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  • बेशकीमती दौलत

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव “अजी सुनते हो… आज आपसे एक बात पूछूँ?” साँझ की सुनहरी चादर धीरे-धीरे कमरे में उतर रही थी। खिड़की से आती धूप की आख़िरी किरणें 80 वर्षीया वृद्धा के झुर्रियों भरे, शांत चेहरे पर ठहर-सी गई थीं - मानो बीते वर्षों की कहानी पढ़ रही हों। सामने 84 वर्षीय उनके जीवनसाथी, काँपते कदमों और छड़ी के सहारे चलते हुए, मुस्कुराते हुए उनके पास आकर बैठ गए। “कहो भाग्यवान… आज आवाज़ में इतना संकोच क्यों है?” उन्होंने स्नेह से पूछा। वृद्धा ने काँपते हाथों से एक पुराना, पीला पड़ चुका कागज़ उनकी ओर बढ़ाया। कागज़ जैसे समय की तहों से निकलकर आया था। उसकी आवाज़ भी उसी कागज़ की तरह थरथरा रही थी - “आपको याद है… शादी से पहले आपने अपनी माताजी को एक खत लिखा था? उसमें आपने लिखा था कि आप मुझसे शादी नहीं करना चाहते… क्योंकि आपको मेरा चेहरा पसंद नहीं था।” वृद्ध के चेहरे पर आश्चर्य की लहर दौड़ गई। “वो खत? अरे… वो तो जैसे किसी और जन्म की बात है! तुम्हें कहाँ मिला?” वृद्धा की आँखें भर आईं - “कल पुराने बक्से को साफ करते समय मिला। मुझे तो कभी पता ही नहीं था कि यह शादी आपकी इच्छा के विरुद्ध हुई थी… अगर तब जानती, तो शायद खुद ही पीछे हट जाती।” कमरे में अचानक गहरा सन्नाटा छा गया। दीवार पर लगी घड़ी की टिक-टिक अब साफ सुनाई दे रही थी - जैसे हर सेकंड उन साठ वर्षों की परतें खोल रहा हो। वृद्ध ने धीरे से मुस्कुराते हुए अपना सिर पत्नी की गोद में रख दिया। “अरे पगली,” उन्होंने बेहद कोमल स्वर में कहा, “जब वो खत लिखा था, तब मैं सिर्फ 12 साल का था।” पत्नी ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा - आँखों में आँसू भी थे और हल्की मुस्कान भी। “मुझे लगा था,” वे हँसते हुए बोले, “कि तू शादी करके आएगी तो मेरे कमरे में मेरे साथ सोएगी… मेरे बिस्तर पर, मेरे तकिए पर। मेरे खिलौनों से खेलेगी और मेरी गुल्लक के पैसे चुरा लेगी। मुझे डर था कि मेरा बचपन कोई मुझसे छीन लेगा।” उन्होंने एक गहरी साँस ली, जैसे दिल के सबसे कोमल हिस्से से शब्द निकाल रहे हों - “पर मैं कहाँ जानता था कि तू मेरे जीवन में आकर सिर्फ कमरे में नहीं, मेरे दिल में घर बना लेगी। मैं कहाँ जानता था कि कपड़े के खिलौनों से कहीं ज्यादा प्यारे खिलौने - हमारे बच्चे - तू मुझे देगी। मैं कहाँ जानता था कि मेरी चिल्लर से भरी गुल्लक के बदले तू मुझे प्यार की ऐसी अनमोल दौलत देगी, जिसकी कीमत कोई नहीं लगा सकता… और जो आज भी मेरे पास सुरक्षित है।” वृद्धा की आँखों से आँसू मोतियों की तरह ढलक पड़े, मगर इस बार उनमें पीड़ा नहीं, गहरा संतोष था। धीमे से मुस्कुराते हुए बोली - “भगवान का लाख-लाख शुक्र है… मैं तो सोच रही थी कि शायद आपको उस पड़ोस वाली से प्रेम था।” वृद्ध ठहाका लगाकर हँस पड़े - “अरे रहने दो! कहाँ वो… और कहाँ मेरी ये रानी।” दोनों की भीगी पलकों ने एक-दूसरे को देखा - जैसे साठ वर्षों का साथ उन नजरों में सिमट आया हो। कितनी तकरारें, कितनी नोकझोंक, कितनी अधूरी इच्छाएँ और अनगिनत साझा हँसी - सब आज एक गहरी शांति में बदल चुका था। जीवन की साँझ थी, अंतिम पड़ाव शायद दूर नहीं था… मगर साथ था, और वही सबसे बड़ी राहत थी। पति-पत्नी का रिश्ता खून से नहीं, दिल से बनता है। यह रिश्ता सिर्फ प्रेम का नहीं, धैर्य और त्याग का भी होता है। यह रिश्ता केवल जवानी की चंचल हँसी का नहीं, बुढ़ापे में एक-दूसरे की लाठी बनने का होता है। याद रखिए— “उम्र भर का पसीना उसकी गोद में सूख जाएगा, हमसफ़र क्या होता है - ये बुढ़ापे में समझ आएगा।” इसलिए यदि आपका जीवनसाथी आज आपके पास है, तो उसका सम्मान कीजिए, उसकी भावनाओं को समझिए, और इस अनमोल रिश्ते को सहेजकर रखिए। क्योंकि सच्चा प्रेम वही है, जो समय की हर आँधी में अडिग खड़ा रहे - और अंत में यही सिद्ध करे कि दुनिया की सबसे बेशकीमती दौलत, प्यार है। *******

