औरतें
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अनु चक्रवर्ती
फिर जवान होने लगती हैं औरतें
दुनियादारी की जवाबदारी से
गुजरते हुए एक उम्र के बाद
फिर जवान होने लगती हैं औरतें
फैली हुई कमर और
एक मुट्ठी के पकड़ में आने लगी
पेट की चर्बी के साथ
आँखों के कोने में दिखने लगी
तीन लकीरों के साथ
घिसती है निचोड़े गये नींबू को
नाखूनों और गर्दन पर
बदलने लगती हैं अपने पहनावे के साथ
बालों की रंगत को भी
छोड़ देती है बालों को अक्सर खुले ही
कुछ अलग सी दिखने की चाह बढ़ सी जाती है
करती हैं खुद को निखारने के लिए
कुछ कुछ नये प्रयोग
छूटी हुई फुर्सत में जिम और योगा को भी
करती है खुद पर मेहरबां
घड़ी के कांटे पर टांग देती है खुद को
मगर बचना भी चाहती है उम्र की भागती हुई घड़ी से
जी लेना चाहती है बसंत की मादकता को
सावन की बरसती बूंदों की ठंडक का
जीभ पर लेना चाहती है स्वाद
पलाश के फूलों की तरह घुलकर किसी में
रंग देना चाहती है उसे एक नये रंग में
नहीं हटाती आँखों के ऊपर से
गीले बालों की जवान दिखती लटों को
पहले से ज्यादा याद करने लगती है
अपनी कमसिन दिनों की यादों को
फिर आजमाती है आईने में खुद को बार बार
ऐसा नहीं कि निकल जाना चाहती है
सुबह की पहली उबालती चाय से
दोपहर के चावल के माढ़ और जूठी होती थालियों से
न ही शाम की अगरबत्ती और
न रात की रोटी से निकलती गर्म भाप से
एक बार खुद को फिर सुलगाना चाहती है
अपनी बासी होती जिंदगी में आग लाने के लिए
उस आग में जलकर दमकने के लिए
फीकी पड़ने लगी जिंदगी के रंग को
सुर्ख करके थोड़ा और जी लेने के लिए
फिर जवान होने लगती हैं औरतें।
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