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- एकता की ताकत
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव जंगली भैंसों का एक झुण्ड जंगल में घूम रहा था। तभी एक बछड़े ने पुछा... पिता जी, क्या इस जंगल में ऐसी कोई चीज है जिससे डरने की ज़रुरत है? बस शेरों से सावधान रहना.. भैंसा बोला। हाँ, मैंने भी सुना है कि शेर बड़े खतरनाक होते हैं...। अगर कभी मुझे शेर दिखा तो मैं जितना हो सके उतनी तेजी से दौड़ता हुआ भाग जाऊँगा... बछड़ा बोला। नहीं.. इससे बुरा तो तुम कुछ कर ही नहीं सकते.. भैंसा बोला। बछड़े को ये बात कुछ अजीब लगी..वह बोला। क्यों? वे खतरनाक होते हैं... मुझे मार सकते हैं तो भला... मैं भाग कर अपनी जान क्यों ना बचाऊं? भैंसा समझाने लगा.... अगर तुम भागोगे तो शेर तुम्हारा पीछा करेंगे। भागते समय वे तुम्हारी पीठ पर आसानी से हमला कर सकते हैं और तुम्हे नीचे गिरा सकते है। और एक बार तुम गिर गए तो मौत पक्की समझो। तो.. तो। .. ऐसी स्थिति में मुझे क्या करना चाहिए ? बछड़े ने घबराहट में पुछा। अगर तुम कभी भी शेर को देखो... तो अपनी जगह डट कर खड़े हो जाओ और ये दिखाओ की तुम जरा भी डरे हुए नहीं हो। अगर वो ना जाएं तो...। उसे अपनी तेज सींघें दिखाओ और खुरों को जमीन पर पटको। अगर तब भी शेर ना जाएं तो धीरे -धीरे उसकी तरफ बढ़ो... और अंत में तेजी से अपनी पूरी ताकत के साथ उस पर हमला कर दो। भैंसे ने गंभीरता से समझाया। ये तो पागलपन है.... ऐसा करने में तो बहुत खतरा है। अगर शेर ने पलट कर मुझ पर हमला कर दिया तो? बछड़ा नाराज होते हुए बोला। बेटे!! अपने चारों तरफ देखो। क्या दिखाई देता है? भैंसे ने कहा। बछड़ा घूम - घूम कर देखने लगा ..। उसके चारों तरफ ताकत वर भैंसों का बड़ा सा झुण्ड था। अगर कभी भी तुम्हे डर लगे.. तो ये याद रखो कि हम सब तुम्हारे साथ हैं। अगर तुम मुसीबत का सामना करने की बजाये, भाग खड़े होते हो, तो हम तुम्हें नहीं बचा पाएंगे। लेकिन अगर तुम साहस दिखाते हो और मुसीबत से लड़ते हो तो हम मदद के लिए ठीक तुम्हारे पीछे खड़े होंगे। बछड़े ने गहरी सांस ली और अपने पिता को इस सीख के लिए धन्यवाद दिया। हम सभी की ज़िन्दगी में भी शेर हैं। कुछ ऐसी समस्याएं हैं जिनसे हम डरते हैं, जो हमें भागने पर, हार मानने पर मजबूर करना चाहती हैं। लेकिन अगर हम भागते हैं तो वे हमारा पीछा करती हैं और हमारा जीना मुश्किल कर देती हैं। इसलिए उन मुसीबतों का सामना करिये। उन्हें दिखाइए कि आप उनसे डरते नहीं हैं। दिखाइए कि आप सचमुच कितने ताकतवर हैं और पूरे साहस और हिम्मत के साथ उल्टा उनकी तरफ टूट पड़िये। और जब आप ऐसा करेंगे तो आप पाएंगे कि आपके परिवार और दोस्त पूरी ताकत से आपके पीछे खड़े हैं। ******
- मीठे बोल
रीता सिंह नव विवाहित जोड़ा किराए का मकान देखने के लिए शर्मा जी के घर पहुंचा। दोनों मियां बीवी खुश हो गए चलो कुछ रौनक होगी कितना सुंदर जोड़ा है हम इन्हें घर जरूर देंगे। "आंटी अंकल हमें दो रुम किचन का मकान चाहिए.. क्या हम मकान देख सकते हैं? घुटनों के दर्द से बेहाल सीमा जी उठते हुए बोली "हां हां बेटा क्यों नहीं देख लो। बाजू में ही छोटा पोर्शन किराए के लिए बनवाया था आर्थिक सहायता भी होगी तनिक रौनक भी लगी रहेगी। मकान बहुत पसंद आया जोड़े को "अंकल हम लोग कल इतवार को ही शिफ्ट कर जाएंगे" राघव जी भी खुश होकर बोले "हां बेटा बिल्कुल बिल्कुल" दूसरे दिन से सूने से घर में रौनक आ गई। सारा दिन सामान जमाकर जैसे ही नीतू रवि फुरसत होकर बैठे ही थे कि दरवाजे की घंटी बज उठी.... दरवाजा खोला तो देखा राघव जी थे "बेटा तुम्हारी आंटी ने तुम्हें खाना खाने के लिए बुलाया है।" रवि बोल पड़ा "अरे क्यों तकलीफ की आंटी ने... हम तो बाहर से ऑर्डर करने ही वाले थे।" पोपले मुंह से हंसते हुए राघव जी बोले "आज़ थके हुए हो.... खा लो, कल से अपने हिसाब से इंतज़ाम कर लेना।" सीमा जी और राघव जी से अनजाना सा लगाव हो गया नीतू और रवि को, ये जानकर कि उनके दोनों बेटे परदेश में ही स्थायी तौर पर बस चुके हैं.... दोनों का मन भर आया। नीतू! "सारी रात अंकल के खांसने और कराहने की आवाज़ आती रही तनिक देखकर आता हूं कहीं तबियत ज्यादा खराब तो नहीं हो गई।" "ठीक है जाओ, मैं नाश्ता लेकर आती हूं... साथ ही नाश्ता कर लेंगे।" "क्यों तकलीफ की बेटा! बुढ़ापे में तो ये सब लगा ही रहता है... लगता है इनकी खांसी की आवाज से सो नहीं पाए तुम लोग?" "अरे नहीं आंटी! ऐसा नहीं है मैं अभी डॉक्टर के पास ले जाऊंगा अंकल को, दवा देंगे तो तबियत संभल जाएगी।" बेबसी से दोनों की ओर देखती हुई सीमा जी बोलीं..... "बेटा! दवा से ज्यादा अपनेपन से भरे मीठे बोल की जरूरत है हमें, बस इसी की कमी थी, जो तुम दोनों ने पूरी कर दी" पल्लू से आंखे पोंछतीं सीमा जी बोलीं, राघव जी की आंखों भी बरस पड़ीं।" ******
