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  • समय-प्रबंधन

    डॉo कृष्ण कांत श्रीवास्तव इस संसार में मौसम आते हैं और जाते हैं, मनुष्य आते हैं और जाते हैं, समाज बनता है और बिगड़ता है, पर समय बिना रुके सदा चलता रहता है। समय को कोई पकड़ नहीं सकता। हम जितना उसके पीछे दौड़ते हैं वह उतना ही आगे भाग जाता है। यह बहुत बड़ी विडंबना है कि हम समय का महत्व जानते हुए भी उसे व्यर्थ के कार्यों में जाया करते रहते हैं। समय-प्रबंधन की असमर्थता ही इसका मूल कारण है। हम यह भूल जाते हैं कि जीवन-प्रबंधन के लिए, व्यक्तित्व निर्माण के लिए और कार्यक्षेत्र में सफलता के लिए समय का प्रबंधन अति आवश्यक है। इसके अभाव में हमारे जीवन पर अस्त-व्यस्तता हावी हो जाती है। अच्छा समय प्रबंधन हमारे जीवन में सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है। जीवन में कुछ भी करने के लिए समय की आवश्यकता होती है। आप कितने भी कुशल, महान, समृद्ध या प्रसिद्ध व्यक्ति क्यों ना हो परंतु समय का कोष सभी के लिए सीमित रहता है। आपको अपने जीवन में जो कुछ भी करना है, जितनी भी समृद्धि प्राप्त करनी है, या जितना भी नाम कमाना है, सब दिन के इन्हीं 24 घंटों के भीतर करना है। इतने समय में ही आपको सभी आवश्यक, अप्रत्याशित, व्यक्तिगत, व्यावसायिक, पारिवारिक, सामाजिक, मनोरंजक, स्वास्थ्यवर्धक आदि कार्य अपने आवश्यकतानुसार पूरे करने होते हैं। हम अपने समय पर शत-प्रतिशत नियंत्रण तो नहीं कर सकते, परंतु प्रभावी रूप से समय का सदुपयोग करने की आदत डालकर अपनी कार्य-क्षमता को और अधिक विकसित कर सकते हैं। इसलिए समय का बेहतर प्रबंधन अति आवश्यक है। जो मनुष्य अपने समय को बेहतर तरीके से व्यवस्थित कर लेते हैं, वहीं जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त कर सकते हैं। समय, सभी के लिए निःशुल्क होता है, न कोई कभी इसे बेच सकता है, न खरीद सकता है। समय अबंधनीय है, अर्थात् कोई भी इसकी सीमा निर्धारित नहीं कर सकता है। यह समय ही है, जो सभी को अपने चारों ओर नचाता है। अपने जीवन में कोई न तो इसे हरा सकता है, और न इससे जीत सकता है। समय को इस संसार में सबसे ताकतवर वस्तु कहा जाता है, जो किसी को भी नष्ट या सुधार सकता है। समय जीवन में अन्य सभी वस्तुओं से अधिक शक्तिशाली और अमूल्य होता है। हम धन को तो एकबार खो कर दुबारा प्राप्त कर सकते हैं परंतु समय को खो कर किसी भी साधन से दुबारा प्राप्त नहीं कर सकते। इसकी क्षमता को हम माप नहीं सकते, क्योंकि जीवन में कभी-कभी जीतने के लिए एक पल ही काफी होता है और कभी-कभी इसके लिए पूरा जीवन लग जाता है। कोई पल व्यक्ति को अमीर बना देता है और कोई गरीब। जीवन और मृत्यु के बीच भी केवल एक पल का ही फासला होता है। समय सर्वदा हमारे लिए स्वर्णावसर लाता है, बस आवश्यकता है, उसके संकेतों को समझ कर तदानुसार कार्य करने की। यदि आप समय की महत्ता को नहीं समझते तो निश्चित मानिए समय भी आपको अहमियत नहीं देगा। समय के साथ वस्तुएं जन्म लेती हैं, बढ़ती हैं, घटती हैं और नष्ट हो जाती हैं। लोग सोचते हैं कि जीवन कितना लम्बा है परंतु सत्य तो यह है कि जीवन क्षणिक है और जीवन में करने के लिए कार्य बहुत हैं। हमें अपने जीवन का हरेक पल उचित और अर्थपूर्ण ढंग से बिना नष्ट किए उपयोग करना चाहिए। जीवन में सफलता का पहला कदम उत्तम समय-प्रबंधन ही है। जिस व्यक्ति ने अपने समय का उचित प्रयोग करना सीख लिया, सच मानिये उसने अपनी कामयाबी का पहला अध्याय लिख लिया। जो अपने समय की व्यवस्था ठीक से नहीं कर सकता, वह हर क्षेत्र में विफल हो जाता है। कुशल समय-प्रबंधन आपकी उत्पादकता बढ़ाता है, काम की गुणवत्ता सुधारता है और तनाव कम करने में भी मदद करता है। अपने निश्चित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बनाई गई, समय की सुनियोजित योजना, समय-प्रबंधन कहलाती है। यह आपको अपनी हर गतिविधि को एक निश्चित समय में पूरा करने की कला सिखाती है। समाज के सभी क्षेत्रों में कार्यरत व्यक्तियों के लिए समय-प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है। आप ग्रहणी हैं और आप अपनी रुचि अनुरूप कार्यों में समय व्यतीत करना चाहती हैं, आप छात्र हैं और उच्च शिक्षा में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं, आप व्यापारी हैं और व्यापार को देश-विदेश तक फैलाना चाहते हैं, आप वैज्ञानिक हैं और बड़े-बड़े अनुसंधान करना चाहते हैं, आप खिलाड़ी हैं और खेल में उच्च पदक प्राप्त करना चाहते हैं अर्थात आप किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करना चाहते हों, समय-प्रबंधन आपको अपना लक्ष्य प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। अच्छे समय-प्रबंधन के लिए आपको अपनी कार्य-विधि में अमूल-चूक परिवर्तन करना चाहिए। आपको अपनी हर गतिविधि का उद्देश्य केवल लक्ष्य प्राप्ति ही निर्धारित करना चाहिए। व्यस्त रहने का यह अर्थ कदापि नहीं है कि आप लक्ष्य को प्राप्त ही कर लेगें। अक्सर लक्ष्य से चूकने वाले ये दुहाई देते हैं, कि हमने कोशिश की पर क्या करे समय कम था। यदि आप वैज्ञानिक विधि अनुसार कार्य नहीं करते हैं तो समय कितना भी हो वह हमेशा कम ही पड़ेगा। अतः आप समय-प्रबंधन की तकनीकों का उपयोग करके, अपने कार्य को और अधिक प्रभावी ढंग से पूर्ण करने की क्षमता प्राप्त कर सकते हैं। जीवन का प्रत्येक क्षण, ईश्वर का दिया हुआ अनमोल तोहफा है। इसे पहचानकर और समय के साथ अनुशासित हो कर चलना प्रारंभ करें। बीता समय, खर्च किए गए धन के समान कभी वापस नही आता। भविष्य का समय अपने नियंत्रण में नहीं होता, वह तो ईश्वर द्वारा ही निर्धारित किया जाता