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  • देवांगना

    आचार्य चतुरसेन शास्त्री का उपन्यास Chapter 01 प्रस्तावना  : देवांगना आज से ढाई हज़ार वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध ने अपने शिष्यों को ब्रह्मचर्य और सदाचार की शिक्षा देकर बहुत जनों के हित के लिए, बहुत जनों के सुख के लिए, लोक पर दया करने के लिए, देव-मनुष्यों के प्रयोजन-हित सुख के लिए संसार में विचरण करने का आदेश दिया। वह 44 वर्षों तक, बरसात के तीन मासों को छोड़कर विचरण करते और लोगों को धर्मोपदेश देते रहे। उनका यह विचरण प्रायः सारे उत्तर प्रदेश और सारे बिहार तक ही सीमित था। इससे बाहर वे नहीं गये। परन्तु उनके जीवनकाल में ही उनके शिष्य भारत के अनेक भागों में पहुँच गये थे। ई. पू. 253 में अशोक ने अपने धर्मगुरु आचार्य मोग्गलिपुत्र तिष्य के नेतृत्व में भारत से बाहर बौद्ध धर्मदूतों को भेजा। भारत के बाहर बौद्धधर्म का प्रचार भारतीय इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। इस समय प्रायः सारा भारत, काबुल के उस ओर हिन्दुकुश पर्वतमाला तक, अशोक के शासन में था। बुद्ध के जीवनकाल में पेशावर और सिन्धु नदी तक, पारसीक शासानुशास दारयोश का राज्य था। तक्षशिला भी उसी के अधीन था। उन दिनों व्यापारियों के सार्थ पूर्वी और पश्चिमी समुद्र तट तक ही नहीं, तक्षशिला तक जाते-आते रहते थे। उनके द्वारा दारयोश के पश्चिमी पड़ोसी यवनों का नाम बुद्ध के कानों तक पहुँच चुका था। परन्तु उस काल का मानव संसार बहुत छोटा था। चन्द्रगुप्त के काल में सिकन्दर ने पंजाब तक पहुँचकर मानव संसार की सीमा बढ़ाई। अशोक काल में भारत का ग्रीस के राज्यों से घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित हआ, जो केवल राजनैतिक और व्यापारिक ही न था, सांस्कृतिक भी था। इसी से अशोक को व्यवस्थित रूप में धर्म-विजय में सफलता मिली और बौद्धधर्म विश्वधर्म का रूप धारण कर गया। इतना ही नहीं; जब बौद्धधर्म का सम्पर्क सभ्य-सुसंस्कृत ग्रीकों से हुआ जहाँ अफलातून और अरस्तू जैसे दार्शनिक हो चुके थे, तो बौद्धधर्म महायान का रूप धारण कर अति शक्तिशाली बन गया। महायान ने बौद्धधर्म जीवन का एक ऐसा उच्च आदर्श सामने रखा जिसमें प्राणिमात्र की सेवा के लिए कुछ भी अदेय नहीं माना गया तथा इस आदर्श ने शताब्दियों तक अफगानिस्तान से जापान और साइबेरिया से जावा तक सहृदय मानव को अपनी ओर आकृष्ट किया। महायान ने ही शून्यवाद के आचार्य नागार्जुन-असंग-वसुबन्धु, दिङ्नाग, धर्मकीर्ति जैसे दार्शनिक उत्पन्न किए जिन्होंने क्षणिक विज्ञानवाद का सिद्धान्त स्थिर किया। जिसने गौड़पाद और शंकराचार्य के दर्शनों को आगे जन्म दिया। मसीह की चौथी शताब्दी तक महायान पूर्ण रूपेण विकसित हुआ और उसके बाद अगली तीन शताब्दियों में उसने भारत और भारत की उत्तर दिशा के बौद्धजगत् को आत्मसात् कर लिया। इसी समय से वज्रयान उसमें से अंकुरित होने लगा। और आठवीं शताब्दी में चौरासी सिद्धों की परम्परा के प्रादुर्भाव के साथ वज्रयान भारत का प्रमुख धर्म बन गया। बौद्धधर्म का यह अंतिम रूप था, जो अपने पीछे वाममार्ग को छोड़कर तेरहवीं शताब्दी में तुर्कों की तलवार से छिन्न-भिन्न हो गया। भारतीय जीवन को बौद्धधर्म ने एक नया प्राण दिया। बौद्ध-संस्कृति भारतीय संस्कृति का एक अभंग और महत्त्वपूर्ण अंग थी। उसने भारतीय-संस्कृति के प्रत्येक अंग को समृद्ध किया। न्याय-दर्शन और व्याकरण में जैसे चोटी के हिन्दू विद्वान् अक्षपाद, वात्स्यायन, वाचस्पति, उदयनाचार्य थे. उससे कहीं बढ़े-चढ़े बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन, वसुबन्धु, दिङ्नाग, धर्मकीर्ति, प्रज्ञाकर गुप्त और ज्ञानश्री थे। पाणिनि, कात्यायन और पतंजलि जैसे दिग्गज हिन्दू वैयाकरणों के मुकाबिले में बौद्ध पण्डित काशिकाकार जयादित्य, न्यासकार जिनेन्द्रबुद्धि तथा पाणिनि सूत्रों पर भाषा वृत्ति बनाने वाले पुरुषोत्तमदेव कम न थे। कालिदास के समक्ष अश्वघोष को हीन कवि नहीं माना जा सकता। सिद्ध नागार्जुन तो भारतीय रसायन के एकक्षत्र आचार्य हैं। आरम्भिक हिन्दी का विकास भी बौद्धों ने किया। उनके अपभ्रंश काव्यों की पूरी छाप उत्तर कालीन संतों की निर्गुण धारा पर पड़ी। इतना ही नहीं, कला का विकास भी बौद्धों ने अद्वितीय रूप से किया। साँची, भरहुत, गान्धार, मथुरा, धान्य कण्टक, अजन्ता, अलची-सुभरा की चित्रकला एवं ऐलोरा-अजन्ता, कोली-भाजा के गुहाप्रासाद बौद्धों की अमर देन है। इस प्रकार साहित्य-संस्कृतिमूर्तिकला-चित्रकला और वास्तुकला के विकास में बौद्ध संस्कृति ने भारत को असाधारण देन दी।

