पिता का आशीर्वाद
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डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव
यह लोकप्रचलित प्रेरक कथा गुजरात के प्रसिद्ध बंदरगाह नगर खंभात के एक व्यापारी परिवार की है। उस परिवार में न अपार धन था, न कोई बड़ा व्यापार; फिर भी नगर के लोग परिवार के मुखिया रामदास का बहुत सम्मान करते थे। इसका कारण उनकी संपत्ति नहीं, बल्कि उनकी ईमानदारी थी।
रामदास ने जीवनभर छोटा-मोटा व्यापार किया। कभी लाभ मिला, कभी हानि उठानी पड़ी, परंतु कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने सत्य का मार्ग नहीं छोड़ा। गलत नाप-तौल, मिलावट और छल-कपट से उन्होंने हमेशा दूरी बनाए रखी। उनकी मान्यता थी—“धन कम हो तो मनुष्य सादगी से जीवन बिता सकता है, पर चरित्र खो जाए तो संसार की सारी संपत्ति भी उसे सुख नहीं दे सकती।”
समय बीतता गया। वृद्धावस्था में रामदास का स्वास्थ्य गिरने लगा। जब उन्हें अनुभव हुआ कि जीवन की अंतिम घड़ी निकट है, तब उन्होंने अपने इकलौते पुत्र धर्मपाल को पास बुलाया। धर्मपाल पिता के सिरहाने बैठ गया। पिता का दुर्बल चेहरा देखकर उसकी आंखें भर आईं।
रामदास ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा—“बेटा, मैं तुम्हारे लिए कोई बड़ी संपत्ति एकत्र नहीं कर सका। न मेरे पास तुम्हें देने के लिए सोने-चांदी का भंडार है, न कोई विशाल दुकान। जीवनभर जितना कमाया, उतने में परिवार की आवश्यकताएं पूरी होती रहीं।” धर्मपाल ने पिता का हाथ पकड़ लिया।
“पिताजी, आपने मुझे अच्छे संस्कार दिए हैं। मेरे लिए इससे बड़ी संपत्ति और क्या हो सकती है?”
रामदास की आंखों में संतोष की चमक उभरी। उन्होंने कहा—“मैंने जीवन में अभाव अवश्य देखे, लेकिन कभी किसी का अधिकार नहीं छीना। कठिनाइयां आईं, फिर भी ईश्वर पर विश्वास और अपने श्रम पर भरोसा नहीं छोड़ा। उसी सत्य और निष्ठा की शक्ति से तुम्हें आशीर्वाद देता हूं—तुम जीवन में सुखी रहोगे। ईमानदारी से कर्म करते रहना; फिर जिस धूल को भी हाथ लगाओगे, वह तुम्हारे लिए सोना बन जाएगी।”
धर्मपाल ने झुककर पिता के चरण स्पर्श किए। “मैं आपके आशीर्वाद के योग्य बनने का प्रयास करूंगा, पिताजी”
रामदास ने उसके सिर पर हाथ रखा, ईश्वर का नाम लिया और कुछ समय बाद शांतिपूर्वक अपनी अंतिम सांस ली।
पिता के निधन के बाद घर की पूरी जिम्मेदारी धर्मपाल पर आ गई। परिवार के पास इतना धन नहीं था कि वह कोई बड़ी दुकान खोल सके। उसने कुछ सामान उधार लिया और एक छोटे से ठेले पर मसाले तथा दैनिक उपयोग की वस्तुएं बेचने लगा। वह सुबह सूर्योदय से पहले उठ जाता। बाजार से ताजा और अच्छा सामान लाता, ठेला साफ करता और पूरे दिन मेहनत करता। पिता की तरह उसने भी सही नाप-तौल और उचित मूल्य को अपने व्यापार का नियम बना लिया।