  • एहसास एक अनुभूति

    बबिता चौधरी "राही"   यहां.... भाई भाई का प्रेम वहीं तक   जब तक सिर मां बाप का साया। जिस दिन यह साया उठ गया   फिर भाई भी हो जाता पराया। भाई बहन का  प्रेम वहीं तक  जब तक बहन ने हक ना जताया। जिस दिन बहन ने हक़ मांग लिया  "राही" भाई भी हो जाता पराया। पति पत्नी का प्रेम वहीं तक जब तक एक दूजे का साथ निभाया। एक ने भी गर दामन छोड़ दिया तो यह रिश्ता भी हो जाता पराया। ******

  • अनपढ़ व्यापारी

    राम प्रकाश वर्मा एक छोटे से शहर के एक प्रतिष्ठित कॉन्वेंट स्कूल में एक आदमी काम करता था। उसका काम बड़ा साधारण था—पीरियड शुरू होने और छुट्टी होने की घंटी बजाना। दिन में कई बार स्कूल की शांत फिज़ा में उसकी आवाज़ गूंजती— “टन… टन… टन… टन… टन…” बच्चों के लिए वह आवाज़ आज़ादी का संकेत थी, शिक्षकों के लिए अनुशासन का, और उसके लिए… बस रोज़ी-रोटी का साधन। वह आदमी सीधा-सादा था, कम बोलने वाला, और अपना काम ईमानदारी से करने वाला। उसे न किसी से शिकायत थी, न किसी से अपेक्षा। एक दिन स्कूल में नए प्रिंसिपल आए। सख्त स्वभाव के, नियम-कानून के पक्के। निरीक्षण करते-करते उनकी नज़र उस पर पड़ी। “तुम्हारा नाम क्या है?” “जी… रामू।” “कितनी पढ़ाई की है?” रामू ने सिर झुका लिया। “साहब… पढ़ा-लिखा नहीं हूँ।” प्रिंसिपल चौंक पड़े। “क्या? इतने बड़े स्कूल में एक अनपढ़ कर्मचारी? यह तो नियमों के खिलाफ है!” और बस… एक आदेश ने वर्षों की नौकरी समाप्त कर दी। रामू के हाथ से घंटी छूट गई। अब उसके जीवन में सन्नाटा था—न “टन-टन” की आवाज़, न रोज़ की दिनचर्या। कुछ दिन जैसे-तैसे गुज़रे। घर में राशन खत्म होने लगा। बच्चों की आंखों में सवाल थे। पत्नी के चेहरे पर चिंता। तभी किसी ने सलाह दी—“अरे, स्कूल के सामने वाली सड़क पर समोसे बेच लो। बच्चों की भीड़ रहती है, कुछ न कुछ कमाई हो जाएगी।” रामू के पास खोने को कुछ था ही नहीं। उसने उधार लेकर एक छोटा-सा ठेला लगाया। पहले दिन दस समोसे बिके। दूसरे दिन पंद्रह। तीसरे दिन बीस। उसने मेहनत बढ़ा दी। समोसे गरम, कुरकुरे और स्वादिष्ट बनाने लगा। धीरे-धीरे उसकी पहचान बनने लगी— “अरे, स्कूल वाले रामू के समोसे खाए क्या?” खोमचा गुमटी बना, गुमटी दुकान बनी। दुकान शहर की सबसे मशहूर दुकान बन गई। अब वह सिर्फ समोसे ही नहीं, कचौरी, जलेबी, चाय—सब बेचने लगा। समय बदला। उसने अपने बच्चों को पढ़ाया-लिखाया और उन्हें व्यापार में लगाया। एक दुकान से तीन दुकानें, फिर होटल, फिर मिठाई का बड़ा प्रतिष्ठान। कुछ ही वर्षों में वही “घंटी बजाने वाला रामू” शहर का प्रसिद्ध सेठ रामप्रसाद बन गया। एक दिन एक पत्रकार उसका इंटरव्यू लेने आया। कैमरे, माइक और फ्लैश लाइट के बीच पत्रकार ने पूछा—“सेठ जी, आपकी सफलता की कहानी अद्भुत है। आप कहाँ तक पढ़े हैं?” सेठ रामप्रसाद मुस्कुराए। “मैं पढ़ा-लिखा नहीं हूँ।” पत्रकार हैरान रह गया। “आप अनपढ़ होकर इतने बड़े व्यापारी बन गए! अगर आप पढ़े-लिखे होते तो आज कहाँ होते?” सेठ ने हल्की हँसी के साथ जवाब दिया—“अगर पढ़ा-लिखा होता… तो शायद आज भी किसी स्कूल में घंटी ही बजा रहा होता।” कमरे में सन्नाटा छा गया, फिर सब हंस पड़े। लेकिन उस हँसी के पीछे एक गहरी सच्चाई छिपी थी। डिग्री जरूरी है, पर उससे भी अधिक जरूरी है साहस। शिक्षा महत्वपूर्ण है, पर उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है परिश्रम। और सबसे ऊपर है—कर्म। किस्मत दरवाज़ा खटखटाती जरूर है, लेकिन दरवाज़ा खोलने का काम मेहनत करती है। तो दोस्तों, यह कहानी मज़ाक में कही गई लग सकती है, पर संदेश स्पष्ट है—परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हों, यदि मन में लगन और हाथों में मेहनत हो, तो घंटी बजाने वाला भी एक दिन सफलता की गूंज बन सकता है। ******

