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बांझ

लक्ष्मी कुमावत

रचना को अब यहां घुटन हो रही थी। उस रिपोर्ट को हाथ में लिए वो सदमे में पिछले आधे घंटे से खड़ी हुई थी। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि उसके साथ इतना बड़ा धोखा हो रहा है। उसका पति मयंक उसके साथ इतना कुछ कर गया। उसे उसकी बिल्कुल उम्मीद नहीं थी। कहाँ तो वो दुनिया भर के ताने मयंक के प्यार में भुला देती थी।
और कहाँ ये रिपोर्ट? मयंक का प्यार केवल छलावा भर था। क्या सच है क्या झूठ, उसे अभी भी समझ में नहीं आ रहा था। पर इस बात को वो मयंक के मुंह से ही सुनना चाहती थी।
लेकिन वो तो अपने परिवार वालों के साथ अपनी छोटी बहन सावी की सगाई में गया हुआ था उसे अकेला यहां छोड़कर। क्योंकि अभी थोड़ी देर पहले काफी हंगामा हुआ था।
बरबस ही उसे वो दिन याद हो आया जब पाँच साल पहले वो मयंक की दुल्हन बनकर इस घर में आई थी। दोनों की ही अरेंज कम लव मैरिज थी। लव मैरिज जब मजबूरी में अरेंज की जाती है तब जाहिर सी बात है कि ससुराल वालों के दिल में बहू को जगह बनाने में वैसे भी बहुत देर लगती है।
शादी कर रचना जब ससुराल आई तो ससुराल में सास मालिनी जी, ननद सावी, देवर सुदेश और पति मयंक ही था।
घर में सास मालिनी जी का रुतबा था। मजाल है उनके सामने दोनों बेटे कुछ कह जाए। पर रचना ने अपनी तरफ से कहीं कोई कमी नहीं छोड़ी। अपनी तरफ से उसने हमेशा ससुराल वालों को खुश करने की कोशिश ही की। लेकिन ससुराल वालों को कभी खुश ना होना था, ना वो लोग हुए। और इस आग में घी का काम रचना के माँ न बनने ने पूरी तरह से किया।
शादी के दो तीन साल तक तो मयंक खुद ही बच्चा नहीं चाहता था। लेकिन एक साल पूरा होते होते तो मालिनी जी ने बच्चें की रट लगा दी। उनका बच्चे के लिए इतना मन देखकर आखिर मयंक फैमिली प्लान करने को तैयार हुआ। लेकिन काफी कोशिशों के बावजूद भी रचना कनसीव नहीं कर पाई।
इन्हीं कोशिशें में दो साल और निकल गए। साथ ही साथ मालिनी जी के ताने भी तेज होते गए। तब डॉक्टर के कहने पर दोनों ने अपना पूरा मेडिकल चेकअप करवाया।
पहले तो मयंक तैयार ही नहीं हुआ। और ना ही मालिनी जी इसके लिए तैयार थी। उनके अनुसार तो कमी रचना में ही थी। बड़ी मुश्किल से मयंक राजी हुआ था।
लेकिन जब रिपोर्ट आई तो पता चला कि कमी रचना में ही थी। हालांकि रचना ने रिपोर्ट नहीं देखी थी। उसने तो बस मयंक की बातों पर विश्वास किया था। बस तब से मालिनी जी ने मयंक की दूसरी शादी की बात शुरू कर दी। हालांकि मयंक कभी भी इसके लिए तैयार नहीं हुआ। उसने बच्चा गोद लेने के लिए भी कहा लेकिन मालिनी जी तैयार नहीं हुई।
अब तो देवर सुदेश की भी शादी हो चुकी थी और देवरानी नेहा ने दो महीने बाद ही खुशखबरी सुना दी। बस फिर क्या था?
तानों का वार और तेज होता गया। एक दिन ऐसा नहीं जाता था जब मालिनी जी उसके दिल के टुकड़े-टुकड़े ना कर देती। लेकिन हर बार मयंक उसके साथ खड़ा हो जाता। बस यही उसके लिए सुकून के पल होते थे। कुछ ही दिनों बाद मालिनी जी ने रचना का कमरा ऊपर वाले फ्लोर पर कर दिया। साथ ही एक छोटी रसोई भी बनवा दी। ये कहकर की कि वो रचना का साया नेहा पर नहीं पड़ने देगी।
आज देवरानी का बेटा भी एक साल का हो चुका है लेकिन मजाल हैं कि मालिनी जी ने आज तक उस बच्चे को रचना को हाथ तक लगाने दिया हो।
आज सावी की सगाई थी। खास ननद की सगाई थी लेकिन ये बात उसे पड़ोस में से पता चली।
सुबह जब सब लोग घर से निकलने की तैयारी कर रहे थे तो रचना वहां पहुंच गई। और सबसे पहला सवाल मालिनी जी से ही किया,
"मम्मी जी आपने बताया तक नहीं कि आज सावी की सगाई है। क्या मैं इस घर की सदस्य नहीं हूं। मुझे जानने का हक नहीं है?"