यदि किसी ग्राहक से भूलवश अधिक पैसे मिल जाते तो वह तुरंत लौटा देता। किसी वस्तु में कमी होती तो पहले ही बता देता। निर्धन ग्राहक के पास पूरे पैसे न हों तो उसे उधार सामान दे देता और भुगतान के लिए कभी अपमानित नहीं करता।
लोग कहने लगे—“धर्मपाल के ठेले से निश्चिंत होकर सामान खरीदो। वहां न मिलावट मिलेगी, न तौल में कमी।” विश्वास बढ़ा तो ग्राहक बढ़ने लगे। कुछ वर्षों में ठेले की जगह एक छोटी-सी दुकान खुल गई। फिर दुकान बड़ी हुई और उसने थोक व्यापार आरंभ कर दिया। आसपास के नगरों से व्यापारी उसके पास सामान खरीदने आने लगे।
धर्मपाल प्रत्येक सफलता के बाद पिता के चित्र के सामने दीपक जलाता और कहता—“यह सब आपके आशीर्वाद और दिए हुए संस्कारों का फल है।”
धीरे-धीरे उसकी गणना नगर के संपन्न व्यापारियों में होने लगी। लेकिन संपन्नता आने के बाद भी उसके व्यवहार में अभिमान नहीं आया। वह अपने कर्मचारियों से सम्मानपूर्वक बात करता, जरूरतमंदों की सहायता करता और लाभ का एक भाग सेवा-कार्यों में लगाता।
वह लोगों से अक्सर कहा करता—“मेरे पिता ने मुझे धन नहीं दिया, पर धन कमाने योग्य चरित्र दिया। उनके आशीर्वाद ने मुझे हर कठिनाई में सही निर्णय लेने की बुद्धि दी है।”
एक दिन उसके मित्र ने हंसते हुए पूछा—“धर्मपाल, तुम प्रत्येक सफलता का श्रेय अपने पिता के आशीर्वाद को देते हो। यदि उनके आशीर्वाद और चरित्र में इतना ही बल था, तो वे स्वयं धनवान क्यों नहीं बन सके?”
धर्मपाल ने बिना नाराज हुए उत्तर दिया—“मैं अपने पिता की संपत्ति की नहीं, उनके आशीर्वाद की शक्ति की बात करता हूं। प्रत्येक जीवन का प्रयोजन अलग होता है। संभव है, उनका काम धन जुटाना नहीं, मुझे सत्य और ईमानदारी का मार्ग दिखाना था। उन्होंने जो स्वयं नहीं पाया, उसके लिए ईर्ष्या नहीं की; बल्कि अपने पुत्र को आगे बढ़ने का आशीर्वाद दिया। इससे बड़ी उदारता क्या होगी?” उसका मित्र निरुत्तर हो गया।
धर्मपाल के मुख से पिता के आशीर्वाद की चर्चा इतनी बार सुनाई देती थी कि कुछ लोग हंसी में उसे ‘बाप का आशीर्वाद’ कहने लगे। धर्मपाल को इस नाम से बुरा नहीं लगता था। वह मुस्कराकर कहता—“यह तो मेरे लिए सम्मान की बात है। मेरी केवल यही कामना है कि मैं जीवनभर अपने पिता के आशीर्वाद के योग्य बना रहूं।”
समय के साथ धर्मपाल ने समुद्री मार्ग से विदेशों में भी व्यापार आरंभ कर दिया। वह जिस वस्तु का व्यापार करता, उसमें उसे लाभ मिलता। इसका कारण केवल भाग्य नहीं था। वह बाजार का गहरा अध्ययन करता, अच्छी गुणवत्ता का माल खरीदता, समय पर भुगतान करता और व्यापारियों का विश्वास कभी नहीं तोड़ता।
फिर भी उसके मन में यह विश्वास दृढ़ होता गया कि पिता का आशीर्वाद अदृश्य कवच की तरह उसकी रक्षा कर रहा है। एक दिन उसके मन में एक विचित्र विचार आया—“मैंने व्यापार में अनेक बार लाभ देखा, लेकिन कभी बड़ी हानि का अनुभव नहीं किया। क्या सचमुच पिता का आशीर्वाद हर परिस्थिति में मेरा साथ देगा?”
