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अपनों के बीच

  • Jan 1, 2026
  • 1 min read

करुणा शंकर अवस्थी

 

कई बार

लौटते-लौटते

बहुत देर हो जाती है।

इतनी देर कि

हम खुद को भी

पहचान नहीं पाते।

अपना पता भी

ढूंढ़ नहीं पाते।

अपना शहर, अपनी गलियां

भूल चुकी होती हैं हमें।

खत्म हो चुके होते हैं

जाने कितने जन्म,

जाने कितने रिश्ते।

और इस तरह

हमारा लौटना,

लौटना नहीं होता।

हम सिर्फ आ जाते हैं

अनचाहे और अनजाने से

उन अपनों के बीच,

जिन्होंने कभी

हमारे लौट आने की

जाने कितनी दुआएं मांगी थीं।

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