- माँ की पीड़ा
राजीव कुमार एक ठंडी शाम थी। हवा में हल्की ठंडक थी, और आसमान में घने बादल छाए हुए थे। छत पर अकेली बैठी सुलोचना बुत बनी हुई थी, उसकी आँखें कहीं दूर टिकी थीं। बारिश कब से शुरू हो चुकी थी, पर उसे इसका कोई अहसास नहीं था। उसका बदन थर-थर काँप रहा था, मगर मानो वो खुद को महसूस ही नहीं कर रही थी। ठंडी हवाएँ उसे कंपा रही थीं, लेकिन वह अपने विचारों में गुम थी। अचानक उसे अपने नाम की पुकार सुनाई दी। "कहाँ हो सुलोचना? पूरा घर छान मारा, और तुम यहाँ छत पर भीग रही हो! जल्दी नीचे चलो, कपड़े बदलो। आज तुम्हारे लिए चाय मैं बनाऊँगा।" शिवकांत जी ने उसकी हथेली थामकर उसे धीरे से उठाया और कमरे की ओर ले गए। ऐसा लग रहा था मानो सुलोचना को अब तक किसी बात का होश ही नहीं था। शिवकांत जी ने कमरे में पहुँचकर उसे झकझोरते हुए कहा, “जल्दी से कपड़े बदल लो, सुलोचना। ठंड लग जाएगी, बीमार पड़ जाओगी। मैं तुमसे नाराज़ नहीं हूँ। जो हुआ, वो अब गुज़रा वक्त है। वो लोग अब चले गए हैं, कभी वापस नहीं आएँगे। तुम्हें तकलीफ होगी, पर मैं खुश हूँ कि अब कोई तुम्हें अपमानित नहीं करेगा। कोई हमारी इज़्ज़त पर और धब्बा नहीं लगा पाएगा।” सुलोचना ने कुछ नहीं कहा। चुपचाप अलमारी से कपड़े उठाए और बाथरूम में चली गई। नहा कर, कपड़े बदल कर, वो रसोई की ओर बढ़ी। रसोई का माहौल बिखरा हुआ था, मानो थोड़ी देर पहले हुए घटनाक्रम की गवाही दे रहा हो। वह खुद से बुदबुदाई, "काश मेरी कोई औलाद ही न होती..." पहली बार उसके मुँह से ऐसी कड़वी बात निकली थी, लेकिन उसके दिल की घुटन इससे कहीं ज्यादा थी। शिवकांत जी भी उसके पीछे रसोई में आ गए। उन्होंने चाय का पानी चढ़ा दिया और उसके साथ बिखरा सामान समेटने लगे। चाय बनाते हुए शिवकांत ने गंभीर स्वर में कहा, “सुलोचना, देख लो, कुणाल का कोई सामान तो नहीं छूट गया? जो भी उसका है, सब उसके मुँह पर फेंक कर आऊँगा। इतनी बदतमीजी! न अपने माता-पिता की इज्ज़त का ख्याल रखा, न उस प्यार का जो हमने उसे दिया। वह ससुराल के बहकावे में आकर हमें बेइज़्ज़त कर रहा है।” सुलोचना ने उदासी से सिर झुका लिया। उसने धीरे से कहा, “क्या कमी कर दी थी हमने? सब कुछ तो बाद में उसी का होने वाला था। फिर ये जिद क्यों कि अभी से घर अपने और बहू के नाम करवा लें। मैं तो ममता में अंधी हो जाती अगर बहू की बातें मेरे कानों में नहीं पड़ी होतीं। अच्छा होता अगर हम बेऔलाद ही रहते... ये दुख तो नहीं सहना पड़ता।” शिवकांत जी का कंधा पकड़ कर वह फूट-फूट कर रोने लगी। उसकी सिसकियाँ पूरे कमरे में गूँज रही थीं, और शिवकांत जी उसे सांत्वना देते हुए उसकी पीड़ा को महसूस कर रहे थे। ******
- समय और धैर्य
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव एक साधु था, वह रोज घाट के किनारे बैठ कर चिल्लाया करता था, ”जो चाहोगे सो पाओगे", "जो चाहोगे सो पाओगे" बहुत से लोग वहाँ से गुजरते थे पर कोई भी उसकी बात पर ध्यान नही देता था और सब उसे एक पागल आदमी समझते थे। एक दिन एक युवक वहाँ से गुजरा और उसने उस साधु की आवाज सुनी, “जो चाहोगे सो पाओगे”, जो चाहोगे सो पाओगे”, और आवाज सुनते ही उसके पास चला गया। उसने साधु से पूछा ”महाराज आप बोल रहे थे कि ‘जो चाहोगे सो पाओगे’ तो क्या आप मुझको वो दे सकते हो जो मैं जो चाहता हूँ ?” साधु उसकी बात को सुनकर बोला “हाँ बेटा तुम जो कुछ भी चाहता है मैं उसे जरुर दुँगा, बस तुम्हे मेरी बात माननी होगी। लेकिन पहले ये तो बताओ कि तुम्हे आखिर चाहिये क्या ?” युवक बोला ”मेरी एक ही ख्वाहिश है मैं हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनना चाहता हूँ।