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  • डर के आगे जीत

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव एक दिन एक कुत्ता जंगल में रास्ता खो गया। तभी उसने देखा कि एक शेर बहुत तेजी से उसकी तरफ आ रहा है। कुत्ते की सांस रूक गयी औऱ उसने मन ही मन सोचा, "आज तो काम तमाम मेरा..!" तभी फिर अचानक उसने अपने सामने कुछ सूखी हड्डियाँ पड़ी देखीं। वो आते हुए शेर की तरफ पीठ कर के बैठ गया और एक सूखी हड्डी को चूसने लगा और जोर-जोर से बोलने लगा, "वाह! शेर को खाने का मज़ा ही कुछ और है, एक और मिल जाए तो पूरी दावत हो जायेगी! " और उसने जोर से डकार मारी। कुत्ते की बात सुनकर शेर सोच में पड़ गया। उसने सोचा, "ये कुत्ता तो शेर का भी शिकार करसकता है! अपनी जान बचाकर भागने में ही भलाई है!" शेर वहां से जान बचा कर भाग गया। पेड़ पर बैठा एक बन्दर यह सब तमाशा बहुत गौर से देख रहा था। उसने सोचा यह अच्छा मौका है। शेर को सारी कहानी बता देता हूँ। शेर से दोस्ती भी हो जायेगी और उससे ज़िन्दगी भर के लिए जान का खतरा भी दूर हो जाएगा। वो फटाफट शेर के पीछे भागा। कुत्ते ने बन्दर को जाते हुए देख लिया और समझ गया कि जरुर कोई साज़िश करने वाला है, यह बंदर। उधर बन्दर ने शेर को सारी कहानी बता दी कि कैसे कुत्ते ने उसे बेवकूफ बनाया है। शेर जोर से दहाड़ा, "चल मेरे साथ, अभी उसकी जीवन लीला समाप्त करता हूँ" और बन्दर को अपनी पीठ पर बैठा कर शेर कुत्ते की तरफ चल दिया। कुत्ते ने शेर को अपनी तरफ आते देखा तो उसे महसूस हुआ कि एक बार फिर उसकी जान को ख़तरा है।  मगर फिर भी वह हिम्मत कर उन दोनों की तरफ अपनी पीठ करके बैठ गया और जोर-जोर से चिल्लाकर बोलने लगा, "साला, इस बन्दर को भेजे दो घंटे हो गए, कमीना अब तक एक शेर को फंसा कर नहीं ला सका, बहुत जोर की भूख लगी है!" यह सुनते ही शेर ने बंदर को वहीं पटका और वापस पीछे खूब तेज़ भाग गया। इसलिए मुश्किल समय में अपना आत्मविश्वास कभी नहीं खोएं, आपकी ऊर्जा, समय और ध्यान भटकाने वाले कई बन्दर आपके आस-पास हैं, उन्हें पहचानिए और उनसे सावधान रहिये। याद रखिए, डर के आगे जीत है। *******

  • सच्चे रिश्ते

    कर्माकर गुप्ता पूनम की डोली जब ससुराल पहुँची, तो उसके मन में अनगिनत सपने और खुशियाँ थीं। उसका पति, आदित्य, एक प्रतिष्ठित कंपनी में काम करता था और घर में उसके ससुर, सुदर्शन और ननद, माया, के अलावा कोई और सदस्य नहीं था। आदित्य का स्वभाव शांत और समझदार था, और जल्दी ही पूनम का परिवार के हर सदस्य के साथ अच्छा तालमेल हो गया। ससुर उसे बेटी की तरह मानते, और आदित्य उसे बेहद चाहते। इस तरह, पूनम सबकी प्यारी बहु बन गई। सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन उसकी ननद माया उससे ज्यादा घुलमिल नहीं पाती थी। माया को पूनम की सुंदरता और पढ़ाई-लिखाई से हमेशा एक अजीब-सी जलन होती। माया जब भी मौका पाती, किसी न किसी बात पर पूनम को ताने देती। पूनम यह सब सुनकर भी मुस्कुरा देती और कभी जवाब नहीं देती। वह समझती थी कि सच्चे रिश्ते सहनशीलता और प्रेम से ही बनते हैं। समय बीतता गया और माया की भी शादी हो गई। वह अपने ससुराल चली गई और वहां खुद का परिवार बसा लिया। इधर, पूनम के ससुर सुदर्शन की उम्र भी बढ़ रही थी और अब उन्हें अक्सर बीमारियाँ घेरने लगीं। उनकी तबीयत धीरे-धीरे बिगड़ती जा रही थी। एक दिन सुदर्शन ने आदित्य को बुलाकर कहा, "बेटा, मैं सोचता हूँ कि गांव की ज़मीन बेच देते हैं। वहाँ तो अब कोई जाता नहीं, और इसे बेचने से मिलने वाले पैसे हमारे लिए काम आएँगे।" आदित्य ने सहमति जताते हुए कहा, "जैसा आप ठीक समझें, पिताजी।" अगले ही दिन, सुदर्शन ने एक ब्रोकर से संपर्क किया और ज़मीन बेचने की प्रक्रिया शुरू कर दी। कुछ दिनों बाद ब्रोकर ने फोन करके बताया कि डील फाइनल हो चुकी है और जल्द ही पैसा मिल जाएगा। इस बात से परिवार में थोड़ी राहत महसूस हुई, क्योंकि अब पैसों की कमी का हल निकलने वाला था। लेकिन कुछ ही दिनों बाद, अचानक माया ने अपनी भाभी पूनम को ताने देते हुए कहा, "तुम्हें क्या लगता है, तुम्हारे जैसी पढ़ी-लिखी और खूबसूरत बहू को इस परिवार में सब कुछ मिल जाएगा? ससुराल में कभी-कभी कुछ चीजें सहनी पड़ती हैं।" पूनम ने शांत स्वभाव से जवाब दिया, "माया, हर इंसान की अलग सोच होती है। मैं मानती हूँ कि हमें एक-दूसरे की आदतों और खामियों को समझकर स्वीकार करना चाहिए।" समय का पहिया और तेजी से घूमने लगा। सुदर्शन की तबीयत अब इतनी बिगड़ चुकी थी कि डॉक्टरों ने कह दिया कि उनके पास ज्यादा समय नहीं है। इस खबर से परिवार में उदासी छा गई, और पूनम ने अपने पति से कहा, "हमें जल्दी से ज़मीन का सौदा पूरा करवा लेना चाहिए, ताकि पिताजी के इलाज के लिए पैसों की कोई कमी न हो।" आदित्य को यह विचार समझ में आया और उसने ब्रोकर से संपर्क किया, ताकि सौदा शीघ्रता से पूरा हो सके। इधर, जब माया को इस बारे में पता चला, तो उसने सोचा कि ज़मीन बेचने के बाद आदित्य और पूनम अधिक संपत्ति के मालिक बन जाएंगे, और हो सकता है कि वे परिवार की देखभाल में पीछे हट जाएं। यह सोच माया के मन में एक बार फिर ईर्ष्या का कारण बनी। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, माया को पूनम की सच्चाई का एहसास होने लगा। पूनम ने कभी भी दिखावे या कोई स्वार्थपूर्ण उद्देश्य नहीं रखा था। वह हमेशा सच्चे दिल से सबकी भलाई चाहती थी। धीरे-धीरे माया का नज़रिया बदलने लगा। उसे यह भी समझ में आया कि पूनम ने हर कठिनाई में इस परिवार का साथ दिया है और सच्ची रिश्तों की कद्र करती है। कुछ समय बाद, पूनम और माया के बीच की कड़वाहट दूर हो गई। माया ने अपने पिछले व्यवहार के लिए पूनम से माफी माँगी। पूनम ने माया को गले लगाते हुए कहा, "असली रिश्ते तब ही मजबूत होते हैं जब हम एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े रहते हैं।" इस तरह, परिवार में पुनः प्रेम, समझदारी और सामंजस्य का माहौल बन गया। पूनम की सहनशीलता और सच्चे प्रेम ने माया के दिल में भी उसके प्रति आदर भर दिया। सुदर्शन भी अपने जीवन के अंतिम दिनों में अपनी बहू और बेटी को एक-दूसरे के प्रति इस प्रेम से संतुष्ट महसूस करने लगे। ******