  • सफलता का रहस्य

    एक नौजवान युवक ने अपने जीवन यापन हेतु बड़े उत्साह के साथ एक व्यापार की शुरुआत की, परंतु दुर्भाग्यवश कुछ ही समय में किसी बड़े घाटे की वजह से उसका व्यापार बंदी की कगार पर पहुंच गया। व्यापार की बंदी नौजवान के उदासी का कारण बन गई और काफी समय बीत जाने पर भी उसने कोई और काम नहीं शुरू किया। युवक की इस परेशानी का पता उसके गुरुजन को भी लगा, जो पहले कभी उसे पढ़ा चुके थे। उन्होंने एक दिन युवक को अपने घर बुलाया और पूछा, “क्या बात है आज-कल तुम बहुत परेशान रहते हो और कोई व्यापार भी नहीं करते?” “बस कुछ नहीं गुरुजी मैंने एक व्यापार प्रारंभ किया था परंतु उस व्यापार में इच्छा अनुसार वृद्धि ना हो सकी और मुझे आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा और मुझे काम बंद करना पड़ा, इसीलिए थोड़ा परेशान रहता हूँ ।” युवक बोला। गुरुजी बोले, “इसमें इतना घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि व्यापार में इस प्रकार की दुर्घटनाएं तो होती ही रहती है।” “लेकिन मैंने व्यापार बनाने के लिए कड़ी मेहनत की थी, मैं तन-मन-धन से इस काम में जुटा था, फिर मैं नाकामयाब कैसे हो सकता हूँ।” युवक कुछ झुंझलाते हुए बोला । गुरुजी कुछ देर के लिए शांत हो गए, फिर कुछ सोच कर उन्होंने कहा, “बेटा, मेरे पीछे आओ, “टमाटर के इस मरे हुए पौधे को देखो।” “ये तो बेकार हो चुका है, इसे देखने से क्या फायदा।”, युवक बोला। गुरुजी बोले, “मैंने जब इस पौधे को रोपा था तब मैंने इस पौधे की अन्य पौधों की भांति ही पूरा रखरखाव किया था मैंने इसे समय पर पानी दिया, समय पर खाद डाली, समय पर कीटनाशक का छिड़काव भी किया, परंतु फिर भी यह पौधा ऐसा हो गया।” “तो क्या ?”, युवक बोला। गुरुजी ने समझाया, “चाहे तुम कितना भी प्रयास क्यों न कर लो, परंतु परिणाम पर हमारा अधिकार नहीं होता। हम उसे तय नहीं कर सकते। बस हम उन्हीं चीजों पर नियंत्रण कर सकते हैं जो हमारे हाथ में हैं, बाकी चीजों को हमें भगवान पर छोड़ देना चाहिए।” “तो अब मैं क्या करूँ? यदि सफलता की कोई गारंटी नहीं है तो फिर प्रयास करने से क्या फायदा?”,युवक बोला। “बेटा, बहुत से लोग बस इसी बहाने का सहारा लेकर अपनी जिंदगी में कोई भी बड़ा कार्य करने का साहस नहीं करते कि जब सफलता की निश्चितता ही नहीं है तो फिर प्रयास करने से क्या फायदा !”, गुरुजी बोले। “हाँ, यदि लोग ऐसा सोचते हैं तो सही ही सोचते हैं। इतनी मेहनत, इतना पैसा, इतना समय देने के बाद भी अगर सफलता केवल एक संयोग मात्र ही है, तो इतना सब कुछ करने से क्या फायदा।”, युवक बाहर निकलते हुए बोला। “रुको-रुको, जाने से पहले जरा इस दरवाजे को भी खोलकर देखो।” गुरुजी ने एक दरवाजे की तरफ इशारा करते हुए कहा। युवक ने दरवाजा खोला, सामने बड़े-बड़े लाल टमाटरों का ढेर पड़ा हुआ था। “ये कहाँ से आये ?”, युवक ने आश्चर्य से पूछा। “बेशक, टमाटर के सभी पौधे नहीं मरे थे। यदि तुम लगातार सही दिशा में प्रयास करते रहो, तो सफलता की संभावनाएं अत्यधिक प्रबल हो जाती है। लेकिन अगर तुम एक-दो प्रयासों के बाद हार मानकर बैठ जाते हो तो तुम्हें जीवन में कोई सफलता प्राप्त नहीं होती।” गुरुजी ने अपनी बात पूरी की। युवक को अब जीवन में सफलता के रहस्य की बात पूर्ण रुप से समझ आ गई थी। अब वह एक नए जोश और उत्साह के साथ अपने काम में लगने के लिए तैयार था। सार - जो लोग सफलता प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास करते रहते हैं उन्हें आज नहीं तो कल सफलता मिल ही जाती है। याद रखिये कि जीवन की नाकामयाबी ही कामयाबी की तरफ बढ़ता एक कदम होता है। ******

  • सपनों के सौदागर

    साची सेठ   यदि सपनों के सौदागर होते हम होते नील गगन में, मन की बातें, मन की चाहें पूरी हो जातीं इक पल में, हम भी बड़े महल में होते राजकुमारी होते। यदि सपनों के सौदागर होते सपनों में ही रहते, कुटिया के बर्तन भी फिर तो सोने की सब होते, पेड़ों पर रसगुल्ले होते तोड़ तोड़ कर खाते। सारी इच्छाएं पूरी होतीं मन में दुःख न होते, यदि सपनों के सौदागर होते पंख हमारे होते कभी उछल कर पेड़ों पर और कभी हवा में होते, सागर में बिन सांस लिए ही गहरे तल में होते, बड़े बड़े हिमगिरि भी हमसे तनिक भी दूर न होते। यदि सपनों के सौदागर होते प्यारों के संग होते। यादें सपनों के सौदागर यादों में बसता जीवन है यादों में हम सुख पाते हैं माता और पिता को भी हम श्रद्धा सुमन चढ़ाते हैं। नव संतति को देख देख हम बचपन अपना याद करें, और यादों में ही तो अपना स्वर्णिम अतीत दुहराते हैं। जीवन आधारित यादों पर मुर्दा बनते बिन यादों के, करते याद राम कृष्ण की जीवन लीला गाते हैं। कौन अभागा बिन यादों के जीवन यापन करता है, जाने कितने महाकाव्य भी यादों पर बन जाते हैं। जीवन चक्र बिना यादों के पूरा नहीं कभी होता है, यादों की एकांत याद में मंद मंद मुस्काते हैं। भूले रहे जमाने भर को जीवन हमने व्यर्थ किया, अपनों की यादों में ही तो रोते और बिलखते हैं। हर्षित हो जाता है तन मन सुखद याद जब करते हैं, जाने कितने रहे अभागे अब भी यादों में ही रोते हैं। ******