“ साधू बोला, ”कोई बात नहीं!! मैं तुम्हे एक हीरा और एक मोती देता हूँ, उससे तुम जितने भी हीरे मोती बनाना चाहोगे बना पाओगे !” और ऐसा कहते हुए साधु ने अपना हाथ आदमी की हथेली पर रखते हुए कहा, “पुत्र, मैं तुम्हे दुनिया का सबसे अनमोल हीरा दे रहा हूँ! लोग इसे ‘समय’ कहते हैं, इसे तेजी से अपनी मुट्ठी में पकड़ लो और इसे कभी मत गंवाना, तुम इससे जितने चाहो उतने हीरे बना सकते हो!“ युवक अभी कुछ सोच ही रहा था कि साधु उसका दूसरी हथेली, पकड़ते हुए बोला, ”पुत्र, इसे पकड़ो, यह दुनिया का सबसे कीमती मोती है, लोग इसे “धैर्य” कहते हैं! जब कभी समय देने के बावजूद परिणाम ना मिलें तो इस कीमती मोती को धारण कर लेना, याद रखना जिसके पास यह मोती है, वह दुनिया में कुछ भी प्राप्त कर सकता है।“ युवक गम्भीरता से साधु की बातों पर विचार करता है और निश्चय करता है कि आज से वह कभी अपना समय बर्वाद नहीं करेगा और हमेशा धैर्य से काम लेगा। और ऐसा सोचकर वह हीरों के एक बहुत बड़े व्यापारी के यहाँ काम शुरू करता है और अपनी मेहनत और ईमानदारी के बल पर एक दिन खुद भी हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनता है। मित्रो ‘समय’ और ‘धैर्य’ वह दो हीरे- मोती हैं जिनके बल पर हम बड़े से बड़ा लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। अतः ज़रूरी है कि हम अपने कीमती समय को बर्बाद ना करें और अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए धैर्य से काम लें। *******
- पश्चाताप
रमाशंकर मिश्रा सुमन की शादी को अभी कुछ ही साल हुए थे। वो अपने पति राजेश और सास के साथ रहती थी। शुरू में सब कुछ ठीक था, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, सुमन के और उसकी सास के बीच छोटे-छोटे मामलों को लेकर मतभेद होने लगे। एक दिन सुमन को पता चला कि उसका सोने का हार नहीं मिल रहा है। उसने सारा घर छान मारा, हर जगह ढूंढ़ा, लेकिन हार का कहीं नामोनिशान नहीं था। सुमन को अपने मन में शक हुआ कि कहीं उसकी सास ने ही तो हार नहीं चुराया। उसे याद आया कि उसकी सास ने एक बार उसके गहनों को बड़े ध्यान से देखा था। मन ही मन सुमन को यकीन हो गया कि हार की चोरी उसकी सास ने ही की है। वह गुस्से में तमतमाती हुई अपने पति के पास गई। सुमन ने गुस्से में कहा, "राजेश, मेरा सोने का हार चोरी हो गया है। और मुझे पूरा यकीन है कि तुम्हारी माँ ने ही इसे चुराया है। वो हमेशा मेरे गहनों को बड़े ध्यान से देखती रहती हैं।" राजेश ने सुमन को शांत करने की कोशिश की और कहा, "सुमन, ये तुम क्या कह रही हो? माँ कभी ऐसा नहीं कर सकतीं। तुमने अच्छी तरह से खोजा?" लेकिन सुमन के मन में शक गहरा बैठ चुका था। उसने अपनी आवाज़ को और ऊँचा करते हुए कहा, "मैंने हर जगह देख लिया, वो हार नहीं मिल रहा। ये जरूर तुम्हारी माँ ने ही चुराया होगा। उनकी नज़र मेरे गहनों पर कब से थी।" राजेश ने एक बार फिर समझाने की कोशिश की, "सुमन, प्लीज चुप हो जाओ। माँ पर इस तरह का इल्ज़ाम लगाना ठीक नहीं है।" सुमन ने उसकी एक न सुनी और ताने मारते हुए बोली, "अगर मुझे न्याय नहीं मिला, तो मैं ये घर छोड़कर चली जाऊँगी। तुम हमेशा अपनी माँ की ही तरफदारी करते हो।" राजेश को अपनी माँ की यादें एक-एक करके याद आने लगीं। कैसे उसकी माँ ने उसे पालने-पोसने के लिए अपने हिस्से की रोटी तक छोड़ दी थी। उसकी माँ की एक-एक कुर्बानी उसे याद आ रही थी। उसने अपनी आवाज़ को संयम में रखते हुए कहा, "सुमन, अगर तुम्हें लगता है कि ये घर छोड़कर जाना ही सही है, तो तुम चली जाओ। लेकिन एक बात याद रखना, जो माँ अपने हिस्से की रोटी तक बेटे के लिए छोड़ देती थी, वो कभी चोरी नहीं कर सकती।" यह बात सुनकर सुमन को लगा कि शायद उसने ज्यादा ही कह दिया। वो कुछ क्षणों के लिए चुप हो गई, लेकिन अपने मन के संदेह को छोड़ नहीं पाई। सुमन की बातें और उसके इल्जाम सुनते हुए राजेश की माँ दरवाजे के पीछे खड़ी थी। उसने अपने बेटे की बातें सुनीं, और उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उसे अपने बेटे पर गर्व हुआ कि उसने अपनी माँ पर भरोसा बनाए रखा, लेकिन साथ ही उसे इस बात का भी दुःख हुआ कि उसकी बहू ने उस पर ऐसे घिनौने आरोप लगाए। रात हो गई, लेकिन उस घर में सन्नाटा पसरा हुआ था। राजेश और सुमन