  • मूंछ का बाल

    डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव बहुत समय पहले की बात है, एक वृद्ध सन्यासी हिमालय की पहाड़ियों में कहीं रहता था। वह बड़ा ज्ञानी था और उसकी बुद्धिमत्ता की ख्याति दूर-दूर तक फैली थी। एक दिन एक औरत उसके पास पहुंची और अपना दुखड़ा रोने लगी, ”बाबा, मेरा पति मुझसे बहुत प्रेम करता था, लेकिन वह जबसे युद्ध से लौटा है ठीक से बात तक नहीं करता।” “युद्ध लोगों के साथ ऐसा ही करता है।”, सन्यासी बोला। “लोग कहते हैं कि आपकी दी हुई जड़ी-बूटी इंसान में फिर से प्रेम उत्पन्न कर सकती है, कृपया आप मुझे वो जड़ी-बूटी दे दें।”, महिला ने विनती की। सन्यासी ने कुछ सोचा और फिर बोला, “देवी मैं तुम्हें वह जड़ी-बूटी ज़रूर दे देता लेकिन उसे बनाने के लिए एक ऐसी चीज चाहिए जो मेरे पास नहीं है।” “आपको क्या चाहिए मुझे बताइए मैं लेकर आउंगी।”, महिला बोली। “मुझे बाघ की मूंछ का एक बाल चाहिए।”, सन्यासी बोला। अगले ही दिन महिला बाघ की तलाश में जंगल में निकल पड़ी, बहुत खोजने के बाद उसे नदी के किनारे एक बाघ दिखा, बाघ उसे देखते ही दहाड़ा, महिला सहम गयी और तेजी से वापस चली गयी। अगले कुछ दिनों तक यही हुआ, महिला हिम्मत कर के उस बाघ के पास पहुँचती और डर कर वापस चली जाती। महीना बीतते-बीतते बाघ को महिला की मौजूदगी की आदत पड़ गयी, और अब वह उसे देख कर सामान्य ही रहता। अब तो महिला बाघ के लिए मांस भी लाने लगी, और बाघ बड़े चाव से उसे खाता। उनकी दोस्ती बढ़ने लगी और अब महिला बाघ को थपथपाने भी लगी। और देखते-देखते एक दिन वो भी आ गया जब उसने हिम्मत दिखाते हुए बाघ की मूंछ का एक बाल भी निकाल लिया। फिर क्या था, वह बिना देरी किये सन्यासी के पास पहुंची, और बोली “मैं बाल ले आई बाबा।” “बहुत अच्छे।” और ऐसा कहते हुए सन्यासी ने बाल को जलती हुई आग में फ़ेंक दिया। “अरे ये क्या बाबा, आप नहीं जानते इस बाल को लाने के लिए मैंने कितने प्रयत्न किये और आपने इसे जला दिया ……अब मेरी जड़ी-बूटी कैसे बनेगी?” महिला घबराते हुए बोली। “अब तुम्हें किसी जड़ी-बूटी की ज़रुरत नहीं है।” सन्यासी बोला।” जरा सोचो, तुमने बाघ को किस तरह अपने वश में किया। जब एक हिंसक पशु को धैर्य और प्रेम से जीता जा सकता है तो क्या एक इंसान को नहीं? जाओ जिस तरह तुमने बाघ को अपना मित्र बना लिया उसी तरह अपने पति के अन्दर प्रेम भाव जागृत करो।” महिला सन्यासी की बात समझ गयी, अब उसे उसकी जड़ी-बूटी मिल चुकी थी। ******