  • बेटी की योग्यता

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव राजकिशोर जी के घर इन दिनों जैसे वसंत उतर आया था। आंगन में रखे गमलों के फूल भी जैसे कुछ अधिक खिले-खिले लगते थे और घर की दीवारें भी मुस्कुरा रही थीं। आखिर मुस्कुराएँ भी क्यों न - इकलौती बेटी के लिए एक सुयोग्य, सरकारी अफसर दामाद जो मिल रहा था, वह भी बिना किसी लेन-देन के। शादी सादगी से होनी थी, खर्च की चिंता नहीं, समाज में प्रतिष्ठा अलग से। राजकिशोर जी को लगता था जैसे उन्होंने जीवन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सहज ही पूरी कर ली हो। वे जहां भी जाते, छाती गर्व से चौड़ी हो जाती - “हमारी बेटी की शादी एक अफसर से तय हुई है।” रिश्तेदारों के फोन, बधाइयाँ, तैयारियों की चर्चाएँ… घर में हर दिन एक छोटे से उत्सव जैसा था। धीरे-धीरे शादी की तारीख पास आने लगी। दोनों परिवारों का आना-जाना बढ़ गया। कभी लड़के वाले चाय पर आते, कभी राजकिशोर जी बेटी के साथ वहाँ जाते। हंसी-मजाक, भविष्य की योजनाएँ, शादी की सूची - सब कुछ सुचारु रूप से चल रहा था। अब तो बस एक महीना ही शेष था। उसी शाम, जब राजकिशोर जी ऑफिस से लौटकर थके कदमों से सोफे पर बैठे ही थे और पत्नी ने चाय का कप उनके हाथ में थमाया था, तभी मोबाइल की घंटी बजी। स्क्रीन पर नाम चमका - “राम श्रेष्ठ जी। उन्होंने मुस्कुराते हुए फोन उठाया - “नमस्कार समधी जी!” औपचारिक बातें हुईं, पर अगले ही क्षण जो शब्द उनके कानों में पड़े, उन्होंने जैसे उनके पैरों तले से जमीन खींच ली। चेहरा पीला पड़ गया, हाथ कांपने लगे, चाय का कप मेज पर रखते-रखते छलक गया। राम श्रेष्ठ जी की आवाज़ में कठोरता कम, गंभीरता अधिक थी - “समधी जी, हमें यह रिश्ता आगे बढ़ाना उचित नहीं लग रहा…” राजकिशोर जी को लगा शायद उन्होंने गलत सुना है। “क्या कह रहे हैं आप? कोई भूल हुई क्या?” उधर से शांत किंतु स्पष्ट स्वर आया - “आपने हमें बेटी की शैक्षणिक योग्यता के प्रमाणपत्र दिखाए, हमें खुशी भी हुई। पर हम केवल डिग्री नहीं, संस्कार भी देखना चाहते थे। पिछले दो महीनों में मैं तीन-चार बार आपके घर अलग-अलग समय पर आया। कभी सुबह, कभी दोपहर, कभी शाम। हर बार मैंने समधन जी को घर के कामों में व्यस्त पाया - कभी रसोई में, कभी कपड़े धोते, कभी झाड़ू-पोंछा करते। कभी-कभी वे थकी हुई भी दिखीं। लेकिन… मैंने आपकी बेटी को कभी उनकी मदद करते नहीं देखा।” कुछ क्षणों की चुप्पी के बाद वे आगे बोले - “समधी जी, हमें अपने घर के लिए बहू चाहिए, कोई सजावटी गुड़िया नहीं। हमें ऐसी लड़की चाहिए जो हमारे परिवार का हिस्सा बने, सास को मां माने, घर की जिम्मेदारियों को समझे। जो लड़की अपनी मां का बोझ हल्का नहीं कर सकती, वह हमारे घर में आकर कैसे निभा पाएगी? हमें डर है कि आपकी बेटी हमारे वातावरण में स्वयं को ढाल नहीं पाएगी। इसलिए हम यह रिश्ता यहीं समाप्त करना चाहते हैं।” फोन कट गया। कमरे में सन्नाटा छा गया। पत्नी ने घबराकर पूछा - “क्या हुआ?” राजकिशोर जी के पास शब्द नहीं थे। उनकी आंखों के सामने जैसे वर्षों की परवरिश घूमने लगी - बेटी को कभी कोई काम न करने देना, “पढ़ाई पर ध्यान दो”, “तुम्हें इन सब में पड़ने की जरूरत नहीं”, “हम हैं न” - इन वाक्यों की गूंज उनके भीतर उठने लगी। वे समझ गए थे कि उन्होंने अपनी बेटी को डिग्रियाँ तो दीं, पर जीवन का व्यावहारिक पाठ नहीं सिखाया। उसे हर सुविधा दी, पर जिम्मेदारी का एहसास नहीं कराया। उस रात घर में किसी ने भोजन ठीक से नहीं किया। बेटी भी सब समझ चुकी थी। उसकी आंखों में आंसू थे - शायद पहली बार उसे एहसास हुआ कि जीवन केवल सजने-संवरने, पढ़-लिख लेने और ऊँचे सपने देखने का नाम नहीं; जीवन साझेदारी, सहानुभूति और जिम्मेदारी का भी नाम है। दोस्तों, यह कहानी केवल राजकिशोर जी के घर की नहीं, हमारे समाज के अनेक घरों की सच्चाई है। हम अपनी बेटियों को पढ़ाते हैं, उन्हें आत्मनिर्भर बनाते हैं - जो नितांत आवश्यक है - परंतु साथ ही हमें उन्हें जीवन-कौशल, सहानुभूति, परिवार की समझ और सहभागिता का भी पाठ पढ़ाना चाहिए। बेटी हो या बेटा - घर के छोटे-बड़े कामों में हाथ बंटाना, बड़ों का सम्मान करना, जिम्मेदारियों को समझना - ये गुण ही व्यक्ति को संपूर्ण बनाते हैं। अत्यधिक लाड़-प्यार कभी-कभी बच्चों को जीवन की वास्तविकताओं से दूर कर देता है। इसलिए हर माता-पिता से निवेदन है - अपनी संतान से प्रेम अवश्य करें, पर उसे इतना सक्षम भी बनाएं कि वह जहां जाए, वहां केवल अपने सपनों को ही नहीं, रिश्तों को भी निभा सके। क्योंकि जीवन में केवल योग्यताएँ नहीं, संस्कार ही स्थायी सम्मान दिलाते हैं। ******

