे जंगल में कोई शेर अपना शिकार उड़ा रहा हो। न जवाबदेही का ख़ौफ़ था, न बदनामी की फ़िक्र। इन भावनाओं को उन्होंने बहुत पहले ही जीत लिया था। घीसू दार्शनिक भाव से बोला—“हमारी आत्मा प्रसन्न हो रही है तो क्या उसे पुन्न न होगा?” माधव ने श्रद्धा से सिर झुकाकर तसदीक़ की—“ज़रूर से ज़रूर होगा। भगवान, तुम अंतर्यामी हो। उसे बैकुंठ ले जाना। हम दोनों हृदय से आशीर्वाद दे रहे हैं। आज जो भोजन मिला वह कभी उम्र-भर न मिला था” एक क्षण के बाद माधव के मन में एक शंका जागी। बोला—“क्यों दादा, हम लोग भी एक-न-एक दिन वहाँ जाएँगे ही?” घीसू ने इस भोले-भाले सवाल का कुछ उत्तर न दिया। वह परलोक की बातें सोचकर इस आनंद में बाधा न डालना चाहता था। “जो वहाँ वह हम लोगों से पूछे कि तुमने हमें कफ़न क्यों नहीं दिया तो क्या कहोगे?” “कहेंगे तुम्हारा सिर!” “पूछेगी तो ज़रूर!” “तू कैसे जानता है कि उसे कफ़न न मिलेगा? तू मुझे ऐसा गधा समझता है? साठ साल क्या दुनिया में घास खोदता रहा हूँ? उसको कफ़न मिलेगा और बहुत अच्छा मिलेगा!” माधव को विश्वास न आया। बोला—“कौन देगा? रुपए तो तुमने चट कर दिए। वह तो मुझसे पूछेगी। उसकी माँग में तो सेंदुर मैंने डाला था।” “कौन देगा, बताते क्यों नहीं?” “वही लोग देंगे, जिन्होंने अबकी दिया। हाँ, अबकी रुपए हमारे हाथ न आएँगे।” ज्यों-ज्यों अँधेरा बढ़ता था और सितारों की चमक तेज़ होती थी, मधुशाला की रौनक भी बढ़ती जाती थी। कोई गाता था, कोई डींग मारता था, कोई अपने संगी के गले लिपटा जाता था। कोई अपने दोस्त के मुँह में कुल्हड़ लगाए देता था। वहाँ के वातावरण में सुरूर था, हवा में नशा। कितने तो यहाँ आकर एक चुल्लू में मस्त हो जाते थे। शराब से ज़्यादा यहाँ की हवा उन पर नशा करती थी। जीवन की बाधाएँ यहाँ खींच लाती थीं और कुछ देर के लिए यह भूल जाते थे कि वे जीते हैं या मरते हैं। या न जीते हैं, न मरते हैं। और यह दोनों बाप-बेटे अब भी मज़े ले-लेकर चुसकियाँ ले रहे थे। सबकी निगाहें इनकी ओर जमी हुई थीं। दोनों कितने भाग्य के बली हैं! पूरी बोतल बीच में है। भरपेट खाकर माधव ने बची हुई पूरियों का पत्तल उठाकर एक भिखारी को दे दिया, जो खड़ा इनकी ओर भूखी आँखों से देख रहा था। और देने के गौरव, आनंद और उल्लास का अपने जीवन में पहली बार अनुभव किया। घीसू ने कहा—“ले जा, ख़ूब खा और आशीर्वाद दे! जिसकी कमाई है, वह तो मर गई। मगर तेरा आशीर्वाद उसे ज़रूर पहुँचेगा। रोएँ-रोएँ से आशीर्वाद दो, बड़ी गाढ़ी कमाई के पैसे हैं!” माधव ने फिर आसमान की तरफ़ देखकर कहा—“वह बैकुंठ में जाएगी दादा, बैकुंठ की रानी बनेगी।” घीसू खड़ा हो गया और जैसे उल्लास की लहरों में तैरता हुआ बोला—“हाँ, बेटा बैकुंठ में