top of page

धूम्रपान- एक आह्वान

Sep 12
1 min read

साची सेठ

 

आओ, मैं तुम्हें पिऊँ

दोनों अंगुलियों में भींचकर

अधर रस से सींचकर

आंख भीच कर।

आओ, तुम!

एक के बाद दूसरी

दूसरी के बाद तीसरी

तुम मेरी प्यास।

तुम ! मेरी भूख!

तुम! मेरी नींद!

तुम ! मेरी हाजत!

तुम्हारा जीवन दर्शन,

राख और धुंआ

मेरा अज्ञान मिटाता

या ज्ञान घटाता

निराशा को दूर कर

आशा की किरण दिखाता

अरे मूढ़! पीले मेरा धुआं,

हृदयसात् करले मुझे

मेरा अक्स तेरे दिल पर,

पड़े बिना नहीं रह सकता।

तब कहना

हाय! हाय!

******

Comments


bottom of page