के बीच जो अनकहा संवाद था, उसने एक अजीब सी खामोशी को जन्म दिया। अगले दिन सुबह सुमन को अचानक एक पुराने बक्से में हार मिल गया। उसे याद आया कि उसने किसी काम के चलते कुछ दिन पहले उसे वहाँ रख दिया था, लेकिन फिर भूल गई। सुमन का दिल धड़क उठा। उसे अपने किए पर गहरा पछतावा हुआ। उसने सोचा कि क्या वह इतनी छोटी बात को इतना बड़ा मुद्दा बनाकर सही कर रही थी? उसे अपनी सास पर इल्जाम लगाने की बात बार-बार कचोट रही थी। उसने सोचा, "मैंने माँ जैसी सास पर इतनी भयानक बात का इल्जाम लगा दिया।" सुमन का मन अब शर्मिंदगी से भर चुका था। उसे समझ में आ गया था कि वह अपने शक के कारण अनजाने में ही बहुत गलत कर चुकी थी। फिर वह अपनी सास के कमरे में गई। उसकी सास एक चुपचाप बैठी हुई थी। सुमन ने उनके पास जाकर धीमे स्वर में कहा, "माँजी, मुझे माफ कर दीजिए। मैंने आप पर बेबुनियादी आरोप लगाए। मैं बहुत शर्मिंदा हूँ।" उसकी सास ने उसकी ओर देखा, और बिना किसी नाराजगी के मुस्कुराते हुए उसे गले लगा लिया। वह बोलीं, "बेटी, मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है। मैं जानती हूँ कि कभी-कभी शक और गुस्सा हमसे ऐसी बातें कहलवा देते हैं, जिनका हमें बाद में पछतावा होता है।" सुमन की आँखों में आँसू आ गए। उसने सोचा कि जो इंसान उसे इतना प्यार और अपनापन दे सकता है, उस पर उसने ऐसा इल्जाम लगाया। उसे समझ में आ गया कि सच्चा अपनापन और प्यार कभी किसी को चोट पहुँचाना नहीं सिखाता। उस दिन के बाद सुमन ने न केवल अपनी सास के साथ अपना रिश्ता मजबूत किया, बल्कि खुद को भी बदलने का संकल्प लिया। उसने ठान लिया कि वह अब किसी भी रिश्ते में शक और गलतफहमी को कभी जगह नहीं देगी। ******
- गलत मार्ग का अंजाम
रत्न सावरकर किसी ग्राम में किसान दम्पती रहा करते थे। किसान तो वृद्ध था पर उसकी पत्नी युवती थी। अपने पति से संतुष्ट न रहने के कारण किसान की पत्नी सदा पर-पुरुष की टोह में रहती थी, इस कारण एक क्षण भी घर में नहीं ठहरती थी। एक दिन किसी ठग ने उसको घर से निकलते हुए देख लिया। उसने उसका पीछा किया और जब देखा कि वह एकान्त में पहुँच गई तो उसके सम्मुख जाकर उसने कहा, “देखो, मेरी पत्नी का देहान्त हो चुका है। मैं तुम पर अनुरक्त हूं। मेरे साथ चलो।” वह बोली, “यदि ऐसी ही बात है तो मेरे पति के पास बहुत-सा धन है, वृद्धावस्था के कारण वह हिलडुल नहीं सकता। मैं उसको लेकर आती हूं, जिससे कि हमारा भविष्य सुखमय बीते।” “ठीक है जाओ। कल प्रातःकाल इसी समय इसी स्थान पर मिल जाना।” इस प्रकार उस दिन वह किसान की स्त्री अपने घर लौट गई। रात होने पर जब उसका पति सो गया, तो उसने अपने पति का धन समेटा और उसे लेकर प्रातःकाल उस स्थान पर जा पहुंची। दोनों वहां से चल दिए। दोनों अपने ग्राम से बहुत दूर निकल आए थे कि तभी मार्ग में एक गहरी नदी आ गई। उस समय उस ठग के मन में विचार आया कि इस औरत को अपने साथ ले जाकर मैं क्या करूंगा। और फिर इसको खोजता हुआ कोई इसके पीछे आ गया तो वैसे भी संकट ही है। अतः किसी प्रकार इससे सारा धन हथियाकर अपना पिण्ड छुड़ाना चाहिए। यह विचार कर उसने कहा, “नदी बड़ी गहरी है। पहले मैं गठरी को उस पार रख आता हूं, फिर तुमको अपनी पीठ पर लादकर उस पार ले चलूंगा। दोनों को एक साथ ले चलना कठिन है।” “ठीक है, ऐसा ही करो।” किसान की स्त्री ने अपनी गठरी उसे पकड़ाई तो ठग बोला, “अपने पहने हुए गहने-कपड़े भी दे दो, जिससे नदी में चलने में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होगी। और कपड़े भीगेंगे भी नहीं।” उसने वैसा ही किया। उन्हें लेकर ठग नदी के उस पार गया तो फिर लौटकर आया ही नहीं। वह औरत अपने कुकृत्यों के कारण कहीं की नहीं रही। इसलिए कहते हैं कि अपने हित के लिए गलत कर्मों का मार्ग नहीं अपनाना चाहिए। *******
- मां का घर