है। केवल वर्तमान समय ही हमारे पास कार्य करने हेतु उपलब्ध है। अतः हमारे लिए हितकर होगा कि हम समय का अधिकतम सदुपयोग करके लाभ उठाएँ और व्यर्थ के कार्यों में इसे नष्ट ना करें। समय-प्रबंधन के लिए सबसे पहले यह विचार कीजिए कि हमारा समय व्यर्थ किन कार्यों में हो जाता है। हम पाएंगे कि नियोजन की कमी, दूसरों को कार्य न सौंप पाने की इच्छा शक्ति की कमी,  ईर्ष्या,  घृणा,  क्रोध, जैसी कई निजी समस्याएं और अन्य तरह-तरह की बाधाएं, हमारा बहुत-सा समय बरबाद कर देती हैं। इसके अतिरिक्त,  कुछ समय पूर्वाग्रहों,  निर्भरताओं,  लगाव-झुकाव,  अति ममत्व,  चिंता और तनाव के हवाले भी हो जाता है। इन से बचने के लिए और बेहतरीन समय-प्रबंधन के लिए नीचे दिए गए कुछ सुझावों पर अमल करने का प्रयास कीजिए। संभव है, आप इन प्रयासों का सफलतापूर्वक अभ्यास कर अपने समय का बेहतरीन उपयोग कर सकने में समर्थ हो सकें। आप रात्रि में सोने से पूर्व, अगले दिन के कार्यों की रूपरेखा अवश्य तैयार कर लें। इसका परिणाम यह होगा कि आप अगले दिन किये जाने वाले संपूर्ण कार्यों से पूर्व परिचित होंगे और दिन का प्रत्येक पल आपकी योजना अनुरूप ही व्यतीत होगा। प्रत्येक कार्य को उसकी उपयोगिता के अनुसार निश्चित समय सीमा के भीतर पूर्ण कर लेने की योजना निर्धारित करें। एक कार्य के लिए निर्धारित समय को दूसरे कार्य के लिए उपयोग ना करें। यह जान लें कि आप किसी भी दशा में अपनी क्षमता से अधिक कार्य नहीं कर सकते और आपको ऐसा करना भी नहीं चाहिए। इससे आपकी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। यदि बीच में कोई अतिरिक्त कार्य आ जाता है, जिससे आपका चल रहा काम बाधित हो रहा हो तो उसे करने से मना करें या उसके लिए कोई अन्य उपयुक्त समय आवंटित करें। कार्य पूर्ण करने की समय सीमा को वास्तविकता के आधार पर निर्धारित करें। कार्य को जल्द समाप्त कर देने के उद्देश्य से कम समय में पूर्ण करने का प्रयास ना करें। इससे ना केवल कार्य की गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ेगा बल्कि आप पर भी कम समय में अधिक कार्य करने का अतिरिक्त बोझ आ पड़ेगा। समय प्रबंधन का मूलभूत सूत्र यह है कि आप भूलकर भी आज का कार्य कल पर न टालें। कबीर दास जी ने कहा भी है कि :- काल करे सो आज कर, आज करे सो अब। पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगो कब।। अर्थात जो आज का कार्य है, उसे आज ही समाप्त कर देना चाहिए, क्योंकि अगले पल का कोई भरोसा नहीं है। अगर हम आज का काम कल पर टालते जायेंगे तो कल के लिए बहुत सारा काम एकत्रित हो जायेगा। तब इसे समय पर पूर्ण करना असंभव होगा। कार्य क्षेत्र में, घड़ी अवश्य अपने साथ रखें। ख्याल रखें कि आपको अपना कार्य समय-सारणी अनुसार ही पूरा करना है। गांधीजी भी अपने पास एक घड़ी हमेशा रखते थे और इसी के अनुसार अपना प्रत्येक कार्य निर्धारित समय पर पूर्ण करते थे। अतः अच्छे समय प्रबंधक के पास घड़ी का रहना अत्यंत आवश्यक है। एक समय पर सिर्फ एक कार्य पर ही अपना ध्यान केंद्रित कीजिए। एक साथ कई कार्य प्रारंभ कर देने पर कभी-कभी कोई भी कार्य समय पर पूर्ण नहीं होता, साथ ही कार्य की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। कार्य के वक्त समय बर्बाद करने वाले कार्यों जैसे: व्हाट्सएप पर मैसेज करना, फेसबुक पर पोस्ट करना, ट्विटर पर ट्वीट करना इत्यादि से बचने का प्रयास करना चाहिए। इन सभी कार्यों के लिए अलग से कोई एक समय निर्धारित कर लीजिए। क्योंकि इन कार्यों में उलझ कर आप दिग्भ्रमित हो जाएंगे और अपने लक्ष्य को निश्चित समय पर प्राप्त नहीं कर पाएंगे। कुशलतापूर्वक समय प्रबंधन किसी व्यक्ति के महान गुणों को प्रदर्शित करती है। ऐसे व्यक्ति सीमित समय में कामयाबी की ऊंचाइयों को छू लेते हैं। समय-प्रबंधन वह आवश्यक अस्त्र है, जिस के प्रयोग से आप चंद दिनों में ही कामयाबी की मंजिल प्राप्त कर लेते हैं। अगर आप अपने समय के सही उपयोग की कला सीख जाते हैं तो आप अपने व्यावसायिक जीवन के साथ-साथ निजी रिश्तों को भी बेहतर कर सकते हैं। यदि कोई कार्य अति महत्वपूर्ण नहीं है और उसे कोई अन्य व्यक्ति कर सकने में समर्थ है, तो ऐसे कार्यों को अन्य व्यक्ति को करने देना चाहिए। इससे आपको महत्वपूर्ण कार्य करने के लिए अतिरिक्त समय उपलब्ध हो जाएगा। हमें दूसरों की गलतियों से सीखने के साथ ही दूसरों की सफलता से प्रेरणा भी लेनी चाहिए।  जब आप समय प्रबंधन में दक्ष हो जाते हैं तब आपके कार्य करने की क्षमता और गुणवत्ता में निखार आ जाता है। आप कार्य करने की सकारात्मक ऊर्जा से भर जाते हैं। ऐसे व्यक्तियों के जीवन से नकारात्मक दृष्टिकोण लगभग समाप्त हो जाता है और वह आदर्श व्यक्तित्व की प्रतिमूर्ति बनकर समाज को उचित राह प्रदर्शित करने की शक्ति उत्पन्न कर लेता है। जैसा कि सर्व विदित है, सकारात्मक सोच का व्यक्ति अपनी जैसी सकारात्मक विचारों की विद्युत चुंबकीय तरंगों का उत्सर्जन कर अपने चारों ओर सकारात्मकता का एक आभा मंडल तैयार कर लेता है, जिसके संपर्क में आकर आम आदमी भी अपने व्यक्तित्व में अभूतपूर्व परिवर्तन महसूस करने लगता है। अतः आपके द्वारा अपनाए जाने वाले समय प्रबंधन के सूत्र से ना केवल आपके व्यक्तित्व का विकास होता है, अपितु आपके माध्यम से समाज का एक बड़ा वर्ग भी इस सूत्रों से जुड़ जाता है। अंत में परम पिता परमेश्वर से यही प्रार्थना है कि वह हमें उचित प्रतिबद्धता, समयनिष्ठता, लगन और समय के सकारात्मक उपयोग की क्षमता के साथ अपने कार्यों को समय पर पूर्ण कर लेने की शक्ति प्रदान करें, जिससे हम अपने जीवन में उन्नति, विकास और समृद्धि की मंज़िले खड़ी कर सकें। *******