  • सच्ची खुशी

    डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव जवानी के समय में शारीरिक चाहतें आसमान छू कर बोलने लगती हैं, और पहले 20 साल तेजी से समाप्त हो जाते हैं। इसके बाद धन की आवश्यकता पड़ने पर नौकरी की खोज शुरू होती है। यह नौकरी नहीं, वह नौकरी नहीं, दूर नहीं, पास नहीं। कई नौकरियाँ बदलने के बाद आखिरकार एक नौकरी स्थिरता की शुरुआत करती है। पहली तनख्वाह का चेक हाथ में आते ही उसे बैंक में जमा किया जाता है, और शून्यों का अंतहीन खेल शुरू हो जाता है। दो-तीन साल और बीत जाते हैं और बैंक में शून्यों की संख्या बढ़ने लगती है। 25 की उम्र होते-होते विवाह करने के लिए घर के सदस्यों द्वारा फोर्स किया जाता उसके बाद थोडे-बहुत विवाद होने के बाद परिवार के सदस्यों की बात पर राजी होना फिर विवाह हो जाता है और जीवन की एक नई कहानी की शुरूआत होती है। शुरू के एक-दो साल गुलाबी और सपनीले होते हैं। हाथ में हाथ डालकर घूमना, रंग-बिरंगे सपने देखना। लेकिन यह सब जल्दी ही खत्म हो जाता है। बच्चे के आने की आहट होती है और पालना झूलने लगता है। अब सारा ध्यान बच्चे पर केंद्रित हो जाता है, उठना, बैठना, खाना-पीना, लाड़-दुलार। समय कैसे बीत जाता है, पता ही नहीं चलता। इस बीच, धीरे-धीरे एक-दूसरे से दूरी बढती जाती हैं, बातें करना, एक दूसरे के साथ समय बिताना, साथ रहना और घूमना-फिरना बंद हो जाता है। और इसी बीच धीरे-धीरे बच्चे बड़ा होता जाता है और वह समय बच्चे में व्यस्त हो जाती है, जबकि मैं अपने काम में व्यस्त रहता हूँ। घर, गाड़ी की किस्त, बच्चे की जिम्मेदारी, शिक्षा, भविष्य की चिंता, और बैंक में शून्यों की बढ़ती संख्या, इन सब में जीवन व्यस्त हो जाता है। 35 साल की उम्र में आते आते, घर, गाड़ी, परिवार और बैंक में बढ़ते शून्य सब कुछ होते हुए भी एक कमी महसूस होती है। चिड़चिड़ाहट बढ़ती जाती है, काम का प्रेशर होना और मैं उदासीन हो जाता हूँ। दिन बीतते जाते हैं, बच्चा बड़ा होता जाता है और खुद का संसार तैयार होता जाता है। कब 10वीं कक्षा आई और चली गई, पता ही नहीं चलता। चालीस की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते बैंक में शून्यों की संख्या बढ़ती जाती है। एकांत क्षण में गुजरे हुए पल, दिनों की यादें ताज़ा होती हैं और मैंने कहा, "जरा पास में आओ, पास बैठो। चलो हाथ में हाथ डालकर कहीं घूमने-फिरने चलते हैं।" उसने अजीब नजरों से देखा और कहा, "तुम्हें बातें सूझ रही हैं, यहाँ ढेर सारा काम पड़ा है।" कमर में पल्लू खोंसकर वह चली जाती है। पैंतालीस की उम्र में, आँखों पर चश्मे का नंबर बढ़ता जाता है, बाल सफेद होने लगते हैं, और दिमाग में उलझनें बढ़ जाती हैं। बेटा कॉलेज में होता है और बैंक में शून्यों की संख्या बढ़ती जाती है। बेटे के कॉलेज खत्म होने और परदेश चले जाने के बाद, घर अब बोझ लगने लगता है। 55 की उम्र की ओर बढ़ते हुए, बैंक के शून्यों की कोई खबर नहीं होती। बाहर जाने-आने के कार्यक्रम बंद हो जाते हैं। दवाइयों का दिन और समय तय हो जाते हैं। बच्चे बड़े हो जाते हैं और अब हमें सोचने की जरूरत होती है कि वे कब लौटेंगे। एक दिन, सोफे पर बैठा ठंडी हवा का आनंद ले रहा था। वह पूजा में व्यस्त थी। तभी फोन की घंटी बजी। बेटे ने बताया कि उसने शादी कर ली है और परदेश में ही रहेगा। उसने यह भी कहा कि बैंक के शून्यों को किसी एक वृद्धाश्रम में दे देना और खुद भी वहीं चले जाओ, और वही पर रहना शुरु कर दो | मैं उसी की बातों में खोए हुए दिल में भावना के साथ आकर सोफ़े पर बैठ गया। उसकी पूजा खत्म होने को आई थी। मैंने उसे आवाज दी, "चलो, आज फिर पुरानी यादें ताजा करते हैं  हाथ में हाथ डालकर बातें करते हैं।" वह तुरंत जवाब दी, "अभी आई।" मुझे विश्वास नहीं हुआ। चेहरा खुशी से चमक उठा। आँखे भर आईं और आँसुओं से गाल भीग गए। लेकिन अचानक आँखों की चमक फीकी पड़ गई और मैं निस्तेज हो गया हमेशा के लिए। उसने शेष पूजा की और मेरे पास आकर बैठ गई। "बोलो, क्या बोल रहे थे?" लेकिन मैंने कुछ नहीं कह सका। उसने मेरे शरीर को छूकर देखा ठंडा पड़ चुका था। मैंने उसकी ओर एकटक देखा। पलभर के लिए वह शून्य हो गई। "क्या करूँ?" उसे कुछ समझ में नहीं आया। लेकिन एक-दो मिनट में ही वह चेतन्य हो गई। धीरे से उठी, पूजा घर में गई, एक अगरबत्ती जलाई, ईश्वर को प्रणाम किया और फिर से आकर सोफे पर बैठ गई। मेरा ठंडा हाथ अपने हाथों में लिया और बोली, "चलो, कहाँ घूमने चलना है तुम्हें? क्या बातें करनी हैं तुम्हें?" ऐसा कहते हुए उसकी आँखें भर आईं। वह एकटक मुझे देखती रही। आँसुओं की धारा बह निकली। मेरा सिर उसके कंधे पर गिर गया। ठंडी हवा का झोंका अब भी चल रहा था। क्या यही जीवन है? इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि जीवन को अपने तरीके से जीना चाहिए। धन और भौतिक सुख-सुविधाएँ महज एक भाग हैं, लेकिन सच्ची खुशी और संतोष प्रेम, समझदारी, और एक-दूसरे के साथ बिताए समय में होता है। *******