जाएगी। किसी को सताया नहीं, किसी को दबाया नहीं। मरते-मरते हमारी ज़िंदगी की सबसे बड़ी लालसा पूरी कर गई। वह न बैकुंठ जाएगी तो क्या ये मोटे-मोटे लोग जाएँगे, जो ग़रीबों को दोनों हाथों से लूटते हैं, और अपने पाप को धोने के लिए गंगा में नहाते हैं और मंदिरों में जल चढ़ाते हैं? श्रद्धालुता का यह रंग तुरंत ही बदल गया। अस्थिरता नशे की ख़ासियत है। दु:ख और निराशा का दौरा हुआ। माधव बोला—“मगर दादा, बेचारी ने ज़िंदगी में बड़ा दुख भोगा। कितना दुख झेलकर मरी!” वह आँखों पर हाथ रखकर रोने लगा। चीखें मार-मारकर। घीसू ने समझाया—“क्यों रोता है बेटा, ख़ुश हो कि वह माया-जाल से मुक्त हो गई, जंजाल से छूट गई। बड़ी भाग्यवान थी, जो इतनी जल्द माया-मोह के बंधन तोड़ दिए। और दोनों खड़े होकर गाने लगे— “ठगिनी क्यों नैना झमकावे! ठगिनी!” पियक्कड़ों की आँखें इनकी ओर लगी हुई थीं और यह दोनों अपने दिल में मस्त गाए जाते थे। फिर दोनों नाचने लगे। उछले भी, कूदे भी। गिरे भी, मटके भी। भाव भी बनाए, अभिनय भी किए। और आख़िर नशे में मदमस्त होकर वहीं गिर पड़े। *****
- कृतज्ञता
शंकर लाल वर्मा इस वक्त कौन हो सकता है। अचानक किसी ने जोर से दरवाजा खटखटाया और लगातार खटखटाता रहा। "इस वक्त कौन हो सकता है?" प्रिया ने सोचा और बगल में सो रहे अपने पति हर्ष को जगाया। हर्ष भी इतनी जोर से दरवाजा खटखटाने की आवाज से जगा - जगा सा तो हो ही गया था और प्रिया के हिलाने से तुरंत उठकर बैठ गया और घबराई हुई नजरों से प्रिया की ओर देखा। प्रिया की हालत भी उसके ही जैसे थी। अभी एक महीने पहले ही तो दोनों इस मकान में शिफ्ट हुए हैं। अभी ठीक से पड़ोसियों को भी नहीं जानते तो रात के 12:30 बजे कौन आ सकता है और इस तरह से दरवाजा खटखटा सकता है। हिम्मत कर के दोनों दरवाजे के पास गए और आई होल में से देखकर पूछा," कौन है ? "बेटा! मैं हूं तुम्हारे पड़ोस में रहने वाली तिवारी आंटी। तुम्हारे अंकल की तबियत अचानक से बहुत खराब हो गई है, क्या तुम चल कर देख सकते हो? "बाहर से एक करुणामई आवाज आई।" तुम जानती हो क्या तिवारी आंटी को?" हर्ष ने प्रिया से पूछा।" पास वाले मकान में अंकल और आंटी बस दोनों ही रहते हैं और बुजुर्ग हैं, बस इतना ही जानती हूं। उनसे कभी बात तो नहीं हुई, हां एक-दो बार नमस्ते जरूर हुई है।" प्रिया ने बताया।" ठीक है। तब तो हमें उनकी मदद जरूर करनी चाहिए।" कहते हुए हर्ष ने दरवाजा खोल दिया और आंटी के साथ उनके घर की तरफ चल दिया। थोड़ी देर में प्रिया भी घर लॉक कर आंटी के यहां चली गई। तब तक हर्ष ने डॉक्टर को फोन कर दिया था और अंकल को फर्स्ट एड देना शुरू कर दिया था। अंकल को शायद हार्ट अटैक आया था। क्योंकि उनके