  • समझदार व्यापारी

    हरिशंकर परसाई हीरालाल मशालो का एक व्यापारी था, जो शहर-शहर जाकर मशाले बेचा करता था। एक दिन उसकी तबीयब बहुत खराब हो गयी जिस कारण वह मशाले बेचने नहीं जा पाता है। उसका बेटा जब खेल कर आता है तो देखता है कि उसका पिता बिस्तर पर लेता हुआ है। यह देख कर अपने पिता से पूछता है। क्या, हुआ पिताजी जो आज आप शहर नहीं गए? उस पर पिता कहता है,"आज मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं है जिस बजह से मशाले बेचने शहर नहीं गया हूँ। उसका बेटा भोला बोलता है तो आज मै शहर मशाले बेचने चला जाता है। यह सुन कर उसके पिता कहते है,"तुम अभी बहुत छोटे हो और दुकानदार तुम्हे मूर्ख बना कर सस्ते में माल खरीद लेगा। इस पर उसका बेटा भोला बोलता है,"पिताजी सिर्फ मेरा नाम ही भोला बाकि मै बहुत चालक हूँ " यह बोल कर अपने पिता से शहर जाने की जिद्द करने लगता है फिर उसके पिता उसकी माँ को उसे समझाने के लिए कहता है लेकिन वह अपनी माँ की भी बात नहीं मानता है। अंत में दोनो उसे शहर भेजने के लिए तैयार हो जाते है। शहर भेजने से पहले उसके पिता कहते है,"अगर तुम ये तीन बात मानोगे तो ही तुम्हें शहर जाने दुगा",उस पर उसका बेटा कहता है ठीक है पिताजी। मै आप की सारी बाते मानने के लिए तैयार हूं। पहली बात तुम्हारी माँ तुम्हें कुछ रोटियां देगी,जब तुम्हें भूख लगे तो खाना लेकिन खाने से पहले एक खाऊ, दो खाऊ, तीन खाऊ या चार खाऊ । ये शब्द जरूर बोलना होगा । दूसरी बात जब भी कमरा लेना तो कुंडी वाला लेना, अगर कुंडी वाला ना हो तो लेने से मना कर देना। बेटा कहता है ठीक है पिताजी जैसी आप बोले है,वैसे ही करेंगे। तीसरी बात जब भाव सही ना दे तो कहना पिताजी से पूछ कर आता हूं। उसका बेटा उसकी सारी बात मानने के लिए तैयार हो जाता है। जब वह शहर पहुँचता है तो चार चोर उसे देख कर कहते है, इसके पोटली में जरूर कोई कीमती चीज है। सुनसान जगह देख कर उसकी पोटली छीन लेगे,चारो चोर बात कर रहे थे। उसे भूख लगती है तो वह एक पेड़ के नीचे बैठ जाता है और खाना निकलता है। जैसा कि उसकी पिता ने बताया था वो बोलने लगता है एक खाऊ, दो खाऊ, तीन खाऊ या चार खाऊ। यह बात सुन चारों चोर भाग जाते है और एक जगह रुक कर कहते है वो तो भूत था। अगर वह हम सब को देख लेता तो चारों को खा जाता। खाना खाने के बाद, वह एक सराय जाता है, जहाँ वह पूछता है कोई कमरा मिलेगा तो सराय का मालिक कहता है मिल जाएगा लेकिन जब वह पूछता है उस मे कुड़ी तो है ना। इस पर सराय का मालिक समझ जाता है कि इसे पता है कि यहाँ सामान चोरी होता है। फिर सराय का मालिक उसे वहाँ से भगा देता है। अब वह मशाले बेचने जाता है तो दुकानदार कहता है, "तुम जो कीमत बोल रहे हो उस से आधी कीमत दुगा, इस पर भोला बोलता है। मै अपने पिताजी से पूछ कर आता हूं, इस पर व्यापारी मन में कहता है, "लगता है इसका पिता भी साथ आया और कही किसी और को माल ना बेच दे" यह सोच कर व्यापारी उसका माल ख़रीद लेता है। निष्कर्ष - हमारे बड़े अगर कोई बात बोले तो उसे ध्यान से सुनना और समझना चाहिए क्योंकि वे बिना वजय कोई बात हमें नहीं बोलते है। ******