  • रिश्तों की असली कीमत

    दीपक दिवाकर पत्नी रचना ने जज के सामने ठंडे स्वर में कहा, “मुझे तलाक मंजूर है, लेकिन इसके बदले मुझे एक लाख रुपए चाहिए।” पूरा कोर्टरूम सन्न रह गया। सबकी नजरें उस व्हीलचेयर पर बैठे विशाल की ओर मुड़ गईं। उसकी आँखों में कोई शिकवा नहीं था, बस एक गहरी चुप्पी थी। तभी पीछे की बेंच से एक छोटा सा लड़का, अंश, उठा। उसके हाथ में एक मुड़ी-तुड़ी चिट्ठी थी। उसने कहा, “जज साहब, ये पापा ने मेरे लिए लिखी थी।” उस चिट्ठी के शब्द अदालत की दीवारों को भी पिघला गए। जज साहब ने चिट्ठी खोली, पूरा कोर्टरूम खामोश हो गया। चिट्ठी में लिखा था— “प्रिय अंश, अगर कभी तुम मेरी आँखों में खालीपन देखो तो समझना कि वह रोशनी तुम्हारे लिए बचाकर रखी है। अगर कभी माँ को मेरी हालत पर गुस्सा आए तो उसे दोष मत देना। उसका दर्द मुझसे ज्यादा है। बेटा, तुम बड़े होकर बस इतना करना कि कभी किसी औरत को अकेला महसूस ना होने देना। और अगर मेरी हालत तुम्हें शर्मिंदगी दे तो जान लेना कि तुम्हारा पापा तुमसे बहुत प्यार करता था।” जैसे ही ये शब्द अदालत में गूंजे, वहाँ मौजूद हर इंसान की आँखें भर आईं। रचना का चेहरा पीला पड़ गया, उसकी आँखें नीचे झुक गईं। विशाल अब भी चुप था, लेकिन उसकी आँखों से आंसू बह रहे थे। शायद इसलिए कि उसने अपने बेटे को अपने सबसे गहरे जज्बात सौंप दिए थे। जज साहब ने कुछ देर तक खामोशी के बाद कहा, “यह मामला अब सिर्फ कानून का नहीं रहा, बल्कि इंसानियत और रिश्तों की सच्चाई का इम्तिहान बन गया है।” रचना के दिल पर चिट्ठी के शब्द जैसे हथौड़े की चोट कर रहे थे। उसने पहली बार अपने बेटे की आँखों में वह दर्द देखा, जो उसने कभी महसूस करने की कोशिश ही नहीं की थी। अंश की मासूम निगाहें पूछ रही थीं-माँ, क्या हमारे रिश्ते की कीमत सिर्फ रुपयों में लगाई जा सकती है? रचना का चेहरा लाल हो गया। उसने अपने आंचल से पसीना पोंछा, लेकिन उसके गाल पर अब आंसुओं की बूंदें भी उतर आई थीं।

  • बदलाव

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव बूढ़े दादा जी को उदास बैठे देख बच्चों ने पूछा, “क्या हुआ दादा जी, आज आप इतने उदास बैठे क्या सोच रहे हैं?” “कुछ नहीं, बस यूँही अपनी ज़िन्दगी के बारे में सोच रहा था।”, दादा जी बोले। “जरा हमें भी अपनी लाइफ के बारे में बताइये न।”, बच्चों ने ज़िद्द्द की। दादा जी कुछ देर सोचते रहे और फिर बोले, “जब मैं छोटा था, मेरे ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं थी, मेरी कल्पनाओं की भी कोई सीमा नहीं थी। मैं दुनिया बदलने के बारे में सोचा करता था। जब मैं थोड़ा बड़ा हुआ, बुद्धि कुछ बढ़ी, तो सोचने लगा ये दुनिया बदलना तो बहुत मुश्किल काम है, इसलिए मैंने अपना लक्ष्य थोड़ा छोटा कर लिया, सोचा दुनिया न सही मैं अपना देश तो बदल ही सकता हूँ। पर जब कुछ और समय बीता, मैं अधेड़ होने को आया, तो लगा ये देश बदलना भी कोई मामूली बात नहीं है। हर कोई ऐसा नहीं कर सकता है, चलो मैं बस अपने परिवार और करीबी लोगों को बदलता हूँ। पर अफ़सोस मैं वो भी नहीं कर पाया। और अब जब मैं इस दुनिया में कुछ दिनों का ही मेहमान हूँ तो मुझे एहसास होता है कि बस अगर मैंने खुद को बदलने का सोचा होता तो मैं ऐसा ज़रूर कर पाता और हो सकता है मुझे देखकर मेरा परिवार भी बदल जाता और क्या पता उनसे प्रेरणा लेकर ये देश भी कुछ बदल जाता और तब शायद मैं इस दुनिया को भी बदल पाता। ये कहते-कहते दादा जी की आँखें नम हो गयीं और वे धीरे से बोले, “बच्चों ! तुम मेरी जैसी गलती मत करना, कुछ और बदलने से पहले खुद को बदलना। बाकि सब अपने आप बदलता चला जायेगा। हम सभी में दुनिया बदलने की ताकत है, पर इसकी शुरआत खुद से ही होती है। कुछ और बदलने से पहले हमें खुद को बदलना होगा, हमें खुद को तैयार करना होगा। अपने कौशल को मजबूत करना होगा, अपने नज़रिये को सकारात्मक बनाना होगा, अपने लक्ष्य को फौलाद करना होगा, और तभी हम वो हर एक बदलाव ला पाएंगे जो हम सचमुच लाना चाहते हैं। *****

  • विचार स्नान

    डॉ. जहान सिंह जहान   मैं सुंदर हो गया हूँ। त्याग कर मनमैल। मैं निर्मल हो गया हूँ। मैं फिर सुंदर हो गया हूँ।। कितना सुघड़ है ये पात्र खाली कितना मधुर संगीत इसका। मैं फिर से सब का मनमीत हो गया हूँ।। जला दी आज मैंने दूषित बिचारों की अर्थी। राख कर दी अहम की खोखली हस्ती। तोड़ दी अपनी बनाई मायाजाल की बस्ती।। इस मलबे को प्रवाहित कर आया हूँ। साथ कुछ नहीं लाया हूँ।। त्याग कर सब ज्ञान की सरिता में नहाकर आया हूँ। कितना बदसूरत था ऐ सोचकर मैं हत प्रत हुआ। कितना सरल हूँ। मन मेरा प्रफुल्लित हुआ।। मैं फिर से सुंदर हो गया हूँ।। आपनी मां की गोद का बच्चा हो गया हूँ ।। त्याग कर मन मैल। मैं फिर निर्मल हो गया हूँ।। मैं सुन्दर हो गया हूँ।। ******