  • अंजाने रिश्ते

    डॉ मंजु सैनी   एक अनजाना सा रिश्ता मन का मीत बना और फिर बिछुड़ गया एक नश्तर बन मेरे जीवन में साथ निभाने की जो बातें हुईं छोड़ गया यूँ ही क्षण भर में आज नश्तर से चुभते हैं नासूर बन छोड़ गए चिह्न जीवंत हूँ तो टीसता हैं वो दर्द नजर अंदाज करती हूँ फिर भी खामोश रह जाती हूं सोचकर शायद यही किस्मत में लिखा है बस गया था सांसों में मानो रह नही पाऊँगी उस बिन पर चल रही हैं जिंदगी यूं ही अकेले सफर में चलते चलते ही रह गया हैं मात्र यादो का कारवां शायद कभी होगा मेरी यादों को उसका सही मुकाम मुक्ति यदों से न रहूँ कभी मैं प्रतीक्षारत उस अंजाने से रिश्ते से मुक्त *****

  • कद्दू की तीर्थयात्रा

    हमारे यहाँ तीर्थ यात्रा का बहुत ही धार्मिक व संस्कारिक महत्त्व है। पहले के समय तीर्थ यात्रा में जाना बहुत कठिन कार्य माना जाता था। तीर्थ यात्रियों द्वारा पैदल या बैलगाड़ी में यात्रा की जाती थी। यात्रा में थोड़े-थोड़े अंतर पर रुकना होता था। विविध प्रकार के लोगों से मिलना जुलना होता था, समाज का दर्शन होता था। विविध बोली और विविध रीति-रीवाज से तीर्थ यात्रियों का परिचय होता था। कई कठिनाईओं से गुजरना पड़ता, तो कई प्रकार के अनुभव भी प्राप्त होते थे। एकबार तीर्थ यात्रा पर जानेवाले लोगों के संघ ने एक संत जी के पास जाकर उनके साथ चलने की प्रार्थना की। सोचा कि संत के साथ होने से यात्रा का महत्व दो गुना हो जाएगा। संत जी ने यात्रा पर जाने में अपनी असमर्थता बताई। उन्होंने तीर्थ यात्रियों को एक कड़वा कद्दू देते हुए कहा, “किन्ही कारणों वश, मैं तो आप लोगों के साथ जा नहीं सकता लेकिन आप इस कद्दू को साथ ले जाईए और जहाँ-जहाँ भी स्नान करें, इसे भी उस पवित्र जल में स्नान करा लाये आपकी महान कृपा होगी।” लोगों ने संत के गूढार्थ पर गौर किये बिना ही वह कद्दू ले लिया और जहाँ-जहाँ गए, स्नान किया, वहाँ-वहाँ कद्दू को भी स्नान करवाया, मंदिर में जाकर दर्शन किया तो कद्दू को भी दर्शन करवाया और ऐसा कर उन्होंने संत की आज्ञा का अनुपालन किया। ऐसे यात्रा पूरी कर सब वापस आए और उन लोगों ने वह कद्दू संतजी को वापस दिया। संतजी ने सभी यात्रियों को अपने आश्रम में प्रीतिभोज पर आमंत्रित किया। तीर्थ यात्रियों को विविध पकवान परोसे गए। तीर्थ में घूमकर आये हुए कद्दू की सब्जी विशेष रूप से बनवायी गयी। सभी यात्रियों ने खाना शुरू किया और सबने कहा कि “यह सब्जी तो कड़वी है।” संतजी ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि “यह सब्जी तो उसी कद्दू से बनी है, जो तीर्थ स्नान कर आया है। बेशक यह तीर्थाटन के पूर्व कड़वा था, मगर तीर्थ दर्शन तथा स्नान के बाद भी इस में कड़वाहट तो पहले जैसी ही बनी हुई है।” यह सुन कर सभी यात्रियों को अपनी गलती का बोध हो गया कि ‘हमने तीर्थाटन किया है लेकिन अपने मन एवं स्वभाव को सुधारा नहीं तो तीर्थयात्रा का कोई मूल्य नहीं है। हम भी इस कड़वे कद्दू जैसे कड़वे रहकर वापस आये हैं।’ सार - जब तक हमारे व्यवहार व सोच में परिवर्तन नहीं होता है हमारी तीर्थ यात्रा अधूरी ही मानी जाती है। संस्कारों में आधारभूत परिवर्तन ही तीर्थ यात्रा का वास्तविक प्रतिफल है।

