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बरसात की रात

डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव

दो-तीन दिन पहले की बात है। मैं अपनी 8 वर्षीय बेटी को स्कूल से लेने के लिए तीन बजे स्कूल के गेट पर पहुंचा। वहाँ बच्चों को लेने आए अभिभावकों की भीड़ थी। जूनियर के.जी. के बच्चे तीन बजकर दस मिनट पर बाहर आते हैं, जबकि बड़े बच्चे तीन बजे से ही बाहर आने लगते हैं। अचानक बारिश शुरू हो गई, और सभी ने अपनी-अपनी छतरियां खोल लीं। मेरे बगल में एक सज्जन खड़े थे, जिनके पास छतरी नहीं थी। मैंने शिष्टाचार के नाते उन्हें अपनी छतरी में बुला लिया।
उन्होंने कहा, "गाड़ी से जल्दी-जल्दी में आ गया, छतरी लाना भूल गया।"
मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "कोई बात नहीं, ऐसा हो जाता है।"
थोड़ी देर बाद उनका बेटा रेनकोट पहनकर बाहर आया। मैंने सज्जन को उनकी गाड़ी तक छोड़ दिया। जाते समय उन्होंने धन्यवाद कहते हुए मेरी ओर गहरी नजरों से देखा।
अगली रात, नौ बजे पाटिल साहब का बेटा मेरे पास आया। वह घबराए हुए थे।
"अंकल, गाड़ी चाहिए। रूबी (उनकी छह महीने की बेटी) की तबीयत बहुत खराब है, डॉक्टर के पास ले जाना है।"
मैंने तुरंत कहा, "चलो, चलते हैं।"
अंधेरी बरसाती रात में हम डॉक्टर के क्लिनिक पहुंचे। वहां दरवाजा बंद हो रहा था। कम्पाउंडर ने बताया कि डॉक्टर साहब लास्ट पेशेंट देख रहे हैं और अब सोमवार को ही नंबर लगेगा।
मैंने कम्पाउंडर से विनती की कि बच्ची की हालत खराब है, इसे आज ही दिखाने दें। इतने में डॉक्टर साहब चैंबर से बाहर आए। मेरी ओर देखा और ठिठक गए।
"अरे आप! कहिए सर, क्या बात है?"
डॉक्टर साहब वही व्यक्ति थे, जिन्हें स्कूल में मैंने छतरी दी थी।
डॉक्टर साहब ने बच्ची का मुआयना किया, दवा लिखी और कम्पाउंडर से कहा, "इन्हें इंजेक्शन तुरंत लगाओ और दवाएं अपने पास से दे दो।"
मैंने विरोध किया तो डॉक्टर साहब बोले, "अब इस बरसाती रात में आप दवा खोजने कहां जाएंगे। कुछ तो मुझे भी आपका रंग चढ़ने दीजिए।"
डॉक्टर साहब ने न फीस ली, न दवा का दाम। उन्होंने कम्पाउंडर से कहा, "ये हमारे मित्र हैं, इन्हें कभी आने से मना मत करना।"
डॉक्टर साहब ने हमें गाड़ी तक छोड़ा और जाते-जाते बोले, "सर, आप जैसे लोग इस दुनिया में हैं, तो इंसानियत ज़िंदा है।"
निस्वार्थ भाव से मदद करने का जो सुकून मिलता है, वह कहीं और नहीं। हमेशा बिना स्वार्थ दूसरों की मदद करते रहिए, शायद आपका यह भाव औरों पर भी असर करे।

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