  • एक कहानी बड़ी सुहानी

    संतोष श्रीवास्तव ऑफिस से निकल कर शर्मा जी ने स्कूटर स्टार्ट किया ही था कि उन्हें याद आया.. पत्नी ने कहा था 1 किलो जामुन लेते आना। तभी उन्हें सड़क किनारे बड़े और ताज़ा जामुन बेचते हुए एक बीमार सी दिखने वाली बुढ़िया दिख गयी। वैसे तो वह फल हमेशा राम आसरे फ्रूट भण्डार से ही लेते थे, पर आज उन्हें लगा कि क्यों न बुढ़िया से ही खरीद लूँ? उन्होंने बुढ़िया से पूछा, माई जामुन कैसे दिए। बुढ़िया बोली, बाबूजी 40 रूपये किलो। शर्माजी बोले, माई 30 रूपये दूंगा। बुढ़िया ने कहा, 35 रूपये दे देना, दो पैसे मै भी कमा लूंगी। शर्मा जी बोले, 30 रूपये लेने हैं तो बोलो। बुझे चेहरे से बुढ़िया ने, "न" मे गर्दन हिला दी। शर्माजी बिना कुछ कहे चल पड़े और राम आसरे फ्रूट भण्डार पर आकर जामुन का भाव पूछा तो वह बोला 50 रूपये किलो हैं, बाबूजी कितने दूँ? शर्माजी बोले, 5 साल से फल तुमसे ही ले रहा हूँ। ठीक भाव लगाओ, तो उसने सामने लगे बोर्ड की ओर इशारा कर दिया। बोर्ड पर लिखा था - मोल भाव करने वाले माफ़ करें। शर्माजी को उसका यह व्यवहार बहुत बुरा लगा। उन्होंने कुछ सोचकर स्कूटर को वापस ऑफिस की ओर मोड़ दिया। सोचते सोचते वह बुढ़िया के पास पहुँच गए। बुढ़िया ने उन्हें पहचान लिया और बोली, बाबूजी जामुन दे दूँ। पर भाव 35 रूपये से कम नही लगाउंगी। शर्माजी ने मुस्कुराकर कहा, माई एक नही दो किलो दे दो और भाव की चिंता मत करो। अब बुढ़िया का चेहरा ख़ुशी से दमकने लगा। जामुन देते हुए बोली, बाबूजी मेरे पास थैली नही है। फिर बोली, एक टाइम था जब मेरा आदमी जिन्दा था, तो मेरी भी छोटी सी दुकान थी। सब्ज़ी, फल सब बिकता था उस पर आदमी की बीमारी मे दुकान चली गयी। आदमी भी नही रहा। अब खाने के भी लाले पड़े हैं। किसी तरह पेट पाल रही हूँ। कोई औलाद भी नही है, जिसकी ओर मदद के लिए देखूं। इतना कहते कहते बुढ़िया रुआंसी हो गयी और उसकी आंखों मे आंसू आ गए। शर्माजी ने 100 रूपये का नोट बुढ़िया को दिया तो वो बोली बाबूजी मेरे पास छुट्टे नही हैं, शर्माजी बोले माई चिंता मत करो, रख लो। अब मै तुमसे ही फल खरीदूंगा और कल मै तुम्हें 1000 रूपये दूंगा। धीरे धीरे चुका देना और परसों से बेचने के लिए मंडी से दूसरे फल भी ले आना। बुढ़िया कुछ कह पाती उसके पहले ही शर्माजी घर की ओर रवाना हो गए। घर पहुंचकर उन्होंने पत्नी से कहा, न जाने क्यों हम हमेशा मुश्किल से पेट पालने वाले थड़ी लगा कर सामान बेचने वालों से मोल भाव करते हैं किन्तु बड़ी दुकानों पर मुंह मांगे पैसे दे आते हैं। शायद हमारी मानसिकता ही बिगड़ गयी है। गुणवत्ता के स्थान पर हम चकाचौंध पर अधिक ध्यान देने लगे हैं। अगले दिन शर्माजी ने बुढ़िया को 500 रूपये देते हुए कहा, माई लौटाने की चिंता मत करना, जो फल खरीदूंगा उनकी कीमत से ही चुक जाएंगे। जब शर्माजी ने ऑफिस मे ये किस्सा बताया तो सबने बुढ़िया से ही फल खरीदना प्रारम्भ कर दिया। तीन महीने बाद ऑफिस के लोगों ने स्टाफ क्लब की ओर से बुढ़िया को एक हाथ ठेला भेंट कर दिया। बुढ़िया अब बहुत खुश है। उचित खान पान के कारण उसका स्वास्थ्य भी पहले से बहुत अच्छा है। हर दिन शर्माजी और ऑफिस के दूसरे लोगों को दुआ देती नही थकती। शर्माजी के मन में भी अपनी बदली सोच और एक असहाय निर्बल महिला की सहायता करने की संतुष्टि का भाव रहता है। जीवन मे किसी बेसहारा की मदद करके देखो, अपनी पूरी जिंदगी में किये गए सभी कार्यों से ज्यादा संतोष मिलेगा। *****

