एक्स्ट्रा टिफिन
- Jan 4
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सपना रानी
मै जैसे ही ऑफिस से निकला मुझे याद आया, मुझे अपने टिफिन का खाना फेंकना था। अगर खाना टिफिन में चला गया तो बीबी किच किच करेगी। आज टिफिन में लौकी की सब्ज़ी जो आई थी।
लौकी… उफ़्फ़ बेस्वाद सी सब्ज़ी, जो मुझे पसन्द नहीं आती। पता नहीं क्यों बीवी सेहत का ख्याल रखने पर तुली हुई है, लौकी की सब्ज़ी मेरे मुँह का स्वाद मार देती है और भूख मर जाती है मेरी।
मैंने पनीर कोफ़्ता और नान मंगवा कर बड़े चटखारे लेकर खाया था? और टिफिन जस का तस पड़ा रह गया था, पर घर पर तो यही दिखाना था कि मैंने टिफिन सारा खाली कर दिया है।
अब टिफिन खाकर खाली किया कि खाना फेंक कर बीवी कौन सा देखने आ रही थी...?
मैंने एक सुनसान गली के पास बाइक रोकी, बैग से टिफिन निकाला और पहले बॉक्स से सलाद नीचे गिराया, दूसरा बॉक्स जिसमें वही बेस्वाद लौकी की सब्ज़ी थी उसको खोलकर नीचे डालने ही वाला था कि एक आवाज़ आई...
“बाबूजी खाना मत फेंकिये, हमें दे दीजिए बाबूजी... सुबह से कुछ भी नहीं खाये हैं।” मैंने जिधर से वो दयनीय आवाज़ आ रही थी उधर नज़र घुमाई? वो कोई पचास साल का एक वृद्ध आदमी था।
वो देखने में बहुत गन्दा लग रहा था। उसकी याचना में बहुत करुणा थी। वो मेरे नजदीक आ गया, “बाबूजी हमको दे दीजिए खाना, भगवान आपका भला करेगा, इसे नाली में न गिराइये।” उसने फिर याचना की.....
मैंने तीसरे बॉक्स से रोटियाँ निकाली और उसकी तरफ बढ़ा दीं, उसने सिल्वर फॉयल में लपेटी हुई रोटियाँ खोलीं और उन्हें फैला दिया, मैंने उन फैलाई हुई रोटियों पर लौकी की वो बेस्वाद सब्ज़ी भी उड़ेल दी...
वो आदमी साईड में बैठकर लपलपाती जीभ के साथ खाने लगा। मैंने अपना टिफिन जब तक पैक करके बैग में डाला वो भूखा बुजुर्ग सारा खाना खत्म कर चुका था।
“भगवान आपका भला करे बाबूजी! आत्मा तृप्त हो गई हमारी। खाना बहुत स्वादिष्ट था बाबूजी... आप अब जब भी खाना फेंकने आएं? इधर ही फेंकना बाबूजी... हम यहीं भीख माँगते हैं, हमें नहीं तो किसी और को खाना मिल जाएगा।” कहते कहते बुड्ढे की आँखें भीग गईं....
मैंने उससे नजरें घुमा लीं, तो सामने की दीवार पर लिखा एक दोहा नज़र आया..
“रोटी तेरे मोल का, क्या मैं करूँ बखान।
धाये को माटी लगे, भूखे को भगवान।”
यह पढ़कर मुझे शर्मिंदगी हुई, मैंने झट से बाइक आगे बढ़ा ली। कितना सच लिखा हुआ था, रोटी का मोल तो केवल भूखा ही जानता है। हम जैसे भरे पेट वाले अपने टिफिन के खाने को फेंककर स्वाद के लिए बाहर से खाना मंगवाकर खा लेते हैं और ये गरीब आदमी रोटी रोटी को तरसते हैं। मुझे अपने आप पर शर्मिंदगी महसूस हो रही थी।
मैं अमीरी गरीबी तो नहीं मिटा सकता हूँ, पर खाना बर्बाद करने की जगह किसी भूखे जरूरतमंद को तो दे सकता हूँ, ये सोचते हुए मैं घर आ गया।
टिफिन निकालकर बीवी को पकड़ाया और उस बूढ़े भिखारी की कहे शब्द दोहरा दिए, “खाना बहुत स्वादिष्ट था, आत्मा तृप्त हो गई मेरी।”
“अच्छा जी, आज बड़ी तारीफ हो रही खाने की, मैं तो रोज़ ही स्वादिष्ट बनाती हूँ।” कहते हुए बीवी किचन की ओर बढ़ गई।
मैंने जैसे ही हाथ मुँह धोए वो चाय ले आई। मैंने चाय पीते हुए पत्नी से कहा, “कल से चार रोटी और कुछ सब्ज़ी ज़्यादा दे सकती हो क्या?”
“क्यों क्या बात हुई, इतना खाना खा पाओगे?” उसने पूछा।
“नहीं किन्हीं की भूख मिटानी है”, मैंने कहा।
पता नहीं बीवी ने कुछ समझा या नहीं, पर उसने चाय के बर्तन समेटते हुए कहा, “खाना तो ज़्यादा डाल दूँगी, पर एक्स्ट्रा टिफिन नहीं है, सिल्वर फोइल में डालकर पॉलीथिन में डाल दूँगी, चलेगा?”
“चलेगा” मैंने कहा और हम एक दूसरे को देखकर मुस्कुरा दिए....
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