सविता देवी एक दिन मैंने अपने पति के साथ झगड़े वाली सारी बातें अपने भाई को बता दी तो भाई ने कहा कि एक काम करो तुम कुछ दिनों के लिए हमारे घर आ जाओ...!! जब तुम दोंनो कुछ दिन एक दूसरे से अलग रहोगे तो तुम दोंनो को एक दूसरे की कमी का एहसास होगा...!! फिर मैं कुछ दिनों के लिए पति का घर छोड़कर भाई के घर आ गई... हालांकि मेरा भाई बहुत अच्छा है मुझे बहुत प्यार भी करता है पर कहते हैं न कि भाई चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो परन्तू...!! अगर कोई काम भाभी की मर्जी के हो तो घर का माहौल, खराब होने में देर नहीं लगती...!! कुछ दिनों बाद ही भाभी को लगने लगा कि कहीं मैं हमेशा के लिए ही मायके में ना रह जाऊं,इसलिए वो दूसरों पर डालकर मुझे हर दिन कुछ ना कुछ ताना मारने लगी कि...!! "ये घर छोड़ने वाली लड़कियों का ना कोई घर नहीं होता"ना घर की रहती है ना घाट की....!! मैं भाभी के इसारे अच्छे से समझने लगी, कुछ ही दिनों में मुझे लगने लगा कि, यह अब मेरा मायका नहीं है बल्कि अब यह भाभी का घर है...!! इधर मेरे पति को भी अकेला पन महसूस होने लगा तो वो मुझे लेने आ गये और मैं उनसे लिपट कर रोने लगी... फिर उन्होंने मेरे आंसू पोछे....!! फिर मैं भाई का घर छोड़कर वापस ससुराल आ गयी... रास्ते भर मैं बस यही सोचती रही कि जब तक घर में मां होती है तब तक ही मायका अपना घर लगता है उसके बाद तो सिर्फ भाभी का घर बन जाता है...!! शायद तभी तो कहते हैं कि "मायका माँ से होता है....!! ******
- जीवन गणित
सन्दीप तोमर जिंदगी के गणित में तुमने रेखागणित को चुना और मैं, मैं खुद बना रहा एलजेब्रा मान लेता अचर को कोई चर और सुलझा लेता उलझी हुई समीकरणों को, एक रोज जब मैंने चाहा जिंदगी का हल तब तुम बोली- रेखागणित सी इस दुनिया में मैं और .... और तुम दो समांतर रेखाएँ जैसे नदी के दो तीर, सिर्फ साथ चल सकते हैं, दूर से एक-दूसरे को देख सकते हैं, शायद महसूस भी कर सकते हैं लेकिन, अगर गलती से मिल गये तो अपना अस्तित्व समाप्त, मैंने कहना चाहा प्रतिउत्तर में- तिर्यक रेखाएँ भी उसी रेखागणित का हिस्सा है, साथ चलते हुए एक बार मिलती है और बस एक बार मिलकर फिर नहीं मिलती और यह मिलना कोई संयोग न होकर हो जाता है अक्सर ऐतिहासिक योग शकुंतला का जन्म भी सम्भवतः ऐसे ही तिर्यक रेखाओं का अद्भुद संयोग रहा होगा लेकिन-तुमने बाँध लिया खुद को समांतर रेखाओं के दायरे में, ये दायरे मुझे एलजेब्रा से निकाल समांतर रेखा की मर्यादा सिखाते लगते हैं और मैं ख़ो जाता हूँ वृत की एक निश्चचित त्रिज्या के गिर्द घूमते पथ से निर्मित परिधि के आकर्षण में। ******
- इज्जत और इंसानियत
गोपाल चंद्र सर्दियों की सुबह थी। मुंबई एयरपोर्ट पर भीड़ अपने चरम पर थी। बिजनेस ट्रैवलर्स लैपटॉप लेकर भाग रहे थे, परिवार छुट्टियों पर जाने को तैयार थे और हर तरफ चकाचौंध थी। इसी भीड़ में एक बुजुर्ग महिला, श्रीमती विमला देवी, धीरे-धीरे चलते हुए एयरलाइंस के काउंटर तक पहुंची। उनका पहनावा सादा था - एक सूती साड़ी, ऊपर पुराना शॉल और पैरों में साधारण चप्पलें। हाथ में एक प्लास्टिक कवर में रखी प्रिंटेड टिकट थी। चेहरे पर शांति थी, लेकिन आंखों में थकान भी थी। उन्हें बस सीट कंफर्म होने का आश्वासन चाहिए था। उन्होंने काउंटर पर खड़ी लड़की से विनम्रता से पूछा, “बिटिया, यह मेरी टिकट है। सीट कंफर्म है क्या? मुझे भोपाल जाना है।” लड़की ने उन्हें ऊपर से नीचे तक देखा, फिर मुंह बनाया और बोली, “आंटी, यह रेलवे स्टेशन नहीं है। यहां बोर्डिंग ऐसे नहीं मिलती। पहले ऑनलाइन चेक इन करना पड़ता है।” विमला देवी थोड़ी घबरा गईं—”मुझे नहीं आता बेटा यह सब, बस एक बार देख लो प्लीज।” पास खड़ा एक और कर्मचारी हंसते हुए बोला, “इन्हें कौन टिकट देता है भाई? ये लोग ऐसे ही फालतू घूमते हैं। आंटी, आप घर जाइए, यह आपके बस की बात नहीं है।” भीड़ के बीच कुछ लोग देख रहे थे, लेकिन कोई कुछ नहीं बोला। किसी को जल्दी थी, किसी को फर्क नहीं पड़ा। विमला देवी फिर बोलीं, “बस एक बार कंप्यूटर में चेक कर लीजिए, टिकट असली है बेटा।” लड़की ने टिकट ली, बिना देखे ही फाड़ डाली और जोर से कहा, “मैम, प्लीज क्लियर द एरिया, दिस इज नॉट अलाउड हियर!” विमला देवी स्तब्ध रह गईं, हाथ में अब सिर्फ आधी फटी हुई टिकट थी। उनका चेहरा सूना पड़ गया, धीरे से गर्दन झुकाई और पीछे मुड़कर भीड़ में खो गईं। बाहर एयरपोर्ट के गेट के पास वह एक बेंच पर जाकर बैठ गईं। कपकपाती ठंड में हाथ कांप रहे थे, लेकिन चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था, बस एक ठहराव। उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू में लिपटा पुराना छोटा सा