निस्वार्थ प्रेम
- Dec 25, 2025
- 2 min read
हेमा सिंह
रवि की बहन की शादी को सात साल हो चुके थे। उसने कभी बहन के ससुराल जाने की जरूरत महसूस नहीं की थी, हालांकि उसके माता-पिता त्योहारों पर कभी-कभी वहां जाया करते थे।
एक दिन रवि की पत्नी ने उससे शिकायत की, "तुम्हारी बहन जब भी आती है, उसके बच्चे घर को अस्त-व्यस्त कर देते हैं। खर्चा भी दोगुना हो जाता है। और तुम्हारी मां, उससे छुप-छुपकर कभी उसे साबुन, कपड़े, सर्फ का पैकेट तो कभी चावल का बोरा भी दे देती हैं।" उसने रवि से कहा, "अपने मां को समझाओ, ये हमारा घर है, कोई खैरात का सेंटर नहीं।"
रवि को गुस्सा आ गया। वह खुद ही मुश्किल से घर का खर्च चला रहा था, और उसकी मां यूं बहन को सामान देती रहती थीं। एक दिन जब बहन घर आई थी, उसके बेटे ने गलती से टीवी का रिमोट तोड़ दिया। रवि ने गुस्से में अपनी मां से कहा, "मां, बहन से कहो कि बस राखी के दिन ही आया करे। और ये सब देना-लेना बंद कर दो।" मां चुप रहीं, लेकिन बहन ने सब सुन लिया।
कुछ समय बाद, जब जमीन का बंटवारा हुआ तो रवि ने साफ इनकार कर दिया कि वह अपनी बहन को कोई हिस्सा नहीं देगा। बहन खामोश रही, कुछ नहीं बोली। मां ने कहा, "बेटी का भी हक होता है।" लेकिन रवि ने साफ मना कर दिया, और उसकी पत्नी भी बहन के खिलाफ बोलने लगी।
समय बीता। रवि के बड़े बेटे की तबीयत अचानक खराब हो गई, और उसे इलाज के लिए पैसों की सख्त जरूरत थी। उसने कुछ कर्ज लिया, लेकिन मुश्किलें कम नहीं हो रही थीं। एक दिन परेशान रवि कमरे में अकेला बैठा रो रहा था। तभी उसकी बहन घर आई। रवि ने मन ही मन सोचा, "अब ये भी आ गई, मनहूसियत लेकर।"
उसकी बहन पास आई, उसके सिर पर हाथ फेरा और प्यार से बोली, "तू परेशान क्यों होता है? बड़ी बहन हूँ तेरी।" फिर अपने पर्स से अपने सोने के कंगन निकाले और उसके हाथ में रख दिए। वह बोली, "ये बेच दे और अपने बेटे का इलाज करवा। किसी से मत कहना, मेरी कसम है तुझे।"
वह रवि की ओर प्यार से देख रही थी और रवि की आंखों में आंसू थे। बहन ने जाते-जाते उसे एक हजार रुपये और दिए, जो उसने अपने पास धीरे-धीरे जोड़े थे। वह बोली, "बच्चों के लिए कुछ ला देना, और खुद को इतना परेशान मत किया कर।"
जाते-जाते रवि ने देखा, उसकी बहन के पैरों में टूटी हुई जूती थी और उसने वही पुराना दुपट्टा ओढ़ रखा था जो वह हमेशा पहना करती थी। रवि को अपनी बहन की महानता का अहसास हुआ।
वह सोचने लगा कि बहनें अपने भाई के हर दुःख को बिना कुछ कहे सह लेती हैं, लेकिन हम भाई कई बार अपने स्वार्थ में बहनों का दर्द महसूस नहीं कर पाते। रवि अब अपनी बहन की कुर्बानी और निस्वार्थ प्रेम को समझ चुका था।
******



Comments