  • परिंदे

    निर्मल वर्मा अँधियारे गलियारे में चलते हुए लतिका ठिठक गई। दीवार का सहारा लेकर उसने लैंप की बत्ती बढ़ा दी। सीढ़ियों पर उसकी छाया एक बेडौल फटी-फटी आकृति खींचने लगी। सात नंबर कमरे से लड़कियों की बातचीत और हँसी-ठहाकों का स्वर अभी तक आ रहा था। लतिका ने दरवाज़ा खटखटाया। शोर अचानक बंद हो गया। ‘कौन है?’ लतिका चुपचाप खड़ी रही। कमरे में कुछ देर तक घुसुर-पुसुर होती रही, फिर दरवाज़े की चटखनी के खुलने का स्वर आया। लतिका कमरे की देहरी से कुछ आगे बढ़ी, लैंप की झपकती लौ में लड़कियों के चेहरे सिनेमा के पर्दे पर ठहरे हुए क्लोज़-अप की भाँति उभरने लगे। ‘कमरे में अँधेरा क्यों कर रखा है?’ लतिका के स्वर में हल्की-सी झिड़क का आभास था। ‘लैंप में तेल ही ख़त्म हो गया, मैडम!’ यह सुधा का कमरा था, इसलिए उसे ही उत्तर देना पड़ा। होस्टल में शायद वह सबसे अधिक लोकप्रिय थी। क्योंकि सदा छुट्टी के समय या रात के डिनर के बाद आस-पास के कमरों में रहने वाली लड़कियों का जमघट उसी के कमरे में लग जाता था। देर तक गपशप, हँसी-मज़ाक़ चलता रहता। ‘तेल के लिए करीमुद्दीन से क्यों नहीं कहा?’ ‘कितनी बार कहा मैडम, लेकिन उसे याद रहे तब तो!’ कमरे में हँसी की फुहार एक कोने में दूसरे कोने तक फैल गई। लतिका के कमरे में आने से अनुशासन की जो घुटन घिर आई थी, वह अचानक बह गई। करीमुद्दीन होस्टल का नौकर था। उसके आलस और काम में टालमटोल करने के क़िस्से होस्टल की लड़कियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आते थे। लतिका को हठात् कुछ स्मरण हो आया। अँधेरे में लैंप घुमाते हुए चारों ओर निगाहें दौड़ाई। कमरे में चारों ओर घेरा बनाकर वे बैठी थी—पास-पास एक-दूसरे से सटकर। सबके चेहरे परिचित थे, किंतु लैंप के पीले मद्धिम प्रकाश में मानो कुछ बदल गया था, या जैसे वह उन्हें पहली बार देख रही थी। ‘जूली, अब तक तुम इस ब्लॉक में क्या कर रही हो?’ जूली खिड़की के पास पलंग के सिरहाने बैठी थी। उसने चुपचाप आँखें नीची कर ली। लैंप का प्रकाश चारों ओर से सिमटकर अब केवल उसके चेहरे पर गिर रहा था। ‘नाइट-रजिस्टर पर दस्तख़त कर दिए?’ ‘हाँ, मैडम।’ ‘फिर...?’ लतिका का स्वर कड़ा हो आया। जूली सकुचाकर खिड़की से बाहर देखने लगी। जब से लतिका इस स्कूल में आई है, उसने अनुभव किया है कि होस्टल के इस नियम का पालन डाँट-फटकार के बावजूद नहीं होता। ‘मैडम, कल से छुट्टियाँ शुरू हो जाएँगी, इसलिए आज रात हम सबने मिलकर... और सुधा पूरी बात न कहकर हेमंती की ओर देखते हुए मुस्कुराने लगी। ‘हेमंती के गाने का प्रोग्राम है; आप भी कुछ देर बैठिए न!’ लतिका को उलझन मालूम हुई। इस समय यहाँ आकर उसने उनके मज़े को किरकिरा कर दिया। इस छोटे-से हिल स्टेशन पर रहते उसे ख़ासा अर्सा हो गया, लेकिन कब समय पतझड़ और गर्मियों का घेरा पार कर सर्दी की छुट्टियों की गोद में सिमट जाता है, उसे कभी याद नहीं रहता। चोरों की तरह चुपचाप वह देहरी से बाहर हो गई। उसके चेहरे का तनाव ढीला पड़ गया। वह मुस्कुराने लगी।

  • मेरा दुश्मन

    कृष्ण बलदेव वैद वह इस समय दूसरे कमरे में बेहोश पड़ा है। आज मैंने उसकी शराब में कोई चीज़ मिला दी थी कि ख़ाली शराब वह शरबत की तरह गट-गट पी जाता है और उस पर कोई ख़ास असर नहीं होता। आँखों में लाल ढोरे-से झूलने लगते हैं, माथे की शिकनें पसीने में भीगकर दमक उठती हैं, होंठों का ज़हर और उजागर हो जाता है, और बस—होश-ओ-हवास बदस्तूर क़ायम रहते हैं। हैरान हूँ कि यह तरकीब मुझे पहले कभी क्यों नहीं सूझी। शायद सूझी भी हो, और मैंने कुछ सोचकर इसे दबा दिया हो। मैं हमेशा कुछ-न-कुछ सोचकर कई बातों को दबा जाता हूँ। आज भी मुझे अंदेशा तो था कि वह पहले ही घूँट में ज़ायक़ा पहचान कर मेरी चोरी पकड़ लेगा। लेकिन गिलास ख़त्म होते-होते उसकी आँखें बुझने लगी थीं और मेरा हौसला बढ़ गया था। जी में आया था कि उसी क्षण उसकी गरदन मरोड़ दूँ, लेकिन फिर नतीजों की कल्पना से दिल दहलकर रह गया था। मैं समझता हूँ कि हर बुज़दिल आदमी की कल्पना बहुत तेज़ होती है, हमेशा उसे हर ख़तरे से बचा ले जाती है। फिर भी हिम्मत बाँधकर मैंने एक बार सीधे उसकी ओर देखा ज़रूर था। इतना भी क्या कम है कि साधारण हालात में मेरी निगाहें सहमी हुई-सी उसके सामने इधर-उधर फड़फड़ाती रहती हैं। साधारण हालात में मेरी स्थिति उसके सामने बहुत असाधारण रहती है। ख़ैर, अब उसकी आँखें बंद हो चुकी थीं और सर झूल रहा था। एक ओर लुढ़ककर गिर जाने से पहले उसकी बाँहें दो लदी हुई ढीली टहनियों की सुस्त-सी उठान के साथ मेरी ओर उठ आई थीं। उसे इस तरह लाचार देखकर भ्रम हुआ था कि वह दम तोड़ रहा है। लेकिन मैं जानता हूँ कि वह मूज़ी किसी भी क्षण उछलकर खड़ा हो सकता है। होश सँभालने पर वह कुछ कहेगा नहीं। उसकी ताक़त उसकी ख़ामोशी में है। बातें वह उस ज़माने में भी बहुत कम किया करता था, लेकिन अब तो जैसे बिलकुल गूँगा हो गया हो।