कीपैड वाला फोन निकाला, जिसकी स्क्रीन धुंधली पड़ चुकी थी। एक नंबर डायल किया—”हां, मैं एयरपोर्ट पर हूं। जैसा डर था वैसा ही हुआ। अब आपसे अनुरोध है, वह आदेश जारी कर दीजिए। हां, तुरंत।” कॉल काटने के बाद उन्होंने एक लंबी सांस ली और आंखें बंद कर लीं। अंदर एयरपोर्ट पर हलचल शुरू हुई। काउंटर पर काम कर रहे कर्मचारियों को मैनेजर ने बुलाया—”सब बोर्डिंग प्रोसेस रोक दो। फ्लाइट्स के क्लीयरेंस ऑर्डर रुके हैं। कुछ इशू आया है।” कुछ ही मिनटों में सिक्योरिटी चीफ का फोन बजा—”डीजीसीए से कॉल आया है। हमारी आज की फ्लाइट्स पर रोक लगाई गई है। कोई वीआईपी केस है?” परेशान स्टाफ सोच में पड़ गया—वीआईपी किसने शिकायत की? तभी एक काले रंग की गाड़ी एयरपोर्ट गेट पर रुकी। उसमें से निकले तीन लोग—एक वरिष्ठ एयरलाइन अधिकारी, एक निजी सहायक और एक वरिष्ठ सुरक्षाकर्मी। उनके साथ बेंच पर बैठी बुजुर्ग महिला अब खड़ी हो चुकी थी और एयरपोर्ट के उसी प्रवेश द्वार की ओर बढ़ रही थी, जहां कुछ देर पहले उन्हें “आंटी, यह रेलवे स्टेशन नहीं है” कहा गया था। एयरपोर्ट का माहौल बदल चुका था। उड़ानों की अनाउंसमेंट बंद, सन्नाटा छा गया। कई पैसेंजर्स से कहा गया—थोड़ी देर रुकिए, टेक्निकल इशू है। लेकिन स्टाफ खुद नहीं जान रहा था असली वजह क्या है। तभी एयरलाइन काउंटर के पास वही बुजुर्ग महिला फिर से प्रकट हुईं। इस बार उनके साथ एयरलाइन की चीफ ऑपरेशंस ऑफिसर, डीजीसीए के वरिष्ठ सलाहकार और एक विशेष सुरक्षा अधिकारी थे। भीड़ हटी, रास्ता बना। जिन कर्मचारियों ने कुछ देर पहले उन्हें धकेला था, अब उनके चेहरे पर पसीना था। विमला देवी धीरे-धीरे उस काउंटर की ओर बढ़ीं जहां उनकी टिकट फाड़ी गई थी। उन्होंने जेब से एक और कार्ड निकाला—उस पर लिखा था: “श्रीमती विमला देवी, वरिष्ठ नागरिक एवं नागर विमानन मंत्रालय की सलाहकार, पूर्व अध्यक्ष नागरिक विमानन प्राधिकरण।” उनकी पहचान देखकर मैनेजर का चेहरा सफेद पड़ गया। तभी डीजीसीए अधिकारी ने गुस्से में कहा—”आप लोगों ने इन्हें बेइज्जत किया, बिना आईडी देखे टिकट फाड़ दी।” काउंटर पर खड़ी लड़की के हाथ से टिकट का फटा टुकड़ा गिर गया। विमला जी ने पहली बार कुछ कहा, आवाज में गुस्सा नहीं, सिर्फ पीड़ा थी—”मैं चिल्लाई नहीं क्योंकि मैंने जिंदगी में बहुत कुछ देखा है। लेकिन आज देखा इंसानियत कितनी खोखली हो चुकी है। तुमने मेरी टिकट नहीं फाड़ी, तुमने उस मूल्य को फाड़ा है जो सम्मान कहलाता है।” भीड़ में सन्नाटा था। कुछ लोग मोबाइल से वीडियो बनाने लगे। एयरलाइन की सीनियर मैनेजमेंट सामने आई—”मैम, हम शर्मिंदा हैं, पूरी टीम से माफी मांगते हैं।” विमला जी ने मुस्कुरा कर कहा, “माफी उनसे मांगो जो आगे भी ऐसे पहनावे देखकर लोगों को परखते रहेंगे। मेरे जाने के बाद भी किसी और को यह अपमान सहना ना पड़े।” फैसला तुरंत हुआ—जिन दो कर्मचारियों ने टिकट फाड़ी थी, उन्हें निलंबित कर दिया गया। एयरपोर्ट पर सभी कर्मचारियों को एल्डर डिग्निटी एंड डिस्क्रिमिनेशन पर अनिवार्य ट्रेनिंग करवाने का आदेश दिया गया। डीजीसीए द्वारा उस एयरलाइन को एक सप्ताह की चेतावनी दी गई—यदि किसी और वरिष्ठ नागरिक के साथ ऐसी घटना दोहराई गई, लाइसेंस सस्पेंशन की कार्यवाही शुरू की जाएगी। विमला जी का चेहरा अब शांत था। उन्होंने किसी को नीचा नहीं दिखाया, कोई चिल्लाहट नहीं, कोई बदला नहीं। बस शालीनता से सबको आईना दिखा दिया। वह गेट की ओर बढ़ीं। इस बार उन्हें कोई नहीं रोक रहा था। एक कर्मचारी उनके पास दौड़ता हुआ आया—”मैम, कृपया बैठ जाइए, हम आपके लिए विशेष लाउंज तैयार करवा रहे हैं।” विमला जी ने कहा, “नहीं बेटा, मुझे भीड़ में बैठना अच्छा लगता है। वहां इंसानियत के असली चेहरे दिखते हैं।” अब विमला देवी एयरपोर्ट के उसी वेटिंग ज़ोन में एक कोने में बैठ गईं। सबकी नजरें उन पर थीं, पर नजरिया बदल चुका था। कुछ लोग मोबाइल में उनका नाम सर्च कर रहे थे, कुछ पूछ रहे थे—यह हैं कौन? और जो सर्च कर पा रहे थे, उनके चेहरे पर चौंकाहट साफ थी। विमला देवी कोई सामान्य बुजुर्ग नहीं थीं—देश के सबसे पहले डीजीसीए रिफॉर्म पॉलिसी बोर्ड की अध्यक्ष रहीं। उनकी अगुवाई में भारत ने पहली बार एल्डरली फ्रेंडली एवीएशन पॉलिसी लागू की। कई अंतरराष्ट्रीय एयरलाइन