  • महान् गणितज्ञ रामानुजन : धुन के पक्के

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव रामानुजन का जन्म एक गरीब परिवार में 22 दिसम्बर, 1887 को तमिलनाडु के इरोड़ कस्बे में हुआ था। उनके पिता एक साड़ी की दुकान पर क्लर्क का काम करते थे। रामानुजन के जीवन पर उनकी माँ का बहुत प्रभाव था। जब वे 11 वर्ष के थे, तो उन्होंने गणित की किताब की पूरी मास्टरी कर ली थी। गणित का ज्ञान तो जैसे उन्हें ईश्वर के यहाँ से ही मिला था। 14 वर्ष की उम्र में उन्हें मेरिट सर्टीफिकेट्स एवं कई अवार्ड मिले। वर्ष 1904 में जब उन्होंने टाउन हाईस्कूल से स्नातक पास की, तो उन्हें के. रंगनाथा राव पुरस्कार, प्रधानाध्यापक कृष्ण स्वामी अय्यर द्वारा प्रदान किया गया। वर्ष 1909 में उनकी शादी हुई, उसके बाद वर्ष 1910 में उनका एक ऑपरेशन हुआ। घरवालों के पास उनके ऑपरेशन हेतु पर्याप्त राशि नहीं थी। एक डॉक्टर ने उनका मुफ्त में यह ऑपरेशन किया था। इस ऑपरेशन के बाद रामानुजन नौकरी की तलाश में जुट गए। वे मद्रास में जगह-जगह नौकरी के लिए घूमे। इसके लिए उन्होंने ट्यूशन भी किए। वे पुनः बीमार पड़ गए। इसी बीच वे गणित में अपना कार्य करते रहे। ठीक होने के बाद, उनका सम्पर्क नेलौर के जिला कलेक्टर-रामचन्दर राव से हुआ। वह रामानुजन के गणित में कार्य से बेहद प्रभावित हुए। उन्होंने रामानुजन की आर्थिक मदद भी की। वर्ष 1912 में उन्हें मद्रास में चीफ अकाउण्टेंट के ऑफिस में क्लर्क की नौकरी भी मिल गई। वे ऑफिस का कार्य जल्दी पूरा करने के बाद, गणित का रिसर्च करते रहते, इसके बाद वे इंग्लैण्ड चले गए। वहाँ उनके कार्य को खूब प्रशंसा मिली। उनके गणित के अनूठे ज्ञान को खूब सराहना मिली। वर्ष 1918 में उन्हें ट्रिनिटी कॉलेज कैम्ब्रिज का फेलो (Fellow of Trinity College Cambridge) चुना गया। वह पहले भारतीय थे, जिन्हें इस सम्मान के लिए चुना गया। बहुत मेहनती एवं धुन के पक्के थे। कोई भी विषम परिस्थिति, आर्थिक कठिनाइयाँ, बीमारी एवं अन्य परेशानियाँ उन्हें अपनी ‘धुन’ से नहीं डिगा सकीं। वे अन्ततः सफल हुए। आज उन्हें विश्व के महान् गणितज्ञों में शुमार किया जाता है। 32 वर्ष की छोटी उम्र में ही इस प्रतिभाशाली व्यक्ति का देहावसान हो गया। दुनिया ने एक महान गणितज्ञ को खो दिया। *******

  • चौथा मित्र

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव एक गाँव में चार मित्र रहते थे। उनमें से तीन पढ़े-लिखे व विद्वान थे परंतु चौथा इतना विद्वान नहीं था, पर हर बात की सामान्य जानकारी रखता था। वह काफी व्यावहारिक था और अपने अच्छे-बुरे की समझ रखता था। एक दिन तीनों मित्रों ने तय किया कि उन्हें अपने ज्ञान के बल पर धन कमाना चाहिए। वे अपनी किस्मत आजमाने के लिए दूसरे देश के लिए चल पड़े। वे चौथे दोस्त को साथ नहीं ले जाना चाहते थे क्योंकि वह अधिक पढ़ा-लिखा नहीं था लेकिन बचपन का दोस्त होने के नाते उसे भी साथ ले लिया। चारों ने यात्रा आरंभ की। रास्ते में एक घना जंगल पड़ा। एक जगह पेड़ के नीचे हड्डियों का ढेर दिखाई दिया। एक मित्र बोला- विज्ञान की जानकारी को परखने का अच्छा अवसर है। ये तो किसी मरे हुए जानवर की हड्डियाँ लगती हैं चलो इसे फिर से जिंदा करने की कोशिश करते हैं। पहले मित्र ने कहा-‘मुझे हड्डियाँ जोड़ कर ढाँचा बनाना आता है। उसने कुछ मंत्र पढ़े और हड्डियों का कंकाल बन गया। दूसरे मित्र ने कुछ मंत्र पढ़े तो कंकाल पर खाल आ गई और शरीर में खून दौड़ने लगा। अब वह एक निर्जीव शेर दिखता था। अपनी उपलब्धि पर प्रसन्न होते हुए तीसरा मित्र बोला कि वह उस बेजान शरीर में प्राण डाल देगा। चौथा मित्र चिल्लाया रुको! ये तो शेर लगता है। जिंदा होते ही हम सबको मार कर खा जाएगा। तीनों मित्रों ने चौथे मित्र की बात पर ध्यान नहीं दिया और उसको मुर्ख बताकर उस शेर को जिंदा करने लगे। तब चौथा मित्र बोला- बस एक क्षण रुकना- कह कर वह पास के ऊंचे पेड़ पर चढ़ गया। अपने मित्र की बात अनसुनी कर तीसरे मित्र ने ज्यों ही मंत्र पढ़े शेर के प्राण लौट आए। वह भयंकर शेर उन्हें देख कर दहाड़ने लगा। उसने पल भर में झपट्टा मारा और सभी मित्रों को मार दिया। जब शेर चला गया तो चौथा मित्र पेड़ से उतरा। उसे अपने मृत मित्रों को देख बहुत अफसोस हुआ। उदास व दुखी मन से वहअकेला घर लौट गया। दोस्तों व्यक्ति के भीतर विशेष योग्यता के साथ साथ कुछ सामान्य जानकारीयों का होना भी आवश्यक है। *******