सीने में बहुत तेज दर्द हो रहा था और वे पसीने से तर बतर हो रहे थे, साथ ही घबराहट भी हो रही थी। थोड़ी ही देर में डॉक्टर आ गए। उन्होंने एग्जामिन कर के बताया कि अंकल को हार्ट अटैक ही आया है और समय से फर्स्ट एड मिल जाने से अंकल सैफ हैं लेकिन उनको तुरंत हॉस्पिटल ले जाना पड़ेगा। एंबुलेंस को कॉल कर अंकल को तुरंत हॉस्पिटल ले जाया गया। जहां पर अगले दिन उनकी हार्ट सर्जरी की गई। लगभग एक महीने हॉस्पिटल में रहने के बाद अंकल को डिस्चार्ज कर दिया गया। जब तक अंकल हॉस्पिटल में रहे तब तक हर्ष और प्रिया ने भी अपने पिता के जैसे उनका बहुत ध्यान रखा। कुछ दिन बाद अंकल - आंटी कृतज्ञता व्यक्त करने प्रिया के घर गए," बेटा! अगर उस दिन तुम हमारी सहायता नहीं करते तो शायद मैं अभी तुम्हारे सामने नहीं होता।" अंकल ने हर्ष के हाथों को अपने हाथों में पकड़ते हुए कहा।" कैसी बातें करते हैं, उनके आप? हम क्यों नहीं आपकी सहायता करते? पड़ोसी होते ही इसलिए हैं। अब आप अपने को अकेला नहीं समझिएगा।" हर्ष ने कहा" सच कहते हो बेटा। भगवान ने इस उम्र में आकर हमारी गोद भरी है। तुम्हारे जैसा बेटा-बहु पाकर हम धन्य हो गए।" आंटी ने आंसू पोंछते हुए कहा।" चलिए अब रोना बंद करिए और अपनी बहु के हाथ के चाय-पकोड़े खा कर बताइए कैसे बने हैं।" प्रिया ने ट्रे हाथ में लिए कमरे में प्रवेश किया। और प्रिया की बात से हॉल ठहाकों से गूंज गया। ******
- कड़वी बहु
रमेश चंद्रा जानकी के बहु बेटे शहर में बस चुके थे लेकिन उसका गाँव छोड़ने का मन नहीं हुआ इसलिए अकेले ही रहती थी। वह रोजाना की तरह मंदिर जा कर आ रही थी। रास्ते मे उसका संतुलन बिगड़ा और गिर पड़ी। गाँव के लोगों ने उठाया, पानी पिलाया और समझाया 'अब इस अवस्था में अकेले रहना उचित नहीं। किसी भी बेटे के पास चली जाओ।' जानकी ने भी परिस्थिति को स्वीकार कर बेटे बहुओं को ले जाने के लिए कहने हेतु फोन करने का मन बना लिया। जानकी की तीन बहुएँ थी। एक बड़ी अति आज्ञाकारी मंझली मध्यम आज्ञाकारी और छोटी कड़वी। जानकी अति धार्मिक थी। कोई व्रत त्यौहार आता पहले से ही तीनों बहुओं को सचेत कर देती। 'अति' खुशी खुशी व्रत करती। माध्यम भी मान जाती थी लेकिन कड़वी विरोध पर उतर जाती। "आप हर त्योहार पर व्रत रखवा कर उसके आनंद को कष्ट में परिवर्तित कर देती हैं।" "तेरी तो जुबान लड़ाने की आदत है। कुछ व्रत तप कर ले। आगे तक साथ जाएँगे।" दोनों की किसी न किसी बात पर बहस हो जाती। गुस्से में एक दिन जानकी ने कह दिया था। "तू क्या समझती है! बुढापे में मुझे तेरी जरूरत पड़ने वाली है। तो अच्छी तरह समझ ले। सड़ जाऊँगी लेकिन तेरे पास नहीं आऊँगी।" सबसे पहले उसने अति को फोन किया "गिर गई