उसने अपने एक व्यापारी मित्र से कहा—“मुझे ऐसा व्यापार बताओ जिसमें लाभ की कोई संभावना न हो। मैं एक बार जानबूझकर हानि का अनुभव करना चाहता हूं।” मित्र ने समझा कि लगातार सफलता ने धर्मपाल को अभिमानी बना दिया है। उसने सोचा—इसे ऐसा व्यापार बताता हूं जिसमें इसे भारी घाटा होगा। तब इसका भ्रम टूट जाएगा।
उसने कहा—“यदि तुम्हें वास्तव में नुकसान उठाना है तो भारत से लौंग खरीदकर जंजीबार ले जाओ और वहां बेचने का प्रयास करो।” धर्मपाल ने आश्चर्य से पूछा—“जंजीबार में लौंग बेचूं?”
“हां। जंजीबार तो स्वयं लौंग उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। वहां से लौंग भारत आती है और यहां ऊंचे मूल्य पर बिकती है। यदि तुम भारत में महंगी लौंग खरीदकर उसी देश में ले जाओगे जहां वह अत्यंत सस्ती है, तो तुम्हारे माल का कोई खरीदार नहीं मिलेगा। इससे निश्चित व्यापारिक हानि और क्या हो सकती है?”
धर्मपाल कुछ देर सोचता रहा। फिर बोला—“तुम्हारा सुझाव मुझे स्वीकार है। मैं लौंग लेकर जंजीबार जाऊंगा।” मित्र ने उसे समझाने का अभिनय किया, लेकिन भीतर ही भीतर प्रसन्न था कि अब धर्मपाल को अपनी सफलता की वास्तविकता समझ आएगी।
धर्मपाल ने भारत के बाजार से बड़ी मात्रा में लौंग खरीदी। जहाज में माल रखवाया और स्वयं उसके साथ जंजीबार के लिए चल पड़ा। लंबी समुद्री यात्रा के बाद जहाज जंजीबार के तट पर पहुंचा। बंदरगाह के समीप हवा में मसालों की सुगंध घुली थी। गोदाम लौंग की बोरियों से भरे पड़े थे और स्थानीय व्यापारी अत्यंत कम मूल्य पर उसका व्यापार कर रहे थे।
यह दृश्य देखकर जहाज के एक कर्मचारी ने कहा—“सेठजी, यहां आपकी लौंग कौन खरीदेगा? लगता है इस यात्रा में हमें भारी नुकसान उठाना पड़ेगा।”
धर्मपाल शांत स्वर में बोला—“लाभ और हानि अभी भविष्य के गर्भ में हैं। हमारा काम ईमानदारी से प्रयास करना है। परिणाम की चिंता बाद में करेंगे।”
जहाज से उतरकर धर्मपाल स्थानीय व्यापारियों से मिलने के लिए समुद्रतट के पास बने रेतीले मार्ग पर चल पड़ा। कुछ दूर जाने पर उसे सामने से एक राजसी व्यक्ति आता दिखाई दिया। उसके साथ बड़ी संख्या में सैनिक और सेवक थे। आश्चर्य की बात यह थी कि सैनिकों के हाथों में तलवारें अथवा बंदूकें नहीं, बल्कि बड़ी-बड़ी छलनियां थीं। वे थोड़ी-थोड़ी दूरी पर रेत उठाकर छान रहे थे।
धर्मपाल ने पास खड़े एक व्यक्ति से पूछा—“ये कौन हैं और इतने सैनिक रेत क्यों छान रहे हैं?”
उस व्यक्ति ने उत्तर दिया—“ये हमारे सुल्तान हैं। उनकी कोई मूल्यवान वस्तु यहां खो गई है। सैनिक उसी को ढूंढ़ रहे हैं।” धर्मपाल सम्मानपूर्वक मार्ग के एक ओर खड़ा हो गया। सुल्तान की दृष्टि उसके विदेशी वस्त्रों और व्यापारी वेशभूषा पर पड़ी तो वे उसके पास रुक गए। “तुम इस देश के निवासी नहीं लगते। कौन हो और कहां से आए हो?”
धर्मपाल ने झुककर अभिवादन किया। “हुजूर, मेरा नाम धर्मपाल है। मैं भारत के खंभात नगर का व्यापारी हूं। यहां व्यापार करने आया हूं।” भारतीय व्यापारी का परिचय पाकर सुल्तान ने आत्मीयता से पूछा—“तुम्हारा जंजीबार में स्वागत है। भारत से क्या माल लेकर आए हो?”