  • प्रायश्चित

    भगवतीचरण वर्मा अगर कबरी बिल्ली घर-भर में किसी से प्रेम करती थी तो रामू की बहू से, और अगर रामू की बहू घर-भर में किसी से घृणा करती थी तो कबरी बिल्ली से। रामू की बहू, दो महीने हुए मायके से प्रथम बार ससुराल आई थी, पति की प्यारी और सास की दुलारी, चौदह वर्ष की बालिका। भंडार-घर की चाभी उसकी करधनी में लटकने लगी, नौकरों पर उसका हुक्म चलने लगा, और रामू की बहू घर में सब कुछ; सासजी ने माला ली और पूजा-पाठ में मन लगाया। लेकिन ठहरी चौदह वर्ष की बालिका, कभी भंडार-घर खुला है तो कभी भंडार-घर में बैठे-बैठे सो गई। कबरी बिल्ली को मौक़ा मिला, घी-दूध पर अब वह जुट गई। रामू की बहू की जान आफ़त में और कबरी बिल्ली के छक्के-पंजे। रामू की बहू हाँडी में घी रखते-रखते ऊँघ गई और बचा हुआ घी कबरी के पेट में। रामू की बहू दूध ढककर मिसरानी को जिन्स देने गई और दूध नदारद। अगर बात यहीं तक रह जाती, तो भी बुरा न था, कबरी रामू की बहू से कुछ ऐसा परच गई थी कि रामू की बहू के लिए खाना-पीना दुश्वार। रामू की बहू के कमरे में रबड़ी से भरी कटोरी पहुँची और रामू जब आए तब तक कटोरी साफ़ चटी हुई। बाज़ार से बालाई आई और जब तक रामू की बहू ने पान लगाया बालाई ग़ायब। रामू की बहू ने तय कर लिया कि या तो वही घर में रहेगी या फिर कबरी बिल्ली ही। मोर्चाबंदी हो गई, और दोनों सतर्क। बिल्ली फँसाने का कठघरा आया, उसमें दूध बालाई, चूहे, और भी बिल्ली को स्वादिष्ट लगने वाले विविध प्रकार के व्यंजन रखे गए, लेकिन बिल्ली ने उधर निगाह तक न डाली। इधर कबरी ने सरगर्मी दिखलाई। अभी तक तो वह रामू की बहू से डरती थी; पर अब वह साथ लग गई, लेकिन इतने फ़ासिले पर कि रामू की बहू उस पर हाथ न लगा सके। कबरी के हौसले बढ़ जाने से रामू की बहू को घर में रहना मुश्किल हो गया। उसे मिलती थीं सास की मीठी झिड़कियाँ और पतिदेव को मिलता था रूखा-सूखा भोजन।

  • एक कर्ज़ ऐसा भी...

    ऋतिक द्विवेदी "डॉक्टर साहब, जब आप छुट्टी पर थे, तब कोई आदमी अपनी माँ को यहाँ भर्ती कराकर चला गया और आज तक वापस नहीं आया। समस्या ये है कि वह बुढ़िया भी अपने बारे में कुछ बता नहीं पा रही हैं। हमने बहुत कोशिश की, लेकिन भर्ती कराने वाले ने नाम और पता सब गलत दिया था। अब हम क्या करें? इतने दिन किसी को रख नहीं सकते और ऐसे छोड़ भी नहीं सकते,"रिसेप्शनिस्ट ने बताया, तो डॉक्टर को आश्चर्य के साथ-साथ गुस्सा भी आया। "कितने दिन से भर्ती है और बेटे ने अब तक कोई खोज खबर नहीं ली? हद है! कैसा निर्दयी बेटा है जो अपनी माँ का साथ तब छोड़ गया जब उसे सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी। वैसे उस बूढ़ी माई ने कुछ बताया?" डॉक्टर ने कोट उतारते हुए पूछा। "नहीं, डॉक्टर साहब। वो कुछ भी नहीं बोलतीं। हां, कभी-कभी किसी 'बबुआ' का नाम लेकर बुदबुदाती हैं, लेकिन हम समझ नहीं पाते।" "बबुआ...?" ये नाम सुनते ही डॉक्टर के दिल में एक झुरझुरी सी फैल गई। कहीं ये वही तो नहीं? वह लगभग दौड़ते हुए उस बुजुर्ग महिला के बेड की तरफ गया। सिकुड़ी हुई, कमजोर और बीमार हालत में लेटी बुढ़िया को देखते ही उसकी आँखें भर आईं। "हाँ, ये वही थीं। मगर बहुत बीमार और जर्जर हो चुकी थीं।" उसे अपने बचपन की याद आ गई। वह तीन-चार साल का ही था, जब अम्मा उसे अनाथालय से लाकर अपने घर में खिलाती-पिलाती थीं। वह रोज़ थोड़ी देर के लिए उसे अपने घर लातीं, मनपसंद चीज़ें बनाकर उसे खिलातीं, और कहतीं, "हमारा बबुआ बड़ा होकर डॉक्टर बनेगा, फिर जब हम बीमार पड़ेंगे तो दवाई देगा, है ना?" "हां अम्मा, डाक्कल बनूंगा, औल दवाई दूंगा," वह तुतलाते हुए कहता। उसकी दुनिया सिर्फ अम्मा पर ही सिमट गई थी। वक्त गुजरता गया। पढ़ाई में अव्वल रहने के कारण और शिक्षकों की मदद से वह मेडिकल कॉलेज में चुना गया और दूसरे शहर जाने लगा। अम्मा से बिछड़ते वक्त बहुत रोया, पर अम्मा ने समझाया, "यहां रहोगे तो डॉक्टर कैसे बनोगे? थोड़े समय की ही तो बात है, फिर हम साथ रहेंगे।" लेकिन पढ़ाई और दूरियों के कारण उसका मिलना-जुलना कम होता गया। फिर एक दिन खबर आई कि अम्मा का बेटा उन्हें लेकर गाँव चला गया। उसने अम्मा को ढूंढने की बहुत कोशिश की, पर किसी को भी उनके गाँव का पता नहीं पता था। "और आज, इतने सालों बाद, अम्मा इस हालत में यहां हैं?" वह बुढ़िया के पास जाकर धीरे से फुसफुसाया, "अम्मा, देखो, तुम्हारा बबुआ डॉक्टर बन गया है। अब तुम्हें दवाई दूंगा।" उनकी आँखों में एक हल्की चमक आई, पर तुरंत गायब हो गई। "तुम कौन हो बच्चा?" वह बमुश्किल बुदबुदाईं। डॉक्टर की आँखों से आँसू बह निकले। यही अम्मा कभी कहती थीं, "मेरी याददाश्त इतनी अच्छी है कि लाखों की भीड़ में तुझे पहचान लूंगी।" पर आज उन्हें पहचानना भी मुश्किल हो रहा था। "सर, आप रो रहे हैं? इन्हें आप जानते हैं?" रिसेप्शनिस्ट ने पूछा। "हाँ, इन्हें बहुत अच्छे से जानता हूँ। इनका मुझ पर बहुत बड़ा कर्ज़ है... ममता का कर्ज़।" संयत होते हुए डॉक्टर ने कहा, "इनके डिस्चार्ज पेपर्स तैयार करो। अब ये मेरे साथ चलेंगी, अपने बबुआ के घर।" ******