  • मैं शिव हो गया हूँ।

    मुकेश ‘नादान’ संन्यासी होने की साथ उन्हें बचपन से ही थी। एक दिन एक गेरुए वत्र को लपेटकर वे घूमने निकल रहे थे। यह देखकर माँ ने पूछा, "यह क्या रे?" वरिश्वर ने उल्लासपूर्वक ऊँचे स्वर में कहा, "मैं शिव हो गया हूँ।" उनमें ध्यान-प्रवणता भी थी। चड़ों के मुँह से उन्होंने सुना था कि ध्यान में निमग्न ऋषि-मुनियों की जटा बढ़कर धरती को छूने लगती है और धीरे-धीरे बरगद के पेड़ की जटा की तरह धरती में घुस जाती है। सरल हृदय बालक वीरेश्वर ध्यान में बैठते और बीच-बीच में आँख खोलकर देखते कि उनकी जटा जमीन में प्रवेश कर गई है या नहीं। जब वे देखते कि वैसा नहीं हुआ है, तब दौड़ते हुए जाकर माँ से कहते, "माँ, ध्यान तो किया, जटा बड़ी कहाँ हुई?" माँ समझाती, "एकाध घंटा या एकाध दिन में नहीं होती, कई दिन लगते हैं।" घर के सब लोग देखते थे, वीरेश्वर इसी तरह कभी अकेले अथवा कभी पड़ोस के बालकों के साथ ध्यान में बैठकर समय का ज्ञान खो बैठता है और अपने भाव में इस प्रकार तन्मय हो जाता है कि पुकारने पर कोई उत्तर नहीं मिल पाता। एक दिन नरेंद्र सीढ़ी वाले कमरे में घर की छत पर थे, इसी प्रकार ध्यान का खेल चल रहा था। अचानक एक लड़के ने देखा कि घर में एक भयंकर साँप है। वह भय से चिल्ला उठा और वीरेश्वर को छोड़कर सभी लड़के घर से बाहर निकल भागे। लेकिन वीरेश्वर तब भी ध्यान में मग्न कम-चेतना से शून्य बैठा रहा। साथियों द्वारा शोरगुल करते हुए बार-बार पुकारने पर भी कोई उत्तर नहीं मिला। तब भयभीत ही झटपट दौड़कर बड़े-बुजुरगों को बुला लाए। उन लोगों ने आकर वह भयावह दृश्य देखा, आँखें मूंदकर बालक बैठा है। उसके सामने विषेला साँप फन फैलाए डोल रहा है। यह देखकर सबके प्राण सूख गए, साँसे थम गई। आवाज करने पर साँप बालक का अनिष्ट कर सकता है, इस भय से निरुपाय हो सभी चुपचाप खड़े रहे। थोड़ी देर बाद वह विषधर स्वयं ही चला गया। इसके बाद चैतन्य होने पर वीरेश्वर ने सबकुछ सुना, किंतु बोला, "मुझे तो कुछ पता ही नहीं चला।" *****

  • असमय की एक कविता

    सन्दीप तोमर   आजकल एकदम खाली हूँ इतना खाली कि मेरे हिस्से कोई काम ही नहीं बचा, कभी समय मुझ पर हँसता है कभी मैं समय पर और यह भी क्या इत्तेफाक़ है मेरा समय सापेक्ष होना मुझे निरपेक्षता का सिद्धान्त समझा रहा है वैसे न समय मेरे साथ है और न ही मैं ही समय के साथ जो लोग समय की रट लगा दुहाई देते थे अब पास नहीं फटकते, मौत का खौफ कभी रहा नहीं आज भी नहीं है लेकिन मैंने देखा है करीब से मौत को एक नहीं, तीन-तीन बार लोगों ने कहा कि मृत्यु ही सत्य है लेकिन सत्य तो जीवन ही है ऐसा न होता तो सब जीने को लालायित न होते हाँ, आज मैं महसूस कर रहा हूँ मौत को भी उतने ही करीब से जीतने करीब से जीवन को देखा मेरी बैशाखी की टक-टक की आवाज करीब आती मौत का बुलावा है  मौत ने बना लिया है एक ओरा मेरे इर्द-गिर्द, कहते हैं- सात ऊर्जा स्तर है जो मेरुदंड के गिर्द ऊर्जा चक्र की तरह रहते हुए सुरक्षारत हैं ये इंद्र्धानुषी रंगों से शुद्ध और चमकदार बन स्वस्थ रखते तो कभी चमकविहीन हो करते बीमार भी अगर ऐसा है तो फिर इंतजार किया जा सकता है एक बार फिर से मौत का चेहरा, पीठ, जुबान सब कुछ ही तो अब समय की छाप दिखा चिढ़ा रहे हैं पल-पल मौत से पहले कुछ काम कर लेना चाहता हूँ इस खाली समय में कब से गाँव नहीं गया बचपन के दोस्त, खेल, प्रेम, झगड़ा सब पर सोचने का ये माकूल वक़्त है बहुत से हिसाब-किताब हैं जो अब चुकता कर लेने चाहिए, एक इच्छा थी कि जब कभी खाली समय होगा दिन भर मदिरा पान करूंगा वक़्त है लेकिन प्याला नसीब कहाँ साकी और हमप्याला भी नहीं कोई, एक अरसा हुआ जब खरीदी थी कुछ और किताबें बंडल पड़ा है लाइब्रेरी की किसी दराज में सोचता हूँ- उन्हें निकाल सजा दूँ हर सफ़े में ट्रोफियों पर भी तो जम गया है धूल का एक पूरा अम्बार जिन पर लिखी उपलब्धियां अब पढ़ नहीं पाता  खाली समय में मौत का इंतज़ार करना कितना असहज कर रहा ज़िंदगी के बेतरतीब पन्ने खुल रहे हैं   मैं पढ़ लेना चाहता हूँ हर वो पन्ना जिसे पढ़ने का वक़्त ही नहीं मिला कभी, कुछ दोस्त जो छोड़ गए हैं साथ उनको याद कर लेना या फिर उस व्यक्ति पर दया दिखाना जिसकी बीवी छोड़ गयी चार बच्चों को उसके भरोसे, पानी का घड़ा भी तो बदलना है जो पिछली गर्मी में भी रिस रहा था टपकती छत की मरम्मत भी लाजिमी है बूढ़े हो चुके पिता का हाल भी तो नहीं पूछा एक अरसे से उनकी दवा का पर्चा भी चिढ़ाता है, बचपन की सहेली का हाल-समाचार भी जानना है, मौत से पहले का समय अचानक कितना अहम लगने लगा है मैं इसका भरपूर उपयोग कर लेना चाहता हूँ। ******