प्रोजेक्ट्स की मुख्य सलाहकार रहीं। पद्म भूषण से सम्मानित, पर कभी उसका ढिंढोरा नहीं पीटा। उनकी पहचान वीआईपी पास से नहीं, उनकी सादगी और सोच से बनी थी। एक पत्रकार ने धीरे से उनके पास जाकर पूछा—”मैम, आप इतने चुप क्यों रही जब आपको धक्का दिया गया?” विमला जी मुस्कुराते हुए बोलीं, “कभी इसी एयरपोर्ट पर मैंने वर्दी पहनकर आदेश दिए थे। आज उसी एयरपोर्ट पर आम आदमी बनकर अपमान झेल रही थी। मैं जानना चाहती थी—क्या हमारे बनाए कानून सिर्फ फाइलों में हैं या दिलों में भी?” उनकी वापसी का मकसद क्या था? वह एयरलाइन उनकी पुरानी पेंशन फंड कंपनी में इन्वेस्टर थी। आज वह सिर्फ यह देखने आई थीं—क्या इस देश में अब भी बुजुर्गों को इज्जत मिलती है? उनके अनुभव ने सिखाया—किसी सिस्टम की ताकत उसकी तकनीक में नहीं, उसकी संवेदनशीलता में होती है। जो दिखता है वही सच नहीं होता। काउंटर स्टाफ जो पहले मजाक कर रहे थे, अब आंखें नीची किए खड़े थे। विमला जी ने उनमें से एक युवा कर्मचारी को पास बुलाया। लड़का कांप रहा था। “बेटा, तुमने मेरी टिकट फाड़ी थी। अब जिंदगी में किसी का सम्मान मत फाड़ना। यह कुर्सियां बदल जाएंगी। लेकिन तुम्हारी सोच वही तुम्हें आदमी बनाती है या सिर्फ एक मशीन।” अब लाउंज में बैठा हर यात्री आज कुछ सीख कर जा रहा था। किसी ने लिखा ट्विटर पर—”आज देखा असली ताकत वो है जो चुप रहती है और जरूरत पड़ने पर सिर्फ एक कॉल से पूरा सिस्टम हिला देती है।” एक बुजुर्ग महिला ने मुस्कुराकर कहा—”वह इंसान अकेले नहीं थी, उनके साथ पूरा अनुभव खड़ा था।” फ्लाइट बोर्डिंग शुरू हो चुकी थी। घोषणा हो रही थी—”विस्तारा फ्लाइट 304 बेंगलुरु के लिए अब बोर्डिंग गेट 5B से शुरू हो रही है।” लेकिन आज कोई भी यात्री उतनी जल्दी में नहीं था जितना अक्सर होता है। सबकी नजरें अब भी उस बुजुर्ग पर टिकी थीं, जिसने एक टूटे टिकट से पूरा सिस्टम हिला दिया। विमला जी ने धीरे से उठकर अपना पुराना बैग उठाया, जिसमें इतिहास का भार था। वह चलते हुए गेट की ओर बढ़ीं। रास्ते में वही मैनेजर जिसने उन्हें अपमानित किया था, उनके सामने हाथ जोड़कर खड़ा था—”मैम, प्लीज एक बार माफ कर दीजिए।” विमला जी रुकीं, उसकी आंखों में देखा और बोलीं, “माफ कर दूंगी, लेकिन शर्त पर—हर उस यात्री से माफी मांगो जो तुम्हारे शब्दों से टूटे हैं, और हर उस बुजुर्ग को नम्रता से देखो जो तुम्हारे सिस्टम की बेंचों पर बैठते हैं।” गेट पर पहुंचते ही एयरलाइन की सीनियर टीम उनका इंतजार कर रही थी। फूलों का गुलदस्ता, वीआईपी चेयर सब रखा गया था। लेकिन उन्होंने मुस्कुराकर मना कर दिया—”मैं वीआईपी नहीं, एक रिमाइंडर हूं कि बुजुर्ग कोई बोझ नहीं बल्कि नीम है इस समाज की।” नीचे एयरपोर्ट पर कर्मचारी अब भी उस फटे हुए टिकट को देख रहे थे। उनमें से एक ने धीरे से कहा—”हमने उनकी टिकट नहीं फाड़ी, हमने अपनी सोच का पर्दा उतार दिया। इंसान की पहचान उसके कपड़ों से नहीं, बल्कि उस जख्म से होती है जो वह चुपचाप सहता है और फिर भी मुस्कुरा कर माफ कर देता है। जिसे तुमने मामूली समझा वही तुम्हारी आखिरी उम्मीद हो सकता है। इज्जत सिर्फ ऊंचे पद के लिए नहीं, इंसानियत के लिए होनी चाहिए।” ******
- जनता को मूर्ख बनाते हैं
रमेश चंद शर्मा सावधान जनता समझ रही है स्वदेशी के गीत गाते थे, स्वदेशी नाम से ललचाते थे, स्वदेशी आन्दोलन चलाते थे, सड़कों पर नजर आते थे, अफवाह, झूठ खूब फैलाते हैं, अब क्या कर रहे हो भाई।। बिना बुलाए आते थे, झूठा संवाद चलाते थे, झूठी कसमें खाते थे, नारे खूब लगाते थे, सत्ता के लिए छटपटाते थे, सत्ता कैसे भी पाते है।। जनता को मूर्ख बनाते है, ढोंग खूब रचाते है, वादे नहीं निभाते है, जुमले उन्हें बताते है, अपने को भगत कहलाते हैं, अब चेहरा सामने आया है।। सत्ता जब से हाथ आई, स्वदेशी की खत्म लडाई, भूले कसमें थी जो खाई, औढली अब नई रजाई, रंगीन सियार की कहानी याद आई, अब सत्ता का मजा उड़ाते हैं।। जान गए सब भाई बहना, पहनें बैठे सत्ता का गहना, मौज मस्ती में सीखा जीना, अब स्वदेशी की बात नहीं कहना, जनता को है अब दुःख सहना, इनके हाथ लगी मोटी मलाई है।। ढूढ़ लिया अब नया काम, पडौसी का काम तमाम, छात्रों पर बंदूकें तान, अर्बन नक्सली बदनाम, हाथ लगा दंड भेद साम