  • बलवा

    महेश कुमार केशरी रोज की तरह आज भी किशून ऑटो लेकर स्टैंड़ पर पहुँचा था। दोपहर होने को हो आई थी। लेकिन, अब तक बोहनी नहीं हुई थी।  रह-रहकर उसके दिमाग में आरती की कही बातें याद आ रही थीं। दोपहर से पहले किसी तरह आलू, प्याज, और कुछ हरी सब्जियाँ लेते आना। घर में सब्जी एक छँटाक नहीं है। गैस भी खत्म होने वाला है। एक-आध दिन चल जायेगा। उसके बाद लाना ही होगा। सोनू अब चार साल का हो गया। खाने-पीने में वैसे ही नखराहा है।  गिन-चुनकर ही चीजें खाता है। सोनू को और कुछ नहीं तो कम-से-कम पाव भर दूध तो देना ही होगा। ग्वाला, दूध के पैसे के लिये तगादा करके गया है। महीना पूरा होने वाला है।   लगता है आज भी बोहनी नहीं होगी। पिछले चार दिनों में पिछली जमा पूँजी किशून खा गया था। आखिर, इधर कुछ दिनों से शहर के हालात कुछ ठीक नहीं हैं। किसी ने पैगंबर साहब के बारे में कुछ कह दिया है। राजधानी में बलवा मचा हुआ है। कई पुलिस वाले के सिर फूट गये हैं। एहतियातन श्रीरामपुर में भी पुलिस ने तीन-चार दिनों से निषेधाज्ञा लगा दी है। चार-पाँच आदमी एक साथ एक जगह जमा नहीं हो सकते। खैर, प्रशासन ने ठीक ही तो किया है। नहीं तो कहाँ-कहाँ और किस-किस के सिर फूटेंगें कोई नहीं जानता। पुलिस वाले भी बेचारे अफसरान का हुक्म बजातें हैं।  अभी वो, अपने में खोया हुआ ये बातें सोच ही रहा था कि सामने से, जैनुल अपनी ऑटो किशुन के बगल में लाकर खड़ा करते हुए बोला-"और, किशून भैया, आज भी सवारी मिली या नहीं। कि खाली सड़क नापते ही आज का दिन भी निकलने  वाला है।" "तुमने मेरी मुँह की बात छीन ली। यही सवाल मैं तुमसे पूछने वाला था कि तुमको भी कहीं आज सवारी मिली या नहीं?" किशून ने हाथ पर सुर्ती मलते हुए जैनुल से पूछा।  " अरे, नहीं भईया जबसे राजधानी में बलबा मचा है। कोई घर से बाहर निकल कहाँ रहा है?  परसों एक ठो भाड़ा मिला था। उसके बाद से सूखा पड़ा है, भैया। लाओ थोड़ी खैनी मुझे भी दे दो। " जैनुल ऑटो साइड़ में लगाते हुए बोला। "सुना है, राजधानी में तुम्हारे ससुर मकबूल साहब पर दंगाईयों ने रोड़े बाजी की है। और तुम्हारे ससुर का सिर फूट गया है। अब कैसी हालत है उनकी? कमबख्त दँगाईयों का कुछ दीन-ईमान तो होता नहीं। दोनों तरफ ऐसे सौ-पचास फसादी लोग ऐसे भरे पड़े हैं। जो आग में घी डालने का काम करते हैं। हुँह बेड़ा गर्क हो इन फसादियों का।  "किशून ने बुरा सा मुँह बनाया और सुर्ती, जैनुल की तरफ बढ़ा दिया।  "अरे, कल की पैसेंजर ट्रेन से ससुर जी को ही तो देखने गया था। दँगाईयों ने सिर तो फोड़ा ही। किसी ने थाने में आग भी लगा दी। ससुर जी मरते-मरते बचे हैं।  यास्मीन को वहीं ससुर जी की सेवा में लगा रखा है। वो, मेरे साथ आने को तैयार नहीं हुई। आखिर, उसको किस मुँह से अपने साथ लाता। बाप बिस्तर पर पड़ा है। और, मैं उससे कैसे कहता कि मेरे साथ वापस लौट चलो? मेरी सास तो ये खबर सुनकर बेहोश हो गई थी। वो भी अस्पताल में हैं। आखिर, ससुर जी भी क्या करें? साहब का हुक्म तो बजाना ही पड़ता है। आखिर इस पापी पेट का सवाल जो है। हर आदमी दँगें में भी पेट के लिये ही बाहर निकलता है। हुक्मरान बँद ए.सी. कमरों में रिआया को आपस में कैसे लड़वाया जाये इसका रोड़-मैप बनाते हैं। और बलि का बकरा बनता है,  आम-आदमी। आखिर, क्या मिलता है? लोगों को धर्म के नाम पर लड़कर आज तक मैं ये समझ नहीं पाया। आम मेहनत कश आदमी,  हमारी तुम्हारी तरह बाल-बच्चों की जरूरतों के लिये सड़कों पर मारा-मारा फिरता है। सियासतदाँ अपनी-अपनी रोटी सेंकने में लगे रहते हैं। लोगों को आपस में भड़काते हैं। और लड़वाते है। नयी उम्र के, अनाड़ी किस्म के लोग उनके चक्कर में पड़ जाते हैं। और शहर जल उठता है। " "भैया, इसी को तो राजनीति कहते हैं।" किशून ऑटो के लुकिंग ग्लास को पोंछते हुए बोला।  तभी जैनुल ने लोगों की एक भीड़ को तलवार और बँदूकों के साथ अपनी ओर आते हुए देखा। उनके हाथों में कुछ धार्मिक झँड़े भी थें। और वो नारे लगाते हुए आ रहे थें। जैनुल ने ऑटो को जल्दी से स्टार्ट किया। और किशून की ओर चिल्लाकर बोला- "भाग भाई किशून, भाग।  दँगाई आ रहें हैं।" किशून ने भी ऑटो जैनुल की आवाज सुनकर उसी दिशा में भगा लिया। जिधर जैनुल भगा रहा था। काफी देर तक वे ऑटो को सड़क पर भगाते रहे। अब वो, दँगाईयों से दूर निकल आये थें। गली की मोड़ पर जहाँ गली खत्म होती थी। वहाँ किशून ने गाड़ी रोकी और जैनुल का शुक्रिया अदा किया- "भाई अगर तूने आज अवाज ना लगाई होती तो, आज मैं गया था काम से। " जैनुल हँसते हुए बोला-"भाई, किशून अगर इंसान-इंसान के काम नहीं आये तो फिर लोगों का इंसानियत पर से भरोसा उठ जायेगा। और देख किशून, मेरी बात ध्यान  से सुन जब तक माहौल शाँत ना हो जाये ऑटो घर से बाहर मत निकालियो। अच्छा भाई चलता हूँ। अपना ख्याल रखना। जै राम जी की।" किशून ने भी जैनुल को उसी आवाज में हिदायत दी, और जैनुल से बोला- "जैनुल भाई मामला शाँत होने तक,  तुम भी, ऑटो घर से बाहर मत निकालना। जिंदा रहे तो फिर मिंलेंगें। अच्छा भाई खुदा हाफिज।" दोनों ऑटो आगे जाकर सड़क पर कहीं  गुम हो गये। *****