  • ईश्वर की कृपा

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव एक आश्रम में संतों की विशाल सभा लगी हुई थी। भजन, प्रवचन और शांति का वातावरण चारों ओर फैला था। किसी श्रद्धालु ने प्रेम से एक नया मिट्टी का घड़ा लाकर उसमें गंगाजल भर दिया और सभा के बीच रख दिया, ताकि जब भी किसी संत को प्यास लगे, वह गंगाजल ग्रहण कर सकें। सभा के बाहर खड़ा एक व्यक्ति उस घड़े को बड़े ध्यान से देख रहा था। उसके मन में विचारों की लहरें उठने लगीं—“वाह! कितना भाग्यशाली है यह घड़ा! न किसी तालाब का पानी, न किसी कुएँ का… इसमें तो गंगाजल भरा है। और वह भी संतों की सेवा के लिए! कितनी ऊँची किस्मत है इसकी… काश! मेरा जीवन भी ऐसा होता।” उसके मन की बात मानो घड़े ने सुन ली। और अचानक जैसे वह बोल पड़ा—“बंधु, जिस भाग्य की तुम प्रशंसा कर रहे हो, उसकी कहानी सुनोगे तो चौंक जाओगे।” व्यक्ति विस्मित रह गया। घड़ा अपनी कथा कहने लगा—“मैं कभी यूँ पूजनीय नहीं था। मैं तो बस मिट्टी था… पैरों तले रौंदी जाने वाली, किसी काम की नहीं समझी जाने वाली मिट्टी। एक दिन कुम्हार आया। उसने फावड़े से मुझे खोदा। मुझे लगा—यह कैसा अन्याय! शांति से पड़ा था, क्यों उखाड़ दिया? फिर उसने मुझे गधे पर लादा। धूल, धूप, झटके—सब सहता हुआ मैं उसके घर पहुँचा। वहाँ उसने मुझे रौंदा… पानी डालकर गूंथा… चाक पर चढ़ाकर तेज़ी से घुमाया। मेरा सिर काटा, थपकी देकर आकार दिया। मैं चीख भी नहीं सकता था, बस सहता रहा। पर असली परीक्षा अभी बाकी थी। मुझे भट्टी की आग में झोंक दिया गया। चारों ओर आग ही आग… ऐसा लगा अब सब समाप्त हो जाएगा। मैं भीतर-ही-भीतर पुकारता रहा—‘हे ईश्वर! यह कैसा न्याय है? एक के बाद एक कष्ट क्यों?’ आग से निकला तो सोचा अब शांति मिलेगी। पर नहीं—मुझे बाजार भेज दिया गया। लोग मुझे ठोक-ठोककर देखते, परखते। और अंत में मेरी कीमत लगाई—बस बीस-तीस रुपये! मैं टूट चुका था। मुझे लगता था, ईश्वर ने मेरे हिस्से में बस पीड़ा ही लिखी है। फिर एक दिन, एक सज्जन मुझे खरीदकर ले गए। मुझे धोया गया, साफ किया गया, और मुझमें गंगाजल भरकर संतों की सभा में रख दिया गया। उसी क्षण मुझे समझ आया—कुम्हार का फावड़ा भी कृपा थी। उसका रौंदना भी कृपा थी। चाक की चक्कराती गति भी कृपा थी। भट्टी की आग भी कृपा थी। और बाजार की ठोकरें भी कृपा ही थीं। यदि मैं उस मिट्टी से गुजरकर यह घड़ा न बना होता, तो आज संतों की सेवा का सौभाग्य कैसे मिलता?” घड़ा शांत हो गया। वह व्यक्ति गहरी सोच में डूब गया। हमारे जीवन में भी जब कठिनाइयाँ आती हैं, तो हम अक्सर सोचते हैं—“भगवान मेरे साथ ही ऐसा क्यों कर रहे हैं?” पर सच यह है कि हर परीक्षा, हर पीड़ा, हर ठोकर—हमें गढ़ रही होती है। हम भविष्य नहीं देख पाते, इसलिए ईश्वर की योजना को समझ नहीं पाते। जिस तरह आप अपनी गाड़ी किसी अनाड़ी को नहीं सौंपते, वैसे ही ईश्वर भी अपनी विशेष कृपा उस व्यक्ति को सौंपते हैं जो भीतर से परिपक्व हो चुका हो। कठिन समय ईश्वर की दूरी नहीं, बल्कि उनकी तैयारी का समय होता है। किसी को फल जल्दी मिलता है, किसी को देर से—पर जो धैर्य रखता है, सत्य और न्याय के मार्ग पर अडिग रहता है, वह अंततः सफल होता है। तो क्या करें जब जीवन की भट्टी तपाने लगे? संतोष का मार्ग अपनाएँ। जो मिला है, वह भी बहुत है—यह भाव आते ही मन हल्का हो जाता है। दुनिया का सबसे सुखी व्यक्ति वह है, जो तुलना नहीं, कृतज्ञता में जीता है। हम हमेशा उसे देखते हैं जिसके पास हमसे ज्यादा है, कभी यह भी देखिए—कितने लोग ऐसे हैं जिन्हें वह भी नहीं मिला जो आपके पास है। याद रखिए—हम अभी मिट्टी हैं या भट्टी में तप रहे हैं, यह अंत नहीं है। शायद ईश्वर हमें भी किसी बड़ी सेवा के लिए तैयार कर रहे हों। और जब वह क्षण आएगा, तब समझ में आएगा—सब कुछ… सचमुच सब कुछ…ईश्वर की कृपा ही थी। ******