  • अभ्यास का महत्त्व

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव प्राचीन समय में विद्यार्थी गुरुकुल में रहकर ही पढ़ा करते थे। बच्चे को शिक्षा ग्रहण करने के लिए गुरुकुल में भेजा जाता था। बच्चे गुरुकुल में गुरु के सानिध्य में आश्रम की देखभाल किया करते थे और अध्ययन भी किया करते थे। एक उम्र दराज विद्यार्थी को भी सभी की तरह गुरुकुल भेज दिया गया। वहां आश्रम में अपने साथियों के साथ घुलने मिलने लगा। लेकिन वह पढ़ने में बहुत ही कमजोर था। गुरुजी की कोई भी बात उसके बहुत कम समझ में आती थी। इस कारण सभी के बीच वह उपहास का कारण बनता। उसके सारे साथी अगली कक्षा में चले गए लेकिन वो आगे नहीं बढ़ पाया। गुरुजी जी ने भी आखिर हार मानकर उसे बोला, “बेटा! मैने सारे प्रयास करके देख लिये है। अब यही उचित होगा कि तुम यहां अपना समय बर्बाद मत करो। अपने घर चले जाओ और घरवालों की काम में मदद करो।” विद्यार्थी ने भी सोचा कि शायद विद्या मेरी किस्मत में नहीं हैं। और भारी मन से गुरुकुल से घर के लिए निकल गया। दोपहर का समय था। रास्ते में उसे प्यास लगने लगी। इधर उधर देखने पर उसने पाया कि थोड़ी दूर पर ही कुछ महिलाएं कुएं से पानी भर रही थी। वह कुएं के पास गया। वहां पत्थरों पर रस्सी के आने जाने से निशान बने हुए थे,तो उसने महिलाओ से पूछा, “यह निशान आपने कैसे बनाएं।” तो एक महिला ने जवाब दिया, “बेटे यह निशान हमने नहीं बनाएं। यह तो पानी खींचते समय इस कोमल रस्सी के बार-बार आने जाने से ठोस पत्थर पर भी ऐसे निशान बन गए हैं।” विद्यार्थी सोच में पड़ गया। उसने विचार किया कि जब एक कोमल सी रस्सी के बार-बार आने जाने से एक ठोस पत्थर पर गहरे निशान बन सकते हैं तो निरंतर अभ्यास कर मै विद्या ग्रहण क्यों नहीं कर सकता। विद्यार्थी ढेर सारे उत्साह के साथ वापस गुरुकुल आया और अथक कड़ी मेहनत की। गुरुजी ने भी खुश होकर भरपूर सहयोग किया। कुछ ही सालों बाद यही मंदबुद्धि बालक वरदराज आगे चलकर संस्कृत व्याकरण का महान विद्वान बना। शिक्षा: दोस्तो अभ्यास की शक्ति का तो कहना ही क्या हैं। यह आपके हर सपने को पूरा करेगी। अभ्यास बहुत जरूरी है चाहे वो खेल मे हो या पढ़ाई में या किसी और चीज़ में। बिना अभ्यास के आप सफल नहीं हो सकते हो। अगर आप बिना अभ्यास के केवल किस्मत के भरोसे बैठे रहोगे, तो आखिर में आपको पछतावे के सिवा और कुछ हाथ नहीं लगेगा। इसलिए अभ्यास के साथ धैर्य, परिश्रम और लगन रखकर आप अपनी मंजिल को पाने के लिए जुट जाए। *******

  • एक राजा की कहानी

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव ये कहानी है एक राजा की जो कि एक लंबी यात्रा के लिए निकल ने वाला था। तो सारे प्रजा के लोग राजा को नाव तक छोड़ने के लिए आते है। उन लोगों में से एक आदमी राजा के पास आकर कहता है कि महाराज जब आप जंगल से होते हुए जाएंगे तो आपको वहाँ एक छोटे कद का आदमी मिलेगा और वह आपको लड़ने के लिए चुनौती देगा। उस आदमी को आप जान से मारे बिना आगे मत बढ़ना। अब राजा उस आदमी की बात मानकर यात्रा पर निकल पड़ता है। जब दो दिनों के बाद राजा जब जंगल पहुंचता है तब राजा को एक छोटी कद वाला आदमी मिलता है। उस आदमी ने राजा को लड़ने के लिए चुनौती दी पर राजा तो महान था, उसने उस छोटे कद वाले आदमी के साथ लड़ाई शुरू कर दी। थोड़ी देर में लड़ाई खत्म हुई और राजा जीत गया। लेकिन जब उस आदमी को जान से मारने की बारी आयी तब राजा ने कहा इस छोटे कद के आदमी को मारने में कैसी महानता है। राजा उस दो फुट के आदमी को जिंदा छोड़कर अब आगे बढ़ गया। अब दो दिन बीत गए और वह आदमी फिर राजा के सामने आया। पर अब उस आदमी का कद कुछ बढ़ चुका था। उसने फिर से राजा को लड़ने के लिए चुनौती दी और राजा ने वह स्वीकार की और लड़ाई शुरू हुई। जब लड़ाई ख़त्म हुई तब राजा फिर जीत गया। लेकिन इस बार भी राजा ने उस आदमी को यह कहकर छोड़ दिया कि इस आदमी को मारने में कैसी महानता है। दो दिनों बाद वापस वह आदमी राजा के सामने आया। अब उस आदमी का कद राजा के राजा के कद के बराबर था। उसने फिर राजा को लड़ने के लिए चुनौती दी। फिर लड़ाई में राजा जीत गया लेकिन इस बार भी राजा ने उसे मारा नहीं था। इसी तरह हर बार राजा उसे छोड़ता गया और एक दिन ऐसा आया कि उस आदमी का कद अब राजा से भी बढ़ गया। उसने फिर राजा को लड़ने के लिए चुनौती दी। इस बार राजा थोड़ा डर गया लेकिन राजा महान था उसने चुनौती को स्वीकार किया। लड़ाई शुरू हुई और राजा इस बार बहुत जख्मी हुआ लेकिन राजा ने जैसे तैसे करके उस आदमी को हरा दिया पर इस बार राजा ने उस आदमी को ज़िंदा नहीं छोड़ा उसे जान से मार दिया। सीख:- आपके जिंदगी में कितनी भी छोटी परेशानी क्यों ना आये उसे ख़त्म किये बगैर आगे मत बढ़ाना क्योंकि कल वही छोटी परेशानी आगे बढाकर आपके सामने बहुत बड़ी होकर आएंगी। इन छोटी परेशानिओं को हल करने से आपको अनुभव मिलता है और जीवन में अगर आपके सामने कोई बड़ी परेशानी आये तो आप उसे आसानी से हल कर सकते है। *******