  • गलती का एहसास

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव एक बार एक बहुत बड़ा व्यापारी एक छोटे से गांव में जाता है। उसका उद्देश्य होता है कि उस गांव में एक बड़ी सी फैक्ट्री लगानी है। वह एक ऐसी जगह पर पहुंच जाता है, जहां पर उसके सामने एक नदी होती है और उस नदी के सामने वह गांव होता है। अब उसके सामने दो रास्ते हैं – पहला यह कि वह सड़क के रास्ते घूम कर उस गांव तक पहुंचे, जिसमें लगभग 10 घंटे लगेंगे क्योंकि वहां तक पहुंचने का कोई सीधा रास्ता नहीं है। दूसरा रास्ता यह था कि वह एक नाव में बैठकर नदी के रास्ते उस गांव तक पहुंच जाए जिसमें केवल 20 मिनट ही लगते। अपना टाइम बचाने के लिए उसने उस नाव के जरिए गांव तक पहुंचने का फैसला किया। वह नांव बहुत छोटी सी थी, जिसमें एक तरफ वह आदमी बैठा था जो नांव चला रहा था और दूसरी तरफ वह व्यापारी बैठा था। नांव मैं बैठने के थोड़ी देर बाद उस व्यापारी ने नांव वाले से पूछा – “तुझे पता है तेरी नांव में कौन बैठा है? तो नांव वाले ने बड़े भोलेपन से कहा – “नहीं साहब मैं नहीं जानता। ” तब व्यापारी ने कहा – “अरे तू अखबार नहीं पड़ता है क्या? मेरी तस्वीर हर दूसरे-तीसरे दिन अखबार में छपती है।” तो नांव वाले ने कहा – “अरे साहब मुझे पढ़ना लिखना नहीं आता है। मैं बहुत छोटा सा था, जब मेरे पिताजी गुज़र गए थे औरअपने परिवार का ध्यान रखने के लिए मैं बचपन से ही काम में लग गया। इसलिए मेरा स्कूल बचपन में ही छूट गया था।” यह सुनकर उस व्यापारी ने नांव वाले का मजाक उड़ाते हुए कहा – “तुझे पढ़ना लिखना भी नहीं आता है। ऐसी जिंदगी का क्या फायदा।” यह सुनकर उस नांव वाले को बुरा तो लगा, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। थोड़ी देर बाद वह व्यापारी उस नांव वाले से बोला – “अभी कुछ दिन बाद, यह जो तू सामने जमीन देख रहा है ना, वहाँ मेरी एक बड़ी सी फैक्ट्री लगेगी जहां पर हम मिनरल वाटर की बोतल बनाएंगे। उस नांव वाले को बात समझ नहीं आई। उसने कहा किस चीज की फैक्ट्री? तो व्यापारी ने बड़े इरिटेट होकर उससे कहा कि – वहाँ पानी की बोतलें बनेंगी, जो तेरे गांव में नहीं बिकती लेकिन शहरों में बहुत बिकती है। तब नांव वाले ने कहा – अरे साहब मुझे कहां पता होगा। मैने तो कभी इस गांव से बाहर निकला ही नहीं। फिर व्यापारी ने उसके ऊपर हंसते हुए बोला – तू कभी इस गांव से बाहर तक नहीं गया। तुझे पता ही नहीं की शहर क्या होता है। ऐसी जिंदगी का क्या फायदा। उसकी बात सुनकर नांव वाले को सच में यह लगने लगा कि उसकी जिंदगी किसी काम की नहीं है। यह सोचते हुए उसकी नांव पर से से ध्यान हटी और नांव की एक बड़े से पत्थर से टक्कर हो गई। जिसकी वजह से नांव में पानी भरने लगा और नांव डूबने लगा। उस जगह पर पानी बहुत ही गहरा था और किनारा बहुत दूर था। नांव वाले को समझ आ गया कि अब इस नांव को बचाने का कोई तरीका नहीं है। फिर वह अपनी जान बचाने के लिए नदी में छलांग लगाने ही वाला था, तभी उसने व्यापारी ने पूछा – आपको तैरना तो आता है ना ? तो व्यापारी ने घबराकर पूछा – ऐसा क्यों पूछ रहे हो? मुझे तैरना नहीं आता है। उसकी यह बात सुनकर नांव वाले को हंसी आ गई और बोला – साहब आपको तैरना तक नहीं आता। ऐसी जिंदगी का क्या फायदा। यह सुनकर उस व्यापारी को अपनी गलती का एहसास हुआ और हाथ जोड़कर उसने नांव वाले से कहा – तुम जो मांगोगे मैं तुम्हें वह दूंगा, बस मेरी जान बचा लो। तो उस नांव वाले ने कहा – अरे साहब घबराओ नहीं। मुझे सिर्फ तैरना ही नहीं आता है, बल्कि डूबते हुए लोगों को बचाना भी आता है। आप मुझे कसकर पकड़ लो। मैं आपको कुछ नहीं होने दूंगा और फिर उस नांव वाले ने न सिर्फ अपनी, बल्कि उस व्यापारी की भी जान बचाई। तो हमें इस कहानी से एक बहुत बड़ी सीख मिलती है कि जिंदगी में कभी किसी की मजाक नहीं उड़ानी चाहिए या अपने से कम नहीं समझना चाहिए, क्योंकि हमें नहीं पता की कब, कहाँ और कैसे किसकी जरूरत पड़ जाए। ******

  • सच्चा सुख

    राजकुमार विजय और सविता की शादी को पचास साल पूरे हो चुके थे। दोनों की उम्र अब पचहत्तर से ऊपर थी, और इन सालों में उन्होंने हंसी-खुशी और प्यार भरी जिंदगी साथ बिताई थी। समय के साथ, उनके बीच का रिश्ता गहराता गया था, मानो दोनों सच में "दो जिस्म, एक जान" बन गए हों। सविता ने विजय के साथ हर सुख-दुख बांटा था। उनके बीच में शायद ही कोई राज हो, लेकिन एक राज ऐसा था, जो सविता ने कभी विजय को नहीं बताया था। उनकी अलमारी के सबसे ऊपरी हिस्से में एक पुराना जूतों का बॉक्स रखा था। सविता ने विजय को सख्त हिदायत दे रखी थी कि उस बॉक्स को बिना उनकी इजाजत के कोई हाथ न लगाए। विजय ने भी इस बात का सम्मान किया और कभी उस बॉक्स को खोलने की कोशिश नहीं की। वक्त बीतता गया और दोनों की जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव आए। उम्र के साथ बीमारियां भी दस्तक देने लगीं। सविता की सेहत दिन-ब-दिन गिरने लगी और एक दिन उन्हें महसूस हुआ कि उनका अंत निकट है। उस दिन उन्होंने विजय को पास बुलाया, और कहा, "आज मैं तुम्हें उस बॉक्स का राज बताने जा रही हूं।" विजय ने चौंकते हुए वह बॉक्स उठाया और सविता के पास ले आए। जैसे ही बॉक्स खोला, विजय की आंखें आश्चर्य से फैल गईं। बॉक्स में दो पुरानी खरोची हुई गुड़िया और ढेर सारे 100 रुपये के नोट थे। विजय को समझ नहीं आया कि इन चीजों का मतलब क्या है। उन्होंने सविता से सवाल किया, "ये गुड़िया और इतने सारे पैसे यहां क्यों रखे हैं?" सविता ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "जब हमारी शादी होने वाली थी, मेरी दादी ने मुझे एक सलाह दी थी। उन्होंने कहा था कि शादी को मजबूत बनाने के लिए हर छोटी-छोटी बात पर लड़ाई-झगड़ा करने के बजाय दिल से माफ करना सीखना। और अगर कभी मुझसे तुम्हारी किसी बात पर गुस्सा आए, तो वह गुस्सा तुम्हें जताने के बजाय इस गुड़िया को खरोच देना।" विजय यह सुनकर भावुक हो गए। पचास सालों में सविता को उनसे केवल दो बार ही इतनी शिकायत हुई थी कि उसे उन्होंने एक गुड़िया पर उकेरा। यह जानकर विजय की आंखों में आंसू आ गए, क्योंकि सविता का यह प्रेम और धैर्य उनके लिए अनमोल था। फिर विजय ने ढेर सारे 100 रुपये के नोटों के बारे में पूछा, जो करीब एक लाख रुपये थे। सविता मुस्कुराई और कहा, "यह पैसे मैंने उन खुशियों और संतोष के पलों के लिए जमा किए हैं, जो मैंने तुम्हारे साथ बिताए हैं। जब-जब मुझे तुमसे सच्चा सुख और संतोष महसूस हुआ, मैंने इस बॉक्स में एक नोट डाल दिया।" विजय की आंखें भर आईं, और उन्होंने सविता को गले लगा लिया। उन्होंने धीरे से कहा, "तुम्हारे जैसे जीवन साथी का साथ मिलना मेरे पिछले जन्मों के पुण्य होंगे।" यह सुनकर सविता ने विजय का हाथ थामा और मुस्कुराते हुए अपनी आंखें बंद कर लीं। ******

