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कर्तव्य और प्रेम
महत्त्वाकांक्षा जीवन को आगे बढ़ाती है, लेकिन संवेदनहीन महत्त्वाकांक्षा संबंधों को पीछे छोड़ सकती है। सच्ची सफलता वही है जिसमें मनुष्य अपने सपनों के साथ अपने कर्तव्यों और प्रियजनों को भी सम्मानपूर्वक साथ लेकर चले।
माता-पिता की सेवा केवल पुत्र का दायित्व नहीं; पुत्री भी समान प्रेम और अधिकार के साथ उनका सहारा बन सकती है। विवाह का अर्थ किसी स्त्री को उसके माता-पिता से अलग करना नहीं, बल्कि दो परिवारों और उनकी जिम्मेदारियों को समान सम्मान से जोड़ना है।
सुनील दत्त
15 hours ago11 min read
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