  • बादशाह का कुत्ता

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव ये कहानी है एक बादशाह की जिसे अपने कुत्ते से बड़ा प्यार था और वो हमेशा शाही अंदाज में रहता था। बादशाह के राज्य के लोग कहते काश हम भी बादशाह के कुत्ते होते तो काश हमारी जिंदगी भी थोड़ी ठीक होती। बादशाह अपनी प्रजा पर कम ध्यान देता था पर उसका सारा ध्यान अपने कुत्ते पर था। कुछ लोग बादशाह की मिसाल देते थे अगर जानवरों से प्यार करना है तो बादशाह से सीखिए। बादशाह जहाँ भी जाते थे वहाँ वे अपने पालतू कुत्ते को साथ में रहते थे और दरबार में भी उनका कुत्ता हमेशा बैठा रहता था। एक बार बादशाह को किसी दूसरी राज्य के राजा से मिलने जाना था पर वहाँ तक जाने का रास्ता समुद्री था। बादशाह वहाँ जाने के लिए अपनी जहाज में सवार हुए। अब उनके साथ बादशाह के मंत्री, सैनिक और कुछ सवारी लोग भी थे। अब बादशाह जहाँ भी जाता वहाँ वे अपने प्यारे कुत्ते को भी साथ लेकर जाते थे। बादशाह के कुत्ते के लिए ये पहला समुद्री सफर था जब वह जहाज में बैठा था। जब जहाज ने आगे बढ़ाना शुरू किया तो जहाज के पानी में हलचल की वजह से वह कुत्ता घबराने लगा और वह कुत्ता जहाज में इधर से उधर भागने लगा। जहाज में बैठे बाकी लोग भी कुत्ते की इस हरकत को देखकर खुद को असहज महसूस करने लग गए और उस कुत्ते के उछल कूद करने के वजह से जहाज में बैठे लोगो को चिंता होने लगी कि कही जहाज पलट ना जाए। हर कोई चाह रहा था कि काश ये बात बादशाह भी समझ ले लेकिन बादशाह को शुरू-शुरू में बड़ा अच्छा लग रहा था क्योंकि उनका कुत्ता बड़े मजे से जहाज में खेल रहा था। अब थोड़ी देर बाद बादशाह को भी कुत्ते की इस हरकत से चिढ़ लगने लगी। उन्हें लगने लगा कि कही कोई ख़तरा ना हो जाए और अपने कुत्ते के इस तरह उछल कूद करने की वजह से कही जहाज ही पानी में पलट जाए। जहाज पर सफर कर रहे लोगो में एक दार्शनिक बैठा हुआ था। उस दार्शनिक ने बादशाह के पास जाकर बोला गुस्ता कि माफ़ हो हुजूर लेकिन हमे कुछ ना कुछ करना होगा वरना ये आपका प्यारा कुत्ता हम सबको मुसीबत में डाल देगा और इस जहाज को पलटी कर देगा। बादशाह ने कहा ठीक है आप क्या करना चाहते है और आप को जो समझ में आ रहा है आप कर लीजिए मेरी तरफ से आपको इजाजत है। तभी वह दार्शनिक गया और अपने साथ दो लोगो लेकर आया अब उन तीनों ने मिलकर उस कुत्ते को पकड़ा और समुद्र में फेंक दिया। जैसे ही कुत्ता समुद्र में गिरा तब उसकी जान पर बन आयी और वह समझ नहीं पा रहा था कि अब वह क्या करे तब उसने डरते हुए कैसे भी कर के जहाज को पकड़ लिया और थोड़ी देर तक वैसे ही जहाज के साथ समुद्र के पानी में तैरता रहा। दार्शनिक ने अपने साथियों से कहा कि अब इसको वापस से जहाज में उठाकर ले आते है। कुत्ता जहाज में वापस आने के बाद चुपचाप से जहाज के एक कोने में जाकर बैठ गया। बादशाह और बाकि लोगों को समझ नहीं आया कि यह क्या हो गया। अचानक से इस कुत्ते की उछल कूद कैसे बंद हो गयी। तब बादशाह ने उस दार्शनिक से पूछा तुमने ये क्या किया जो कुत्ता इतना उछल कूद रहा था वह अचानक से पालतू बकरी बन गया है। दार्शनिक ने कहा बादशाह बड़ी सीधी सी बात है “जिंदगी में जब तक खुद पर कोई परेशानी नहीं आती तब तक हमे दूसरे की परेशानियां समझ नहीं आती और जब खुद की जान पर बन आती तब हम दूसरे की परिस्थिकों अपने आप समझ जाते है।” सीख:- कमी देखनी है और बुराई देखनी है तो सबसे पहले खुद की देखिये और उसे ठीक करने की कोशिश करिए। *******

  • सफलता का रहस्य

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव एक बार एक व्यक्ति ने सुकरात से पूछा कि “सफलता का रहस्य क्या है?” सुकरात ने उस इंसान को कहा कि वह कल सुबह नदी के पास मिले, वही पर उसे अपने प्रश्न का जवाब मिलेगा। जब दूसरे दिन सुबह वह व्यक्ति नदी के पास मिला तो सुकरात ने उसको नदी में उतरकर, नदी गहराई की गहराई मापने के लिए कहा। वह व्यक्ति नदी में उतरकर आगे की तरफ जाने लगा। जैसे ही पानी उस व्यक्ति के नाक तक पहुंचा, पीछे से सुकरात ने आकर अचानक से उसका मुंह पानी में डुबो दिया। वह व्यक्ति बाहर निकलने के लिए झटपटाने लगा, कोशिश करने लगा लेकिन सुकरात थोड़े ज्यादा Strong थे। सुकरात ने उसे काफी देर तक पानी में डुबोए रखा। कुछ समय बाद सुकरात ने उसे छोड़ दिया और उस व्यक्ति ने जल्दी से अपना मुंह पानी से बाहर निकालकर जल्दी जल्दी साँस ली। सुकरात ने उस व्यक्ति से पूछा – “जब तुम पानी में थे तो तुम क्या चाहते थे?” व्यक्ति ने कहा – “जल्दी से बाहर निकलकर सांस लेना चाहता था।” सुकरात ने कहा – “यही तुम्हारे प्रश्न का उतर है। जब तुम सफलता को उतनी ही तीव्र इच्छा से चाहोगे जितनी तीव्र इच्छा से तुम सांस लेना चाहते है, तो तुम्हे सफलता निश्चित रूप से मिल जाएगी।” *******