  • इंतज़ार की बरसात

    लक्ष्मी सारस्वत छोटे से शहर के कॉलेज में जब अदिति ने कदम रखा, तो उसकी आँखों में बड़े-बड़े सपने थे। उसकी सादगी और मासूमियत ने कॉलेज में आते ही सबका ध्यान अपनी ओर खींचा। वहीं दूसरी ओर, राघव कॉलेज का सबसे लोकप्रिय लड़का था - स्मार्ट, हैंडसम, और दिल का बहुत अच्छा। लेकिन राघव को प्यार पर विश्वास नहीं था। उसके लिए बस दोस्ती और मस्ती ही थी। एक दिन कॉलेज में एक नाटक हो रहा था और अदिति को मुख्य किरदार मिला। राघव भी उस नाटक का हिस्सा बन गया, और दोनों के बीच पहली बार नज़रें मिलीं। अदिति की मासूमियत और मुस्कुराहट ने राघव के दिल में हलचल मचा दी। धीरे-धीरे उनकी दोस्ती गहरी होती गई, और अदिति राघव के लिए खास बनती गई। अदिति ने राघव में वो सच्चाई देखी, जो शायद किसी और ने कभी नहीं देखी थी। उसका दिल अब राघव के बिना अधूरा महसूस करने लगा था। उसने अपने इस प्यार का इज़हार करने की सोची। लेकिन राघव को प्यार और रिश्तों पर भरोसा नहीं था; उसके दिल में एक पुराना घाव था, जो उसने कभी किसी को नहीं बताया था। एक दिन अदिति ने अपनी हिम्मत जुटाई और राघव के सामने अपने दिल की बात कह दी। पर राघव चुप था। उसके पास कोई जवाब नहीं था। अदिति की आँखों में आंसू थे, और उसने उसे कभी न बताने की कसम खाई थी, लेकिन दिल ने उसकी बात सुन ली थी। अदिति ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद शहर छोड़ने का फैसला किया। राघव को ये खबर सुनते ही उसके दिल में अजीब सा दर्द उठा। उसने कभी सोचा नहीं था कि अदिति इतनी महत्वपूर्ण हो जाएगी उसके जीवन में। अदिति चली गई, लेकिन उसके प्यार की निशानियाँ छोड़ गईं। राघव का दिल अब अधूरा महसूस करता था। उसने खुद से लड़ाई की, पर अदिति की यादें उसकी हर सोच में थीं। कई सालों बाद, राघव ने अपने दिल के जज्बातों को समझा और अदिति को वापस पाने के लिए उसे ढूंढने का फैसला किया। शहर, गलियां, यहां तक की कॉलेज के पुराने रास्तों पर वो अदिति को ढूंढने लगा। लेकिन अदिति कहीं नहीं थी। उसकी जिंदगी एक इंतज़ार बन गई थी, और हर बरसात की बूंद उसे अदिति की याद दिलाती थी। एक दिन, जब राघव बारिश में भीगते हुए एक पुरानी किताब की दुकान में गया, तो वहां उसने अदिति को देखा। अदिति भीग रही थी, लेकिन उसकी मुस्कान में वही मासूमियत थी। दोनों की नज़रें मिलीं और राघव ने अपने जज्बातों को कहने का साहस जुटाया। अदिति ने उसकी बात सुनी और मुस्कुराई। दोनों की आँखों में आँसू थे, और वो बरसात का मौसम गवाह बना उनके मिलन का। इंतजार खत्म हुआ, और वो दोनों एक-दूसरे के हो गए, जैसे ये बरसात हमेशा उनके इंतजार की कहानी कहती रहेगी। *****

