चाँद...
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किरण मोरे
क्या कहूँ तेरी खूबसूरती के बारे में, चाँद...
किसी शर्माती हसीना की तरह...
तू पेड़ों में छिप जाती है,
पेड़ों को आँचल बनाकर... नज़रों से हट जाती है...
क्या कहूँ तेरी खूबसूरती के बारे में...
जितना कहूँ, सब फीका पड़ जाता है...
किसी ने बहुत खूब कहा है...
मत ढँको मेरे चाँद को... इन ईंट की दीवारों से...
वो भूल न जाए कहीं खुलकर जीना...
फिर मैं क्यों बाँधूँ तुझे...
अपनी आँखों के धागों से...?
क्या कहूँ मैं तेरी खूबसूरती के बारे में, चाँद...
तू ही बता...
जो कहूँ... सब फीका पड़ जाता है..
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