  • अपनी असीम शक्तियों को पहचानिए

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव मनुष्य वह अद्भुत रचना है, जिसमें ईश्वर ने असीम शक्तियों को छिपा रखा है। लेकिन बहुत से लोग अपने जीवन में कभी उन शक्तियों को पहचान ही नहीं पाते। वे बाहरी दुनिया की समस्याओं, चुनौतियों और असफलताओं में उलझकर अपने आत्मबल को भूल जाते हैं। जब जीवन में संघर्ष आता है, तब हम हार मान लेते हैं और अपनी कमज़ोरियों को दोष देने लगते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि हर व्यक्ति के भीतर वह शक्ति है जो पर्वत को भी हिला सकती है। यदि हम अपने भीतर झाँकें, अपने मन की शक्ति को पहचानें, तो हम असंभव को भी संभव बना सकते हैं। "अपनी असीम शक्तियों को पहचानिए" - यह वाक्य केवल एक प्रेरणास्पद विचार नहीं, बल्कि जीवन को बदलने वाला मंत्र है। इस लेख के माध्यम से हमारा आपको उसी आत्मशक्ति की ओर ले जाने का प्रयास है—जहाँ आप खुद को एक नए दृष्टिकोण से देखेंगे और जीवन को दिशा देने में सक्षम बनेंगे।

  • बड़े बदलाव के लिए आज छोटी शुरुआत करें

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव बदलाव की बात करते ही हमारे मन में एक बड़ी तस्वीर उभरती है – जैसे जीवन पूरी तरह बदल जाए, समाज में क्रांति आ जाए, या देश प्रगति की नई ऊँचाइयों को छू ले। परंतु हम यह भूल जाते हैं कि हर बड़ा बदलाव एक छोटी शुरुआत से ही जन्म लेता है। समुद्र की शुरुआत एक छोटे से जलकण से होती है और पर्वत की ऊँचाई एक-एक कण से बनती है। ठीक उसी तरह, यदि हम अपने जीवन, समाज या देश में कुछ बड़ा बदलाव लाना चाहते हैं, तो उसकी पहली ईंट आज की छोटी कोशिश होनी चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कुछ सपने होते हैं – किसी को लेखक बनना है, किसी को आईएएस अधिकारी, किसी को व्यापार में सफल होना है, तो किसी को समाज सुधारक। ये सभी लक्ष्य सुनने में बड़े लगते हैं, लेकिन इनके लिए एक ही मूलमंत्र है –

  • बनिये का बेटा

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव एक गाँव में एक बनिया रहता था, उसकी बुद्धि की ख्याति दूर दूर तक फैली थी।एक बार वहाँ के राजा ने उसे चर्चा पर बुलाया। काफी देर चर्चा के बाद राजा ने कहा – “महाशय, आप बहुत अक्लमंद है, इतने पढ़े लिखे है पर आपका लड़का इतना मूर्ख क्यों है? उसे भी कुछ सिखायें। उसे तो सोने चांदी में मूल्यवान क्या है यह भी नहीं पता।” यह कहकर राजा जोर से हंस पड़ा.. बनिए को बुरा लगा, वह घर गया व लड़के से पूछा “सोना व चांदी में अधिक मूल्यवान क्या है ?” “सोना”, बिना एक पल भी गंवाए उसके लड़के ने कहा। “तुम्हारा उत्तर तो ठीक है, फिर राजा ने ऐसा क्यूं कहा? सभी के बीच मेरी खिल्ली भी उड़ाई।” लड़के के समझ में आ गया, वह बोला “राजा गाँव के पास एक खुला दरबार लगाते हैं, जिसमें सभी प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल होते हैं। यह दरबार मेरे स्कूल जाने के मार्ग में ही पड़ता है। मुझे देखते ही बुलवा लेते हैं, अपने एक हाथ में सोने का व दूसरे में चांदी का सिक्का रखकर, जो अधिक मूल्यवान है वह ले लेने को कहते हैं और मैं चांदी का सिक्का ले लेता हूं। सभी ठहाका लगाकर हंसते हैं व मज़ा लेते हैं। ऐसा तक़रीबन हर दूसरे दिन होता है।” “फिर तुम सोने का सिक्का क्यों नहीं उठाते, चार लोगों के बीच अपनी फजिहत कराते हो व साथ मे मेरी भी?” लड़का हंसा व हाथ पकड़कर पिता को अंदर ले गया और कपाट से एक पेटी निकालकर दिखाई जो चांदी के सिक्कों से भरी हुई थी। यह देख वो बनिया हतप्रभ रह गया। लड़का बोला “जिस दिन मैंने सोने का सिक्का उठा लिया उस दिन से यह खेल बंद हो जाएगा। वो मुझे मूर्ख समझकर मज़ा लेते हैं तो लेने दें, यदि मैं बुद्धिमानी दिखाउंगा तो कुछ नहीं मिलेगा। बनिये का बेटा हूँ अक़्ल से काम लेता हूँ। मूर्ख होना अलग बात है और मूर्ख समझा जाना अलग। स्वर्णिम मौके का फायदा उठाने से बेहतर है, हर मौके को स्वर्ण में तब्दील किया जाए। आपकी समझदारी ही आपकी सबसे बड़ी तरक्की है। ******