  • चमत्कारी गुलाब

    सपना चौधरी कभी कभी कुछ बाते इंसान की समझ से बहुत दूर होती है। ऐसी ही बिलकुल समझ से बाहर थी रानी चित्रा। रानी चित्रा किसी चमत्कार से कम नहीं थी। कारण था रानी की सुंदरता। कहते थे रानी ने उम्र को बंदी बना लिया है। रानी 100 वर्ष की हो गई थी लेकिन अभी भी 25 वर्ष की भाती जवान और खूबसूरत थी। विश्वास के परे था इसलिये तो लोग चमत्कार कहते थे। रानी एक विशाल साम्राज्य की रानी थी। कहना था कि उसे अमरता का वरदान है। समय समय पर कई तरह के कायस रानी के लिये लगाये जाते थे। मानना था कि रानी के पास ऐसी कोई शक्ति है। जिससे वो अभी तक युवा अवस्था में ही है। रहस्यमयी होने के कारण रानी का सम्मान और उससे डरना स्वाभाविक था। रानी कीं आभा देखते ही बनती थी भरी सभा में जब वो आती थी तब उसकी सुंदरता को देख लोग आश्चर्य से भर जाते थे एक विशाल सिंघासन पर वो बैठती थी और स्वर्ण जड़ित वस्त्र. रानी के जुड़े में विशेष गुलाब होते थे। लोगों का मानना था कि वो गुलाब भी नहीं मुरझाते है। रानी सुन्दर थी और ऊपर से हमेशा जवान रहने वाली रानी कौन नहीं चाहेगा इसलिये रानी पर मोहित होने वाले राजकुमारो कीं कोई कमी नहीं होती थी। लेकिन रानी के यह रहस्य ही नहीं बल्कि एक रहस्य और था कि अब तक रानी कई बार विवाह कर चुकी है। लेकिन रानी के विवाह ज्यादा नहीं टिकते पहली रात के बाद ही रानी जिससे भी विवाह करती वो फिर नजर नहीं आता। एक रहस्य से भरी रानी। और रानी की इतनी रहस्यमयी बातें पता होने के बाद भी भी पता होने के बाद भी रानी के ऊपर मिटने वालों कीं कमी नहीं थी। एक अजीब सम्मोहन था जो सब को उसकी ओर खींचता था। ज़िज्ञासा वश ही कई राजकुमार जानना चाहते थे कि आखिर रानी के पास ऐसा क्या है, जिससे वो 100 वर्षो बाद भी अभी तक ज्यो कीं त्यों बनी हुई। पडोसी राज्य का एक युवा राजकुमार अब रानी पर मोहित हो गया। रानी को प्रस्ताव दिया कि वो उनसे विवाह करना चाहता है। बड़ा बहादुर था कई दिनों के बाद उसने यह निर्णय किया था। रानी को मिलने वो सभा में आया, रानी नें कहां कि 'मुझसे विवाह क्यों करना चाहते हो'। राजकुमार नें बोला 'ना करने कीं एक वजह आप बता दीजिये हमेशा युवा और इतना रहस्य इसे में अपनाना चाहता हूं'। रानी नें कहां कि 'क्या तुम्हे पता है बड़ी बड़ी बातें करने वाले मर्द पहली रात ही राजमहल छोड़ कर भाग जाते है।' राजकुमार बोला कि वो भागने वालों में से नहीं है। रानी बोली 'हमने यह दावे पहले भी सुनें है लेकिन जिस आश्चर्य को देखने वो आते है उसे देखने के बाद किसी को दिखाई नहीं देते है'। कई दिनों तक रानी ने उसे समझाने की कोशिश कि लेकिन राजकुमार अडीक रहा। रानी नें कहां कि 'हमने तुम्हे बहुत समझा दिया अब तुम्हारे साथ जो भी होगा उसके लिये तुम स्वयं जिम्मेदार होंगे'। रानी का विवाह एक बार फिर होना तय हुआ। राज्य में फिर से चर्चा का विषय बन गया सभी लोगों का मानना था कि पिछलों कीं तरह यह राजकुमार भी एक रात के बाद अदृश्य हो जायेगा। रानी के चेहरे पर एक अभिभान वाली मुस्कान थी। सारे राज्य को सजाया गया। और रानी का विवाह उस राजकुमार के साथ संपन्न हुआ। बस अब था उस रात का समय जिस रात में कई रहस्य है। जिस रात के बाद रानी के कोई राजकुमार फिर दिखाई नहीं देता था। रानी और राजकुमार कीं सुहागरात के लिये रानी का कक्ष विशेष रूप से सजाया गया। राजकुमार रानी के कक्ष में आया। उसे कुछ अजीब चीजे नजर आयी उसे कक्ष के भीतर एक पिंजरा दिखाई दिया जिसका दरवाजा खुला था। रानी बिस्तर पर बैठी थी। राजकुमार पहले से ही सतर्क था उसे पता था कि  रानी के कक्ष में कुछ भी हो सकता है इसलिये उसे जागे रहना है। रानी नें कहां क्यों इतने भयभीत क्यों हो आज हमारी सुहाग रात है। रानी खड़ी होकर राजकुमार के पास आ गई रानी उसे पिंजरे के मुँह के पास लें आयी। रानी नें अब राजकुमार कीं आँखों में देखना शुरू किया। राजकुमार रानी की सुंदरता पर मोहित हो गया उसकी बड़ी बड़ी आँखों में खो गया। राजकुमार ने रानी के बाल खोलना चाहे उसके जुड़े को हाथ लगया और उसमे लगे गुलाब के फूलो को निकालना चाहा। रानी डर गई और तुरंत ही राजकुमार का हाथ पकड़ लिया। रानी को डरते देख राजकुमार रुका फिर सोचा हो ना हो इसमें ही कुछ राज है। उसे पता चल गया था की इन फूलो में कुछ रहस्य है। रानी के मना करने पर वो उस समय रुक गया लेकिन उसके मन में यही था कि अब उसे इन फूलो को निकालना है। राजकुमार नें रानी को थोड़ी देर सहलाया फिर एकदम से उसके गुलाब को जुड़े से निकाल दिया. रानी ज़ोर से चिल्लाई कहां था उसे मत छूना। एक गुलाब निकलते ही रानी कुछ वर्ष अधिक आयु कीं हो गई। रानी अब गुस्से से लाल हो गई। राजकुमार बोला अच्छा तो यह है तुम्हारी आयु का रहस्य। अभी एक गुलाब निकला है अगर पुरे गुलाब को निकाल दिया जाये तो तुम पूरी वृद्ध हो जाओगी। राजकुमार बोला में तुम्हारा पति हूं मुझे अभी भी तुम बता सकती हो। आखिर यह गुलाब क्या है और तुम्हे कहाँ से प्राप्त हुऐ है। रानी डरी और राजकुमार के पास आयी बोली कि अगर तुम मुझे यह गुलाब दे दो तो में तुम्हे सच बता दूंगी। राजकुमार नें गुलाब दिया और रानी नें गुलाब लेते ही राजकुमार को पिंजरे के अंदर धक्का मारा। पिंजरे में भीतर जाते ही राजकुमार एक गुलाब का फूल बन गया। और रानी फिर जोर से हॅसते हुऐ बोली लें देख लें तेरे जैसे कितने मैने गुलाब बना कर अपने जुड़े में लगा लिये और उनकी आयु भी मुझे मिलने से में अभी तक जवान हूं। रानी नें पिजरें से गुलाब उठाया और अपने जुड़े में लगा लिया। यह पिजरा है रानी कीं आयु का रहस्य। रानी फिर सुबह सभा में गई और इस बार फिर राजकुमार रात के बाद दिखाई नहीं दिया। लेकिन रानी के जुड़े में एक फूल ओर जुड़ गया था। ******