हूँ। आजकल कई बार ऐसा हो गया है। सोचती हूँ तुम्हारे पास ही आ जाऊँ।" "नवरात्र में? अभी नहीं माँ जी। नंगे पाँव रह रही हूं आजकल। किसी का छुआ भी नहीं खाती।" मध्यम को भी फोन किया लेकिन उसने भी बहाना कर टाल दिया। जब अति और मध्यम ही टाल चुकी तो कड़वी को फोन करने का कोई फायदा नहीं था और अहम अभी टूटा था लेकिन खत्म नहीं हुआ था। फोन पर हाथ रख आने वाले कठिन समय की कल्पना करने लगी थी। तभी फोन की घण्टी बजी। आवाज़ से ही समझ गई थी कड़वी है। "गिर गये ना? आपने तो बताया नहीं लेकिन मैंने भी जासूस छोड़ रखे हैं। पोते को भेज रही हूँ लेने।" "क्या तुझे मेरे शब्द याद नहीं?" "जिंदगी भर नहीं भूलूँगी। आपने कहा था सड़ जाऊँगी तो भी तेरे पास नहीँ आऊँगी। तभी मैंने व्रत ले लिया था इस बुढ़िया को सड़ने नहीं देना है। मेरा तप अब शुरू होगा।" बूढ़ी माँ की आंखों से अपनी कड़वी बहु के लिए प्रेम में आंसू की धारा बह निकली। ******
- अपनों के बीच
करुणा शंकर अवस्थी कई बार लौटते-लौटते बहुत देर हो जाती है। इतनी देर कि हम खुद को भी पहचान नहीं पाते। अपना पता भी ढूंढ़ नहीं पाते। अपना शहर, अपनी गलियां भूल चुकी होती हैं हमें। खत्म हो चुके होते हैं जाने कितने जन्म, जाने कितने रिश्ते। और इस तरह हमारा लौटना, लौटना नहीं होता। हम सिर्फ आ जाते हैं अनचाहे और अनजाने से उन अपनों के बीच, जिन्होंने कभी हमारे लौट आने की जाने कितनी दुआएं मांगी थीं। ******
- इन्द्रजाल
रघुनाथ सिंह 1 शुभे ! शुभे ! शुभे ! विन्ध्याचल के गहन कानन के बीच कान्तार-गामिनी युवती के बढ़ते हुए पद इस मर्मस्पर्शी सम्बोधन-स्वर को सुनते ही सहसा स्तम्भित हो गए। उसने चकित होकर चतुर्दिश पर्यालोचन किया तो पादुका-विहीन पद-चिह्नों से अकित मालुधान तुल्य क्षीण कान्तार की अपेक्षा उसे और कुछ दृष्टिगत न हुआ । अनन्तर उस श्यामांगी युवती के अरुण विलोचनों की तारिकाएँ अपांगों के मध्य चकराती हुई अन्वेषण करने लगीं। वह ज्यों ही आई हुई ध्वनि की दिशा की ओर बढ़ने का उपक्रम करने लगी त्यों ही पुनः सुनाई पड़ा- शुभे, ठहरो ! ठहरो ! ठहरो ! यह आवाज युवती के दक्षिण पार्श्व में स्थित तरु-समूहों के बीच से होकर आई। वह शीघ्रतापूर्वक उस ओर मुड़ पड़ी। उसने अभी थोड़ा भी अनुसरण न किया होगा कि अपने सामने एक विशाल स्कन्धीय, सुन्दर, श्री सम्पन्न एवं राज-लक्षण-युक्त एक आगन्तुक युवक को देखा। उसे देखते ही नारी-सुलभ लज्जा से युवती के विलोल लोचन नमित हो गए। युवती का सामना होते ही योगन्तुक भी ठिठक गया। करुणा थपना गम्भीर आवरण उसके शिथिल एवं उदासीन मुख पर विस्तारित किए हुए थी। सद्यजात घृणा ने उसके मुख-मण्डल की कान्ति को और भी आवृत कर लिया। अतः उसके विषण्ण