  • अनजान देवता

    आशीष चौहान रमाशंकर की कार जैसे ही सोसायटी के गेट में घुसी, गार्ड ने उन्हें रोक कर कहा- “साहब, यह महिला आपके नाम और पते की चिट्ठी लेकर न जाने कब से भटक रही हैं।” रमाशंकर ने चिट्ठी लेकर देखा, नाम और पता तो उन्हीं का था, पर जब उन्होंने चिट्ठी लाने वाली की ओर देखा तो उसे पहचान नहीं पाए। चिट्ठी एक बहुत ही गरीब कमजोर महिला ले कर आई थी। उनके साथ बीमार सा एक लड़का भी था। उन्हें देख कर रमाशंकर को तरस आ गया। शायद बहुत देर से वे घर तलाश रही थी। उन्हें अपने घर लाकर कहा, “पहले तो आप बैठ जाइए।” इसके बाद नौकर को आवाज़ लगाई, “रामू इन्हें पानी ला कर दो।” पानी पी कर महिला ने थोड़ी राहत महसूस की तो रमाशंकर ने पूछा, “अब बताइए किससे मिलना है?”

  • धर्म और प्रेम

    निधि सिंह नीतू अपनी डेस्क पर काम में व्यस्त थी, तभी एक प्यून ने आकर कहा, "नीतू जी, मालिक आपको अपने केबिन में बुला रहे हैं।" नीतू ने हल्का-सा मुस्कराते हुए उत्तर दिया, "ठीक है, जाती हूं," लेकिन मन में यह सोचने लगी कि विक्रम ने मुझे क्यों बुलाया है। "खैर, बुलाया है तो जाना पड़ेगा," उसने अपने आपको समझाया। वह विक्रम के ऑफिस में गई और बोली, "सर, आपने मुझे बुलाया?" "जी हां, बैठिए," विक्रम ने सामने की कुर्सी की ओर इशारा किया। वह बड़े ध्यान से नीतू के चेहरे को देख रहे थे, जहाँ संतोष और आत्मविश्वास की झलक थी। अचानक उन्होंने एक पेपर उसके सामने रखते हुए कहा, "नीतू, आपने दूसरी बार प्रमोशन से इनकार कर दिया। यह मेरे लिए हैरानी की बात है। आज जहाँ ऑफिस में हर कोई पदोन्नति के लिए होड़ लगा रहा है, आप हैं कि फिर से इनकार कर रही हैं। आखिर कारण क्या है?" नीतू ने सहजता से मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, "सर, जीवन में इच्छाएँ अनंत होती हैं। हम सभी इच्छाओं के झूले में झूलते रहते हैं और बड़ी-बड़ी पेंगें लगाते हैं। लेकिन मैं इस पर विश्वास नहीं करती। मैं उतनी ही पेंग लगाती हूँ जितनी कि मुझे आवश्यकता है। मैं जिस पद पर हूँ, उससे खुश हूँ।" विक्रम ने कहा, "नीतू, मैं आपको लगभग तीन वर्षों से देख रहा हूँ। मैनेजर और अन्य सभी कर्मचारी आपके काम की तारीफ करते हैं। मगर, तरक्की किसे नहीं पसंद? आखिर कोई तो कारण होगा जो आप मुझसे छिपा रही हैं। एक गौरवमयी पद, गाड़ी, बंगले की सहूलियत, बड़ा शहर भला किसको आकर्षित नहीं करता? जिंदगी एक सुनहरे मोड़ पर आपका इंतज़ार कर रही है और आप मोड़ की ओर जाना ही नहीं चाहतीं। अच्छा, एक मालिक और कर्मचारी के नाते नहीं, एक दोस्त के नाते ही सही, कुछ तो बताइए।" नीतू ने गंभीरता से विक्रम की ओर देखा और फिर बोली, "सर, मुझे अपने माता-पिता के प्रति अपना धर्म आकर्षित करता है। मेरे माता-पिता के विवाह के कई साल बाद मेरा जन्म हुआ और मैं इकलौती संतान हूँ। मम्मी-पापा काफी उम्र के हो चले हैं। आप तो जानते ही हैं, एक पौधा कहीं भी मिट्टी में पनप जाता है, लेकिन वृक्ष नहीं। उन्हें यहाँ रहना पसंद है। यहाँ वे खुशी-खुशी जिंदगी जी रहे हैं। अगर मैं उन्हें नए शहर में ले जाऊं और उनका नया जलवायु अनुकूल नहीं हुआ तो..." विक्रम ने उनकी बातों को ध्यान से सुना और कहा, "आपकी चिंता समझ में आती है। लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि यह अवसर आपके जीवन में एक नया अध्याय खोल सकता है?" नीतू ने आगे कहा, "माना बड़ा बंगला, गाड़ी, ओहदा होगा। लेकिन जिनके लिए मेरा जीवन है, यदि वे वहाँ खुश नहीं रह पाएंगे, तो ऐसे ओहदे, बंगले, गाड़ी मेरे लिए बेमानी हैं। इसलिए मैं यह जगह छोड़कर नहीं जा सकती।" विक्रम ने चुप रहकर कहा, "लेकिन आपने अब तक शादी नहीं की। मैं मीन..." नीतू ने फिर से अपनी बात रखी, "सर, मैंने कहा ना, मेरे माता-पिता पहले मेरी जिम्मेदारी हैं। आजकल ऐसे लड़के नहीं मिलते जो लड़की के माता-पिता की भी सेवा करने की अनुमति दें। मतलब, लड़केवाले अपने परिवार के आगे भूल जाते हैं कि एक लड़की के भी माता-पिता होते हैं। बस इसलिए।" "इसलिए आपने अब तक शादी नहीं की?" विक्रम ने मुस्कुराते हुए कहा। "जी, इसलिए मुझे कोई प्रमोशन नहीं चाहिए, सर," नीतू ने अपने अंतिम निर्णय को स्पष्ट किया। विक्रम ने नीतू की धर्मनिष्ठा पर मुग्ध होकर कहा, "क्या मुझसे शादी करोगी? मेरा इस दुनिया में कोई नहीं है। एक अच्छे जीवनसाथी की तलाश में हूँ, जो मुझे अब तक नहीं मिली थी। आपको देखकर लगता है मेरी तलाश पूरी हो गई है। मुझे एक अच्छे जीवनसाथी के साथ-साथ माता-पिता का प्यार भी मिल जाएगा। तो कहिए, मुझे अपना जीवनसाथी बनाओगी?" यह अप्रत्याशित निवेदन सुनकर नीतू कुछ पल के लिए निःशब्द रह गई। उसने धीरे से हाथ आगे बढ़ाया और विक्रम के हाथ को थाम लिया। अब एकसाथ दो ज़िंदगियाँ एक सुनहरे मोड़ की ओर अग्रसर थीं। इस नए अध्याय में धर्म और प्रेम का संगम हुआ, जहाँ नीतू ने न केवल अपने माता-पिता की सेवा का संकल्प लिया, बल्कि विक्रम के साथ एक नई यात्रा की शुरुआत भी की। दोनों ने एक-दूसरे को समझा और समर्थन दिया, जिससे उनके रिश्ते में विश्वास और प्रेम की नींव रखी गई। ******

