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रिश्तों की असली कीमत

  • Dec 28, 2025
  • 5 min read

दीपक दिवाकर

पत्नी रचना ने जज के सामने ठंडे स्वर में कहा, “मुझे तलाक मंजूर है, लेकिन इसके बदले मुझे एक लाख रुपए चाहिए।”

पूरा कोर्टरूम सन्न रह गया। सबकी नजरें उस व्हीलचेयर पर बैठे विशाल की ओर मुड़ गईं। उसकी आँखों में कोई शिकवा नहीं था, बस एक गहरी चुप्पी थी।

तभी पीछे की बेंच से एक छोटा सा लड़का, अंश, उठा। उसके हाथ में एक मुड़ी-तुड़ी चिट्ठी थी। उसने कहा, “जज साहब, ये पापा ने मेरे लिए लिखी थी।”

उस चिट्ठी के शब्द अदालत की दीवारों को भी पिघला गए। जज साहब ने चिट्ठी खोली, पूरा कोर्टरूम खामोश हो गया।

चिट्ठी में लिखा था—

“प्रिय अंश,

अगर कभी तुम मेरी आँखों में खालीपन देखो तो समझना कि वह रोशनी तुम्हारे लिए बचाकर रखी है। अगर कभी माँ को मेरी हालत पर गुस्सा आए तो उसे दोष मत देना। उसका दर्द मुझसे ज्यादा है।

बेटा, तुम बड़े होकर बस इतना करना कि कभी किसी औरत को अकेला महसूस ना होने देना। और अगर मेरी हालत तुम्हें शर्मिंदगी दे तो जान लेना कि तुम्हारा पापा तुमसे बहुत प्यार करता था।”

जैसे ही ये शब्द अदालत में गूंजे, वहाँ मौजूद हर इंसान की आँखें भर आईं। रचना का चेहरा पीला पड़ गया, उसकी आँखें नीचे झुक गईं। विशाल अब भी चुप था, लेकिन उसकी आँखों से आंसू बह रहे थे।

शायद इसलिए कि उसने अपने बेटे को अपने सबसे गहरे जज्बात सौंप दिए थे।

जज साहब ने कुछ देर तक खामोशी के बाद कहा, “यह मामला अब सिर्फ कानून का नहीं रहा, बल्कि इंसानियत और रिश्तों की सच्चाई का इम्तिहान बन गया है।”

रचना के दिल पर चिट्ठी के शब्द जैसे हथौड़े की चोट कर रहे थे। उसने पहली बार अपने बेटे की आँखों में वह दर्द देखा, जो उसने कभी महसूस करने की कोशिश ही नहीं की थी।

अंश की मासूम निगाहें पूछ रही थीं-माँ, क्या हमारे रिश्ते की कीमत सिर्फ रुपयों में लगाई जा सकती है?

रचना का चेहरा लाल हो गया। उसने अपने आंचल से पसीना पोंछा, लेकिन उसके गाल पर अब आंसुओं की बूंदें भी उतर आई थीं।

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