विलोचन जब दूसरी ओर देखने को उद्यत हुए तो उसकी अस्थिर इन्द्रियों की शिथिल प्रवृत्ति, सूखे तालु से उत्पन्न उष्ण उछ्वास, आतप से व्याकुल मस्तिष्क, क्षुधा द्वारा उद्भूत उदर की कचोट, कानन को गम्भीर निर्जनता द्वारा उत्पन्न भय एवं मन को कातर बनाने वाली शिथिलता आदि ने आगन्तुक पर एक साथ आक्रमण किया, जिससे वह विक्षिप्त की भाँति मुसकरा उठा। अन्धकार उसे चारों ओर से घेरने लगा। कण्टकाकीर्ण कानन के अवन्ध्य तरु-इल आगन्तुक से मिलने के लिए मानों अग्रसर होने लगे । आगन्तुक की इस दयनीय स्थिति पर भगवान् भास्कर 'मुसकरा उठे। रश्मियाँ परिहासोन्मुख हुई। जब मरुत के प्रवाह में पढ़कर वृक्षों की पत्तियाँ अनियंत्रित रूप में नाचने को उद्यत हुई तो तरुओं को अपनी मर्यादा अतिक्रमण करना भला न लगा। तरुओं की इस भावना पर पत्तियों इठलाकर खड़खड़ाहट के साथ अट्टहास कर उठीं। अनन्तर अपने मनोवेग में उड़कर वे खूब नाचीं। मरुत ने सहानुभूति सूचित करते हुए पूछा- तुम तो हो। नाच चुकीं न ! अनन्तर पत्तियाँ करुण-दृष्टि से तरु-दल की ओर देखने लगीं। इसपर वृक्षों ने केवल इतना ही कहा कि तुम तो अपने मनोवेग को संभाल न सकी थीं। अपने मनोवेग की इस उच्छृंखलता पर पत्तियाँ कुछ विचार किए बिना ही भूमि को अपना अस्तित्व सौंपती हुई जीवन की निःसारता का परिचय देने लगीं। आगन्तुक का मन कानन का यह अनोखा स्वागत देखकर कहीं शरण पाने की लालसा में अधीर हो उठा। अनन्तर घबड़ाहट में घूमती हुई उसके नेत्र की तारिकाएँ समस्त मनोविकारों को व्यवधानित करती हुई दया-भिक्षा के निमित्त युवती की ओर आकर स्थिर हुई और वह बोला- शुभे, तृषित हूँ। थोड़ा जल-दान करोगी ? आगन्तुक वेग के साथ युवती के समीप लड़खड़ाता हुआ आ पहुँचा। आगन्तुक पर चकित दृष्टि डालती हुई युवती पीछे हटने लगी। आगन्तुक शिथिलता के कारण अपनेको सँभाल न सका। वह पृथ्वी पर गिर गया। उसे अपनी इस निर्बल एवं दयनीय दशा पर स्वयं आश्चर्य होने लगा। युवती भी वहीं स्तब्ध हो गई। आगन्तुक की चेतन शक्ति उस नव-परिचित युवती के साथ मैत्री स्थापित करने के हेतु उतावली होने लगी। उसने युवती की ओर अत्यन्त करुणा-भरे नयनों से देखा। अनन्तर किचित् उठने का उपक्रम करता हुआ बोला- मृत्यु के मुख में पड़ा हूँ। देवि, दया करो।
- देवांगना
आचार्य चतुरसेन शास्त्री का उपन्यास Chapter 01 प्रस्तावना : देवांगना आज से ढाई हज़ार वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध ने अपने शिष्यों को ब्रह्मचर्य और सदाचार की शिक्षा देकर बहुत जनों के हित के लिए, बहुत जनों के सुख के लिए, लोक पर दया करने के लिए, देव-मनुष्यों के प्रयोजन-हित सुख के लिए संसार में विचरण करने का आदेश दिया। वह 44 वर्षों तक, बरसात के तीन मासों को छोड़कर विचरण करते और लोगों को धर्मोपदेश देते रहे। उनका यह विचरण प्रायः सारे उत्तर प्रदेश और सारे बिहार तक ही सीमित था। इससे बाहर वे नहीं गये। परन्तु उनके जीवनकाल में ही उनके शिष्य भारत के अनेक भागों में पहुँच गये थे। ई. पू. 