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अधूरा वादा

संजय नायक

आज सुबह से जगदिश प्रसाद बहुत खुश था, अपनी बरसों पुरानी साईकिल को ग्रीस, आयल लगाकर और सरसों का तेल लगाकर एकदम चकाचक करने में मशगूल था, उसे यूँ तल्लीन देख पत्नी ने उसे टोका, "इस बरसों से पड़ी खटारा को क्यों इतना चमका रहे हो,और भी बहुत काम पड़े हैं, उनमें हाथ बंटा दो।"

"अरी भाग्यवान जानती हो न, आज मेरा पोता सात साल बाद घर आ रहा है, 3 महीने का था तब उसे लेकर गए थे अरुण और बहू, आज वो बेटे से किया अधूरा वादा पूरा करने का समय आ गया है।

याद है अरुण को जब पहली बार इसकी आगे वाली सीट पर बिठाकर घुमाकर लाया था तो उसने पूछा था, बाबा आपको भी किसी ने ऐसे बिठाकर घुमाया था क्या? तो मैंने उसे कहा था कि मेरे बचपन मे साईकिल होना कोई छोटी बात न थी। छोटी तो अरुण के बचपन मे भी न थी, पर मैं पैसे बचाकर ये रामप्यारी ले आया था। उस दिन अरुण ने मासूमियत से पूछा था पापा मेरे भी बच्चा होगा क्या?

तो मैंने उसे कहा था हाँ क्यों नहीं होगा, जरूर होगा। तब उसने वादा लिया था कि बाबा वादा करो मेरे बच्चे को भी यूँ ही साईकिल की आगे वाली सीट पर बैठाकर घुमाओगे बड़ा मजा आता है। तब से वो अधूरा वादा पूरा किये जाने की बाट जोह रहा हूँ, और आज मेरे पोते को इसपर घुमाकर वो अधूरा वादा पूरा जरूर करूँगा।" जगदीश के चेहरे पर चमक आ गई थी।

"आप भी बहुत बचकानी बातें करते हैं। उसने बचपने में वो कह दिया और आप अभी तक उसे दिल से लगाये बैठे हैं अरुण तो भूल भी गया होगा।"

"अरी वो भूला तो क्या हुआ, मैं तो नहीं भूला न बेटे से किया वादा आज जरूर पूरा करूँगा।" "ठीक है ठीक है….जब ये रामप्यारी चमक जाये तो थोड़ा काम में हाथ बंटा देना बहुत काम पड़े है। सालों बाद बेटा घर आ रहा है।" कहकर कमला काम में लग गई।

शाम को अरुण पत्नी और बेटे के साथ घर आ गया। जगदीश ने बड़े प्यार से पोते को साईकिल पर बैठाना चाहा तो वो बिदक गया, "डेडा मैं इस खटारा पर नहीं बैठने वाला, मुझे तो बस स्केटिंग करनी है।"

और वो अपने स्केटिंग शूज उठा लाया। अरुण ने भी कहा "बाबा आप अभी तक इस कबाड़ को घर में ही रखे हुए हो, मैंने सोचा आपने अब तक इसे कबाड़ी को दे दी होगी।"

"अरे ऐसे कैसे दे देता इसे कबाड़ी को, तुमने ही वादा लिया था, कि मेरे बच्चे को इसकी अगली सीट पर बैठाकर घुमाना।" "अरे बाबा आप अब तक उस बचपने की बात को मन में लिए बैठे हो, वो बात तभी आई गई हो गई,जमाना बदल गया है। आजकल के बच्चों को ये सब आनन्द नहीं देता।" अरुण ने जगदीश को झिड़का।

सुबह सवेरे ही जगदीश ने कबाड़ी वाले को बुला लिया और रामप्यारी को उसे बेच दिया। कबाड़ी वाले के उसे ले जाने से पहले जगदिश ने कई बार उसे प्यार से सहलाया।

शाम को जब अरुण जाने को हुआ तो जगदीश ने उसे मायूसी से कहा, बेटा एक बात कहनी है। अपने बच्चे के बचपने पर उसे कोई वादा न करना, जमाना बदल गया है, हो सकता है बदले जमाने में तुम बेटे से किया वादा पूरा न कर सको और वो अधूरा रह जाये, अपनों से किये अधूरे वादे बहुत खटकते हैं।"

तभी अरूण का बेटा स्केटिंग करते हुए आया और कार में बैठ गया। अरुण अपने जाते हुए पिता की पीठ देख रहा था कभी अपने बेटे को।

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