  • समय का सदुपयोग करें

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव "समय अमूल्य है" – यह वाक्य हम सभी ने अनगिनत बार सुना है। पर क्या हम वास्तव में इस अमूल्य धन का सही उपयोग करते हैं? जीवन में सफलता, सम्मान और आत्म-संतोष पाने के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ अगर कोई है, तो वह है समय का सदुपयोग। समय न तो किसी का इंतज़ार करता है, न ही वापस आता है। इसका एक-एक क्षण मूल्यवान होता है। आइए हम समझते हैं कि समय का सदुपयोग क्यों आवश्यक है, इसका हमारे जीवन में क्या प्रभाव पड़ता है और हम इसे अपने दैनिक जीवन में कैसे व्यवहार में ला सकते हैं। समय की महत्ता समय जीवन का सबसे महत्वपूर्ण संसाधन है, जिसे न खरीदा जा सकता है, न ही उधार लिया जा सकता है। हर व्यक्ति को दिन के 24 घंटे समान रूप से मिलते हैं – कोई राजा हो या रंक, विद्यार्थी हो या कर्मचारी। फर्क केवल इतना है कि कोई उन 24 घंटों का बेहतरीन इस्तेमाल करता है और कोई उन्हें यूं ही गवां देता है। समय का सही उपयोग व्यक्ति को शिखर तक पहुँचा सकता है, वहीं समय की बर्बादी व्यक्ति को पछतावे की गर्त में ढकेल देती है। जब हम यह समझ जाते हैं कि समय लौटकर नहीं आता, तब हम उसकी कीमत पहचानते हैं। समय का दुरुपयोग समय का दुरुपयोग यानी आलस्य करना, टालमटोल करना, बिना योजना के जीना, या निरर्थक कार्यों में समय गँवाना। इसका परिणाम: ·         हम लक्ष्य से दूर हो जाते हैं क्योंकि बिना समयबद्धता के कोई भी लक्ष्य नहीं प्राप्त हो सकता। ·         हम आत्मग्लानि से भर जाते हैं क्योंकि जब समय हाथ से निकल जाता है, तब केवल पछतावा शेष रह जाता है। ·         जो व्यक्ति समय का आदर नहीं करता, वह खुद के विकास को रोक देता है। ·         जब कार्य समय पर पूरे नहीं होते, तो तनाव, चिंता और निराशा बढ़ती है और हम मानसिक तनाव के शिकार हो जाते हैं। समय का सदुपयोग कैसे करें? ·         सुनियोजित दिनचर्या बनाएँ : हर दिन की एक स्पष्ट योजना बनाना बहुत ज़रूरी है। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक के कामों की सूची बनाइए और उन्हें प्राथमिकता के अनुसार बाँटिए। ·         लक्ष्य निर्धारित करें : छोटे और बड़े लक्ष्यों को निर्धारित कर उन्हें समयसीमा में बाँधें। जब आपके पास लक्ष्य होंगे, तभी आप समय का सही दिशा में उपयोग कर पाएँगे। ·         प्राथमिकताओं को पहचानें : हर काम ज़रूरी नहीं होता। समझें कि आपके जीवन के कौन से कार्य आपके विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं और पहले उन्हें पूरा करें। ·         आलस्य और टालमटोल से बचें : "कल करूँगा" का रवैया समय का सबसे बड़ा दुश्मन है। आज का काम आज ही करें, नहीं तो वह कभी नहीं होगा। ·         डिजिटल व्यसन से दूरी रखें : सोशल मीडिया, मोबाइल गेम्स और वेब सीरीज़ समय के सबसे बड़े चोर हैं। इनसे नियंत्रित दूरी बनाना ही बुद्धिमानी है। ·         अवकाश का भी रखें ख्याल : समय का सदुपयोग का मतलब केवल काम करना नहीं है, बल्कि आत्मविकास, मानसिक शांति और आनंद के लिए भी समय निकालना चाहिए। योग, ध्यान, पढ़ना, या परिवार के साथ समय बिताना – ये सब जीवन को संतुलित बनाते हैं। महान व्यक्तियों की समय के प्रति सोच ·         महात्मा गांधी ने कहा था – "भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि आप आज क्या करते हैं।" ·         डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा – "अगर आप सूरज की तरह चमकना चाहते हैं, तो पहले सूरज की तरह जलना होगा।" इसका सीधा अर्थ है कि हर पल को परिश्रम और अनुशासन से भरना होगा। ·         चाणक्य ने कहा – "जो समय की कद्र नहीं करता, समय उसे मिटा देता है।" इन सभी महान आत्माओं ने अपने जीवन में समय का सही प्रयोग किया और संसार को प्रेरणा दी। विद्यार्थियों और युवाओं के लिए विशेष सन्देश आज के युवाओं के पास अवसरों की कोई कमी नहीं है, लेकिन सफलता उन्हीं को मिलती है जो समय का सम्मान करते हैं। छात्र जीवन में समय का सदुपयोग विशेष रूप से आवश्यक है, क्योंकि यही जीवन की नींव होती है। जो विद्यार्थी समय को बर्बाद करते हैं, वे भविष्य में पछताते हैं। पर जो समय का सम्मान करते हैं, वे जीवन में ऊँचाइयाँ छूते हैं। ·         आज की मेहनत कल का सुनहरा भविष्य बनाती है। ·         समय का सदुपयोग – जीवन में सकारात्मक परिवर्तन और आत्मविश्वास बढ़ता है। ·         कार्य समय पर पूर्ण होते हैं। समाज में सम्मान मिलता है। ·         मानसिक शांति और संतुलन बना रहता है। ·         जीवन में उद्देश्य स्पष्ट होता है। समय का सदुपयोग करें, क्योंकि यह सबसे बड़ा शिक्षक, साथी और साधन है। एक बार जो समय निकल गया, वह फिर लौटकर नहीं आता। यदि आप चाहते हैं कि आपका जीवन सफल, संतुलित और सार्थक हो, तो समय को अपना सबसे अच्छा मित्र बना लीजिए। हर दिन की शुरुआत इस विचार से करें – "मैं आज का दिन पूरी लगन, ईमानदारी और समय का सदुपयोग करते हुए बिताऊँगा।" यकीन मानिए, यही विचार धीरे-धीरे आपके पूरे जीवन को बदल देगा। "वो समय नहीं जो घड़ी में चलता है, वो समय है जो सपनों को हकीकत में बदलता है। जो समय को जान लेता है, वो ही सच्चे अर्थों में जीवन को पहचान लेता है।" *******

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