  • सबसे बड़ा धन

    रामकिशोर वर्मा एक समृद्ध गाँव में एक सेठ रहता था। हवेली ऊँची, तिजोरियाँ भरी हुई, नौकर-चाकरों की कतार लगी रहती थी। धन की कोई कमी नहीं थी। लेकिन उस सेठ के जीवन में एक बड़ी कमी थी—परिश्रम की। वह इतना आलसी था कि पानी का गिलास भी खुद उठाकर नहीं पीता था। सुबह देर तक सोना, दिन भर बिस्तर पर पड़े रहना, रात को दावतें और ऐशो-आराम—बस यही दिनचर्या थी। उसे गर्व था—“मेरे पास पैसा है। मैं सब खरीद सकता हूँ। लोग मेरे लिए काम करने को तैयार हैं। मुझे मेहनत की क्या जरूरत?” धीरे-धीरे उसका शरीर भी उसकी सोच जैसा हो गया—ढीला, बोझिल और निष्क्रिय। कहते हैं, प्रकृति देर से ही सही, लेकिन जवाब जरूर देती है। कुछ वर्षों बाद सेठ को महसूस होने लगा कि उसका शरीर साथ छोड़ रहा है। हाथ-पैरों में जकड़न… चलने में तकलीफ… साँस फूलना… वह घबरा गया। तुरंत शहर से बड़े-बड़े डॉक्टर बुलाए गए। दवाइयाँ आईं, इंजेक्शन लगे, जाँचें हुईं। तिजोरी खुलती गई, पर सेहत नहीं लौटी। अब सेठ की आँखों में डर था—“धन है, पर शरीर साथ नहीं दे रहा… तो इस दौलत का क्या अर्थ?” उसी समय एक दिन गाँव से एक साधु गुजर रहे थे। उन्होंने सेठ की बीमारी के बारे में सुना। साधु ने सेठ के नौकर से कहा—“कह दो अपने मालिक से, यदि वह चाहे तो मैं उसका उपचार कर सकता हूँ।” नौकर भागा-भागा सेठ के पास पहुँचा। सेठ ने तुरंत संदेश भेजा—“साधु महाराज को आदर सहित यहाँ लाओ।” पर उत्तर आया—“यदि सेठ को स्वस्थ होना है, तो उसे स्वयं मेरे पास आना होगा।” यह सुनकर सेठ सन्न रह गया। वह तो ठीक से चल भी नहीं सकता था। पर जब कोई और उपाय न बचा, तो उसने हिम्मत जुटाई। नौकरों के सहारे, लाठी टेकते हुए, बड़ी कठिनाई से साधु के बताए स्थान पर पहुँचा। पर वहाँ कोई नहीं था। निराश होकर वह लौट आया। अगले दिन फिर संदेश आया—“कल आना।” सेठ फिर गया—साधु फिर नहीं मिले। यह सिलसिला रोज़ चलने लगा। साधु बुलाते, सेठ जाता—और खाली हाथ लौट आता। पहले तो उसे क्रोध आया। फिर निराशा हुई। फिर… आदत हो गई। धीरे-धीरे तीन महीने बीत गए। और एक दिन सेठ को एहसास हुआ—उसके कदम अब पहले से मजबूत हैं। हाथ-पैर कम जकड़े हुए लगते हैं। साँस कम फूलती है। वह अब सहारे के बिना कुछ दूर चल लेता था। उसी दिन साधु सामने आ खड़े हुए। मुस्कुराकर बोले—“कैसा है शरीर अब?” सेठ ने झुककर प्रणाम किया। “महाराज… मैं समझ गया। आपने मुझे दवा नहीं दी, चलना सिखाया है। आपने मुझे परिश्रम की औषधि दी।” साधु बोले—“बेटा, धन से सब कुछ खरीदा जा सकता है—पर स्वास्थ्य नहीं। तिजोरी में रखे सिक्के शरीर को शक्ति नहीं देते। परिश्रम ही असली दवा है। याद रखो—स्वस्थ शरीर से बड़ा कोई धन नहीं होता।” उस दिन के बाद सेठ बदल गया। वह अब सुबह सूर्योदय के साथ उठता, टहलता, खेतों में जाता, काम में हाथ बँटाता। तिजोरी पहले भी भरी थी—पर अब जीवन भी भरा हुआ था। शिक्षा : मित्रों, धन कमाना बुरा नहीं है। पर यदि शरीर ही साथ न दे, तो धन व्यर्थ है। इसलिए कमाइए जरूर—पर अपने स्वास्थ्य की कीमत पर नहीं। क्योंकि पैसा पूंजी हो सकता है, पर स्वस्थ शरीर ही असली संपत्ति है। ******

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