253 में अशोक ने अपने धर्मगुरु आचार्य मोग्गलिपुत्र तिष्य के नेतृत्व में भारत से बाहर बौद्ध धर्मदूतों को भेजा। भारत के बाहर बौद्धधर्म का प्रचार भारतीय इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। इस समय प्रायः सारा भारत, काबुल के उस ओर हिन्दुकुश पर्वतमाला तक, अशोक के शासन में था। बुद्ध के जीवनकाल में पेशावर और सिन्धु नदी तक, पारसीक शासानुशास दारयोश का राज्य था। तक्षशिला भी उसी के अधीन था। उन दिनों व्यापारियों के सार्थ पूर्वी और पश्चिमी समुद्र तट तक ही नहीं, तक्षशिला तक जाते-आते रहते थे। उनके द्वारा दारयोश के पश्चिमी पड़ोसी यवनों का नाम बुद्ध के कानों तक पहुँच चुका था। परन्तु उस काल का मानव संसार बहुत छोटा था। चन्द्रगुप्त के काल में सिकन्दर ने पंजाब तक पहुँचकर मानव संसार की सीमा बढ़ाई। अशोक काल में भारत का ग्रीस के राज्यों से घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित हआ, जो केवल राजनैतिक और व्यापारिक ही न था, सांस्कृतिक भी था। इसी से अशोक को व्यवस्थित रूप में धर्म-विजय में सफलता मिली और बौद्धधर्म विश्वधर्म का रूप धारण कर गया। इतना ही नहीं; जब बौद्धधर्म का सम्पर्क सभ्य-सुसंस्कृत ग्रीकों से हुआ जहाँ अफलातून और अरस्तू जैसे दार्शनिक हो चुके थे, तो बौद्धधर्म महायान का रूप धारण कर अति शक्तिशाली बन गया। महायान ने बौद्धधर्म जीवन का एक ऐसा उच्च आदर्श सामने रखा जिसमें प्राणिमात्र की सेवा के लिए कुछ भी अदेय नहीं माना गया तथा इस आदर्श ने शताब्दियों तक अफगानिस्तान से जापान और साइबेरिया से जावा तक सहृदय मानव को अपनी ओर आकृष्ट किया। महायान ने ही शून्यवाद के आचार्य नागार्जुन-असंग-वसुबन्धु, दिङ्नाग, धर्मकीर्ति जैसे दार्शनिक उत्पन्न किए जिन्होंने क्षणिक विज्ञानवाद का सिद्धान्त स्थिर किया। जिसने गौड़पाद और शंकराचार्य के दर्शनों को आगे जन्म दिया। मसीह की चौथी शताब्दी तक महायान पूर्ण रूपेण विकसित हुआ और उसके बाद अगली तीन शताब्दियों में उसने भारत और भारत की उत्तर दिशा के बौद्धजगत् को आत्मसात् कर लिया। इसी समय से वज्रयान उसमें से अंकुरित होने लगा। और आठवीं शताब्दी में चौरासी सिद्धों की परम्परा के प्रादुर्भाव के साथ वज्रयान भारत का प्रमुख धर्म बन गया। बौद्धधर्म का यह अंतिम रूप था, जो अपने पीछे वाममार्ग को छोड़कर तेरहवीं शताब्दी में तुर्कों की तलवार से छिन्न-भिन्न