धर्मपाल उत्तर देता, उससे पहले उसकी उत्सुकता छलनियों की ओर चली गई। उसने विनम्रता से पूछा—“यदि अनुमति हो तो जान सकता हूं कि आपके सैनिक इस विशाल समुद्रतट की रेत क्यों छान रहे हैं?”
सुल्तान ने अपनी खाली उंगली दिखाते हुए कहा—“आज प्रातः भ्रमण करते समय मेरी अंगूठी कहीं रेत में गिर गई। बहुत खोजने पर भी नहीं मिली, इसलिए सैनिकों को रेत छानने का आदेश दिया है।”
धर्मपाल ने पूछा—“अंगूठी अवश्य बहुत मूल्यवान होगी?”
सुल्तान ने गंभीर होकर कहा—“सोने और हीरों की दृष्टि से उसका मूल्य अधिक नहीं है। मेरे खजाने में उससे कहीं अधिक मूल्यवान आभूषण हैं। लेकिन वह अंगूठी मुझे एक फकीर ने आशीर्वाद के रूप में दी थी।” सुल्तान की आंखों में श्रद्धा उतर आई। “उस फकीर ने कहा था कि जब तक मैं न्याय और करुणा से शासन करूंगा, ईश्वर की कृपा मेरी प्रजा पर बनी रहेगी। मेरे लिए वह अंगूठी सल्तनत से भी अधिक मूल्यवान है, क्योंकि वह मुझे प्रतिदिन अपने कर्तव्य की याद दिलाती है।”
धर्मपाल ने कहा—“तब वह केवल अंगूठी नहीं, आपके लिए आशीर्वाद और उत्तरदायित्व का प्रतीक है। उसे अवश्य मिलना चाहिए।”
सुल्तान ने पुनः पूछा—“अब बताओ, भारत से क्या माल लेकर आए हो?”
“लौंग।”
“लौंग!”
सुल्तान ने समझा कि उसने शायद ठीक नहीं सुना। “तुम भारत से लौंग खरीदकर जंजीबार में बेचने आए हो? यहां तो प्रत्येक खेत में लौंग उगती है। बाजार में अत्यंत कम मूल्य पर ढेरों लौंग उपलब्ध है। तुम्हें ऐसा व्यापार करने की सलाह किसने दी? वह तुम्हारा मित्र था या शत्रु?” धर्मपाल मुस्करा दिया। “मुझे ज्ञात है कि यहां लौंग बहुत सस्ती है। मैं जानबूझकर ऐसा माल लेकर आया हूं।” “लेकिन क्यों?”
धर्मपाल ने पूरी बात बता दी—“मेरे पिता जीवनभर ईमानदारी और सत्य के मार्ग पर चलते रहे। उनके पास मुझे देने के लिए धन नहीं था। मृत्यु से पहले उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया था कि ईमानदारी से कर्म करता रहूं तो मेरे हाथ में आई धूल भी सोना बन जाएगी।” सुल्तान ध्यान से उसकी बात सुनते रहे।
धर्मपाल ने आगे कहा—“तब से मैंने जो भी व्यापार किया, उसमें लाभ मिला। इसलिए इस बार मैं ऐसा व्यापार करना चाहता था जिसमें हानि निश्चित दिखाई दे। मैं यह देखने आया हूं कि कठिन और प्रतिकूल परिस्थिति में भी पिता का आशीर्वाद मेरा साथ देता है या नहीं।”
सुल्तान ने कहा—“तो क्या तुम्हें विश्वास है कि भारत से लाई लौंग यहां भी लाभ में बिक जाएगी?”