लेकिन मालिनी जी ने रचना की तरफ देखने की जगह मयंक से सवाल किया,
"तूने बताया नहीं इसे?"
इतने में मयंक रचना के पास आया और उसे ऊपर ले जाते हुए बोला,
"रचना अभी ये सब बातें छोड़ो। चलो, ऊपर चलो"
"नहीं मयंक, ये गलत है। मुझे पड़ोसियों से पता चल रहा है कि सावी की सगाई है। मैं भी तो भाभी हूं उसकी। ले जाना तो दूर की बात है। मैं ये बात जानूँ, क्या ये मेरा हक नहीं है"
इतने में मालिनी जी गुस्सा होते हुए बोली,
"आज खुशी का दिन है। और मैं चाहती हूँ कि मेरी बेटी की झोली आशीर्वाद से भरे। अपनी बेटी पर तेरा साया नहीं चाहती थी इसलिए तुझे नहीं बताया"
"मां अब बस भी करो ना। मैं रचना को लेकर जा तो रहा हूं। फिर क्यों बोले जा रही हो आप"
मयंक का रचना का साथ देना मालिनी जी को अच्छा नहीं लगा तो वो मयंक को सुनाते हुए बोली,
"हां तू ही साथ दे इसका। एक बार मेरी बेटी की शादी हो जाने दे। उसके बाद तो इसका इस घर से हमेशा हमेशा के लिए किस्सा ही खत्म करुँगी। मैं तेरी दूसरी शादी करवा कर ही रहूँगी। पता नहीं तू क्यों झेल रहा है इस बाँझ।। "
"बस करो मां। एक शब्द भी नहीं बोलोगी आप"
अचानक मयंक बोला तो मालिनी जी चुप हो गई। मयंक रचना का हाथ पकड़ कर उसे ऊपर लेकर आ गया।
रचना की आंखों से आंसू बहे जा रहे थे। मयंक उसे समझाते हुए बोला, "बस, इसीलिए मैं तुम्हें नहीं बता रहा था। मैं जानता था कि तुम्हें दुख होगा। क्योंकि माँ तुम्हें ले जाने को तैयार नहीं होगी। देखो रचना, मेरी बात को समझो। बड़ा भाई होने के नाते मुझे तो जाना ही पड़ेगा। पर मैं तुम्हारा दिल नहीं तोड़ना चाहता था। इसलिए तुम्हें नहीं बताया। प्लीज, मेरी बात को समझो"
मयंक अपनी बात समझाते हुए बोला। खूब देर तक उसे चुप कराने की कोशिश करता रहा। तभी नीचे से मालिनी जी की आवाज आई, "मयंक जल्दी चलो, देर हो रही है। लड़के वाले आ गए होंगे"
सुनकर मयंक ने रचना को कहा, "रचना, देखो मुझे अपनी जिम्मेदारी तो निभानी ही पड़ेगी ना। प्लीज तुम रो मत। अगर तुम इसी तरह रोती रहोगी तो मेरा दिल नहीं लगेगा। और अगर तुम चाहती हो तो मैं भी नहीं जाऊंगा। मैं तुम्हारे पास ही बैठ जाता हूं"
कह कर मयंक वही पलंग पर बैठ गया। उसे वहां ऐसे बैठे देखकर रचना के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई। वो अपने आंसू पोछते हुए बोली, "मैं भला कौन होती हूं एक भाई को अपनी बहन की सगाई में जाने से रोकने वाली। मैं सावी के इतने खूबसूरत दिन को खराब नहीं करूंगी। तुम जाओ। मैं नहीं रो रही हूं" कहते हुए रचना ने मयंक को वहां से विदा किया।मयंक को विदा करने के काफी देर तक रचना यूं ही चुपचाप बैठी रही। फिर पता नहीं क्या सोचकर अलमारी की सफाई करने लगी। उस अलमारी की सफाई जिसे मयंक कभी हाथ तक नहीं लगाने देता था। काफी दिन से मयंक अलमारी की सफाई करने के लिए कह रहा था।
सो रचना ने सोचा कि मयंक को तो वक्त मिल नहीं रहा है, इसलिए वो ही इसे साफ कर देगी।
और अलमारी की सफाई करते समय ये रिपोर्ट वाली फाइल उसके हाथ लगी। बस तब से रचना यूं ही शाॅक होकर बैठी हुई है।
कुछ सोच कर रचना उठी और घर को लॉक कर बाहर निकल गई। कुछ देर बाद सब लोग घर पर आ गए तब तक रचना भी घर आ गई। जब रचना वापस घर आई तो मयंक ने उसे देखकर कहा, "रचना कहां गई थी तुम?"
