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बड़े भाई साहब
मेरे भाई साहब मुझसे पाँच साल बड़े, लेकिन केवल तीन दर्जे आगे। उन्होंने भी उसी उम्र में पढ़ना शुरू किया था जब मैंने शुरू किया था, लेकिन तालीम जैसे महत्त्व के मामले में वह जल्दबाज़ी से काम लेना पसंद न करते थे। इस भवन की बुनियाद ख़ूब मज़बूत डालना चाहते थे, जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुख़्ता न हो, तो मकान कैसे पायेदार बने।
प्रेमचंद
Apr 613 min read


अंजाने रिश्ते
डॉ मंजु सैनी एक अनजाना सा रिश्ता मन का मीत बना और फिर बिछुड़ गया एक नश्तर बन मेरे जीवन में साथ निभाने की जो बातें हुईं छोड़ गया यूँ ही क्षण भर में आज नश्तर से चुभते हैं नासूर बन छोड़ गए चिह्न जीवंत हूँ तो टीसता हैं वो दर्द नजर अंदाज करती हूँ फिर भी खामोश रह जाती हूं सोचकर शायद यही किस्मत में लिखा है बस गया था सांसों में मानो रह नही पाऊँगी उस बिन पर चल रही हैं जिंदगी यूं ही अकेले सफर में चलते चलते ही रह गया हैं मात्र यादो का कारवां शायद कभी होगा मेरी यादों को उसका सही मुकाम मुक
डॉ मंजु सैनी
Feb 221 min read
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