मेरा घर
1 day ago
1 min read
प्रेमलता
एक शहर था
जो अपना था,
शहर की वो गली
जहां सब अपने थे,
गली का वो आख़िरी मकान
हां वही तो मेरा घर था,
घर का वो खुला आंगन
जहां खेला था मेरा बचपन,
आंगन से सटा वो कमरा
छोटा था पर हम सबका था,
कमरे से लगी वो सीढ़िया
जो मुझे छत से मिलाती थीं,
छत पर चलती वो ठंडी पुरवाई
जो मेरी हर थकान मिटा जाती थी,
एक अरसा हुआ अब
उस शहर को छोड़े,
हर बार अब वहां
कुछ नया सा लगता है,
कहीं भूल न जाए मुझे
वो शहर वो गली मेरी,
यह सोच कर भी
मुझे डर सा लगता है,
घर पहुंचता हूं जब तो वो भी
कुछ उखड़ा–उखड़ा सा लगता है,
बहुत दिनों बाद आए इस बार
शायद यही शिक़ायत करता है
*****



Comments