उसे देखकर रचना को बात करने की इच्छा नहीं हो रही थी। पर फिर भी बोली, "डॉक्टर के पास गई थी। मन कुछ खराब हो रहा था"
"क्या कहा डॉक्टर ने?" मयंक ने फिक्र जताते हुए कहा।
 "डॉक्टर ने कहा कि मैं मां बन सकती हूं। मुझ में कोई कमी नहीं है। इसलिए आते समय रास्ते में से मिठाई लेकर आई हूं" कहते हुए रचना मिठाई का डिब्बा लेकर मयंक के पास आई और उसे खोलकर मयंक का मुंह मीठा कराने लगी। पर मयंक ने उसका हाथ रोकते हुए कहा,
"पर रचना। वो पिछली मेडिकल रिपोर्ट तो।।।"
"अरे हां, वो मेडिकल रिपोर्ट। उस रिपोर्ट में तो कहीं नहीं लिखा था कि मैं माँ नहीं बन सकती। है ना मयंक?" रचना ने प्रश्न भरी नजरों से मयंक की तरफ देखा। तब तक मालिनी जी बोली, "अब चाहे तू कुछ भी तमाशा कर ले। तू इस घर में नहीं रहेगी। अब तो मैं अपने बेटे की दूसरी शादी कर के ही रहूंगी। तेरे जैसी बाँझ को तो इस घर में मैं बिल्कुल ना रहने दूँ"
"बाँझ?? आज ये शब्द चुभ नहीं रहा मुझे। जानते हो क्यों मयंक? क्योंकि आज तुम्हारी रिपोर्ट मेरे हाथ में आई। ये बाँझ शब्द तो उस 'धोखे' से बहुत छोटा है जो तुम मेरे साथ कर रहे थे। तुम्हारी मां मुझ पर तानों के वार पर वार किये जा रही थी और तुम? तुम चुपचाप सुने जा रहे थे। मुझे लगा था कि तुम मेरा साथ दे रहे हो। तुम मुझे अकेला कभी नहीं छोड़ोगे।लेकिन सबसे पहले अकेला तो तुमने छोड़ा मुझे। बस अब और नहीं"
"रचना मुझे माफ कर दो। मुझसे हिम्मत ही नहीं हुई कि मैं सबके सामने सच्चाई ।।।"
मयंक कहते-कहते चुप हो गया।
"तू क्यों उससे माफी मांग रहा है? इसके जैसी बहुत आएगी। जाने दे इसे। तेरे लिए मैं एक से बढ़कर एक रिश्ते लेकर आऊँगी "
"बिल्कुल लाइए मां जी, बिल्कुल लाइए। अपने बेटे की दूसरी शादी करवाईए। पर उससे भी कुछ नहीं होने वाला। क्योंकि आपका बेटा ही पिता नहीं बन सकता"
रचना की बात सुनकर मालिनी जी ने मयंक की तरफ देखा। मयंक गर्दन झुकाए खड़ा हुआ था। मालिनी जी को समझते देर नहीं लगी कि आखिर मयंक किस बात की माफी रचना से मांग रहा है। ये देखकर वो अपनी बात पलटते हुए बोली,
"बहु ठीक है, मयंक से गलती हो गई। अब तू क्या बात पकड़ कर बैठी हुई है। बच्चा नहीं हो सकता तो बच्चा गोद लिया जा भी सकता है"
"अरे वाह माँ जी, बहुत जल्दी बात पलटना तो कोई आपसे सीखे। बहु बाँझ है तो दूसरी बहू आ जाएगी। लेकिन बेटा बच्चा पैदा नहीं कर सकता तो बच्चा गोद ले लेंगे। क्यों? मुझे ये फैसला मंजुर नहीं है। मुझे इस धोखे से भरे हुए रिश्ते से छुटकारा चाहिए" कहकर रचना अपने कमरे में अपना सामान लेने चली गई। मालिनी जी ने उसे खूब रोकने की कोशिश की पर रचना नहीं रुकी। और आखिर ये रिश्ता यहीं खत्म हो गया।

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