समर्पण
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राहुल द्विवेदी 'स्मित'
चिर व्यथा के शोक से निवृत्ति का है,
यह अकेला मंत्र सब स्वीकार कर लो।
प्राप्ति हो या जन्म, सबकुछ राम का है
इस समपर्ण हेतु मन तैयार कर लो।।
यह समय है यज्ञ की वेदी सजाकर
भक्ति की ज्वाला जलाकर व्योम कर दो।
मानवी दुर्बल कलाएँ, कामनाएँ
नम्र आहुतियों में तत्क्षण होम कर दो।
छोड़ कर भव बन्धनों की बेड़ियों को
राम के सुचि नाम को गलहार कर लो।
चिर व्यथा के.....।।
घोर निद्रा मोह की घेरे हुए है
क्रूर स्वप्नों की सतायी आत्माएँ।
जागते ही क्या निराशा, भय, अपेक्षा
क्या पतन, उत्थान की सम्भावनाएँ।
इसलिए जागो, चलो अब मुक्ति पथ पर
और नौका इस जगत से पार कर लो।
चिर व्यथा के.....।।
आँख मूँदे घोर तम की दृश्यता में
मन अभागा दौड़ता है, चीखता है।
पलक उठते ही अलौकिक चेतना में
दिव्य छवि का भव्य सौरभ दीखता है।
इस अवर्णित दिव्य छवि को ले हृदय में
इस अपावन देह का उद्धार कर लो।
चिर व्यथा के........।।
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