“मुझे अपने पिता के शब्दों पर विश्वास है, लेकिन उससे अधिक उनके दिए संस्कारों पर। उन्होंने यह नहीं कहा था कि बिना श्रम के चमत्कार होगा। उनका आशय था कि सत्य, धैर्य और पुरुषार्थ के साथ किया गया प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता।” इतना कहते हुए धर्मपाल सहज भाव से नीचे झुका। उसने समुद्रतट की रेत की एक मुट्ठी उठाई और कहा—“देखिए हुजूर, मेरे पिता कहते थे कि आशीर्वाद हो और मनुष्य उसके योग्य कर्म करे, तो ऐसी साधारण धूल भी उसके लिए सोना बन सकती है।”
उसने धीरे-धीरे अपनी मुट्ठी खोल दी। रेत उसकी उंगलियों के बीच से नीचे गिरने लगी। लेकिन रेत पूरी तरह गिर जाने के बाद उसकी हथेली में कोई चमकती हुई वस्तु रह गई। धर्मपाल ने आश्चर्य से अपनी हथेली देखी। वह हीरे जड़ी एक सुंदर अंगूठी थी। सुल्तान की आंखें विस्मय से फैल गईं। उन्होंने तुरंत अपनी उंगली आगे बढ़ाकर कहा— “यही है! यही मेरी खोई हुई अंगूठी है!”
सैनिक, सेवक और आसपास खड़े लोग स्तब्ध रह गए। जिस अंगूठी को सैकड़ों सैनिक छलनियों से रेत छानकर नहीं खोज सके थे, वह धर्मपाल की पहली ही मुट्ठी में आ गई थी।
सुल्तान ने आकाश की ओर देखकर कहा—“हे पालनहार! तेरी करामात अद्भुत है। आज एक पिता का आशीर्वाद दूसरे फकीर के आशीर्वाद से आ मिला।”
धर्मपाल ने विनम्रता से उत्तर दिया—“हुजूर, आशीर्वाद देने वाले अलग हो सकते हैं, लेकिन उन्हें फल प्रदान करने वाला परमात्मा एक ही है।”
धर्मपाल का उत्तर सुनकर सुल्तान अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने अंगूठी पहन ली और भावावेश में धर्मपाल को गले लगा लिया। “सेठ, आज तुमने मुझे मेरी सल्तनत की सबसे प्रिय वस्तु लौटा दी। मांगो—आज जो चाहोगे, तुम्हें दिया जाएगा।”
धर्मपाल ने हाथ जोड़कर कहा—“आप दीर्घायु हों, न्यायपूर्वक शासन करें और आपकी प्रजा सुखी रहे—मेरे लिए यही सबसे बड़ा पुरस्कार होगा।” सुल्तान उसके उत्तर से और अधिक प्रभावित हुए।
“तुम व्यापारी होकर भी अपने लिए कुछ नहीं मांगते?”
धर्मपाल ने कहा—“मेरे पिता ने मुझे सिखाया था कि आवश्यकता से अधिक प्राप्त करने की इच्छा अंततः मनुष्य की शांति छीन लेती है। मुझे जितना चाहिए, ईश्वर ने उससे अधिक ही दिया है।”
सुल्तान ने कुछ क्षण विचार किया और फिर अपने मंत्री से कहा—“धर्मपाल भारत से जितनी भी लौंग लाया है, वह सारी राजभंडार के लिए खरीद ली जाए।”
धर्मपाल ने तुरंत कहा—“हुजूर, मेरे माल का मूल्य स्थानीय लौंग से अधिक है। केवल प्रसन्न होकर राज्य के धन का अनुचित व्यय मत कीजिए।” सुल्तान मुस्कराए।
“मैं तुम्हारे माल को सामान्य बाजार के लिए नहीं खरीद रहा। अगले महीने हमारे पड़ोसी राज्य के शासक का विवाह है। राजपरंपरा के अनुसार हम उन्हें विदेशी मसालों का विशेष उपहार भेजेंगे। तुम्हारी लौंग भारत के बाजार से चुनी और वहां पैक की गई है; वह हमारे लिए विदेशी व्यापार तथा मैत्री का प्रतीक बनेगी। इसलिए उसका उचित मूल्य दिया जाएगा, उपहार नहीं।”
धर्मपाल ने देखा कि सुल्तान दया नहीं, एक सम्मानजनक व्यापारिक सौदा कर रहे हैं। उसने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। सुल्तान ने उसके सारे माल को उचित लाभ के साथ खरीद लिया। इतना ही नहीं, उन्होंने धर्मपाल की ईमानदारी से प्रभावित होकर उसे राजकीय व्यापार के लिए विशेष अनुमति भी प्रदान की।
धर्मपाल जिस व्यापार में निश्चित हानि उठाने आया था, वही उसके जीवन का सबसे लाभकारी और प्रतिष्ठित सौदा बन गया। भारत लौटने पर मित्र ने उसका स्वागत करते हुए पूछा—“कहो, इस बार कितना नुकसान हुआ?”