दाम, नफरत, हिंसा फैलाते हैं।। हाथ लगे अब नए भेद, काट रहे आम जनता के खेत, गंगा मैया की बेच रहे रेत, सन्यासियों के दिए गले रेत, काम एक नहीं करते नेक, भ्रम भयंकर फैलाते हैं।। अपने ही लोगों को बांटे, दुनिया के करें सैर सपाटे, मजदूर किसान का गला काटे, जनता खाए मुंह पर चांटे, धनपतियों के पैर चाटे, अपने भर रहे गोदाम।। खत्म हो गई क्या मंहगाई, रुपए की क्या दशा बनाई, जीएसटी नोटबंदी एफडीआई, जेबें भर कर करी कमाई, लोग कह रहे राम दुहाई, इनको जरा नहीं शर्म आई, ऐसा राम राज्य लाये हैं।। एक योगी बन गया लाला, एक बने प्रदेश के आला, गौ माता ढूढे ग्वाला, मांस निर्यात में बना देश आला, दबके कर रहे धंधा काला, खूब डकारी काली कमाई है।। भय भेद भूख नफरत बढ़ाई, भूल गए अपनी लडाई, अमेरिका से सवारी बुलाई, कोरोना की बारी आई, दूसरों के सिर मंढी बुराई, शिक्षा ऐसी पाई है।। आँखों में पड़ गए जाले, जनता के मुंह में छाले, दुश्मन हमने कैसे पाले, जीने के पड़ गए लाले, इनसे देश संभले ना संभाले, घोप दिए छाती में भाले, सत्यानाश किया भारी है।। कम्पनी बेचीं, कारखाने बेचे, रेल बेचीं प्लेटफार्म बेचे, कोयले की खान बेची, अपनी शान आन बेची, फायदे वाली दुकान बेची, अब आगे किसकी बारी, अक्ल गई इनकी मारी, बचने की खुद करो तैयारीI *****
- सिर्फ तेरे लिए
काजल शर्मा वो चूड़ियाँ जो सिर्फ़ तेरे लिए पहनी थी! कहाँ शौक था मुझे, सजने-सवरने का। नैनो में काला काजल, तो माथे पे बिंदिया लगाने का। तुझे देख पलकें झुकाने, और मुस्कुराने शर्माने का। कहाँ शौक था मुझे, खुद को एक युवती बनाने का। हाथों में चूड़ी, पैरों में पायल छनकाने का। केशों को खुला छोड़, ज़ुल्फों को पीछे हटाने का। कहाँ शौक था मुझे, खुद में शार्मो हया लाने का। हाँ! ये चूड़ियाँ सिर्फ़ तेरे लिए पहनी थी, अंदाज़ था मेरा तुझे इशारों में बुलाने का। दुपट्टे को सलीके से ओढ़, इस दफा सूट में नज़र आने का। कहाँ शौक था मुझे, तेरी चाहत में इतना बदल जाने का। चूड़ियाँ जो सिर्फ़ तेरे लिए पहनी थी! सिर्फ तेरे लिए! *******
- सौदा
अंजलि शर्मा इस बड़े शहर में एक छोटा सा कॉस्मेटिक शॉप है मेरा। पति ने खोला था मेरे नाम पर। झुमकी श्रृंगार स्टोर। आज एक नया जोड़ा आया है मेरे दुकान पर। स्टाफ ने बताया कि सुबह से दूसरी बार आये हैं। एक कंगन इन्हें पसंद है पर इनके हिसाब से दाम ज्यादा है। इन्हें देख इस दुकान की नींव, मेरा वजूद, और अपनी कहानी याद आ गई। ऐसे ही शादी के बाद पहली बार हम एक मेले में साथ गए थे। मुझे काँच की चूड़ियों का एक सेट पसंद आया था। तब आठ रुपये की थी और हम ले ना पाए थे। ये बार बार पाँच रुपये की बात करते मगर उसने देने से मना कर दिया। उन्हें मुझे वो चूड़ी ना दिलाने का अफसोस ज़िंदगी भर रहा था। क्यूंकि उस दिन मैं पहली बार उनके साथ मेले में गई थी और कुछ पसंद किया था। उसदिन इनके जेहन में इस दुकान की नींव पड़ गई थी। इतना प्रेम करते थे मुझसे कि फिर कभी कुछ माँगना ही ना पड़ा। मेरी खुशियों के लिए रातदिन एक कर दिया। ये सब याद कर मेरी गीली आँखे इनके फूल चढ़े तसवीर की तरफ गई जिसके शीशे में ये जोड़ी नज़र आ रही थी। "सर! सुबह ही कहा था कि हजार से कम नहीं होगा" "चलिये ना, कोई बात नहीं! फिर कभी ले लेंगे" दोनों सीधे साधे गाँव के लग रहे थे बिलकुल जैसे हम थे। लड़की मेरी ही तरह स्थिति समझ रही है और लड़के में इनके जैसा उसे दिला देने की ललक और ज़िद्द। इस प्यार को मैं महसूस कर रही थी "एक बार और देख लीजिए ना अगर सात सौ तक भी..!" "एक ही बात कितनी बार बोलूं सर, नहीं हो सकता" जैसे मैं इनका हाथ लिए मेले के उस दुकान से वापस जा रही थी और ये मायूस हो कदम वापस ले रहे थे..ये जोड़ा भी दुकान से बढ़ने ही वाले थे "रुकिए आपलोग! कौन सा कंगन पसंद है" "ये गोल्डेन और रेड वाला मैम" स्टाफ ने कहा "इस पर तो कल ही फिफ्टी परसेंट डिस्काउंट लगाने बोला था तुमको।" "कब बोला था मैम"? "अच्छा! लगता है मैं भूल गई थी..जी ये अब पाँच सौ का ही है, आप ले जाइए" लड़के की खुशी देख मुझे महसूस हो रहा था कि उसदिन ये भी ऐसे ही खुश होते। स्टाफ मुझे ऐसे देख रहा था जैसे आज पहली बार मैंने घाटे का सौदा किया हो। पर उसे क्या पता खुशियों का सौदा नहीं होता..... ******