हो गया। भारतीय जीवन को बौद्धधर्म ने एक नया प्राण दिया। बौद्ध-संस्कृति भारतीय संस्कृति का एक अभंग और महत्त्वपूर्ण अंग थी। उसने भारतीय-संस्कृति के प्रत्येक अंग को समृद्ध किया। न्याय-दर्शन और व्याकरण में जैसे चोटी के हिन्दू विद्वान् अक्षपाद, वात्स्यायन, वाचस्पति, उदयनाचार्य थे. उससे कहीं बढ़े-चढ़े बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन, वसुबन्धु, दिङ्नाग, धर्मकीर्ति, प्रज्ञाकर गुप्त और ज्ञानश्री थे। पाणिनि, कात्यायन और पतंजलि जैसे दिग्गज हिन्दू वैयाकरणों के मुकाबिले में बौद्ध पण्डित काशिकाकार जयादित्य, न्यासकार जिनेन्द्रबुद्धि तथा पाणिनि सूत्रों पर भाषा वृत्ति बनाने वाले पुरुषोत्तमदेव कम न थे। कालिदास के समक्ष अश्वघोष को हीन कवि नहीं माना जा सकता। सिद्ध नागार्जुन तो भारतीय रसायन के एकक्षत्र आचार्य हैं। आरम्भिक हिन्दी का विकास भी बौद्धों ने किया। उनके अपभ्रंश काव्यों की पूरी छाप उत्तर कालीन संतों की निर्गुण धारा पर पड़ी। इतना ही नहीं, कला का विकास भी बौद्धों ने अद्वितीय रूप से किया। साँची, भरहुत, गान्धार, मथुरा, धान्य कण्टक, अजन्ता, अलची-सुभरा की चित्रकला एवं ऐलोरा-अजन्ता, कोली-भाजा के गुहाप्रासाद बौद्धों की अमर देन है। इस प्रकार साहित्य-संस्कृतिमूर्तिकला-चित्रकला और वास्तुकला के विकास में बौद्ध संस्कृति ने भारत को असाधारण देन दी।
- रिश्तों की असली कीमत
दीपक दिवाकर पत्नी रचना ने जज के सामने ठंडे स्वर में कहा, “मुझे तलाक मंजूर है, लेकिन इसके बदले मुझे एक लाख रुपए चाहिए।” पूरा कोर्टरूम सन्न रह गया। सबकी नजरें उस व्हीलचेयर पर बैठे विशाल की ओर मुड़ गईं। उसकी आँखों में कोई शिकवा नहीं था, बस एक गहरी चुप्पी थी। तभी पीछे की बेंच से एक छोटा सा लड़का, अंश, उठा। उसके हाथ में एक मुड़ी-तुड़ी चिट्ठी थी। उसने कहा, “जज साहब, ये पापा ने मेरे लिए लिखी थी।” उस चिट्ठी के शब्द अदालत की दीवारों को भी पिघला गए। जज साहब ने चिट्ठी खोली, पूरा कोर्टरूम खामोश हो गया। चिट्ठी में लिखा था— “प्रिय अंश, अगर कभी तुम मेरी आँखों में खालीपन देखो तो समझना कि वह रोशनी तुम्हारे लिए बचाकर रखी है। अगर कभी माँ को मेरी हालत पर गुस्सा आए तो उसे दोष मत देना। उसका दर्द मुझसे ज्यादा है। बेटा, तुम बड़े होकर बस इतना करना कि कभी किसी औरत को अकेला महसूस ना होने देना। और अगर मेरी हालत तुम्हें शर्मिंदगी दे तो जान लेना कि तुम्हारा पापा तुमसे बहुत प्यार करता था।” जैसे ही ये शब्द अदालत में गूंजे, वहाँ मौजूद हर इंसान की आँखें भर आईं। रचना का चेहरा पीला पड़ गया, उसकी आँखें नीचे झुक गईं। विशाल अब भी चुप था, लेकिन उसकी आँखों से आंसू बह रहे थे। शायद इसलिए