  • निस्वार्थ प्रेम

    हेमा सिंह रवि की बहन की शादी को सात साल हो चुके थे। उसने कभी बहन के ससुराल जाने की जरूरत महसूस नहीं की थी, हालांकि उसके माता-पिता त्योहारों पर कभी-कभी वहां जाया करते थे। एक दिन रवि की पत्नी ने उससे शिकायत की, "तुम्हारी बहन जब भी आती है, उसके बच्चे घर को अस्त-व्यस्त कर देते हैं। खर्चा भी दोगुना हो जाता है। और तुम्हारी मां, उससे छुप-छुपकर कभी उसे साबुन, कपड़े, सर्फ का पैकेट तो कभी चावल का बोरा भी दे देती हैं।" उसने रवि से कहा, "अपने मां को समझाओ, ये हमारा घर है, कोई खैरात का सेंटर नहीं।" रवि को गुस्सा आ गया। वह खुद ही मुश्किल से घर का खर्च चला रहा था, और उसकी मां यूं बहन को सामान देती रहती थीं। एक दिन जब बहन घर आई थी, उसके बेटे ने गलती से टीवी का रिमोट तोड़ दिया। रवि ने गुस्से में अपनी मां से कहा, "मां, बहन से कहो कि बस राखी के दिन ही आया करे। और ये सब देना-लेना बंद कर दो।" मां चुप रहीं, लेकिन बहन ने सब सुन लिया। कुछ समय बाद, जब जमीन का बंटवारा हुआ तो रवि ने साफ इनकार कर दिया कि वह अपनी बहन को कोई हिस्सा नहीं देगा। बहन खामोश रही, कुछ नहीं बोली। मां ने कहा, "बेटी का भी हक होता है।" लेकिन रवि ने साफ मना कर दिया, और उसकी पत्नी भी बहन के खिलाफ बोलने लगी। समय बीता। रवि के बड़े बेटे की तबीयत अचानक खराब हो गई, और उसे इलाज के लिए पैसों की सख्त जरूरत थी। उसने कुछ कर्ज लिया, लेकिन मुश्किलें कम नहीं हो रही थीं। एक दिन परेशान रवि कमरे में अकेला बैठा रो रहा था। तभी उसकी बहन घर आई। रवि ने मन ही मन सोचा, "अब ये भी आ गई, मनहूसियत लेकर।" उसकी बहन पास आई, उसके सिर पर हाथ फेरा और प्यार से बोली, "तू परेशान क्यों होता है? बड़ी बहन हूँ तेरी।" फिर अपने पर्स से अपने सोने के कंगन निकाले और उसके हाथ में रख दिए। वह बोली, "ये बेच दे और अपने बेटे का इलाज करवा। किसी से मत कहना, मेरी कसम है तुझे।" वह रवि की ओर प्यार से देख रही थी और रवि की आंखों में आंसू थे। बहन ने जाते-जाते उसे एक हजार रुपये और दिए, जो उसने अपने पास धीरे-धीरे जोड़े थे। वह बोली, "बच्चों के लिए कुछ ला देना, और खुद को इतना परेशान मत किया कर।" जाते-जाते रवि ने देखा, उसकी बहन के पैरों में टूटी हुई जूती थी और उसने वही पुराना दुपट्टा ओढ़ रखा था जो वह हमेशा पहना करती थी। रवि को अपनी बहन की महानता का अहसास हुआ। वह सोचने लगा कि बहनें अपने भाई के हर दुःख को बिना कुछ कहे सह लेती हैं, लेकिन हम भाई कई बार अपने स्वार्थ में बहनों का दर्द महसूस नहीं कर पाते। रवि अब अपनी बहन की कुर्बानी और निस्वार्थ प्रेम को समझ चुका था। ******

  • एक भिखारी

    मालती त्रिपाठी पटना जंक्शन के बाहर फुटपाथ पर एक 25 साल की महिला बैठी थी। उसका चेहरा थका हुआ, आंखों के नीचे काले घेरे, होठ सूखे और कपड़े मैले-कुचैले थे। खूबसूरत तो थी, लेकिन हालात ने उसकी खूबसूरती को छुपा दिया था। वह राहगीरों से भीख मांगती, कभी पानी के लिए गुहार लगाती। लोग अक्सर उसे अनदेखा कर चले जाते, कोई सिक्का फेंक देता और कोई तिरस्कार से देखता। इसी भीड़ में एक दिन एक चमचमाती गाड़ी आकर रुकी। उसमें से एक 30 साल का युवक उतरा - साधारण कपड़े, चेहरे पर गंभीरता और आंखों में अपनापन। वह सीधा महिला के पास गया और बोला, “तुम्हें पैसों की जरूरत है ना? मैं तुम्हें 5 लाख दूंगा, लेकिन मेरे साथ होटल चलो।” यह सुनते ही भीड़ में खुसरपुसर शुरू हो गई। किसी ने घृणा से देखा, किसी ने तिरछी नजरों से। महिला के शरीर में सिहरन दौड़ गई, उसकी सांसें तेज हो गईं। पर युवक की आंखों में कोई लालच या हवस नहीं, बल्कि कुछ अलग था। वह गंभीरता से बोला, “डरने की जरूरत नहीं, बस चलो।” महिला डरते-डरते गाड़ी में बैठ गई। गाड़ी एक होटल के सामने रुकी। युवक ने उसे एक साफ-सुथरे कमरे में ले जाकर कहा, “यह कमरा तुम्हारे लिए है। आराम करो, पेट भर खाना खाओ। मैं तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचाऊंगा।” महिला की आंखों से आंसू बह निकले। शायद सालों बाद किसी ने उससे बिना शर्त इंसान की तरह बात की थी। उसने पूछा, “तुम यह सब क्यों कर रहे हो? तुम्हें मुझसे क्या चाहिए?” युवक मुस्कुराकर बोला, “मुझे बस तुम्हारी कहानी सुननी है। शायद उसमें मुझे वो सच्चाई मिले, जिसकी तलाश मैं कर रहा हूं।” महिला ने अपनी पूरी कहानी सुनाई - कैसे कम उम्र में शादी हुई, पति ने मारपीट की, छोड़कर चला गया, मायके में जगह नहीं मिली, शहर आकर काम ढूंढा, लेकिन हर जगह उसकी मजबूरी का फायदा उठाया गया। कई बार आत्महत्या का मन हुआ, लेकिन हर बार दिल ने कहा, शायद एक दिन हालात बदलेंगे। युवक चुपचाप सुनता रहा। फिर बोला, “अब तुम्हारी जिंदगी ऐसे नहीं कटेगी। मैं तुम्हें एक इज्जत वाली नौकरी दिलाऊंगा।” अगले दिन युवक उसे एक छोटे से रेस्टोरेंट में ले गया। मालिक से बात की और महिला को बर्तन धोने का काम दिलाया। “मेहनत करो, धीरे-धीरे किचन का काम भी सीख सकती हो,” युवक ने कहा। महिला ने काम शुरू किया। अब वह भीख नहीं मांगती थी, बल्कि मेहनत से कमाती थी। धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास लौटने लगा। कपड़े साफ रहने लगे, चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई। लोग अब उसे इज्जत से देखने लगे। युवक भी कभी-कभी आकर हालचाल पूछता, मदद करता, लेकिन कभी उसकी मेहनत में दखल नहीं देता। कुछ महीनों में महिला ने किचन का काम भी सीख लिया। मालिक ने उसकी लगन देखकर कहा, “तुम्हारे हाथों में स्वाद है।” महिला की जिंदगी बदलने लगी। युवक ने उसे पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया, किताबें लाकर दीं, बेसिक गणित और अंग्रेजी सिखाई। महिला हैरान थी कि कोई अजनबी उसके लिए इतना क्यों कर रहा है, लेकिन धीरे-धीरे उसे समझ आने लगा कि यही इंसानियत है। 6 महीने में महिला का आत्मविश्वास लौट आया। अब वह सिर झुकाकर नहीं, सीना तानकर चलती थी। लोग उसकी इज्जत करने लगे। पटना की वही सड़कें, जो कभी उसके लिए दर्द का आईना थीं, अब नई कहानी बन गई थीं। एक शाम युवक ने महिला से कहा, “तुम्हारे हाथ का स्वाद अलग है। क्यों न हम अपना खुद का रेस्टोरेंट खोलें?” महिला हैरान रह गई। उसने धीरे से कहा, “मेरे पास तो कुछ नहीं…” युवक बोला, “तुम्हारे पास मेहनत है, लगन है। बाकी सब मैं देख लूंगा।” कुछ ही समय में दोनों ने मिलकर एक छोटा सा रेस्टोरेंट खोला। महिला ने हर थाली में अपने संघर्ष और मेहनत का स्वाद घोल दिया। धीरे-धीरे रेस्टोरेंट चल निकला। लोग कहने लगे, “यहां का खाना घर जैसा है, लेकिन स्वाद अनोखा।” अखबारों में महिला का नाम छपने लगा - फुटपाथ से रेस्टोरेंट तक का सफर! युवक हर पल उसके साथ था। दोनों का रिश्ता अब साझेदारी से बढ़कर अपनापन बन गया। एक रात युवक ने कहा, “जब पहली बार तुम्हें देखा था, तो बस मदद करनी थी। अब लगता है, तुम्हारे बिना अधूरा हूं।” महिला की आंखों में आंसू आ गए। उसने सिर झुका कर कहा, “अब लगता है, यह सफर अकेले का नहीं है। हां, मैं तैयार हूं।” कुछ समय बाद दोनों ने सादगी से शादी की। महिला ने लाल साड़ी पहनी, चेहरे पर चमक और आंखों में खुशी के आंसू थे। आज वह सिर्फ एक पत्नी नहीं, बल्कि एक सफल बिजनेस वूमेन भी है। उसका रेस्टोरेंट अब शहर की पहचान बन चुका है। ******