  • स्वार्थी लोग

    महेश कुमार केशरी सिस्टर मरियम बच्चों को पढ़ा रही थीं -"बच्चों हमारे अलग-अलग धर्मों में जितने भी लार्ड हुए हैं। उन सबमें एक समानता रही है। कि उन्होंने हमेशा त्याग की भावना को अपनाया। दूसरों के लिये अपना जीवन तक दाँव पर लगा दिया। जैसे हमारे लार्ड शिवा हैं। आपने पढ़ा भी होगा। शिव जी ने खुद विष का पान किया। ताकि हमारी धरती बची रहे। राम जी ने भाई के लिये चौदह साल का वनवास कबूल लिया। प्रभु यीशू दूसरों की भलाई के लिये सलीब पर टँगे। पैगंबर साहब ने अपने सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी दी। आप लोग जानते हैं। भगवान ऐसा क्यों करते हैं। ताकि, दुनिया में शाँति कायम रहे। लोग धरती पर आपसी भाईचारे और मेल मुहब्बत से रहें। शिव जी का हलाहल पी जाना। राम जी का बनवास चले जाना। जीसस का सलीब पर टँग जाना। पैगंबर साहब का अपनी सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी देना। हमें सिखाता है कि हम भी त्याग करें। दूसरे को अगर हमारे होने से तकलीफ हो तो हम  भी वनवास चले जायें। ताकि अशाँति ना फैले। दूसरों का यदि भला हो तो हम सलीब पर भी टँग जायें। इसलिये हम इन्हें अपना आदर्श मानते हैं। इनके व्यक्तित्व के गुणों को हम अपने जीवन में उतारे। तभी हमारा उद्धार होगा। समाज का कल्याण होगा। विश्व का कल्याण होगा। " जोसेफ अपने क्लास का सबसे होनहार बच्चा था। उसने सिस्टर मरियम से एक सवाल पूछा - "सिस्टर मरियम आप एक बात बतायें। जब इनका जीवन चरित्र इतना उत्कृष्ट है। तो फिर, देश में दँगें क्यों होते हैं? देश भर में जो आज हालात हैं। हमारा आधा देश आज जल रहा है। ये किसके कारण हो रहा है। क्या हमारे राजनेताओं ने लार्ड शिवा, लार्ड राम, या जीसस या पैगंबर साहब से कुछ नहीं सिखा। जो आज देश में इतनी अशाँति फैली हई है। क्या उन्होंने इनको नहीं पढ़ा? क्या उनके अंदर त्याग की भावना नहीं है? ये क्यों नहीं सीखते हमारे लार्ड से।" सिस्टर मरियम ने जोसेफ के सिर पर प्यार से हाथ फिराते हुए कहा - "बेटा हर कोई लार्ड शिवा, राम या जीसस, या पैगंबर नहीं हो सकता। इसके लिये त्याग की भावना आदमी के अंदर होनी चाहिये। राजनेताओं के अंदर अपना स्वार्थ है। लिप्सा है। भोग की वृति है। त्याग नहीं है। लालसा है। इनसे अच्छा जीवन तो मजदूरों का है। किसानों का है। जो दो रोटी अपनी मेहनत से कमाकर खाते हैं। अपना परिवार ही नहीं अपने देश के निर्माण में भी योगदान करते हैं। लार्ड शिवा, लार्ड राम या जीसस और पैगंबर के ये बहुत ही करीब के लोग हैं। इसका कारण ये है कि इनमें भी त्याग की  बहुत बड़ी इच्छा शक्ति होती है। ये परिवार से पहले देश के बारे में सोचते हैं। देश और समाज निर्माण में इनका योगदान बहुत बड़ा होता है। लेकिन हम इन्हें कभी सम्मानित नहीं करतें हैं। अपने समाज के किसी बड़े राजनेता को किसी आकेजन पर हम बुलाते हैं। और इसमें अपनी बड़ी शान समझते हैं।  दरअसल असली सम्मान इन मजदूरों और किसानों को मिलना चाहिये। जो कि हमारे युग निर्माता हैं। स्वार्थियों को हमें कभी सम्मानित नहीं करना चाहिये। जो हमें जात-पात, धर्म और मजहब में बाँटकर,  हममें फूट डालकर अपनी राजनीतिक महत्वकाँक्षाओं की पूर्ति में लगे रहते हैं। " *****

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