कि उसने अपने बेटे को अपने सबसे गहरे जज्बात सौंप दिए थे। जज साहब ने कुछ देर तक खामोशी के बाद कहा, “यह मामला अब सिर्फ कानून का नहीं रहा, बल्कि इंसानियत और रिश्तों की सच्चाई का इम्तिहान बन गया है।” रचना के दिल पर चिट्ठी के शब्द जैसे हथौड़े की चोट कर रहे थे। उसने पहली बार अपने बेटे की आँखों में वह दर्द देखा, जो उसने कभी महसूस करने की कोशिश ही नहीं की थी। अंश की मासूम निगाहें पूछ रही थीं-माँ, क्या हमारे रिश्ते की कीमत सिर्फ रुपयों में लगाई जा सकती है? रचना का चेहरा लाल हो गया। उसने अपने आंचल से पसीना पोंछा, लेकिन उसके गाल पर अब आंसुओं की बूंदें भी उतर आई थीं।
- बदलाव
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव बूढ़े दादा जी को उदास बैठे देख बच्चों ने पूछा, “क्या हुआ दादा जी, आज आप इतने उदास बैठे क्या सोच रहे हैं?” “कुछ नहीं, बस यूँही अपनी ज़िन्दगी के बारे में सोच रहा था।”, दादा जी बोले। “जरा हमें भी अपनी लाइफ के बारे में बताइये न।”, बच्चों ने ज़िद्द्द की। दादा जी कुछ देर सोचते रहे और फिर बोले, “जब मैं छोटा था, मेरे ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं थी, मेरी कल्पनाओं की भी कोई सीमा नहीं थी। मैं दुनिया बदलने के बारे में सोचा करता था। जब मैं थोड़ा बड़ा हुआ, बुद्धि कुछ बढ़ी, तो सोचने लगा ये दुनिया बदलना तो बहुत मुश्किल काम है, इसलिए मैंने अपना लक्ष्य थोड़ा छोटा कर लिया, सोचा दुनिया न सही मैं अपना देश तो बदल ही सकता हूँ। पर जब कुछ और समय बीता, मैं अधेड़ होने को आया, तो लगा ये देश बदलना भी कोई मामूली बात नहीं है। हर कोई ऐसा नहीं कर सकता है, चलो मैं बस अपने परिवार और करीबी लोगों को बदलता हूँ। पर अफ़सोस मैं वो भी नहीं कर पाया। और अब जब मैं इस दुनिया में कुछ दिनों का ही मेहमान हूँ तो मुझे एहसास होता है कि बस अगर मैंने खुद को बदलने का सोचा होता तो मैं ऐसा ज़रूर कर पाता और हो सकता है मुझे देखकर मेरा परिवार भी बदल जाता और क्या पता उनसे प्रेरणा लेकर ये देश भी कुछ बदल जाता और तब शायद मैं इस दुनिया को भी बदल पाता। ये कहते-कहते दादा जी की आँखें नम हो गयीं और वे धीरे से बोले, “बच्चों ! तुम मेरी जैसी गलती मत करना, कुछ और बदलने से पहले खुद को बदलना। बाकि सब अपने आप बदलता चला जायेगा। हम सभी में दुनिया बदलने की ताकत है, पर इसकी शुरआत खुद से ही होती है। कुछ और बदलने से पहले हमें खुद को बदलना होगा, हमें खुद को तैयार करना होगा। अपने कौशल को मजबूत करना होगा, अपने नज़रिये को सकारात्मक बनाना होगा, अपने लक्ष्य को फौलाद करना होगा, और तभी हम वो हर एक बदलाव ला पाएंगे जो हम सचमुच लाना चाहते हैं। *****