धर्मपाल मुस्कराया और पूरी घटना सुना दी।
मित्र आश्चर्य से उसका चेहरा देखता रह गया। फिर लज्जित होकर बोला—“मैंने तुम्हारा अभिमान तोड़ने के लिए यह सलाह दी थी। सोचा था, भारी घाटा होगा तो पिता के आशीर्वाद की चर्चा छोड़ दोगे।”
धर्मपाल ने उसके कंधे पर हाथ रखा। “तुम्हारी सलाह ने मेरा विश्वास नहीं तोड़ा, बल्कि मुझे एक बात और समझा दी।” “वह क्या?”
“माता-पिता का आशीर्वाद भाग्य का ऐसा प्रमाणपत्र नहीं है जिसके सहारे मनुष्य बिना सोचे-समझे कोई भी काम करता रहे। यदि मैं केवल चमत्कार की प्रतीक्षा करता, बाजार की जानकारी न लेता, ईमानदारी से व्यवहार न करता और सुल्तान का विश्वास न जीतता, तो संभव है अंगूठी मिलने के बाद भी कुछ प्राप्त न होता। आशीर्वाद हमें अवसर देता है; उसे सफलता में बदलना हमारे चरित्र, विवेक और कर्म पर निर्भर करता है।”
मित्र ने सिर झुका लिया। “मुझे क्षमा कर दो। मैंने तुम्हारे विश्वास का उपहास किया।”
धर्मपाल ने कहा—“तुम मेरे मित्र हो। तुम्हारी सलाह ने ही मुझे इस अनुभव तक पहुंचाया। मैं तुमसे नाराज कैसे हो सकता हूं?” उस दिन से नगर के लोग धर्मपाल को केवल ‘बाप का आशीर्वाद’ कहकर चिढ़ाते नहीं थे, बल्कि सम्मान से उसी नाम से पुकारते थे।
धर्मपाल जब भी अपनी सफलता की चर्चा करता तो कहता—“मेरे पिता का आशीर्वाद मेरे लिए कोई जादुई मंत्र नहीं था। वह उनकी सत्यनिष्ठा, तपस्या और निष्कलंक जीवन की संचित शक्ति थी। उस आशीर्वाद ने मुझे सोना नहीं दिया; उसने मुझे ऐसा चरित्र दिया, जो धूल में भी अवसर पहचान सके।”
जीवन-संदेश : माता-पिता का आशीर्वाद जीवन की अमूल्य संपत्ति है, लेकिन उसका अर्थ यह नहीं कि संतान बिना परिश्रम किए सफलता प्राप्त कर लेगी। आशीर्वाद दिशा देता है, संकट में साहस देता है और सही निर्णय लेने के लिए अंतःकरण को जागृत रखता है। उसे फलित करने के लिए ईमानदारी, विनम्रता, विवेक और निरंतर पुरुषार्थ आवश्यक हैं।
माता-पिता जीवन के वे दो महान मार्गदर्शक हैं—मां संतान के मन की मौन भाषा समझती है और पिता उसके भविष्य के लिए मार्ग तैयार करता है। उनके अनुभव, संस्कार और शुभकामनाएं कठिन समय में अदृश्य कवच बनकर हमारी रक्षा करते हैं।
अपने माता-पिता और बुजुर्गों का सम्मान कीजिए। उनकी सेवा केवल सामाजिक कर्तव्य नहीं, अपनी जड़ों के प्रति कृतज्ञता है। माता-पिता का आशीर्वाद धूल को अपने आप सोना नहीं बनाता; वह संतान को ऐसी दृष्टि, शक्ति और पात्रता देता है कि वह धूल में छिपा सोना पहचान सके।
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