  • हादसा

    संगीता अग्रवाल हैदराबाद की भीड़भाड़ भरी गलियों में एक मासूम बच्चा आर्यन फुटपाथ पर बैठा था। उसकी उम्र मुश्किल से 8 साल थी, लेकिन उसके चेहरे पर बचपन की मासूमियत से ज्यादा भूख और बेबसी की लकीरें साफ नजर आती थीं। फटे कपड़े, नंगे पैर और खाली आंखों में हजारों सपने। आर्यन कभी अपने माता-पिता के साथ एक छोटे से किराए के कमरे में रहता था। उसके पिता सत्यपाल मजदूरी करते थे और मां सुनीता सिलाई करती थीं। गरीब जरूर थे, लेकिन बेटे के लिए बड़े-बड़े सपने थे। सत्यपाल हमेशा कहते थे - ”आर्यन पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनेगा।” लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था। एक रात सड़क हादसे में उसके माता-पिता की मौत हो गई। आर्यन महज 5 साल का था। पड़ोसियों ने कुछ दिन साथ दिया, लेकिन धीरे-धीरे सब अपने-अपने काम में लग गए। कोई बोला - ”कब तक इस बच्चे को संभालेंगे?” और एक दिन आर्यन अकेला रह गया। अब उसकी जिंदगी फुटपाथ पर आ गई। वहीं सोना, जागना, भीख मांगना और पेट की आग बुझाने के लिए राहगीरों से उम्मीद करना। धीरे-धीरे वह दूसरे भिखारी बच्चों के साथ शामिल हो गया। मंदिरों के बाहर बैठना, कूड़े के ढेर से खाना तलाशना उसकी दिनचर्या बन गई। तीन साल गुजर गए। अब आर्यन 8 साल का हो चुका था। एक दिन जब वह सड़क किनारे बैठा था, उसकी नजर एक आदमी पर पड़ी। वह अच्छे कपड़े पहने, फोन पर बात करता हुआ सड़क पर टहल रहा था। उसका नाम था अरविंद - शहर के नामी उद्योगपति। अरविंद अपने फोन में इतना व्यस्त था कि उसे सड़क पर आती तेज रफ्तार कार का ध्यान ही नहीं था। आर्यन ने देखा कि कार सीधे अरविंद की ओर बढ़ रही है। उसके मन में अपने माता-पिता की मौत का दृश्य घूम गया। उसने जोर से आवाज लगाई - ”साहब हट जाइए, गाड़ी आ रही है!” लेकिन अरविंद ने सुना ही नहीं। तभी आर्यन दौड़ा और अरविंद को जोर से धक्का दे दिया। अरविंद सड़क के किनारे गिर पड़ा, कार पास से निकल गई। अगर आर्यन ने देर की होती तो शायद अरविंद की जान चली जाती। अरविंद ने पहले गुस्से में बच्चे को देखा, लेकिन तुरंत समझ गया कि उसकी जान बच गई है। उसने आर्यन को पास बुलाया, बेंच पर बैठाया और पूछा - ”तुमने मुझे क्यों बचाया?” आर्यन की आंखों में आंसू आ गए। उसने कहा - ”मेरे माता-पिता भी सड़क हादसे में मारे गए थे। मैं नहीं चाहता था कि आपके बच्चों को भी वही दर्द मिले जो मुझे मिला।” अरविंद भावुक हो गया। उसने आर्यन को खाना खिलाया। आर्यन ने कांपते हाथों से खाना खाया, जैसे हर निवाला उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा तोहफा हो। अरविंद सोचने लगा - क्या मैं इसे फिर से सड़क पर छोड़ दूं? नहीं, यह बच्चा अब मेरी जिम्मेदारी है। अरविंद ने आर्यन को अपने घर ले जाने का फैसला किया। उसकी पत्नी अनामिका ने पहले सवाल किए, लेकिन जब पूरी घटना सुनी तो उसकी आंखें भी नम हो गईं। अरविंद ने कहा - ”हमने 12 साल से संतान का इंतजार किया, शायद भगवान ने हमें यही बेटा दिया है।” अनामिका ने आर्यन को गले लगाया - ”अब तुम हमारे बेटे हो। तुम्हें पढ़ाई कराएंगे, अच्छे कपड़े देंगे, वही प्यार देंगे जो एक मां देती है।” आर्यन की आंखों में आंसू थे, लेकिन दिल में उम्मीद थी। अरविंद ने आर्यन का दाखिला शहर के सबसे अच्छे स्कूल में करवाया। पहली बार यूनिफार्म पहनकर स्कूल गया तो बच्चे उसका मजाक उड़ाते थे। लेकिन आर्यन ने मेहनत नहीं छोड़ी। धीरे-धीरे पढ़ाई और खेल में आगे बढ़ा। उसकी मेहनत देखकर टीचर भी प्रभावित हुए। यही ईश्वर की माया है कि जहाँ एक हादसे में बच्चे ने अपने माँ बाप को खो दिया, वहीं दूसरे हादसे में उसने अपने खोए माँ बाप को प्राप्त भी कर लिया।है। अतः ईश्वर पर विश्वास रखिए, क्योंकि वो यदि कभी कष्ट देता है तो दूसरे ही क्षणउस कष्ट का निवारण भी करता है। ******

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